वैष्णव खण्ड · अध्याय 149
भागवत की श्रेष्ठता के माहात्म्य का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.149.1)
।।श्रीभगवानुवाच।। ।। शृणु ध्यानं चतुर्वक्त्र वक्ष्यामि प्रीतमानसः ।। श्रुतेनैव च सौभाग्यं लभते मानवो भुवि
śrībhagavānuvāca śṛṇu dhyānaṁ caturvaktra vakṣyāmi prītamānasaḥ śrutenaiva ca saubhāgyaṁ labhate mānavo bhuvi
श्रीभगवान ने कहा — हे चतुर्मुख! ध्यान सुनो, मैं प्रसन्नचित्त होकर वर्णन करूँगा। इसे सुनने मात्र से ही मनुष्य पृथ्वी पर सौभाग्य प्राप्त करता है।
श्लोक 2 (skanda.2.149.2)
अथ श्रीमदुद्यानसंवीतहैमस्थलोद्भासिरत्नस्फुरन्मंडपांतः ।। लसत्कल्पवृक्षोदितोद्दीप्तरत्नस्थलाधिष्ठितांभोजपीठाऽधिरूढम्
atha śrīmadudyānasaṁvītahaimasthalodbhāsiratnasphuranmaṁḍapāṁtaḥ lasatkalpavṛkṣoditoddīptaratnasthalādhiṣṭhitāṁbhojapīṭhā'dhirūḍham
फिर, उद्यान से घिरे स्वर्ण-तल पर स्थित, चमकते रत्नों वाले मण्डप के भीतर, कल्पवृक्षों के नीचे उदित तेजस्वी रत्नमय भूमि पर रखे कमल-आसन पर आरूढ़—
श्लोक 3 (skanda.2.149.3)
महानीलनीलाभमत्यंतबालं गुडस्निग्धवक्त्रांतविस्रस्तकेशम् ।। अलिव्रातपर्याकुलोत्फुल्लपद्मप्रमुग्धाननं श्रीमदिंदीवराक्षम्
mahānīlanīlābhamatyaṁtabālaṁ guḍasnigdhavaktrāṁtavisrastakeśam alivrātaparyākulotphullapadmapramugdhānanaṁ śrīmadiṁdīvarākṣam
—महानील मणि के समान श्याम, अत्यंत बाल-रूप, गुड़ के समान चिकने मुख पर बिखरे केशों वाले, भ्रमरों से घिरे खिले कमल जैसे मनोहर मुख वाले, कमल-नेत्र, अत्यंत शोभायमान—
श्लोक 4 (skanda.2.149.4)
चलत्कुंडलोल्लासितोत्फुल्लगल्लं सुघोणं सुशोणाधरं सुस्मितास्यम् ।। अनेकोल्लसत्कंठभूषालसंतं वहंतं नखं पौंडरीकं सुनेत्रम्
calatkuṁḍalollāsitotphullagallaṁ sughoṇaṁ suśoṇādharaṁ susmitāsyam anekollasatkaṁṭhabhūṣālasaṁtaṁ vahaṁtaṁ nakhaṁ pauṁḍarīkaṁ sunetram
—हिलते कुण्डलों से चमकती गालों वाले, सुंदर नासिका, लाल अधरों, मंद मुस्कान वाले मुख के, कण्ठ में अनेक चमकते आभूषणों वाले, श्वेत कमल-सम नखों और सुंदर नेत्रों वाले—
श्लोक 5 (skanda.2.149.5)
समुद्धूसरोरःस्थलं धेनुधूल्या सुपुष्टांगमष्टापदाकल्पदीप्तम् ।। कटीरस्थले चारुजंघोरुयुग्मे पिनद्धं क्वणत्किंकिणीजालदाम्ना
samuddhūsaroraḥsthalaṁ dhenudhūlyā supuṣṭāṁgamaṣṭāpadākalpadīptam kaṭīrasthale cārujaṁghoruyugme pinaddhaṁ kvaṇatkiṁkiṇījāladāmnā
—गौओं की धूलि से धूसरित विशाल वक्षःस्थल, अष्टधातु के आभूषण से देदीप्यमान सुपुष्ट अंगों वाले, कटि और सुंदर जंघा-ऊरु युगल पर बजती घंटियों की माला बाँधे—
श्लोक 6 (skanda.2.149.6)
हसंतं लसद्बंधुजीवप्रसूनप्रभापाणिपादांबुजोदारकांत्या ।। करे दक्षिणे पायसं वामहस्ते दधानं नवं शुद्धहैयंगवीनम्
hasaṁtaṁ lasadbaṁdhujīvaprasūnaprabhāpāṇipādāṁbujodārakāṁtyā kare dakṣiṇe pāyasaṁ vāmahaste dadhānaṁ navaṁ śuddhahaiyaṁgavīnam
—मुस्कुराते हुए, बंधुजीव पुष्प की आभा से युक्त उदार कांतिमय हाथ-पैर के कमलों वाले, दाहिने हाथ में पायस और बाएँ हाथ में नवीन शुद्ध मक्खन धारण किए—
