वैष्णव खण्ड · अध्याय 148
श्रीकृष्ण नाम माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.148.1)
।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। ये त्वया वै कृताः प्रश्नाः पूर्वं प्रश्नविदां वर ।। तान्वर्णयिष्ये क्रमशो निशामय सुनिश्चितम्
śrībhagavānuvāca ye tvayā vai kṛtāḥ praśnāḥ pūrvaṁ praśnavidāṁ vara tānvarṇayiṣye kramaśo niśāmaya suniścitam
श्रीभगवान ने कहा — हे प्रश्न जानने वालों में श्रेष्ठ! तुमने पूर्वकाल में जो प्रश्न पूछे थे, उन्हें मैं क्रमशः वर्णन करूँगा, ध्यानपूर्वक सुनो।
श्लोक 2 (skanda.2.148.2)
सहोमासे च देवो वै कीर्तियुक्तो हि केशवः ।। तस्य पूजा प्रकर्तव्या यथापूर्वं प्रभाषितम्
sahomāse ca devo vai kīrtiyukto hi keśavaḥ tasya pūjā prakartavyā yathāpūrvaṁ prabhāṣitam
सहोम मास में कीर्तियुक्त देव केशव ही हैं; उनकी पूजा पहले बताए अनुसार करनी चाहिए।
श्लोक 3 (skanda.2.148.3)
ब्राह्मणं केशवं स्मृत्वा तत्पत्नीं कीर्तिमेव च ।। दंपती विधिवत्पूज्यौ वस्त्राभरणधेनुभिः
brāhmaṇaṁ keśavaṁ smṛtvā tatpatnīṁ kīrtimeva ca daṁpatī vidhivatpūjyau vastrābharaṇadhenubhiḥ
ब्राह्मण को केशव और उसकी पत्नी को कीर्ति ही समझकर, उस दंपती की विधिपूर्वक वस्त्र, आभूषण और गौओं से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.148.4)
दम्पती पूजितौ वत्स पूजितोऽहं न संशयः।। तस्मादवश्यं संपूज्यौ दंपती मम तुष्टिदौ
dampatī pūjitau vatsa pūjito'haṁ na saṁśayaḥ tasmādavaśyaṁ saṁpūjyau daṁpatī mama tuṣṭidau
हे वत्स! जब दंपती की पूजा की जाती है, तब निःसंदेह मेरी ही पूजा होती है; इसलिए वह दंपती, जो मुझे संतोष देने वाले हैं, अवश्य पूजे जाने चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.2.148.5)
दानं च विविधं कार्यं मम तुष्टिकरं परम् ।। गोदानं भूमिदानं च स्वर्णदानं विशेषतः
dānaṁ ca vividhaṁ kāryaṁ mama tuṣṭikaraṁ param godānaṁ bhūmidānaṁ ca svarṇadānaṁ viśeṣataḥ
मुझे परम संतोष देने वाले विविध दान करने चाहिए — गोदान, भूमिदान, और विशेष रूप से स्वर्ण-दान—
श्लोक 6 (skanda.2.148.6)
वस्त्रदानं तथा शय्या तथाऽलंकरणानि च ।। सद्मदानं प्रकर्तव्यं मम सन्तोषकारकम्
vastradānaṁ tathā śayyā tathā'laṁkaraṇāni ca sadmadānaṁ prakartavyaṁ mama santoṣakārakam
—वस्त्र-दान, शय्या-दान, तथा आभूषण-दान भी; मुझे संतोष देने वाला गृह-दान भी करना चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.2.148.7)
सर्वेषामेव दानानां विशेषं च त्रिकं स्मृतम् ।। वसुन्धरा तथा धेनुर्विद्यादानं तथैव च
sarveṣāmeva dānānāṁ viśeṣaṁ ca trikaṁ smṛtam vasundharā tathā dhenurvidyādānaṁ tathaiva ca
समस्त दानों में एक विशेष त्रय स्मृत है — भूमि, गौ और उसी प्रकार विद्या-दान।
श्लोक 8 (skanda.2.148.8)
दत्ते दानत्रिके वत्स भवेत्प्रीतिर्ममाऽतुला ।। तस्मान्नरैस्तु कर्तव्यं सहोमासे त्रिकं शुभम्
datte dānatrike vatsa bhavetprītirmamā'tulā tasmānnaraistu kartavyaṁ sahomāse trikaṁ śubham
हे वत्स! यह त्रिविध दान दिए जाने पर मेरी प्रीति अतुलनीय हो जाती है; इसलिए मनुष्यों को सहोम मास में यह शुभ त्रय अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.2.148.9)
स्नानस्य च विधिः सम्यक्पुरैवोक्तो मयाऽनघ ।। पूजास्नानं च दानं च विधिरेष न संशयः
