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वैष्णव खण्ड · अध्याय 145

अखण्ड एकादशी व्रत का कथन

अध्याय 144अध्याय-सूचीअध्याय 146

श्लोक 1 (skanda.2.145.1)

।। देवशर्मोवाच ।। ।। ।। तवेदृशी मतिर्जाता सहसा केशवोपरि ।। एतस्मान्मे गतं पापं पूर्वजन्मशतोद्भवम्

devaśarmovāca tavedṛśī matirjātā sahasā keśavopari etasmānme gataṁ pāpaṁ pūrvajanmaśatodbhavam

देवशर्मा ने कहा — तुम्हारे मन में केशव के प्रति अकस्मात् ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई है; इसी से मेरा सैकड़ों पूर्वजन्मों से उत्पन्न पाप भी दूर हो गया।

श्लोक 2 (skanda.2.145.2)

विना व्रतैर्विना तीर्थैर्मुक्तस्त्वं पापकोटिभिः ।। ममातिथ्येन भक्त्या च जातं तव हरेः पदम्

vinā vratairvinā tīrthairmuktastvaṁ pāpakoṭibhiḥ mamātithyena bhaktyā ca jātaṁ tava hareḥ padam

बिना व्रतों के, बिना तीर्थों के, तुम करोड़ों पापों से मुक्त हो गए हो; मेरे आतिथ्य और तुम्हारी भक्ति से हरि का पद तुम्हें प्राप्त हुआ है।

श्लोक 3 (skanda.2.145.3)

तेन पुण्यप्रभावेण मतिर्जाता तवेदृशी ।। ध्यात्वा संचिंत्य मनसा ज्ञातं पूर्वविचेष्टितम्

tena puṇyaprabhāveṇa matirjātā tavedṛśī dhyātvā saṁciṁtya manasā jñātaṁ pūrvaviceṣṭitam

उसी पुण्य के प्रभाव से तुम्हारे मन में ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई। ध्यान करके, मन से विचार करके, तुम्हारा पूर्ववृत्तांत मुझे ज्ञात हुआ।

श्लोक 4 (skanda.2.145.4)

पूर्वजन्मनि विप्रस्त्वमवंत्यां धर्मतत्परः ।। सदाऽध्ययनशीलश्च सुशीलश्च सदा व्रती

pūrvajanmani viprastvamavaṁtyāṁ dharmatatparaḥ sadā'dhyayanaśīlaśca suśīlaśca sadā vratī

पूर्वजन्म में तुम अवंती में धर्मपरायण, सदा अध्ययनशील, सुशील और सदा व्रती ब्राह्मण थे।

श्लोक 5 (skanda.2.145.5)

एका तु द्वादशी विष्णोः कृता च दशमीयुता ।। तत्पापस्य प्रभावेण समस्तं सुकृतं गतम्

ekā tu dvādaśī viṣṇoḥ kṛtā ca daśamīyutā tatpāpasya prabhāveṇa samastaṁ sukṛtaṁ gatam

परन्तु एक बार विष्णु की द्वादशी दशमी से युक्त करके मनाई गई; उस पाप के प्रभाव से तुम्हारा समस्त अर्जित पुण्य नष्ट हो गया।

श्लोक 6 (skanda.2.145.6)

सर्वं तद्विफलं जातं यथा शूद्रापतिर्द्विजः ।। बहुवर्षसहस्राणि प्राप्ता नरकयातनाः

sarvaṁ tadviphalaṁ jātaṁ yathā śūdrāpatirdvijaḥ bahuvarṣasahasrāṇi prāptā narakayātanāḥ

वह सब निष्फल हो गया; परिणामस्वरूप तुम एक शूद्रा के पति बने द्विज बने, और सहस्रों वर्षों तक नरक की यातनाएँ भोगते रहे।

श्लोक 7 (skanda.2.145.7)

तस्मादेवं त्वया पूर्वं कृतं दुष्टं चिरं बहु ।। कृता तु दशमीमिश्रा तिथिर्विष्णोर्महात्मनः

tasmādevaṁ tvayā pūrvaṁ kṛtaṁ duṣṭaṁ ciraṁ bahu kṛtā tu daśamīmiśrā tithirviṣṇormahātmanaḥ

इसलिए तुमने पूर्वकाल में इस प्रकार का दीर्घकालिक बड़ा दोष किया कि महात्मा विष्णु की तिथि को दशमी से मिश्रित करके मनाया।

श्लोक 8 (skanda.2.145.8)

तेन शूद्रो भवाञ्जातः पापे तव मतिस्तथा ।। धर्मे न रमते चित्तं दशमीवेधदूषितम्

tena śūdro bhavāñjātaḥ pāpe tava matistathā dharme na ramate cittaṁ daśamīvedhadūṣitam

उसी से तुम शूद्र हुए और तुम्हारी बुद्धि पाप की ओर झुक गई; दशमी के दोष से दूषित तुम्हारा चित्त धर्म में रमता नहीं था।