श्लोक 7 (skanda.2.149.7)
महीभारभूताऽमरारातियूथाऽनलं पूतनादीन्निहंतुं प्रवृत्तम् ।। प्रभुं गोपिकागोपवृंदेन वीतं सुरेन्द्रादिभिर्वंदितं देवदेवम्
mahībhārabhūtā'marārātiyūthā'nalaṁ pūtanādīnnihaṁtuṁ pravṛttam prabhuṁ gopikāgopavṛṁdena vītaṁ surendrādibhirvaṁditaṁ devadevam
—पृथ्वी के भार-स्वरूप देव-शत्रुओं के समूह के लिए अग्नि-स्वरूप, पूतना आदि के वध हेतु प्रवृत्त, गोपिकाओं और ग्वालों से घिरे, इन्द्र आदि देवों द्वारा वंदित उन देवाधिदेव प्रभु का—
श्लोक 8 (skanda.2.149.8)
प्रगे पूजयित्वा त्वनुस्मृत्य कृष्णं भुजंगेंद्रवज्रादिभिर्भक्तिनम्रः ।। सितांभोजहैयंगवीनैश्च दध्ना विमिश्रेण दुग्धेन संप्रीणयेत्तम्
prage pūjayitvā tvanusmṛtya kṛṣṇaṁ bhujaṁgeṁdravajrādibhirbhaktinamraḥ sitāṁbhojahaiyaṁgavīnaiśca dadhnā vimiśreṇa dugdhena saṁprīṇayettam
—प्रातःकाल पूजा करके, भुजंगेन्द्र-वज्र आदि मंत्रों सहित भक्तिपूर्वक झुककर कृष्ण का स्मरण करके, श्वेत कमल-सदृश मक्खन को दही और दूध मिलाकर उन्हें प्रसन्न करना चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.2.149.9)
इति प्रातरेवाऽर्चयेदत्युतं यो नरः प्रत्यहं शश्वदास्तिक्ययुक्तः ।। लभेत्सोऽचिरेणैव लक्ष्मीं समग्रामिह प्रेत्य शुद्धं परं धाम भूयात्
iti prātarevā'rcayedatyutaṁ yo naraḥ pratyahaṁ śaśvadāstikyayuktaḥ labhetso'cireṇaiva lakṣmīṁ samagrāmiha pretya śuddhaṁ paraṁ dhāma bhūyāt
इस प्रकार जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल श्रद्धायुक्त होकर अच्युत की पूजा करता है, वह शीघ्र ही यहाँ सम्पूर्ण लक्ष्मी प्राप्त करता है और मृत्यु के बाद शुद्ध परम धाम को पाता है।
श्लोक 10 (skanda.2.149.10)
मन्त्रश्चोक्तः पुरा पुत्र आदौ लोकमनोहरः ।। श्रीमद्दामोदराख्यो हि शृणु तस्याधिकारिणः
mantraścoktaḥ purā putra ādau lokamanoharaḥ śrīmaddāmodarākhyo hi śṛṇu tasyādhikāriṇaḥ
हे पुत्र! पहले ही आरम्भ में लोक को मोहित करने वाला 'श्रीमद्दामोदर' नामक मंत्र कहा गया है; अब उसके अधिकारी को सुनो।
श्लोक 11 (skanda.2.149.11)
अयोग्याय न दातव्यो मंत्रराजस्त्वया सुत ।। यत्नेन गोपनीयं च रहस्यं शीघ्रसिद्धिदम्
ayogyāya na dātavyo maṁtrarājastvayā suta yatnena gopanīyaṁ ca rahasyaṁ śīghrasiddhidam
हे पुत्र! यह मंत्रराज अयोग्य को नहीं देना चाहिए; इसे प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए, क्योंकि यह शीघ्र सिद्धि देने वाला रहस्य है।
श्लोक 12 (skanda.2.149.12)
अलसं मलिनं क्लिष्टं दंभमोहसमन्वितम् ।। दरिद्रं रोगिणं क्रुद्धं रागिणं भोगलालसम्
alasaṁ malinaṁ kliṣṭaṁ daṁbhamohasamanvitam daridraṁ rogiṇaṁ kruddhaṁ rāgiṇaṁ bhogalālasam
आलसी, मलिन, क्लेशयुक्त, दंभ और मोह से युक्त, दरिद्र, रोगी, क्रोधी, आसक्त और भोग-लालसा से युक्त—
श्लोक 13 (skanda.2.149.13)
असूयामत्सरग्रस्तं शठं परुषवादिनम् ।। अन्यायेनाऽर्जितधनं परदाररतं सदा
