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वैष्णव खण्ड · अध्याय 152

गोवर्धन-पर्वत-समीप उद्धव-दर्शन-वर्णन

अध्याय 151अध्याय-सूचीअध्याय 153

श्लोक 1 (skanda.2.152.1)

।। श्रीऋषय ऊचुः ।। ।। शांडिल्ये तौ समादिश्य परावृत्ते स्वमाश्रमम् ।। किं कथं चक्रतुस्तौ तु राजानौ सूत तद्वद

śrīṛṣaya ūcuḥ śāṁḍilye tau samādiśya parāvṛtte svamāśramam kiṁ kathaṁ cakratustau tu rājānau sūta tadvada

ऋषियों ने कहा — शांडिल्य द्वारा उन दोनों को उपदेश देकर अपने आश्रम को लौट जाने पर, हे सूत, उन दोनों राजाओं ने क्या और कैसे किया, वह बताइए।

श्लोक 2 (skanda.2.152.2)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। ततस्तु विष्णुरातेन श्रेणीमुख्वाः सहस्रशः ।। इन्द्रप्रस्थात्समानाय्य मथुरास्थानमापिताः

śrīsūta uvāca tatastu viṣṇurātena śreṇīmukhvāḥ sahasraśaḥ indraprasthātsamānāyya mathurāsthānamāpitāḥ

सूत जी ने कहा — तत्पश्चात् विष्णुरात ने इन्द्रप्रस्थ से हजारों श्रेणी-मुख्यों को लाकर मथुरा-क्षेत्र में बसाया।

श्लोक 3 (skanda.2.152.3)

माथुरान्ब्राह्मणांस्तत्र वानरांश्च पुरातनान् ।। विज्ञाय माननीयत्वं तेषु स्थापितवान्स्वरादट्

māthurānbrāhmaṇāṁstatra vānarāṁśca purātanān vijñāya mānanīyatvaṁ teṣu sthāpitavānsvarādaṭ

वहाँ के माथुर ब्राह्मणों और पुरातन वानरों के मान्यत्व को जानकर, उस स्वराट् ने उन्हें यथोचित रूप से वहाँ प्रतिष्ठित किया।

श्लोक 4 (skanda.2.152.4)

वज्रस्तु तत्सहायेन शाण्डिल्यस्याऽप्यनुग्रहात् ।। गोविन्दगोपगोपीनां लीलास्थानान्यनुक्रमात्

vajrastu tatsahāyena śāṇḍilyasyā'pyanugrahāt govindagopagopīnāṁ līlāsthānānyanukramāt

वज्र ने उसकी सहायता से और शांडिल्य की कृपा से भी, गोविन्द, गोपों और गोपियों के लीला-स्थलों को क्रमशः —

श्लोक 5 (skanda.2.152.5)

विज्ञायाऽभिधयाऽऽस्थाप्य ग्रामानावासयद्बहून् ।। कुण्डकूपादिपूर्तेन शिवादिस्थापनेन च

vijñāyā'bhidhayā''sthāpya grāmānāvāsayadbahūn kuṇḍakūpādipūrtena śivādisthāpanena ca

— जानकर और नाम स्थापित करके अनेक ग्रामों को बसाया, तथा कुण्ड, कूप आदि के निर्माण और शिवादि की स्थापना से —

श्लोक 6 (skanda.2.152.6)

गोविन्दहरिदेवादिस्वरूपाऽऽरोपणेन च ।। कृष्णैकभक्तिं स्वे राज्यं ततान च मुमोद ह

govindaharidevādisvarūpā''ropaṇena ca kṛṣṇaikabhaktiṁ sve rājyaṁ tatāna ca mumoda ha

— और गोविन्द, हरि आदि के स्वरूपों की स्थापना से अपने राज्य में एकमात्र कृष्ण-भक्ति का विस्तार किया और आनन्दित हुए।

श्लोक 7 (skanda.2.152.7)

प्रजास्तु मुदितास्तस्य कृष्णकीर्तनतत्पराः ।। परमानन्दसम्पन्ना राज्यं तस्यैव तुष्टुवुः

prajāstu muditāstasya kṛṣṇakīrtanatatparāḥ paramānandasampannā rājyaṁ tasyaiva tuṣṭuvuḥ

उसकी प्रजा, कृष्ण-कीर्तन में तत्पर तथा परमानन्द से सम्पन्न होकर, हर्षित होकर उसके राज्य की प्रशंसा करने लगी।

