Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 150

मथुरा माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151

श्लोक 1 (skanda.2.150.1)

।। ब्रह्मोवाच ।। ।। कस्मिन्क्षेत्रे हि देवेश मार्गशीर्षोऽधिकः स्मृतः ।। किं फलं च भवेत्तस्मिन्नेतत्सर्वं वद प्रभो

brahmovāca kasminkṣetre hi deveśa mārgaśīrṣo'dhikaḥ smṛtaḥ kiṁ phalaṁ ca bhavettasminnetatsarvaṁ vada prabho

ब्रह्मा जी ने कहा — हे देवेश! किस क्षेत्र में मार्गशीर्ष को सर्वाधिक उत्तम माना गया है? और वहाँ क्या फल प्राप्त होता है? हे प्रभो! यह सब मुझे बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.150.2)

।। श्रीभगवानुवाच ।। ।। मधुरेति सुविख्यातमस्ति क्षेत्रं परं मम ।। सुरम्या च प्रशस्ता च जन्मभूमिः प्रिया मम

śrībhagavānuvāca madhureti suvikhyātamasti kṣetraṁ paraṁ mama suramyā ca praśastā ca janmabhūmiḥ priyā mama

श्रीभगवान ने कहा — मथुरा नाम से सुविख्यात मेरा एक परम क्षेत्र है — अत्यंत रमणीय, अत्यंत श्रेष्ठ, और मेरी प्रिय जन्मभूमि।

श्लोक 3 (skanda.2.150.3)

पदेपदे तीर्थफलं मधुरायां चतुर्मुख ।। यत्रयत्र नरः स्नातो मुच्यते घोरकिल्बिषात्

padepade tīrthaphalaṁ madhurāyāṁ caturmukha yatrayatra naraḥ snāto mucyate ghorakilbiṣāt

हे चतुर्मुख! मथुरा में पग-पग पर तीर्थ का फल है; जहाँ-जहाँ मनुष्य स्नान करता है, वहाँ वह घोर पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.2.150.4)

सर्वधर्मविहीनानां पुरुषाणां दुरात्मनाम् ।। नरकार्तिहरा पुत्र मधुरा पापनाशिनी

sarvadharmavihīnānāṁ puruṣāṇāṁ durātmanām narakārtiharā putra madhurā pāpanāśinī

हे पुत्र! समस्त धर्मों से रहित, दुरात्मा पुरुषों के लिए भी मथुरा नरक की पीड़ा को हरने वाली और पाप का नाश करने वाली है।

श्लोक 5 (skanda.2.150.5)

कृतघ्नश्च सुरापश्च चौरो भग्नव्रतस्तथा ।। मधुरां प्राप्य मनुजो मुच्यते घोरपातकात्

kṛtaghnaśca surāpaśca cauro bhagnavratastathā madhurāṁ prāpya manujo mucyate ghorapātakāt

कृतघ्न, मद्यपायी, चोर तथा व्रतभंजक मनुष्य भी मथुरा पहुँचकर घोर पातक से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.2.150.6)

सूर्यौदये तमो नश्येद्यथा वज्रभयान्नगाः ।। तार्क्ष्यं दृष्ट्वा यथा सर्पा मेघा वातहता यथा

sūryaudaye tamo naśyedyathā vajrabhayānnagāḥ tārkṣyaṁ dṛṣṭvā yathā sarpā meghā vātahatā yathā

जैसे सूर्योदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, जैसे नागों को वज्र के भय से, जैसे सर्प गरुड़ को देखकर, जैसे मेघ वायु से आहत होकर—

श्लोक 7 (skanda.2.150.7)

तत्त्वज्ञानाद्यथा दुःखं हरिं दृष्ट्वा यथा गजाः ।। तथा पापानि नश्यंति मथुरादर्शनात्सुत

tattvajñānādyathā duḥkhaṁ hariṁ dṛṣṭvā yathā gajāḥ tathā pāpāni naśyaṁti mathurādarśanātsuta

—जैसे तत्त्वज्ञान से दुःख, जैसे हरि को देखकर हाथी नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही हे पुत्र! मथुरा के दर्शन मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 8 (skanda.2.150.8)

श्रद्धया भक्तियुक्तस्तु दृष्ट्वा मधुपुरीं नरः ।। ब्रह्महाऽपि विशुध्येत किं पुनस्त्वन्यपातकी

śraddhayā bhaktiyuktastu dṛṣṭvā madhupurīṁ naraḥ brahmahā'pi viśudhyeta kiṁ punastvanyapātakī

श्रद्धा और भक्तिपूर्वक मधुपुरी को देखने वाला मनुष्य ब्रह्महत्यारा भी शुद्ध हो जाता है, फिर अन्य पापी की तो बात ही क्या!