asūyāmatsaragrastaṁ śaṭhaṁ paruṣavādinam anyāyenā'rjitadhanaṁ paradārarataṁ sadā
—ईर्ष्या और द्वेष से ग्रस्त, धूर्त, कठोरभाषी, अन्याय से धन अर्जित करने वाले, सदा परस्त्रीरत—
श्लोक 14 (skanda.2.149.14)
विदुषां वैरिणं नित्यमज्ञं पंडितमानिनम् ।। भ्रष्टव्रतं क्लिष्टवृत्तिं पिशुनं दुष्टमानसम्
viduṣāṁ vairiṇaṁ nityamajñaṁ paṁḍitamāninam bhraṣṭavrataṁ kliṣṭavṛttiṁ piśunaṁ duṣṭamānasam
—विद्वानों का शत्रु, सदा अज्ञानी होते हुए भी अपने आपको पंडित मानने वाला, व्रत से भ्रष्ट, दूषित वृत्ति वाला, चुगलखोर, दुष्ट मन वाला—
श्लोक 15 (skanda.2.149.15)
बह्वाशिनं क्रूरचेष्टमग्रगण्यं दुरात्मनाम् ।। कृपणं पापिनं रौद्रमाश्रितानां भयंकरम्
bahvāśinaṁ krūraceṣṭamagragaṇyaṁ durātmanām kṛpaṇaṁ pāpinaṁ raudramāśritānāṁ bhayaṁkaram
—अत्यधिक खाने वाला, क्रूर आचरण वाला, दुरात्माओं में अग्रगण्य, कृपण, पापी, भयंकर, शरणागतों के लिए भयकारी—
श्लोक 16 (skanda.2.149.16)
एवमादिगुणैर्युक्तं शिष्यं नैव परिग्रहेत् ।। गृह्णीयाद्यदि तद्दोषः प्रायो गुरुमुपस्पृशेत्
evamādiguṇairyuktaṁ śiṣyaṁ naiva parigrahet gṛhṇīyādyadi taddoṣaḥ prāyo gurumupaspṛśet
—इन आदि गुणों से युक्त शिष्य को कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए; यदि ग्रहण करे, तो उसका दोष प्रायः गुरु को ही स्पर्श करता है।
श्लोक 17 (skanda.2.149.17)
अमात्यदोषो राजानं जायादोषः पतिं यथा ।। तथा शिष्यकृतो दोषो गुरुं प्राप्नोत्यसंशयम्
amātyadoṣo rājānaṁ jāyādoṣaḥ patiṁ yathā tathā śiṣyakṛto doṣo guruṁ prāpnotyasaṁśayam
जैसे मंत्री का दोष राजा को और पत्नी का दोष पति को लगता है, वैसे ही शिष्य द्वारा किया गया दोष निःसंदेह गुरु को प्राप्त होता है।
श्लोक 18 (skanda.2.149.18)
तस्माच्छिष्यं गुरुर्नित्यं परीक्ष्यैव परिग्रहेत् ।। कायेन मनसा वाचा गुरुशुश्रूषणे रतम्
tasmācchiṣyaṁ gururnityaṁ parīkṣyaiva parigrahet kāyena manasā vācā guruśuśrūṣaṇe ratam
इसलिए गुरु को सदा शिष्य की परीक्षा करके ही उसे ग्रहण करना चाहिए — जो काया, मन और वाणी से गुरु-सेवा में तत्पर हो—
श्लोक 19 (skanda.2.149.19)
अस्तेयवृत्तिमास्तिक्ययुक्तं मोक्षकृतोद्यमम् ।। ब्रह्मचर्यरतं नित्यं दृढव्रतमकल्मषम्
asteyavṛttimāstikyayuktaṁ mokṣakṛtodyamam brahmacaryarataṁ nityaṁ dṛḍhavratamakalmaṣam
—जो चोरी न करने वाला, आस्तिकता से युक्त, मोक्ष के लिए उद्यमशील, सदा ब्रह्मचर्य में रत, दृढ़ व्रत वाला और निष्कलंक हो—
श्लोक 20 (skanda.2.149.20)
प्रसन्नहृदयं शुद्धमशठं विमलाशयम् ।। परोपकारनिरतं स्वार्थे च विगतस्पृहम्
prasannahṛdayaṁ śuddhamaśaṭhaṁ vimalāśayam paropakāranirataṁ svārthe ca vigataspṛham
—प्रसन्न हृदय वाला, शुद्ध, धूर्ततारहित, निर्मल भाव वाला, परोपकार में तत्पर तथा स्वार्थ से रहित—
श्लोक 21 (skanda.2.149.21)
स्वचित्तवित्तदेहैस्तु परितोषकरं गुरोः ।। आश्रितानां तथा पुत्र परितोषकरं शुचिम्
