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वैष्णव खण्ड · अध्याय 143

पूजा-विधि की समाप्ति, उसके उद्यापन एवं फल का कथन

अध्याय 142अध्याय-सूचीअध्याय 144

श्लोक 1 (skanda.2.143.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। ।। नैवेद्यानंतरं तात किं कर्तव्यं नृभिः प्रभो ।। यत्कर्तव्यं सहोमासे तत्सर्वं ब्रूहि तत्त्वतः

brahmovāca naivedyānaṁtaraṁ tāta kiṁ kartavyaṁ nṛbhiḥ prabho yatkartavyaṁ sahomāse tatsarvaṁ brūhi tattvataḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे तात, हे प्रभो! नैवेद्य के पश्चात् मनुष्यों को क्या करना चाहिए? सहोम मास में जो कुछ करना चाहिए, वह सब मुझे यथार्थ रूप से बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.143.2)

श्रीभगवानुवाच ।। ।। अथ भुक्तवते दत्त्वा जलैः कर्पूरवासितैः ।। आचमनं च तांबूलं चंदनं करमार्जनम्

śrībhagavānuvāca atha bhuktavate dattvā jalaiḥ karpūravāsitaiḥ ācamanaṁ ca tāṁbūlaṁ caṁdanaṁ karamārjanam

श्रीभगवान ने कहा — फिर भोजन कर चुके [देव] को कर्पूर-सुवासित जल से आचमन, ताम्बूल, चन्दन और हाथ पोंछना अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.143.3)

पुष्पांजलिं ततः कुर्याद्भक्त्याऽऽदर्शं प्रदर्शयेत् ।। नीराजनं ततः कार्यं कार्पूरं विभवे सति

puṣpāṁjaliṁ tataḥ kuryādbhaktyā''darśaṁ pradarśayet nīrājanaṁ tataḥ kāryaṁ kārpūraṁ vibhave sati

फिर भक्तिपूर्वक पुष्पांजलि अर्पित करे और दर्पण दिखाए; फिर सामर्थ्य होने पर कर्पूर से नीराजन (आरती) करे।

श्लोक 4 (skanda.2.143.4)

समर्प्य मुकुटादीनि भूषणानि विचक्षणः ।। ततः पश्चान्महाभाग प्रकल्प्य च्छत्रचामरे

samarpya mukuṭādīni bhūṣaṇāni vicakṣaṇaḥ tataḥ paścānmahābhāga prakalpya cchatracāmare

हे महाभाग! विचक्षण पुरुष मुकुट आदि आभूषण अर्पित करके, फिर छत्र और चामर की व्यवस्था करे।

श्लोक 5 (skanda.2.143.5)

प्रसादसुमुखं ध्यात्वा श्यामसुंदरविग्रहम् ।। जपेदष्टोत्तरशतं स्तुवीत स्तुतिभिः प्रभुम्

prasādasumukhaṁ dhyātvā śyāmasuṁdaravigraham japedaṣṭottaraśataṁ stuvīta stutibhiḥ prabhum

प्रसन्न मुखमंडल वाले, श्याम-सुंदर स्वरूप का ध्यान करके, एक सौ आठ बार जप करे और स्तोत्रों से प्रभु की स्तुति करे।

श्लोक 6 (skanda.2.143.6)

शंखरौप्यमयी माला कांचनी च विशेषतः ।। पद्माक्षैश्चैव सुभगैर्विद्रुमैर्मणिमौक्तिकैः

śaṁkharaupyamayī mālā kāṁcanī ca viśeṣataḥ padmākṣaiścaiva subhagairvidrumairmaṇimauktikaiḥ

शंख अथवा चाँदी की माला, और विशेष रूप से स्वर्ण की; पद्माक्ष की सुंदर माला, मूँगे, मणि और मोतियों की—

श्लोक 7 (skanda.2.143.7)

