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वैष्णव खण्ड · अध्याय 147

मत्स्योत्सव का कथन

अध्याय 146अध्याय-सूचीअध्याय 148

श्लोक 1 (skanda.2.147.1)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। ततः प्रभाते द्वादश्यां कार्यो मत्स्योत्सवो बुधैः ।। मार्गशीर्षे शुक्लपक्षे यथाविध्युपचारतः

śrībhagavānuvāca tataḥ prabhāte dvādaśyāṁ kāryo matsyotsavo budhaiḥ mārgaśīrṣe śuklapakṣe yathāvidhyupacārataḥ

श्रीभगवान ने कहा — मार्गशीर्ष के शुक्ल पक्ष में द्वादशी के प्रातःकाल, विद्वानों को यथाविधि उपचारपूर्वक मत्स्योत्सव करना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.2.147.2)

अथ मार्गशिरे मासे दशम्यां नियतात्मवान् ।। कृत्वा देवार्चनं धीमानग्निकार्यं यथाविधि

atha mārgaśire māse daśamyāṁ niyatātmavān kṛtvā devārcanaṁ dhīmānagnikāryaṁ yathāvidhi

मार्गशीर्ष मास की दशमी को संयमी, बुद्धिमान पुरुष देवताओं की पूजा और यथाविधि अग्निकार्य करके—

श्लोक 3 (skanda.2.147.3)

शुचिवासाः प्रसन्नात्मा हव्यमन्नं सुसंस्कृतम् ।। पक्त्वा पंचपदे गत्वा पुनः शौचं तु पादयोः

śucivāsāḥ prasannātmā havyamannaṁ susaṁskṛtam paktvā paṁcapade gatvā punaḥ śaucaṁ tu pādayoḥ

—स्वच्छ वस्त्र धारण किए, प्रसन्नचित्त होकर, भलीभाँति संस्कारित हव्यान्न पकाकर, पाँच पगों तक जाकर, फिर पैरों की शुद्धि करके—

श्लोक 4 (skanda.2.147.4)

कृत्वाऽष्टांगुलमानं तु क्षीरवृक्षे समुद्भवम् ।। भक्षयेद्दंतकाष्ठं तु ततश्चाचम्य यत्नतः

kṛtvā'ṣṭāṁgulamānaṁ tu kṣīravṛkṣe samudbhavam bhakṣayeddaṁtakāṣṭhaṁ tu tataścācamya yatnataḥ

—दूधवाले वृक्ष से उत्पन्न आठ अंगुल की दातुन लेकर उसे चबाए, फिर सावधानीपूर्वक आचमन करे।

श्लोक 5 (skanda.2.147.5)

दृष्ट्वाऽऽकाशानि सर्वाणि ध्यात्वा वै मां गदाधरम् ।। शंखचक्रगदापाणिकिरीटं पीतवाससम्

dṛṣṭvā''kāśāni sarvāṇi dhyātvā vai māṁ gadādharam śaṁkhacakragadāpāṇikirīṭaṁ pītavāsasam

आकाश की सभी दिशाओं को देखकर, शंख-चक्र-गदा हाथ में लिए, मुकुटधारी, पीतवस्त्रधारी मुझ गदाधर का ध्यान करके—

श्लोक 6 (skanda.2.147.6)

प्रसन्नवदनांऽभोजं सर्वलक्षणलक्षितम् ।। ध्यात्वा पुनर्जलं हस्ते गृहीत्वा भानुमध्यगम्

prasannavadanāṁ'bhojaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam dhyātvā punarjalaṁ haste gṛhītvā bhānumadhyagam

—प्रसन्न कमल-मुख वाले, समस्त शुभ लक्षणों से युक्त मेरा ध्यान करके, फिर हाथ में जल लेकर, उदीयमान सूर्य के सम्मुख होकर—

श्लोक 7 (skanda.2.147.7)

ध्यात्वाऽर्घ्यं दापयेत्तत्र करतोयेन मानवः ।। एवमुच्चारयेद्वाचं तस्मिन्काले चतुर्मुख

dhyātvā'rghyaṁ dāpayettatra karatoyena mānavaḥ evamuccārayedvācaṁ tasminkāle caturmukha

