वैष्णव खण्ड · अध्याय 140
पुष्पों का माहात्म्य तथा विष्णु के कण्ठ में सहस्र जाती-पुष्पों की माला के फल का कथन
श्लोक 1 (skanda.2.140.1)
।। ब्रह्मोवाच ।। ।। माहात्म्यं वद देवेश पुष्पजातिसमुद्भवम् ।। येनयेन च पुष्पेण यत्फलं लभते नरः
brahmovāca māhātmyaṁ vada deveśa puṣpajātisamudbhavam yenayena ca puṣpeṇa yatphalaṁ labhate naraḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — हे देवेश! पुष्प-जातियों से उत्पन्न माहात्म्य कहिए — प्रत्येक पुष्प से मनुष्य को क्या फल प्राप्त होता है?
श्लोक 2 (skanda.2.140.2)
।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं पुष्पसंभवम्।। येन पुष्पेण मे प्रीतिर्भवेत्सम्यङ्न संशयः
śrībhagavānuvāca śṛṇu putra pravakṣyāmi māhātmyaṁ puṣpasaṁbhavam yena puṣpeṇa me prītirbhavetsamyaṅna saṁśayaḥ
श्रीभगवान ने कहा — हे पुत्र! सुनो, मैं पुष्पों से उत्पन्न माहात्म्य बताता हूँ, जिस पुष्प से मुझे पूर्ण प्रसन्नता होती है, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 3 (skanda.2.140.3)
मल्लिका मालती चैव यूथिका चातिमुक्तका ।। पाटला करवीरं च जयन्ती विजया तथा
mallikā mālatī caiva yūthikā cātimuktakā pāṭalā karavīraṁ ca jayantī vijayā tathā
मल्लिका, मालती, यूथिका, अतिमुक्तका; पाटला, करवीर, जयन्ती और विजया—
श्लोक 4 (skanda.2.140.4)
कुब्जकस्तबकश्चैव कर्णिकारं कुरंटकः ।। चंपकश्चातकः कुन्दो बाणः कर्चूरमल्लिका
kubjakastabakaścaiva karṇikāraṁ kuraṁṭakaḥ caṁpakaścātakaḥ kundo bāṇaḥ karcūramallikā
कुब्जक, स्तबक, कर्णिकार, कुरंटक; चम्पक, चातक, कुन्द, बाण, कर्चूर और मल्लिका—
श्लोक 5 (skanda.2.140.5)
अशोकस्तिलकश्चैव तथैवाऽपरयूथिकः ।। अमी पुष्पप्रकारास्तु शस्ता मे पूजने सुत
aśokastilakaścaiva tathaivā'parayūthikaḥ amī puṣpaprakārāstu śastā me pūjane suta
अशोक, तिलक और उसी प्रकार एक अन्य यूथिका — हे पुत्र! ये सब पुष्प-प्रकार मेरी पूजा के लिए प्रशंसित हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.140.6)
केतकीपत्रपुष्पं च भृंगराजस्तथैव च ।। तुलसीपत्रपुष्पं च सद्यः प्रीतिकरं मम
ketakīpatrapuṣpaṁ ca bhṛṁgarājastathaiva ca tulasīpatrapuṣpaṁ ca sadyaḥ prītikaraṁ mama
केतकी के पत्ते का पुष्प, तथा भृंगराज का भी; तुलसी-पत्र का पुष्प मुझे तत्काल प्रसन्नता देने वाला है।
श्लोक 7 (skanda.2.140.7)
पद्मान्यंबुसमुत्थानि रक्तनीलोत्पले तथा ।। सितोत्पलं सहोमासे ममाऽत्यन्तं हि वल्लभम्
padmānyaṁbusamutthāni raktanīlotpale tathā sitotpalaṁ sahomāse mamā'tyantaṁ hi vallabham
जल से उत्पन्न कमल, तथा लाल और नीले उत्पल; श्वेत उत्पल सहोम मास में मुझे अत्यंत प्रिय है।
श्लोक 8 (skanda.2.140.8)
तान्येव च प्रशस्तानि कुसुमानि च मे सुत ।। यानि स्युर्वर्णयुक्तानि रसगन्धयुतानि च
tānyeva ca praśastāni kusumāni ca me suta yāni syurvarṇayuktāni rasagandhayutāni ca
हे पुत्र! वे ही पुष्प मेरे लिए प्रशंसनीय हैं जो रंगयुक्त तथा रस और गंध से युक्त हों।
श्लोक 9 (skanda.2.140.9)