रचितेंद्राक्षकैर्माला तथैवांगुलिपर्वभिः ।। पुत्रजीवमयी माला शस्ता वै जपकर्मणि

raciteṁdrākṣakairmālā tathaivāṁguliparvabhiḥ putrajīvamayī mālā śastā vai japakarmaṇi

—इन्द्राक्ष से बनी माला, तथा उसी प्रकार अंगुलियों के पोरों से गिनने की विधि भी; पुत्रजीव के बीजों की माला जप-कर्म के लिए प्रशस्त है।

श्लोक 8 (skanda.2.143.8)

न च क्रमन्न च हसन्न पार्श्वमवलोकयन् ।। न पदा पदमाक्राम्य करप्राप्तशिरास्तथा

na ca kramanna ca hasanna pārśvamavalokayan na padā padamākrāmya karaprāptaśirāstathā

न चलते हुए, न हँसते हुए, न बगल में देखते हुए; न पैर पर पैर रखते हुए, और न ही हाथ से सिर तक माला को छुआते हुए—

श्लोक 9 (skanda.2.143.9)

नोत्तिष्ठन्मन्मनुं विद्वान्न जपेद्व्यग्रमानसः ।। जपकाले न भाषेत व्रतहोमार्चनादिषु

nottiṣṭhanmanmanuṁ vidvānna japedvyagramānasaḥ japakāle na bhāṣeta vratahomārcanādiṣu

—विद्वान को मेरे मंत्र का जप करते समय उठना नहीं चाहिए, न व्यग्रचित्त होकर जप करना चाहिए; जप के समय, तथा व्रत, होम और पूजा आदि में बोलना नहीं चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.2.143.10)

गृहेष्वेकगुणंजाप्यं गोष्ठे दशगुणं भवेत् ।। नदीतीरे शतं विद्यादग्न्यगारे दशाऽधिकम्

gṛheṣvekaguṇaṁjāpyaṁ goṣṭhe daśaguṇaṁ bhavet nadītīre śataṁ vidyādagnyagāre daśā'dhikam

घर में जप का एक गुना फल होता है, गौशाला में दस गुना होता है; नदी के तट पर सौ गुना जानना चाहिए, अग्निशाला में उससे दस गुना अधिक।

श्लोक 11 (skanda.2.143.11)

तीर्थादिषु सहस्रं स्यादनंतं मम सन्निधौ ।। एवं कृत्वा सहोमासे यः कुर्याच्च प्रदक्षिणाम्

tīrthādiṣu sahasraṁ syādanaṁtaṁ mama sannidhau evaṁ kṛtvā sahomāse yaḥ kuryācca pradakṣiṇām

तीर्थों में सहस्र गुना होता है, और मेरी सन्निधि में अनंत गुना। इस प्रकार सहोम मास में करके जो प्रदक्षिणा करता है—

श्लोक 12 (skanda.2.143.12)

सप्तद्वीपवतीपुण्यं लभते स पदेपदे ।। पठन्नामसहस्रं तु अथवा नाम केवलम्

saptadvīpavatīpuṇyaṁ labhate sa padepade paṭhannāmasahasraṁ tu athavā nāma kevalam

—वह प्रत्येक पग पर सप्तद्वीपा पृथ्वी का पुण्य प्राप्त करता है, चाहे वह सहस्रनाम का पाठ करे अथवा केवल नाम का ही।

श्लोक 13 (skanda.2.143.13)

एका प्रदक्षिणा भक्त्या दहेत्पापं सदाऽऽह्निकम् ।। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा

ekā pradakṣiṇā bhaktyā dahetpāpaṁ sadā''hnikam pradakṣiṇīkṛtā tena saptadvīpā vasundharā

भक्तिपूर्वक की गई एक प्रदक्षिणा प्रतिदिन के पाप को जला देती है; उसके द्वारा सप्तद्वीपा पृथ्वी की ही प्रदक्षिणा हो जाती है।

श्लोक 14 (skanda.2.143.14)

