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वैष्णव खण्ड · अध्याय 146

एकादशी व्रत के जागरण के फल का कथन

अध्याय 145अध्याय-सूचीअध्याय 147

श्लोक 1 (skanda.2.146.1)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि जागरस्य च लक्षणम् ।। येन विज्ञातमात्रेण सुलभोऽहं सदा कलौ

śrībhagavānuvāca śṛṇu putra pravakṣyāmi jāgarasya ca lakṣaṇam yena vijñātamātreṇa sulabho'haṁ sadā kalau

श्रीभगवान ने कहा — हे पुत्र! सुनो, मैं जागरण के लक्षण बताता हूँ, जिसे जान लेने मात्र से मैं कलियुग में भी सदा सुलभ हो जाता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.2.146.2)

गीतं वाद्यं च नृत्यं च पुराणपठनं तथा ।। धूपं दीपं च नैवेद्यं पुष्पं गन्धानुलेपनम्

gītaṁ vādyaṁ ca nṛtyaṁ ca purāṇapaṭhanaṁ tathā dhūpaṁ dīpaṁ ca naivedyaṁ puṣpaṁ gandhānulepanam

गीत, वाद्य, नृत्य, तथा पुराण-पठन; धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प और गंध का लेपन—

श्लोक 3 (skanda.2.146.3)

फलार्पणं च श्रद्धां च दानमिंद्रियसंयमम् ।। सत्यान्वितं विनिद्रं च मुदा मद्यजनान्वितम्

phalārpaṇaṁ ca śraddhāṁ ca dānamiṁdriyasaṁyamam satyānvitaṁ vinidraṁ ca mudā madyajanānvitam

फलों का अर्पण, श्रद्धा, दान, इन्द्रियों का संयम; सत्यता से युक्त, निद्रारहित, प्रसन्नतापूर्वक अपने भक्तजनों सहित—

श्लोक 4 (skanda.2.146.4)

साश्चर्यं चैव सोत्साहं पापालस्यादिवर्जनम् ।। प्रदक्षिणासमायुक्तं नमस्कारपुरःसरम्

sāścaryaṁ caiva sotsāhaṁ pāpālasyādivarjanam pradakṣiṇāsamāyuktaṁ namaskārapuraḥsaram

आश्चर्य और उत्साह सहित, पाप और आलस्य आदि का त्याग करते हुए; प्रदक्षिणा से युक्त, नमस्कार-पूर्वक—

श्लोक 5 (skanda.2.146.5)

नीराजनसमायुक्तमतिहृष्टेन चेतसा ।। यामेयामे महाभाग कुर्यादारार्तिकं मम

nīrājanasamāyuktamatihṛṣṭena cetasā yāmeyāme mahābhāga kuryādārārtikaṁ mama

नीराजन से युक्त, अत्यंत हर्षित चित्त से — हे महाभाग! प्रत्येक प्रहर में मेरी आरती करनी चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.2.146.6)

षड्विंशद्गुणसंयुक्तमेकादश्यां च जागरम् ।। यः करोति नरो भक्त्या न पुनर्जायते भुवि

ṣaḍviṁśadguṇasaṁyuktamekādaśyāṁ ca jāgaram yaḥ karoti naro bhaktyā na punarjāyate bhuvi

जो मनुष्य इन छब्बीस गुणों से युक्त होकर एकादशी को भक्तिपूर्वक जागरण करता है, वह पृथ्वी पर पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 7 (skanda.2.146.7)

य एवं कुरुते भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जितः ।। जागरं परया भक्त्या स लीनो जायते मयि

ya evaṁ kurute bhaktyā vittaśāṭhyavivarjitaḥ jāgaraṁ parayā bhaktyā sa līno jāyate mayi

जो इस प्रकार भक्तिपूर्वक, धन के प्रति कृपणता त्यागकर, परम भक्ति से जागरण करता है, वह मुझमें ही लीन हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.2.146.8)

दष्टाः कलिभुजंगेन स्वपन्ते ये दिने मम ।। कुर्वंति जागरं नैव मायापाशविमोहिताः

daṣṭāḥ kalibhujaṁgena svapante ye dine mama kurvaṁti jāgaraṁ naiva māyāpāśavimohitāḥ

जो कलियुग रूपी सर्प से डसे हुए मेरे दिन (एकादशी) में सोते हैं और जागरण नहीं करते, वे माया के पाश से मोहित हैं।

