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वैष्णव खण्ड · अध्याय 144

एकादशी की कथा

अध्याय 143अध्याय-सूचीअध्याय 145

श्लोक 1 (skanda.2.144.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। ।। एकादश्याश्च माहात्म्यं मूर्तीनां च विधानकम् ।। सर्वं ब्रूहि मम स्वामिन्कृपया भूतभावन

brahmovāca ekādaśyāśca māhātmyaṁ mūrtīnāṁ ca vidhānakam sarvaṁ brūhi mama svāminkṛpayā bhūtabhāvana

ब्रह्मा जी ने कहा — हे स्वामिन्! हे भूतभावन! एकादशी का माहात्म्य और उनकी मूर्तियों की विधि — यह सब कृपापूर्वक मुझे बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.144.2)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। शृणुष्व द्विजशार्दूल कथां पापप्रणाशिनीम् ।। यां श्रुत्वा याति विलयं पापं ब्रह्मवधादिकम्

śrībhagavānuvāca śṛṇuṣva dvijaśārdūla kathāṁ pāpapraṇāśinīm yāṁ śrutvā yāti vilayaṁ pāpaṁ brahmavadhādikam

श्रीभगवान ने कहा — हे द्विजशार्दूल! पाप का नाश करने वाली इस कथा को सुनो, जिसे सुनकर ब्रह्महत्या आदि पाप भी विलीन हो जाते हैं।

श्लोक 3 (skanda.2.144.3)

कांपिल्ये नगरे राजा वीरबाहुरिति स्मृतः ।। सत्यवादी जितक्रोधो ब्रह्मज्ञो मम तत्परः

kāṁpilye nagare rājā vīrabāhuriti smṛtaḥ satyavādī jitakrodho brahmajño mama tatparaḥ

कांपिल्य नगर में वीरबाहु नामक राजा स्मृत हैं — सत्यवादी, क्रोध पर विजय पाने वाले, ब्रह्मज्ञ और मेरे प्रति तत्पर।

श्लोक 4 (skanda.2.144.4)

भाववान्स दयाशीलोरूपवान्बलवान्नरः ।। भक्तो भागवतानां च सदा मम कथारुचिः

bhāvavānsa dayāśīlorūpavānbalavānnaraḥ bhakto bhāgavatānāṁ ca sadā mama kathāruciḥ

भावुक, दयाशील, रूपवान, बलवान, भागवतों के भक्त, और सदा मेरी कथाओं में रुचि रखने वाले।

श्लोक 5 (skanda.2.144.5)

सदा मम कथाऽऽसक्तः सदा जागरणप्रियः ।। दाता विद्वान्क्षमाशीलो विक्रमी विजितेंद्रियः

sadā mama kathā''saktaḥ sadā jāgaraṇapriyaḥ dātā vidvānkṣamāśīlo vikramī vijiteṁdriyaḥ

सदा मेरी कथा में आसक्त, सदा जागरण-प्रिय; दाता, विद्वान, क्षमाशील, पराक्रमी और इन्द्रियों को जीतने वाले।

श्लोक 6 (skanda.2.144.6)

विजयी रणशीलश्च ऋद्ध्या च धनदोपमः।। पुत्रवान्पशुमांश्चैव स्वदारनिरतस्तथा

vijayī raṇaśīlaśca ṛddhyā ca dhanadopamaḥ putravānpaśumāṁścaiva svadāraniratastathā

विजयी, युद्ध में निपुण, कुबेर के समान समृद्धिशाली, पुत्रवान, पशुधनयुक्त और अपनी पत्नी में अनुरक्त।

श्लोक 7 (skanda.2.144.7)

तस्य भार्या कांतिमती रूपेणाऽप्रतिमा भुवि ।। पतिव्रता महासाध्वी मम भक्तिरता सदा

tasya bhāryā kāṁtimatī rūpeṇā'pratimā bhuvi pativratā mahāsādhvī mama bhaktiratā sadā

उनकी पत्नी कांतिमती पृथ्वी पर रूप में अनुपम थीं — पतिव्रता, महासाध्वी और सदा मेरी भक्ति में लीन।

श्लोक 8 (skanda.2.144.8)

तया सह विशालाक्षो बुभुजे मेदिनीं युवा ।। मुक्त्वैकं मां महाबाहो नान्यज्जानाति दैवतम् ।। ।

tayā saha viśālākṣo bubhuje medinīṁ yuvā muktvaikaṁ māṁ mahābāho nānyajjānāti daivatam

हे महाबाहु! विशाल नेत्रों वाले उस युवा राजा ने उनके साथ पृथ्वी का उपभोग किया; मुझे छोड़कर वे किसी अन्य देवता को नहीं जानते थे।

श्लोक 9 (skanda.2.144.9)

एकस्मिन्दिवसे पुत्र भारद्वाजो महामुनिः ।। समागतो गृहे तस्य वीरबाहोर्महात्मनः

ekasmindivase putra bhāradvājo mahāmuniḥ samāgato gṛhe tasya vīrabāhormahātmanaḥ

हे पुत्र! एक दिन महामुनि भारद्वाज उस महात्मा वीरबाहु के घर पधारे।

श्लोक 10 (skanda.2.144.10)

दृष्ट्वा समागतं दूराद्भारद्वाजं महामुनिम् ।। स्वागतं कारयामास दत्त्वार्घ्यं विधिवत्तदा

dṛṣṭvā samāgataṁ dūrādbhāradvājaṁ mahāmunim svāgataṁ kārayāmāsa dattvārghyaṁ vidhivattadā

दूर से ही महामुनि भारद्वाज को आते देखकर, राजा ने विधिपूर्वक अर्घ्य देकर उनका स्वागत किया।

श्लोक 11 (skanda.2.144.11)

आसनं कल्पयामास स्वयमेव महीपतिः ।। प्रणम्य परया भक्त्या तस्थौ मुनिवराग्रतः ।।।

āsanaṁ kalpayāmāsa svayameva mahīpatiḥ praṇamya parayā bhaktyā tasthau munivarāgrataḥ

राजा ने स्वयं ही आसन की व्यवस्था की और परम भक्तिपूर्वक प्रणाम करके श्रेष्ठ मुनि के सामने खड़े हो गए।

श्लोक 12 (skanda.2.144.12)

