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वैष्णव खण्ड · अध्याय 139

भगवान को घण्टानाद तथा तुलसी-काष्ठ-चन्दन अर्पण के फल का कथन

अध्याय 138अध्याय-सूचीअध्याय 140

श्लोक 1 (skanda.2.139.1)

।। ।। ब्रह्मोवाच ।। ।। घण्टानादस्य माहात्म्यं चंदनस्य तथाऽच्युत ।। यत्फलं लभते स्वामिंस्तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वतः

brahmovāca ghaṇṭānādasya māhātmyaṁ caṁdanasya tathā'cyuta yatphalaṁ labhate svāmiṁstatsarvaṁ brūhi tattvataḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे अच्युत! घण्टानाद के माहात्म्य का और उसी प्रकार चन्दन का जो फल प्राप्त होता है, हे स्वामिन्! वह सब मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.139.2)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। स्नानार्चनक्रियाकाले घंटानादं करोति यः ।। पुरतो मम देवेश तस्य पुण्यफलं शृणु

śrībhagavānuvāca snānārcanakriyākāle ghaṁṭānādaṁ karoti yaḥ purato mama deveśa tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

श्रीभगवान ने कहा — स्नान और पूजा की क्रिया के समय जो मेरे आगे घण्टानाद करता है, हे देवेश! उसके पुण्य-फल को सुनो।

श्लोक 3 (skanda.2.139.3)

वर्षकोटिसहस्राणि वर्षकोटिशतानि च ।। वसते मामके लोके अप्सरोगणसेवितः

varṣakoṭisahasrāṇi varṣakoṭiśatāni ca vasate māmake loke apsarogaṇasevitaḥ

वह अप्सराओं के समूह से सेवित होकर हजारों करोड़ वर्ष और सैकड़ों करोड़ वर्ष तक मेरे लोक में निवास करता है।

श्लोक 4 (skanda.2.139.4)

सर्ववाद्यमयी घण्टा सर्वदेवमयी यतः ।। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन घण्टानादं तु कारयेत्

sarvavādyamayī ghaṇṭā sarvadevamayī yataḥ tasmātsarvaprayatnena ghaṇṭānādaṁ tu kārayet

क्योंकि घण्टा समस्त वाद्यों और समस्त देवताओं का स्वरूप है, इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से घण्टानाद करना चाहिए।

श्लोक 5 (skanda.2.139.5)

सर्ववाद्यमयी घण्टा सर्वदा मम वल्लभा ।। वादनाल्लभते पुण्यं यज्ञकोटिशतोद्भवम्

sarvavādyamayī ghaṇṭā sarvadā mama vallabhā vādanāllabhate puṇyaṁ yajñakoṭiśatodbhavam

समस्त वाद्यों का स्वरूप वह घण्टा सदा मुझे अत्यंत प्रिय है; उसके बजाने से सौ करोड़ यज्ञों से उत्पन्न पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (skanda.2.139.6)

घंटानादः सदा कार्यः पूजाकाले विशेषतः ।। मन्वंतरसहस्राणि मन्वतरशतानि च

ghaṁṭānādaḥ sadā kāryaḥ pūjākāle viśeṣataḥ manvaṁtarasahasrāṇi manvataraśatāni ca

पूजा के समय विशेष रूप से घण्टानाद सदा करना चाहिए — इससे हजारों मन्वंतर और सैकड़ों मन्वंतर तक—

श्लोक 7 (skanda.2.139.7)

प्रीतो भवामि सततं घंटानादेन पुत्रक ।। भेरीशंखनिनादेन घंटानादान्वितेन च

prīto bhavāmi satataṁ ghaṁṭānādena putraka bherīśaṁkhaninādena ghaṁṭānādānvitena ca

—हे पुत्र! मैं घण्टानाद से, तथा भेरी और शंख के निनाद से युक्त घण्टानाद से सदा प्रसन्न रहता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.2.139.8)

मृदंगशंखेन युतं प्रणवेन समन्वितम् ।। अर्चनं मम देवेश सततं मोक्षदं नृणाम्

mṛdaṁgaśaṁkhena yutaṁ praṇavena samanvitam arcanaṁ mama deveśa satataṁ mokṣadaṁ nṛṇām

