वैष्णव खण्ड · अध्याय 151
शाण्डिल्य-उपदिष्ट व्रजभूमि-माहात्म्य-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.151.1)
।। व्यास उवाच ।। ।। श्रीसच्चिदानन्दघनस्वरूपिणे कृष्णाय चानन्तसुखाभिवर्षिणे ।। विश्वोद्भवस्थाननिरोधहेतवे नुमो वयं भक्तिरसाप्तयेऽनिशम्
vyāsa uvāca śrīsaccidānandaghanasvarūpiṇe kṛṣṇāya cānantasukhābhivarṣiṇe viśvodbhavasthānanirodhahetave numo vayaṁ bhaktirasāptaye'niśam
व्यास जी ने कहा — हम सत्-चित्-आनन्द के सघन स्वरूप वाले, अनन्त सुख की वर्षा करने वाले, विश्व की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारणभूत श्रीकृष्ण को निरन्तर नमन करते हैं, जिससे हमें भक्ति-रस की प्राप्ति हो।
श्लोक 2 (skanda.2.151.2)
नैमिषे सूतमासीनमभिवाद्य महामतिम् ।। कथामृतरसास्वादकुशला ऋषयोऽब्रुवन्
naimiṣe sūtamāsīnamabhivādya mahāmatim kathāmṛtarasāsvādakuśalā ṛṣayo'bruvan
नैमिषारण्य में बैठे हुए महामति सूत जी को प्रणाम करके, कथा के अमृत-रस का आस्वादन करने में कुशल ऋषियों ने कहा।
श्लोक 3 (skanda.2.151.3)
।। ऋषय ऊचुः ।। ।। वज्रं श्रीमाथुरे देशे स्वपौत्रं हस्तिनापुरे ।। अभिषिच्य गते राज्ञि तौ कथं किं च चक्रतुः
ṛṣaya ūcuḥ vajraṁ śrīmāthure deśe svapautraṁ hastināpure abhiṣicya gate rājñi tau kathaṁ kiṁ ca cakratuḥ
ऋषियों ने कहा — मथुरा देश में वज्र को तथा हस्तिनापुर में अपने पौत्र (परीक्षित्) को राज्याभिषिक्त करके जब राजा (युधिष्ठिर) महाप्रस्थान को गए, तब उन दोनों ने क्या और कैसे किया, हे सूत, वह कहिए।
श्लोक 4 (skanda.2.151.4)
।। सूत उवाच ।। ।। नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।। देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्
sūta uvāca nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam devīṁ sarasvatīṁ vyāsaṁ tato jayamudīrayet
सूत जी ने कहा — नारायण को, नर अर्थात् नरोत्तम को, देवी सरस्वती को और व्यास जी को नमस्कार करके तत्पश्चात् जय (महाभारत) का उच्चारण करना चाहिए।
श्लोक 5 (skanda.2.151.5)
महापथं गते राज्ञि परीक्षित्पृथिवीपतिः ।। जगाम मथुरां विप्रा वज्रनाभदिदृक्षया
mahāpathaṁ gate rājñi parīkṣitpṛthivīpatiḥ jagāma mathurāṁ viprā vajranābhadidṛkṣayā
हे विप्रो, जब राजा महाप्रस्थान को चले गए, तब पृथ्वीपति परीक्षित् वज्रनाभ को देखने की इच्छा से मथुरा गए।
श्लोक 6 (skanda.2.151.6)
पितृव्यमागतं ज्ञात्वा वज्रः प्रेमपरिप्लुतः ।। अभिगम्याभिवाद्याथ निनाय निजमन्दिरम्
pitṛvyamāgataṁ jñātvā vajraḥ premapariplutaḥ abhigamyābhivādyātha nināya nijamandiram
अपने पितृव्य को आया जानकर, प्रेम से आप्लावित वज्र ने पास जाकर प्रणाम किया और उन्हें अपने भवन में ले गए।
श्लोक 7 (skanda.2.151.7)
परिष्वज्य स तं वीरः कृष्णैकगतमानसः ।। रोहिण्याद्या हरेः पत्नीर्ववन्दायतनागतः
pariṣvajya sa taṁ vīraḥ kṛṣṇaikagatamānasaḥ rohiṇyādyā hareḥ patnīrvavandāyatanāgataḥ
कृष्ण में एकनिष्ठ मन वाले उस वीर वज्र ने उन्हें आलिंगन किया, और अन्तःपुर में जाकर परीक्षित् ने रोहिणी आदि हरि की पत्नियों को प्रणाम किया।
श्लोक 8 (skanda.2.151.8)
ताभिः सम्मानितोऽत्यर्थं परीक्षित्पृथिवीपतिः ।। विश्रान्तः सुखमासीनो वज्रनाभमुवाच ह