दिनसप्तोद्भवं पापं मम तिस्रः प्रदक्षिणाः ।। तत्क्षणान्नाशयंत्येव पापं देहे दशाऽऽह्निकम्

dinasaptodbhavaṁ pāpaṁ mama tisraḥ pradakṣiṇāḥ tatkṣaṇānnāśayaṁtyeva pāpaṁ dehe daśā''hnikam

मेरी तीन प्रदक्षिणाएँ सात दिनों में उत्पन्न पाप को तत्क्षण नष्ट कर देती हैं, तथा शरीर में दस दिनों तक जमा पाप को भी नष्ट कर देती हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.143.15)

कृताः प्रदक्षिणा येन एकविंशति भक्तितः ।। भ्रूणहत्यादिपापानि नाशमायांति तत्क्षणात्

kṛtāḥ pradakṣiṇā yena ekaviṁśati bhaktitaḥ bhrūṇahatyādipāpāni nāśamāyāṁti tatkṣaṇāt

जिसने भक्तिपूर्वक इक्कीस प्रदक्षिणाएँ की हैं, उसके भ्रूणहत्या आदि पाप उसी क्षण नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.143.16)

अष्टोत्तरशतं येन कृता भक्त्या प्रदक्षिणाः ।। तेनेष्टं क्रतुभिः सर्वैः समाप्तवरदक्षिणैः

aṣṭottaraśataṁ yena kṛtā bhaktyā pradakṣiṇāḥ teneṣṭaṁ kratubhiḥ sarvaiḥ samāptavaradakṣiṇaiḥ

जिसने भक्तिपूर्वक एक सौ आठ प्रदक्षिणाएँ की हैं, उसके द्वारा दक्षिणा सहित सम्पन्न किए गए सभी यज्ञों के समान इष्ट पूर्ण हो जाता है।

श्लोक 17 (skanda.2.143.17)

प्रदक्षिणीकृता तेन तावद्वारं वसुन्धरा ।। मातुः प्रदक्षिणास्तद्वद्भूतधात्रीप्रदक्षिणाः

pradakṣiṇīkṛtā tena tāvadvāraṁ vasundharā mātuḥ pradakṣiṇāstadvadbhūtadhātrīpradakṣiṇāḥ

उसके द्वारा पृथ्वी उतनी ही बार परिक्रमा की गई मानी जाती है; माता की प्रदक्षिणा, तथा भूदेवी की प्रदक्षिणा भी उसी के समान है।

श्लोक 18 (skanda.2.143.18)

शालिग्रामशिलायाश्च सममेतत्त्रयं स्मृतम् ।। एको दंडप्रपातश्च सहे सप्तप्रदक्षिणाः

śāligrāmaśilāyāśca samametattrayaṁ smṛtam eko daṁḍaprapātaśca sahe saptapradakṣiṇāḥ

शालिग्राम शिला की प्रदक्षिणा भी — ये तीनों समान स्मृत हैं। सहोम मास में एक दण्डवत् प्रणाम सात प्रदक्षिणाओं के समान है।

श्लोक 19 (skanda.2.143.19)

सममेतद्द्वयं नो वा दंडपातो विशिष्यते ।। प्रदक्षिणे दंडपातं यः करोति सदा मम

samametaddvayaṁ no vā daṁḍapāto viśiṣyate pradakṣiṇe daṁḍapātaṁ yaḥ karoti sadā mama

ये दोनों समान नहीं हैं — दण्डवत् प्रणाम ही श्रेष्ठ है। जो सदा प्रदक्षिणा के साथ मेरे लिए दण्डवत् प्रणाम भी करता है—

श्लोक 20 (skanda.2.143.20)