।। राजोवाच ।। ।। अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं दिनम् ।। अद्य मे सफलं राज्यमद्य मे सफलं गृहम्

rājovāca adya me saphalaṁ janma adya me saphalaṁ dinam adya me saphalaṁ rājyamadya me saphalaṁ gṛham

राजा ने कहा — आज मेरा जन्म सफल हुआ, आज मेरा दिन सफल हुआ; आज मेरा राज्य सफल हुआ, आज मेरा घर सफल हुआ।

श्लोक 13 (skanda.2.144.13)

प्रसन्नो मम विप्रर्षे परमात्मा जनार्दनः ।। यत्त्वं समागतो ह्यद्य गृहे योगिवरस्तथा

prasanno mama viprarṣe paramātmā janārdanaḥ yattvaṁ samāgato hyadya gṛhe yogivarastathā

हे विप्रर्षे! परमात्मा जनार्दन मुझ पर प्रसन्न हैं, कि आप योगिवर आज मेरे घर पधारे हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.144.14)

मुक्तोऽहं पापकोट्याद्य यत्त्वयाऽहं निरीक्षितः ।। राज्यं लक्ष्मीर्गजाऽश्वाश्च मया तुभ्यं निवेदिताः

mukto'haṁ pāpakoṭyādya yattvayā'haṁ nirīkṣitaḥ rājyaṁ lakṣmīrgajā'śvāśca mayā tubhyaṁ niveditāḥ

आज मैं करोड़ों पापों से मुक्त हो गया, क्योंकि आपने मुझे देखा है। राज्य, लक्ष्मी, हाथी और घोड़े — ये सब मैंने आपको अर्पित कर दिए हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.144.15)

वैष्णवोऽसि मुनिश्रेष्ठ नास्त्यदेयं मया तव ।। मेरुतुल्यं भवेत्सर्वं वैष्णवस्य वराटिका ।।

vaiṣṇavo'si muniśreṣṭha nāstyadeyaṁ mayā tava merutulyaṁ bhavetsarvaṁ vaiṣṇavasya varāṭikā

हे मुनिश्रेष्ठ! आप वैष्णव हैं, आपको मेरे पास न देने योग्य कुछ भी नहीं है। वैष्णव के लिए एक कौड़ी भी मेरु के समान हो जाती है।

श्लोक 16 (skanda.2.144.16)

नाऽऽयाति हि गृहे यस्य वैष्णवो वै द्विजोत्तमः ।। तद्दिनं विफलं तस्य कथितं ब्राह्मणैर्मम

nā''yāti hi gṛhe yasya vaiṣṇavo vai dvijottamaḥ taddinaṁ viphalaṁ tasya kathitaṁ brāhmaṇairmama

जिसके घर श्रेष्ठ द्विज वैष्णव नहीं आता, वह दिन उसके लिए निष्फल कहा गया है, ऐसा ब्राह्मणों ने मुझसे कहा है।

श्लोक 17 (skanda.2.144.17)

विष्णुभक्ताश्च ये केचित्सर्वे वर्णा द्विजातयः ।। कथितं मम गार्ग्येण गौतमेन सुमंतुना

viṣṇubhaktāśca ye kecitsarve varṇā dvijātayaḥ kathitaṁ mama gārgyeṇa gautamena sumaṁtunā

जो कोई भी विष्णु-भक्त हों, चाहे किसी भी द्विज-वर्ण के हों — यह मुझसे गार्ग्य, गौतम और सुमन्तु ने कहा है।

श्लोक 18 (skanda.2.144.18)

ये त्वभक्ता हृषीकेशे पिशाचास्ते हि मानवाः ।। महापातकलिप्तास्ते ये भुंजंति हरेर्दिने ।।

ye tvabhaktā hṛṣīkeśe piśācāste hi mānavāḥ mahāpātakaliptāste ye bhuṁjaṁti harerdine

जो हृषीकेश के भक्त नहीं हैं, वे मनुष्य वास्तव में पिशाच ही हैं; जो हरि के दिन (एकादशी) भोजन करते हैं, वे महापातकों से लिप्त हैं।

श्लोक 19 (skanda.2.144.19)

शिवव्रतसहस्रैस्तु सौरैर्ब्राह्मैश्च कोटिभिः ।। यत्फलं कविभिः प्रोक्तं वासरैकेन तद्धरेः

śivavratasahasraistu saurairbrāhmaiśca koṭibhiḥ yatphalaṁ kavibhiḥ proktaṁ vāsaraikena taddhareḥ

सहस्रों शिव-व्रतों से, करोड़ों सौर और ब्राह्म व्रतों से जो फल विद्वानों ने कहा है, वही फल हरि के एक ही दिन (एकादशी) से प्राप्त होता है।

श्लोक 20 (skanda.2.144.20)

गर्वमुद्वहते तावत्तिथिर्ब्राह्मी च शांकरी ।। यावन्नायाति विप्रेंद्र द्वादशी च मम प्रिया

garvamudvahate tāvattithirbrāhmī ca śāṁkarī yāvannāyāti vipreṁdra dvādaśī ca mama priyā

हे विप्रेन्द्र! जब तक मुझे प्रिय द्वादशी नहीं आती, तब तक ब्रह्मा और शंकर से संबंधित तिथियाँ अपने गर्व को धारण करती रहती हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.144.21)

तावत्प्रभावस्ताराणां यावन्नोदयते शशी ।। तिथिस्तथा च विप्रेंद्र यावन्नायाति द्वादशी

tāvatprabhāvastārāṇāṁ yāvannodayate śaśī tithistathā ca vipreṁdra yāvannāyāti dvādaśī

जब तक चन्द्रमा उदय नहीं होता, तब तक तारों का प्रभाव रहता है; उसी प्रकार, हे विप्रेन्द्र! जब तक द्वादशी नहीं आती, तब तक अन्य तिथियों का प्रभाव रहता है।

श्लोक 22 (skanda.2.144.22)

नारदेन पुरा प्रोक्तं वसिष्ठेन ममाग्रतः ।। त्वं वेत्ता सर्वधर्माणां वैष्णवानां महामुने

nāradena purā proktaṁ vasiṣṭhena mamāgrataḥ tvaṁ vettā sarvadharmāṇāṁ vaiṣṇavānāṁ mahāmune

पूर्वकाल में नारद ने मेरे समक्ष वसिष्ठ से कहा था — 'हे महामुने! आप वैष्णवों के समस्त धर्मों के ज्ञाता हैं।'

श्लोक 23 (skanda.2.144.23)