श्लोक 9 (skanda.2.145.9)

विदर्भनगरे वत्स अस्ति ते पुत्रिकासुतः ।। कृतं तेन विधानोक्तं हरेरेकादशीव्रतम्

vidarbhanagare vatsa asti te putrikāsutaḥ kṛtaṁ tena vidhānoktaṁ harerekādaśīvratam

हे वत्स! विदर्भ नगर में तुम्हारा एक दौहित्र (पुत्री का पुत्र) है; उसने विधि-विधान से हरि का एकादशी व्रत किया।

श्लोक 10 (skanda.2.145.10)

प्रदत्तं तेन तत्पुण्यमखण्डैकाशीव्रतम्।। धर्मोपरि मतिर्जाता जातः पापस्य संक्षयः

pradattaṁ tena tatpuṇyamakhaṇḍaikāśīvratam dharmopari matirjātā jātaḥ pāpasya saṁkṣayaḥ

उसने अखण्ड एकादशी व्रत का वह पुण्य तुम्हें प्रदान कर दिया; धर्म के प्रति तुम्हारे मन में बुद्धि उत्पन्न हुई और तुम्हारे पाप का नाश हुआ।

श्लोक 11 (skanda.2.145.11)

तेन पुण्यप्रभावेण एकादश्या व्रतेन च ।। दशमीवेधजं पापं यमेन परिमार्जितम्

tena puṇyaprabhāveṇa ekādaśyā vratena ca daśamīvedhajaṁ pāpaṁ yamena parimārjitam

उसी पुण्य के प्रभाव से और एकादशी के व्रत से, दशमी के दोष से उत्पन्न पाप को यम ने स्वयं मिटा दिया।

श्लोक 12 (skanda.2.145.12)

इह जन्मनि यत्पापं जन्मायुतकृतानि च ।। मार्जितानि यमेनैव पापानि तव सांप्रतम्

iha janmani yatpāpaṁ janmāyutakṛtāni ca mārjitāni yamenaiva pāpāni tava sāṁpratam

इस जन्म में जो पाप हुआ, और दस हजार जन्मों में जो पाप हुआ, वे सब पाप अब यम द्वारा ही मिटा दिए गए हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.145.13)

तयोर्विवदतोरेवं विष्वक्सेनः समागतः ।। वर्णावर स्वागतं ते तुष्टस्तेहं जनार्दनः

tayorvivadatorevaṁ viṣvaksenaḥ samāgataḥ varṇāvara svāgataṁ te tuṣṭastehaṁ janārdanaḥ

इस प्रकार दोनों के वार्तालाप के बीच विष्वक्सेन वहाँ आ पहुँचे [और कहा] — 'हे श्रेष्ठ वर्ण वाले! तुम्हारा स्वागत है, मैं जनार्दन तुमसे प्रसन्न हूँ।

श्लोक 14 (skanda.2.145.14)

विप्रस्याऽऽतिथ्यहेतुत्वाज्जातः पापस्य संक्षयः ।। परदत्तेन पुण्येन एकादश्या व्रतेन च

viprasyā''tithyahetutvājjātaḥ pāpasya saṁkṣayaḥ paradattena puṇyena ekādaśyā vratena ca

ब्राह्मण को आतिथ्य देने के कारण तुम्हारे पाप का नाश हुआ; दूसरे द्वारा दिए गए पुण्य से और एकादशी के व्रत से—

श्लोक 15 (skanda.2.145.15)

दशमीवेधजं पापं तव शूद्र लयं गतम् ।। व्रतं कृत्वा ददौ पुण्यं दौहित्रस्तेन तारितः

daśamīvedhajaṁ pāpaṁ tava śūdra layaṁ gatam vrataṁ kṛtvā dadau puṇyaṁ dauhitrastena tāritaḥ

—हे शूद्र! दशमी के दोष से उत्पन्न तुम्हारा पाप विलीन हो गया है; व्रत करके तुम्हारे दौहित्र ने उसका पुण्य दिया, जिससे तुम तार दिए गए।

श्लोक 16 (skanda.2.145.16)

पत्न्या सह महाभाग वैनतेयं समारुह ।। इत्युक्त्वा देवदेवेन विमाने स्थापितस्तदा

patnyā saha mahābhāga vainateyaṁ samāruha ityuktvā devadevena vimāne sthāpitastadā

हे महाभाग! अपनी पत्नी सहित गरुड़ पर आरूढ़ हो जाओ' — देवताओं के देव ने ऐसा कहकर उसे तभी विमान में स्थापित कर दिया।

श्लोक 17 (skanda.2.145.17)

स्वर्गं ततः सपत्नीकः शूद्रत्वेन नृपोत्तम ।। देवशर्मा तु विप्रो वै तीर्थराजं ययौ पुनः

svargaṁ tataḥ sapatnīkaḥ śūdratvena nṛpottama devaśarmā tu vipro vai tīrtharājaṁ yayau punaḥ