निर्गंधान्यपि शस्तानि कुसुमानि मतानि मे ।। सुरभीणि तथाऽन्यानि वर्जयित्वा तु केतकीम्
nirgaṁdhānyapi śastāni kusumāni matāni me surabhīṇi tathā'nyāni varjayitvā tu ketakīm
गंधरहित पुष्प भी मुझे प्रशंसनीय माने गए हैं, तथा अन्य सुगंधित पुष्प भी — केवल केतकी को छोड़कर।
श्लोक 10 (skanda.2.140.10)
बाणं च चंपकाऽशोकं करवीरं च यूथिका ।। पारिभद्रं पाटला च बकुलं गिरिशालिनी
bāṇaṁ ca caṁpakā'śokaṁ karavīraṁ ca yūthikā pāribhadraṁ pāṭalā ca bakulaṁ giriśālinī
बाण, चम्पक, अशोक, करवीर, यूथिका; पारिभद्र, पाटला, बकुल, गिरिशालिनी—
श्लोक 11 (skanda.2.140.11)
बिल्वपत्रं शमीपत्रं पत्रं भृंगिरजस्य च ।। तमालामलकीपत्रं शस्तं मे पूजने सुत
bilvapatraṁ śamīpatraṁ patraṁ bhṛṁgirajasya ca tamālāmalakīpatraṁ śastaṁ me pūjane suta
बिल्वपत्र, शमीपत्र, भृंगिराज का पत्र; तमाल और आँवले का पत्ता — हे पुत्र! ये मेरी पूजा में प्रशंसित हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.140.12)
पुष्पैररण्यसंभूतैः पत्रैर्वा गिरिसंभवैः ।। अपर्युषितनिश्छिद्रैः प्रोक्षितैर्जंतुवर्जितैः
puṣpairaraṇyasaṁbhūtaiḥ patrairvā girisaṁbhavaiḥ aparyuṣitaniśchidraiḥ prokṣitairjaṁtuvarjitaiḥ
वन में उत्पन्न पुष्पों से, अथवा पर्वत पर उत्पन्न पत्तों से — जो बासी न हों, छिद्ररहित हों, प्रोक्षित हों और कीड़ों से रहित हों—
श्लोक 13 (skanda.2.140.13)
अथारामोद्भवैर्वापि पुष्पैः संपूजयेच्च माम् ।। पुष्पजातिविशेषेण भवेत्पुण्यं विशेषतः
athārāmodbhavairvāpi puṣpaiḥ saṁpūjayecca mām puṣpajātiviśeṣeṇa bhavetpuṇyaṁ viśeṣataḥ
—अथवा बगीचे में उत्पन्न पुष्पों से मेरी पूजा करनी चाहिए। पुष्प-जाति के विशेष होने से पुण्य भी विशेष रूप से प्राप्त होता है।
श्लोक 14 (skanda.2.140.14)
तपःशीलगुणोपेते पात्रे वेदस्य पारगे ।। दश दत्त्वा सुवर्णानि यत्फलं लभते नरः ।। तत्फलं लभते मर्त्यः सहे कुसुमदानतः
tapaḥśīlaguṇopete pātre vedasya pārage daśa dattvā suvarṇāni yatphalaṁ labhate naraḥ tatphalaṁ labhate martyaḥ sahe kusumadānataḥ
तप, शील और गुणों से युक्त तथा वेद-पारंगत सुपात्र को दस स्वर्ण-मुद्राएँ देने से मनुष्य जो फल पाता है, वही फल सहोम मास में एक पुष्प-दान से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 15 (skanda.2.140.15)
द्रोणपुष्पे तथैकस्मिन्मह्यं च विनिवेदिते ।। दश दत्त्वा सुवर्णानि फलं तदधिकं सुत
droṇapuṣpe tathaikasminmahyaṁ ca vinivedite daśa dattvā suvarṇāni phalaṁ tadadhikaṁ suta
हे पुत्र! एक भी द्रोण-पुष्प मुझे निवेदित करने से, दस स्वर्ण देने की अपेक्षा उसका फल कहीं अधिक होता है।
श्लोक 16 (skanda.2.140.16)
पुष्पात्पुष्पांतरे भेदो यथाऽऽसीत्तन्निबोध मे
puṣpātpuṣpāṁtare bhedo yathā''sīttannibodha me
पुष्प-पुष्प में जो भेद है, उसे मुझसे जानो।
श्लोक 17 (skanda.2.140.17)
द्रोणपुष्पसहस्रेभ्यः खादिरं तु विशिष्यते ।। खादिरात्पुष्पसाहस्राच्छमीपुष्पं विशिष्यते
droṇapuṣpasahasrebhyaḥ khādiraṁ tu viśiṣyate khādirātpuṣpasāhasrācchamīpuṣpaṁ viśiṣyate
