वैष्णव खण्ड · अध्याय 138
शंख-पूजन फल का कथन
श्लोक 1 (skanda.2.138.1)
।। ब्रह्मोवाच ।। ।। पंचामृतस्य स्नपनाद्यत्फलं लभते हरेः।। शंखोदकेन यत्किंचित्तन्मे ब्रूह्यजिताऽच्युत
brahmovāca paṁcāmṛtasya snapanādyatphalaṁ labhate hareḥ śaṁkhodakena yatkiṁcittanme brūhyajitā'cyuta
ब्रह्मा जी ने कहा — हरि को पंचामृत से स्नान कराने का जो फल प्राप्त होता है, और शंख के जल से जो कुछ भी फल प्राप्त होता है, हे अजित अच्युत! वह मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.2.138.2)
।। ।। श्रीभगवानुवाच।। ।। क्षीरस्नानं प्रकुर्वंति ये नरा मम मूर्द्धनि।। शताश्वमेधजं पुण्यं बिंदुना बिंदुना स्मृतम्
śrībhagavānuvāca kṣīrasnānaṁ prakurvaṁti ye narā mama mūrddhani śatāśvamedhajaṁ puṇyaṁ biṁdunā biṁdunā smṛtam
श्रीभगवान ने कहा — जो मनुष्य मेरे मस्तक पर दुग्ध से स्नान कराते हैं, उन्हें प्रत्येक बूँद के लिए सौ अश्वमेध यज्ञों का पुण्य स्मृत है।
श्लोक 3 (skanda.2.138.3)
क्षीराद्दशगुणं दध्ना घृतेनैव दशोत्तरम्।। मधुना तद्दशगुणं सितया तु ततोऽधिकम् ।। गंधपुष्पोदके मंत्रं सर्वोत्कृष्टं प्रशस्यते
kṣīrāddaśaguṇaṁ dadhnā ghṛtenaiva daśottaram madhunā taddaśaguṇaṁ sitayā tu tato'dhikam gaṁdhapuṣpodake maṁtraṁ sarvotkṛṣṭaṁ praśasyate
दुग्ध से दस गुना फल दही से, और उससे दस गुना अधिक घी से प्राप्त होता है; उससे दस गुना मधु से, और उससे भी अधिक शक्कर से; परन्तु गंधयुक्त पुष्पजल के साथ मंत्रोच्चारण सबसे उत्कृष्ट कहा गया है।
श्लोक 4 (skanda.2.138.4)
द्वादश्यां पंचदश्यां वा गव्येन पयसा मम ।। स्नापनं देवशार्दूल महापातकनाशनम्
dvādaśyāṁ paṁcadaśyāṁ vā gavyena payasā mama snāpanaṁ devaśārdūla mahāpātakanāśanam
हे देवशार्दूल! द्वादशी अथवा पूर्णिमा के दिन मुझे गाय के दूध से स्नान कराना महापातकों का नाश करने वाला है।
श्लोक 5 (skanda.2.138.5)
दध्यादीनां विकाराणां क्षीरतः संभवो यथा ।। तथैव शेषकामानां क्षीरस्नपनतो मम
dadhyādīnāṁ vikārāṇāṁ kṣīrataḥ saṁbhavo yathā tathaiva śeṣakāmānāṁ kṣīrasnapanato mama
जैसे दही आदि विकार दुग्ध से ही उत्पन्न होते हैं, वैसे ही मुझे दुग्ध से स्नान कराने से शेष सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.138.6)
क्षीरस्नानेन सौभाग्यं दध्ना मिष्टान्नभोजनम्।। घृतेन स्नापयेद्यो मां नरो मम पुरं व्रजेत्
kṣīrasnānena saubhāgyaṁ dadhnā miṣṭānnabhojanam ghṛtena snāpayedyo māṁ naro mama puraṁ vrajet
दुग्ध-स्नान से सौभाग्य मिलता है, दही से मिष्टान्न-भोजन; जो मनुष्य घी से मुझे स्नान कराता है, वह मेरे धाम को प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (skanda.2.138.7)
मधुना सितया यस्तु कारयेन्मार्गशीर्षके ।। स राजा जायते लोके पुनः स्वर्गादिहागतः
madhunā sitayā yastu kārayenmārgaśīrṣake sa rājā jāyate loke punaḥ svargādihāgataḥ
जो मार्गशीर्ष में मधु और शक्कर से मुझे स्नान कराता है, वह स्वर्ग से लौटकर इस लोक में पुनः राजा होकर जन्म लेता है।