।। भारद्वाज उवाच ।। ।। साधु पृष्टं महाभाग यत्त्वं भक्तोऽसि वैष्णवः ।। सा सुप्रजा मही धन्या यत्त्वं रक्षसि भूमिप

bhāradvāja uvāca sādhu pṛṣṭaṁ mahābhāga yattvaṁ bhakto'si vaiṣṇavaḥ sā suprajā mahī dhanyā yattvaṁ rakṣasi bhūmipa

भारद्वाज ने कहा — हे महाभाग! तुमने उत्तम प्रश्न पूछा है, क्योंकि तुम भक्त वैष्णव हो; हे भूमिपते! धन्य है वह प्रजायुक्त पृथ्वी जिसकी तुम रक्षा करते हो।

श्लोक 24 (skanda.2.144.24)

तस्मिन्राष्ट्रे न वस्तव्यं यत्र राजा न वैष्णवः ।। वरं वासो वने तीर्थे न तु राष्ट्रे त्ववैष्णवे

tasminrāṣṭre na vastavyaṁ yatra rājā na vaiṣṇavaḥ varaṁ vāso vane tīrthe na tu rāṣṭre tvavaiṣṇave

उस राष्ट्र में नहीं रहना चाहिए जहाँ राजा वैष्णव न हो; वन में या तीर्थ में निवास श्रेष्ठ है, परन्तु अवैष्णव राष्ट्र में नहीं।

श्लोक 25 (skanda.2.144.25)

यत्र भागवतो राजा संप्रशास्ति च मेदिनीम् ।। वैकुण्ठमिति मंतव्यं तद्राष्ट्रं पापवर्जितम्

yatra bhāgavato rājā saṁpraśāsti ca medinīm vaikuṇṭhamiti maṁtavyaṁ tadrāṣṭraṁ pāpavarjitam

जहाँ भागवत राजा भलीभाँति पृथ्वी का शासन करता है, उस पापरहित राष्ट्र को वैकुण्ठ ही मानना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.2.144.26)

चक्षुर्हीनं यथा देहं पतिहीना यथा स्त्रियः ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

cakṣurhīnaṁ yathā dehaṁ patihīnā yathā striyaḥ dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे नेत्रहीन शरीर, जैसे पतिरहित स्त्री, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 27 (skanda.2.144.27)

यथा पुत्रो महीपाल मातापित्रोरपोषकः ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

yathā putro mahīpāla mātāpitrorapoṣakaḥ dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

हे भूपाल! जैसे माता-पिता का पोषण न करने वाला पुत्र, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 28 (skanda.2.144.28)

दानहीनो यथा राजा ब्राह्मणो रसविक्रयी ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

dānahīno yathā rājā brāhmaṇo rasavikrayī dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे दानरहित राजा, जैसे रस बेचने वाला ब्राह्मण, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 29 (skanda.2.144.29)

दंतहीनो यथा हस्ती पक्षहीनो यथा खगः ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

daṁtahīno yathā hastī pakṣahīno yathā khagaḥ dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे दाँतरहित हाथी, जैसे पंखरहित पक्षी, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 30 (skanda.2.144.30)

प्रतिग्रहार्थं वेदादि द्रव्यार्थं सुकृतं यथा ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

pratigrahārthaṁ vedādi dravyārthaṁ sukṛtaṁ yathā dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे प्रतिग्रह के लिए किया गया वेदाध्ययन आदि, जैसे धन के लिए किया गया सुकृत, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 31 (skanda.2.144.31)

दर्भहीना यथा संध्या यथा श्राद्धमदक्षिणम् ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

darbhahīnā yathā saṁdhyā yathā śrāddhamadakṣiṇam dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे कुशरहित संध्या-वंदन, जैसे दक्षिणारहित श्राद्ध, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 32 (skanda.2.144.32)

सशिखश्च यथा शूद्रा कपिलाक्षीरपायकः ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

saśikhaśca yathā śūdrā kapilākṣīrapāyakaḥ dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे शिखायुक्त शूद्र, जैसे कपिला के दूध का अनुचित पान करने वाला, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 33 (skanda.2.144.33)

शूद्रश्च ब्राह्मणीगामी हेमघ्नो धर्मदूषकः ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

śūdraśca brāhmaṇīgāmī hemaghno dharmadūṣakaḥ dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे ब्राह्मणी के पास जाने वाला शूद्र, स्वर्ण-चोर, धर्म का दूषक, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 34 (skanda.2.144.34)

हरिसूर्यादिवृक्षाणां यथा छेदो नरोत्तम ।। द्वादशी दशमी युक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

harisūryādivṛkṣāṇāṁ yathā chedo narottama dvādaśī daśamī yuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

हे नरोत्तम! जैसे हरि और सूर्य के वृक्षों को काटना, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 35 (skanda.2.144.35)

यथाऽऽहुतिर्मंत्रहीना मृतवत्सापयो यथा ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

yathā''hutirmaṁtrahīnā mṛtavatsāpayo yathā dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे मंत्ररहित आहुति, जैसे मृतवत्सा गाय का दूध, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 36 (skanda.2.144.36)

सकेशा विधवा यद्वद्व्रतं स्नानविवर्जितम् ।। द्वादशी दशमीयुक्ता तथा राष्ट्रमवैष्णवम्

sakeśā vidhavā yadvadvrataṁ snānavivarjitam dvādaśī daśamīyuktā tathā rāṣṭramavaiṣṇavam

जैसे खुले केश वाली विधवा, जैसे स्नानरहित व्रत, जैसे दशमी से युक्त द्वादशी — वैसा ही है अवैष्णव राष्ट्र।

श्लोक 37 (skanda.2.144.37)

स राजा प्रोच्यते सद्भिर्यो भक्तो मधुसूदने ।। तद्राष्ट्रं वर्धते नित्यं सुखी भवति सप्रजः

sa rājā procyate sadbhiryo bhakto madhusūdane tadrāṣṭraṁ vardhate nityaṁ sukhī bhavati saprajaḥ

वही राजा सज्जनों द्वारा उत्तम कहा जाता है जो मधुसूदन का भक्त है; उसका राष्ट्र सदा समृद्ध होता है, वह सुखी और सुसंतति से युक्त होता है।

श्लोक 38 (skanda.2.144.38)

