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वैष्णव खण्ड · अध्याय 142

नैवेद्य विधि का कथन

अध्याय 141अध्याय-सूचीअध्याय 143

श्लोक 1 (skanda.2.142.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। ।। नैवेद्यस्य विधिं ब्रूहि देव मे तत्त्वतः प्रभो ।। अन्नं कतिविधं चेष्टं व्यंजनादीन्यशेषतः

brahmovāca naivedyasya vidhiṁ brūhi deva me tattvataḥ prabho annaṁ katividhaṁ ceṣṭaṁ vyaṁjanādīnyaśeṣataḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे प्रभो! नैवेद्य की विधि मुझे यथार्थ रूप से बताइए। कितने प्रकार का अन्न वांछित है, तथा व्यंजन आदि सम्पूर्ण रूप से बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.142.2)

।।श्रीभगवानुवाच ।। ।। साधु पृष्टं त्वया वत्स मम प्रीतिकरं परम् ।। वक्ष्यामि तेऽन्नपानादिव्यंजनादीन्यशेषतः

śrībhagavānuvāca sādhu pṛṣṭaṁ tvayā vatsa mama prītikaraṁ param vakṣyāmi te'nnapānādivyaṁjanādīnyaśeṣataḥ

श्रीभगवान ने कहा — हे वत्स! तुमने उत्तम प्रश्न पूछा है, जो मुझे अत्यंत प्रिय है। मैं तुम्हें अन्न, पान और व्यंजन आदि सम्पूर्ण रूप से बताता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.2.142.3)

आदौ हिरण्मयं पात्रं तदभावे च राजतम् ।। तदभावे च पालाशं विस्तीर्णं बहुसुन्दरम्

ādau hiraṇmayaṁ pātraṁ tadabhāve ca rājatam tadabhāve ca pālāśaṁ vistīrṇaṁ bahusundaram

पहले स्वर्ण का पात्र होना चाहिए, उसके अभाव में चाँदी का, और उसके भी अभाव में पलाश के पत्तों का बना विस्तृत और अत्यंत सुंदर पात्र।

श्लोक 4 (skanda.2.142.4)

कचोलाः शतशः कार्याः पात्रे वै परितोऽनघ ।। तन्मध्ये व्यंजना देया नानाफलमयाः शुभाः

kacolāḥ śataśaḥ kāryāḥ pātre vai parito'nagha tanmadhye vyaṁjanā deyā nānāphalamayāḥ śubhāḥ

हे निष्पाप! उस पात्र के चारों ओर सैकड़ों छोटी कटोरियाँ रखनी चाहिए, जिनमें नाना फलों से बने शुभ व्यंजन रखे जाएँ।

श्लोक 5 (skanda.2.142.5)

पायसं चन्द्रसंकाशं पात्रे वै शर्करायुतम् ।। भक्तं कुमुदसंकाशं मुद्गान्काचप्रभाञ्छुभान्

pāyasaṁ candrasaṁkāśaṁ pātre vai śarkarāyutam bhaktaṁ kumudasaṁkāśaṁ mudgānkācaprabhāñchubhān

चन्द्रमा के समान पायस शक्कर सहित पात्र में, कुमुद के समान सफेद भात, तथा काँच की आभा वाली शुभ मूँग की दाल—

श्लोक 6 (skanda.2.142.6)

नानाव्यंजनसंरुद्धं त्रिभिः पंक्तिभिरेव च ।। निंबूरसेन चंद्रेण फलमूलयुतेन च

nānāvyaṁjanasaṁruddhaṁ tribhiḥ paṁktibhireva ca niṁbūrasena caṁdreṇa phalamūlayutena ca

—नाना व्यंजनों से भरी हुई तीन पंक्तियों में, नींबू के रस और चन्द्रमा जैसे उज्ज्वल भात के साथ, फल-मूल सहित।

श्लोक 7 (skanda.2.142.7)

वैकृताश्च तदा कार्याः शतशो भोजने मम ।। द्राक्षास्तु मिश्रिताश्चूतकरमर्द कृताः शुभाः

vaikṛtāśca tadā kāryāḥ śataśo bhojane mama drākṣāstu miśritāścūtakaramarda kṛtāḥ śubhāḥ