श्लोक 8 (skanda.2.138.8)
गजाश्वरथसंपूर्णं स राज्यं लभते भुवि ।। कारयेन्मार्गशीर्षे वै यः क्षीरस्नापनं मम
gajāśvarathasaṁpūrṇaṁ sa rājyaṁ labhate bhuvi kārayenmārgaśīrṣe vai yaḥ kṣīrasnāpanaṁ mama
जो मार्गशीर्ष में मुझे दुग्ध से स्नान कराता है, वह पृथ्वी पर हाथी, घोड़े और रथों से परिपूर्ण राज्य प्राप्त करता है।
श्लोक 9 (skanda.2.138.9)
स्वर्गे लोके स जयति चंद्रेंद्ररुद्रमारुतान् ।। क्षीरस्नानं परं श्रेष्ठं मार्गशीर्षे च पुत्रक
svarge loke sa jayati caṁdreṁdrarudramārutān kṣīrasnānaṁ paraṁ śreṣṭhaṁ mārgaśīrṣe ca putraka
हे पुत्र! वह स्वर्गलोक में चन्द्र, इन्द्र, रुद्र और वायु को भी जीत लेता है; मार्गशीर्ष में दुग्ध-स्नान सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 10 (skanda.2.138.10)
क्षीरस्नपनमाहात्म्यं वर्चस्कं पुष्टिवर्धनम् ।। दौर्भाग्यं विलयं याति क्षीरस्नानेन मे सुत
kṣīrasnapanamāhātmyaṁ varcaskaṁ puṣṭivardhanam daurbhāgyaṁ vilayaṁ yāti kṣīrasnānena me suta
हे पुत्र! दुग्ध-स्नान का माहात्म्य तेज देने वाला और पुष्टि बढ़ाने वाला है; मेरे दुग्ध-स्नान से दुर्भाग्य विलीन हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.2.138.11)
स्नापयेन्मार्गशीर्षे मां यो वै पंचाऽमृतेन तु ।। स न शोच्यो भवेज्जंतुर्बंधुना भुवि मानद
snāpayenmārgaśīrṣe māṁ yo vai paṁcā'mṛtena tu sa na śocyo bhavejjaṁturbaṁdhunā bhuvi mānada
हे मानद! जो मार्गशीर्ष में मुझे पंचामृत से स्नान कराता है, वह प्राणी पृथ्वी पर अपने बंधुओं के लिए कभी शोक का विषय नहीं होता।
श्लोक 12 (skanda.2.138.12)
कपिलाक्षीरमादाय यः स्नापयति मां सुत ।। कपिलाशतदानस्य फलं प्राप्नोति मानवः
kapilākṣīramādāya yaḥ snāpayati māṁ suta kapilāśatadānasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ
हे पुत्र! जो कपिला गाय का दूध लेकर मुझे स्नान कराता है, वह मनुष्य सौ कपिला-गौओं के दान का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.2.138.13)
शंखे तीर्थोदकं कृत्वा यः स्नापयति देशिकः ।। बिंदुनाऽपि सहोमासे स्वकुलं तारयेद्धि सः
śaṁkhe tīrthodakaṁ kṛtvā yaḥ snāpayati deśikaḥ biṁdunā'pi sahomāse svakulaṁ tārayeddhi saḥ
जो आचार्य शंख में तीर्थ-जल भरकर, सहोम मास (मार्गशीर्ष) में एक बूँद से भी स्नान कराता है, वह अपने कुल को तार देता है।
श्लोक 14 (skanda.2.138.14)
कापिलं क्षीरमादाय शंखे कृत्वा च मानवः ।। यः स्नापयति मां भक्त्या सर्वतीर्थफलं लभेत्
kāpilaṁ kṣīramādāya śaṁkhe kṛtvā ca mānavaḥ yaḥ snāpayati māṁ bhaktyā sarvatīrthaphalaṁ labhet
हे पुत्र! जो कपिला गाय का दूध लेकर उसे शंख में भरकर भक्तिपूर्वक मुझे स्नान कराता है, वह समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 15 (skanda.2.138.15)
शंखे कृत्वा तु पानीयं साक्षतं कुशसंयुतम् ।। यः स्नापयेत्सहोमासे सर्वतीर्थफलं लभेत्
śaṁkhe kṛtvā tu pānīyaṁ sākṣataṁ kuśasaṁyutam yaḥ snāpayetsahomāse sarvatīrthaphalaṁ labhet
