वैष्णव खण्ड · अध्याय 141
तुलसी, धूप तथा दीप के माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.141.1)
।। ब्रह्मोवाच।। ।। श्रीमत्तुलसिमाहात्म्यं यथावद्वर्णय प्रभो ।। यस्याः सन्निधिमात्रेण प्रीतिर्भवति तेऽधिका
brahmovāca śrīmattulasimāhātmyaṁ yathāvadvarṇaya prabho yasyāḥ sannidhimātreṇa prītirbhavati te'dhikā
ब्रह्मा जी ने कहा — हे प्रभो! श्रीमती तुलसी के माहात्म्य का यथावत वर्णन कीजिए, जिसकी सन्निधि मात्र से आपकी प्रीति अत्यंत बढ़ जाती है।
श्लोक 2 (skanda.2.141.2)
।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। मणिकांचनपुष्पाणि तथा मुक्तामयानि च ।। तुलसीपत्रदानस्य कलां नार्हंति षोडशीम्
śrībhagavānuvāca maṇikāṁcanapuṣpāṇi tathā muktāmayāni ca tulasīpatradānasya kalāṁ nārhaṁti ṣoḍaśīm
श्रीभगवान ने कहा — मणि, स्वर्ण के पुष्प और उसी प्रकार मोतियों से बने पुष्प भी तुलसी-पत्र के दान की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.141.3)
तुलसीमंजरीभिर्यः कुर्याद्वै मम पूजनम् ।। न स गर्भगृहं यायान्मुक्तिभागी भवेन्नरः
tulasīmaṁjarībhiryaḥ kuryādvai mama pūjanam na sa garbhagṛhaṁ yāyānmuktibhāgī bhavennaraḥ
जो तुलसी की मंजरियों से मेरी पूजा करता है, उसे पुनः गर्भ में नहीं जाना पड़ता — वह मनुष्य मुक्ति का भागी हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.2.141.4)
आरोप्य तुलसीं वत्स पूजयेत्तद्दलैश्च माम् ।। दिवि संमोदमानः स श्वेतद्वीपे च मे गृहे
āropya tulasīṁ vatsa pūjayettaddalaiśca mām divi saṁmodamānaḥ sa śvetadvīpe ca me gṛhe
हे वत्स! तुलसी को रोपकर उसके पत्तों से मेरी पूजा करने वाला स्वर्ग में, श्वेतद्वीप में, मेरे ही घर में आनंदित होता है।
श्लोक 5 (skanda.2.141.5)
श्रीमत्तुलस्यार्चयते सकृद्धि मां पत्रैः सुगन्धैर्विमलैरखंडितैः ।। यस्तस्य पापं पटसंस्थितं तदा निरीक्षयित्वा परिमार्जयेद्यमः
śrīmattulasyārcayate sakṛddhi māṁ patraiḥ sugandhairvimalairakhaṁḍitaiḥ yastasya pāpaṁ paṭasaṁsthitaṁ tadā nirīkṣayitvā parimārjayedyamaḥ
जो सुगंधित, निर्मल, अखण्डित पत्तों से एक बार भी श्रीमती तुलसी की पूजा करता है, उसका पट पर लिखा पाप देखकर यम उसी क्षण मिटा देते हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.141.6)
तुलसी न येषां मम पूजनार्थं संपादितैकादशिपुण्यवासरे ।। धिग्यौवनं जीवितमर्थसन्ततिस्तेषां सुखं नेह च दृश्यते परे
tulasī na yeṣāṁ mama pūjanārthaṁ saṁpāditaikādaśipuṇyavāsare dhigyauvanaṁ jīvitamarthasantatisteṣāṁ sukhaṁ neha ca dṛśyate pare
जिनके द्वारा एकादशी के पुण्य दिवस पर मेरी पूजा हेतु तुलसी संपादित नहीं की गई, उनके यौवन, जीवन, धन और संतान को धिक्कार है; उनका सुख न यहाँ दिखाई देता है, न परलोक में।
श्लोक 7 (skanda.2.141.7)
लिंगमभ्यर्चितं दृष्ट्वा सहोमासे च मामकम् ।। तुलसीपत्रनिकरैर्मुच्यते ब्रह्महत्यया