हे नृपोत्तम! तत्पश्चात् शूद्र-रूप में होते हुए भी वह अपनी पत्नी सहित स्वर्ग को गया, और ब्राह्मण देवशर्मा पुनः तीर्थराज (प्रयाग) को चले गए।

श्लोक 18 (skanda.2.145.18)

एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्त्वया परिपृच्छितम् ।। अखण्डैकादशीपुण्यात्प्राप्तस्याऽऽतिथ्यकारणात् ।। विष्णुभक्तिमती भार्या राज्यं निहतकण्टकम् ।।

etatte sarvamākhyātaṁ yattvayā paripṛcchitam akhaṇḍaikādaśīpuṇyātprāptasyā''tithyakāraṇāt viṣṇubhaktimatī bhāryā rājyaṁ nihatakaṇṭakam

तुमने जो पूछा था, वह सब यह बताया गया — अखण्ड एकादशी के पुण्य से और आतिथ्य के कारण प्राप्त हुई विष्णु-भक्तिमती पत्नी और कंटकरहित राज्य।

श्लोक 19 (skanda.2.145.19)

।। राजोवाच ।। ।। ब्रह्मन्नखण्डैकादश्या विधिं सम्यक्समादिश ।। विष्णोः सम्प्रीणनार्थाय प्रसादं कर्तुमर्हसि

rājovāca brahmannakhaṇḍaikādaśyā vidhiṁ samyaksamādiśa viṣṇoḥ samprīṇanārthāya prasādaṁ kartumarhasi

राजा ने कहा — हे ब्रह्मन्! अखण्ड एकादशी की विधि भलीभाँति बताइए; विष्णु की प्रसन्नता के लिए मुझ पर अनुग्रह करने योग्य हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.145.20)

।। ऋषिरुवाच ।। ।। शृणुष्व नृपशार्दूल एकादश्या विधिं शुभम् ।। पुराऽऽसीद्भगवान्विष्णुर्नारदाय यदुक्तवान्

ṛṣiruvāca śṛṇuṣva nṛpaśārdūla ekādaśyā vidhiṁ śubham purā''sīdbhagavānviṣṇurnāradāya yaduktavān

ऋषि ने कहा — हे नृपशार्दूल! एकादशी की शुभ विधि सुनो; पूर्वकाल में यह भगवान विष्णु ने नारद से कही थी।

श्लोक 21 (skanda.2.145.21)

तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि उद्यापनविधिं शुभम् ।। मार्गशीर्षादिमासेषु द्वादशीषु नरोत्तम

tatte'haṁ saṁpravakṣyāmi udyāpanavidhiṁ śubham mārgaśīrṣādimāseṣu dvādaśīṣu narottama

हे नरोत्तम! वह मैं तुम्हें उद्यापन की शुभ विधि सहित पूर्ण रूप से बताता हूँ — मार्गशीर्ष आदि महीनों की द्वादशियों में—

श्लोक 22 (skanda.2.145.22)

व्रतं शुभमिदं कार्यमखण्डैकादशीव्रतम् ।। दशम्यां चैव नक्तं च एकादश्यामुपोषणम् ।।

vrataṁ śubhamidaṁ kāryamakhaṇḍaikādaśīvratam daśamyāṁ caiva naktaṁ ca ekādaśyāmupoṣaṇam

—यह शुभ अखण्ड एकादशी व्रत करना चाहिए। दशमी को एक बार रात्रि-भोजन (नक्त), एकादशी को उपवास—

श्लोक 23 (skanda.2.145.23)

द्वादश्यामेकभुक्तं च अखंडा इति कथ्यते ।। दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभूते दिवाकरे

dvādaśyāmekabhuktaṁ ca akhaṁḍā iti kathyate divasasyāṣṭame bhāge mandībhūte divākare

—और द्वादशी को एक बार भोजन — इसी को 'अखण्ड' कहा जाता है। दिन के आठवें भाग में, जब सूर्य मंद पड़ जाए—

श्लोक 24 (skanda.2.145.24)

तद्धि नक्तं विजानीयान्न नक्तं निशि भोजनम् ।। कांस्यं मांसं मसूरांश्च चणकान्कोद्रवांस्तथा

taddhi naktaṁ vijānīyānna naktaṁ niśi bhojanam kāṁsyaṁ māṁsaṁ masūrāṁśca caṇakānkodravāṁstathā

—उसे 'नक्त' जानना चाहिए, रात्रि का भोजन नहीं। काँसे के पात्र, मांस, मसूर, चना और कोदो अनाज—

श्लोक 25 (skanda.2.145.25)

शाकं मधु परान्नं च पुनर्भोजनमैथुने ।। विष्णुभक्तो नरो वाऽपि दशम्यां दश वर्जयेत्

śākaṁ madhu parānnaṁ ca punarbhojanamaithune viṣṇubhakto naro vā'pi daśamyāṁ daśa varjayet