tābhiḥ sammānito'tyarthaṁ parīkṣitpṛthivīpatiḥ viśrāntaḥ sukhamāsīno vajranābhamuvāca ha
उनके द्वारा अत्यन्त सम्मानित पृथ्वीपति परीक्षित् विश्राम करके सुखपूर्वक बैठे और वज्रनाभ से बोले।
श्लोक 9 (skanda.2.151.9)
।। श्रीपरीक्षिदुवाच ।। ।। तात त्वत्पितृभिर्नूनमस्मत्पितृपितामहाः ।। उद्धृता भूरिदुःखौघादहं च परिरक्षितः
śrīparīkṣiduvāca tāta tvatpitṛbhirnūnamasmatpitṛpitāmahāḥ uddhṛtā bhūriduḥkhaughādahaṁ ca parirakṣitaḥ
परीक्षित् ने कहा — हे तात, निश्चय ही तुम्हारे पूर्वजों द्वारा हमारे पिता-पितामह दुःखों की भारी बाढ़ से उद्धृत हुए, और मेरी भी रक्षा हुई।
श्लोक 10 (skanda.2.151.10)
न पारयाम्यहं तात साधु कृत्वोपकारतः ।। त्वामतः प्रार्थयाम्यङ्ग सुखं राज्येऽनुयुज्यताम्
na pārayāmyahaṁ tāta sādhu kṛtvopakārataḥ tvāmataḥ prārthayāmyaṅga sukhaṁ rājye'nuyujyatām
हे तात, मैं उस उपकार का उचित प्रत्युपकार करने में समर्थ नहीं हूँ; अतः हे प्रिय, मैं तुमसे केवल यह प्रार्थना करता हूँ कि तुम सुखपूर्वक अपने राज्य में लगे रहो।
श्लोक 11 (skanda.2.151.11)
कोशसैन्यादिजा चिन्ता तथारिदमनादिजा ।। मनागपि न कार्या ते सुसेव्याः किन्तु मातरः
kośasainyādijā cintā tathāridamanādijā manāgapi na kāryā te susevyāḥ kintu mātaraḥ
कोश, सेना आदि से उत्पन्न चिन्ता और शत्रुओं के दमन आदि से उत्पन्न चिन्ता तुम्हें तनिक भी नहीं करनी चाहिए, अपितु माताओं की भली-भाँति सेवा करनी चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.2.151.12)
निवेद्य मयि कर्तव्यं सर्वाधिपरिवर्ज्जनम् ।। श्रुत्वैतत्परमप्रीतो वज्रस्तं प्रत्युवाच ह
nivedya mayi kartavyaṁ sarvādhiparivarjjanam śrutvaitatparamaprīto vajrastaṁ pratyuvāca ha
यह मुझे निवेदन करके तुम्हें अन्य सब अधिकार का त्याग कर देना चाहिए। यह सुनकर परम प्रसन्न हुए वज्र ने उन्हें उत्तर दिया।
श्लोक 13 (skanda.2.151.13)
।। श्रीवज्रनाभ उवाच ।। ।। राजन्नुचितमेतत्ते यदस्मासु प्रभाषते ।। त्वत्पित्रोपकृतश्चाहं धनुर्विद्याप्रदानतः
śrīvajranābha uvāca rājannucitametatte yadasmāsu prabhāṣate tvatpitropakṛtaścāhaṁ dhanurvidyāpradānataḥ
वज्रनाभ ने कहा — हे राजन्, आप जो हमसे कह रहे हैं, वह आपके योग्य ही है; क्योंकि धनुर्विद्या प्रदान करके आपके पिता ने मुझ पर उपकार किया था।
श्लोक 14 (skanda.2.151.14)
तस्मान्नाल्पापि मे चिन्ता क्षात्रं दृढमुपेयुषः ।। किन्त्वेका परमा चिन्ता तत्र किञ्चिद्विचार्य्यताम्
tasmānnālpāpi me cintā kṣātraṁ dṛḍhamupeyuṣaḥ kintvekā paramā cintā tatra kiñcidvicāryyatām
इसलिए क्षत्रियोचित धर्म को दृढ़तापूर्वक प्राप्त कर लेने पर मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है, किन्तु एक ही परम चिन्ता है, उस पर कुछ विचार किया जाए।
श्लोक 15 (skanda.2.151.15)
माथुरे त्वभिषिक्तोऽपि स्थितोऽहं निर्जने वने ।। क्व गता वै प्रजाऽत्रत्या यत्र राज्यं प्ररोचते
māthure tvabhiṣikto'pi sthito'haṁ nirjane vane kva gatā vai prajā'tratyā yatra rājyaṁ prarocate
मथुरा में अभिषिक्त होने पर भी मैं निर्जन वन में बसा हुआ हूँ; यहाँ की प्रजा कहाँ चली गई, जिससे यहाँ राज्य सुशोभित हो सके?