सहोमासे विशेषेण आकल्पं स वसेद्दिवि ।। कल्पादनंतरं तात चक्रवर्ती प्रजायते

sahomāse viśeṣeṇa ākalpaṁ sa vaseddivi kalpādanaṁtaraṁ tāta cakravartī prajāyate

—विशेष रूप से सहोम मास में, वह कल्प के अंत तक स्वर्ग में निवास करता है; हे तात! कल्प के पश्चात् वह चक्रवर्ती सम्राट होकर जन्म लेता है।

श्लोक 21 (skanda.2.143.21)

चिरायुर्धनवान्भोगी दानवान्धर्मवत्सलः ।। सहस्रनामपठनात्पापं नश्येत्त्रिधा कृतम्

cirāyurdhanavānbhogī dānavāndharmavatsalaḥ sahasranāmapaṭhanātpāpaṁ naśyettridhā kṛtam

दीर्घायु, धनवान, भोगयुक्त, दानशील और धर्मवत्सल होता है; सहस्रनाम के पाठ से तीन प्रकार से किया गया पाप (काया-वाणी-मन से) नष्ट हो जाता है।

श्लोक 22 (skanda.2.143.22)

अथ किं बहुनोक्तेन शृणु गुह्यं च मे सुत ।। दामोदरेति नाम्ना वै भवेत्प्रीतिर्ममाऽतुला

atha kiṁ bahunoktena śṛṇu guhyaṁ ca me suta dāmodareti nāmnā vai bhavetprītirmamā'tulā

अब अधिक कहने से क्या लाभ — हे पुत्र, मेरा यह रहस्य सुनो: 'दामोदर' नाम से मेरी अतुलनीय प्रीति उत्पन्न होती है।

श्लोक 23 (skanda.2.143.23)

गुणसंबंधि मन्नाम कृतं मात्रा यशोदया ।। यदा मे दधिभांडस्य स्फोटनं गोकुले कृतम्

guṇasaṁbaṁdhi mannāma kṛtaṁ mātrā yaśodayā yadā me dadhibhāṁḍasya sphoṭanaṁ gokule kṛtam

मेरा यह गुणसंबंधी नाम माता यशोदा ने रखा था, जब गोकुल में मेरे द्वारा दही के बर्तन को फोड़ा गया था—

श्लोक 24 (skanda.2.143.24)

तदा यशोदया गाढं बद्धो दाम्ना ह्युलूखले ।। ततः प्रभृति मे नाम ख्यातं दामोदरेति च

tadā yaśodayā gāḍhaṁ baddho dāmnā hyulūkhale tataḥ prabhṛti me nāma khyātaṁ dāmodareti ca

—तब यशोदा ने मुझे रस्सी (दाम) से ऊखल में कसकर बाँध दिया था; तभी से मेरा नाम 'दामोदर' के रूप में विख्यात हुआ।

श्लोक 25 (skanda.2.143.25)

नमो दामोदरायेति जपेद्यः सुसमाहितः ।। सूर्योदये शुचिर्भूत्वा त्रिसहस्रं दिनेदिने

namo dāmodarāyeti japedyaḥ susamāhitaḥ sūryodaye śucirbhūtvā trisahasraṁ dinedine

जो सूर्योदय के समय पवित्र होकर, एकाग्रचित्त होकर प्रतिदिन तीन हजार बार 'नमो दामोदराय' का जप करता है—

श्लोक 26 (skanda.2.143.26)

सार्द्धलक्षत्रयं यावत्तत उद्यापयेद्बुधः ।। तर्पणं हवनं चैव ब्रह्मभोज्यं दशांशतः

sārddhalakṣatrayaṁ yāvattata udyāpayedbudhaḥ tarpaṇaṁ havanaṁ caiva brahmabhojyaṁ daśāṁśataḥ

—जब तक साढ़े तीन लाख की संख्या पूर्ण न हो जाए, तब बुद्धिमान को उसका उद्यापन करना चाहिए, तर्पण, हवन तथा दशांश ब्राह्मण-भोज सहित।

श्लोक 27 (skanda.2.143.27)