श्लोक 9 (skanda.2.146.9)

प्राप्ताप्येकादशी येषां कलौ जागरणं विना ।। ते विनष्टा न संदेहो यस्माज्जीवितमध्रुवम्

prāptāpyekādaśī yeṣāṁ kalau jāgaraṇaṁ vinā te vinaṣṭā na saṁdeho yasmājjīvitamadhruvam

कलियुग में जिन्हें एकादशी प्राप्त होकर भी जागरण के बिना बीत जाती है, वे निःसंदेह नष्ट हो गए, क्योंकि जीवन अनित्य है।

श्लोक 10 (skanda.2.146.10)

उद्धृतं नेत्रयुग्मं च दत्त्वा वै हृदये पदम् ।। कृतं ये नैव पश्यंति पापिनो मम जागरम्

uddhṛtaṁ netrayugmaṁ ca dattvā vai hṛdaye padam kṛtaṁ ye naiva paśyaṁti pāpino mama jāgaram

अपनी दोनों आँखें निकालकर हृदय में रख लेना उन पापियों के लिए बेहतर है, जो मेरा किया जा रहा जागरण नहीं देखते।

श्लोक 11 (skanda.2.146.11)

अभावे वाचकस्याऽथ गीतं नृत्यं च कारयेत् ।। वाचके सति देवेश पुराणं प्रथमं पठेत्

abhāve vācakasyā'tha gītaṁ nṛtyaṁ ca kārayet vācake sati deveśa purāṇaṁ prathamaṁ paṭhet

पाठक (कथावाचक) के अभाव में गीत और नृत्य करवाना चाहिए; हे देवेश! पाठक के उपस्थित होने पर पहले पुराण का पाठ करना चाहिए।

श्लोक 12 (skanda.2.146.12)

अश्वमेधसहस्रस्य वाजपेयशतस्य च ।। पुण्यं कोटिगुणं पुत्र मम जागरणे कृते

aśvamedhasahasrasya vājapeyaśatasya ca puṇyaṁ koṭiguṇaṁ putra mama jāgaraṇe kṛte

हे पुत्र! सहस्र अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञों का पुण्य करोड़ गुना हो जाता है, जब मेरा जागरण किया जाता है।

श्लोक 13 (skanda.2.146.13)

पितृपक्षे मातृपक्षे भार्यापक्षे च मानद ।। कुलान्युद्धरते चैतन्मम जागरणे कृते ।।

pitṛpakṣe mātṛpakṣe bhāryāpakṣe ca mānada kulānyuddharate caitanmama jāgaraṇe kṛte

हे मानद! पितृपक्ष, मातृपक्ष और पत्नी-पक्ष के कुलों का उद्धार होता है, जब मेरा जागरण किया जाता है।

श्लोक 14 (skanda.2.146.14)

उपोषणदिने विघ्ने प्रारब्धे जागरे सति ।। विहाय स्थानं तत्राहं शापं दत्त्वा व्रजाम्यहम्

upoṣaṇadine vighne prārabdhe jāgare sati vihāya sthānaṁ tatrāhaṁ śāpaṁ dattvā vrajāmyaham

यदि उपवास के दिन जागरण आरंभ होने पर कोई विघ्न पड़े, तो मैं उस स्थान को छोड़कर शाप देकर चला जाता हूँ।

श्लोक 15 (skanda.2.146.15)

अविद्धवासरे ये मे प्रकुर्वंति हि जागरम् ।। तेषां मध्ये प्रहृष्टः सन्नृत्यं वै प्रकरोम्यहम्

aviddhavāsare ye me prakurvaṁti hi jāgaram teṣāṁ madhye prahṛṣṭaḥ sannṛtyaṁ vai prakaromyaham

जो सही समय पर मेरा जागरण करते हैं, उनके बीच मैं अत्यंत प्रसन्न होकर स्वयं नृत्य करता हूँ।

श्लोक 16 (skanda.2.146.16)

यावद्दिनानि कुरुते जागरं मम सन्निधौ ।। युगाऽयुतानि तावंति वसते मम वेश्मनि ।।

yāvaddināni kurute jāgaraṁ mama sannidhau yugā'yutāni tāvaṁti vasate mama veśmani

जितने दिनों तक मनुष्य मेरी सन्निधि में जागरण करता है, उतने ही दस-हजार युगों तक वह मेरे घर में निवास करता है।