liṁgamabhyarcitaṁ dṛṣṭvā sahomāse ca māmakam tulasīpatranikarairmucyate brahmahatyayā
जो सहोम मास में तुलसी-पत्तों के ढेर से पूजित मेरे लिंग का दर्शन करता है, वह ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.2.141.8)
नित्यमभ्यर्चयेद्यो वै तुलस्या मां रमेश्वरम् ।। महापापानि नश्यंति किं पुनश्चोपपातकम्
nityamabhyarcayedyo vai tulasyā māṁ rameśvaram mahāpāpāni naśyaṁti kiṁ punaścopapātakam
जो प्रतिदिन तुलसी से मुझ रमेश्वर की पूजा करता है, उसके महापाप भी नष्ट हो जाते हैं, फिर छोटे पापों की तो बात ही क्या।
श्लोक 9 (skanda.2.141.9)
वर्ज्यं पर्युषितं पुष्पं वर्ज्यं पर्युषितं जलम् ।। न वर्ज्यं तुलसीपत्रं न वर्ज्यं जाह्नवीजलम्
varjyaṁ paryuṣitaṁ puṣpaṁ varjyaṁ paryuṣitaṁ jalam na varjyaṁ tulasīpatraṁ na varjyaṁ jāhnavījalam
बासी पुष्प वर्जित है, बासी जल वर्जित है; परन्तु तुलसी-पत्र कभी वर्जित नहीं है, न ही गंगाजल कभी वर्जित है।
श्लोक 10 (skanda.2.141.10)
तावद्गर्जंति पुष्पाणि मालत्यादीनि भोः सुत ।। यावन्न प्राप्यते पुण्या तुलसी मम वल्लभा
tāvadgarjaṁti puṣpāṇi mālatyādīni bhoḥ suta yāvanna prāpyate puṇyā tulasī mama vallabhā
हे पुत्र! मालती आदि पुष्प तभी तक अपनी बड़ाई करते हैं जब तक मुझे प्रिय पवित्र तुलसी प्राप्त नहीं हो जाती।
श्लोक 11 (skanda.2.141.11)
सकृदभ्यर्चयेद्यो मां बिल्वपत्रेण मानवः ।। मुक्तिभागी निरातंको मम पार्श्वगतो भवेत्
sakṛdabhyarcayedyo māṁ bilvapatreṇa mānavaḥ muktibhāgī nirātaṁko mama pārśvagato bhavet
जो मनुष्य एक बार भी बिल्वपत्र से मेरी पूजा करता है, वह मुक्ति का भागी, आतंकरहित और सदा मेरे समीप रहने वाला होता है।
श्लोक 12 (skanda.2.141.12)
बिल्वपत्राच्छमीपत्राज्जातीपत्रात्सरोरुहात् ।। वल्लभं तुलसीपत्रं कौस्तुभादधिकं मम
bilvapatrācchamīpatrājjātīpatrātsaroruhāt vallabhaṁ tulasīpatraṁ kaustubhādadhikaṁ mama
बिल्वपत्र, शमीपत्र, जातीपत्र और कमल से भी अधिक तुलसीपत्र मुझे प्रिय है — कौस्तुभ मणि से भी बढ़कर।
श्लोक 13 (skanda.2.141.13)
अभिन्नपत्रा तुलसी हृद्या मंजरिसंयुता ।। क्षीरोदार्णवसंभूता पद्मेवेयं सदा मम
abhinnapatrā tulasī hṛdyā maṁjarisaṁyutā kṣīrodārṇavasaṁbhūtā padmeveyaṁ sadā mama
अखण्ड पत्तों वाली, हृदयग्राही, मंजरियों से युक्त, क्षीरसागर से उत्पन्न वह तुलसी मुझे सदा लक्ष्मी के समान प्रिय है।
श्लोक 14 (skanda.2.141.14)
अकृष्णाऽप्यथवा कृष्णा तुलसी मम वल्लभा ।। सिता वाऽप्यसिता वापि द्वादशी वल्लभा यथा ।
akṛṣṇā'pyathavā kṛṣṇā tulasī mama vallabhā sitā vā'pyasitā vāpi dvādaśī vallabhā yathā
चाहे वह श्याम-रहित हो अथवा श्याम, तुलसी मुझे सदा प्रिय है; चाहे शुक्ल पक्ष की हो अथवा कृष्ण पक्ष की, वह वैसे ही प्रिय है जैसे द्वादशी प्रिय होती है।
श्लोक 15 (skanda.2.141.15)