फिर मेरे भोजन के लिए सैकड़ों विशेष व्यंजन बनाने चाहिए — मिश्रित अंगूर, तथा आम और करौंदे से बने शुभ पदार्थ—

श्लोक 8 (skanda.2.142.8)

मरीचपिप्पलीसार्द्रकैलाचंद्रकसंयुताः ।। क्वाथिताः कथिकाः कार्याः शतशो भोजने मम

marīcapippalīsārdrakailācaṁdrakasaṁyutāḥ kvāthitāḥ kathikāḥ kāryāḥ śataśo bhojane mama

—काली मिर्च, पीपल, अदरक और इलायची से युक्त, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल पकाए हुए व्यंजन सैकड़ों की संख्या में मेरे भोजन के लिए बनाने चाहिए।

श्लोक 9 (skanda.2.142.9)

प्रलेहनास्तथा कार्याः कचोलशतसंकुलाः ।। नानाकुसुमसंमोदयुक्ताः सहसि मे प्रियाः

pralehanāstathā kāryāḥ kacolaśatasaṁkulāḥ nānākusumasaṁmodayuktāḥ sahasi me priyāḥ

उसी प्रकार गाढ़े मीठे व्यंजन भी सैकड़ों कटोरियों में भरकर बनाने चाहिए, जो नाना पुष्पों की सुगंध से युक्त हों — ये मुझे हृदय से प्रिय हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.142.10)

मंडका वर्तुला रम्याः समाः सर्वत्र बिंदुवत् ।। सितया सहितेनाऽथ दुग्धेन क्वथितेन च

maṁḍakā vartulā ramyāḥ samāḥ sarvatra biṁduvat sitayā sahitenā'tha dugdhena kvathitena ca

गोल, रमणीय, सर्वत्र बूँद के समान सम मण्डक (मीठी रोटी), शक्कर सहित उबले हुए दूध के साथ—

श्लोक 11 (skanda.2.142.11)

मधुवर्णेन गव्येन युक्ते तस्मिन्सुभोजने ।। कचोले सुप्रभे वत्स स्थितं कांचनसुप्रभम्

madhuvarṇena gavyena yukte tasminsubhojane kacole suprabhe vatsa sthitaṁ kāṁcanasuprabham

—हे वत्स! उस मधु के वर्ण वाले गोदुग्ध से युक्त सुंदर भोजन में, उज्ज्वल कटोरी में स्वर्ण के समान चमकीला पदार्थ रखा हो।

श्लोक 12 (skanda.2.142.12)

घृतं सुवासितं प्रीत्या देयं हि मम भोजने ।। तत्र गोधूमपात्रेण चंद्रकेण हि चोज्ज्वलम्

ghṛtaṁ suvāsitaṁ prītyā deyaṁ hi mama bhojane tatra godhūmapātreṇa caṁdrakeṇa hi cojjvalam

प्रेमपूर्वक सुगंधित घी मेरे भोजन में देना चाहिए; वहाँ गेहूँ के आटे के पात्र में चन्द्रमा के समान उज्ज्वल पदार्थ रखा हो।

श्लोक 13 (skanda.2.142.13)

सौवाह्लिकाः पूरिकास्तु शतच्छिद्राः सवेष्टिकाः ।। अपूपाश्च तथा क्षीरं प्रकारांस्तु प्रकारयेत्

sauvāhlikāḥ pūrikāstu śatacchidrāḥ saveṣṭikāḥ apūpāśca tathā kṣīraṁ prakārāṁstu prakārayet

सुवाह्लिका, सौ छिद्रों वाली पूरियाँ, लपेटी हुई मिठाइयाँ, तथा विविध अपूप (पुए) और दूध — इन सब प्रकारों को बनाना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.142.14)

मणयः सूत्रसंज्ञाश्च मालतीकुसुमादयः ।। पर्पटा वर्पटा रम्या माषकूष्मांडसंभवाः

maṇayaḥ sūtrasaṁjñāśca mālatīkusumādayaḥ parpaṭā varpaṭā ramyā māṣakūṣmāṁḍasaṁbhavāḥ