श्लोक 17 (skanda.2.146.17)

न गयापिंडदानेन न तीर्थैर्बहुभिर्मखैः ।। पूर्वजा मुक्तिमायांति विनैकादशिजागरात्

na gayāpiṁḍadānena na tīrthairbahubhirmakhaiḥ pūrvajā muktimāyāṁti vinaikādaśijāgarāt

न गया में पिण्डदान से, न अनेक तीर्थों और यज्ञों से — पितरगण एकादशी के जागरण के बिना मुक्ति को प्राप्त नहीं होते।

श्लोक 18 (skanda.2.146.18)

यः कुर्याज्जागरे पूजां कुसुमैर्मम वासरे । पुष्पेपुष्पेऽश्वमेधस्य फलमाप्नोति मानवः

yaḥ kuryājjāgare pūjāṁ kusumairmama vāsare puṣpepuṣpe'śvamedhasya phalamāpnoti mānavaḥ

जो मेरे दिन जागरण में पुष्पों से पूजा करता है, वह मनुष्य प्रत्येक पुष्प के लिए अश्वमेध का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 19 (skanda.2.146.19)

यः कुर्याद्दीपदानं च रात्रौ जागरणे मम ।। निमिषे निमिषे पुत्र लभते गोऽयुतं फलम्

yaḥ kuryāddīpadānaṁ ca rātrau jāgaraṇe mama nimiṣe nimiṣe putra labhate go'yutaṁ phalam

जो रात्रि में मेरे जागरण में दीपदान करता है, हे पुत्र! वह प्रत्येक क्षण के लिए दस हजार गौओं का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (skanda.2.146.20)

यो दद्याज्जागरे पुत्र हविष्यान्नसमुद्भवम् ।। नैवेद्यं लभते पुण्यं शालिशैलसमुद्भवम्

yo dadyājjāgare putra haviṣyānnasamudbhavam naivedyaṁ labhate puṇyaṁ śāliśailasamudbhavam

जो पुत्र मुझे जागरण में हविष्यान्न से बना नैवेद्य देता है, वह पवित्र पर्वत पर उगे उत्तम चावल के नैवेद्य का पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.2.146.21)

पक्वान्नानि च यो दद्यात्फलानि विविधनि च ।। जागरे मे चतुर्वक्त्र लभते गोशतं फलम्

pakvānnāni ca yo dadyātphalāni vividhani ca jāgare me caturvaktra labhate gośataṁ phalam

हे चतुर्मुख! जो मेरे जागरण में पके हुए व्यंजन और विविध फल देता है, वह सौ गौओं का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 22 (skanda.2.146.22)

कर्पूरेण च तांबूलं ददाति मम जागरे ।। मद्भक्तो मत्प्रसादेन सप्तद्वीपाऽधिपो भवेत्

karpūreṇa ca tāṁbūlaṁ dadāti mama jāgare madbhakto matprasādena saptadvīpā'dhipo bhavet

जो मेरे जागरण में कर्पूर सहित ताम्बूल देता है, वह मेरा भक्त मेरी कृपा से सप्तद्वीप का अधिपति बनता है।

श्लोक 23 (skanda.2.146.23)

जागरे मम देवेश यः कुर्यात्पुष्पमण्डपम् ।। स पुष्पकविमानेन क्रीडते मम सद्मनि

jāgare mama deveśa yaḥ kuryātpuṣpamaṇḍapam sa puṣpakavimānena krīḍate mama sadmani

हे देवेश! जो मेरे जागरण में पुष्प-मण्डप बनाता है, वह पुष्पक विमान में मेरे धाम में क्रीड़ा करता है।

श्लोक 24 (skanda.2.146.24)

जागरे मे तु यो धूपं सकर्पूरं सगुग्गुलम्।। ददाति दहते पापं जन्मलक्षसमुद्भवम्

jāgare me tu yo dhūpaṁ sakarpūraṁ saguggulam dadāti dahate pāpaṁ janmalakṣasamudbhavam

जो मेरे जागरण में कर्पूर और गुग्गुल सहित धूप देता है, वह एक लाख जन्मों में संचित पाप को जला देता है।

श्लोक 25 (skanda.2.146.25)