—ध्यान करके, वहाँ हाथ के जल से अर्घ्य अर्पित करे। हे चतुर्मुख! उस समय मनुष्य को इस प्रकार वचन कहना चाहिए—

श्लोक 8 (skanda.2.147.8)

एकादश्यां निराहारः स्थित्वाऽहनि परे ह्यहम् ।। भोक्ष्यामि पुंडरीकाक्ष शरणं मे भवाऽच्युत

ekādaśyāṁ nirāhāraḥ sthitvā'hani pare hyaham bhokṣyāmi puṁḍarīkākṣa śaraṇaṁ me bhavā'cyuta

'हे पुण्डरीकाक्ष! एकादशी को निराहार रहकर, अगले दिन मैं भोजन करूँगा; हे अच्युत! मेरी शरण हो जाइए।'

श्लोक 9 (skanda.2.147.9)

एवमुक्त्वा ततो रात्रौ मम मूर्तेश्च सन्निधौ ।। जपेन्नारायणायेति स्वयं तत्र विधानतः

evamuktvā tato rātrau mama mūrteśca sannidhau japennārāyaṇāyeti svayaṁ tatra vidhānataḥ

ऐसा कहकर फिर रात्रि में मेरी मूर्ति के समक्ष स्वयं वहाँ विधिपूर्वक 'नारायणाय' का जप करे।

श्लोक 10 (skanda.2.147.10)

ततः प्रभाते विमलां नदीं गत्वा समुद्रगाम् ।। इतरां वा तडागं वा गृहे वा नियतात्मवान्

tataḥ prabhāte vimalāṁ nadīṁ gatvā samudragām itarāṁ vā taḍāgaṁ vā gṛhe vā niyatātmavān

फिर प्रातःकाल संयमी पुरुष समुद्र में मिलने वाली स्वच्छ नदी में, अथवा अन्य नदी में, अथवा तालाब में, अथवा घर में ही जाकर—

श्लोक 11 (skanda.2.147.11)

आनीय मृत्तिकां शुद्धां मंत्रेणाऽनेन मानवः।। वंदयेद्देवदेवेशं तदा शुद्धो भवेन्नरः

ānīya mṛttikāṁ śuddhāṁ maṁtreṇā'nena mānavaḥ vaṁdayeddevadeveśaṁ tadā śuddho bhavennaraḥ

—शुद्ध मिट्टी लाकर इस मंत्र से मनुष्य देवाधिदेव की वंदना करे, तब मनुष्य शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.2.147.12)

धारणं पोषणं त्वत्तो भूतानां देवि सर्वदा ।। तेन सत्येन मे पापं यावन्मोचय सुव्रते

dhāraṇaṁ poṣaṇaṁ tvatto bhūtānāṁ devi sarvadā tena satyena me pāpaṁ yāvanmocaya suvrate

'हे देवी! तुमसे ही समस्त प्राणियों का धारण और पोषण सदा होता है; हे सुव्रते! उसी सत्य से मेरे पाप को मुक्त करो।'

श्लोक 13 (skanda.2.147.13)

ब्रह्मांडोदरतीर्थानि करैः स्पृष्टानि दैवतैः ।। तेनेमां मृत्तिकां स्पृष्टा माऽऽलभामि त्वयोद्धृताम्

brahmāṁḍodaratīrthāni karaiḥ spṛṣṭāni daivataiḥ tenemāṁ mṛttikāṁ spṛṣṭā mā''labhāmi tvayoddhṛtām

'ब्रह्माण्ड के भीतर के तीर्थ देवताओं के हाथों से स्पर्श किए गए हैं; इसीलिए इस मिट्टी को स्पर्श करके मैं तुम्हारे द्वारा उद्धृत उसे ग्रहण करता हूँ।'

श्लोक 14 (skanda.2.147.14)

त्वयि नित्यं रसाः सर्वे स्थिता वरुण सर्वदा ।। तेनेमां मृत्तिकां प्लाव्य पूतां कुरुष्व माचिरम्

tvayi nityaṁ rasāḥ sarve sthitā varuṇa sarvadā tenemāṁ mṛttikāṁ plāvya pūtāṁ kuruṣva māciram