श्लोक 16 (skanda.2.151.16)
इत्युक्तो विष्णुरातस्तु नन्दादीनां पुरोहितम् ।। शांडिल्यमाजुहावाशु वज्रसंदेहनुत्तये
ityukto viṣṇurātastu nandādīnāṁ purohitam śāṁḍilyamājuhāvāśu vajrasaṁdehanuttaye
यह सुनकर विष्णुरात ने वज्र के संदेह को दूर करने के लिए नन्द आदि के पुरोहित शांडिल्य को शीघ्र बुलाया।
श्लोक 17 (skanda.2.151.17)
अथोटजं विहायाशु शांडिल्यः समुपागतः ।। पूजितो वज्रनाभेन निषसादासनोत्तमे
athoṭajaṁ vihāyāśu śāṁḍilyaḥ samupāgataḥ pūjito vajranābhena niṣasādāsanottame
तब शांडिल्य अपनी कुटिया को तुरंत छोड़कर आ गए; वज्रनाभ द्वारा पूजित होकर वे उत्तम आसन पर बैठे।
श्लोक 18 (skanda.2.151.18)
उपोद्घातं विष्णुरातश्चकाराशु ततस्त्वसौ ।। उवाच परमप्रीतस्तावुभौ परिसान्त्वयन्
upodghātaṁ viṣṇurātaścakārāśu tatastvasau uvāca paramaprītastāvubhau parisāntvayan
तत्पश्चात् विष्णुरात ने शीघ्र ही विषय का प्रारम्भ किया; फिर अत्यन्त प्रसन्न हुए शांडिल्य ने उन दोनों को सान्त्वना देते हुए कहा।
श्लोक 19 (skanda.2.151.19)
।। श्रीशांडिल्य उवाच ।। ।। शृणुतं दत्तचित्तौ मे रहस्यं व्रजभूमिजम् ।। व्रजनं व्याप्तिरित्युक्त्या व्यापनाद्व्रज उच्यते
śrīśāṁḍilya uvāca śṛṇutaṁ dattacittau me rahasyaṁ vrajabhūmijam vrajanaṁ vyāptirityuktyā vyāpanādvraja ucyate
शांडिल्य ने कहा — तुम दोनों चित्त लगाकर व्रजभूमि का रहस्य सुनो। "व्रजन" का अर्थ व्याप्ति है, इस कथन से व्यापन के कारण ही इसे "व्रज" कहा जाता है।
श्लोक 20 (skanda.2.151.20)
गुणातीतं परं ब्रह्म व्यापकं व्रज उच्यते ।। सदानन्दं परं ज्योतिर्मुक्तानां पदमव्ययम्
guṇātītaṁ paraṁ brahma vyāpakaṁ vraja ucyate sadānandaṁ paraṁ jyotirmuktānāṁ padamavyayam
गुणों से अतीत, व्यापक परब्रह्म को ही व्रज कहा जाता है — जो सदा आनन्दस्वरूप, परम ज्योति और मुक्तों का अविनाशी पद है।
श्लोक 21 (skanda.2.151.21)
तस्मिन्नन्दात्मजः कृष्णः सदानन्दांगविग्रहः ।। आत्मारामश्चाप्तकामः प्रेमाक्तैरनुभूयते
tasminnandātmajaḥ kṛṣṇaḥ sadānandāṁgavigrahaḥ ātmārāmaścāptakāmaḥ premāktairanubhūyate
उसी में नन्द के पुत्र कृष्ण, जिनका शरीर ही सदानन्दमय है, निवास करते हैं; वे आत्माराम और आप्तकाम हैं, और केवल प्रेम में डूबे हुए भक्तों द्वारा ही अनुभव किए जाते हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.151.22)
आत्मा तु राधिका तस्य तयैव रमणादसौ ।। आत्मारामतया प्राज्ञैः प्रोच्यते गूढवेदिभिः
ātmā tu rādhikā tasya tayaiva ramaṇādasau ātmārāmatayā prājñaiḥ procyate gūḍhavedibhiḥ