दृष्टिर्मे सफला राजन्यन्मया त्वं निरीक्षितः ।। अद्य मे सफला वाणी जल्पते या त्वया सह

dṛṣṭirme saphalā rājanyanmayā tvaṁ nirīkṣitaḥ adya me saphalā vāṇī jalpate yā tvayā saha

हे राजन्! मेरी दृष्टि सफल हुई कि मैंने तुम्हें देखा; आज मेरी वह वाणी सफल हुई जो तुमसे बातचीत करती है।

श्लोक 39 (skanda.2.144.39)

दूरमेव हि गंतव्यं श्रूयते यत्र वैष्णवः ।। दर्शनात्तु भवेत्पुण्यं तीर्थस्नानसमुद्भवम्

dūrameva hi gaṁtavyaṁ śrūyate yatra vaiṣṇavaḥ darśanāttu bhavetpuṇyaṁ tīrthasnānasamudbhavam

जहाँ वैष्णव के होने की बात सुनी जाती है, वहाँ दूर तक भी जाना चाहिए; उसके दर्शन मात्र से तीर्थ-स्नान से उत्पन्न पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 40 (skanda.2.144.40)

स त्वं राजन्मया दृष्टो विष्णुभक्तिरतः शुचिः ।। स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामि सुखी भव नराधिप

sa tvaṁ rājanmayā dṛṣṭo viṣṇubhaktirataḥ śuciḥ svasti te'stu gamiṣyāmi sukhī bhava narādhipa

हे राजन्! तुम वैसे ही हो — विष्णु-भक्ति में लीन और पवित्र, जैसा मैंने तुम्हें देखा है। तुम्हारा कल्याण हो, अब मैं जाऊँगा; हे नराधिप! सुखी रहो।

श्लोक 41 (skanda.2.144.41)

एतस्मिन्नंतरे राज्ञ्या कांतिमत्या नमस्कृतः ।। भारद्वाजो मुनिश्रेष्ठः प्रवरः सर्वयोगिनाम्

etasminnaṁtare rājñyā kāṁtimatyā namaskṛtaḥ bhāradvājo muniśreṣṭhaḥ pravaraḥ sarvayoginām

इसी बीच रानी कांतिमती द्वारा प्रणाम किए गए, समस्त योगियों में श्रेष्ठ मुनिश्रेष्ठ भारद्वाज ने—

श्लोक 42 (skanda.2.144.42)

अवैधव्यं वरारोहे भक्ता भव स्वभर्त्तरि ।। निश्चला केशवे भक्तिः सदा भवतु ते शुभे

avaidhavyaṁ varārohe bhaktā bhava svabharttari niścalā keśave bhaktiḥ sadā bhavatu te śubhe

—[कहा] 'हे वरारोहे! सदा अवैधव्य को प्राप्त रहो, अपने पति में भक्तिमती रहो; हे शुभे! केशव में तुम्हारी भक्ति सदा अचल रहे।'

श्लोक 43 (skanda.2.144.43)

एतस्मिन्नंतरे राजा भारद्वाजं महामुनिम् ।। उवाच प्रीणयन्वाचा मेघनादगभीरया

etasminnaṁtare rājā bhāradvājaṁ mahāmunim uvāca prīṇayanvācā meghanādagabhīrayā

इसी बीच राजा ने महामुनि भारद्वाज को मेघ-गर्जना के समान गंभीर वाणी से प्रसन्न करते हुए कहा—

श्लोक 44 (skanda.2.144.44)

।। राजोवाच ।। ।। विपुला मे कथं लक्ष्मीः किं कृतं पूर्वजन्मनि ।। सर्वं ब्रूहि मुनिश्रेष्ठ कृपा यदि ममोपरि

rājovāca vipulā me kathaṁ lakṣmīḥ kiṁ kṛtaṁ pūrvajanmani sarvaṁ brūhi muniśreṣṭha kṛpā yadi mamopari

राजा ने कहा — मेरी लक्ष्मी इतनी विपुल कैसे है? मैंने पूर्वजन्म में क्या किया था? हे मुनिश्रेष्ठ! यदि मुझ पर आपकी कृपा हो तो सब बताइए।

श्लोक 45 (skanda.2.144.45)

एतन्मया कथं प्राप्तं राज्यं निहतकण्टकम् ।। पुत्रो वै गुणवाञ्च्छ्रेष्ठः प्रिया च सुमनोहरा

etanmayā kathaṁ prāptaṁ rājyaṁ nihatakaṇṭakam putro vai guṇavāñcchreṣṭhaḥ priyā ca sumanoharā

मुझे यह कंटक-रहित राज्य कैसे प्राप्त हुआ? मेरा पुत्र गुणवान और श्रेष्ठ है, तथा मेरी प्रिया अत्यंत मनोहर है—

श्लोक 46 (skanda.2.144.46)

मच्चित्ता मद्गतप्राणा चिंतयन्ती जनार्दनम् ।। कोऽहं मुने कथं चैषा कश्च धर्मो मया कृतः

maccittā madgataprāṇā ciṁtayantī janārdanam ko'haṁ mune kathaṁ caiṣā kaśca dharmo mayā kṛtaḥ

—जिसका मन मुझमें और प्राण मुझमें बसे हैं, जो सदा जनार्दन का चिंतन करती है। हे मुने! मैं कौन हूँ, यह कैसे है, और मैंने कौन-सा धर्म किया है?

श्लोक 47 (skanda.2.144.47)

किं चाऽनयाऽपि चार्वंग्या मम पत्न्या कृतं मुने ।। केन पुण्येन मे लक्ष्मीर्मृत्युलोके सुदुर्लभा

kiṁ cā'nayā'pi cārvaṁgyā mama patnyā kṛtaṁ mune kena puṇyena me lakṣmīrmṛtyuloke sudurlabhā

हे मुने! इस सुंदर अंगों वाली मेरी पत्नी ने भी क्या किया है? किस पुण्य से मृत्युलोक में अत्यंत दुर्लभ यह लक्ष्मी मुझे प्राप्त हुई है?