स्नापयेज्जागरे यो मां दधिक्षीरघृतांबुकैः ।। भोगानिह लभेद्वै स ह्यन्ते च परमां गतिम्

snāpayejjāgare yo māṁ dadhikṣīraghṛtāṁbukaiḥ bhogāniha labhedvai sa hyante ca paramāṁ gatim

जो मुझे जागरण में दही, दूध, घी और जल से स्नान कराता है, वह यहाँ भोग प्राप्त करता है और अंत में परम गति पाता है।

श्लोक 26 (skanda.2.146.26)

दिव्यांऽबराणि यो दद्यात्फलानि विविधानि च ।। स चिरं वसते स्वर्गे तं तु संख्यासमानि वै

divyāṁ'barāṇi yo dadyātphalāni vividhāni ca sa ciraṁ vasate svarge taṁ tu saṁkhyāsamāni vai

जो दिव्य वस्त्र और विविध फल देता है, वह उनकी संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्ग में चिरकाल निवास करता है।

श्लोक 27 (skanda.2.146.27)

दद्यादाभरणं यो मे हेमजं रत्नसंभवम् ।। सप्तकल्पानि वसते सोत्संगे मत्प्रियो मम

dadyādābharaṇaṁ yo me hemajaṁ ratnasaṁbhavam saptakalpāni vasate sotsaṁge matpriyo mama

जो मुझे स्वर्ण और रत्नों से बना आभूषण देता है, वह मुझे प्रिय होकर सात कल्पों तक मेरी गोद में निवास करता है।

श्लोक 28 (skanda.2.146.28)

घृतेन दीपकं यो मे गव्येन च विशेषतः ।। ज्वालयेज्जागरे रात्रौ निमिषे गोयुतं फलम्

ghṛtena dīpakaṁ yo me gavyena ca viśeṣataḥ jvālayejjāgare rātrau nimiṣe goyutaṁ phalam

जो मेरे लिए घी से, और विशेष रूप से गोघृत से, रात्रि में जागरण में दीपक जलाता है, वह प्रत्येक क्षण के लिए दस हजार गौओं का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 29 (skanda.2.146.29)

जागरे मे चतुर्वक्त्र कर्पूरेण च दीपकम् ।। यो ज्वालयेत नीराजं कपिलादानजं फलम्

jāgare me caturvaktra karpūreṇa ca dīpakam yo jvālayeta nīrājaṁ kapilādānajaṁ phalam

हे चतुर्मुख! जो मेरे लिए जागरण में कर्पूर से आरती का दीपक जलाता है, वह कपिला गाय के दान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 30 (skanda.2.146.30)

यः पुनः कुरुते दीपं गीतं नृत्यं च पूजनम् ।। शतक्रतुसमं पुण्यं व्रतैर्दानशतैरपि

yaḥ punaḥ kurute dīpaṁ gītaṁ nṛtyaṁ ca pūjanam śatakratusamaṁ puṇyaṁ vratairdānaśatairapi

जो पुनः दीपक, गीत, नृत्य और पूजन करता है, वह सौ यज्ञों, सौ व्रतों और सौ दानों के समान पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 31 (skanda.2.146.31)

स्वयं यः कुरुते गीतं विलज्जो नृत्यते यदि ।। स लभेन्निमिषार्धेन कोटियज्ञकृतं फलम्

svayaṁ yaḥ kurute gītaṁ vilajjo nṛtyate yadi sa labhennimiṣārdhena koṭiyajñakṛtaṁ phalam

जो स्वयं गीत गाता है, अथवा लज्जावश केवल नृत्य ही करता है, वह आधे क्षण में करोड़ यज्ञों के तुल्य फल प्राप्त करता है।

श्लोक 32 (skanda.2.146.32)

निवारयति यो गीतं नृत्यं जागरणे मम ।। षष्टियुगसहस्राणि पच्यते रौरवादिषु

nivārayati yo gītaṁ nṛtyaṁ jāgaraṇe mama ṣaṣṭiyugasahasrāṇi pacyate rauravādiṣu

जो मेरे जागरण में गीत या नृत्य को रोकता है, वह साठ हजार युगों तक रौरव आदि नरकों में पकाया जाता है।

श्लोक 33 (skanda.2.146.33)

नृत्यमानस्य मर्त्यस्य ये केचिन्निकटे गताः ।। विमुक्ता धर्मराजेन मुक्ता यांति च मत्पदम्

nṛtyamānasya martyasya ye kecinnikaṭe gatāḥ vimuktā dharmarājena muktā yāṁti ca matpadam