गृहीत्वा तुलसीपत्रं भक्त्या यो मां समर्चयेत् ।। अर्चितं तेन सकलं सदेवासुरमानुषम् ।।
gṛhītvā tulasīpatraṁ bhaktyā yo māṁ samarcayet arcitaṁ tena sakalaṁ sadevāsuramānuṣam
जो तुलसी-पत्र लेकर भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करता है, उसके द्वारा देवता, असुर और मनुष्य सहित सम्पूर्ण जगत पूजित हो जाता है।
श्लोक 16 (skanda.2.141.16)
तावद्गर्जंति रत्नानि कौस्तुभादीन्यनन्तशः ।। यावन्न प्राप्यते कृष्ण तुलसीकृष्णमंजरी
tāvadgarjaṁti ratnāni kaustubhādīnyanantaśaḥ yāvanna prāpyate kṛṣṇa tulasīkṛṣṇamaṁjarī
कौस्तुभ आदि रत्न भी तभी तक अनंत बार अपनी बड़ाई करते हैं जब तक श्याम तुलसी की मंजरी प्राप्त नहीं होती।
श्लोक 17 (skanda.2.141.17)
कृष्णं कृष्णतुलस्या हि यो भक्त्या पूजयेन्नरः ।। स याति भुवनं शुभ्रं यत्र विष्णुः श्रिया सह
kṛṣṇaṁ kṛṣṇatulasyā hi yo bhaktyā pūjayennaraḥ sa yāti bhuvanaṁ śubhraṁ yatra viṣṇuḥ śriyā saha
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्याम तुलसी से श्याम (कृष्ण) की पूजा करता है, वह उस उज्ज्वल लोक को प्राप्त होता है जहाँ विष्णु लक्ष्मी सहित निवास करते हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.141.18)
ममाऽर्चनार्थं भिक्षूणां यच्छंति तुलसीदलम् ।। अन्येषामपि भक्तानां यांति ते पदमव्ययम्
mamā'rcanārthaṁ bhikṣūṇāṁ yacchaṁti tulasīdalam anyeṣāmapi bhaktānāṁ yāṁti te padamavyayam
मेरी पूजा के लिए भिक्षुओं को तथा अन्य भक्तों को भी जो तुलसी-दल देते हैं, वे भी अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.141.19)
तुलसी कृष्णगौरा या तया यो मां समर्चयेत् ।। नरो याति तनुं त्यक्त्वा वैष्णवीं शाश्वतीं गतिम्
tulasī kṛṣṇagaurā yā tayā yo māṁ samarcayet naro yāti tanuṁ tyaktvā vaiṣṇavīṁ śāśvatīṁ gatim
जो कृष्ण-गौर वर्ण की तुलसी से मेरी पूजा करता है, वह मनुष्य शरीर त्यागकर सनातन वैष्णवी गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 20 (skanda.2.141.20)
।। ब्रह्मोवाच ।। ।। धूपदानस्य माहात्म्यं दीपस्याऽपि च केशव ।। यत्फलं लभते मर्त्यस्तन्मे ब्रूहि यथार्थतः
brahmovāca dhūpadānasya māhātmyaṁ dīpasyā'pi ca keśava yatphalaṁ labhate martyastanme brūhi yathārthataḥ
ब्रह्मा जी ने कहा — हे केशव! धूप-दान का तथा दीप-दान का भी माहात्म्य, मनुष्य को जो फल प्राप्त होता है, वह मुझे यथार्थ रूप से बताइए।
श्लोक 21 (skanda.2.141.21)
।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि धूपदानस्य यत्फलम् ।। दीपदानस्य माहात्म्यं मम प्रीतिकरं परम्
śrībhagavānuvāca śṛṇu putra pravakṣyāmi dhūpadānasya yatphalam dīpadānasya māhātmyaṁ mama prītikaraṁ param
श्रीभगवान ने कहा — हे पुत्र! सुनो, मैं धूप-दान का फल बताता हूँ, तथा दीप-दान का माहात्म्य, जो मुझे परम प्रिय है।
श्लोक 22 (skanda.2.141.22)