श्लोक 48 (skanda.2.144.48)

अशेषा भूमिपाला वै वर्तंते यस्य मे वशे ।। विक्रमं चाऽप्रतिहतं शरीरारोग्यता तथा

aśeṣā bhūmipālā vai vartaṁte yasya me vaśe vikramaṁ cā'pratihataṁ śarīrārogyatā tathā

समस्त भूपाल मेरे वश में हैं, मेरा पराक्रम अप्रतिहत है, और उसी प्रकार मेरे शरीर की निरोगता भी है।

श्लोक 49 (skanda.2.144.49)

ममाऽपि विपुलं तेजो न कश्चित्सहते मुने ।। इच्छाम्यद्य प्रतिज्ञातुं यथा चेयमनिंदिता

mamā'pi vipulaṁ tejo na kaścitsahate mune icchāmyadya pratijñātuṁ yathā ceyamaniṁditā

हे मुने! मेरा विपुल तेज भी है, जिसे कोई सहन नहीं कर सकता। मैं आज यह जानना चाहता हूँ कि यह सब निष्कलंक है या नहीं।

श्लोक 50 (skanda.2.144.50)

मयाऽपि सुकृतं विप्र किं कृतं पूर्वजन्मनि ।। इति पृष्टो नरेंद्रेण पूर्वजन्मविचेष्टितम्

mayā'pi sukṛtaṁ vipra kiṁ kṛtaṁ pūrvajanmani iti pṛṣṭo nareṁdreṇa pūrvajanmaviceṣṭitam

हे विप्र! मैंने भी पूर्वजन्म में कौन-सा सुकृत किया था? — इस प्रकार राजा द्वारा पूछे जाने पर मुनि ने पूर्वजन्म के कर्मों को—

श्लोक 51 (skanda.2.144.51)

स्वपत्न्याश्चेष्टितं चैव संपदां चैव कारणम् ।। योगोत्थं सुचिरं कालं तथाविंदत मानसे

svapatnyāśceṣṭitaṁ caiva saṁpadāṁ caiva kāraṇam yogotthaṁ suciraṁ kālaṁ tathāviṁdata mānase

—तथा अपनी पत्नी के कर्मों और समृद्धि के कारण को, योग-शक्ति से, चिरकाल तक मन में जाना।

श्लोक 52 (skanda.2.144.52)

विज्ञातमेतन्नृपते पूर्वजन्मविचेष्टितम् ।। तव पत्न्याश्च राजर्षे शृणुष्व कथयाम्यहम्

vijñātametannṛpate pūrvajanmaviceṣṭitam tava patnyāśca rājarṣe śṛṇuṣva kathayāmyaham

हे राजन्! यह पूर्वजन्म का वृत्तांत मुझे ज्ञात हो गया है; हे राजर्षे! तुम्हारी पत्नी का भी सुनो, मैं कहता हूँ।

श्लोक 53 (skanda.2.144.53)

।।भारद्वाज उवाच ।। ।। शृणु भूपाल सकलं यस्येदं कर्मणः फलम् ।। त्वमासीः शूद्रजातीयो जीवहिंसापरायणः

bhāradvāja uvāca śṛṇu bhūpāla sakalaṁ yasyedaṁ karmaṇaḥ phalam tvamāsīḥ śūdrajātīyo jīvahiṁsāparāyaṇaḥ

भारद्वाज ने कहा — हे भूपाल! सुनो, यह किस कर्म का फल है। तुम शूद्र-जाति के, जीव-हिंसा में तत्पर थे—

श्लोक 54 (skanda.2.144.54)

नास्तिको दुष्टचारित्रः परदारप्रधर्षकः ।। कृतघ्नो दुर्विनीतश्च सुष्ठ्वाचारविवर्जितः

nāstiko duṣṭacāritraḥ paradārapradharṣakaḥ kṛtaghno durvinītaśca suṣṭhvācāravivarjitaḥ

—नास्तिक, दुष्ट आचरण वाले, दूसरों की पत्नियों को सताने वाले, कृतघ्न, अविनीत और सदाचार से पूर्णतः रहित थे।

श्लोक 55 (skanda.2.144.55)

इयं या भवतो भार्या पूर्वमप्यायतेक्षणा ।। कर्मणा मनसा वाचा नान्यदस्यास्त्वया विना ।।

iyaṁ yā bhavato bhāryā pūrvamapyāyatekṣaṇā karmaṇā manasā vācā nānyadasyāstvayā vinā

यह जो तुम्हारी आयत-नेत्रा पत्नी है, वह पूर्वजन्म में भी कर्म, मन और वाणी से तुम्हारे सिवा और कुछ नहीं जानती थी।

श्लोक 56 (skanda.2.144.56)

पतिव्रता महाभागा भजमाना निरन्तरम् ।। भावं न कुरुते दुष्टं तवोपरि तथा सति

pativratā mahābhāgā bhajamānā nirantaram bhāvaṁ na kurute duṣṭaṁ tavopari tathā sati

पतिव्रता, महाभाग्यशाली वह निरंतर तुम्हारी सेवा करती हुई भी, ऐसा होने पर भी, तुम्हारे प्रति दुष्ट भाव नहीं रखती थी।

श्लोक 57 (skanda.2.144.57)

सखिभिस्त्वं परित्यक्तो बन्धुभिः पापकर्मकृत् ।। क्षयं जगाम चाऽर्थो यः सञ्चितस्तव पूर्वजैः

sakhibhistvaṁ parityakto bandhubhiḥ pāpakarmakṛt kṣayaṁ jagāma cā'rtho yaḥ sañcitastava pūrvajaiḥ

हे पापकर्मकारी! मित्रों और बंधुओं द्वारा त्यागे जाने पर, तुम्हारे पूर्वजों द्वारा संचित धन भी क्षीण हो गया।

श्लोक 58 (skanda.2.144.58)

नष्टे द्रव्ये फलाऽऽकांक्षी त्वमासीर्जगतीपते ।। पूर्वकर्मविपाकेन कृषिश्च विफला गता ।।

naṣṭe dravye phalā''kāṁkṣī tvamāsīrjagatīpate pūrvakarmavipākena kṛṣiśca viphalā gatā

हे जगतीपते! धन नष्ट होने पर फल की आकांक्षा रखते हुए भी, पूर्वकर्म के फल से तुम्हारी खेती भी निष्फल हो गई।

श्लोक 59 (skanda.2.144.59)

ततो वित्ते परिक्षीणे परित्यक्तश्च बांधवैः ।। क्षीयमाणाऽपि साध्वीयमत्यजत्त्वां न भामिनी

tato vitte parikṣīṇe parityaktaśca bāṁdhavaiḥ kṣīyamāṇā'pi sādhvīyamatyajattvāṁ na bhāminī