हे देवेश! मृदंग और शंख से युक्त, तथा प्रणव (ॐ) से समन्वित मेरी पूजा मनुष्यों को सदा मोक्ष देने वाली है।

श्लोक 9 (skanda.2.139.9)

यत्र तिष्ठेत पुरतो घंटा नादान्विता मम ।। अर्चिता वैष्णवैर्यत्र तत्र मां विद्धि पुत्रक

yatra tiṣṭheta purato ghaṁṭā nādānvitā mama arcitā vaiṣṇavairyatra tatra māṁ viddhi putraka

हे पुत्र! जहाँ मेरे आगे नादयुक्त घण्टा वैष्णवों द्वारा पूजित होकर स्थित रहती है, वहीं मुझे विद्यमान जानो।

श्लोक 10 (skanda.2.139.10)

वैनतेयांऽकिता घंटा सुदर्शनयुताऽथवा ।। ममाग्रे स्थापयेद्यस्तु तस्य पापं हराम्यहम्

vainateyāṁ'kitā ghaṁṭā sudarśanayutā'thavā mamāgre sthāpayedyastu tasya pāpaṁ harāmyaham

जो गरुड़ से अंकित अथवा सुदर्शन से युक्त घण्टा मेरे आगे स्थापित करता है, मैं उसके पाप को हर लेता हूँ।

श्लोक 11 (skanda.2.139.11)

मदीयार्चनवेलायां घंटानादं करोति यः ।। नश्यंति तस्य पापानि शतजन्मार्जितान्यपि

madīyārcanavelāyāṁ ghaṁṭānādaṁ karoti yaḥ naśyaṁti tasya pāpāni śatajanmārjitānyapi

जो मेरी पूजा के समय घण्टानाद करता है, उसके सौ जन्मों में अर्जित पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 12 (skanda.2.139.12)

स्वापकाले प्रकुर्वीत घण्टानादं स्वभक्तितः ।। ममैवार्चनवेलायां फलं कोटिगुणोद्भवम्

svāpakāle prakurvīta ghaṇṭānādaṁ svabhaktitaḥ mamaivārcanavelāyāṁ phalaṁ koṭiguṇodbhavam

शयन-काल में अपनी भक्ति से घण्टानाद करना चाहिए; मेरी पूजा के समय उसका फल करोड़ गुना उत्पन्न होता है।

श्लोक 13 (skanda.2.139.13)

ये मामर्चंति देवेश सुपर्णोपरिसंस्थितम् ।। शंखपद्मगदायुक्तं सचक्रं च श्रिया युतम्

ye māmarcaṁti deveśa suparṇoparisaṁsthitam śaṁkhapadmagadāyuktaṁ sacakraṁ ca śriyā yutam

हे देवेश! जो गरुड़ पर विराजमान, शंख-पद्म-गदा-चक्र से युक्त और लक्ष्मी सहित मुझे पूजते हैं—

श्लोक 14 (skanda.2.139.14)

किं करिष्यंति ते तीर्थैर्देवतानां च दर्शनैः ।। किं यज्ञैः किं व्रतैर्वापि किं दानैः किमुपोषणैः

kiṁ kariṣyaṁti te tīrthairdevatānāṁ ca darśanaiḥ kiṁ yajñaiḥ kiṁ vratairvāpi kiṁ dānaiḥ kimupoṣaṇaiḥ

—उन्हें तीर्थों से और देवताओं के दर्शन से क्या करना है? यज्ञों से, व्रतों से, दानों से अथवा उपवासों से भी उन्हें क्या करना है?

श्लोक 15 (skanda.2.139.15)

मूर्तिर्नारायणी यैश्च मामकी गरुडोपरि ।। स्थापिता ते कलौ यांति कल्पकोटिं पदं मम

mūrtirnārāyaṇī yaiśca māmakī garuḍopari sthāpitā te kalau yāṁti kalpakoṭiṁ padaṁ mama

जिन्होंने गरुड़ पर मेरी नारायणी मूर्ति स्थापित की है, वे कलियुग में करोड़ों कल्पों तक मेरे पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.139.16)

ममाऽग्रे स्थापयेद्यस्तु प्रासादेऽथ गृहेऽथवा ।। तीर्थकोटिसहस्राणि तत्र तिष्ठंति देवताः

mamā'gre sthāpayedyastu prāsāde'tha gṛhe'thavā tīrthakoṭisahasrāṇi tatra tiṣṭhaṁti devatāḥ