'हे वरुण! तुझमें ही सदा समस्त रसों का निवास है; इसलिए इस मिट्टी को धोकर उसे शीघ्र पवित्र करो।'

श्लोक 15 (skanda.2.147.15)

एवं मृदं तथा तोयं प्रसाद्याऽऽत्मानमालभेत् ।। त्रिःकृत्वाऽशेषमृदया पिंडमालिप्य वै जले

evaṁ mṛdaṁ tathā toyaṁ prasādyā''tmānamālabhet triḥkṛtvā'śeṣamṛdayā piṁḍamālipya vai jale

इस प्रकार मिट्टी और जल को प्रसन्न करके अपने आपको उससे लेपित करे; सम्पूर्ण मिट्टी से तीन बार शरीर को लेपकर जल में एक पिण्ड बनाए।

श्लोक 16 (skanda.2.147.16)

तस्मिन्नरः सदा सम्यङ्नक्रकच्छपदूरतः ।। स्नात्वा चावश्यकं कृत्वा पुनर्मम गृहं व्रजेत्

tasminnaraḥ sadā samyaṅnakrakacchapadūrataḥ snātvā cāvaśyakaṁ kṛtvā punarmama gṛhaṁ vrajet

वहाँ मगरमच्छ और कछुओं से दूर रहकर सदा भलीभाँति स्नान करे, और अपने आवश्यक कर्म करके पुनः मेरे घर (मंदिर) की ओर जाए।

श्लोक 17 (skanda.2.147.17)

तत्राऽऽराध्य महायोगिन्देवं नारायणं हरिम् ।। केशवाय नमः पादौ कटिं दामोदराय च

tatrā''rādhya mahāyogindevaṁ nārāyaṇaṁ harim keśavāya namaḥ pādau kaṭiṁ dāmodarāya ca

वहाँ महायोगी भगवान नारायण हरि की आराधना करके — 'केशवाय नमः' कहते हुए चरणों को, 'दामोदराय' कहते हुए कटि को स्पर्श करे—

श्लोक 18 (skanda.2.147.18)

जानुयुग्मं नृसिंहाय उरः श्रीवत्सधारिणे ।। कंठे कौस्तुभनाभाय वक्षः श्रीपतये तथा

jānuyugmaṁ nṛsiṁhāya uraḥ śrīvatsadhāriṇe kaṁṭhe kaustubhanābhāya vakṣaḥ śrīpataye tathā

—'नृसिंहाय' कहते हुए दोनों घुटनों को, 'श्रीवत्सधारिणे' कहते हुए वक्षःस्थल को, 'कौस्तुभनाभाय' कहते हुए कण्ठ को, 'श्रीपतये' कहते हुए वक्षःस्थल को ही—

श्लोक 19 (skanda.2.147.19)

त्रैलोक्यविजयायेति बाहुं सर्वात्मने शिरः ।। रथांगधारिणे वक्त्रं श्रीकरायेति वारिजम्

trailokyavijayāyeti bāhuṁ sarvātmane śiraḥ rathāṁgadhāriṇe vaktraṁ śrīkarāyeti vārijam

—'त्रैलोक्यविजयाय' कहते हुए भुजा को, 'सर्वात्मने' कहते हुए सिर को, 'रथांगधारिणे' कहते हुए मुख को, 'श्रीकराय' कहते हुए कमल-हस्त को—

श्लोक 20 (skanda.2.147.20)

गंभीरायेति च गदामंभोजं शांतमूर्तये ।। एवमभ्यर्च्य देवेशं देवं नारायणं प्रभुम्

gaṁbhīrāyeti ca gadāmaṁbhojaṁ śāṁtamūrtaye evamabhyarcya deveśaṁ devaṁ nārāyaṇaṁ prabhum

—'गंभीराय' कहते हुए गदा-हस्त को, 'शांतमूर्तये' कहते हुए कमल को स्पर्श करे। इस प्रकार देवाधिदेव भगवान नारायण की पूजा करके—