svacittavittadehaistu paritoṣakaraṁ guroḥ āśritānāṁ tathā putra paritoṣakaraṁ śucim
—हे पुत्र! जो अपने मन, धन और शरीर से गुरु को संतुष्ट करने वाला हो, तथा उसी प्रकार आश्रितों को भी संतुष्ट करने वाला और पवित्र हो—
श्लोक 22 (skanda.2.149.22)
ईदृग्विधाय शिष्याय मंत्रं दद्याच्च नान्यथा ।। यद्यन्यथा वदेत्तस्मिन्देवताशाप आपतेत्
īdṛgvidhāya śiṣyāya maṁtraṁ dadyācca nānyathā yadyanyathā vadettasmindevatāśāpa āpatet
—ऐसे शिष्य को ही मंत्र देना चाहिए, अन्यथा नहीं; यदि कोई अन्यथा दे, तो उस पर देवताओं का शाप पड़ता है।
श्लोक 23 (skanda.2.149.23)
शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि गुरोरपि च लक्षणम् ।। एभिस्तु लक्षणैर्युक्तो गुरुरेव भवेन्नृणाम्
śṛṇu putra pravakṣyāmi gurorapi ca lakṣaṇam ebhistu lakṣaṇairyukto gurureva bhavennṛṇām
हे पुत्र! सुनो, अब मैं गुरु के भी लक्षण बताऊँगा; इन्हीं लक्षणों से युक्त पुरुष ही मनुष्यों का सच्चा गुरु हो सकता है—
श्लोक 24 (skanda.2.149.24)
समचेताः प्रशांतात्मा विमन्युश्च सुहृन्नृणाम् ।। साधुर्महान्समो लोके स गुरुः परिकीर्तितः
samacetāḥ praśāṁtātmā vimanyuśca suhṛnnṛṇām sādhurmahānsamo loke sa guruḥ parikīrtitaḥ
—समभाव वाला, शांतचित्त, क्रोधरहित, मनुष्यों का हितैषी, साधु, महान और संसार में समदर्शी — ऐसा पुरुष ही गुरु कहा गया है।
श्लोक 25 (skanda.2.149.25)
मम व्रतधरो नित्यं वैष्णवानां सुसंमतः ।। मदाश्रयकथासक्तो ममोत्सवरतः सदा
mama vratadharo nityaṁ vaiṣṇavānāṁ susaṁmataḥ madāśrayakathāsakto mamotsavarataḥ sadā
मेरे व्रत को सदा धारण करने वाला, वैष्णवों द्वारा सम्मानित, मेरे आश्रय की कथाओं में आसक्त, सदा मेरे उत्सवों में रत—
श्लोक 26 (skanda.2.149.26)
कृपासिन्धुः सुपूर्णार्थः सर्वसत्त्वोपकारकः ।। निःस्पृहः सर्वतः सिद्धः सर्वविद्याविशारदः
kṛpāsindhuḥ supūrṇārthaḥ sarvasattvopakārakaḥ niḥspṛhaḥ sarvataḥ siddhaḥ sarvavidyāviśāradaḥ
—करुणा का सागर, सुपूर्ण-कामना वाला, समस्त प्राणियों का उपकारक, सर्वथा निःस्पृह, सिद्ध, सभी विद्याओं में निपुण—
श्लोक 27 (skanda.2.149.27)
सर्वसंशयसंछेत्ताऽनलसो गुरुरादृतः ।। ब्राह्मणः सर्वकालज्ञः कुर्यात्सर्वेष्वनुग्रहम्
sarvasaṁśayasaṁchettā'nalaso gururādṛtaḥ brāhmaṇaḥ sarvakālajñaḥ kuryātsarveṣvanugraham
—समस्त संशयों का निवारक, आलस्यरहित, आदरणीय, सर्वकाल का ज्ञाता ब्राह्मण — ऐसा गुरु सबका अनुग्रह करता है।
श्लोक 28 (skanda.2.149.28)
पूर्वोक्तलक्षणैर्युक्तः शिष्य ईदृग्विधाद्गुरोः ।। गृह्णीयात्पुत्र तन्मंत्रं मार्गशीर्षे मदायने
pūrvoktalakṣaṇairyuktaḥ śiṣya īdṛgvidhādguroḥ gṛhṇīyātputra tanmaṁtraṁ mārgaśīrṣe madāyane
हे पुत्र! पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त शिष्य ऐसे ही गुरु से मार्गशीर्ष में, मेरे प्रिय काल में, वह मंत्र ग्रहण करे।
श्लोक 29 (skanda.2.149.29)
वैष्णवानां व्रतानां च कुर्यात्स्वीकरणं बुधः ।। मत्प्रियं शृणुयाच्छश्वच्छ्रीमद्भागवतं परम्