—साग, मधु, दूसरे का बनाया अन्न और पुनः भोजन तथा मैथुन — विष्णु-भक्त मनुष्य को दशमी के दिन इन दस वस्तुओं का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 26 (skanda.2.145.26)

दशम्या विधिरुक्तोऽयमेकादश्यास्तथा शृणु ।। असकृज्जलपानं च हिंसा शौचमसत्यता

daśamyā vidhirukto'yamekādaśyāstathā śṛṇu asakṛjjalapānaṁ ca hiṁsā śaucamasatyatā

यह दशमी की विधि कही गई; अब एकादशी की भी सुनो — बार-बार जल पीना, हिंसा, अत्यधिक शौच-चिंता, असत्यभाषण—

श्लोक 27 (skanda.2.145.27)

तांबूलं दन्तकाष्ठं च दिवाशयनमैथुने ।। द्यूतं क्रीडा निशि स्वापः पतितैः सह भाषणम् ।। एकादश्यां दशैतानि विष्णुभक्तस्तु वर्जयेत्

tāṁbūlaṁ dantakāṣṭhaṁ ca divāśayanamaithune dyūtaṁ krīḍā niśi svāpaḥ patitaiḥ saha bhāṣaṇam ekādaśyāṁ daśaitāni viṣṇubhaktastu varjayet

—ताम्बूल, दातुन, दिन में सोना, मैथुन, जुआ, क्रीड़ा, रात्रि में सोना, पतितों से बातचीत करना — विष्णु-भक्त को एकादशी के दिन इन दस का त्याग करना चाहिए।

श्लोक 28 (skanda.2.145.28)

अद्य मे स्त्रीसुखं नास्ति भोजनं नास्ति केशव ।। प्रीत्यर्थं तव देवेश नियमस्तु दिवानिशि

adya me strīsukhaṁ nāsti bhojanaṁ nāsti keśava prītyarthaṁ tava deveśa niyamastu divāniśi

'हे केशव! आज मुझे स्त्री-सुख नहीं है, भोजन नहीं है; हे देवेश! आपकी प्रसन्नता के लिए यह दिन-रात का नियम है।

श्लोक 29 (skanda.2.145.29)

सुप्तेन्द्रियैस्तु वैक्लव्यं भोजनं यच्च मैथुनम् ।। दन्तांतरविलग्नान्नं क्षमस्व पुरुषोत्तम

suptendriyaistu vaiklavyaṁ bhojanaṁ yacca maithunam dantāṁtaravilagnānnaṁ kṣamasva puruṣottama

इन्द्रियों की व्याकुलता से, भोजन और मैथुन के त्याग से, तथा दाँतों के बीच रह गए अन्न-कण से जो कष्ट हो — हे पुरुषोत्तम! उसे क्षमा कीजिए।'

श्लोक 30 (skanda.2.145.30)

उपावृत्तस्तु पापेभ्यो यस्तु वासो गुणैः सह ।। उपवासः स विज्ञेयो न शरीरस्य शोषणम्

upāvṛttastu pāpebhyo yastu vāso guṇaiḥ saha upavāsaḥ sa vijñeyo na śarīrasya śoṣaṇam

जो पापों से विरत रहना और गुणों के साथ निवास करना है, उसे ही सच्चा उपवास जानना चाहिए, केवल शरीर को सुखाना नहीं।

श्लोक 31 (skanda.2.145.31)

पूर्वोक्तानि दशैतानि परान्नं च तथा मधु ।। द्वादश्यां विष्णुभक्तो वै वर्जयेन्मर्दनादिकम्

pūrvoktāni daśaitāni parānnaṁ ca tathā madhu dvādaśyāṁ viṣṇubhakto vai varjayenmardanādikam

पूर्वोक्त वे दस, तथा दूसरे का अन्न और मधु — विष्णु-भक्त को द्वादशी के दिन उबटन आदि का भी त्याग करना चाहिए।

श्लोक 32 (skanda.2.145.32)

अद्य मे द्वादशी पुण्या पवित्रा पापनाशिनी ।। पारणं च करिष्यामि प्रसीद गरुडध्वज

adya me dvādaśī puṇyā pavitrā pāpanāśinī pāraṇaṁ ca kariṣyāmi prasīda garuḍadhvaja

'हे गरुड़ध्वज! आज मेरी पुण्य, पवित्र, पापनाशिनी द्वादशी है; मैं व्रत का पारण करूँगा, प्रसन्न होइए।

श्लोक 33 (skanda.2.145.33)

विष्णोः संतोषणार्थाय यो मया नियमः कृतः ।। अद्याहं भोजयिष्यामि त्वत्प्रसादाद्द्विजोत्तमम्

viṣṇoḥ saṁtoṣaṇārthāya yo mayā niyamaḥ kṛtaḥ adyāhaṁ bhojayiṣyāmi tvatprasādāddvijottamam

विष्णु की प्रसन्नता के लिए मैंने जो नियम धारण किया था, आज आपकी कृपा से मैं एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को भोजन कराऊँगा।'