श्लोक 9 (skanda.2.150.9)

मथुरां स्नातुकामस्य गच्छतस्तु पदेपदे ।। निराशानि व्रजंत्येव पापानि च शरीरतः

mathurāṁ snātukāmasya gacchatastu padepade nirāśāni vrajaṁtyeva pāpāni ca śarīrataḥ

मथुरा में स्नान करने की इच्छा रखने वाले के लिए, वहाँ जाते हुए प्रत्येक पग पर उसके शरीर से पाप निराश होकर निकल जाते हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.150.10)

अनुषंगेण गच्छंति वाणिज्येनाऽपि सेवया ।। मधुरास्नानमात्रेण दिवं यांति गतांहसः

anuṣaṁgeṇa gacchaṁti vāṇijyenā'pi sevayā madhurāsnānamātreṇa divaṁ yāṁti gatāṁhasaḥ

व्यापार अथवा सेवा जैसे आकस्मिक संबंध से भी वे चले जाते हैं; मथुरा में मात्र स्नान करने से पापरहित होकर मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.150.11)

नामाऽपि गृह्णतामस्याः सदा मुक्तिर्न संशयः ।। सदा कृतयुगं तत्र सदा चैवोत्तरायणम्

nāmā'pi gṛhṇatāmasyāḥ sadā muktirna saṁśayaḥ sadā kṛtayugaṁ tatra sadā caivottarāyaṇam

जो केवल इसका नाम भी लेते हैं, उनके लिए सदा निःसंदेह मुक्ति है; वहाँ सदा सतयुग है और सदा उत्तरायण ही है।

श्लोक 12 (skanda.2.150.12)

यः शृणोति चतुर्वक्त्र माधुरं मम मंदिरम् ।। अन्येनोच्चारिते सद्यः सोऽपि पापात्प्रमुच्यते

yaḥ śṛṇoti caturvaktra mādhuraṁ mama maṁdiram anyenoccārite sadyaḥ so'pi pāpātpramucyate

हे चतुर्मुख! जो मेरे मथुरा-मंदिर के विषय में सुनता है — भले ही किसी अन्य के द्वारा कहा गया हो — वह भी तुरंत पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 13 (skanda.2.150.13)

त्रिरात्रमपि ये तत्र वसंति मनुजाः सुत ।। तेषां पुनंति सहृष्टाः स्पृष्टाश्चरणरेणवः

trirātramapi ye tatra vasaṁti manujāḥ suta teṣāṁ punaṁti sahṛṣṭāḥ spṛṣṭāścaraṇareṇavaḥ

हे पुत्र! जो मनुष्य वहाँ तीन रात्रि भी निवास करते हैं, प्रसन्न होकर उनके चरणों की धूलि भी अन्यों को पवित्र करती है।

श्लोक 14 (skanda.2.150.14)

यथा तृणसमूहं तु ज्वलयंति स्फुलिंगकाः ।। तथा महांति पापानि दहते मथुरा पुरी

yathā tṛṇasamūhaṁ tu jvalayaṁti sphuliṁgakāḥ tathā mahāṁti pāpāni dahate mathurā purī

जैसे चिंगारियाँ तृण के ढेर को जला देती हैं, वैसे ही मथुरा नगरी महान पापों को भी जला डालती है।

श्लोक 15 (skanda.2.150.15)

स्नानेन सर्वतीर्थानां यः स्यात्सुकृतसंचयः ।। ततोऽधिकतरं प्रोक्ता मथुरा सर्वमंडले

snānena sarvatīrthānāṁ yaḥ syātsukṛtasaṁcayaḥ tato'dhikataraṁ proktā mathurā sarvamaṁḍale

समस्त तीर्थों में स्नान करने से जो पुण्य-संचय होता है, समस्त मण्डल में मथुरा उससे भी अधिक कही गई है।

श्लोक 16 (skanda.2.150.16)

चतुर्णामपि वेदानां पुण्यमध्ययनाच्च यत् ।। तत्पुण्यं जायते तत्र मथुरां स्मरतां नृणाम्

caturṇāmapi vedānāṁ puṇyamadhyayanācca yat tatpuṇyaṁ jāyate tatra mathurāṁ smaratāṁ nṛṇām

चारों वेदों के अध्ययन से जो पुण्य होता है, वही पुण्य वहाँ मथुरा का स्मरण करने वाले मनुष्यों को प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (skanda.2.150.17)

अन्यत्र हि कृतं पापं तीर्थमासाद्य नश्यति ।। तीर्थेषु यत्कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति

anyatra hi kṛtaṁ pāpaṁ tīrthamāsādya naśyati tīrtheṣu yatkṛtaṁ pāpaṁ vajralepo bhaviṣyati

अन्यत्र किया गया पाप तीर्थ को प्राप्त करके नष्ट हो जाता है, परन्तु तीर्थों में किया गया पाप वज्र-लेप के समान अमिट हो जाता है।

श्लोक 18 (skanda.2.150.18)

मथुरायां कृतं पापं मथुरायां प्रणश्यति ।। धर्मार्थकाममोक्षाख्यं स्थित्वा तत्र लभेन्नरः

mathurāyāṁ kṛtaṁ pāpaṁ mathurāyāṁ praṇaśyati dharmārthakāmamokṣākhyaṁ sthitvā tatra labhennaraḥ

मथुरा में किया गया पाप मथुरा में ही नष्ट हो जाता है; वहाँ रहकर मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थ प्राप्त करता है।

श्लोक 19 (skanda.2.150.19)