snānasya ca vidhiḥ samyakpuraivokto mayā'nagha pūjāsnānaṁ ca dānaṁ ca vidhireṣa na saṁśayaḥ
हे निष्पाप! स्नान की विधि पहले ही मेरे द्वारा भलीभाँति कही गई है; पूजा, स्नान और दान — यही विधि है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 10 (skanda.2.148.10)
मार्गशीर्षं समग्रं तु एकभक्तेन यः क्षिपेत् ।। भोजयेद्यो द्विजान्भक्त्या स मुच्येद्व्याधिकिल्विषैः
mārgaśīrṣaṁ samagraṁ tu ekabhaktena yaḥ kṣipet bhojayedyo dvijānbhaktyā sa mucyedvyādhikilviṣaiḥ
जो सम्पूर्ण मार्गशीर्ष मास एक समय के भोजन से बिताता है और भक्तिपूर्वक द्विजों को भोजन कराता है, वह रोगों और पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 11 (skanda.2.148.11)
कृषिभागी बहुधनो बहुधान्यश्च जायते ।। किमत्र बहुनोक्तेन शृणु गुह्यं पर मम
kṛṣibhāgī bahudhano bahudhānyaśca jāyate kimatra bahunoktena śṛṇu guhyaṁ para mama
वह अच्छी खेती वाला, बहुधनी और बहुधान्ययुक्त होता है। इसमें अधिक कहने से क्या लाभ — अब मेरा परम रहस्य सुनो।
श्लोक 12 (skanda.2.148.12)
हुतभुग्ब्राह्मणश्चैव वदनं मम मानद ।। ब्राह्मणाख्यं मुखं श्रेष्ठं न तथा हव्यवाहनः
hutabhugbrāhmaṇaścaiva vadanaṁ mama mānada brāhmaṇākhyaṁ mukhaṁ śreṣṭhaṁ na tathā havyavāhanaḥ
हे मानद! आहुति ग्रहण करने वाली अग्नि और ब्राह्मण दोनों मेरे ही मुख हैं; परन्तु ब्राह्मण नामक मुख श्रेष्ठ है, हव्यवाहक अग्नि उतनी नहीं।
श्लोक 13 (skanda.2.148.13)
ब्राह्मणाख्ये मुखे पुत्र हुतं कोटिगुणं भवेत् ।। अग्न्याख्यं ब्राह्मणाधीनं स्वतंत्रा ब्राह्मणाः किल
brāhmaṇākhye mukhe putra hutaṁ koṭiguṇaṁ bhavet agnyākhyaṁ brāhmaṇādhīnaṁ svataṁtrā brāhmaṇāḥ kila
हे पुत्र! ब्राह्मण नामक मुख में जो अर्पित किया जाता है, वह करोड़ गुना हो जाता है; अग्नि नामक मुख ब्राह्मण के अधीन है, जबकि ब्राह्मण स्वतंत्र हैं।
श्लोक 14 (skanda.2.148.14)
सशर्करं घृतयुतं पायसं शशिसन्निभम् ।। होतव्यं ब्राह्मणमुखे मम तुष्टिकरं सुत
saśarkaraṁ ghṛtayutaṁ pāyasaṁ śaśisannibham hotavyaṁ brāhmaṇamukhe mama tuṣṭikaraṁ suta
शक्कर सहित, घी से युक्त, चन्द्रमा के समान श्वेत पायस — हे पुत्र! ब्राह्मण के मुख में अर्पित करना चाहिए, जो मुझे अत्यंत संतोष देता है।
श्लोक 15 (skanda.2.148.15)
शुभमंडलमोदककोकरसं सुत फेनिकया घृतपूरयुतम् ।। यज विप्रमुखे मम तुष्टिकरं यदि चेच्छसि दारसुतादिसुखम्
śubhamaṁḍalamodakakokarasaṁ suta phenikayā ghṛtapūrayutam yaja vipramukhe mama tuṣṭikaraṁ yadi cecchasi dārasutādisukham
हे पुत्र! शुभ मण्डक, मोदक, कोकरस, तथा घी में डूबी फेणिका — यदि तुम पत्नी, पुत्र आदि का सुख चाहते हो तो इन्हें ब्राह्मण के मुख में अर्पित करो, जो मुझे संतोष देता है।
श्लोक 16 (skanda.2.148.16)
कुमुदेन समप्रभसौरभदं शुभभक्तयुतं त्वथ मुद्गयुतम् ।। सुरभीकृतपुष्कलसर्पिसमं कुरु विप्रमुखे हवनं हि सहे
kumudena samaprabhasaurabhadaṁ śubhabhaktayutaṁ tvatha mudgayutam surabhīkṛtapuṣkalasarpisamaṁ kuru vipramukhe havanaṁ hi sahe
कुमुद के समान सुगंधित, शुभ भक्ष्यों से युक्त, मूँग सहित, प्रचुर सुगंधित घी के समान — हे पुत्र! सहोम मास में ब्राह्मण के मुख में हवन करो।
श्लोक 17 (skanda.2.148.17)
पयसा सह सर्पिषि च क्वथितं बहुखारिकचारफलैः सितया ।। सह कर्पुरनारिफलेन समं युतसीकरकं सुत शुभ्रकरम्