तत्पश्चात् धन के क्षीण होने और बंधुओं द्वारा त्यागे जाने पर भी, वह साध्वी स्वयं क्षीण होते हुए भी तुम्हें नहीं त्यागती थी, हे भामिनी के स्वामी।

श्लोक 60 (skanda.2.144.60)

त्वं भग्नः सर्वकामेभ्यो गतवान्निर्जने वने ।। हत्वा जीवाननेकांश्च चकारात्मविपोषणम्

tvaṁ bhagnaḥ sarvakāmebhyo gatavānnirjane vane hatvā jīvānanekāṁśca cakārātmavipoṣaṇam

तुम अपनी सभी इच्छाओं से टूटकर निर्जन वन में चले गए, और अनेक जीवों को मारकर अपना पेट भरते रहे।

श्लोक 61 (skanda.2.144.61)

एवं प्रवृत्तस्य तव सह पत्न्या तदा नृप ।। गतानि बहुवर्षाणि पापवृत्त्या महीतले

evaṁ pravṛttasya tava saha patnyā tadā nṛpa gatāni bahuvarṣāṇi pāpavṛttyā mahītale

हे राजन्! इस प्रकार अपनी पत्नी के साथ लगे रहते हुए, पृथ्वी पर पापपूर्ण जीवन-वृत्ति में तुम्हारे बहुत वर्ष बीत गए।

श्लोक 62 (skanda.2.144.62)

अन्यस्मिन्वासरे राजन्मार्गभ्रष्टो महामुनिः ।। न दिशं विदिशं वेत्ति देवशर्मा द्विजोत्तमः

anyasminvāsare rājanmārgabhraṣṭo mahāmuniḥ na diśaṁ vidiśaṁ vetti devaśarmā dvijottamaḥ

हे राजन्! एक अन्य दिन देवशर्मा नामक श्रेष्ठ द्विज महामुनि मार्ग से भटक गए, उन्हें दिशा-विदिशा का ज्ञान नहीं रहा।

श्लोक 63 (skanda.2.144.63)

क्षुत्तृषापीडितोऽत्यर्थं मध्याह्नगदिवाकरे ।। पतितो वनमध्ये तु मार्गभ्रष्टो महीपते

kṣuttṛṣāpīḍito'tyarthaṁ madhyāhnagadivākare patito vanamadhye tu mārgabhraṣṭo mahīpate

हे महीपते! भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित, मध्याह्न के सूर्य में, वे मार्गभ्रष्ट होकर वन के बीच में गिर पड़े।

श्लोक 64 (skanda.2.144.64)

दया जाता च ते भूप दृष्ट्वा दुःखेन पीडितम् ।। ब्राह्मणं वृद्धमज्ञातं गृहीत्वा तु करेण वै

dayā jātā ca te bhūpa dṛṣṭvā duḥkhena pīḍitam brāhmaṇaṁ vṛddhamajñātaṁ gṛhītvā tu kareṇa vai

हे भूप! दुःख से पीड़ित उस अनजान वृद्ध ब्राह्मण को देखकर तुम्हें दया उत्पन्न हुई, और तुमने हाथ से उसे पकड़कर—

श्लोक 65 (skanda.2.144.65)

उत्थाप्य पतितं भूमौ त्वयोक्तं हि तदा नृप ।। प्रसादं कुरु विप्रर्ष आगच्छ त्वं ममाऽऽश्रमम्

utthāpya patitaṁ bhūmau tvayoktaṁ hi tadā nṛpa prasādaṁ kuru viprarṣa āgaccha tvaṁ mamā''śramam

—भूमि पर गिरे हुए उसे उठाकर, हे राजन्! तुमने तब उससे कहा — 'हे विप्रर्षे! मुझ पर कृपा कीजिए, मेरे आश्रम में पधारिए।

श्लोक 66 (skanda.2.144.66)

जलपूर्णं तडागं च पद्मिनीखण्डमण्डितम् ।। वृक्षैर्मनोहरैर्युक्तं फलैः पुष्पैर्मनोरमैः

jalapūrṇaṁ taḍāgaṁ ca padminīkhaṇḍamaṇḍitam vṛkṣairmanoharairyuktaṁ phalaiḥ puṣpairmanoramaiḥ

वहाँ जल से भरा तालाब है, कमलों के समूहों से सुशोभित, मनोहर वृक्षों तथा मनोरम फलों-फूलों से युक्त।

श्लोक 67 (skanda.2.144.67)

स्नात्वा सुशीतले तोये कृत्वा कर्म च नैत्यकम् ।। कुरु विप्र फलाहारं पिब वारि सुशीतलम्

snātvā suśītale toye kṛtvā karma ca naityakam kuru vipra phalāhāraṁ piba vāri suśītalam

उसके शीतल जल में स्नान करके, अपना नित्यकर्म पूर्ण करके, हे विप्र! फलों का आहार कीजिए और अत्यंत शीतल जल पीजिए।

श्लोक 68 (skanda.2.144.68)

सुखेन कुरु विश्रामं मया संरक्षितः स्वयम् ।। विप्रेन्द्र तृप्तिपर्यंतं वस त्वं च ममाश्रमे

sukhena kuru viśrāmaṁ mayā saṁrakṣitaḥ svayam viprendra tṛptiparyaṁtaṁ vasa tvaṁ ca mamāśrame

सुखपूर्वक विश्राम कीजिए, मैं स्वयं आपकी रक्षा करूँगा। हे विप्रेन्द्र! जब तक तृप्ति न हो, तब तक मेरे आश्रम में निवास कीजिए।

श्लोक 69 (skanda.2.144.69)

उत्तिष्ठ त्वं द्विजश्रेष्ठ प्रसादं कर्तुमर्हसि ।। लब्धसंज्ञस्तदा विप्रः श्रुत्वा शूद्रस्य भाषितम्

uttiṣṭha tvaṁ dvijaśreṣṭha prasādaṁ kartumarhasi labdhasaṁjñastadā vipraḥ śrutvā śūdrasya bhāṣitam

हे द्विजश्रेष्ठ! उठिए, मुझ पर कृपा कीजिए' — शूद्र के इन वचनों को सुनकर, होश में आए हुए विप्र ने—

श्लोक 70 (skanda.2.144.70)

करे जग्राह तं शूद्रं गतो यत्र जलाशयः ।। उपविष्टो महाबाहो छायामाश्रित्य तत्तटे

kare jagrāha taṁ śūdraṁ gato yatra jalāśayaḥ upaviṣṭo mahābāho chāyāmāśritya tattaṭe