श्लोक 8 (skanda.2.152.8)

एकदा कृष्णपत्न्यस्तु श्रीकृष्णविरहातुराः ।। कालिन्दीं मुदिता वीक्ष्य पप्रच्छुर्गतमत्सराः

ekadā kṛṣṇapatnyastu śrīkṛṣṇavirahāturāḥ kālindīṁ muditā vīkṣya papracchurgatamatsarāḥ

एक दिन श्रीकृष्ण के विरह से आतुर कृष्ण की पत्नियों ने कालिन्दी को प्रसन्न देखकर, ईर्ष्यारहित होकर उससे पूछा।

श्लोक 9 (skanda.2.152.9)

।। श्रीकृष्णपत्न्य ऊचुः ।। ।। यथा वयं कृष्णपत्न्यस्तथा त्वमपि शोभने ।। वयं विरहदुःखार्तास्त्वं न कालिन्दि तद्वद

śrīkṛṣṇapatnya ūcuḥ yathā vayaṁ kṛṣṇapatnyastathā tvamapi śobhane vayaṁ virahaduḥkhārtāstvaṁ na kālindi tadvada

कृष्ण की पत्नियों ने कहा — हे शोभने, जैसे हम कृष्ण की पत्नियाँ हैं, वैसे ही तुम भी हो; हम विरह-दुःख से पीड़ित हैं, किन्तु तुम नहीं हो, हे कालिन्दि, यह बताओ।

श्लोक 10 (skanda.2.152.10)

तच्छ्रुत्वा स्मयमाना सा कालिन्दी वाक्यमब्रवीत् ।। सापत्न्यं वीक्ष्य तत्तासां करुणापरमानसा

tacchrutvā smayamānā sā kālindī vākyamabravīt sāpatnyaṁ vīkṣya tattāsāṁ karuṇāparamānasā

यह सुनकर मुस्कुराती हुई कालिन्दी ने, उनकी सापत्न्य-दशा देखकर, परम करुणा से युक्त मन से यह वचन कहा।

श्लोक 11 (skanda.2.152.11)

।। श्रीकालिन्द्युवाच ।। ।। आत्मारामस्य कृष्णस्य ध्रुवमात्मास्ति राधिका ।। तस्या दास्यप्रभावेण विरहोऽस्मान्न संस्पृशेत्

śrīkālindyuvāca ātmārāmasya kṛṣṇasya dhruvamātmāsti rādhikā tasyā dāsyaprabhāveṇa viraho'smānna saṁspṛśet

कालिन्दी ने कहा — आत्माराम कृष्ण की आत्मा निश्चय ही राधिका ही हैं। उनकी दासी होने के प्रभाव से मुझे विरह स्पर्श नहीं करता।

श्लोक 12 (skanda.2.152.12)

तस्या एवांशविस्ताराः सर्वाः श्रीकृष्णनायिकाः ।। नित्यसंभोग एवास्ति तस्याः साम्मुख्ययोगतः

tasyā evāṁśavistārāḥ sarvāḥ śrīkṛṣṇanāyikāḥ nityasaṁbhoga evāsti tasyāḥ sāmmukhyayogataḥ

श्रीकृष्ण की समस्त नायिकाएँ उन्हीं के अंश का विस्तार हैं; उनके सम्मुखत्व के योग से ही उन सबका कृष्ण से नित्य संभोग बना रहता है।

श्लोक 13 (skanda.2.152.13)

स एव सा स सैवास्ति वंशी तत्प्रेमरूपिका ।। श्रीकृष्णनखचन्द्रालिसंगाच्चन्द्रावली स्मृता

sa eva sā sa saivāsti vaṁśī tatpremarūpikā śrīkṛṣṇanakhacandrālisaṁgāccandrāvalī smṛtā

वे ही वह हैं, और वह ही वे हैं — वंशी उनके प्रेम का ही रूप है। श्रीकृष्ण के चन्द्र-सदृश नखों की पंक्ति के संसर्ग से वे ही चन्द्रावली नाम से स्मृत हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.152.14)

रूपान्तरं च गृह्णाना तयोः सेवातिलालसा ।। रुक्मिण्यादिसमावेशो मयात्रैव विलोकितः

rūpāntaraṁ ca gṛhṇānā tayoḥ sevātilālasā rukmiṇyādisamāveśo mayātraiva vilokitaḥ

दूसरा रूप धारण करके उन दोनों की सेवा की अत्यन्त उत्कण्ठा से युक्त होकर, रुक्मिणी आदि में उनका प्रवेश मैंने यहीं देखा है।