श्लोक 21 (skanda.2.147.21)

पुनस्तस्याऽग्रतः कुंभांश्चतुरः स्थापयेद्बुधः ।। जलपूर्णान्समाल्यांश्च सितचंदनलेपितान्

punastasyā'grataḥ kuṁbhāṁścaturaḥ sthāpayedbudhaḥ jalapūrṇānsamālyāṁśca sitacaṁdanalepitān

—बुद्धिमान पुरुष फिर उनके आगे जल से भरे, मालाओं से युक्त, श्वेत चन्दन से लिपे हुए चार कलश स्थापित करे—

श्लोक 22 (skanda.2.147.22)

चूतपल्लवसंयुक्तान्सितवस्त्रावगुंठितान् ।। छादितांस्ताम्रपात्रैश्च तिलपूर्णैः सकांचनैः

cūtapallavasaṁyuktānsitavastrāvaguṁṭhitān chāditāṁstāmrapātraiśca tilapūrṇaiḥ sakāṁcanaiḥ

—आम की टहनियों से युक्त, श्वेत वस्त्र से ढके हुए, तिल से भरे और स्वर्ण सहित ताम्रपात्रों से आच्छादित।

श्लोक 23 (skanda.2.147.23)

चत्वारस्तु समुद्राश्च कलशाः संप्रकीर्तिताः ।। तेषां मध्ये शुभं पीठं स्थापयेद्वस्त्रगर्भितम्

catvārastu samudrāśca kalaśāḥ saṁprakīrtitāḥ teṣāṁ madhye śubhaṁ pīṭhaṁ sthāpayedvastragarbhitam

ये चार कलश चार समुद्रों के प्रतीक कहे गए हैं; उनके बीच में वस्त्र से लपेटा हुआ एक शुभ पीठ स्थापित करे।

श्लोक 24 (skanda.2.147.24)

तस्मिन्सुवर्णं रौप्यं वा ताम्रं वा दारवं तथा ।। अलाभे सर्वपात्राणां पालाशं पात्रमिष्यते

tasminsuvarṇaṁ raupyaṁ vā tāmraṁ vā dāravaṁ tathā alābhe sarvapātrāṇāṁ pālāśaṁ pātramiṣyate

उस पर सोने का, चाँदी का, ताँबे का, अथवा लकड़ी का पात्र रखे; इन सभी पात्रों के अभाव में पलाश के पत्तों का पात्र भी उचित माना जाता है।

श्लोक 25 (skanda.2.147.25)

तोयपूर्णं च तत्कृत्वा तस्मिन्पात्रे ततो न्यसेत् ।। सौवर्णं मत्स्यरूपं च कृत्वा देवं जनार्दनम्

toyapūrṇaṁ ca tatkṛtvā tasminpātre tato nyaset sauvarṇaṁ matsyarūpaṁ ca kṛtvā devaṁ janārdanam

उसे जल से भरकर, उस पात्र में सुवर्ण से बनी मत्स्य के रूप वाली भगवान जनार्दन की मूर्ति रखे—

श्लोक 26 (skanda.2.147.26)

देवदेवांगसंयुक्तं श्रुतिस्मृतिविभूषितम् ।। तत्राऽनेकविधैर्भक्ष्यैः फलैः पुष्पैश्च शोभितम्

devadevāṁgasaṁyuktaṁ śrutismṛtivibhūṣitam tatrā'nekavidhairbhakṣyaiḥ phalaiḥ puṣpaiśca śobhitam

—देवाधिदेव के अंगों से युक्त, श्रुति और स्मृति से विभूषित; वहाँ नाना प्रकार के भक्ष्य पदार्थों, फलों और पुष्पों से सुशोभित करके—

श्लोक 27 (skanda.2.147.27)

गन्धैर्धूपैश्च वस्त्रैश्च अर्चयित्वा यथाविधि ।। रसातलगता वेदा यथादेव त्वयोद्धृताः

gandhairdhūpaiśca vastraiśca arcayitvā yathāvidhi rasātalagatā vedā yathādeva tvayoddhṛtāḥ