श्लोक 34 (skanda.2.145.34)

अनेन विधिना कुर्याद्यावद्वर्षं समाप्यते ।। संपूर्णे तु ततो वर्षे कुर्यादुद्यापनं बुधः

anena vidhinā kuryādyāvadvarṣaṁ samāpyate saṁpūrṇe tu tato varṣe kuryādudyāpanaṁ budhaḥ

इसी विधि से एक वर्ष पूर्ण होने तक व्रत करना चाहिए; वर्ष पूर्ण होने पर बुद्धिमान को उद्यापन करना चाहिए।

श्लोक 35 (skanda.2.145.35)

आदौ मध्ये तथा चांते व्रतस्योद्यापनं स्मृतम् ।। उद्यापनं न कुर्याद्यः कुष्ठी चांधश्च जायते

ādau madhye tathā cāṁte vratasyodyāpanaṁ smṛtam udyāpanaṁ na kuryādyaḥ kuṣṭhī cāṁdhaśca jāyate

आरम्भ में, मध्य में और अंत में — व्रत का उद्यापन स्मृत है; जो उद्यापन नहीं करता, वह कोढ़ी और अंधा हो जाता है।

श्लोक 36 (skanda.2.145.36)

तस्मादुद्यापनं कुर्याद्यथाविभवसारतः ।। क्रियते शुक्लपक्षे च मासे मार्गशिरे शुभे

tasmādudyāpanaṁ kuryādyathāvibhavasārataḥ kriyate śuklapakṣe ca māse mārgaśire śubhe

इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार उद्यापन करना चाहिए; यह शुक्ल पक्ष में, शुभ मार्गशीर्ष मास में किया जाता है।

श्लोक 37 (skanda.2.145.37)

आमंत्र्य द्वादशमितान्ब्राह्मणान्विधिकोविदान् ।। त्रयोदशं सपत्नीकमाचार्यं विधिकोविदम्

āmaṁtrya dvādaśamitānbrāhmaṇānvidhikovidān trayodaśaṁ sapatnīkamācāryaṁ vidhikovidam

विधि के जानकार बारह ब्राह्मणों को आमंत्रित करके, और तेरहवें के रूप में विधि-कुशल आचार्य को उनकी पत्नी सहित—

श्लोक 38 (skanda.2.145.38)

यजमानः शुचिः स्नात्वा श्रद्धायुक्तो जितेन्द्रियः ।। पादशौचार्धवस्त्राद्यैराचार्यादींस्ततोऽर्चयेत्

yajamānaḥ śuciḥ snātvā śraddhāyukto jitendriyaḥ pādaśaucārdhavastrādyairācāryādīṁstato'rcayet

—यजमान पवित्र होकर, स्नान करके, श्रद्धायुक्त और जितेन्द्रिय होकर, पाद-प्रक्षालन, अर्धवस्त्र आदि से आचार्य आदि की पूजा करे।

श्लोक 39 (skanda.2.145.39)

आचार्यस्तु ततः कृत्वा मण्डलं वर्णकैः शुभैः ।। चक्राब्जं सर्वतोभद्रं श्वेतवस्त्रेण वेष्टितम्

ācāryastu tataḥ kṛtvā maṇḍalaṁ varṇakaiḥ śubhaiḥ cakrābjaṁ sarvatobhadraṁ śvetavastreṇa veṣṭitam

आचार्य तब शुभ रंगों से एक मण्डल बनाए — चक्र-कमल का, सर्वतोभद्र, श्वेत वस्त्र से आच्छादित।

श्लोक 40 (skanda.2.145.40)

जलपूर्णं च कुम्भं तु पञ्चरत्नसमन्वितम् ।। पञ्चपल्लवसंयुक्तं कर्पूरागुरुवासितम्

jalapūrṇaṁ ca kumbhaṁ tu pañcaratnasamanvitam pañcapallavasaṁyuktaṁ karpūrāguruvāsitam

जल से भरा, पाँच रत्नों से युक्त, पाँच प्रकार की पत्तियों सहित, कर्पूर और अगुरु से सुवासित कलश—

श्लोक 41 (skanda.2.145.41)

वेष्टितं रक्तवस्त्रेण ताम्रपात्रेण संयुतम् ।। वेष्टितं पुष्पमालाभिर्मंडलोपरि विन्यसेत्

veṣṭitaṁ raktavastreṇa tāmrapātreṇa saṁyutam veṣṭitaṁ puṣpamālābhirmaṁḍalopari vinyaset

—लाल वस्त्र से लपेटा हुआ, ताम्रपात्र सहित, पुष्पमालाओं से लपेटा हुआ — मण्डल के ऊपर रखे।

श्लोक 42 (skanda.2.145.42)