मालती-पुष्प जैसी आकृति वाली धागे-जैसी मिठाइयाँ, तथा उड़द और कुम्हड़े से बने रमणीय पर्पट और वर्पट (पापड़ जैसे व्यंजन)—

श्लोक 15 (skanda.2.142.15)

वटकान्नवधा रम्यान्कुर्यान्मासे सहे मम ।। द्विधा जातीमरीचैश्च पूरिता द्रोणके शुभाः

vaṭakānnavadhā ramyānkuryānmāse sahe mama dvidhā jātīmarīcaiśca pūritā droṇake śubhāḥ

मेरे सहोम मास में नौ प्रकार के रमणीय वटक (पकौड़े) बनाने चाहिए — दो प्रकार जायफल और मिर्च से भरे हुए, छोटे पात्र में शुभ रूप से रखे हुए—

श्लोक 16 (skanda.2.142.16)

युक्तेन लवणेनाऽतिशुद्धतैलेन पूरिताः ।। कुंकुमाभाः स्नेहहीनाः सक्षता इव दुर्जनाः

yuktena lavaṇenā'tiśuddhatailena pūritāḥ kuṁkumābhāḥ snehahīnāḥ sakṣatā iva durjanāḥ

—उचित नमक से युक्त और शुद्ध तेल से भरे, केसर के रंग जैसे, अधिक चिकनाई रहित, दुर्जन के समान करारे (कुरकुरे)—

श्लोक 17 (skanda.2.142.17)

दधिदुग्धयुताः केचिच्चिंचिणीचूतसंभवाः ।। द्राक्षारसयुताः केचित्तथैवेक्षुरसैर्युताः

dadhidugdhayutāḥ kecicciṁciṇīcūtasaṁbhavāḥ drākṣārasayutāḥ kecittathaivekṣurasairyutāḥ

कुछ दही-दूध से युक्त, कुछ इमली और आम से बने; कुछ अंगूर के रस से युक्त, और उसी प्रकार कुछ गन्ने के रस से युक्त—

श्लोक 18 (skanda.2.142.18)

राजिका जलमध्यस्थास्तथाऽन्ये सितया सह ।। रसैश्चतुर्विधैश्चान्यैर्वटका नवधा मताः

rājikā jalamadhyasthāstathā'nye sitayā saha rasaiścaturvidhaiścānyairvaṭakā navadhā matāḥ

कुछ राई मिले जल में डूबे हुए, तथा अन्य शक्कर सहित — इन चार प्रकार के रसों तथा अन्य से वटक नौ प्रकार के माने गए हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.142.19)

वज्रप्रभाऽनुकणिकाचारबीजसुखारिकैः ।। शकलैर्नारिकेलस्य लवंगशतसंयुताः

vajraprabhā'nukaṇikācārabījasukhārikaiḥ śakalairnārikelasya lavaṁgaśatasaṁyutāḥ

हीरे की आभा वाले, छोटे-छोटे दानों वाले, सुपारी और आरामदायक पदार्थों से युक्त, नारियल की कतरनों तथा सैकड़ों लौंगों से युक्त—

श्लोक 20 (skanda.2.142.20)

घृतक्षीरसिताद्यास्ताः कटाहे सुप्रलोडिताः ।। लब्धासितादिकृसररम्याः स्निग्धाश्च फेणिकाः

ghṛtakṣīrasitādyāstāḥ kaṭāhe supraloḍitāḥ labdhāsitādikṛsararamyāḥ snigdhāśca pheṇikāḥ

घी, दूध और शक्कर आदि से युक्त, कड़ाही में भलीभाँति सिझाए हुए; शक्कर आदि से बनी रमणीय खिचड़ी (कृसर) तथा चिकनी फेणिका (मीठी बर्फी जैसा व्यंजन)—

श्लोक 21 (skanda.2.142.21)