vaiṣṇavānāṁ vratānāṁ ca kuryātsvīkaraṇaṁ budhaḥ matpriyaṁ śṛṇuyācchaśvacchrīmadbhāgavataṁ param
बुद्धिमान को वैष्णवों के व्रतों का स्वीकरण करना चाहिए, तथा मुझे प्रिय श्रीमद्भागवत का निरंतर श्रवण करना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.2.149.30)
श्रीमद्भागवतंनाम पुराणं लोकविश्रुतम् ।। शृणुयाच्छ्रद्धया युक्तो मम सन्तोषकारणम्
śrīmadbhāgavataṁnāma purāṇaṁ lokaviśrutam śṛṇuyācchraddhayā yukto mama santoṣakāraṇam
श्रद्धायुक्त होकर लोकविख्यात श्रीमद्भागवत नामक पुराण को सुनना चाहिए, जो मेरे संतोष का कारण है।
श्लोक 31 (skanda.2.149.31)
नित्यं भागवतं यस्तु पुराणं पठते नरः ।। प्रत्यक्षरं भवेत्तस्य कपिलादानजं फलम्
nityaṁ bhāgavataṁ yastu purāṇaṁ paṭhate naraḥ pratyakṣaraṁ bhavettasya kapilādānajaṁ phalam
जो मनुष्य प्रतिदिन भागवत पुराण का पाठ करता है, उसे प्रत्येक अक्षर के लिए कपिला-गौ के दान का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 32 (skanda.2.149.32)
श्लोकार्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम् ।। पठते शृणुयाद्यस्तु गोसहस्रफलं लभेत्
ślokārdhaṁ ślokapādaṁ vā nityaṁ bhāgavatodbhavam paṭhate śṛṇuyādyastu gosahasraphalaṁ labhet
जो प्रतिदिन भागवत से उत्पन्न आधा श्लोक अथवा एक चरण भी पढ़ता या सुनता है, उसे सहस्र गौओं का फल प्राप्त होता है।
श्लोक 33 (skanda.2.149.33)
यः पठेत्प्रयतो नित्यं श्लोकं भागवतं सुत ।। अष्टादशपुराणानां फलमाप्नोति मानवः
yaḥ paṭhetprayato nityaṁ ślokaṁ bhāgavataṁ suta aṣṭādaśapurāṇānāṁ phalamāpnoti mānavaḥ
हे पुत्र! जो संयमी होकर प्रतिदिन भागवत का एक श्लोक पढ़ता है, वह मनुष्य अठारह पुराणों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 34 (skanda.2.149.34)
नित्यं मम कथा यत्र तत्र तिष्ठन्ति वैष्णवाः ।। कलिबाह्या नरास्ते वै येऽर्चयन्ति सदा मम
nityaṁ mama kathā yatra tatra tiṣṭhanti vaiṣṇavāḥ kalibāhyā narāste vai ye'rcayanti sadā mama
जहाँ सदा मेरी कथा होती है, वहीं वैष्णव निवास करते हैं; जो सदा मेरी पूजा करते हैं, वे मनुष्य कलियुग से परे हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.149.35)
वैष्णवानां तु शास्त्राणि येऽर्चयन्ति गृहे नराः ।। सर्वपापविनिर्मुक्ता भवंति सुरवन्दिताः
vaiṣṇavānāṁ tu śāstrāṇi ye'rcayanti gṛhe narāḥ sarvapāpavinirmuktā bhavaṁti suravanditāḥ
जो मनुष्य घर में वैष्णवों के शास्त्रों की पूजा करते हैं, वे समस्त पापों से मुक्त होकर देवताओं द्वारा वंदित होते हैं।
श्लोक 36 (skanda.2.149.36)
येऽर्चयन्ति गृहे नित्यं शास्त्रं भागवतं कलौ ।। आस्फोटयंति वल्गन्ति तेषां प्रीतो भवाम्यहम्
ye'rcayanti gṛhe nityaṁ śāstraṁ bhāgavataṁ kalau āsphoṭayaṁti valganti teṣāṁ prīto bhavāmyaham
जो कलियुग में घर में प्रतिदिन भागवत शास्त्र की पूजा करते हैं, वे हर्ष से उछलते-कूदते हैं; मैं उनसे प्रसन्न होता हूँ।