श्लोक 15 (skanda.2.152.15)

युष्माकमपि कृष्णेन विरहो नैव सर्वतः ।। किन्तु एवं न जानीथ तस्माद्व्याकुलतामिताः

yuṣmākamapi kṛṣṇena viraho naiva sarvataḥ kintu evaṁ na jānītha tasmādvyākulatāmitāḥ

इस प्रकार तुम्हें भी कृष्ण से कहीं से भी विरह नहीं है; किन्तु तुम यह नहीं जानती हो, इसीलिए व्याकुल हो गई हो।

श्लोक 16 (skanda.2.152.16)

एवमेवात्र गोपीनामक्रूरावसरे पुरा ।। विरहाभास एवासीदुद्धवेन समाहितः

evamevātra gopīnāmakrūrāvasare purā virahābhāsa evāsīduddhavena samāhitaḥ

इसी प्रकार पहले अक्रूर के अवसर पर गोपियों को भी केवल विरह की प्रतीति हुई थी, जिसे उद्धव द्वारा शान्त किया गया था।

श्लोक 17 (skanda.2.152.17)

तेनैव भवतीनां चेद्भवेदत्र समागमः ।। तर्हि नित्यं स्वकान्तेन विहारमपि लप्स्यथ

tenaiva bhavatīnāṁ cedbhavedatra samāgamaḥ tarhi nityaṁ svakāntena vihāramapi lapsyatha

यदि तुम्हें भी यहाँ उन्हीं उद्धव से भेंट हो जाए, तो तुम अपने प्रियतम के साथ नित्य विहार भी प्राप्त कर सकोगी।

श्लोक 18 (skanda.2.152.18)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। एवमुक्तास्तु ताः पत्न्यः प्रसन्नां पुनरब्रुवन् ।। उद्धवालोकनेनात्मप्रेष्ठसंगमलालसाः

śrīsūta uvāca evamuktāstu tāḥ patnyaḥ prasannāṁ punarabruvan uddhavālokanenātmapreṣṭhasaṁgamalālasāḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर उद्धव के दर्शन से अपने प्रियतम के साथ संगम की लालसा से युक्त उन पत्नियों ने प्रसन्न कालिन्दी से पुनः कहा।

श्लोक 19 (skanda.2.152.19)

।। श्रीकृष्णपत्न्य ऊचुः ।। ।। धन्यासि सखि कान्तेन यस्या नैवास्ति विच्युतिः ।। यतस्ते स्वार्थसंसिद्धिस्तस्या दास्यो बभूविम

śrīkṛṣṇapatnya ūcuḥ dhanyāsi sakhi kāntena yasyā naivāsti vicyutiḥ yataste svārthasaṁsiddhistasyā dāsyo babhūvima

कृष्ण की पत्नियों ने कहा — हे सखि, धन्य हो तुम, जिनका प्रियतम से कभी वियोग नहीं होता; और चूँकि तुम्हारा स्वार्थ इस प्रकार सिद्ध है, हम सब उन्हीं की दासी बन गई हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.152.20)

परन्तूद्धवलाभे स्यादस्मत्सर्वार्थसाधनम् ।। तथा वदस्व कालिन्दि तल्लाभोऽपि यथा भवेत्

parantūddhavalābhe syādasmatsarvārthasādhanam tathā vadasva kālindi tallābho'pi yathā bhavet

किन्तु उद्धव की प्राप्ति से हमारे सारे प्रयोजन सिद्ध हो जाएँगे; अतः हे कालिन्दि, यह बताओ कि उनकी प्राप्ति भी कैसे हो सकती है।

श्लोक 21 (skanda.2.152.21)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। एवमुक्ता तु कालिन्दी प्रत्युवाचाथ तास्तथा ।। स्मरन्ती कृष्णचन्द्रस्य कलाषोडशरूपिणी

śrīsūta uvāca evamuktā tu kālindī pratyuvācātha tāstathā smarantī kṛṣṇacandrasya kalāṣoḍaśarūpiṇī

सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर कालिन्दी ने, जो स्वयं कृष्णचन्द्र की सोलह कलाओं की स्वरूपिणी हैं, कृष्णचन्द्र का स्मरण करते हुए उन्हें उत्तर दिया।