तस्योपरि न्यसेद्देवं लक्ष्मीनारायणं नृप ।। सौवर्णी प्रतिमा कार्या एककर्षप्रमाणतः

tasyopari nyaseddevaṁ lakṣmīnārāyaṇaṁ nṛpa sauvarṇī pratimā kāryā ekakarṣapramāṇataḥ

हे राजन्! उसके ऊपर लक्ष्मी-नारायण देव को स्थापित करे; एक कर्ष के प्रमाण की स्वर्ण-प्रतिमा बनानी चाहिए—

श्लोक 43 (skanda.2.145.43)

वाहनाऽऽयुधसंयुक्ता प्रमाणं चतुरंगुलम् ।। किंवा शक्त्या प्रकुर्वीत वित्तशाठ्यं विवर्जयेत्

vāhanā''yudhasaṁyuktā pramāṇaṁ caturaṁgulam kiṁvā śaktyā prakurvīta vittaśāṭhyaṁ vivarjayet

—वाहन और आयुधों सहित, चार अंगुल के प्रमाण की; अथवा अपनी शक्ति के अनुसार बनाए, धन के प्रति कृपणता का त्याग करे।

श्लोक 44 (skanda.2.145.44)

ततः संस्थापयेन्मूर्तिं मंडले द्वादशैव हि ।। मासानामधिपः पूज्यश्चाखंडव्रतहेतवे

tataḥ saṁsthāpayenmūrtiṁ maṁḍale dvādaśaiva hi māsānāmadhipaḥ pūjyaścākhaṁḍavratahetave

फिर मण्डल में बारह मूर्तियों की स्थापना करनी चाहिए — महीनों के अधिपतियों की, जो अखण्ड व्रत के हेतु पूज्य हैं।

श्लोक 45 (skanda.2.145.45)

मंडलात्पूर्वदिग्भागे शंखं संस्थापयेच्छुभम् ।। त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे ।। निर्मितः सर्वदेवैस्त्वं पांचजन्य नमोऽस्तु ते

maṁḍalātpūrvadigbhāge śaṁkhaṁ saṁsthāpayecchubham tvaṁ purā sāgarotpanno viṣṇunā vidhṛtaḥ kare nirmitaḥ sarvadevaistvaṁ pāṁcajanya namo'stu te

मण्डल के पूर्व दिशा भाग में शुभ शंख की स्थापना करे — 'तुम पूर्वकाल में समुद्र से उत्पन्न हुए, विष्णु के हाथ में धारण किए गए, समस्त देवों द्वारा निर्मित — हे पांचजन्य! तुम्हें नमस्कार हो।'

श्लोक 46 (skanda.2.145.46)

ततस्तु स्थंडिलं कार्यं मंडलादुत्तरां दिशम् ।। संकल्प्य हवनं कार्यं मन्त्रैर्वेदोक्तवैष्णवैः

tatastu sthaṁḍilaṁ kāryaṁ maṁḍalāduttarāṁ diśam saṁkalpya havanaṁ kāryaṁ mantrairvedoktavaiṣṇavaiḥ

फिर मण्डल के उत्तर दिशा में हवन-स्थल (स्थण्डिल) बनाना चाहिए; संकल्प करके, वेदोक्त वैष्णव मंत्रों से हवन करना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.2.145.47)

स्वस्थाने स्थापयेद्विष्णुं स्थापयेच्च हरिं प्रति ।। पूजयेत्पुरुषसूक्तेन मन्त्रैः पौराणिकैः शुभैः

svasthāne sthāpayedviṣṇuṁ sthāpayecca hariṁ prati pūjayetpuruṣasūktena mantraiḥ paurāṇikaiḥ śubhaiḥ

विष्णु को अपने स्थान पर स्थापित करे तथा हरि के सम्मुख भी स्थापित करे; पुरुषसूक्त से और शुभ पौराणिक मंत्रों से उनकी पूजा करे।

श्लोक 48 (skanda.2.145.48)

नैवेद्यार्थं च वै कार्या मोदका बहवोऽपि च ।। धूपदीपोपहाराणि कृत्वा नीराजनं ततः

naivedyārthaṁ ca vai kāryā modakā bahavo'pi ca dhūpadīpopahārāṇi kṛtvā nīrājanaṁ tataḥ

नैवेद्य के लिए बहुत से मोदक बनाने चाहिए; धूप, दीप और अन्य उपहार अर्पित करके फिर नीराजन (आरती) करनी चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.2.145.49)

यक्षकर्दमेन संपूज्य ततः कुर्यात्प्रदक्षिणाम् ।। स्वस्तिवाचनकैर्विप्रैर्नमस्कारं ततो नृप

yakṣakardamena saṁpūjya tataḥ kuryātpradakṣiṇām svastivācanakairviprairnamaskāraṁ tato nṛpa

यक्ष-कर्दम (सुगंधित लेप) से पूजा करके फिर प्रदक्षिणा करनी चाहिए; हे राजन्! फिर स्वस्तिवाचन करते ब्राह्मणों के साथ नमस्कार करना चाहिए।

श्लोक 50 (skanda.2.145.50)