श्लोक 37 (skanda.2.149.37)
यावद्दिनानि हे पुत्र शास्त्रं भागवतं गृहे ।। तावत्पिबंति पितरः क्षीरं सर्पिर्मधूदकम्
yāvaddināni he putra śāstraṁ bhāgavataṁ gṛhe tāvatpibaṁti pitaraḥ kṣīraṁ sarpirmadhūdakam
हे पुत्र! जितने दिनों तक भागवत शास्त्र घर में रहता है, उतने ही दिनों तक पितर दूध, घी और मधुयुक्त जल पीते हैं।
श्लोक 38 (skanda.2.149.38)
यच्छंति वैष्णवे भक्त्या शास्त्रं भागवतं हि ये ।। कल्पकोटिसहस्राणि मम लोके वसंति ते
yacchaṁti vaiṣṇave bhaktyā śāstraṁ bhāgavataṁ hi ye kalpakoṭisahasrāṇi mama loke vasaṁti te
जो भक्तिपूर्वक किसी वैष्णव को भागवत शास्त्र देते हैं, वे हजारों करोड़ कल्पों तक मेरे लोक में निवास करते हैं।
श्लोक 39 (skanda.2.149.39)
येऽर्चयन्ति सदा गेहे शास्त्रं भागवतं नराः ।। प्रीणितास्तैश्च विबुधा यावदाऽऽभूतसंप्लवम्
ye'rcayanti sadā gehe śāstraṁ bhāgavataṁ narāḥ prīṇitāstaiśca vibudhā yāvadā''bhūtasaṁplavam
जो मनुष्य घर में सदा भागवत शास्त्र की पूजा करते हैं, उनसे देवता प्रलयकाल तक प्रसन्न रहते हैं।
श्लोक 40 (skanda.2.149.40)
श्लोकार्धं श्लोकपादं वा वरं भागवतं गृहे ।। शतशोऽथ सहस्रैश्च किमन्यैः शास्त्रसंग्रहैः
ślokārdhaṁ ślokapādaṁ vā varaṁ bhāgavataṁ gṛhe śataśo'tha sahasraiśca kimanyaiḥ śāstrasaṁgrahaiḥ
घर में आधा श्लोक अथवा एक चरण भी भागवत का होना, अन्य सैकड़ों-हजारों शास्त्र-संग्रहों से श्रेष्ठ है — अन्य शास्त्रों से क्या लाभ?
श्लोक 41 (skanda.2.149.41)
न यस्य तिष्ठते शास्त्रं गृहे भागवतं कलौ ।। न तस्य पुनरावृत्तिर्याम्यपाशात्कदाचन
na yasya tiṣṭhate śāstraṁ gṛhe bhāgavataṁ kalau na tasya punarāvṛttiryāmyapāśātkadācana
जिसके घर में कलियुग में भागवत शास्त्र नहीं रहता, उसे यम के पाश से कभी मुक्ति नहीं मिलती।
श्लोक 42 (skanda.2.149.42)
कथं स वैष्णवो ज्ञेयः शास्त्रं भागवतं कलौ ।। गृहे न तिष्ठते यस्य श्वपचादधिको हि सः
kathaṁ sa vaiṣṇavo jñeyaḥ śāstraṁ bhāgavataṁ kalau gṛhe na tiṣṭhate yasya śvapacādadhiko hi saḥ
जिसके घर में कलियुग में भागवत शास्त्र नहीं रहता, वह वैष्णव कैसे माना जाए? वह तो चाण्डाल से भी नीचे है।
श्लोक 43 (skanda.2.149.43)
सर्वस्वेनाऽपि लोकेश कर्तव्यः शास्त्रसंग्रहः ।। वैष्णवस्तु सदा भक्त्या तुष्ट्यर्थं मम पुत्रक
sarvasvenā'pi lokeśa kartavyaḥ śāstrasaṁgrahaḥ vaiṣṇavastu sadā bhaktyā tuṣṭyarthaṁ mama putraka
हे लोकेश! अपना सर्वस्व लगाकर भी वैष्णव को सदा भक्तिपूर्वक शास्त्र-संग्रह करना चाहिए, हे पुत्र! मेरी संतुष्टि के लिए।
श्लोक 44 (skanda.2.149.44)
यत्र यत्र भवेत्पुण्यं शास्त्रं भागवतं कलौ ।। तत्र तत्र सदैवाऽहं भवामि त्रिदशैः सह
yatra yatra bhavetpuṇyaṁ śāstraṁ bhāgavataṁ kalau tatra tatra sadaivā'haṁ bhavāmi tridaśaiḥ saha
जहाँ-जहाँ कलियुग में पुण्यमय भागवत शास्त्र होता है, वहाँ-वहाँ मैं सदा देवताओं सहित उपस्थित रहता हूँ।
श्लोक 45 (skanda.2.149.45)