अन्यत्र दशभिर्वर्षैः प्रारब्धं भुज्यते हि यत् ।। किल्विषं च चतुर्वक्त्र माथुरे दशभिर्दिनैः

anyatra daśabhirvarṣaiḥ prārabdhaṁ bhujyate hi yat kilviṣaṁ ca caturvaktra māthure daśabhirdinaiḥ

हे चतुर्मुख! अन्यत्र दस वर्षों में आरम्भ किया गया जो पाप भोगा जाता है, वह मथुरा में दस दिनों में ही समाप्त हो जाता है।

श्लोक 20 (skanda.2.150.20)

दिवि नैव न पाताले नांतरिक्षे न मानुषे ।। समं तु मथुरायां हि प्रियं मम सदैव हि

divi naiva na pātāle nāṁtarikṣe na mānuṣe samaṁ tu mathurāyāṁ hi priyaṁ mama sadaiva hi

न स्वर्ग में, न पाताल में, न अंतरिक्ष में, न मनुष्यलोक में — मथुरा के समान कुछ भी नहीं है; वह मुझे सदा ही अत्यंत प्रिय है।

श्लोक 21 (skanda.2.150.21)

सर्वेषामेव तीर्थानां माथुरं परमं महत् ।। बालक्रीडनरूपाणि कृतानि सह गोपकैः

sarveṣāmeva tīrthānāṁ māthuraṁ paramaṁ mahat bālakrīḍanarūpāṇi kṛtāni saha gopakaiḥ

समस्त तीर्थों में मथुरा का तीर्थ ही परम और महान है — वहीं ग्वालों के साथ बाल-क्रीड़ा के रूप संपन्न हुए।

श्लोक 22 (skanda.2.150.22)

त्रिंशद्वर्षसहस्राणि त्रिंशद्वर्षशतानि च ।। यत्फलं भारते वर्षे तत्फलं मथुरां स्मरन्

triṁśadvarṣasahasrāṇi triṁśadvarṣaśatāni ca yatphalaṁ bhārate varṣe tatphalaṁ mathurāṁ smaran

भारतवर्ष में तीस हजार वर्षों तथा तीन हजार वर्षों में जो फल प्राप्त होता है, वही फल मथुरा के स्मरण मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 23 (skanda.2.150.23)

सन्निहत्यां तु यत्पुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे ।। ततोधिकं लभेत्पुत्र मथुरायां दिनेदिने

sannihatyāṁ tu yatpuṇyaṁ rāhugraste divākare tatodhikaṁ labhetputra mathurāyāṁ dinedine

हे पुत्र! सन्निहत्य तीर्थ में सूर्य के राहु-ग्रस्त होने पर जो पुण्य होता है, उससे भी अधिक मथुरा में प्रतिदिन प्राप्त होता है।

श्लोक 24 (skanda.2.150.24)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु तीर्थराजे तु यत्फलम् ।। तत्फलं लभते पुत्र सहोमासे मधोः पुरे

pūrṇe varṣasahasre tu tīrtharāje tu yatphalam tatphalaṁ labhate putra sahomāse madhoḥ pure

हे पुत्र! तीर्थराज (प्रयाग) में पूरे एक हजार वर्षों में जो फल प्राप्त होता है, वही फल सहोम मास में मधुपुरी में प्राप्त होता है।

श्लोक 25 (skanda.2.150.25)

पूर्णे वर्षसहस्रे तु वाराणस्यां च यत्फलम् ।। तत्फलं लभते पुत्र मथुरायां सहो दिने

pūrṇe varṣasahasre tu vārāṇasyāṁ ca yatphalam tatphalaṁ labhate putra mathurāyāṁ saho dine

हे पुत्र! वाराणसी में पूरे एक हजार वर्षों में जो फल प्राप्त होता है, वही फल मथुरा में सहोम मास के एक ही दिन में प्राप्त होता है।

श्लोक 26 (skanda.2.150.26)

गोदावरीद्वारकयोर्नरो यः क्षेत्रे कुरूणां क्षितिदायको यः ।। षण्मासकात्साधयते गयायां समं भवेन्नो दिनमेकमाथुरम्

godāvarīdvārakayornaro yaḥ kṣetre kurūṇāṁ kṣitidāyako yaḥ ṣaṇmāsakātsādhayate gayāyāṁ samaṁ bhavenno dinamekamāthuram

गोदावरी और द्वारका में, कुरुक्षेत्र में, अथवा भूमि-दान करने वाला जो पुरुष, अथवा गया में छह महीनों में जो साधता है, वह सब मथुरा के एक ही दिन के समान नहीं है।

श्लोक 27 (skanda.2.150.27)

न द्वारका काशिकांची न माया गदाधरो यस्य समं न तीर्थम् ।। संतर्पिता यद्यमुनाजलेन वांछंति नो वै पितरः पिंडदानम्

na dvārakā kāśikāṁcī na māyā gadādharo yasya samaṁ na tīrtham saṁtarpitā yadyamunājalena vāṁchaṁti no vai pitaraḥ piṁḍadānam