ततस्तु ब्राह्मणैः कार्य आचार्यक्रमशो जपः ।। जपश्च पावमानीयो मंडलब्राह्मणं मधु

tatastu brāhmaṇaiḥ kārya ācāryakramaśo japaḥ japaśca pāvamānīyo maṁḍalabrāhmaṇaṁ madhu

तत्पश्चात् ब्राह्मणों को आचार्य के क्रम से जप करना चाहिए — पावमानी सूक्त, मण्डल-ब्राह्मण, मधु-सूक्त—

श्लोक 51 (skanda.2.145.51)

तेजोऽसि शुक्रजं वाचं ब्रह्मसामादनंतरम् ।। पवित्रवंतं सूर्यस्य विष्णोर्महसि संहिताम्

tejo'si śukrajaṁ vācaṁ brahmasāmādanaṁtaram pavitravaṁtaṁ sūryasya viṣṇormahasi saṁhitām

—'तेजोऽसि', शुक्र से उत्पन्न वाक्, तत्पश्चात् ब्रह्म-साम, सूर्य का पवित्र सूक्त, और विष्णु के तेज से संबंधित सूक्त।

श्लोक 52 (skanda.2.145.52)

जपांते कलशे विष्णुं सोपांगमुपरि न्यसेत् ।। दिवसस्योदये चैव होमं कुर्यादनुक्रमम्

japāṁte kalaśe viṣṇuṁ sopāṁgamupari nyaset divasasyodaye caiva homaṁ kuryādanukramam

जप के अंत में विष्णु को उनके सहायक देवों सहित कलश के ऊपर स्थापित करे। दिन के उदय होते ही क्रमानुसार होम करना चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.2.145.53)

संस्थाप्य प्रथमं पात्रं पूजयित्वा विधानतः ।। स्तवनं च ततो होमः कर्तव्यश्चरुपूर्वकः

saṁsthāpya prathamaṁ pātraṁ pūjayitvā vidhānataḥ stavanaṁ ca tato homaḥ kartavyaścarupūrvakaḥ

पहले पात्र की स्थापना करके, विधिपूर्वक पूजा करके, फिर स्तवन करना चाहिए, तत्पश्चात् चरु से पूर्व होम करना चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.2.145.54)

स्वगृह्योक्तविधानेन यजनाग्निक्रियापरः ।। चरुद्वयं च कुर्वीत पायसं वैष्णवं चरुम्

svagṛhyoktavidhānena yajanāgnikriyāparaḥ carudvayaṁ ca kurvīta pāyasaṁ vaiṣṇavaṁ carum

अपने गृह्यसूत्र में कही गई विधि से, अग्नि-यजन की क्रिया में तत्पर होकर, दो चरु बनाने चाहिए — पायस और वैष्णव चरु।

श्लोक 55 (skanda.2.145.55)

जुहुयात्पुरुषसूक्तेन चरोः षोडश चाहुतीः ।। तथा चतुर्गृहीतेन घृतयुक्तावराहुतिम्

juhuyātpuruṣasūktena caroḥ ṣoḍaśa cāhutīḥ tathā caturgṛhītena ghṛtayuktāvarāhutim

पुरुषसूक्त से चरु की सोलह आहुतियाँ देनी चाहिए, तथा चार बार लिए गए घी सहित एक अतिरिक्त आहुति भी।

श्लोक 56 (skanda.2.145.56)

प्रादेशमात्राः पालाशसमिधश्च घृतप्लुताः।। इदं विष्ण्विति मंत्रेण होतव्याः कर्मसिद्धये

prādeśamātrāḥ pālāśasamidhaśca ghṛtaplutāḥ idaṁ viṣṇviti maṁtreṇa hotavyāḥ karmasiddhaye

एक बालिश्त लंबी, घी में डूबी हुई पलाश की समिधाएँ 'इदं विष्णु' मंत्र से कर्म-सिद्धि के लिए हवन करनी चाहिए।

श्लोक 57 (skanda.2.145.57)

शतमेकं तु जुहुयाद्द्विगुणाश्च तिलाऽऽहुतीः ।। कृते च वैष्णवे होमे ग्रहयज्ञं समारभेत्

śatamekaṁ tu juhuyāddviguṇāśca tilā''hutīḥ kṛte ca vaiṣṇave home grahayajñaṁ samārabhet

एक सौ एक आहुतियाँ देनी चाहिए, और उससे दुगुनी तिल की आहुतियाँ; वैष्णव होम पूर्ण होने पर ग्रह-यज्ञ का आरंभ करना चाहिए।

श्लोक 58 (skanda.2.145.58)

समिद्भिश्चरुहोमं च तिलहोमं क्रमेण तु ।। उभयोः स्वस्तिकं वाच्यं ततः पूजां समाचरेत्

samidbhiścaruhomaṁ ca tilahomaṁ krameṇa tu ubhayoḥ svastikaṁ vācyaṁ tataḥ pūjāṁ samācaret