payasā saha sarpiṣi ca kvathitaṁ bahukhārikacāraphalaiḥ sitayā saha karpuranāriphalena samaṁ yutasīkarakaṁ suta śubhrakaram
दूध और घी में पकाया हुआ, प्रचुर सूखे अंगूर और सुपारी के फलों से युक्त, शक्कर सहित, कर्पूर और नारियल फल के साथ समान रूप से मिश्रित, बूँदों से युक्त, उज्ज्वल — हे पुत्र! यह भी अर्पित करो।
श्लोक 18 (skanda.2.148.18)
व्यंजनानि च शुभ्राणि मनोज्ञानि प्रियाणि च ।। कर्त्तव्यानि सहोमासे ब्राह्मणार्थे चतुर्मुख
vyaṁjanāni ca śubhrāṇi manojñāni priyāṇi ca karttavyāni sahomāse brāhmaṇārthe caturmukha
हे चतुर्मुख! सहोम मास में ब्राह्मणों के लिए उज्ज्वल, मनोहर और प्रिय व्यंजन बनाने चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.2.148.19)
प्रिया शिखरिणी कार्या चान्यत्तेषां प्रियं च यत् ।। कृत्वैवं भोजयेद्विप्राञ्छ्रद्धया परया सुत
priyā śikhariṇī kāryā cānyatteṣāṁ priyaṁ ca yat kṛtvaivaṁ bhojayedviprāñchraddhayā parayā suta
प्रिय शिखरिणी (दही से बना मिष्ठान्न) बनानी चाहिए, तथा उन्हें जो भी अन्य प्रिय हो; हे पुत्र! इस प्रकार तैयार करके परम श्रद्धा से ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.2.148.20)
रसास्वादनपूर्वं हि भुञ्जते वै यथायथा ।। तथातथा मम प्रीतिर्जायते भुवि दुर्लभा
rasāsvādanapūrvaṁ hi bhuñjate vai yathāyathā tathātathā mama prītirjāyate bhuvi durlabhā
वे जितने-जितने स्वाद का आनंद लेते हुए भोजन करते हैं, उतनी ही उतनी मेरी प्रीति, जो पृथ्वी पर दुर्लभ है, उत्पन्न होती है।
श्लोक 21 (skanda.2.148.21)
तस्मात्तत्तत्तथा कार्यं यथा तुष्यंति ब्राह्मणाः ।। तुष्टैस्तैश्चाप्यहं तुष्टो भवामीह न संशयः
tasmāttattattathā kāryaṁ yathā tuṣyaṁti brāhmaṇāḥ tuṣṭaistaiścāpyahaṁ tuṣṭo bhavāmīha na saṁśayaḥ
इसलिए वही करना चाहिए जिससे ब्राह्मण प्रसन्न हों; उनके प्रसन्न होने पर मैं भी यहाँ निःसंदेह प्रसन्न होता हूँ।
श्लोक 22 (skanda.2.148.22)
श्रद्धत्स्व त्वं चतुर्वक्त्र न ते मिथ्या ब्रवीम्यहम् ।। एतद्गुह्यं मया प्रोक्तं श्रेयोर्थं तव मानद
śraddhatsva tvaṁ caturvaktra na te mithyā bravīmyaham etadguhyaṁ mayā proktaṁ śreyorthaṁ tava mānada
हे चतुर्मुख! इस पर विश्वास करो, मैं तुमसे झूठ नहीं कहता; हे मानद! यह रहस्य मैंने तुम्हारे कल्याण के लिए कहा है।
श्लोक 23 (skanda.2.148.23)
आक्रोशयंति यदि ते अथवा प्रहरंति चेत् ।। तथापि ते नमस्या वै मम प्रीत्या हि मानद
ākrośayaṁti yadi te athavā praharaṁti cet tathāpi te namasyā vai mama prītyā hi mānada
यदि वे तुम्हें डाँटें अथवा तुम पर प्रहार भी करें, तब भी हे मानद! मेरी प्रीति के लिए वे नमस्करणीय ही हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.148.24)
एवं कार्यं सदा पुत्र मार्गशीर्षे विशेषतः ।। यदुक्तं भवता ब्रह्मन्भोक्तव्यं किं शृणुष्व तत्
evaṁ kāryaṁ sadā putra mārgaśīrṣe viśeṣataḥ yaduktaṁ bhavatā brahmanbhoktavyaṁ kiṁ śṛṇuṣva tat
हे पुत्र! ऐसा सदा करना चाहिए, विशेष रूप से मार्गशीर्ष में। हे ब्रह्मन्! तुमने जो पूछा था कि क्या भोजन करना चाहिए, वह सुनो।
श्लोक 25 (skanda.2.148.25)
भोक्तव्यं मम चोच्छिष्टं मम भक्तिपरायणैः ।। पवित्रकरणं पुत्र पापिनामपि मुक्तिदम्
bhoktavyaṁ mama cocchiṣṭaṁ mama bhaktiparāyaṇaiḥ pavitrakaraṇaṁ putra pāpināmapi muktidam