न द्वारका, न काशी, न कांची, न अयोध्या, न गया — कोई भी तीर्थ इसके समान नहीं है; यमुना के जल से तृप्त हुए पितर अन्यत्र पिण्डदान की इच्छा ही नहीं रखते।

श्लोक 28 (skanda.2.150.28)

मथुरायां प्रकुर्वंति पुरीसाधारणीदृशम् ।। ये नरास्तेऽपि विज्ञेयाः पापराशिभिरन्विताः

mathurāyāṁ prakurvaṁti purīsādhāraṇīdṛśam ye narāste'pi vijñeyāḥ pāparāśibhiranvitāḥ

जो मनुष्य मथुरा को साधारण नगरी के समान समझते हैं, वे भी पापों के ढेर से युक्त ही जानने चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.2.150.29)

न दृष्टा मथुरा येन दिदृक्षा यस्य जायते ।। यत्र तत्र मृतस्याऽपि माथुरे जन्म जायते

na dṛṣṭā mathurā yena didṛkṣā yasya jāyate yatra tatra mṛtasyā'pi māthure janma jāyate

जिसने मथुरा नहीं देखी, जिसे उसे देखने की इच्छा भी नहीं होती — वह चाहे कहीं भी मरे, उसका जन्म भी अंततः मथुरा में ही होता है।

श्लोक 30 (skanda.2.150.30)

भूमे रजांसि गणयेत्कालेनाऽपि चतुर्मुख ।। माथुरे यानि तीर्थानि तेषां संख्या न विद्यते

bhūme rajāṁsi gaṇayetkālenā'pi caturmukha māthure yāni tīrthāni teṣāṁ saṁkhyā na vidyate

हे चतुर्मुख! सम्पूर्ण काल में भी पृथ्वी के कणों को गिना जा सकता है, परन्तु मथुरा के तीर्थों की संख्या नहीं जानी जा सकती।

श्लोक 31 (skanda.2.150.31)

कुरु भोः कुरु भो वासं मथुराख्यां पुरीं प्रति ।। वसामि सततं तस्यां गोपकन्याभिरावृतः

kuru bhoḥ kuru bho vāsaṁ mathurākhyāṁ purīṁ prati vasāmi satataṁ tasyāṁ gopakanyābhirāvṛtaḥ

'आओ, आओ, मथुरा नामक नगरी में निवास करो; मैं वहाँ गोपकन्याओं से घिरा हुआ निरंतर निवास करता हूँ।'

श्लोक 32 (skanda.2.150.32)

रेरे संसारमग्नाश्च शिष्या मे शृणुताऽपरे ।। यदीच्छथ सुखं सांद्रं वासं कुरुत मत्पुरीम्

rere saṁsāramagnāśca śiṣyā me śṛṇutā'pare yadīcchatha sukhaṁ sāṁdraṁ vāsaṁ kuruta matpurīm

'अरे संसार में डूबे हुए मेरे अन्य शिष्यो! सुनो — यदि तुम सघन सुख चाहते हो, तो मेरी नगरी में निवास करो।'

श्लोक 33 (skanda.2.150.33)

अहो लोको महानंदो नेत्रयुक्तो न पश्यति ।। माथुरे विद्यमानेऽपि संसृतिं भजते सदा

aho loko mahānaṁdo netrayukto na paśyati māthure vidyamāne'pi saṁsṛtiṁ bhajate sadā

अहो! संसार महामोहग्रस्त है, आँखें रखते हुए भी नहीं देखता; मथुरा के विद्यमान रहते भी वह सदा संसार-चक्र में ही रत रहता है।

श्लोक 34 (skanda.2.150.34)

मानुषीं योनिमतुलां लब्ध्वा भाग्यस्य योगतः ।। वृथैवायुर्गतं तेषां न दृष्टा मथुरापुरी

mānuṣīṁ yonimatulāṁ labdhvā bhāgyasya yogataḥ vṛthaivāyurgataṁ teṣāṁ na dṛṣṭā mathurāpurī

भाग्यवश दुर्लभ मानव-योनि प्राप्त करके भी, जिन्होंने मथुरापुरी नहीं देखी, उनकी आयु व्यर्थ ही बीत गई।

श्लोक 35 (skanda.2.150.35)

अहो मतेः सुदौर्बल्यमहो भाग्यस्य दुर्विधिः ।। अहो मोहस्य महिमा मथुरा नैव सेव्यते

aho mateḥ sudaurbalyamaho bhāgyasya durvidhiḥ aho mohasya mahimā mathurā naiva sevyate

अहो, बुद्धि की महान दुर्बलता! अहो, भाग्य की विडंबना! अहो, मोह की महिमा! कि मथुरा का सेवन ही नहीं किया जाता।

श्लोक 36 (skanda.2.150.36)

मथुरां तु परित्यज्य योऽन्यत्र कुरुते मतिम् ।। मूढो भ्रमति संसारे मोहितो मम मायया

mathurāṁ tu parityajya yo'nyatra kurute matim mūḍho bhramati saṁsāre mohito mama māyayā

जो मथुरा को त्यागकर कहीं अन्यत्र मन लगाता है, वह मूढ़ मेरी माया से मोहित होकर संसार में भटकता रहता है।