राधिका ही उनकी आत्मा हैं, और उन्हीं के साथ रमण करने के कारण वे रहस्य के ज्ञाता विद्वानों द्वारा "आत्माराम" कहे जाते हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.151.23)
कामास्तु वाञ्छितास्तस्य गावो गोपाश्च गोपिकाः ।। नित्याः सर्वे विहाराद्या आप्तकामस्ततस्त्वयम्
kāmāstu vāñchitāstasya gāvo gopāśca gopikāḥ nityāḥ sarve vihārādyā āptakāmastatastvayam
उनकी वांछित कामनाएँ गौएँ, ग्वाल-बाल और गोपियाँ ही हैं, तथा विहार आदि सभी नित्य हैं; इसीलिए वे "आप्तकाम" कहलाते हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.151.24)
रहस्यं त्विदमेतस्य प्रकृतेः परमुच्यते ।। प्रकृत्या खेलतस्तस्य लीलाऽन्यैरनुभूयते
rahasyaṁ tvidametasya prakṛteḥ paramucyate prakṛtyā khelatastasya līlā'nyairanubhūyate
उसका यह रहस्य प्रकृति से परे कहा जाता है; अपनी ही प्रकृति से क्रीड़ा करते हुए उनकी लीला अन्य जनों द्वारा अनुभव की जाती है।
श्लोक 25 (skanda.2.151.25)
सर्गस्थित्यप्यया यत्र रजःसत्त्वतमोगुणैः ।। लीलैवं द्विविधा तस्य वास्तवी व्यावहारिकी
sargasthityapyayā yatra rajaḥsattvatamoguṇaiḥ līlaivaṁ dvividhā tasya vāstavī vyāvahārikī
वहाँ रजः, सत्त्व और तमः गुणों से सृष्टि, स्थिति और प्रलय होते हैं; इस प्रकार उनकी लीला दो प्रकार की है — वास्तविकी और व्यावहारिकी।
श्लोक 26 (skanda.2.151.26)
वास्तवी तत्स्वसंवेद्या जीवानां व्यावहारिकी ।। आद्यां विना द्वितीया न द्वितीया नाद्यगा क्वचित्
vāstavī tatsvasaṁvedyā jīvānāṁ vyāvahārikī ādyāṁ vinā dvitīyā na dvitīyā nādyagā kvacit
वास्तविकी लीला स्वयं द्वारा ही जानी जाती है, और व्यावहारिकी जीवों की है। प्रथम के बिना द्वितीय संभव नहीं, और द्वितीय कभी प्रथम में प्रवेश नहीं करती।
श्लोक 27 (skanda.2.151.27)
आवयोर्गोचरेयं तु तल्लीला व्यावहारिकी ।। यत्र भूरादयो लोका भुवि माथुरमण्डलम्
āvayorgocareyaṁ tu tallīlā vyāvahārikī yatra bhūrādayo lokā bhuvi māthuramaṇḍalam
हम दोनों के लिए जो कुछ ज्ञातव्य है, वह उनकी व्यावहारिकी लीला ही है — जहाँ भूः आदि लोक हैं, और पृथ्वी पर माथुर-मण्डल है।
श्लोक 28 (skanda.2.151.28)
अत्रैव व्रजभूमिः सा यत्र तत्त्वं सुगोपितम् ।। भासते प्रेमपूर्णानां कदाचिदपि सर्वतः
atraiva vrajabhūmiḥ sā yatra tattvaṁ sugopitam bhāsate premapūrṇānāṁ kadācidapi sarvataḥ
यहीं वह व्रजभूमि है, जहाँ सुरक्षित रहस्यमय तत्त्व कभी-कभी, प्रेम से परिपूर्ण भक्तों के लिए सर्वत्र प्रकट होता है।
श्लोक 29 (skanda.2.151.29)
कदाचिद्द्वापरस्यान्ते रहोलीलाधिकारिणः ।। समवेता यदाऽत्र स्युर्यथेदानीं तदा हरिः