अगुरुं च सकर्पूरं दिव्यचंदनसौरभम् ।। दत्त्वा मां वै सहोमासे कुलानां तारयेच्छतम्
aguruṁ ca sakarpūraṁ divyacaṁdanasaurabham dattvā māṁ vai sahomāse kulānāṁ tārayecchatam
जो सहोम मास में मुझे अगुरु, कर्पूर सहित और दिव्य चन्दन की सुगंध से युक्त धूप अर्पित करता है, वह अपने सौ कुलों को तार देता है।
श्लोक 23 (skanda.2.141.23)
कृष्णागुरुसमुत्थेन धूपेन च ममाऽलयम् ।। धूपयेद्वैष्णवो यस्तु स मुक्तो नरकाऽर्णवात्
kṛṣṇāgurusamutthena dhūpena ca mamā'layam dhūpayedvaiṣṇavo yastu sa mukto narakā'rṇavāt
जो वैष्णव कृष्णागुरु से बने धूप से मेरे मंदिर को सुवासित करता है, वह नरक-सागर से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.2.141.24)
माहिषं गुग्गुलं यस्तु आज्ययुक्तं सशर्करम् ।। धूपं ददाति यो वै मां तस्येच्छां प्रददाम्यहम्
māhiṣaṁ guggulaṁ yastu ājyayuktaṁ saśarkaram dhūpaṁ dadāti yo vai māṁ tasyecchāṁ pradadāmyaham
जो घी और शक्कर सहित महिष-गुग्गुल का धूप मुझे अर्पित करता है, मैं उसकी इच्छा पूर्ण करता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.2.141.25)
गुग्गुलो हंत्यशेषाणि अरिष्टानि च धूपितः ।। कामान्नानाविधांश्चैव अगुरुः संप्रयच्छति
guggulo haṁtyaśeṣāṇi ariṣṭāni ca dhūpitaḥ kāmānnānāvidhāṁścaiva aguruḥ saṁprayacchati
धूप के रूप में जलाया गया गुग्गुल समस्त अनिष्टों को नष्ट कर देता है; अगुरु नाना प्रकार की कामनाएँ प्रदान करता है।
श्लोक 26 (skanda.2.141.26)
देहं गेहं पुनात्येव धूपस्त्वगुरुसंभवः ।। नाशयेद्यक्षरक्षांसि धूपः सर्जरसोद्भवः
dehaṁ gehaṁ punātyeva dhūpastvagurusaṁbhavaḥ nāśayedyakṣarakṣāṁsi dhūpaḥ sarjarasodbhavaḥ
अगुरु से उत्पन्न धूप शरीर और घर दोनों को पवित्र करता है; राल (सर्जरस) से उत्पन्न धूप यक्ष-राक्षसों का नाश करता है।
श्लोक 27 (skanda.2.141.27)
जातिपुष्पमथैला च गुग्गुलश्च हरीतकी ।। कूटः सर्जरसश्चैव गुडःसैलाच्छडस्तथा ।। नखयुक्तानि चैतानि दशांगो धूप उच्यते
jātipuṣpamathailā ca guggulaśca harītakī kūṭaḥ sarjarasaścaiva guḍaḥsailācchaḍastathā nakhayuktāni caitāni daśāṁgo dhūpa ucyate
जाती-पुष्प, इलायची, गुग्गुल और हरीतकी; कूठ, राल, गुड़ और दालचीनी की छाल, तथा नखी — इन दस अंगों वाला धूप कहा जाता है।
श्लोक 28 (skanda.2.141.28)
धूपं दशांगं यदि चेत्करोति मासे सहे मे अतिवल्लभे च ।। ददामि कामानतिदुर्लभानपि बलं च पुष्टिं सुतदारभक्तिम्
dhūpaṁ daśāṁgaṁ yadi cetkaroti māse sahe me ativallabhe ca dadāmi kāmānatidurlabhānapi balaṁ ca puṣṭiṁ sutadārabhaktim
यदि कोई मुझे अत्यंत प्रिय सहोम मास में दस-अंगों वाला धूप अर्पित करता है, तो मैं उसे अत्यंत दुर्लभ कामनाएँ भी, तथा बल, पुष्टि और पुत्र-दारा की भक्ति प्रदान करता हूँ।
श्लोक 29 (skanda.2.141.29)
मुस्ताधूपे मानुषाणां प्रियत्वं मांगल्यकं वश्यकरं गुडस्य ।। कुर्यात्सहोमासि ममाग्रतो यो विहाय पापानि स मां समाप्नुयात्