हजार द्रोण-पुष्पों से खादिर का पुष्प श्रेष्ठ है; हजार खादिर-पुष्पों से शमी का पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 18 (skanda.2.140.18)
शमीपुष्पसहस्रेभ्यो बिल्वपुष्पं विशिष्यते ।। बिल्वपुष्पसहस्रेभ्यो बकपुष्पं विशिष्यते
śamīpuṣpasahasrebhyo bilvapuṣpaṁ viśiṣyate bilvapuṣpasahasrebhyo bakapuṣpaṁ viśiṣyate
हजार शमी-पुष्पों से बिल्व-पुष्प श्रेष्ठ है; हजार बिल्व-पुष्पों से बक-पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 19 (skanda.2.140.19)
बकपुष्पसहस्रेभ्यो नंद्यावर्तं विशिष्यते ।। नंद्यावर्तसहस्राद्धि करवीरं विशिष्यते
bakapuṣpasahasrebhyo naṁdyāvartaṁ viśiṣyate naṁdyāvartasahasrāddhi karavīraṁ viśiṣyate
हजार बक-पुष्पों से नंद्यावर्त श्रेष्ठ है; हजार नंद्यावर्त से करवीर श्रेष्ठ है।
श्लोक 20 (skanda.2.140.20)
करवीरसहस्रस्य कुसुमं श्वेतमुत्तमम् ।। करवीरश्वेतपुष्पात्पालाशं पुष्पमुत्तमम्
karavīrasahasrasya kusumaṁ śvetamuttamam karavīraśvetapuṣpātpālāśaṁ puṣpamuttamam
हजार करवीर के फूलों से श्वेत करवीर श्रेष्ठ है; श्वेत करवीर-पुष्प से पलाश का पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 21 (skanda.2.140.21)
पालाशपुष्पसाहस्रात्कुशपुष्पं विशिष्यते ।। कुशपुष्पसहस्राद्धि वनमाला विशिष्यते
pālāśapuṣpasāhasrātkuśapuṣpaṁ viśiṣyate kuśapuṣpasahasrāddhi vanamālā viśiṣyate
हजार पलाश-पुष्पों से कुश का पुष्प श्रेष्ठ है; हजार कुश-पुष्पों से वनमाला श्रेष्ठ है।
श्लोक 22 (skanda.2.140.22)
वनमाला सहस्राद्धि चंपकं च विशिष्यते ।। चंपकस्य पुष्पशतादशोकं पुष्पमुत्तमम्
vanamālā sahasrāddhi caṁpakaṁ ca viśiṣyate caṁpakasya puṣpaśatādaśokaṁ puṣpamuttamam
हजार वनमालाओं से चम्पक श्रेष्ठ है; सौ चम्पक-पुष्पों से अशोक का पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 23 (skanda.2.140.23)
अशोकपुष्पसाहस्राच्छेवन्तीपुष्पमुत्तमम् ।। शेवन्तीपुष्पसाहस्रात्कुजकं पुष्पमुत्तमम्
aśokapuṣpasāhasrācchevantīpuṣpamuttamam śevantīpuṣpasāhasrātkujakaṁ puṣpamuttamam
हजार अशोक-पुष्पों से शेवंती का पुष्प श्रेष्ठ है; हजार शेवंती-पुष्पों से कुंजक का पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 24 (skanda.2.140.24)
कुजपुष्पसहस्राद्धि मालतीपुष्पमुत्तमम् ।। मालतीपुष्पसाहस्रात्सन्ध्यापुष्पं विशिष्यते
kujapuṣpasahasrāddhi mālatīpuṣpamuttamam mālatīpuṣpasāhasrātsandhyāpuṣpaṁ viśiṣyate
हजार कुंज-पुष्पों से मालती का पुष्प श्रेष्ठ है; हजार मालती-पुष्पों से संध्या-पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 25 (skanda.2.140.25)
सन्ध्या पुष्पसहस्राद्धि त्रिसंध्यापुष्पमुत्तमम्
sandhyā puṣpasahasrāddhi trisaṁdhyāpuṣpamuttamam
हजार संध्या-पुष्पों से त्रिसंध्या-पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 26 (skanda.2.140.26)
त्रिसंध्यारक्तसाहस्रात्त्रिसंध्याश्वेतमुत्तमम् ।। त्रिसन्ध्याश्वेतसाहस्रात्कुन्दपुष्पं विशिष्यते ।।