श्लोक 37 (skanda.2.150.37)

मथुरामपि संप्राप्य योऽन्यत्र कुरुते स्पृहाम् ।। दुर्बुद्धेस्तस्य किं ज्ञानं सोऽज्ञानेन विजृंभितः ।।

mathurāmapi saṁprāpya yo'nyatra kurute spṛhām durbuddhestasya kiṁ jñānaṁ so'jñānena vijṛṁbhitaḥ

जो मथुरा को प्राप्त करके भी अन्यत्र स्पृहा रखता है, उस दुर्बुद्धि को क्या ज्ञान है? वह केवल अज्ञान से ही फूला हुआ है।

श्लोक 38 (skanda.2.150.38)

मात्रा पित्रा परित्यक्ता ये त्यक्ता निजबंधुभिः ।। येषां क्वापि गतिर्नास्ति तेषां मम पुरी गतिः

mātrā pitrā parityaktā ye tyaktā nijabaṁdhubhiḥ yeṣāṁ kvāpi gatirnāsti teṣāṁ mama purī gatiḥ

जिन्हें माता-पिता ने त्याग दिया है, जिन्हें अपने बंधुओं ने त्याग दिया है, जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उनकी गति मेरी ही नगरी है।

श्लोक 39 (skanda.2.150.39)

पापराशिभिराक्रांता ये दारिद्र्य पराजिताः ।। येषां क्वापि गतिर्नास्ति तेषां मम पुरी गतिः

pāparāśibhirākrāṁtā ye dāridrya parājitāḥ yeṣāṁ kvāpi gatirnāsti teṣāṁ mama purī gatiḥ

जो पापों के ढेर से आक्रांत हैं, जो दरिद्रता से पराजित हैं, जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उनकी गति मेरी ही नगरी है।

श्लोक 40 (skanda.2.150.40)

सारात्सारतरं स्थानं गुह्याद्गुह्यतरं परम् ।। गतिमन्वेषमाणानां मथुरा परमा गतिः

sārātsārataraṁ sthānaṁ guhyādguhyataraṁ param gatimanveṣamāṇānāṁ mathurā paramā gatiḥ

सारों में सारतम, गुह्यों में परम गुह्यतम स्थान — गति ढूँढने वालों के लिए मथुरा ही परम गति है।

श्लोक 41 (skanda.2.150.41)

न तत्पुण्यैर्न तद्दानैर्न तपोभिर्न तु स्तवैः ।। न लभ्यं विविधैर्योगैर्लभ्यं मदनुभावतः

na tatpuṇyairna taddānairna tapobhirna tu stavaiḥ na labhyaṁ vividhairyogairlabhyaṁ madanubhāvataḥ

वह न पुण्यों से, न दानों से, न तपों से, न स्तवों से, न विविध योगों से प्राप्त होती है — वह केवल मेरे ही अनुग्रह से प्राप्त होती है।

श्लोक 42 (skanda.2.150.42)

मयि येषां स्थिरा भक्तिर्भूयसी येषु मत्कृपा ।। तेषामेव हि धन्यानां मथुरायां भवेद्गतिः

mayi yeṣāṁ sthirā bhaktirbhūyasī yeṣu matkṛpā teṣāmeva hi dhanyānāṁ mathurāyāṁ bhavedgatiḥ

जिनकी मुझमें स्थिर भक्ति है और जिन पर मेरी कृपा प्रचुर है, उन्हीं धन्य पुरुषों को ही मथुरा में गति प्राप्त होती है।

श्लोक 43 (skanda.2.150.43)

या गतिर्योगयुक्तस्य ब्रह्मज्ञस्य मनीषिणः ।। सा गतिस्त्यजतः प्राणान्मथुरायां नरस्य च

yā gatiryogayuktasya brahmajñasya manīṣiṇaḥ sā gatistyajataḥ prāṇānmathurāyāṁ narasya ca

योगयुक्त, ब्रह्मज्ञ, मनीषी पुरुष को जो गति प्राप्त होती है, वही गति मथुरा में प्राणत्याग करने वाले मनुष्य को भी प्राप्त होती है।

श्लोक 44 (skanda.2.150.44)

काश्यादिपुर्यो यदि संति लोके तासां तु मध्ये मथुरैव धन्या ।। या जन्ममौंजीव्रतमुक्तिदानैर्नृणां चतुर्धा विदधाति मुक्तिम् ।।

kāśyādipuryo yadi saṁti loke tāsāṁ tu madhye mathuraiva dhanyā yā janmamauṁjīvratamuktidānairnṛṇāṁ caturdhā vidadhāti muktim

यदि संसार में काशी आदि नगरियाँ हैं, तो उनमें भी मथुरा ही धन्य है, जो मनुष्यों को जन्म से, उपनयन-व्रत से, जीवन से और (मृत्यु के) दान से — इन चार प्रकारों से मुक्ति प्रदान करती है।

श्लोक 45 (skanda.2.150.45)

न योगैर्या गतिर्लभ्या मन्वंतरशतैरपि ।। अन्यत्र हेलया साऽत्र लभ्यते मत्प्रसादतः

na yogairyā gatirlabhyā manvaṁtaraśatairapi anyatra helayā sā'tra labhyate matprasādataḥ