kadāciddvāparasyānte raholīlādhikāriṇaḥ samavetā yadā'tra syuryathedānīṁ tadā hariḥ
कभी-कभी द्वापर के अन्त में, जब गुप्त लीला के अधिकारी जन यहाँ इस प्रकार एकत्र होते हैं जैसे अभी हुए हैं, तब हरि —
श्लोक 30 (skanda.2.151.30)
स्वैः सहावतरेत्स्वेषु समावेशार्थमीप्सिताः ।। तदा देवादयोऽप्यन्येऽवतरन्ति समन्ततः
svaiḥ sahāvataretsveṣu samāveśārthamīpsitāḥ tadā devādayo'pyanye'vataranti samantataḥ
— अपने प्रिय नित्य-परिकरों के साथ, उन्हें अपनी लीला में सम्मिलित करने हेतु अवतरित होते हैं; तब देवादि भी सब ओर से अवतीर्ण होते हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.151.31)
सर्वेषां वाञ्छितं कृत्वा हरिरन्तर्हितोऽभवत् ।। तेनात्र त्रिविधा लोकाः स्थिताः पूर्वं न संशयः
sarveṣāṁ vāñchitaṁ kṛtvā harirantarhito'bhavat tenātra trividhā lokāḥ sthitāḥ pūrvaṁ na saṁśayaḥ
सबकी अभिलाषा पूर्ण करके हरि अन्तर्हित हो गए; इसी कारण यहाँ पहले तीन प्रकार के लोग रहते थे, इसमें संदेह नहीं।
श्लोक 32 (skanda.2.151.32)
नित्यास्तल्लिप्सवश्चैव देवाद्याश्चेति भेदतः ।। देवाद्यास्तेषु कृष्णेन द्वारिकां प्रापिताः पुरा
nityāstallipsavaścaiva devādyāśceti bhedataḥ devādyāsteṣu kṛṣṇena dvārikāṁ prāpitāḥ purā
भेद इस प्रकार है — नित्य-परिकर, उसकी प्राप्ति के इच्छुक जन, और देवादि। इनमें से देवादि को कृष्ण ने पहले द्वारिका पहुँचाया।
श्लोक 33 (skanda.2.151.33)
पुनर्मौशलमार्गेण स्वाधिकारेषु चापिताः ।। तल्लिप्सूंश्च सदा कृष्णः प्रेमानन्दैकरूपिणः
punarmauśalamārgeṇa svādhikāreṣu cāpitāḥ tallipsūṁśca sadā kṛṣṇaḥ premānandaikarūpiṇaḥ
और पुनः मौसल मार्ग के द्वारा उन्हें उनके अपने-अपने अधिकार में स्थापित कर दिया गया। तथा उसकी प्राप्ति के इच्छुक जनों को कृष्ण, जो प्रेमानन्द के एकमात्र स्वरूप हैं —
श्लोक 34 (skanda.2.151.34)
विधाय स्वीयनित्येषु समावेशितवांस्तदा ।। नित्याः सर्वेऽप्ययोग्येषु दर्शनाभावतां गताः
vidhāya svīyanityeṣu samāveśitavāṁstadā nityāḥ sarve'pyayogyeṣu darśanābhāvatāṁ gatāḥ
— उन्हें अपने नित्य-परिकरों में सम्मिलित कर लिया; और सभी नित्य-परिकर अयोग्य जनों की दृष्टि से ओझल हो गए।
श्लोक 35 (skanda.2.151.35)
व्यावहारिकलीलास्थास्तत्र यन्नाधिकारिणः ।। पश्यन्त्यत्रागतास्तस्मान्निर्ज्जनत्वं समन्ततः
vyāvahārikalīlāsthāstatra yannādhikāriṇaḥ paśyantyatrāgatāstasmānnirjjanatvaṁ samantataḥ
व्यावहारिक लीला में स्थित, वहाँ के अनधिकारी जन जब यहाँ आते हैं, तो उन्हें यह सब ओर से निर्जन ही दिखाई देता है।
श्लोक 36 (skanda.2.151.36)