पराकिकासु वै पक्वाः कृताश्चंद्रेण पोलिकाः ।। मोदकास्तत्र वै कार्याश्चारबीजभवाः परे

parākikāsu vai pakvāḥ kṛtāścaṁdreṇa polikāḥ modakāstatra vai kāryāścārabījabhavāḥ pare

विशेष तवों पर पकाई गई, चन्द्रमा के समान बनाई गई पोलिका (भरवाँ रोटी); वहाँ मोदक भी बनाने चाहिए, और अन्य सुपारी से बने पदार्थ भी।

श्लोक 22 (skanda.2.142.22)

सितया सहिताः कार्या अन्ये दुग्धेन निर्मिताः ।। नारिकेलफलैश्चाऽन्ये वृक्षनिर्यासनिर्मिताः

sitayā sahitāḥ kāryā anye dugdhena nirmitāḥ nārikelaphalaiścā'nye vṛkṣaniryāsanirmitāḥ

कुछ शक्कर सहित बनाए जाएँ, कुछ दूध से बनाए जाएँ; कुछ नारियल के फलों से, कुछ वृक्षों के गोंद से बनाए जाएँ।

श्लोक 23 (skanda.2.142.23)

बदामैश्च शुभाश्चाऽन्ये तिलैश्च कणबीजकैः ।। ईदृशान्मोदकांश्चान्यांस्तुष्ट्यर्थं मम कारयेत्

badāmaiśca śubhāścā'nye tilaiśca kaṇabījakaiḥ īdṛśānmodakāṁścānyāṁstuṣṭyarthaṁ mama kārayet

बादाम से बने अन्य शुभ पदार्थ, तथा तिल और खसखस से बने पदार्थ भी — इसी प्रकार के अन्य मोदक भी मेरी प्रसन्नता के लिए बनाने चाहिए।

श्लोक 24 (skanda.2.142.24)

अर्शोघ्नं मोचनीकंदं तथाऽऽर्द्रं करमर्दकम् ।। नारिंगं चिंचिणीकं च कंकोलफलमेव च

arśoghnaṁ mocanīkaṁdaṁ tathā''rdraṁ karamardakam nāriṁgaṁ ciṁciṇīkaṁ ca kaṁkolaphalameva ca

बवासीर का नाश करने वाला कंद, गीला करौंदा, संतरा, इमली, और कंकोल फल भी—

श्लोक 25 (skanda.2.142.25)

दशारं त्रिपुरीजातं शुभं निंबफलं बिसम् ।। तिंदूफलं लवंगं च श्रीफलं तिलकं लुति

daśāraṁ tripurījātaṁ śubhaṁ niṁbaphalaṁ bisam tiṁdūphalaṁ lavaṁgaṁ ca śrīphalaṁ tilakaṁ luti

त्रिपुरी में उत्पन्न शुभ दशार फल, नीम का फल, कमल की नाल, तेंदू फल, लौंग, बेल का फल, तिलक फल और लुति फल—

श्लोक 26 (skanda.2.142.26)

वल्कलं वंशकारीरं तथा कायफलं बलम् ।। द्राक्षाफलं चूतफलं रम्यं कंटकिनीफलम्

valkalaṁ vaṁśakārīraṁ tathā kāyaphalaṁ balam drākṣāphalaṁ cūtaphalaṁ ramyaṁ kaṁṭakinīphalam

वृक्ष की छाल, बाँस का अंकुर, कायफल और बला (औषधीय मूल); अंगूर का फल, आम का फल, और रमणीय काँटेदार पौधे का फल—

श्लोक 27 (skanda.2.142.27)

धात्रीफलं शुक्तिभवं फलमंबाडवं तथा ।। रंभाफलं पिप्पली च मरीचाश्च मनोहराः

dhātrīphalaṁ śuktibhavaṁ phalamaṁbāḍavaṁ tathā raṁbhāphalaṁ pippalī ca marīcāśca manoharāḥ

आँवले का फल, सीप में उत्पन्न फल, अंबाड़े का फल, केले का फल, पीपल और मनोहर काली मिर्च—

श्लोक 28 (skanda.2.142.28)