—उस शूद्र का हाथ पकड़ लिया और वहाँ गए जहाँ जलाशय था; हे महाबाहु! वहाँ तट पर छाया का आश्रय लेकर वे बैठ गए।

श्लोक 71 (skanda.2.144.71)

स्नानं चकार विधिवत्पूजयामास केशवम् ।। तर्पयित्वा पितॄन्देवान्पपौ नीरं सुशीतलम्

snānaṁ cakāra vidhivatpūjayāmāsa keśavam tarpayitvā pitṝndevānpapau nīraṁ suśītalam

उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया, केशव की पूजा की, पितरों और देवताओं को तर्पण देकर अत्यंत शीतल जल पिया।

श्लोक 72 (skanda.2.144.72)

विश्रांतो वृक्षूमूलेऽभूद्देवशर्मा द्विजोत्तमः ।। साष्टांगं मुनये कृत्वा नमस्कारं सह स्त्रिया

viśrāṁto vṛkṣūmūle'bhūddevaśarmā dvijottamaḥ sāṣṭāṁgaṁ munaye kṛtvā namaskāraṁ saha striyā

श्रेष्ठ द्विज देवशर्मा वृक्ष के मूल में विश्राम करने लगे; शूद्र ने अपनी पत्नी सहित मुनि को अष्टांग प्रणाम किया।

श्लोक 73 (skanda.2.144.73)

शूद्रस्तु परया भक्त्या प्रोवाच मुनिसन्निधौ ।। आवयोस्तरणार्थाय अतिथिस्त्वं समागतः

śūdrastu parayā bhaktyā provāca munisannidhau āvayostaraṇārthāya atithistvaṁ samāgataḥ

तब शूद्र ने परम भक्तिपूर्वक मुनि के समक्ष कहा — 'हमारे उद्धार के लिए ही आप अतिथि बनकर पधारे हैं।

श्लोक 74 (skanda.2.144.74)

दर्शनात्तव विप्रर्षे जातः पापस्य संक्षयः ।। प्रिये फलानि स्वादूनि प्रयच्छास्मै द्विजातये ।। मृदूनि रसयुक्तानि सुपक्वानि प्रियाणि च

darśanāttava viprarṣe jātaḥ pāpasya saṁkṣayaḥ priye phalāni svādūni prayacchāsmai dvijātaye mṛdūni rasayuktāni supakvāni priyāṇi ca

हे विप्रर्षे! आपके दर्शन मात्र से ही पाप का नाश हो गया है।' [अपनी पत्नी से] 'प्रिये! इन द्विज को कोमल, रसयुक्त, सुपक्व और प्रिय स्वादिष्ट फल दो।'

श्लोक 75 (skanda.2.144.75)

।। ।। ब्राह्मण उवाच ।। ।। त्वामहं नैव जानामि स्वज्ञातिं कथयस्व मे ।। नाज्ञातस्य हि भोक्तव्यं ब्राह्मणस्याऽपि पुत्रक

brāhmaṇa uvāca tvāmahaṁ naiva jānāmi svajñātiṁ kathayasva me nājñātasya hi bhoktavyaṁ brāhmaṇasyā'pi putraka

ब्राह्मण ने कहा — 'मैं तुम्हें बिल्कुल नहीं जानता, अपनी जाति मुझे बताओ। हे पुत्र! अनजान व्यक्ति का अन्न ब्राह्मण को भी नहीं खाना चाहिए।'

श्लोक 76 (skanda.2.144.76)

।। शूद्र उवाच ।। ।। शूद्रोऽहं द्विजशार्दूल न कार्यः संशयस्त्वया ।। आत्मजैर्दुर्जनैर्विप्र परित्यक्तः स्वबन्धुभिः

śūdra uvāca śūdro'haṁ dvijaśārdūla na kāryaḥ saṁśayastvayā ātmajairdurjanairvipra parityaktaḥ svabandhubhiḥ

शूद्र ने कहा — 'हे द्विजशार्दूल! मैं शूद्र हूँ, इसमें आपको कोई संशय नहीं करना चाहिए। हे विप्र! मैं दुर्जन पुत्रों और अपने बंधुओं द्वारा त्यागा गया हूँ।'

श्लोक 77 (skanda.2.144.77)

तयोः संवदतोरेवं शूद्रपत्न्या फलानि च ।। दत्तानि तस्मै विप्राय तेन भुक्तानि तानि वै

tayoḥ saṁvadatorevaṁ śūdrapatnyā phalāni ca dattāni tasmai viprāya tena bhuktāni tāni vai

इस प्रकार दोनों की बातचीत होते-होते, शूद्र की पत्नी ने फल लाकर उस ब्राह्मण को दिए, और उसने उन्हें खा लिया।

श्लोक 78 (skanda.2.144.78)

अभूत्प्रीतमना विप्रः पीत्वा नीरं सुशीतलम् ।। सुखं संप्राप्य स मुनिर्विश्रांतस्तरुमूलके

abhūtprītamanā vipraḥ pītvā nīraṁ suśītalam sukhaṁ saṁprāpya sa munirviśrāṁtastarumūlake

अत्यंत शीतल जल पीकर ब्राह्मण प्रसन्नचित्त हो गए; सुख प्राप्त कर वे मुनि वृक्ष के मूल में विश्राम करने लगे।

श्लोक 79 (skanda.2.144.79)

स च शूद्रः सपत्नीको भुक्त्वा च पुनरागतः ।। स्वागतं ते मुनिश्रेष्ठ कुतस्त्वमिह चाऽऽगतः

sa ca śūdraḥ sapatnīko bhuktvā ca punarāgataḥ svāgataṁ te muniśreṣṭha kutastvamiha cā''gataḥ

वह शूद्र भी अपनी पत्नी सहित भोजन करके पुनः लौट आया [और कहा] — 'हे मुनिश्रेष्ठ! आपका स्वागत है, आप यहाँ कहाँ से पधारे हैं—

श्लोक 80 (skanda.2.144.80)

शून्याटवीं द्विजश्रेष्ठ दुष्टसत्त्वभयाकुलाम् ।। निर्मनुष्यां दुःखयुक्तां दिवारात्रं भयानकाम्

śūnyāṭavīṁ dvijaśreṣṭha duṣṭasattvabhayākulām nirmanuṣyāṁ duḥkhayuktāṁ divārātraṁ bhayānakām

—हे द्विजश्रेष्ठ! इस सूने जंगल में, जो दुष्ट प्राणियों के भय से व्याकुल, मनुष्यरहित, दुःखयुक्त और दिन-रात भयानक है?'