तत्र सर्वाणि तीर्थानि नदीनदसरांसि च ।। यज्ञाः सप्तपुरी नित्यं पुण्याः सर्वे शिलोच्चयाः
tatra sarvāṇi tīrthāni nadīnadasarāṁsi ca yajñāḥ saptapurī nityaṁ puṇyāḥ sarve śiloccayāḥ
वहाँ समस्त तीर्थ, नदी-नद-सरोवर, यज्ञ, सातों पुरियाँ तथा समस्त पुण्य पर्वत सदा विद्यमान रहते हैं।
श्लोक 46 (skanda.2.149.46)
श्रोतव्यं मम शास्त्रं हि यशोधर्मजयार्थिना ।। पापक्षयार्थं लोकेश मोक्षार्थं धर्मबुद्धिना
śrotavyaṁ mama śāstraṁ hi yaśodharmajayārthinā pāpakṣayārthaṁ lokeśa mokṣārthaṁ dharmabuddhinā
हे लोकेश! यश, धर्म और विजय चाहने वाले को, पाप के नाश के लिए, मोक्ष के लिए, धर्मबुद्धि से मेरे शास्त्र को अवश्य सुनना चाहिए।
श्लोक 47 (skanda.2.149.47)
श्रीमद्भागवतं पुण्यमायुरारोग्यपुष्टिदम् ।। पठनाच्छ्रवणाद्वाऽपि सर्वपापैः प्रमुच्यते
śrīmadbhāgavataṁ puṇyamāyurārogyapuṣṭidam paṭhanācchravaṇādvā'pi sarvapāpaiḥ pramucyate
श्रीमद्भागवत पुण्यदायी, आयु, आरोग्य और पुष्टि देने वाला है; इसके पठन अथवा श्रवण से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.2.149.48)
न शृण्वंति न हृष्यंति श्रीमद्भागवतं परम् ।। सत्यंसत्यं हि लोकेश तेषां स्वामी सदा यमः
na śṛṇvaṁti na hṛṣyaṁti śrīmadbhāgavataṁ param satyaṁsatyaṁ hi lokeśa teṣāṁ svāmī sadā yamaḥ
हे लोकेश! जो परम श्रीमद्भागवत को न सुनते हैं, न उससे हर्षित होते हैं, सत्य ही, सत्य ही, उनका स्वामी सदा यम है।
श्लोक 49 (skanda.2.149.49)
न गच्छति यदा मर्त्यः श्रोतुं भागवतं सुत ।। एकादश्यां विशेषेण नाऽस्ति पापरतस्ततः
na gacchati yadā martyaḥ śrotuṁ bhāgavataṁ suta ekādaśyāṁ viśeṣeṇa nā'sti pāparatastataḥ
हे पुत्र! जब मनुष्य विशेष रूप से एकादशी को भागवत सुनने नहीं जाता, तो उससे बढ़कर पाप में रत कोई नहीं है।
श्लोक 50 (skanda.2.149.50)
श्लोकं भागवतं चाऽपि श्लोकार्धं पादमेव वा ।। लिखितं तिष्ठते यस्य गृहे तस्य वसाम्यहम्
ślokaṁ bhāgavataṁ cā'pi ślokārdhaṁ pādameva vā likhitaṁ tiṣṭhate yasya gṛhe tasya vasāmyaham
जिसके घर में भागवत का एक श्लोक, आधा श्लोक अथवा एक चरण भी लिखा हुआ रहता है, उसके घर में मैं निवास करता हूँ।
श्लोक 51 (skanda.2.149.51)
सर्वाऽऽश्रमाऽभिगमनं सर्वतीर्थाऽवगाहनम् ।। न तथा पावनं नॄणां श्रीमद्भागवतं यथा
sarvā''śramā'bhigamanaṁ sarvatīrthā'vagāhanam na tathā pāvanaṁ nṝṇāṁ śrīmadbhāgavataṁ yathā
सभी आश्रमों में जाना और सभी तीर्थों में स्नान करना भी मनुष्यों को उतना पवित्र नहीं करता, जितना श्रीमद्भागवत करता है।
श्लोक 52 (skanda.2.149.52)
यत्र यत्र चतुर्वक्त्र श्रीमद्भागवतं भवेत् ।। गच्छामि तत्रतत्राऽहं गौर्यथा सुतवत्सला
yatra yatra caturvaktra śrīmadbhāgavataṁ bhavet gacchāmi tatratatrā'haṁ gauryathā sutavatsalā
हे चतुर्मुख! जहाँ-जहाँ श्रीमद्भागवत होता है, वहाँ-वहाँ मैं वैसे ही जाता हूँ जैसे गाय अपने बछड़े के प्रति स्नेहवश जाती है।
श्लोक 53 (skanda.2.149.53)