नृत्य करते हुए मनुष्य के जो भी प्राणी निकट पहुँचते हैं, वे धर्मराज द्वारा मुक्त किए जाते हैं और मेरे पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 34 (skanda.2.146.34)

नृत्यमानस्य मर्त्यस्य उपहासं करोति यः ।। जागरे यांति निरयं यावदिंद्राश्चतुर्दश ।।

nṛtyamānasya martyasya upahāsaṁ karoti yaḥ jāgare yāṁti nirayaṁ yāvadiṁdrāścaturdaśa

जो जागरण में नृत्य करते हुए मनुष्य का उपहास करता है, वह चौदह इन्द्रों के काल तक नरक में जाता है।

श्लोक 35 (skanda.2.146.35)

जागरे मम यः कुर्याद्भक्त्या पुस्तकवाचनम् ।। श्लोकसंख्यायुगान्येव स वसेन्मम सन्निधौ

jāgare mama yaḥ kuryādbhaktyā pustakavācanam ślokasaṁkhyāyugānyeva sa vasenmama sannidhau

जो मेरे जागरण में भक्तिपूर्वक ग्रंथों का पाठ करता है, वह श्लोकों की संख्या के बराबर युग-युगल तक मेरी सन्निधि में निवास करता है।

श्लोक 36 (skanda.2.146.36)

प्रदक्षिणाप्रदानेन यत्फलं कथितं बुधैः ।। न तत्कोटिमखैः पुण्यं युगसंख्यैरवाप्यते

pradakṣiṇāpradānena yatphalaṁ kathitaṁ budhaiḥ na tatkoṭimakhaiḥ puṇyaṁ yugasaṁkhyairavāpyate

प्रदक्षिणा के दान से विद्वानों द्वारा जो फल कहा गया है, वह युगों की गणना जितने करोड़ यज्ञों से भी प्राप्त नहीं होता।

श्लोक 37 (skanda.2.146.37)

दीपमाला ममाग्रे वै यः कुर्याज्जागरे सुत ।। विमानकोटिसंयुक्त आकल्पं वसते दिवि ।।

dīpamālā mamāgre vai yaḥ kuryājjāgare suta vimānakoṭisaṁyukta ākalpaṁ vasate divi

हे पुत्र! जो मेरे आगे जागरण में दीपमाला बनाता है, वह करोड़ों विमानों से युक्त होकर कल्पांत तक स्वर्ग में निवास करता है।

श्लोक 38 (skanda.2.146.38)

मम बालचरित्राणि जागरे पठते हि यः।। युगकोटिसहस्राणि श्वेतद्वीपे वसेन्नरः

mama bālacaritrāṇi jāgare paṭhate hi yaḥ yugakoṭisahasrāṇi śvetadvīpe vasennaraḥ

जो जागरण में मेरे बालचरित्रों का पाठ करता है, वह मनुष्य हजारों करोड़ युगों तक श्वेतद्वीप में निवास करता है।

श्लोक 39 (skanda.2.146.39)

तस्माज्जागरणं कार्यं पक्षयोः शुक्लकृष्णयोः

tasmājjāgaraṇaṁ kāryaṁ pakṣayoḥ śuklakṛṣṇayoḥ

इसलिए शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में जागरण करना चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.2.146.40)

यो गीतां पठते रात्रौ मम नामसहस्रकम्।। वेदोक्तानां पुराणानां जागरात्पुण्यमाप्नुयात्

yo gītāṁ paṭhate rātrau mama nāmasahasrakam vedoktānāṁ purāṇānāṁ jāgarātpuṇyamāpnuyāt

जो रात्रि में मेरे सहस्रनाम अथवा गीता का पाठ करता है, वह जागरण से वेदोक्त शास्त्रों और पुराणों का पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 41 (skanda.2.146.41)

धेनुदानं तु यः कुर्याज्जागरे मम पु्त्रक।। लभते नात्र संदेहः सप्तद्वीपवतीफलम्

dhenudānaṁ tu yaḥ kuryājjāgare mama putraka labhate nātra saṁdehaḥ saptadvīpavatīphalam

हे पुत्र! जो जागरण में गौ का दान करता है, वह निःसंदेह सप्तद्वीपा पृथ्वी का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 42 (skanda.2.146.42)