mustādhūpe mānuṣāṇāṁ priyatvaṁ māṁgalyakaṁ vaśyakaraṁ guḍasya kuryātsahomāsi mamāgrato yo vihāya pāpāni sa māṁ samāpnuyāt
मुस्ता का धूप मनुष्यों में प्रियता, मांगल्य और गुड़ का धूप वशीकरण प्रदान करता है; जो सहोम मास में मेरे आगे यह करता है, वह पापों को त्यागकर मुझे प्राप्त होता है।
श्लोक 30 (skanda.2.141.30)
न भयं विद्यते तस्य दिव्यभौमांतरिक्षजम् ।। मम धूपावशेषेण यस्यांऽगं परिमार्जितम्
na bhayaṁ vidyate tasya divyabhaumāṁtarikṣajam mama dhūpāvaśeṣeṇa yasyāṁ'gaṁ parimārjitam
जिसका शरीर मेरे धूप की भस्म से अभिषिक्त है, उसे स्वर्गीय, भौतिक अथवा आकाशीय — किसी प्रकार का भय नहीं होता।
श्लोक 31 (skanda.2.141.31)
न चापद्विद्यते तस्य भवंति संपदोऽखिलाः ।। धूपे कृते सहोमासे ममाग्रे श्रद्धयाऽनिशम्
na cāpadvidyate tasya bhavaṁti saṁpado'khilāḥ dhūpe kṛte sahomāse mamāgre śraddhayā'niśam
जो सहोम मास में मेरे आगे श्रद्धापूर्वक निरंतर धूप अर्पित करता है, उसे कोई विपत्ति नहीं होती, और उसकी समस्त संपदाएँ सुरक्षित रहती हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.141.32)
धूपः सुरूपतां धत्ते धूपः पावनमुत्तमम् ।। वनस्पतिरसो दिव्यः परमः पावनः शुचिः
dhūpaḥ surūpatāṁ dhatte dhūpaḥ pāvanamuttamam vanaspatiraso divyaḥ paramaḥ pāvanaḥ śuciḥ
धूप सुंदर रूप प्रदान करता है, धूप उत्तम पवित्रता का साधन है; यह वनस्पतियों का दिव्य रस है, परम पावन और शुद्ध।
श्लोक 33 (skanda.2.141.33)
अतः परं प्रवक्ष्यामि दीपमाहात्म्यमुत्तमम् ।। यस्मिन्कृते नरो याति वैकुण्ठं नात्र संशयः
ataḥ paraṁ pravakṣyāmi dīpamāhātmyamuttamam yasminkṛte naro yāti vaikuṇṭhaṁ nātra saṁśayaḥ
अब मैं इससे आगे दीप के उत्तम माहात्म्य का वर्णन करूँगा, जिसे करने से मनुष्य वैकुण्ठ को जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक 34 (skanda.2.141.34)
बहुवर्तिसमायुक्तं घृतपूरसमन्वितम् ।। कुर्यादारार्तिकं यो वै कल्पकोटिं दिवं वसेत्
bahuvartisamāyuktaṁ ghṛtapūrasamanvitam kuryādārārtikaṁ yo vai kalpakoṭiṁ divaṁ vaset
जो बहुत सी बत्तियों से युक्त, प्रचुर घी से भरी आरती करता है, वह करोड़ों कल्पों तक स्वर्ग में निवास करता है।
श्लोक 35 (skanda.2.141.35)
नीराजनं तु यः पश्येत्सहोमासे ममाऽग्रतः ।। सप्तजन्म भवेद्विप्रो ह्यंते च परमं पदम्
nīrājanaṁ tu yaḥ paśyetsahomāse mamā'grataḥ saptajanma bhavedvipro hyaṁte ca paramaṁ padam
जो सहोम मास में मेरे आगे नीराजन (आरती) का दर्शन करता है, वह सात जन्मों तक ब्राह्मण होता है, और अंत में परम पद प्राप्त करता है।
श्लोक 36 (skanda.2.141.36)
कर्पूरेण तु यः कुर्याद्भक्त्या चैव ममाग्रतः ।। आरार्तिकं द्विजश्रेष्ठ प्रविशेन्मामनंतकम्
karpūreṇa tu yaḥ kuryādbhaktyā caiva mamāgrataḥ ārārtikaṁ dvijaśreṣṭha praviśenmāmanaṁtakam