—गंध, धूप और वस्त्रों से विधिपूर्वक पूजा करके, [कहे] — 'हे देव! जैसे रसातल में डूबे वेदों को आपने उद्धृत किया—

श्लोक 28 (skanda.2.147.28)

मत्स्यरूपेण तद्वन्मां भवादुद्धर केशव ।। एवमुच्चार्य तस्याग्रे जागरं तत्र कारयेत् ।।

matsyarūpeṇa tadvanmāṁ bhavāduddhara keśava evamuccārya tasyāgre jāgaraṁ tatra kārayet

—उसी प्रकार, हे केशव! मत्स्य के रूप में मुझे भी संसार से उद्धार करो।' ऐसा कहकर उसके सामने वहाँ जागरण करना चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.147.29)

यथाविभवसारेण प्रभाते विमले तथा ।। चतुर्णां ब्राह्मणानां च चतुरो दापयेद्घटान्

yathāvibhavasāreṇa prabhāte vimale tathā caturṇāṁ brāhmaṇānāṁ ca caturo dāpayedghaṭān

अपनी सामर्थ्य के अनुसार, स्वच्छ प्रातःकाल में, चार ब्राह्मणों को चार घड़े देने चाहिए।

श्लोक 30 (skanda.2.147.30)

पूर्वं च बह्वृचे दद्याच्छांदोग्ये दक्षिणं तथा ।। यजुःशाखान्विते दद्यात्पश्चिमं घटमुत्तमम्

pūrvaṁ ca bahvṛce dadyācchāṁdogye dakṣiṇaṁ tathā yajuḥśākhānvite dadyātpaścimaṁ ghaṭamuttamam

बह्वृच (ऋग्वेदी) को पूर्व दिशा का, छांदोग्य (सामवेदी) को दक्षिण दिशा का, यजुःशाखा वाले को पश्चिम का उत्तम घड़ा देना चाहिए—

श्लोक 31 (skanda.2.147.31)

उत्तरं कामतो दद्यादेष एव विधिः स्मृतः ।। ऋग्वेदः प्रीयतां पूर्वं सामवेदस्तुदक्षिणे

uttaraṁ kāmato dadyādeṣa eva vidhiḥ smṛtaḥ ṛgvedaḥ prīyatāṁ pūrvaṁ sāmavedastudakṣiṇe

—और उत्तर दिशा का घड़ा इच्छानुसार देना चाहिए; यही विधि स्मृत है — पूर्व में 'ऋग्वेद प्रसन्न हों', दक्षिण में 'सामवेद प्रसन्न हों'—

श्लोक 32 (skanda.2.147.32)

यजुर्वेदः पश्चिमतो ह्यथर्वश्चोत्तरेण तु ।। अनेन क्रमयोगेन प्रीयतामिति वाचयेत्

yajurvedaḥ paścimato hyatharvaścottareṇa tu anena kramayogena prīyatāmiti vācayet

—पश्चिम में 'यजुर्वेद प्रसन्न हों' और उत्तर में 'अथर्ववेद प्रसन्न हों' — इसी क्रम से 'प्रसन्न हों' यह कहना चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.2.147.33)

मत्स्यरूपं तु सौवर्णमाचार्याय निवेदयेत् ।। गन्धधूपादि वस्त्रैस्तु संपूज्य विधिवत्क्रमात्

matsyarūpaṁ tu sauvarṇamācāryāya nivedayet gandhadhūpādi vastraistu saṁpūjya vidhivatkramāt

सुवर्ण की मत्स्य-मूर्ति को आचार्य को निवेदित करना चाहिए; गंध, धूप आदि तथा वस्त्रों से विधिपूर्वक क्रम से उसकी पूजा करके—

श्लोक 34 (skanda.2.147.34)

यस्त्विमं सरहस्यं च मन्त्रेणैवोपपादयेत् ।। विधानं विधिवद्दत्त्वा दाता कोटिगुणोत्तरम्

yastvimaṁ sarahasyaṁ ca mantreṇaivopapādayet vidhānaṁ vidhivaddattvā dātā koṭiguṇottaram