श्लोक 81 (skanda.2.144.81)

।। ब्राह्मण उवाच ।। ।। ब्राह्मणोऽहं महाभाग प्रयागगमनं प्रति ।। अहमज्ञातमार्गेण प्रविष्टो दारुणे वने

brāhmaṇa uvāca brāhmaṇo'haṁ mahābhāga prayāgagamanaṁ prati ahamajñātamārgeṇa praviṣṭo dāruṇe vane

ब्राह्मण ने कहा — 'हे महाभाग! मैं प्रयाग जाने के लिए निकला एक ब्राह्मण हूँ; अनजान मार्ग से मैं इस भयंकर वन में प्रवेश कर गया।

श्लोक 82 (skanda.2.144.82)

मम पुण्यप्रभावेण जातोसि वरबांधवः ।। जीवितं मे त्वया दत्तं ब्रूहि किं करवाणि ते

mama puṇyaprabhāveṇa jātosi varabāṁdhavaḥ jīvitaṁ me tvayā dattaṁ brūhi kiṁ karavāṇi te

मेरे ही पुण्य के प्रभाव से तुम एक उत्तम बंधु के समान बन गए हो; तुमने मुझे जीवन दिया है, बताओ मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?

श्लोक 83 (skanda.2.144.83)

भवानपि कुतः प्राप्तो निर्मनुष्ये वने खलु ।। को भवान्कारणं किंस्वित्कथयस्व ममाऽग्रतः

bhavānapi kutaḥ prāpto nirmanuṣye vane khalu ko bhavānkāraṇaṁ kiṁsvitkathayasva mamā'grataḥ

परन्तु तुम स्वयं इस मनुष्यरहित वन में कैसे आ पहुँचे? तुम कौन हो, और इसका क्या कारण है, यह मुझे बताओ।

श्लोक 84 (skanda.2.144.84)

।। शूद्र उवाच ।। ।। विदर्भनगरी राज्ञा भीमसेनेन रक्षिता ।। वासो मम महाराष्ट्रे शूद्रोऽहं पापलंपटः

śūdra uvāca vidarbhanagarī rājñā bhīmasenena rakṣitā vāso mama mahārāṣṭre śūdro'haṁ pāpalaṁpaṭaḥ

शूद्र ने कहा — 'विदर्भ नगरी राजा भीमसेन द्वारा सुरक्षित है; मेरा निवास उसी महाराष्ट्र में है, मैं पाप में लिप्त शूद्र हूँ।

श्लोक 85 (skanda.2.144.85)

स्वकर्मविहितो धर्मो मया त्यक्तो द्विजोत्तम ।। त्यक्तोऽहं बन्धुवर्गेण ततोऽहं वनमागतः

svakarmavihito dharmo mayā tyakto dvijottama tyakto'haṁ bandhuvargeṇa tato'haṁ vanamāgataḥ

हे द्विजोत्तम! मैंने अपने कर्म से विहित धर्म को त्याग दिया है; अपने बंधुओं द्वारा त्यागे जाने पर मैं इस वन में आया हूँ।

श्लोक 86 (skanda.2.144.86)

कृत्वा जीववधं नित्यं जीवेऽहं भार्यया सह ।। सांप्रतं पातकात्सम्यङ् निर्विण्णोस्मि महामुने

kṛtvā jīvavadhaṁ nityaṁ jīve'haṁ bhāryayā saha sāṁprataṁ pātakātsamyaṅ nirviṇṇosmi mahāmune

निरंतर जीव-हिंसा करते हुए मैं अपनी पत्नी के साथ जीवन-यापन करता हूँ; हे महामुने! अब मैं इस पाप से भलीभाँति विरक्त हो चुका हूँ।

श्लोक 87 (skanda.2.144.87)

कुरुष्वाऽनुग्रहं किञ्चित्पापयुक्तस्य मे प्रभो ।। मम पुण्यप्रभावेण आगतस्त्वं द्विजोत्तम

kuruṣvā'nugrahaṁ kiñcitpāpayuktasya me prabho mama puṇyaprabhāveṇa āgatastvaṁ dvijottama

हे प्रभो! पापयुक्त मुझ पर कुछ अनुग्रह कीजिए; मेरे ही पुण्य के प्रभाव से हे द्विजोत्तम! आप यहाँ पधारे हैं।

श्लोक 88 (skanda.2.144.88)

न पश्यामि यथा सौरिं पत्न्या सह महामुने ।। उपदेशप्रभावेण प्रसादं कर्तुमर्हसि

na paśyāmi yathā sauriṁ patnyā saha mahāmune upadeśaprabhāveṇa prasādaṁ kartumarhasi

हे महामुने! मुझे अपनी पत्नी सहित यम के इस भय से बचने का कोई मार्ग नहीं दिखता; अपने उपदेश के प्रभाव से मुझ पर कृपा करने योग्य हैं।

श्लोक 89 (skanda.2.144.89)

नान्यदिच्छाम्यहं किञ्चिन्मुक्त्वा देवं जनार्दनम् ।। कुरुष्वाऽनुग्रहं मेऽद्य प्रसादमृषिसत्तम

nānyadicchāmyahaṁ kiñcinmuktvā devaṁ janārdanam kuruṣvā'nugrahaṁ me'dya prasādamṛṣisattama

भगवान जनार्दन को छोड़कर मैं और कुछ भी नहीं चाहता; हे ऋषिसत्तम! आज मुझ पर कृपा और अनुग्रह कीजिए।'

श्लोक 90 (skanda.2.144.90)

।। भारद्वाज उवाच ।। ।। इति तेन समापृष्टो देवशर्मा द्विजाग्रणीः ।। शूद्रेण परया भक्त्या प्रहसन्वाक्यमब्रवीत्

bhāradvāja uvāca iti tena samāpṛṣṭo devaśarmā dvijāgraṇīḥ śūdreṇa parayā bhaktyā prahasanvākyamabravīt

भारद्वाज ने कहा — इस प्रकार उस शूद्र द्वारा परम भक्तिपूर्वक पूछे जाने पर, द्विजों में अग्रणी देवशर्मा मुस्कुराते हुए यह वचन बोले—

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