जो मुझे मंदिर में अथवा घर में अपने आगे स्थापित करता है, वहाँ हजारों करोड़ तीर्थ और देवता निवास करते हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.139.17)

यस्तु पूजयते धन्यो गरुडोपरिसंस्थितम्।। एकादश्यां तथा रात्रौ वासनासंयुतो मम ।। कृत्वा गीतं च नृत्यं च तारयेन्नरकात्पितॄन्

yastu pūjayate dhanyo garuḍoparisaṁsthitam ekādaśyāṁ tathā rātrau vāsanāsaṁyuto mama kṛtvā gītaṁ ca nṛtyaṁ ca tārayennarakātpitṝn

जो धन्य पुरुष गरुड़ पर विराजमान मुझे एकादशी की रात्रि में भावविभोर होकर पूजता है, तथा गीत और नृत्य करता है, वह अपने पितरों को नरक से तार देता है।

श्लोक 18 (skanda.2.139.18)

पुनश्च कथयिष्यामि शृणु घंटामहं सुत

punaśca kathayiṣyāmi śṛṇu ghaṁṭāmahaṁ suta

हे पुत्र! अब मैं फिर से घण्टा के विषय में कहूँगा, सुनो।

श्लोक 19 (skanda.2.139.19)

मम नामांकिता घण्टा पुरतो या च तिष्ठति ।। अर्चिता वैष्णवी यत्र तत्र मां विद्धि पुत्रक

mama nāmāṁkitā ghaṇṭā purato yā ca tiṣṭhati arcitā vaiṣṇavī yatra tatra māṁ viddhi putraka

हे पुत्र! जहाँ मेरे नाम से अंकित घण्टा मेरे आगे पूजित होकर स्थित रहती है, वहीं मुझे विद्यमान जानो।

श्लोक 20 (skanda.2.139.20)

यस्तु वादयते घंटां वैनतेयविचिह्निताम्।। धूपे नीराजने स्नाने पूजाकाले विलेपने

yastu vādayate ghaṁṭāṁ vainateyavicihnitām dhūpe nīrājane snāne pūjākāle vilepane

जो धूप, नीराजन (आरती), स्नान, पूजा और विलेपन के समय गरुड़ के चिह्न से युक्त घण्टा बजाता है—

श्लोक 21 (skanda.2.139.21)

ममाग्रे प्रत्यहं वत्स प्रत्येकं लभते फलम् ।। मखायुतं गोऽयुतं च चांद्रायणशतोद्भवम्

mamāgre pratyahaṁ vatsa pratyekaṁ labhate phalam makhāyutaṁ go'yutaṁ ca cāṁdrāyaṇaśatodbhavam

—हे वत्स! वह मेरे आगे प्रतिदिन प्रत्येक क्रिया के लिए दस हजार यज्ञों, दस हजार गौओं और सौ चांद्रायण व्रतों से उत्पन्न फल प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (skanda.2.139.22)

विधिबाह्यकृता पृजा सफला जायते नृणाम् ।। घण्टानादेन तुष्टोऽहं प्रयच्छामि स्वकं पदम्

vidhibāhyakṛtā pṛjā saphalā jāyate nṛṇām ghaṇṭānādena tuṣṭo'haṁ prayacchāmi svakaṁ padam

विधि से बाहर की गई पूजा भी मनुष्यों के लिए सफल हो जाती है; घण्टानाद से प्रसन्न होकर मैं अपना ही पद प्रदान करता हूँ।

श्लोक 23 (skanda.2.139.23)

नागाऽरिचिह्निता घंटा रथांगेन समन्विता ।। वादनात्कुरुते नाशं जन्मकोटिभयस्य वै

nāgā'ricihnitā ghaṁṭā rathāṁgena samanvitā vādanātkurute nāśaṁ janmakoṭibhayasya vai

सर्पों के शत्रु (गरुड़) से चिह्नित और चक्र से युक्त घण्टा, बजाने मात्र से करोड़ों जन्मों के भय का नाश करती है।

श्लोक 24 (skanda.2.139.24)