जो शंख में जल भरकर, अक्षत और कुश सहित, सहोम मास में उससे स्नान कराता है, वह समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 16 (skanda.2.138.16)
शंखाष्टकेन यः स्नानं कारयेन्मार्गशीर्षके ।। भक्त्या भगवतः श्रेष्ठो मम लोके महीयते
śaṁkhāṣṭakena yaḥ snānaṁ kārayenmārgaśīrṣake bhaktyā bhagavataḥ śreṣṭho mama loke mahīyate
जो मार्गशीर्ष में आठ शंखों से भक्तिपूर्वक भगवान का स्नान कराता है, वह मेरे लोक में श्रेष्ठ और महिमामंडित होता है।
श्लोक 17 (skanda.2.138.17)
शंखषोडशकेनाथ यः स्नापयति मे सुत ।। स पापमुक्तः सुचिरं स्वर्गलोके महीयते
śaṁkhaṣoḍaśakenātha yaḥ snāpayati me suta sa pāpamuktaḥ suciraṁ svargaloke mahīyate
हे पुत्र! जो सोलह शंखों से मुझे स्नान कराता है, वह पापमुक्त होकर बहुत काल तक स्वर्गलोक में महिमामंडित रहता है।
श्लोक 18 (skanda.2.138.18)
चतुर्विंशतिसंख्याकैः शंखैर्यः स्नापयेच्च माम् ।। इंद्रलोके चिरं स्थित्वा स राजा भुवि जायते
caturviṁśatisaṁkhyākaiḥ śaṁkhairyaḥ snāpayecca mām iṁdraloke ciraṁ sthitvā sa rājā bhuvi jāyate
जो चौबीस शंखों से मुझे स्नान कराता है, वह इन्द्रलोक में चिरकाल तक रहकर पृथ्वी पर राजा होकर जन्म लेता है।
श्लोक 19 (skanda.2.138.19)
शंखाऽष्टोत्तरशतेनैव स्नापयेन्मार्गशीर्षके ।। शंखेशंखे सुवर्णस्य फलं प्राप्नोति मानवः
śaṁkhā'ṣṭottaraśatenaiva snāpayenmārgaśīrṣake śaṁkheśaṁkhe suvarṇasya phalaṁ prāpnoti mānavaḥ
जो मार्गशीर्ष में एक सौ आठ शंखों से स्नान कराता है, वह मनुष्य प्रत्येक शंख के बदले स्वर्ण-दान का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 20 (skanda.2.138.20)
मार्गशीर्षे भक्तिमान्यः कृत्वा शंखध्वनिं हि माम् ।। स्नापयेत्पितरस्तस्य स्वर्गं तावत्प्रतिष्ठिताः
mārgaśīrṣe bhaktimānyaḥ kṛtvā śaṁkhadhvaniṁ hi mām snāpayetpitarastasya svargaṁ tāvatpratiṣṭhitāḥ
जो भक्तिमान पुरुष मार्गशीर्ष में शंख-ध्वनि करके मुझे स्नान कराता है, उसके पितर उतनी ही संख्या में स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाते हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.138.21)
अष्टोत्तरसहस्रं तु शंख स्नानं तु यश्चरेत् ।। स गणो मुक्तिमाप्नोति यावदाभूतसंप्लवम्
aṣṭottarasahasraṁ tu śaṁkha snānaṁ tu yaścaret sa gaṇo muktimāpnoti yāvadābhūtasaṁplavam
जो एक हजार आठ बार शंख-स्नान करता है, वह गणों में सम्मिलित होकर प्रलयकाल तक मुक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 22 (skanda.2.138.22)
नित्यं संस्नापयेद्यो मां शंखेन सुरसत्तम ।। गंगास्नानफलं प्राप्य नित्यं नंदति देववत्
nityaṁ saṁsnāpayedyo māṁ śaṁkhena surasattama gaṁgāsnānaphalaṁ prāpya nityaṁ naṁdati devavat
हे देवसत्तम! जो प्रतिदिन मुझे शंख से स्नान कराता है, वह गंगा-स्नान का फल पाकर देवता के समान सदा आनंदित रहता है।
श्लोक 23 (skanda.2.138.23)
शंखेतोयं समादाय यः स्नापयति मां सुत ।। नमो नारायणेत्युक्त्वा मुच्यते सर्वकिल्बिषैः