सर्वेषामेव पुण्यानां महत्पुण्यं महीतले ।। द्वादशीजागरं पुत्र प्रसिद्धं भुवनत्रये

sarveṣāmeva puṇyānāṁ mahatpuṇyaṁ mahītale dvādaśījāgaraṁ putra prasiddhaṁ bhuvanatraye

हे पुत्र! पृथ्वी पर समस्त पुण्यों में महान पुण्य, तीनों लोकों में प्रसिद्ध, द्वादशी का जागरण ही है।

श्लोक 43 (skanda.2.146.43)

जागरं ये च कुर्वंति कर्मणा मनसा गिरा ।। न तेषां पुनरावृत्तिर्मम लोकात्कथंचन

jāgaraṁ ye ca kurvaṁti karmaṇā manasā girā na teṣāṁ punarāvṛttirmama lokātkathaṁcana

जो कर्म, मन और वाणी से जागरण करते हैं, उनका मेरे लोक से किसी भी प्रकार पुनरागमन नहीं होता।

श्लोक 44 (skanda.2.146.44)

प्रोत्साहयित्वा लोकान्यः कुरुते जागरं निशि ।। प्राप्नोति चक्रवर्तित्वं सत्यं मे व्याहृतं सुत

protsāhayitvā lokānyaḥ kurute jāgaraṁ niśi prāpnoti cakravartitvaṁ satyaṁ me vyāhṛtaṁ suta

हे पुत्र! जो लोगों को प्रोत्साहित करके रात्रि में जागरण करता है, वह चक्रवर्ती सम्राट पद प्राप्त करता है — यह मैंने सत्य कहा है।

श्लोक 45 (skanda.2.146.45)

संमानिताः ककुत्स्थेन रात्रौ जागरकारिणः।। स्वशक्त्या चैव दानेन प्राप्तं राज्यं सुदुर्लभम्

saṁmānitāḥ kakutsthena rātrau jāgarakāriṇaḥ svaśaktyā caiva dānena prāptaṁ rājyaṁ sudurlabham

रात्रि में जागरण करने वालों का ककुत्स्थ-वंशियों द्वारा भी सम्मान किया गया है; अपनी सामर्थ्य और दान से उन्होंने अत्यंत दुर्लभ राज्य प्राप्त किया।

श्लोक 46 (skanda.2.146.46)

ये केचिद्गायका विप्रा वादका नर्तकाश्च ये ।। नर्तकीसहिता यांति मम लोके सनातने

ye kecidgāyakā viprā vādakā nartakāśca ye nartakīsahitā yāṁti mama loke sanātane

जो भी गायक, ब्राह्मण, वादक और नर्तक हों, वे नर्तकियों सहित मेरे सनातन लोक को जाते हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.146.47)

दुर्योनिषु गतैः सर्वैः कृत्वा जागरणं मम।। संप्राप्तं पृथिवीशत्वं कामुकैर्मुनिसत्तम

duryoniṣu gataiḥ sarvaiḥ kṛtvā jāgaraṇaṁ mama saṁprāptaṁ pṛthivīśatvaṁ kāmukairmunisattama

हे मुनिसत्तम! दुर्गति को प्राप्त हुए सभी लोगों ने भी मेरा जागरण करके, कामुक होते हुए भी पृथ्वी का आधिपत्य प्राप्त किया।

श्लोक 48 (skanda.2.146.48)

निष्कामा मुक्तिमापन्नाः श्वपचाद्याश्च जागरात्।। विवेको नास्ति वर्णानां मम जागरकारिणाम्।।

niṣkāmā muktimāpannāḥ śvapacādyāśca jāgarāt viveko nāsti varṇānāṁ mama jāgarakāriṇām

निष्काम पुरुष जागरण से मुक्ति प्राप्त करते हैं, चाहे वे चाण्डाल आदि ही क्यों न हों; मेरे जागरण करने वालों में जाति का कोई भेद नहीं है।

श्लोक 49 (skanda.2.146.49)

न कलौ पावनं ध्यानं न कलौ जाह्नवीजलम् ।। न कलौ पावनं जाप्यं मुक्त्वैकं जागरं मम

na kalau pāvanaṁ dhyānaṁ na kalau jāhnavījalam na kalau pāvanaṁ jāpyaṁ muktvaikaṁ jāgaraṁ mama

कलियुग में न कोई पवित्र ध्यान है, न कलियुग में गंगाजल पवित्र है, न कलियुग में कोई पवित्र जप है — मेरे एक जागरण को छोड़कर।