श्लोक 22 (skanda.2.152.22)

साधनभूमिर्बदरी व्रजता कृष्णेन मंत्रिणे प्रोक्ता ।। तत्रास्ते स तु साक्षात्तद्वयुनं ग्राहयँल्लोकान्

sādhanabhūmirbadarī vrajatā kṛṣṇena maṁtriṇe proktā tatrāste sa tu sākṣāttadvayunaṁ grāhayaṁllokān

जाते हुए कृष्ण ने अपने मंत्री (उद्धव) के लिए बदरी को साधना-भूमि बताया था; वहाँ वे साक्षात् निवास करते हुए लोगों को उस ज्ञान का बोध करा रहे हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.152.23)

फलभूमिर्व्रजभूमिर्दत्ता तस्मै पुरैव सरहस्यम् ।। फलमिह तिरोहितं सत्तदिहेदानीं स उद्धवोऽलक्ष्यः

phalabhūmirvrajabhūmirdattā tasmai puraiva sarahasyam phalamiha tirohitaṁ sattadihedānīṁ sa uddhavo'lakṣyaḥ

व्रजभूमि को ही फलभूमि के रूप में उन्हें पूर्व में ही रहस्य सहित दे दिया गया था; वह फल यहाँ विद्यमान होते हुए भी तिरोहित है, इसीलिए वे उद्धव अभी यहाँ अदृश्य हैं।

श्लोक 24 (skanda.2.152.24)

गोवर्द्धनगिरिनिकटे सखीस्थले तद्रजःकामः ।। तत्रत्याङ्कुरवल्लीरूपेणास्ते स उद्धवो नूनम्

govarddhanagirinikaṭe sakhīsthale tadrajaḥkāmaḥ tatratyāṅkuravallīrūpeṇāste sa uddhavo nūnam

गोवर्धन गिरि के निकट सखी-स्थल में, वहाँ की धूलि की कामना करते हुए, वे उद्धव निश्चय ही वहाँ अंकुर और लता के रूप में विद्यमान हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.152.25)

आत्मोत्सवरूपत्वं हरिणा तस्मै समर्पितं नियतम् ।। तस्मात्तत्र स्थित्वा कुसुमसरःपरिसरे सवज्राभिः

ātmotsavarūpatvaṁ hariṇā tasmai samarpitaṁ niyatam tasmāttatra sthitvā kusumasaraḥparisare savajrābhiḥ

उसे हरि ने निश्चयपूर्वक अपने ही उत्सव-स्वरूपत्व का दान किया है। इसलिए वहाँ, कुसुम-सरोवर के तट पर, वज्र सहित तुम सब स्थित होकर —

श्लोक 26 (skanda.2.152.26)

वीणावेणुमृदंगैः कीर्तनकाव्यादिसरससंगीतैः ।। उत्सव आरब्धव्यो हरिरतलोकान्समानाय्य

vīṇāveṇumṛdaṁgaiḥ kīrtanakāvyādisarasasaṁgītaiḥ utsava ārabdhavyo hariratalokānsamānāyya

— वीणा, वेणु और मृदंग के साथ, कीर्तन-काव्य आदि रसमय संगीत से, हरि में अनुरक्त लोगों को एकत्र करके, उत्सव प्रारम्भ करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.2.152.27)

तत्रोद्धवावलोको भविता नियतं महोत्सवे वितते ।। यौष्माकीणामभिमतसिद्धिं सविता स एव सवितानाम्

tatroddhavāvaloko bhavitā niyataṁ mahotsave vitate yauṣmākīṇāmabhimatasiddhiṁ savitā sa eva savitānām

वहाँ उस विस्तृत महोत्सव में उद्धव का दर्शन अवश्य होगा; और वे ही सूर्यों के सूर्य के समान तुम्हारी अभीष्ट सिद्धि के प्रेरक होंगे।

श्लोक 28 (skanda.2.152.28)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। इति श्रुत्वा प्रसन्नास्ताः कालिन्दीमभिवन्द्य तत् ।। कथयामासुरागत्य वज्रं प्रति परीक्षितम्

śrīsūta uvāca iti śrutvā prasannāstāḥ kālindīmabhivandya tat kathayāmāsurāgatya vajraṁ prati parīkṣitam