एवं यः कुरुते भक्त्या तस्य यच्छामि वांछितम् ।। धनं धान्यं तथा दारान्पुत्रांश्चान्यच्च वांछितम्

evaṁ yaḥ kurute bhaktyā tasya yacchāmi vāṁchitam dhanaṁ dhānyaṁ tathā dārānputrāṁścānyacca vāṁchitam

जो भक्तिपूर्वक इस प्रकार करता है, उसे मैं उसकी वांछित वस्तु — धन, धान्य, पत्नी, पुत्र तथा अन्य जो कुछ भी वांछित हो — प्रदान करता हूँ।

श्लोक 28 (skanda.2.143.28)

त्रिसत्येन मया चोक्तं श्रद्धत्स्व त्वं महामते ।। मंत्रराजमिमं पुत्र कृपया मे प्रकाशितम्

trisatyena mayā coktaṁ śraddhatsva tvaṁ mahāmate maṁtrarājamimaṁ putra kṛpayā me prakāśitam

हे महामते! मैंने यह तीन बार सत्य की शपथ लेकर कहा है, इस पर विश्वास करो; हे पुत्र! यह मंत्रराज मेरी कृपा से ही प्रकट हुआ है।

श्लोक 29 (skanda.2.143.29)

दामोदरायेति पठन्नित्यं कुर्यात्प्रदक्षिणम्।। दंडपातं तथा पुत्र अष्टांगेन समन्वितम्

dāmodarāyeti paṭhannityaṁ kuryātpradakṣiṇam daṁḍapātaṁ tathā putra aṣṭāṁgena samanvitam

'दामोदराय' का सदा पाठ करते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिए, तथा हे पुत्र! आठ अंगों से युक्त दण्डवत् प्रणाम भी करना चाहिए।

श्लोक 30 (skanda.2.143.30)

पद्भ्यां कराभ्यां जानुभ्यामुरसा शिरसा तथा ।। मनसा वचसा दृष्टवा प्रणामोष्टांग उच्यते

padbhyāṁ karābhyāṁ jānubhyāmurasā śirasā tathā manasā vacasā dṛṣṭavā praṇāmoṣṭāṁga ucyate

दोनों पैरों, दोनों हाथों, दोनों घुटनों, वक्षःस्थल और सिर से, तथा मन, वाणी और दृष्टि से — इसे अष्टांग प्रणाम कहा जाता है।

श्लोक 31 (skanda.2.143.31)

शिरो मत्पादयोः कृत्वा बाहुभ्यां च परस्परम्।। प्रपन्नं पाहि मामीश भीतं मृत्युग्रहाऽर्णवात्

śiro matpādayoḥ kṛtvā bāhubhyāṁ ca parasparam prapannaṁ pāhi māmīśa bhītaṁ mṛtyugrahā'rṇavāt

अपना सिर मेरे चरणों पर रखकर, दोनों भुजाओं को परस्पर फैलाकर [कहे] — 'हे ईश! मैं शरणागत और भयभीत हूँ, मुझे मृत्यु और ग्रहों के इस सागर से बचाइए।'

श्लोक 32 (skanda.2.143.32)

पश्चाच्छेषां मया दत्तां शिरस्याधाय सादरम् ।। एवं ब्रूयात्ततो वत्स मम पूजाप्रपूर्त्तये

paścāccheṣāṁ mayā dattāṁ śirasyādhāya sādaram evaṁ brūyāttato vatsa mama pūjāprapūrttaye

तत्पश्चात् मेरे द्वारा दिए गए शेष (प्रसाद) को आदरपूर्वक सिर पर रखकर, हे वत्स! फिर मेरी पूजा की पूर्णता के लिए इस प्रकार कहे—

श्लोक 33 (skanda.2.143.33)

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन ।। यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे

maṁtrahīnaṁ kriyāhīnaṁ bhaktihīnaṁ janārdana yatpūjitaṁ mayā deva paripūrṇaṁ tadastu me