गरुडेनांऽकितां घंटां दृष्ट्वाहं प्रत्यहं मुदा ।। प्रीतिं करोमि देवेश लक्ष्मीं प्राप्य यथाऽधनः

garuḍenāṁ'kitāṁ ghaṁṭāṁ dṛṣṭvāhaṁ pratyahaṁ mudā prītiṁ karomi deveśa lakṣmīṁ prāpya yathā'dhanaḥ

हे देवेश! गरुड़ से अंकित घण्टा को प्रतिदिन देखकर मुझे उतनी ही प्रसन्नता होती है, जितनी निर्धन को लक्ष्मी पाकर होती है।

श्लोक 25 (skanda.2.139.25)

घंटादण्डस्य शिरसि सुचक्रं स्थापयेत्तु यः ।। मत्प्रियं वैनतेयं वा स्थापितं भुवनत्रयम्

ghaṁṭādaṇḍasya śirasi sucakraṁ sthāpayettu yaḥ matpriyaṁ vainateyaṁ vā sthāpitaṁ bhuvanatrayam

जो घण्टा के दण्ड के शिखर पर सुंदर चक्र, अथवा मुझे प्रिय गरुड़ को स्थापित करता है, उसके द्वारा मानो तीनों लोक स्थापित कर दिए गए हों।

श्लोक 26 (skanda.2.139.26)

घंटानादं सचक्रं च अंतकाले शृणोति यः ।। पापकोटियुतस्याऽपि नश्यंति यमकिंकराः

ghaṁṭānādaṁ sacakraṁ ca aṁtakāle śṛṇoti yaḥ pāpakoṭiyutasyā'pi naśyaṁti yamakiṁkarāḥ

हे पुत्र! जो मृत्यु के समय चक्र सहित घण्टानाद सुनता है, उसके करोड़ों पापों से युक्त होने पर भी यम के दूत नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 27 (skanda.2.139.27)

सर्वदोषाः प्रणश्यंति घंटानादेन वै सुत ।। देवतानां सरुद्राणां पितॄणामुत्सवो भवेत्

sarvadoṣāḥ praṇaśyaṁti ghaṁṭānādena vai suta devatānāṁ sarudrāṇāṁ pitṝṇāmutsavo bhavet

हे पुत्र! घण्टानाद से सभी दोष नष्ट हो जाते हैं; रुद्रों सहित देवताओं का और पितरों का उत्सव होता है।

श्लोक 28 (skanda.2.139.28)

अभावे वैनतेयस्य चक्रस्याऽपि न संशयः ।। घंटानादेन भक्तानां प्रसादं प्रकरोम्यहम्

abhāve vainateyasya cakrasyā'pi na saṁśayaḥ ghaṁṭānādena bhaktānāṁ prasādaṁ prakaromyaham

गरुड़ और चक्र के अभाव में भी, निःसंदेह घण्टानाद से मैं भक्तों पर अनुग्रह करता हूँ।

श्लोक 29 (skanda.2.139.29)

गृहे यस्मिन्भवेन्नित्यं घण्टा नागारिसंयुता ।। सर्पाणां न भयं तत्र नाग्निविद्युत्समुद्भवम्

gṛhe yasminbhavennityaṁ ghaṇṭā nāgārisaṁyutā sarpāṇāṁ na bhayaṁ tatra nāgnividyutsamudbhavam

जिस घर में सर्पों के शत्रु (गरुड़) के चिह्न से युक्त घण्टा सदा रहती है, वहाँ न सर्पों का भय होता है, न अग्नि अथवा बिजली से उत्पन्न भय।

श्लोक 30 (skanda.2.139.30)

यस्य घंटा गृहे नास्ति शंखो न पुरतो मम ।। कथं भागवतो ज्ञेयः कथं भवति वल्लभः

yasya ghaṁṭā gṛhe nāsti śaṁkho na purato mama kathaṁ bhāgavato jñeyaḥ kathaṁ bhavati vallabhaḥ

जिसके घर में घण्टा नहीं है, जिसके आगे शंख भी नहीं है, वह भागवत कैसे जाना जाए और मुझे कैसे प्रिय हो सकता है?