तस्माच्चिन्ता न ते कार्या वज्रनाभ मदाज्ञया ।। वासयात्र बहून्ग्रामान्संसिद्धिस्ते भविष्यति
tasmāccintā na te kāryā vajranābha madājñayā vāsayātra bahūngrāmānsaṁsiddhiste bhaviṣyati
इसलिए हे वज्रनाभ, तुम्हें इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए; मेरी आज्ञा से यहाँ अनेक ग्राम बसाओ, तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी।
श्लोक 37 (skanda.2.151.37)
कृष्णलीलानुसारेण कृत्वा नामानि सर्वतः ।। त्वया वासय ता ग्रामान्संसेव्या भूरियं परा
kṛṣṇalīlānusāreṇa kṛtvā nāmāni sarvataḥ tvayā vāsaya tā grāmānsaṁsevyā bhūriyaṁ parā
कृष्ण की लीलाओं के अनुसार सर्वत्र नाम रखकर तुम उन ग्रामों को बसाओ; यह परम भूमि सेवा के योग्य है।
श्लोक 38 (skanda.2.151.38)
गोवर्द्धने दीर्घपुरे मथुरायां महावने ।। नन्दिग्रामे बृहत्सानौ कार्या राज्यस्थितिस्त्वया
govarddhane dīrghapure mathurāyāṁ mahāvane nandigrāme bṛhatsānau kāryā rājyasthitistvayā
गोवर्धन, दीर्घपुर, मथुरा, महावन, नन्दिग्राम और बृहत्सानु में तुम्हें राज्य की व्यवस्था करनी चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.2.151.39)
नद्यद्रिद्रोणिकुण्डादिकुञ्जान्संसेवतस्तव ।। राज्ये प्रजाः सुसंपन्नास्त्वं च प्रीतो भविष्यसि
nadyadridroṇikuṇḍādikuñjānsaṁsevatastava rājye prajāḥ susaṁpannāstvaṁ ca prīto bhaviṣyasi
नदी, पर्वत, द्रोणी, कुण्ड आदि कुञ्जों की सेवा करते रहने से तुम्हारे राज्य में प्रजा सुसम्पन्न होगी, और तुम स्वयं प्रसन्न रहोगे।
श्लोक 40 (skanda.2.151.40)
सच्चिदानन्दभूरेषा त्वया सेव्या प्रयत्नतः ।। तव कृष्णस्थलान्यत्र स्फुरन्तु मदनुग्रहात्
saccidānandabhūreṣā tvayā sevyā prayatnataḥ tava kṛṣṇasthalānyatra sphurantu madanugrahāt
यह सच्चिदानन्दमयी भूमि तुम्हें प्रयत्नपूर्वक सेवन करनी चाहिए; मेरी कृपा से तुम्हारे लिए यहाँ कृष्ण के स्थल प्रकट हों।
श्लोक 41 (skanda.2.151.41)
वज्र संसेवनादस्या उद्धवस्त्वां मिलिष्यति ।। ततो रहस्यमेतस्मात्प्राप्स्यसि त्वं समातृकः
vajra saṁsevanādasyā uddhavastvāṁ miliṣyati tato rahasyametasmātprāpsyasi tvaṁ samātṛkaḥ
हे वज्र, इसकी सेवा करने से उद्धव तुमसे मिलेंगे; और तत्पश्चात् इसी रहस्य को तुम अपनी माताओं सहित प्राप्त करोगे।
श्लोक 42 (skanda.2.151.42)
एवमुक्त्वा तु शाण्डिल्यो गतः कृष्णमनुस्मरन् ।। विष्णुरातोऽथ वज्रश्च परां प्रीतिमवापतुः
evamuktvā tu śāṇḍilyo gataḥ kṛṣṇamanusmaran viṣṇurāto'tha vajraśca parāṁ prītimavāpatuḥ
ऐसा कहकर शांडिल्य कृष्ण का स्मरण करते हुए चले गए; और विष्णुरात तथा वज्र दोनों परम प्रीति को प्राप्त हुए।