जो गति योग से सैकड़ों मन्वंतरों में भी प्राप्त नहीं होती, वही गति यहाँ, मेरी कृपा से, सहजता से प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 46 (skanda.2.150.46)

न पापेभ्यो भयं यत्र न भयं यत्र वै यमात् ।। न गर्भवासभीर्यत्र तत्क्षेत्रं को न संश्रयेत्

na pāpebhyo bhayaṁ yatra na bhayaṁ yatra vai yamāt na garbhavāsabhīryatra tatkṣetraṁ ko na saṁśrayet

जहाँ न पापों का भय है, न यम का कोई भय है, न गर्भवास का भय है — उस क्षेत्र का आश्रय कौन नहीं लेगा?

श्लोक 47 (skanda.2.150.47)

मथुरायां च यत्पुण्यं तत्पुण्यस्य फलं शृणु ।। मथुरायां समासाद्य मथुरायां मृता हि ये

mathurāyāṁ ca yatpuṇyaṁ tatpuṇyasya phalaṁ śṛṇu mathurāyāṁ samāsādya mathurāyāṁ mṛtā hi ye

मथुरा में जो पुण्य है, उस पुण्य के फल को सुनो; जो मथुरा को प्राप्त करके मथुरा में ही मृत्यु पाते हैं—

श्लोक 48 (skanda.2.150.48)

अपि कीटपतंगाद्या जायंते ते चतुर्भुजाः ।। कूलात्पतंति ये वृक्षास्तेऽपि यांति परां गतिम्

api kīṭapataṁgādyā jāyaṁte te caturbhujāḥ kūlātpataṁti ye vṛkṣāste'pi yāṁti parāṁ gatim

—वे कीट-पतंग आदि होकर भी अंततः चतुर्भुज हो जाते हैं; तट से गिरने वाले वृक्ष भी परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.150.49)

मूका जडांधबधिरास्तपोनियमवर्जिताः ।। कालेनैव मृता ये च मम लोकं व्रजंति ते

mūkā jaḍāṁdhabadhirāstaponiyamavarjitāḥ kālenaiva mṛtā ye ca mama lokaṁ vrajaṁti te

मूक, जड़, अंधे, बहरे, तप और नियम से रहित, जो केवल काल से ही वहाँ मृत्यु पाते हैं, वे भी मेरे लोक को जाते हैं।

श्लोक 50 (skanda.2.150.50)

सर्पदष्टाः पशुहताः पावकांबुविनाशिताः।। लब्धाऽपमृत्यवो ये च माथुरे मम लोकगाः

sarpadaṣṭāḥ paśuhatāḥ pāvakāṁbuvināśitāḥ labdhā'pamṛtyavo ye ca māthure mama lokagāḥ

सर्प-दंश से मरे, पशुओं द्वारा मारे गए, अग्नि या जल से नष्ट हुए, अकाल-मृत्यु को प्राप्त हुए जो भी मथुरा में हैं, वे मेरे लोक को जाते हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.150.51)

सत्यं सत्यं मुनिश्रेष्ठ ब्रुवे शपथपूर्वकम् ।। सर्वाऽभीष्टप्रदं नान्यन्मथुरायाः समं क्वचित्

satyaṁ satyaṁ muniśreṣṭha bruve śapathapūrvakam sarvā'bhīṣṭapradaṁ nānyanmathurāyāḥ samaṁ kvacit

हे मुनिश्रेष्ठ! मैं शपथपूर्वक सत्य ही, सत्य ही कहता हूँ — मथुरा के समान सर्वाभीष्ट देने वाला कहीं कुछ भी नहीं है।

श्लोक 52 (skanda.2.150.52)

त्रिवर्गदा कामिनां या मुमुक्षूणां च मुक्तिदा ।। भक्तीच्छोर्भक्तिदा कस्तां मथुरां नाऽऽश्रयेद्बुधः

trivargadā kāmināṁ yā mumukṣūṇāṁ ca muktidā bhaktīcchorbhaktidā kastāṁ mathurāṁ nā''śrayedbudhaḥ

वह भोग की इच्छा रखने वालों को त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) देती है, मुमुक्षुओं को मुक्ति देती है, भक्ति चाहने वालों को भक्ति देती है — ऐसी मथुरा का आश्रय कौन बुद्धिमान नहीं लेगा?