सूत जी ने कहा — यह सुनकर प्रसन्न होकर उन्होंने कालिन्दी को प्रणाम किया और आकर वह सब वज्र तथा परीक्षित् से कह सुनाया।

श्लोक 29 (skanda.2.152.29)

विष्णुरातस्तु तच्छ्रुत्वा प्रसन्नस्तद्युतस्तदा ।। तत्रैवागत्य तत्सर्वं कारयामास सत्वरम्

viṣṇurātastu tacchrutvā prasannastadyutastadā tatraivāgatya tatsarvaṁ kārayāmāsa satvaram

विष्णुरात यह सुनकर प्रसन्न हुए और उनके साथ वहीं आकर उन्होंने वह सब शीघ्र संपन्न करवाया।

श्लोक 30 (skanda.2.152.30)

गोवर्धनाददूरेण वृन्दारण्ये सखीस्थले ।। प्रवृत्तः कुसुमाम्भोधौ कृष्णसंकीर्तनोत्सवः

govardhanādadūreṇa vṛndāraṇye sakhīsthale pravṛttaḥ kusumāmbhodhau kṛṣṇasaṁkīrtanotsavaḥ

गोवर्धन से न दूर, वृन्दारण्य में, सखी-स्थल पर, कुसुम-सरोवर के तट पर, कृष्ण-संकीर्तन का उत्सव प्रवृत्त हुआ।

श्लोक 31 (skanda.2.152.31)

वृषभानुसुताकान्तविहारे कीर्तनश्रिया ।। साक्षादिव समावृत्ते सर्वेऽनन्यदृशोऽभवन्

vṛṣabhānusutākāntavihāre kīrtanaśriyā sākṣādiva samāvṛtte sarve'nanyadṛśo'bhavan

वृषभानु-सुता के प्रियतम के विहार को मानो साक्षात् घेरे हुए कीर्तन की शोभा से आवृत्त होकर, सब लोग अनन्य-दृष्टि वाले हो गए।

श्लोक 32 (skanda.2.152.32)

ततः पश्यत्सु सर्वेषु तृणगुल्मलताचयात् ।। आजगामोद्धवः स्रग्वी श्यामः पीताम्बरावृतः

tataḥ paśyatsu sarveṣu tṛṇagulmalatācayāt ājagāmoddhavaḥ sragvī śyāmaḥ pītāmbarāvṛtaḥ

तब सबके देखते-देखते तृण, गुल्म और लताओं के समूह से माला पहने, श्याम वर्ण, पीताम्बरधारी उद्धव प्रकट हुए।

श्लोक 33 (skanda.2.152.33)

गुञ्जामालाधरो गायन्बल्लवीवल्लभं मुहुः ।। तदागमनतो रेजे भृशं संकीर्तनोत्सवः

guñjāmālādharo gāyanballavīvallabhaṁ muhuḥ tadāgamanato reje bhṛśaṁ saṁkīrtanotsavaḥ

गुंजा की माला धारण किए, बार-बार गोपियों के प्रियतम का गायन करते हुए, उनके आगमन से संकीर्तनोत्सव अत्यन्त शोभायमान हो उठा।

श्लोक 34 (skanda.2.152.34)

चन्द्रिकागमतो यद्वत्स्फाटिकाट्टालभूमणिः ।। अथ सर्वे सुखाम्भोधौ मग्नाः सर्वं विसस्मरुः

candrikāgamato yadvatsphāṭikāṭṭālabhūmaṇiḥ atha sarve sukhāmbhodhau magnāḥ sarvaṁ visasmaruḥ

जैसे चन्द्रिका के आगमन से स्फटिक के अट्टालिका-भवन सुशोभित हो उठते हैं, वैसे ही तब सभी आनन्द के सागर में निमग्न होकर सब कुछ भूल गए।

श्लोक 35 (skanda.2.152.35)

क्षणेनागतविज्ञाना दृष्ट्वा श्रीकृष्णरूपिणम् ।। उद्धवं पूजयांचक्रुः प्रतिलब्धमनोरथाः

kṣaṇenāgatavijñānā dṛṣṭvā śrīkṛṣṇarūpiṇam uddhavaṁ pūjayāṁcakruḥ pratilabdhamanorathāḥ

क्षणभर में सचेत होकर, उद्धव को श्रीकृष्ण के ही स्वरूप के रूप में देखकर, अपनी मनोकामना पूर्ण हुई मानकर उन्होंने उद्धव की पूजा की।

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