'हे जनार्दन! मंत्ररहित, क्रियारहित, भक्तिरहित होकर हे देव! जो पूजा मेरे द्वारा आपकी की गई है, वह मेरे लिए परिपूर्ण हो।'

श्लोक 34 (skanda.2.143.34)

मृदंगवाद्येन समं प्रणवेन सुसंयुतम् ।। एवं कार्यं सहोमासे नृत्यं पुण्यप्रदं नृणाम्

mṛdaṁgavādyena samaṁ praṇavena susaṁyutam evaṁ kāryaṁ sahomāse nṛtyaṁ puṇyapradaṁ nṛṇām

मृदंग के वाद्य के साथ, प्रणव (ॐ) से भलीभाँति युक्त होकर, इस प्रकार सहोम मास में नृत्य करना चाहिए, जो मनुष्यों को पुण्य प्रदान करने वाला है।

श्लोक 35 (skanda.2.143.35)

गीतं वाद्यं च नृत्यं च तथा पुस्तकवाचनम् ।। पूजाकाले चतुर्वक्त्र सर्वदा मम च प्रियम्

gītaṁ vādyaṁ ca nṛtyaṁ ca tathā pustakavācanam pūjākāle caturvaktra sarvadā mama ca priyam

हे चतुर्मुख! गीत, वाद्य और नृत्य, तथा शास्त्रों का वाचन — पूजा के समय ये मुझे सदा प्रिय हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.143.36)

गीतवाद्याद्यभावे च मम नामसहस्रकम् ।। स्तवराजं तथा पुत्र गजेंद्रस्य च मोक्षणम्

gītavādyādyabhāve ca mama nāmasahasrakam stavarājaṁ tathā putra gajeṁdrasya ca mokṣaṇam

गीत-वाद्य आदि के अभाव में मेरे सहस्रनाम का, तथा हे पुत्र! स्तवराज का और 'गजेंद्रमोक्ष' का पाठ करना चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.2.143.37)

अनुस्मृतिश्च गीता च स्तवनं पंचधा मतम् ।। पंचस्तवं महाभाग मम प्रीतिकरं परम्

anusmṛtiśca gītā ca stavanaṁ paṁcadhā matam paṁcastavaṁ mahābhāga mama prītikaraṁ param

अनुस्मरण और गीता का पाठ तथा स्तवन — यह पाँच प्रकार का माना गया है। हे महाभाग! यह पंचस्तव मुझे अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 38 (skanda.2.143.38)

पादोदकं पिबेद्यो वै शालिग्रामसमुद्भवम् ।। पंचगव्यसहस्रैस्तु प्राशितैः किं प्रयोजनम्

pādodakaṁ pibedyo vai śāligrāmasamudbhavam paṁcagavyasahasraistu prāśitaiḥ kiṁ prayojanam

जो शालिग्राम से उत्पन्न चरणोदक पीता है, उसे सहस्र पंचगव्यों के सेवन से क्या प्रयोजन?

श्लोक 39 (skanda.2.143.39)

शालिग्रामशिलातोयं यः पिबेद्बिंदुना समम् ।। मातुः स्तन्यं पुनर्नैव स पिबेन्मुक्तिभाग्नरः

śāligrāmaśilātoyaṁ yaḥ pibedbiṁdunā samam mātuḥ stanyaṁ punarnaiva sa pibenmuktibhāgnaraḥ

जो शालिग्राम शिला के जल को एक बूँद के बराबर भी पी लेता है, वह मुक्ति का भागी पुरुष फिर कभी माता का स्तन-पान नहीं करता।

श्लोक 40 (skanda.2.143.40)

आशौचं नैव विद्येत सूतके मृतकेऽपि च ।। येषां पादोदकं मूर्ध्नि प्राशनं ये प्रकुर्वते

āśaucaṁ naiva vidyeta sūtake mṛtake'pi ca yeṣāṁ pādodakaṁ mūrdhni prāśanaṁ ye prakurvate