śaṁkhetoyaṁ samādāya yaḥ snāpayati māṁ suta namo nārāyaṇetyuktvā mucyate sarvakilbiṣaiḥ
हे पुत्र! जो शंख में जल लेकर 'नमो नारायणाय' कहते हुए मुझे स्नान कराता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.2.138.24)
कृत्वा पादोदकं शंखे वैष्णवानां महात्मनाम् ।। यो ददाति तिलोन्मिश्रं चांद्रायणफलं लभेत्
kṛtvā pādodakaṁ śaṁkhe vaiṣṇavānāṁ mahātmanām yo dadāti tilonmiśraṁ cāṁdrāyaṇaphalaṁ labhet
जो महात्मा वैष्णवों के चरणामृत को शंख में लेकर तिल मिलाकर दान करता है, वह चांद्रायण व्रत का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (skanda.2.138.25)
नाद्यं तडागजं वाऽपि वापीकूपादिकं च यत् ।। गांगेयं जायते सर्वं जलं शंखकृतं च यत्
nādyaṁ taḍāgajaṁ vā'pi vāpīkūpādikaṁ ca yat gāṁgeyaṁ jāyate sarvaṁ jalaṁ śaṁkhakṛtaṁ ca yat
नदी, तालाब, बावली अथवा कुएँ का जो भी जल हो, वह शंख में भर देने पर सम्पूर्ण रूप से गंगाजल के समान हो जाता है।
श्लोक 26 (skanda.2.138.26)
गृहीत्वा मम पादांबु शंखे कृत्वा तु वैष्णवः ।। यो वहेच्छिरसा नित्यं स मुनिस्तपतां वरः
gṛhītvā mama pādāṁbu śaṁkhe kṛtvā tu vaiṣṇavaḥ yo vahecchirasā nityaṁ sa munistapatāṁ varaḥ
जो वैष्णव मेरे चरणोदक को शंख में भरकर उसे प्रतिदिन सिर पर धारण करता है, वह तपस्वियों में श्रेष्ठ मुनि है।
श्लोक 27 (skanda.2.138.27)
त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि मम चैवाज्ञया सुत ।। शंखे तानि वसंतीह तस्माच्छंखो वरः स्मृतः
trailokye yāni tīrthāni mama caivājñayā suta śaṁkhe tāni vasaṁtīha tasmācchaṁkho varaḥ smṛtaḥ
हे पुत्र! तीनों लोकों में जितने भी तीर्थ हैं, वे सब मेरी ही आज्ञा से यहाँ शंख में निवास करते हैं; इसलिए शंख को सर्वश्रेष्ठ स्मृत किया गया है।
श्लोक 28 (skanda.2.138.28)
सांबुं शंखं करे धृत्वा मंत्रैरेतैस्तु वैष्णवः ।। यः स्नापयेन्मार्गशीर्षे तुष्टस्तस्य भवाम्यहम्
sāṁbuṁ śaṁkhaṁ kare dhṛtvā maṁtrairetaistu vaiṣṇavaḥ yaḥ snāpayenmārgaśīrṣe tuṣṭastasya bhavāmyaham
जो वैष्णव जल भरे शंख को हाथ में लेकर इन्हीं मंत्रों से मार्गशीर्ष में मुझे स्नान कराता है, मैं उससे प्रसन्न होता हूँ।
श्लोक 29 (skanda.2.138.29)
शंखादौ चंद्रदैवत्यं कुक्षौ वरुणदेवता ।। पृष्ठे प्रजापतिश्चैव अग्रे गंगा सरस्वती
śaṁkhādau caṁdradaivatyaṁ kukṣau varuṇadevatā pṛṣṭhe prajāpatiścaiva agre gaṁgā sarasvatī
शंख के मुख में चन्द्र देवता का, कुक्षि में वरुण देवता का, पीठ में प्रजापति का, और अग्रभाग में गंगा-सरस्वती का वास है।
श्लोक 30 (skanda.2.138.30)
तेषामुच्चारपूर्वं तु स्नापयेन्मामतंद्रितः ।। तस्य पुण्यस्य संख्यां वै कर्तुं नैव सुराः क्षमाः
teṣāmuccārapūrvaṁ tu snāpayenmāmataṁdritaḥ tasya puṇyasya saṁkhyāṁ vai kartuṁ naiva surāḥ kṣamāḥ
इनका उच्चारण करके, आलस्यरहित होकर मुझे स्नान कराना चाहिए; उसके पुण्य की गणना करने में देवता भी समर्थ नहीं हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.138.31)