श्लोक 50 (skanda.2.146.50)

द्वादशीदिवसे प्राप्ते ये कुर्वंति हि जागरम् ।। ते धन्यास्ते कृतार्था वै कलिकाले न संशयः

dvādaśīdivase prāpte ye kurvaṁti hi jāgaram te dhanyāste kṛtārthā vai kalikāle na saṁśayaḥ

जो द्वादशी के दिन आने पर जागरण करते हैं, वे धन्य हैं, कलिकाल में निःसंदेह कृतार्थ हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.146.51)

न भूयान्मानुषे लोके द्वादशीविमुखो नरः ।। अतीतानागतान्वाऽपि पातयेन्नरके हि सः

na bhūyānmānuṣe loke dvādaśīvimukho naraḥ atītānāgatānvā'pi pātayennarake hi saḥ

द्वादशी से विमुख मनुष्य को मनुष्य-लोक में पुनः जन्म नहीं लेना चाहिए; वह अपने भूत और भविष्य के पूर्वजों को भी नरक में गिरा देता है।

श्लोक 52 (skanda.2.146.52)

वरमेको गुणैर्युक्तः किं जातैर्बहुभिः सुतैः ।। द्वादशीजागरात्सर्वांस्तारयेद्यो हि पूर्वजान्

varameko guṇairyuktaḥ kiṁ jātairbahubhiḥ sutaiḥ dvādaśījāgarātsarvāṁstārayedyo hi pūrvajān

गुणों से युक्त एक ही पुत्र श्रेष्ठ है, बहुत से पुत्रों से क्या लाभ — क्योंकि द्वादशी के जागरण से वह अपने समस्त पूर्वजों को तार देता है।

श्लोक 53 (skanda.2.146.53)

माहात्म्यं पठते भक्त्या मयोक्तं जागरोद्भवम् ।। द्वादशीसंभवः पुत्रः कुलानां तारयेच्छतम्

māhātmyaṁ paṭhate bhaktyā mayoktaṁ jāgarodbhavam dvādaśīsaṁbhavaḥ putraḥ kulānāṁ tārayecchatam

जो भक्तिपूर्वक मेरे द्वारा कहे गए इस जागरण-संबंधी माहात्म्य का पाठ करता है, तथा द्वादशी को जन्मा पुत्र, अपने सौ कुलों को तार देता है।

श्लोक 54 (skanda.2.146.54)

अगम्यागमने पापमभक्ष्यस्यापि भक्षणे ।। पापं विलयमायाति कृते जागरणे सुत

agamyāgamane pāpamabhakṣyasyāpi bhakṣaṇe pāpaṁ vilayamāyāti kṛte jāgaraṇe suta

अगम्यागमन का पाप, तथा अभक्ष्य वस्तु के भक्षण का पाप भी — हे पुत्र! जागरण किए जाने पर विलीन हो जाता है।

श्लोक 55 (skanda.2.146.55)

अज्ञानाद्यत्कृतं पापं ज्ञात्वा यत्पातकं कृतम् ।। पूर्वजन्मार्जितं पापमिह जन्मनि यत्कृतम् ।।

ajñānādyatkṛtaṁ pāpaṁ jñātvā yatpātakaṁ kṛtam pūrvajanmārjitaṁ pāpamiha janmani yatkṛtam

अज्ञानवश किया गया पाप, जान-बूझकर किया गया पातक, पूर्वजन्म में अर्जित पाप, और इस जन्म में किया गया पाप—

श्लोक 56 (skanda.2.146.56)

सिद्ध्यंति सर्वकार्याणि मनसा चिंतितान्यपि ।। द्वादश्यां वै चतुर्वक्त्र रात्रौ जागरणे कृते

siddhyaṁti sarvakāryāṇi manasā ciṁtitānyapi dvādaśyāṁ vai caturvaktra rātrau jāgaraṇe kṛte

—हे चतुर्मुख! द्वादशी की रात्रि में जागरण किए जाने पर मन में सोचे गए सभी कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 57 (skanda.2.146.57)

द्वादशीजागरेणैव मुक्तिं गच्छंति मानवाः

dvādaśījāgareṇaiva muktiṁ gacchaṁti mānavāḥ

द्वादशी के जागरण से ही मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 58 (skanda.2.146.58)