मेरी भक्ति में तत्पर लोगों को मेरा उच्छिष्ट (जूठा) भोजन करना चाहिए; हे पुत्र! यह पवित्र करने वाला है और पापियों को भी मुक्ति देने वाला है।
श्लोक 26 (skanda.2.148.26)
ममाशनस्य शेषं च यो भुनक्ति दिनेदिने ।। सिक्थेसिक्थे भवेत्पुण्यं चांद्रायणशतोद्भवम्
mamāśanasya śeṣaṁ ca yo bhunakti dinedine sikthesikthe bhavetpuṇyaṁ cāṁdrāyaṇaśatodbhavam
जो प्रतिदिन मेरे भोजन का शेष खाता है, उसे प्रत्येक चावल के दाने के लिए सौ चांद्रायण व्रतों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।
श्लोक 27 (skanda.2.148.27)
अवशिष्टं तथोच्छिष्टं भक्तानां भोजनद्वयम् ।। नाऽन्यद्वै भोजनं तेषां भुक्त्वा चांद्रायणं चरेत्
avaśiṣṭaṁ tathocchiṣṭaṁ bhaktānāṁ bhojanadvayam nā'nyadvai bhojanaṁ teṣāṁ bhuktvā cāṁdrāyaṇaṁ caret
शेष और उच्छिष्ट — यही भक्तों के लिए दो भोजन हैं; उनके लिए कोई अन्य भोजन नहीं है, और यह खाकर वे मानो चांद्रायण व्रत का ही आचरण करते हैं।
श्लोक 28 (skanda.2.148.28)
अनर्पयित्वा यो भुंक्ते अन्नपानादिकं च यत् ।। श्वानविष्ठासमं चान्नं पानं च मदिरासमम् ।।
anarpayitvā yo bhuṁkte annapānādikaṁ ca yat śvānaviṣṭhāsamaṁ cānnaṁ pānaṁ ca madirāsamam
जो बिना अर्पित किए अन्न-पान आदि खाता-पीता है, उसका अन्न कुत्ते की विष्ठा के समान और पेय मदिरा के समान है।
श्लोक 29 (skanda.2.148.29)
तस्मान्मामर्पयेत्पुत्र अन्नपानादि चौषधम् ।। भक्षयेत्परया भक्त्या अशुचेः शुचिकारकम्
tasmānmāmarpayetputra annapānādi cauṣadham bhakṣayetparayā bhaktyā aśuceḥ śucikārakam
इसलिए, हे पुत्र! अन्न, पान और औषधि तक मुझे ही अर्पित करनी चाहिए; परम भक्ति से उसे ग्रहण करना चाहिए, जो अशुद्ध को भी शुद्ध करने वाला है।
श्लोक 30 (skanda.2.148.30)
तीर्थयज्ञादिकफलं कलिदोषविनाशनम् ।। ममोच्छिष्टं सुगतिदमपि दुष्कृतकर्मणाम्
tīrthayajñādikaphalaṁ kalidoṣavināśanam mamocchiṣṭaṁ sugatidamapi duṣkṛtakarmaṇām
तीर्थ और यज्ञ आदि के फल के समान, कलिकाल के दोष का नाश करने वाला मेरा उच्छिष्ट, दुष्कर्मियों को भी सद्गति देने वाला है।
श्लोक 31 (skanda.2.148.31)
अन्येषां दैवतानां च न गृह्णीयाच्च भक्षितम् ।। अभक्तानां च पक्वान्नं भुक्त्वा च नरकं व्रजेत्
anyeṣāṁ daivatānāṁ ca na gṛhṇīyācca bhakṣitam abhaktānāṁ ca pakvānnaṁ bhuktvā ca narakaṁ vrajet
अन्य देवताओं के जूठे भोजन को ग्रहण नहीं करना चाहिए, और न ही अभक्तों का पका हुआ अन्न; उसे खाकर मनुष्य नरक को जाता है।
श्लोक 32 (skanda.2.148.32)
वक्तव्यमेव यत्प्रोक्तं तच्छृणुष्व समाहितः ।। कथयिष्ये तव प्रीत्या अपि गुह्यतरं मम
vaktavyameva yatproktaṁ tacchṛṇuṣva samāhitaḥ kathayiṣye tava prītyā api guhyataraṁ mama
अब जो और कहना है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो; तुम्हारी प्रीति के लिए मैं अपना और भी गूढ़तर रहस्य बताऊँगा।
श्लोक 33 (skanda.2.148.33)
मम नाम प्रवक्तव्यं सहे चैव विशेषतः ।। कृष्णकृष्णेति वक्तव्यं मम प्रीतिकरं परम्
mama nāma pravaktavyaṁ sahe caiva viśeṣataḥ kṛṣṇakṛṣṇeti vaktavyaṁ mama prītikaraṁ param
सहोम मास में विशेष रूप से मेरे नाम का उच्चारण करना चाहिए; 'कृष्ण-कृष्ण' कहना चाहिए, जो मुझे परम प्रिय है।
श्लोक 34 (skanda.2.148.34)