हे द्विजश्रेष्ठ! जो भक्तिपूर्वक मेरे आगे कर्पूर से आरती करता है, वह अनंत स्वरूप मुझमें ही प्रविष्ट हो जाता है।
श्लोक 37 (skanda.2.141.37)
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत्कृतं पूजनं मम ।। सर्वं संपूर्णतामेति कृते नीराजने सुत
mantrahīnaṁ kriyāhīnaṁ yatkṛtaṁ pūjanaṁ mama sarvaṁ saṁpūrṇatāmeti kṛte nīrājane suta
हे पुत्र! मंत्ररहित और क्रियारहित होकर की गई मेरी पूजा भी आरती के होने से सम्पूर्ण हो जाती है।
श्लोक 38 (skanda.2.141.38)
यः करोति सहोमासे कर्पूरेण च दीपकम् ।। अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत्
yaḥ karoti sahomāse karpūreṇa ca dīpakam aśvamedhamavāpnoti kulaṁ caiva samuddharet
जो सहोम मास में कर्पूर से दीपक जलाता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाता है और अपने कुल का उद्धार करता है।
श्लोक 39 (skanda.2.141.39)
ममाऽग्रे वै द्विजानां च दीपं दद्याच्चतुष्पथे ।। मेधावी ज्ञानसंपन्नश्चक्षुष्माञ्जायते नरः
mamā'gre vai dvijānāṁ ca dīpaṁ dadyāccatuṣpathe medhāvī jñānasaṁpannaścakṣuṣmāñjāyate naraḥ
जो मेरे आगे तथा ब्राह्मणों के आगे चौराहे पर दीपक अर्पित करता है, वह बुद्धिमान, ज्ञानसंपन्न और स्पष्ट दृष्टि वाला मनुष्य होता है।
श्लोक 40 (skanda.2.141.40)
घृतेन वाऽथ तैलेन दीपं प्रज्वालयेन्नरः ।। सहोमासे ममाऽग्रे च तस्य पुण्यफलं शृणु
ghṛtena vā'tha tailena dīpaṁ prajvālayennaraḥ sahomāse mamā'gre ca tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
जो मनुष्य सहोम मास में मेरे आगे घी अथवा तेल से दीपक जलाता है, उसके पुण्य-फल को सुनो—
श्लोक 41 (skanda.2.141.41)
विहाय सकलं पापं सहस्रादित्यसन्निभः ।। ज्योतिष्मता विमानेन मम लोके महीयते
vihāya sakalaṁ pāpaṁ sahasrādityasannibhaḥ jyotiṣmatā vimānena mama loke mahīyate
वह समस्त पाप त्यागकर, सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी होकर, ज्योतिर्मय विमान में बैठकर मेरे लोक में महिमामंडित होता है।
श्लोक 42 (skanda.2.141.42)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन दीपं दद्याद्विचक्षणः ।। तं च दत्त्वा विहिंसेद्यः स पतेन्नरके धुवम्
tasmātsarvaprayatnena dīpaṁ dadyādvicakṣaṇaḥ taṁ ca dattvā vihiṁsedyaḥ sa patennarake dhuvam
इसलिए विचक्षण पुरुष को सम्पूर्ण प्रयत्न से दीपक अर्पित करना चाहिए; परन्तु जो दीपक अर्पित करके भी उसे नष्ट करता है, वह निश्चय ही नरक में गिरता है।
श्लोक 43 (skanda.2.141.43)
दीपं यो वै हरेत्पापी लोभाद्द्वेषाद्द्विजोत्तम ।। तद्दीपहरणात्सोऽपि मूकोंऽधश्च प्रजायते
dīpaṁ yo vai haretpāpī lobhāddveṣāddvijottama taddīpaharaṇātso'pi mūkoṁ'dhaśca prajāyate
हे द्विजोत्तम! जो पापी लोभ अथवा द्वेष से दीपक चुरा लेता है, वह उस दीप-हरण के कारण मूक और अंधा होकर जन्म लेता है।