समिधाओं से, चरु-होम से, और क्रमशः तिल-होम से; दोनों के लिए स्वस्तिवाचन कहना चाहिए, फिर पूजा सम्पन्न करनी चाहिए।

श्लोक 59 (skanda.2.145.59)

ऋत्विजां च ततो दद्याद्धेन्वादिग्रहदक्षिणाः ।। देवस्य तृप्त्यै दद्याच्च ब्राह्मणाय यथाविधि

ṛtvijāṁ ca tato dadyāddhenvādigrahadakṣiṇāḥ devasya tṛptyai dadyācca brāhmaṇāya yathāvidhi

फिर ऋत्विजों को गौ आदि ग्रह-दक्षिणाएँ देनी चाहिए; देवता की तृप्ति के लिए ब्राह्मण को विधिपूर्वक देना चाहिए।

श्लोक 60 (skanda.2.145.60)

गां वै पयस्विनीं दद्याद्वृषभं च सुशोभनम् ।। ब्राह्मणानां ततो दद्यात्त्रयोदश पदानि च

gāṁ vai payasvinīṁ dadyādvṛṣabhaṁ ca suśobhanam brāhmaṇānāṁ tato dadyāttrayodaśa padāni ca

दूध देने वाली गाय और सुंदर बैल देना चाहिए; फिर ब्राह्मणों को तेरह पद (गिनती की इकाइयाँ) देनी चाहिए।

श्लोक 61 (skanda.2.145.61)

आचार्यं तु सपत्नीकं वस्त्रैश्च परितोषयेत् ।। तोषयित्वा महादानैस्तं सार्थं च समर्पयेत्

ācāryaṁ tu sapatnīkaṁ vastraiśca paritoṣayet toṣayitvā mahādānaistaṁ sārthaṁ ca samarpayet

आचार्य को उनकी पत्नी सहित वस्त्रों से संतुष्ट करना चाहिए; महादान से संतुष्ट करके उन्हें सम्पूर्ण धन भी अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.2.145.62)

पञ्चविंशतिकुम्भांश्च सोदकान्वस्त्रवेष्टितान् ।। ब्राह्मणांश्च ततो दद्यात्कृते पारणके निशि

pañcaviṁśatikumbhāṁśca sodakānvastraveṣṭitān brāhmaṇāṁśca tato dadyātkṛte pāraṇake niśi

पच्चीस जल भरे, वस्त्र से लपेटे हुए कलश ब्राह्मणों को देने चाहिए, जब रात्रि में पारण किया जाए।

श्लोक 63 (skanda.2.145.63)

भूरिदानं च दातव्यं बंधूनामिष्टभोजनम् ।। पूर्णपात्रं ततो दद्यादाचार्याय सदक्षिणम्

bhūridānaṁ ca dātavyaṁ baṁdhūnāmiṣṭabhojanam pūrṇapātraṁ tato dadyādācāryāya sadakṣiṇam

प्रचुर दान देना चाहिए, तथा बंधुओं को प्रिय भोजन कराना चाहिए; फिर आचार्य को दक्षिणा सहित पूर्ण पात्र देना चाहिए।

श्लोक 64 (skanda.2.145.64)

पूर्णपात्रप्रदानेन कार्यं संपूरितं भवेत् ।। उपवासव्रतं चैव स्नानं तीर्थफलं भवेत्

pūrṇapātrapradānena kāryaṁ saṁpūritaṁ bhavet upavāsavrataṁ caiva snānaṁ tīrthaphalaṁ bhavet

पूर्ण पात्र के दान से कर्म पूर्ण हो जाता है; उपवास व्रत और स्नान तीर्थ के फल के समान हो जाते हैं।

श्लोक 65 (skanda.2.145.65)

विप्रैः संभाषितं तस्य संपूर्णं तद्भवेत्फलम् ।। वित्त शक्तिर्गृहे नास्ति कृतं चैकादशीव्रतम्

vipraiḥ saṁbhāṣitaṁ tasya saṁpūrṇaṁ tadbhavetphalam vitta śaktirgṛhe nāsti kṛtaṁ caikādaśīvratam

इस विषय में ब्राह्मणों के साथ किया गया वार्तालाप उसके फल को पूर्ण कर देता है। यदि घर में धन-सामर्थ्य न हो, तो भी एकादशी व्रत करना चाहिए—

श्लोक 66 (skanda.2.145.66)

स्वशक्त्या चैव कर्तव्यं तथा चोद्यापनादिकम् ।। एतत्ते सर्वमाख्यातमखण्डैकादशीव्रतम् ।।

svaśaktyā caiva kartavyaṁ tathā codyāpanādikam etatte sarvamākhyātamakhaṇḍaikādaśīvratam

—अपनी सामर्थ्य के अनुसार, तथा उसी प्रकार उसका उद्यापन आदि भी। यह सब तुम्हें अखण्ड एकादशी व्रत बता दिया गया।

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