प्रतिज्ञैषा च मे पुत्र न जानंति सुरासुराः ।। मनसा कर्मणा वाचा यो मे शरणमागतः ।।
pratijñaiṣā ca me putra na jānaṁti surāsurāḥ manasā karmaṇā vācā yo me śaraṇamāgataḥ
हे पुत्र! मेरा यह वचन देवता और असुर भी नहीं जानते — जो कोई मन, कर्म और वाणी से मेरी शरण में आता है—
श्लोक 35 (skanda.2.148.35)
स हि सर्वामवाप्नोति कामनामिह लौकिकीम् ।। सर्वोत्कृष्टं च वैकुण्ठं मत्प्रियां कमलामपि
sa hi sarvāmavāpnoti kāmanāmiha laukikīm sarvotkṛṣṭaṁ ca vaikuṇṭhaṁ matpriyāṁ kamalāmapi
—वह यहाँ सांसारिक समस्त कामनाओं को, और सबसे उत्कृष्ट वैकुण्ठ को, तथा मुझे प्रिय कमला (लक्ष्मी) को भी प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 36 (skanda.2.148.36)
कृष्णकृष्णेति कृष्णेति यो मां स्मरति नित्यशः ।। जलं भित्त्वा यथा पद्मं नरकादुद्धराम्यहम्
kṛṣṇakṛṣṇeti kṛṣṇeti yo māṁ smarati nityaśaḥ jalaṁ bhittvā yathā padmaṁ narakāduddharāmyaham
जो सदा 'कृष्ण-कृष्ण-कृष्ण' कहकर मेरा स्मरण करता है, उसे मैं वैसे ही नरक से उद्धार करता हूँ जैसे कमल जल को भेदकर ऊपर आता है।
श्लोक 37 (skanda.2.148.37)
विनोदेनाऽपि दंभेन मौढ्याल्लोभाच्छलादपि ।। यो मां भजत्यसौ वत्स मद्भक्तो नाऽवसीदति
vinodenā'pi daṁbhena mauḍhyāllobhācchalādapi yo māṁ bhajatyasau vatsa madbhakto nā'vasīdati
हे वत्स! जो खेल-खेल में, दंभवश, मूर्खतावश, लोभवश, अथवा छल से भी मुझे भजता है, वह मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 38 (skanda.2.148.38)
ये वै पठंति कृष्णेति मरणे पर्युपस्थिते ।। यदि पापयुताः पुत्र न पश्यंति यमं क्वचित्
ye vai paṭhaṁti kṛṣṇeti maraṇe paryupasthite yadi pāpayutāḥ putra na paśyaṁti yamaṁ kvacit
हे पुत्र! जो मृत्यु के समय 'कृष्ण' का पाठ करते हैं, वे यदि पापयुक्त भी हों, तो भी उन्हें यम कहीं दिखाई नहीं देता।
श्लोक 39 (skanda.2.148.39)
पूर्वे वयसि पापानि कृतान्यपि च कृत्स्नशः ।। अंतकाले च कृष्णेति स्मृत्वा मामेत्यसंशयम्
pūrve vayasi pāpāni kṛtānyapi ca kṛtsnaśaḥ aṁtakāle ca kṛṣṇeti smṛtvā māmetyasaṁśayam
जिसने पूर्व आयु में सम्पूर्ण रूप से पाप ही किए हों, वह भी अंतकाल में 'कृष्ण' का स्मरण करके निःसंदेह मुझे प्राप्त होता है।
श्लोक 40 (skanda.2.148.40)
नमः कृष्णाय महते विवशोऽपि वदेद्यदि ।। ध्रुवं पदमवाप्नोति मरणे पर्युपस्थिते
namaḥ kṛṣṇāya mahate vivaśo'pi vadedyadi dhruvaṁ padamavāpnoti maraṇe paryupasthite
मृत्यु के समय विवश होकर भी यदि कोई 'महान कृष्ण को नमस्कार' कहे, तो वह निश्चय ही परम पद प्राप्त करता है।
श्लोक 41 (skanda.2.148.41)
श्रीकृष्णेति कृतोच्चारैः प्राणैर्यदि वियुज्यते ।। दूरस्थः पश्यति च तं स्वर्गतं प्रेतनायकः
śrīkṛṣṇeti kṛtoccāraiḥ prāṇairyadi viyujyate dūrasthaḥ paśyati ca taṁ svargataṁ pretanāyakaḥ
यदि 'श्रीकृष्ण' का उच्चारण करते हुए प्राण निकल जाएँ, तो यमराज दूर से ही उसे स्वर्ग को जाता हुआ देखते हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.148.42)
श्मशाने यदि रथ्यायां कृष्णकृष्णेति जल्पति ।। म्रियते यदि चेत्पुत्र मामेवैति न संशयः
śmaśāne yadi rathyāyāṁ kṛṣṇakṛṣṇeti jalpati mriyate yadi cetputra māmevaiti na saṁśayaḥ
हे पुत्र! यदि श्मशान में अथवा सड़क पर भी कोई 'कृष्ण-कृष्ण' कहते हुए मरता है, तो वह निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होता है।