शुद्धसर्षपतैलेन लवणेन सुवेधितम् ।। तथा राजिकया विद्धं त्रिभिर्वर्षैर्घटे स्थितम्

śuddhasarṣapatailena lavaṇena suvedhitam tathā rājikayā viddhaṁ tribhirvarṣairghaṭe sthitam

शुद्ध सरसों के तेल और नमक से भलीभाँति संस्कारित, राई से युक्त, तीन वर्षों तक घड़े में रखा हुआ—

श्लोक 29 (skanda.2.142.29)

एवंविधानि जातानि व्यंजनानि च मानद ।। कर्तव्यानि सहोमासे मम प्रीतिकराणि वै

evaṁvidhāni jātāni vyaṁjanāni ca mānada kartavyāni sahomāse mama prītikarāṇi vai

हे मानद! इस प्रकार तैयार किए गए ये सभी व्यंजन सहोम मास में बनाने चाहिए, जो मुझे अत्यंत प्रिय हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.142.30)

एतादृशे भोजने चेदसामर्थ्यं भवेद्यदि ।। एवं कार्यं तदा तेन संक्षेपेण शृणुष्व मे

etādṛśe bhojane cedasāmarthyaṁ bhavedyadi evaṁ kāryaṁ tadā tena saṁkṣepeṇa śṛṇuṣva me

यदि इस प्रकार का भोजन तैयार करने में असमर्थता हो, तो संक्षेप में जो करना चाहिए, वह मुझसे सुनो।

श्लोक 31 (skanda.2.142.31)

लड्डूकमेकं घृतपूरमेकं फेनद्वयं कोकरसत्रयं च ।। घृतप्लुतं मंडकषोडशानां वटाष्टदायी नरकं न पश्येत्

laḍḍūkamekaṁ ghṛtapūramekaṁ phenadvayaṁ kokarasatrayaṁ ca ghṛtaplutaṁ maṁḍakaṣoḍaśānāṁ vaṭāṣṭadāyī narakaṁ na paśyet

एक लड्डू, एक घृतपूर (घी में तला हुआ पुआ), दो फेनी, तीन कोकरस, घी में डूबे सोलह मण्डक और आठ वटक अर्पित करने वाला मनुष्य कभी नरक नहीं देखता।

श्लोक 32 (skanda.2.142.32)

आढकं सुचिरपर्युषितं च दुग्धं खंडस्य षोडशपलानि शशिप्रभस्य ।। सर्पिष्पलं मधुपलं मरिचं द्विकर्षं शुंठ्याः पलार्धमथवाऽर्धपलं चतुर्णाम्

āḍhakaṁ suciraparyuṣitaṁ ca dugdhaṁ khaṁḍasya ṣoḍaśapalāni śaśiprabhasya sarpiṣpalaṁ madhupalaṁ maricaṁ dvikarṣaṁ śuṁṭhyāḥ palārdhamathavā'rdhapalaṁ caturṇām

एक आढक चिरकाल तक रखा हुआ दूध, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल शक्कर के सोलह पल, एक पल घी, एक पल मधु, दो कर्ष काली मिर्च, आधा पल सोंठ अथवा चारों के लिए आधा पल—

श्लोक 33 (skanda.2.142.33)

श्लक्ष्णे पटे ललनया मृदुपाणिघृष्टां कर्पूरधूलिधवलीकृतभांडसंस्थाम् ।। एतां शुभां रसवतीं प्रकरोति यो वै कामान्ददामि सकलान्मनुजस्य तस्य

ślakṣṇe paṭe lalanayā mṛdupāṇighṛṣṭāṁ karpūradhūlidhavalīkṛtabhāṁḍasaṁsthām etāṁ śubhāṁ rasavatīṁ prakaroti yo vai kāmāndadāmi sakalānmanujasya tasya

—इसी शुभ रसवती (मिष्ठान्न) को जो कोई सुंदरी कोमल हाथों से चिकने वस्त्र पर मलकर, कर्पूर की धूलि से श्वेत किए गए पात्र में रखकर तैयार करता है, उस मनुष्य को मैं उसकी समस्त कामनाएँ प्रदान करता हूँ।

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