श्लोक 53 (skanda.2.150.53)

एतादृशी मधुपुरी कर्त्तव्या मार्गशीर्षके ।। तदभावे पुष्करं हि कर्तव्यं विधिपूर्वकम्

etādṛśī madhupurī karttavyā mārgaśīrṣake tadabhāve puṣkaraṁ hi kartavyaṁ vidhipūrvakam

ऐसी मधुपुरी की यात्रा मार्गशीर्ष में करनी चाहिए; उसके अभाव में विधिपूर्वक पुष्कर की यात्रा करनी चाहिए।

श्लोक 54 (skanda.2.150.54)

ज्येष्ठं हि ब्रह्मणः कुण्डं मध्यं कुण्डं च वैष्णवम् ।। कनिष्ठं रुद्रदैवत्यमिति जानीहि बुद्धिमन्

jyeṣṭhaṁ hi brahmaṇaḥ kuṇḍaṁ madhyaṁ kuṇḍaṁ ca vaiṣṇavam kaniṣṭhaṁ rudradaivatyamiti jānīhi buddhiman

हे बुद्धिमान! जानो कि सबसे बड़ा कुण्ड ब्रह्मा का है, मध्य कुण्ड वैष्णव है, और सबसे छोटा कुण्ड रुद्र देवता का है।

श्लोक 55 (skanda.2.150.55)

एषु स्नानं च दानं च श्राद्धं च विधिपूर्वकम् ।। पूजा च महती कार्या मम प्रीतिकरा सुत

eṣu snānaṁ ca dānaṁ ca śrāddhaṁ ca vidhipūrvakam pūjā ca mahatī kāryā mama prītikarā suta

हे पुत्र! इनमें स्नान, दान, विधिपूर्वक श्राद्ध, तथा मुझे प्रीति देने वाली महती पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 56 (skanda.2.150.56)

पूर्णा या तु भवेत्पुत्र सहोमासे मम प्रिया ।। तस्यां यत्क्रियते पुण्यं मम प्रीतिकरं भवेत्

pūrṇā yā tu bhavetputra sahomāse mama priyā tasyāṁ yatkriyate puṇyaṁ mama prītikaraṁ bhavet

हे पुत्र! सहोम मास में जो पूर्णिमा मुझे प्रिय है, उस पर किया गया पुण्य मुझे प्रसन्न करता है।

श्लोक 57 (skanda.2.150.57)

गोदानमन्नदानं च हेमदानं च पुत्रक ।। धरादानं च कर्तव्यं पूर्णायां विधिपूर्वकम्

godānamannadānaṁ ca hemadānaṁ ca putraka dharādānaṁ ca kartavyaṁ pūrṇāyāṁ vidhipūrvakam

हे पुत्र! गोदान, अन्नदान, स्वर्णदान और भूमिदान — यह सब पूर्णिमा को विधिपूर्वक करना चाहिए।

श्लोक 58 (skanda.2.150.58)

सहोमासे हि पूर्णायां सद्मदानं च कारयेत् ।। यत्किंचित्क्रियते पूर्णं तदक्षय्यफलं भवेत्

sahomāse hi pūrṇāyāṁ sadmadānaṁ ca kārayet yatkiṁcitkriyate pūrṇaṁ tadakṣayyaphalaṁ bhavet

सहोम मास की पूर्णिमा को गृह-दान भी करना चाहिए; इस दिन जो भी सम्पूर्ण रूप से किया जाता है, वह अक्षय फल देने वाला होता है।

श्लोक 59 (skanda.2.150.59)

ब्रह्मभोज्यं हि कर्तव्यं यथाविभवसारतः ।। पूर्णायामेव कर्तव्य उत्सवो व्रतपूर्त्तये

brahmabhojyaṁ hi kartavyaṁ yathāvibhavasārataḥ pūrṇāyāmeva kartavya utsavo vratapūrttaye

अपनी सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिए; व्रत की पूर्णता के लिए उत्सव पूर्णिमा को ही करना चाहिए।

श्लोक 60 (skanda.2.150.60)

यादृशी मथुरा पुत्र सहोमासे मम प्रिया ।। न तथा तीर्थराजाद्यास्तदभावे च पुष्करम्

yādṛśī mathurā putra sahomāse mama priyā na tathā tīrtharājādyāstadabhāve ca puṣkaram

हे पुत्र! सहोम मास में मथुरा जितनी मुझे प्रिय है, उतना तीर्थराज आदि भी नहीं; उसके अभाव में पुष्कर श्रेष्ठ है।

श्लोक 61 (skanda.2.150.61)

पुष्करे मथुरायां वै पूर्णा कार्या विचक्षणैः ।। यत्र कुत्रापि वा कार्या विधियुक्ता च पूर्णिमा

puṣkare mathurāyāṁ vai pūrṇā kāryā vicakṣaṇaiḥ yatra kutrāpi vā kāryā vidhiyuktā ca pūrṇimā

विचक्षण पुरुषों को पुष्कर अथवा मथुरा में पूर्णिमा-व्रत करना चाहिए; अथवा जहाँ कहीं भी हों, वहाँ विधिपूर्वक पूर्णिमा करनी चाहिए।

श्लोक 62 (skanda.2.150.62)

स्नानं दानं तथा पूजां पूर्णायां न करोति यः ।। षष्टिवर्षसहस्राणि पच्यते रौरवादिषु

snānaṁ dānaṁ tathā pūjāṁ pūrṇāyāṁ na karoti yaḥ ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi pacyate rauravādiṣu

जो पूर्णिमा को स्नान, दान और पूजा नहीं करता, वह साठ हजार वर्षों तक रौरव आदि नरकों में पकाया जाता है।