श्लोक 43 (skanda.2.148.43)
दर्शनात्मम भक्तानां मृत्युमाप्नोति यः क्वचित् ।। विना मत्स्मरणात्पुत्र मुक्तिमेति स मानवः
darśanātmama bhaktānāṁ mṛtyumāpnoti yaḥ kvacit vinā matsmaraṇātputra muktimeti sa mānavaḥ
हे पुत्र! जो मनुष्य मेरे भक्तों के दर्शन मात्र से मृत्यु प्राप्त करता है, वह मेरा स्मरण किए बिना भी मुक्ति को प्राप्त करता है।
श्लोक 44 (skanda.2.148.44)
पापानलस्य दीप्तस्य भयं मा कुरु पुत्रक ।। श्रीकृष्णनाममेघोत्थैः सिच्यते नीरबिंदुभिः
pāpānalasya dīptasya bhayaṁ mā kuru putraka śrīkṛṣṇanāmameghotthaiḥ sicyate nīrabiṁdubhiḥ
हे पुत्र! प्रज्वलित पाप-अग्नि से मत डरो; वह श्रीकृष्ण-नाम रूपी मेघ से उत्पन्न जल-बिंदुओं से बुझ जाती है।
श्लोक 45 (skanda.2.148.45)
कलिकालभुजंगस्य तीक्ष्णदंष्ट्रस्य किं भयम् ।। श्रीकृष्णनामदारूत्थवह्निदग्धः स नश्यति
kalikālabhujaṁgasya tīkṣṇadaṁṣṭrasya kiṁ bhayam śrīkṛṣṇanāmadārūtthavahnidagdhaḥ sa naśyati
तीक्ष्ण दाढ़ों वाले कलिकाल रूपी सर्प का क्या भय है? वह श्रीकृष्ण-नाम रूपी काष्ठ से उत्पन्न अग्नि से जलकर नष्ट हो जाता है।
श्लोक 46 (skanda.2.148.46)
पापपावकदग्धानां कर्मचेष्टावियोगिनाम् ।। भेषजं नास्ति मर्त्यानां श्रीकृष्णस्मरणं विना
pāpapāvakadagdhānāṁ karmaceṣṭāviyoginām bheṣajaṁ nāsti martyānāṁ śrīkṛṣṇasmaraṇaṁ vinā
पाप की अग्नि से जले हुए, कर्म-सामर्थ्य खो चुके मनुष्यों के लिए श्रीकृष्ण के स्मरण के अतिरिक्त कोई औषधि नहीं है।
श्लोक 47 (skanda.2.148.47)
प्रयागे वै यथा गंगा शुक्लतीर्थे च नर्मदा ।। सरस्वती कुरुक्षेत्रे तद्वच्छ्रीकृष्णकीर्तनम्
prayāge vai yathā gaṁgā śuklatīrthe ca narmadā sarasvatī kurukṣetre tadvacchrīkṛṣṇakīrtanam
जैसे प्रयाग में गंगा, शुक्ल-तीर्थ में नर्मदा, और कुरुक्षेत्र में सरस्वती है, वैसे ही श्रीकृष्ण का कीर्तन है।
श्लोक 48 (skanda.2.148.48)
भवांभोधिनिमग्नानां महापापोर्मिपातिनाम् ।। न गतिर्मानवानां च श्रीकृष्णस्मरणं विना
bhavāṁbhodhinimagnānāṁ mahāpāpormipātinām na gatirmānavānāṁ ca śrīkṛṣṇasmaraṇaṁ vinā
संसार-सागर में डूबे हुए, महापाप की लहरों से आहत मनुष्यों के लिए श्रीकृष्ण के स्मरण के अतिरिक्त कोई गति नहीं है।
श्लोक 49 (skanda.2.148.49)
मृत्युकालेऽपि मर्त्यानां पापिनां तदनिच्छताम् ।। गच्छतां नाऽस्ति पाथेयं श्रीकृष्णस्मरणं विना
mṛtyukāle'pi martyānāṁ pāpināṁ tadanicchatām gacchatāṁ nā'sti pātheyaṁ śrīkṛṣṇasmaraṇaṁ vinā
मृत्यु के समय, इच्छा न रखने वाले पापी मनुष्यों के लिए भी, श्रीकृष्ण के स्मरण के अतिरिक्त यात्रा के लिए कोई पाथेय (संबल) नहीं है।
श्लोक 50 (skanda.2.148.50)
तत्र पुत्र गया काशी पुष्करं कुरुजांगलम् ।। प्रत्यहं मंदिरे यस्य कृष्णकृष्णेति कीर्तनम्
tatra putra gayā kāśī puṣkaraṁ kurujāṁgalam pratyahaṁ maṁdire yasya kṛṣṇakṛṣṇeti kīrtanam
हे पुत्र! गया, काशी, पुष्कर और कुरुजांगल — ये सब उस मंदिर के समान हैं जहाँ प्रतिदिन 'कृष्ण-कृष्ण' का कीर्तन होता है।
श्लोक 51 (skanda.2.148.51)
जीवितं जन्मसाफल्यं सुखं तस्यैव सार्थकम् ।। सततं रसना यस्य कृष्णकृष्णेति जल्पति
jīvitaṁ janmasāphalyaṁ sukhaṁ tasyaiva sārthakam satataṁ rasanā yasya kṛṣṇakṛṣṇeti jalpati