न तत्पुण्यं कुरुक्षेत्रे प्रयागे वसतां कलौ ।। माहात्म्यं वसतां पुंसां यत्फलं द्वादशीषु च

na tatpuṇyaṁ kurukṣetre prayāge vasatāṁ kalau māhātmyaṁ vasatāṁ puṁsāṁ yatphalaṁ dvādaśīṣu ca

कलियुग में कुरुक्षेत्र अथवा प्रयाग में निवास करने का जो पुण्य है, वह उस पुण्य के तुल्य नहीं है जो द्वादशी में निवास करने वालों को प्राप्त होता है।

श्लोक 59 (skanda.2.146.59)

नाऽश्वमेधसहस्रैस्तु तीर्थकोट्यवगाहनात् ।। तत्फलं प्राप्यते पुत्र द्वादशीजागरे कृते

nā'śvamedhasahasraistu tīrthakoṭyavagāhanāt tatphalaṁ prāpyate putra dvādaśījāgare kṛte

हे पुत्र! सहस्रों अश्वमेध यज्ञों से, अथवा करोड़ों तीर्थों में स्नान करने से भी वह फल प्राप्त नहीं होता, जो द्वादशी के जागरण से प्राप्त होता है।

श्लोक 60 (skanda.2.146.60)

पठेद्वा शृणुयाद्वाऽपि माहात्म्यं द्वादशीभवम् ।। सर्वपापविशुद्धात्मा स लभेच्छाश्वतीं गतिम्

paṭhedvā śṛṇuyādvā'pi māhātmyaṁ dvādaśībhavam sarvapāpaviśuddhātmā sa labhecchāśvatīṁ gatim

जो द्वादशी से उत्पन्न इस माहात्म्य का पाठ करता है अथवा सुनता भी है, वह समस्त पापों से शुद्धात्मा होकर शाश्वत गति को प्राप्त करता है।

श्लोक 61 (skanda.2.146.61)

सर्वे दुष्टाः समस्ताश्च सौम्यास्तस्य सदा ग्रहाः ।। संततेर्न वियोगस्तु द्वादशी यस्य कारणम्

sarve duṣṭāḥ samastāśca saumyāstasya sadā grahāḥ saṁtaterna viyogastu dvādaśī yasya kāraṇam

जिसका कारण द्वादशी है, उसके लिए सभी ग्रह — चाहे दुष्ट हों या समस्त — सदा सौम्य ही रहते हैं; उसकी संतति का कभी वियोग नहीं होता।

श्लोक 62 (skanda.2.146.62)

मम कीर्तिरुचिर्नित्यं न विपद्येत कर्हिचित् ।। रणे राजकुले चैव सर्वदा विजयी भवेत्

mama kīrtirucirnityaṁ na vipadyeta karhicit raṇe rājakule caiva sarvadā vijayī bhavet

मेरी कीर्ति और तेज सदा उसके साथ रहते हैं, कभी नष्ट नहीं होते; युद्ध में और राजसभा में वह सदा विजयी होता है।

श्लोक 63 (skanda.2.146.63)

धर्मोपरि मतिर्नित्यं भक्तिर्मयि सुनिर्मला ।। पातकं नैव लिप्येत द्वादशीभक्तितो नरम्

dharmopari matirnityaṁ bhaktirmayi sunirmalā pātakaṁ naiva lipyeta dvādaśībhaktito naram

उसका मन सदा धर्म में लगा रहता है, मुझमें उसकी भक्ति अत्यंत निर्मल होती है; द्वादशी की भक्ति से मनुष्य को पाप कभी नहीं लगता।

श्लोक 64 (skanda.2.146.64)

प्रेतत्वं नैव तस्याऽस्ति कृते जागरणे मम ।। एकादश्या विहीनस्य परलोकगतिर्नहि ।। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कलौ कार्यं हि तद्दिनम्

pretatvaṁ naiva tasyā'sti kṛte jāgaraṇe mama ekādaśyā vihīnasya paralokagatirnahi tasmātsarvaprayatnena kalau kāryaṁ hi taddinam

मेरा जागरण किए जाने पर उसे प्रेत-योनि कभी प्राप्त नहीं होती; एकादशी से रहित मनुष्य की परलोक-गति नहीं होती। इसलिए कलियुग में सम्पूर्ण प्रयत्न से वह दिन अवश्य मनाना चाहिए।

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