trisaṁdhyāraktasāhasrāttrisaṁdhyāśvetamuttamam trisandhyāśvetasāhasrātkundapuṣpaṁ viśiṣyate
हजार लाल त्रिसंध्या-पुष्पों से श्वेत त्रिसंध्या श्रेष्ठ है; हजार श्वेत त्रिसंध्या-पुष्पों से कुंद का पुष्प श्रेष्ठ है।
श्लोक 27 (skanda.2.140.27)
कुन्दपुष्पसहस्राद्धि जातीपुष्पं विशिष्यते ।। सर्वासां पुष्पजातीनां जातीपुष्पमिहोत्तमम्
kundapuṣpasahasrāddhi jātīpuṣpaṁ viśiṣyate sarvāsāṁ puṣpajātīnāṁ jātīpuṣpamihottamam
हजार कुंद-पुष्पों से जाती का पुष्प श्रेष्ठ है; समस्त पुष्प-जातियों में जाती का पुष्प ही यहाँ सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 28 (skanda.2.140.28)
जातीपुष्पसहस्रेण यच्छेन्मालां सुशोभनाम् ।। मह्यं यो विधिवद्दद्यात्तस्य पुण्यफलं शृणु
jātīpuṣpasahasreṇa yacchenmālāṁ suśobhanām mahyaṁ yo vidhivaddadyāttasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
जो एक हजार जाती-पुष्पों से बनी सुशोभित माला विधिपूर्वक मुझे अर्पित करता है, उसके पुण्य-फल को सुनो—
श्लोक 29 (skanda.2.140.29)
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ।। मत्पुरे वसते नित्यं ममतुल्य पराक्रमः
kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca matpure vasate nityaṁ mamatulya parākramaḥ
—वह हजारों करोड़ कल्पों और सैकड़ों करोड़ कल्पों तक मेरे पराक्रम के समान पराक्रम रखते हुए सदा मेरी पुरी में निवास करता है।
श्लोक 30 (skanda.2.140.30)
येषां संति च पुष्पाणि प्रशस्तानि ममाऽर्चने ।। तेषां पत्राणि शस्तानि तदभावे फलानि च
yeṣāṁ saṁti ca puṣpāṇi praśastāni mamā'rcane teṣāṁ patrāṇi śastāni tadabhāve phalāni ca
जिनके पास मेरी पूजा के लिए प्रशंसित पुष्प हों, उनके लिए पत्ते भी प्रशंसित हैं, और उनके भी अभाव में फल।
श्लोक 31 (skanda.2.140.31)
एतैः पत्रैश्च पुष्पैश्च फलैश्चाऽपि तथाहि माम् ।। अर्चन्दशसुवर्णस्य प्रत्येकं फलमाप्नुयात्
etaiḥ patraiśca puṣpaiśca phalaiścā'pi tathāhi mām arcandaśasuvarṇasya pratyekaṁ phalamāpnuyāt
इन्हीं पत्तों, पुष्पों और फलों से भी मेरी पूजा करने पर प्रत्येक के लिए दस स्वर्ण-मुद्राओं के दान का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 32 (skanda.2.140.32)
एताभिः पुष्पजातीभिः सहोमासेऽर्चयंति ये ।। भक्तिं ददामि तेषां वै तुष्टः सन्नात्र संशयः
etābhiḥ puṣpajātībhiḥ sahomāse'rcayaṁti ye bhaktiṁ dadāmi teṣāṁ vai tuṣṭaḥ sannātra saṁśayaḥ
जो इन पुष्प-जातियों से सहोम मास में मेरी पूजा करते हैं, उन्हें मैं प्रसन्न होकर भक्ति प्रदान करता हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 33 (skanda.2.140.33)
धनं पुत्रांस्तथा दारान्यत्किंचिद्वांछते हि सः ।। तत्तद्ददामि देवेश पुष्पैरेभिः प्रतोषितः
dhanaṁ putrāṁstathā dārānyatkiṁcidvāṁchate hi saḥ tattaddadāmi deveśa puṣpairebhiḥ pratoṣitaḥ
हे देवेश! धन, पुत्र, पत्नी अथवा जो कुछ भी वह चाहता है, इन पुष्पों से प्रसन्न होकर मैं उसे वह-वह सब प्रदान करता हूँ।