जो सिर पर चरणोदक धारण करते हैं और उसका पान करते हैं, उनके लिए जन्म अथवा मृत्यु के सूतक में भी अशुद्धि नहीं होती।

श्लोक 41 (skanda.2.143.41)

अंतकालेऽपि यस्येदं दीयते पादयोर्जलम् ।। सोऽपि सद्गतिमाप्नोति सदाचारबहिष्कृतः

aṁtakāle'pi yasyedaṁ dīyate pādayorjalam so'pi sadgatimāpnoti sadācārabahiṣkṛtaḥ

जिसे मृत्यु के समय भी यह चरण-जल दिया जाता है, वह सदाचार से बहिष्कृत होते हुए भी सद्गति प्राप्त करता है।

श्लोक 42 (skanda.2.143.42)

अपेयं पिबते यस्तु भुंक्ते यद्यप्यभोजनम् ।। अगम्यागमनो यो वै पापाचारश्च यो नरः

apeyaṁ pibate yastu bhuṁkte yadyapyabhojanam agamyāgamano yo vai pāpācāraśca yo naraḥ

जो न पीने योग्य वस्तु पीता है, जो न खाने योग्य वस्तु खाता है, जो अगम्यागमन करता है और जो पापाचारी मनुष्य है—

श्लोक 43 (skanda.2.143.43)

सोऽपि पूतो भवत्याशु सद्यः पादांबुधारणात् ।। चांद्रायणात्पादकृच्छ्रादधिकं पादयोर्जलम्

so'pi pūto bhavatyāśu sadyaḥ pādāṁbudhāraṇāt cāṁdrāyaṇātpādakṛcchrādadhikaṁ pādayorjalam

—वह भी केवल चरण-जल को सिर पर धारण करने मात्र से तत्काल पवित्र हो जाता है; यह चरण-जल चांद्रायण और पादकृच्छ्र व्रत से भी बढ़कर है।

श्लोक 44 (skanda.2.143.44)

अगुरुं कुंकुमं वाऽपि कर्पूरं चाऽनुलेपनम् ।। मम पादांबुसंस्पृष्टं तद्वै पावनपावनम्

aguruṁ kuṁkumaṁ vā'pi karpūraṁ cā'nulepanam mama pādāṁbusaṁspṛṣṭaṁ tadvai pāvanapāvanam

अगुरु, कुंकुम अथवा कर्पूर का लेप, जब मेरे चरण-जल से स्पर्श हो जाए, तो वह पवित्रों को भी पवित्र करने वाला बन जाता है।

श्लोक 45 (skanda.2.143.45)

दृष्टिपूतं तु यत्तोयं भवेद्वै विप्रसत्तम ।। तद्वै पापहरं नृणां किं पुनः पादयोर्जलम्

dṛṣṭipūtaṁ tu yattoyaṁ bhavedvai viprasattama tadvai pāpaharaṁ nṛṇāṁ kiṁ punaḥ pādayorjalam

हे विप्रसत्तम! जो जल दृष्टि से भी पवित्र हो जाता है, वह मनुष्यों के पाप को हरने वाला होता है — फिर चरण-जल की तो बात ही क्या!

श्लोक 46 (skanda.2.143.46)

प्रियस्त्वं मेऽग्रजः पुत्रो विशेषेण च मत्प्रियः ।। तदर्थं कथितं सर्वं रहस्यं यच्च मे स्थितम्

priyastvaṁ me'grajaḥ putro viśeṣeṇa ca matpriyaḥ tadarthaṁ kathitaṁ sarvaṁ rahasyaṁ yacca me sthitam

तुम मेरे प्रिय, ज्येष्ठ पुत्र हो, और विशेष रूप से मुझे प्रिय हो; इसीलिए मैंने तुम्हारे लिए मुझमें स्थित यह सम्पूर्ण रहस्य कह दिया है।

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