पुरतो मम देवेश सपुष्पः सजलाक्षतः।। शंखस्त्वभ्यर्चितस्तिष्ठेत्तस्य श्रीः सर्वतोमुखी
purato mama deveśa sapuṣpaḥ sajalākṣataḥ śaṁkhastvabhyarcitastiṣṭhettasya śrīḥ sarvatomukhī
हे देवेश! मेरे आगे पुष्प, जल और अक्षत सहित पूजित शंख यदि स्थित रहे, तो उसकी श्री सब ओर से व्याप्त हो जाती है।
श्लोक 32 (skanda.2.138.32)
विलेपनेन संपूर्णं शंखं कृत्वा तु मां भजेत् ।। तदा मे परमा प्रीतिर्भवेद्वै शतवार्षिकी
vilepanena saṁpūrṇaṁ śaṁkhaṁ kṛtvā tu māṁ bhajet tadā me paramā prītirbhavedvai śatavārṣikī
चन्दन के लेप से शंख को पूर्ण रूप से लेपकर जो मेरा भजन करता है, उसे मेरी सौ वर्षों तक रहने वाली परम प्रीति प्राप्त होती है।
श्लोक 33 (skanda.2.138.33)
शंखे कृत्वा तु पानीयं सपुष्पं सजलाक्षतम् ।। अर्घ्यं ददाति यो मां वै तस्य पुण्यमनंतकम्
śaṁkhe kṛtvā tu pānīyaṁ sapuṣpaṁ sajalākṣatam arghyaṁ dadāti yo māṁ vai tasya puṇyamanaṁtakam
जो शंख में जल भरकर, पुष्प, जल और अक्षत सहित मुझे अर्घ्य अर्पित करता है, उसका पुण्य अनंत होता है।
श्लोक 34 (skanda.2.138.34)
अर्घ्यं कृत्वा स्वयं शंखे यः करोति प्रदक्षिणाम् ।। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुंधरा
arghyaṁ kṛtvā svayaṁ śaṁkhe yaḥ karoti pradakṣiṇām pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā vasuṁdharā
जो स्वयं शंख में अर्घ्य बनाकर उसकी प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सप्तद्वीपा पृथ्वी की ही प्रदक्षिणा हो जाती है।
श्लोक 35 (skanda.2.138.35)
भ्रामयित्वा च मे मूर्ध्नि मंदिरं शंखवारिणा ।। प्रोक्षयेद्वैष्णवो यस्तु नाशुभं तद्ग्रहे भवेत्
bhrāmayitvā ca me mūrdhni maṁdiraṁ śaṁkhavāriṇā prokṣayedvaiṣṇavo yastu nāśubhaṁ tadgrahe bhavet
जो वैष्णव मेरे मस्तक पर शंख का जल घुमाकर मंदिर पर छिड़कता है, उसके घर में कभी अशुभ नहीं होता।
श्लोक 36 (skanda.2.138.36)
नाधयो न क्लमस्तस्य नारकं न भयं क्वचित् ।। यस्य पादोदकं शंखे कृतं मूर्धानमालभेत्
nādhayo na klamastasya nārakaṁ na bhayaṁ kvacit yasya pādodakaṁ śaṁkhe kṛtaṁ mūrdhānamālabhet
जिसके सिर पर शंख में रखा हुआ चरणोदक स्पर्श कराया जाता है, उसे न मानसिक कष्ट होता है, न शारीरिक थकान, न नरक और न कहीं भय।
श्लोक 37 (skanda.2.138.37)
ग्रहा रक्षांसि कूष्मांडपिशाचोरगदानवाः ।। दृष्ट्वा शंखोदकं मूर्ध्नि विद्रवंति दिशो दश
grahā rakṣāṁsi kūṣmāṁḍapiśācoragadānavāḥ dṛṣṭvā śaṁkhodakaṁ mūrdhni vidravaṁti diśo daśa
ग्रह, राक्षस, कूष्मांड, पिशाच, सर्प और दानव — सिर पर शंख का जल देखकर दसों दिशाओं में भाग जाते हैं।
श्लोक 38 (skanda.2.138.38)
वादित्रनिनदैरुच्चैर्गीतमंगलनिःस्वनैः ।। यः स्नापयति मां भक्त्या जीवन्मुक्तो भवेद्धि सः
vāditraninadairuccairgītamaṁgalaniḥsvanaiḥ yaḥ snāpayati māṁ bhaktyā jīvanmukto bhaveddhi saḥ
जो वाद्यों की ऊँची ध्वनि, गीत और मंगल-निनाद के साथ भक्तिपूर्वक मुझे स्नान कराता है, वह जीवन्मुक्त हो जाता है।