जिसकी जिह्वा निरंतर 'कृष्ण-कृष्ण' कहती रहती है, उसी का जीवन, जन्म की सफलता और सुख सार्थक है।
श्लोक 52 (skanda.2.148.52)
सकृदुच्चरितं येन हरिरित्यक्षरद्वयम् ।। बद्धः परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति
sakṛduccaritaṁ yena harirityakṣaradvayam baddhaḥ parikarastena mokṣāya gamanaṁ prati
जिसके द्वारा 'हरि' यह दो अक्षर एक बार भी उच्चारित किए गए हों, उसके द्वारा मोक्ष की ओर जाने के लिए मानो कमर बाँध ली गई है।
श्लोक 53 (skanda.2.148.53)
नाम्नोऽस्य यावती शक्तिः पापनिर्दहने मम ।। तावत्कर्तुं न शक्नोति पातकं पातकी जनः
nāmno'sya yāvatī śaktiḥ pāpanirdahane mama tāvatkartuṁ na śaknoti pātakaṁ pātakī janaḥ
मेरे इस नाम में पाप को जलाने की जितनी शक्ति है, पापी मनुष्य उतना पाप कर ही नहीं सकता।
श्लोक 54 (skanda.2.148.54)
नाऽपविद्धं भवेत्तस्य शरीरं नैव मानसम् ।। न पापं न च वैक्लव्यं कृष्णकृष्णेति कीर्तनात्
nā'paviddhaṁ bhavettasya śarīraṁ naiva mānasam na pāpaṁ na ca vaiklavyaṁ kṛṣṇakṛṣṇeti kīrtanāt
'कृष्ण-कृष्ण' के कीर्तन से न उसका शरीर विकृत होता है, न मन; न पाप होता है, न व्याकुलता।
श्लोक 55 (skanda.2.148.55)
श्रीकृष्णेति वचः पथ्यं न त्यजेद्यः कलौ नरः ।। पापामयो वै न भवेत्कलौ तस्यैव मानसे
śrīkṛṣṇeti vacaḥ pathyaṁ na tyajedyaḥ kalau naraḥ pāpāmayo vai na bhavetkalau tasyaiva mānase
जो मनुष्य कलियुग में 'श्रीकृष्ण' शब्द के हितकर मार्ग को नहीं त्यागता, कलियुग में उसके मन में पाप रूपी रोग उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 56 (skanda.2.148.56)
श्रीकृष्णेति प्रजल्पंतं दक्षिणाशापतिर्नरम् ।। श्रुत्वा मार्जयते पापं तस्य जन्मशतार्जितम्
śrīkṛṣṇeti prajalpaṁtaṁ dakṣiṇāśāpatirnaram śrutvā mārjayate pāpaṁ tasya janmaśatārjitam
'श्रीकृष्ण' कहते हुए मनुष्य को सुनकर दक्षिण दिशा के स्वामी (यम) भी उसके सैकड़ों जन्मों में अर्जित पाप को मिटा देते हैं।
श्लोक 57 (skanda.2.148.57)
चांद्रायणशतैः पापं पराकाणां सहस्रकैः ।। यन्नापयाति तद्याति कृष्णकृष्णेति कीर्तनात् ।।
cāṁdrāyaṇaśataiḥ pāpaṁ parākāṇāṁ sahasrakaiḥ yannāpayāti tadyāti kṛṣṇakṛṣṇeti kīrtanāt
सौ चांद्रायण व्रतों से, हजारों पराक व्रतों से भी जो पाप नहीं जाता, वह 'कृष्ण-कृष्ण' के कीर्तन से चला जाता है।
श्लोक 58 (skanda.2.148.58)
नान्याभिर्नामकोटीभिस्तोषो मम भवेत्क्वचित् ।। श्रीकृष्णेति कृतोच्चारे प्रीतिरेवाऽधिकाधिका
nānyābhirnāmakoṭībhistoṣo mama bhavetkvacit śrīkṛṣṇeti kṛtoccāre prītirevā'dhikādhikā
अन्य करोड़ों नामों से मुझे कभी वैसा संतोष नहीं होता; 'श्रीकृष्ण' के उच्चारण से मेरी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती ही जाती है।
श्लोक 59 (skanda.2.148.59)
चंद्रसूर्योपरागैस्तु कोटीभिर्यत्फलं स्मृतम् ।। तत्फलं समवाप्नोति कृष्णकृष्णेति कीर्तनात्
caṁdrasūryoparāgaistu koṭībhiryatphalaṁ smṛtam tatphalaṁ samavāpnoti kṛṣṇakṛṣṇeti kīrtanāt
चन्द्र और सूर्य के करोड़ों ग्रहणों से जो फल स्मृत है, वही फल 'कृष्ण-कृष्ण' के कीर्तन से पूर्ण रूप से प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 60 (skanda.2.148.60)
गुरुदाराभिगमनं हेमस्तेयादि पातकम् ।। श्रीकृष्णकीर्तनाद्याति घर्मतप्तं हिमं यथा
gurudārābhigamanaṁ hemasteyādi pātakam śrīkṛṣṇakīrtanādyāti gharmataptaṁ himaṁ yathā