मत्कथावाचकं नित्यं मत्कथाश्रवणे रतम् ।। मत्कथाप्रीतमनसं नाऽहं त्यक्ष्यामि तं नरम्
matkathāvācakaṁ nityaṁ matkathāśravaṇe ratam matkathāprītamanasaṁ nā'haṁ tyakṣyāmi taṁ naram
जो मनुष्य सदा मेरी कथा का वाचक है, मेरी कथा के श्रवण में रत है, मेरी कथा से जिसका मन प्रसन्न रहता है — मैं उस मनुष्य को कभी नहीं त्यागता।
श्लोक 54 (skanda.2.149.54)
श्रीमद्भागवतं पुण्यं दृष्ट्वा नोत्तिष्ठते हि यः ।। सांवत्सरं तस्य पुण्यं विलयं याति पुत्रक
śrīmadbhāgavataṁ puṇyaṁ dṛṣṭvā nottiṣṭhate hi yaḥ sāṁvatsaraṁ tasya puṇyaṁ vilayaṁ yāti putraka
हे पुत्र! जो पुण्यमय श्रीमद्भागवत को देखकर खड़ा नहीं होता, उसका पूरे वर्ष का पुण्य नष्ट हो जाता है।
श्लोक 55 (skanda.2.149.55)
श्रीमद्भागवतं दृष्ट्वा प्रत्युत्थानाभिवादनैः ।। सन्मानयेत तं दृष्ट्वा भवेत्प्रीतिर्ममाऽतुला
śrīmadbhāgavataṁ dṛṣṭvā pratyutthānābhivādanaiḥ sanmānayeta taṁ dṛṣṭvā bhavetprītirmamā'tulā
श्रीमद्भागवत को देखकर उठकर और नमन करके सम्मान करना चाहिए; इसे देखकर मेरी प्रीति अतुलनीय हो जाती है।
श्लोक 56 (skanda.2.149.56)
दृष्ट्वा भागवतं दूरात्प्रक्रमेत्संमुखं हि यः ।। पदेपदेऽश्वमेधस्य फलं प्राप्नोत्यसंशयम्
dṛṣṭvā bhāgavataṁ dūrātprakrametsaṁmukhaṁ hi yaḥ padepade'śvamedhasya phalaṁ prāpnotyasaṁśayam
जो भागवत को दूर से देखकर उसके सम्मुख आगे बढ़ता है, वह प्रत्येक पग पर निःसंदेह अश्वमेध का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 57 (skanda.2.149.57)
उत्थाय प्रणमेद्यो वै श्रीमद्भागवतं नरः ।। धनं पुत्रांस्तथा दारान्भक्तिं च प्रददाम्यहम्
utthāya praṇamedyo vai śrīmadbhāgavataṁ naraḥ dhanaṁ putrāṁstathā dārānbhaktiṁ ca pradadāmyaham
जो मनुष्य उठकर श्रीमद्भागवत को प्रणाम करता है, उसे मैं धन, पुत्र, पत्नी और भक्ति प्रदान करता हूँ।
श्लोक 58 (skanda.2.149.58)
महाराजोपचारैस्तु श्रीमद्भागवतं सुत ।। शृण्वंति ये नरा भक्त्या तेषां वश्यो भवाम्यहम्
mahārājopacāraistu śrīmadbhāgavataṁ suta śṛṇvaṁti ye narā bhaktyā teṣāṁ vaśyo bhavāmyaham
हे पुत्र! जो मनुष्य महाराजोचित उपचारों सहित भक्तिपूर्वक श्रीमद्भागवत को सुनते हैं, मैं उनके वश में हो जाता हूँ।
श्लोक 59 (skanda.2.149.59)
ममोत्सवेषु सर्वेपु श्रीमद्भागवतं परम् ।। शृण्वंति ये नरा भक्त्या मम प्रीत्यै च सुव्रत
mamotsaveṣu sarvepu śrīmadbhāgavataṁ param śṛṇvaṁti ye narā bhaktyā mama prītyai ca suvrata
हे सुव्रत! जो मनुष्य मेरे समस्त उत्सवों में भक्तिपूर्वक परम श्रीमद्भागवत को मेरी प्रसन्नता के लिए सुनते हैं—
श्लोक 60 (skanda.2.149.60)
वस्त्रालंकरणैः पुष्पैर्धूपदीपोपहारकैः ।। वशीकृतो ह्यहं तैश्च सत्स्त्रिया सत्पतिर्यथा
vastrālaṁkaraṇaiḥ puṣpairdhūpadīpopahārakaiḥ vaśīkṛto hyahaṁ taiśca satstriyā satpatiryathā
—वस्त्र, आभूषण, पुष्प, धूप, दीप और उपहारों से मैं भी उनके वश में हो जाता हूँ, जैसे सच्चा पति सुशील पत्नी के वश में होता है।