श्लोक 63 (skanda.2.150.63)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन मान्या पूर्णा विचक्षणैः ।। मार्गशीर्षेण संयुक्ता अनंतफलदायिनी

tasmātsarvaprayatnena mānyā pūrṇā vicakṣaṇaiḥ mārgaśīrṣeṇa saṁyuktā anaṁtaphaladāyinī

इसलिए मार्गशीर्ष से युक्त, अनंत फल देने वाली पूर्णिमा का विचक्षण पुरुषों द्वारा सम्पूर्ण प्रयत्न से सम्मान किया जाना चाहिए।

श्लोक 64 (skanda.2.150.64)

यथा ते कथितं वत्स मार्गशीर्षं मम प्रियम् ।। करोति यो नरो भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु

yathā te kathitaṁ vatsa mārgaśīrṣaṁ mama priyam karoti yo naro bhaktyā tasya puṇyaphalaṁ śṛṇu

हे वत्स! जैसा मैंने तुम्हें बताया कि मार्गशीर्ष मुझे प्रिय है — जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक करता है, उसके पुण्य-फल को सुनो।

श्लोक 65 (skanda.2.150.65)

तीर्थायुतेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं व्रतकोटिभिः ।। सर्वयज्ञेषु यत्पुण्यं तत्पुण्यं समवाप्नुयात्

tīrthāyuteṣu yatpuṇyaṁ yatpuṇyaṁ vratakoṭibhiḥ sarvayajñeṣu yatpuṇyaṁ tatpuṇyaṁ samavāpnuyāt

दस हजार तीर्थों में जो पुण्य है, करोड़ों व्रतों में जो पुण्य है, समस्त यज्ञों में जो पुण्य है — वह सब पुण्य वह प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 66 (skanda.2.150.66)

अपुत्रो लभते पुत्रं निर्धनो धनमेव च ।। विद्यार्थी च तथा विद्यां रूपार्थी रूपमाप्नुयात्

aputro labhate putraṁ nirdhano dhanameva ca vidyārthī ca tathā vidyāṁ rūpārthī rūpamāpnuyāt

पुत्रहीन को पुत्र प्राप्त होता है, निर्धन को धन ही प्राप्त होता है; विद्यार्थी को विद्या और रूप चाहने वाले को रूप प्राप्त होता है।

श्लोक 67 (skanda.2.150.67)

ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी क्षत्रियो विजयी भवेत् ।। वैश्यो निधिपतित्वं च शूद्रः शुद्ध्येत पातकात्

brāhmaṇo brahmavarcasvī kṣatriyo vijayī bhavet vaiśyo nidhipatitvaṁ ca śūdraḥ śuddhyeta pātakāt

ब्राह्मण ब्रह्मतेज से युक्त होता है, क्षत्रिय विजयी होता है; वैश्य निधियों का स्वामी बनता है, और शूद्र पाप से शुद्ध हो जाता है।

श्लोक 68 (skanda.2.150.68)

यद्दुर्लभं च दुष्प्राप्यं त्रिषु लोकेषु मानद ।। तत्सर्वं प्राप्नुयान्मर्त्यः सहोमासे न संशयः

yaddurlabhaṁ ca duṣprāpyaṁ triṣu lokeṣu mānada tatsarvaṁ prāpnuyānmartyaḥ sahomāse na saṁśayaḥ

हे मानद! तीनों लोकों में जो भी दुर्लभ और दुष्प्राप्य है, वह सब मनुष्य सहोम मास में निःसंदेह प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 69 (skanda.2.150.69)

यद्यप्येतेषु कामेषु सक्ता ये मानवाः सुत ।। तुष्टा ह्यंते चतुर्वक्त्र न कामार्हा महाभुज

yadyapyeteṣu kāmeṣu saktā ye mānavāḥ suta tuṣṭā hyaṁte caturvaktra na kāmārhā mahābhuja

हे पुत्र! फिर भी जो मनुष्य इन्हीं कामनाओं में आसक्त रहते हैं, हे चतुर्मुख! हे महाबाहु! वे अंत में संतुष्ट होकर भी वास्तव में कामनाओं के योग्य नहीं हैं।

श्लोक 70 (skanda.2.150.70)

सुदुर्लभा हि सद्भक्तिर्मम वश्यकरी शुभा ।। सा वै संप्राप्यते पुत्र सहोमासे श्रुते तथा

sudurlabhā hi sadbhaktirmama vaśyakarī śubhā sā vai saṁprāpyate putra sahomāse śrute tathā

मुझे वश में करने वाली शुभ सद्भक्ति अत्यंत दुर्लभ है, परन्तु हे पुत्र! वह भी सहोम मास की महिमा सुनने से प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 71 (skanda.2.150.71)

मम प्रीतिकरं मासं सर्वदा मम वल्लभम् ।। सर्वं संप्राप्यतेऽमुष्मान्मत्प्रसादाच्चतुर्मुख

mama prītikaraṁ māsaṁ sarvadā mama vallabham sarvaṁ saṁprāpyate'muṣmānmatprasādāccaturmukha

हे चतुर्मुख! मुझे सदा प्रसन्नता देने वाला, सदा मुझे प्रिय यह मास — इससे मेरी कृपा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है।

अध्याय 149अध्याय-सूचीअध्याय 151