श्लोक 31 (skanda.2.139.31)

चंदनस्य प्रवक्ष्याम माहात्म्यं तव पुत्रक ।। यस्मिन्कृते भवेत्प्रीतिर्ममात्यंतं न संशयः ।।

caṁdanasya pravakṣyāma māhātmyaṁ tava putraka yasminkṛte bhavetprītirmamātyaṁtaṁ na saṁśayaḥ

हे पुत्र! अब मैं तुझे चन्दन का माहात्म्य बताता हूँ, जिसके करने से निःसंदेह मुझे अत्यंत प्रीति होती है।

श्लोक 32 (skanda.2.139.32)

सचंदनं सकुसुमं कर्पूरागरुमिश्रितम् ।। मृगनाभिसमायुक्तं जातीफलसमन्वितम्

sacaṁdanaṁ sakusumaṁ karpūrāgarumiśritam mṛganābhisamāyuktaṁ jātīphalasamanvitam

चन्दन के साथ कर्पूर, अगुरु मिश्रित, कस्तूरी से युक्त और जायफल सहित—

श्लोक 33 (skanda.2.139.33)

तुलसीचंदनोपेतं ममात्यंतसुखावहम् ।। यो ददाति हि मां नित्यं तुलसीकाष्ठसंभवम्

tulasīcaṁdanopetaṁ mamātyaṁtasukhāvaham yo dadāti hi māṁ nityaṁ tulasīkāṣṭhasaṁbhavam

—तुलसी से युक्त, मुझे अत्यंत सुख देने वाला, तुलसी की काष्ठ से उत्पन्न जो चन्दन प्रतिदिन मुझे अर्पित करता है—

श्लोक 34 (skanda.2.139.34)

युगानि वसते स्वर्गे ह्यनंतानि नरोत्तमः ।। महाविष्णोः कलौ भक्त्या दत्त्वा तुलसिचंदनम् ।।

yugāni vasate svarge hyanaṁtāni narottamaḥ mahāviṣṇoḥ kalau bhaktyā dattvā tulasicaṁdanam

—वह श्रेष्ठ पुरुष अनंत युगों तक स्वर्ग में निवास करता है; कलियुग में भक्तिपूर्वक महाविष्णु को तुलसी-चन्दन अर्पित करके—

श्लोक 35 (skanda.2.139.35)

अर्चयेन्मालतीपुष्पैर्न भूयः स्तनपो भवेत् ।। तुलसीकाष्ठसंभूतं चंदनं यच्छते मम

arcayenmālatīpuṣpairna bhūyaḥ stanapo bhavet tulasīkāṣṭhasaṁbhūtaṁ caṁdanaṁ yacchate mama

—मालती के पुष्पों से पूजा करता है, तो वह फिर कभी स्तनपायी शिशु के रूप में जन्म नहीं लेता। जो तुलसी काष्ठ से उत्पन्न चन्दन मुझे अर्पित करता है—

श्लोक 36 (skanda.2.139.36)

दहामि पातकं सर्वं पूर्वजन्मशतैः कृतम् ।। सर्वेषामेव देवानां तुलसीकाष्ठचंदनम्

dahāmi pātakaṁ sarvaṁ pūrvajanmaśataiḥ kṛtam sarveṣāmeva devānāṁ tulasīkāṣṭhacaṁdanam

—मैं उसके पूर्वजन्मों के सैकड़ों में किए गए सभी पापों को जला देता हूँ। समस्त देवताओं के लिए तुलसी-काष्ठ का चन्दन—

श्लोक 37 (skanda.2.139.37)

पितॄणां च विशेषेण सदाऽभीष्टं यथा मम

pitṝṇāṁ ca viśeṣeṇa sadā'bhīṣṭaṁ yathā mama

—तथा विशेष रूप से पितरों के लिए भी, वह सदा उतना ही अभीष्ट है जितना मुझे।

श्लोक 38 (skanda.2.139.38)

श्रीखंडं चंदनं तावच्छ्रेष्ठं कृष्णागुरुं तथा ।। यावन्न दीयते मह्यं तुलसीकाष्ठचंदनम्

śrīkhaṁḍaṁ caṁdanaṁ tāvacchreṣṭhaṁ kṛṣṇāguruṁ tathā yāvanna dīyate mahyaṁ tulasīkāṣṭhacaṁdanam