गुरु-पत्नी के पास जाने का, स्वर्ण-चोरी आदि का पाप, श्रीकृष्ण-कीर्तन से वैसे ही चला जाता है जैसे धूप में पड़ी हुई बर्फ पिघल जाती है।
श्लोक 61 (skanda.2.148.61)
युक्तो यदि महापापैरगम्यागमनादिभिः ।। मुच्यते चांतकालेऽपि सकृच्छ्रीकृष्णकीर्तनात् ।।
yukto yadi mahāpāpairagamyāgamanādibhiḥ mucyate cāṁtakāle'pi sakṛcchrīkṛṣṇakīrtanāt
यदि कोई अगम्यागमन आदि महापापों से युक्त हो, तो भी वह मृत्यु के समय एक बार श्रीकृष्ण-कीर्तन करने मात्र से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 62 (skanda.2.148.62)
अविशुद्धमना यस्तु विनाप्याचारवर्तनात् ।। प्रेतत्वं सोऽपि नाप्नोति अन्ते श्रीकृष्णकीर्तनात्
aviśuddhamanā yastu vināpyācāravartanāt pretatvaṁ so'pi nāpnoti ante śrīkṛṣṇakīrtanāt
जो अशुद्ध मन वाला है, जिसका आचार-व्यवहार भी शुद्ध नहीं है, वह भी अंत में श्रीकृष्ण-कीर्तन से प्रेत-योनि को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 63 (skanda.2.148.63)
मुखे भवतु मा जिह्वाऽसती यातु रसातलम् ।। न सा चेत्कलिकाले या श्रीकृष्णगुणवादिनी
mukhe bhavatu mā jihvā'satī yātu rasātalam na sā cetkalikāle yā śrīkṛṣṇaguṇavādinī
मुख में स्थित वह जिह्वा जो श्रीकृष्ण के गुणों का वर्णन नहीं करती, वह कलिकाल में असती है — वह भले ही रसातल को चली जाए।
श्लोक 64 (skanda.2.148.64)
स्ववक्त्रे परवक्त्रे च वंद्या जिह्वा प्रयत्नतः ।। कुरुते या कलौ पुत्र श्रीकृष्ण गुणकीर्तनम्
svavaktre paravaktre ca vaṁdyā jihvā prayatnataḥ kurute yā kalau putra śrīkṛṣṇa guṇakīrtanam
हे पुत्र! जो जिह्वा कलियुग में प्रयत्नपूर्वक श्रीकृष्ण के गुणों का कीर्तन करती है, वह अपने और दूसरे के मुख में वंदनीय है।
श्लोक 65 (skanda.2.148.65)
पापवल्ली मुखे तस्य जिह्वारूपेण कीर्त्यते ।। या न वक्ति दिवारात्रौ श्रीकृष्णगुणकीर्तनम्
pāpavallī mukhe tasya jihvārūpeṇa kīrtyate yā na vakti divārātrau śrīkṛṣṇaguṇakīrtanam
जो जिह्वा दिन-रात श्रीकृष्ण के गुणों का कीर्तन नहीं करती, वह मुख में जिह्वा के रूप में उगी हुई पाप की लता ही कही जाती है।
श्लोक 66 (skanda.2.148.66)
पततां शतखण्डा तु सा जिह्वा रोगरूपिणी ।। श्रीकृष्णकृष्णकृष्णेति श्रीकृष्णेति न जल्पति
patatāṁ śatakhaṇḍā tu sā jihvā rogarūpiṇī śrīkṛṣṇakṛṣṇakṛṣṇeti śrīkṛṣṇeti na jalpati
जो 'श्रीकृष्ण-कृष्ण-कृष्ण', 'श्रीकृष्ण' नहीं कहती, वह रोग-रूपिणी जिह्वा गिरते ही सौ टुकड़ों में बिखर जाती है।
श्लोक 67 (skanda.2.148.67)
श्रीकृष्णनाममाहात्म्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् ।। तस्याऽहं श्रेयसां दाता भवाम्येव न संशयः
śrīkṛṣṇanāmamāhātmyaṁ prātarutthāya yaḥ paṭhet tasyā'haṁ śreyasāṁ dātā bhavāmyeva na saṁśayaḥ
जो प्रातःकाल उठकर श्रीकृष्ण के नाम के इस माहात्म्य का पाठ करता है, उसे मैं निःसंदेह समस्त कल्याणों का दाता बनता हूँ।
श्लोक 68 (skanda.2.148.68)
श्रीकृष्णनाममाहात्म्यं त्रिसंध्यं हि पठेत्तु यः ।। सर्वान्कामानवाप्नोति स मृतः परमां गतिम्
śrīkṛṣṇanāmamāhātmyaṁ trisaṁdhyaṁ hi paṭhettu yaḥ sarvānkāmānavāpnoti sa mṛtaḥ paramāṁ gatim
जो श्रीकृष्ण के नाम के इस माहात्म्य का त्रिकाल पाठ करता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है, और मृत्यु के बाद परम गति पाता है।