—जो इस रहस्य सहित विधान को मंत्र द्वारा भलीभाँति प्रदान करता है, वह विधिपूर्वक विधान देकर करोड़ गुना अधिक फल का दाता होता है।

श्लोक 35 (skanda.2.147.35)

प्रतिपद्य गुरुं यस्तु मोहाद्विप्रतिपद्यते ।। स जन्मकोटिं नरके पच्यते पुरुषाधमः

pratipadya guruṁ yastu mohādvipratipadyate sa janmakoṭiṁ narake pacyate puruṣādhamaḥ

जो गुरु के पास जाकर मोह के कारण उनका विरोध करता है, वह अधम पुरुष करोड़ों जन्मों तक नरक में पकाया जाता है।

श्लोक 36 (skanda.2.147.36)

विधानस्य प्रदाता यो गुरुरित्युच्यते बुधैः ।। एवं दत्वा विधानेन द्वादश्यां मां समर्चयेत्

vidhānasya pradātā yo gururityucyate budhaiḥ evaṁ datvā vidhānena dvādaśyāṁ māṁ samarcayet

जो इस विधान का दाता है, वह विद्वानों द्वारा 'गुरु' कहा जाता है; इस प्रकार विधिपूर्वक विधान देकर द्वादशी को मेरी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.2.147.37)

विप्राणां भोजनं दद्याद्यथाशक्त्या च दक्षिणाम् ।। भूरिणा परमान्नेन ततः पश्चात्स्वयं नरः

viprāṇāṁ bhojanaṁ dadyādyathāśaktyā ca dakṣiṇām bhūriṇā paramānnena tataḥ paścātsvayaṁ naraḥ

ब्राह्मणों को भोजन देना चाहिए तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए; प्रचुर उत्तम अन्न से, तत्पश्चात् मनुष्य स्वयं—

श्लोक 38 (skanda.2.147.38)

भुञ्जीत सहितो विप्रैर्वाग्यतः संयतेन्द्रियः ।। अनेन विधिना यस्तु कुर्यान्मत्स्योत्सवं नरः

bhuñjīta sahito viprairvāgyataḥ saṁyatendriyaḥ anena vidhinā yastu kuryānmatsyotsavaṁ naraḥ

—वाणी को संयत रखते हुए, इन्द्रियों को वश में करते हुए, ब्राह्मणों के साथ भोजन करे। जो मनुष्य इस विधि से मत्स्योत्सव करता है—

श्लोक 39 (skanda.2.147.39)

तस्य पुण्यफलं चाग्रे शृणु सत्यवतां वर ।। यदि वक्त्र सहस्राणां सहस्राणि भवंति हि

tasya puṇyaphalaṁ cāgre śṛṇu satyavatāṁ vara yadi vaktra sahasrāṇāṁ sahasrāṇi bhavaṁti hi

—हे सत्यवानों में श्रेष्ठ! उसके पुण्य-फल को आगे सुनो। यदि हजारों मुखों की भी हजारों संख्याएँ हो जाएँ—

श्लोक 40 (skanda.2.147.40)

आयुश्च ब्रह्मणा तुल्यं लभेद्यदि महाव्रत ।। तदा वै ह्यस्य धर्मस्य फलं कथयितुं भवेत्

āyuśca brahmaṇā tulyaṁ labhedyadi mahāvrata tadā vai hyasya dharmasya phalaṁ kathayituṁ bhavet

—और हे महाव्रती! यदि ब्रह्मा के समान आयु भी प्राप्त हो जाए, तब भी इस धर्म के फल का वर्णन करना संभव नहीं होगा।

श्लोक 41 (skanda.2.147.41)

य इमं श्रावयेद्भक्त्या द्वादशीकल्पमुत्तमम् ।। शृणोति वा स पापैस्तु सर्वैरेव विमुच्यते

ya imaṁ śrāvayedbhaktyā dvādaśīkalpamuttamam śṛṇoti vā sa pāpaistu sarvaireva vimucyate

जो भक्तिपूर्वक इस उत्तम द्वादशी-कल्प को सुनाता है, अथवा जो इसे सुनता भी है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

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