जब तक मुझे तुलसी-काष्ठ का चन्दन नहीं दिया जाता, तब तक श्रीखण्ड और श्रेष्ठ कृष्णागुरु का चन्दन भी [उसके समान नहीं]।

श्लोक 39 (skanda.2.139.39)

तावत्कस्तूरिकाऽऽमोदः कर्पूरस्य सुगंधिता ।। यावन्न दीयते मह्यं तुलसीकाष्ठचंदनम्

tāvatkastūrikā''modaḥ karpūrasya sugaṁdhitā yāvanna dīyate mahyaṁ tulasīkāṣṭhacaṁdanam

जब तक मुझे तुलसी-काष्ठ का चन्दन नहीं दिया जाता, तब तक कस्तूरी की सुगंध और कर्पूर की मधुर गंध भी [उसके समान नहीं]।

श्लोक 40 (skanda.2.139.40)

कलौ यच्छंति ये मह्यं तुलसीकाष्ठचंदनम्।। मार्गशीर्षशुभेमासे ते कृतार्था न संशयः

kalau yacchaṁti ye mahyaṁ tulasīkāṣṭhacaṁdanam mārgaśīrṣaśubhemāse te kṛtārthā na saṁśayaḥ

जो कलियुग में शुभ मार्गशीर्ष मास में मुझे तुलसी-काष्ठ का चन्दन अर्पित करते हैं, वे निःसंदेह कृतार्थ हो जाते हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.139.41)

यो हि भागवतो भूत्वा कलौ तुलसिचंदनम् ।। नार्पयेद्वै सहोमासे नाऽसौ भागवतो नरः

yo hi bhāgavato bhūtvā kalau tulasicaṁdanam nārpayedvai sahomāse nā'sau bhāgavato naraḥ

जो भागवत होकर भी कलियुग में सहोम मास में मुझे तुलसी-चन्दन अर्पित नहीं करता, वह वास्तव में भागवत नहीं है।

श्लोक 42 (skanda.2.139.42)

कुंकुमागुरुश्रीखण्डकर्दमैर्मम विग्रहम् ।। आलिपेद्वै सहोमासे कल्पकोटिं वसेद्दिवि

kuṁkumāguruśrīkhaṇḍakardamairmama vigraham ālipedvai sahomāse kalpakoṭiṁ vaseddivi

जो सहोम मास में कुंकुम, अगुरु और श्रीखण्ड के लेप से मेरी प्रतिमा का लेपन करता है, वह करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 43 (skanda.2.139.43)

कर्पूरागुरुमिश्रेण चंदनेनाऽनुलिंपयेत् ।। मृगदर्पं विशेषेण अभीष्टं च सदा मम

karpūrāgurumiśreṇa caṁdanenā'nuliṁpayet mṛgadarpaṁ viśeṣeṇa abhīṣṭaṁ ca sadā mama

कर्पूर और अगुरु मिश्रित चन्दन से, और विशेष रूप से कस्तूरी से मुझे अनुलिप्त करना चाहिए — यह सदा मुझे अत्यंत अभीष्ट है।

श्लोक 44 (skanda.2.139.44)

विलेपयति यो मां वै शंखे कृत्वा तु चंदनम् ।। मार्गशीर्षे तदा प्रीतिं करोमि शतवार्षिकीम्

vilepayati yo māṁ vai śaṁkhe kṛtvā tu caṁdanam mārgaśīrṣe tadā prītiṁ karomi śatavārṣikīm

जो शंख में चन्दन रखकर मार्गशीर्ष में मुझे उससे लेपित करता है, तब मैं उस पर सौ वर्षों तक रहने वाली प्रीति करता हूँ।

श्लोक 45 (skanda.2.139.45)

सेवते तुलसीपत्रैर्नित्यमामलकैश्च यः ।। मार्गशीर्षे सदा भक्त्या स लभेद्वांछितं फलम्

sevate tulasīpatrairnityamāmalakaiśca yaḥ mārgaśīrṣe sadā bhaktyā sa labhedvāṁchitaṁ phalam

जो मार्गशीर्ष में सदा भक्तिपूर्वक तुलसी-पत्तों और आँवलों से मेरी सेवा करता है, वह वांछित फल प्राप्त करता है।

अध्याय 138अध्याय-सूचीअध्याय 140