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वैष्णव खण्ड · अध्याय 153

परीक्षित्-उद्धव-संवाद

अध्याय 152अध्याय-सूचीअध्याय 154

श्लोक 1 (skanda.2.153.1)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। अथोद्धवस्तु तान्दृष्ट्वा कृष्णकीर्तनतत्परान् ।। सत्कृत्याथ परिष्वज्य परीक्षितमुवाच ह

śrīsūta uvāca athoddhavastu tāndṛṣṭvā kṛṣṇakīrtanatatparān satkṛtyātha pariṣvajya parīkṣitamuvāca ha

सूत जी ने कहा — तब उद्धव ने उन्हें कृष्ण-कीर्तन में तत्पर देखकर सत्कार किया, परीक्षित् को आलिंगन किया और उनसे कहा।

श्लोक 2 (skanda.2.153.2)

।। उद्धव उवाच ।। ।। धन्योऽसि राजन्कृष्णैकभक्त्या पूर्णोऽसि नित्यदा ।। यस्त्वं निमग्नचित्तोऽसि कृष्णसंकीर्तनोत्सवे

uddhava uvāca dhanyo'si rājankṛṣṇaikabhaktyā pūrṇo'si nityadā yastvaṁ nimagnacitto'si kṛṣṇasaṁkīrtanotsave

उद्धव ने कहा — हे राजन्, तुम धन्य हो, जो सदा एकमात्र कृष्ण-भक्ति से परिपूर्ण हो, और कृष्ण-संकीर्तनोत्सव में निमग्न-चित्त हो।

श्लोक 3 (skanda.2.153.3)

कृष्णपत्नीषु वज्रे च दिष्ट्या प्रीतिः प्रवर्तिता ।। तवोचितमिदं तात कृष्णदत्तांग वैभव

kṛṣṇapatnīṣu vajre ca diṣṭyā prītiḥ pravartitā tavocitamidaṁ tāta kṛṣṇadattāṁga vaibhava

कृष्ण की पत्नियों और वज्र के प्रति सौभाग्य से प्रेम स्थापित हुआ है; यह तुम्हारे लिए उचित ही है, हे तात, जिनका ऐश्वर्य कृष्ण द्वारा प्रदत्त है।

श्लोक 4 (skanda.2.153.4)

द्वारकास्थेषु सर्वेषु धन्या एते न संशयः ।। येषां व्रजनिवासाय पार्थमादिष्टवान्प्रभुः

dvārakāstheṣu sarveṣu dhanyā ete na saṁśayaḥ yeṣāṁ vrajanivāsāya pārthamādiṣṭavānprabhuḥ

द्वारका में रहने वाले सभी में, निःसंदेह वे ही धन्य हैं, जिनके व्रज-निवास के लिए प्रभु ने पार्थ को आदेश दिया था।

श्लोक 5 (skanda.2.153.5)

श्रीकृष्णस्य मनश्चंद्रो राधास्यप्रभयान्वितः ।। तद्विहारवनं गोभिर्मण्डयन्रोचते सदा

śrīkṛṣṇasya manaścaṁdro rādhāsyaprabhayānvitaḥ tadvihāravanaṁ gobhirmaṇḍayanrocate sadā

राधा के मुख की प्रभा से युक्त श्रीकृष्ण का मनरूपी चन्द्रमा उनके विहार-वन को गौओं से सुशोभित करता हुआ सदा शोभायमान रहता है।

श्लोक 6 (skanda.2.153.6)

कृष्णचन्द्रः सदा पूर्णस्तस्य षोडश याः कलाः ।। चित्सहस्रप्रभाभिन्ना अत्रास्ते तत्स्वरूपता

kṛṣṇacandraḥ sadā pūrṇastasya ṣoḍaśa yāḥ kalāḥ citsahasraprabhābhinnā atrāste tatsvarūpatā

कृष्णचन्द्र सदा पूर्ण हैं; उनकी सोलह कलाएँ, जो चित् की सहस्र प्रभाओं से भिन्न-भिन्न हैं, यहीं विद्यमान हैं — यही उनका स्वरूप है।

श्लोक 7 (skanda.2.153.7)

एवं वज्रस्तु राजेन्द्र प्रपन्नभयभञ्जकः ।। श्रीकृष्णदक्षिणे पादे स्थानमेतस्य वर्तते

evaṁ vajrastu rājendra prapannabhayabhañjakaḥ śrīkṛṣṇadakṣiṇe pāde sthānametasya vartate

इस प्रकार हे राजेन्द्र, वज्र शरणागतों के भय का नाश करने वाले हैं; इनका स्थान श्रीकृष्ण के दाहिने चरण में है।

श्लोक 8 (skanda.2.153.8)

अवतारेऽत्र कृष्णेन योगमायाऽति भाविता ।। तद्बलेनात्मविस्मृत्या सीदन्त्येते न संशयः

avatāre'tra kṛṣṇena yogamāyā'ti bhāvitā tadbalenātmavismṛtyā sīdantyete na saṁśayaḥ

इस अवतार में कृष्ण द्वारा योगमाया अत्यन्त सक्रिय की गई; उसी के बल से आत्म-विस्मृति के कारण ये जन दुःख पाते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 9 (skanda.2.153.9)

ऋते कृष्णप्रकाशं तु स्वात्मबोधो न कस्यचित् ।। तत्प्रकाशस्तु जीवानां मायया पिहितः सदा

ṛte kṛṣṇaprakāśaṁ tu svātmabodho na kasyacit tatprakāśastu jīvānāṁ māyayā pihitaḥ sadā

कृष्ण के प्रकाश के बिना किसी को भी अपने आत्मा का बोध नहीं होता; जीवों के लिए वह प्रकाश माया द्वारा सदा आच्छादित रहता है।

श्लोक 10 (skanda.2.153.10)

अष्टाविंशे द्वापरान्ते स्वयमेव यदा हरिः ।। उत्सारयेन्निजां मायां तत्प्रकाशो भवेत्तदा

aṣṭāviṁśe dvāparānte svayameva yadā hariḥ utsārayennijāṁ māyāṁ tatprakāśo bhavettadā

अट्ठाईसवें युग में, द्वापर के अन्त में, जब हरि स्वयं अपनी माया को हटा देते हैं, तब वह प्रकाश होता है।

श्लोक 11 (skanda.2.153.11)

स तु कालो व्यतिक्रांतस्तेनेदमपरं शृणु ।। अन्यदा तत्प्रकाशस्तु श्रीमद्भागवताद्भवेत्

sa tu kālo vyatikrāṁtastenedamaparaṁ śṛṇu anyadā tatprakāśastu śrīmadbhāgavatādbhavet

वह काल तो बीत चुका है, इसलिए यह दूसरी बात सुनो — अन्य समयों में वह प्रकाश श्रीमद्भागवत से होता है।

श्लोक 12 (skanda.2.153.12)

श्रीमद्भागवतं शास्त्रं यत्र भागवतैर्यदा ।। कीर्त्यते श्रूयते चापि श्रीकृष्णस्तत्र निश्चितम्

śrīmadbhāgavataṁ śāstraṁ yatra bhāgavatairyadā kīrtyate śrūyate cāpi śrīkṛṣṇastatra niścitam

जहाँ और जब भी भक्तों द्वारा श्रीमद्भागवत शास्त्र का कीर्तन अथवा श्रवण किया जाता है, वहाँ निश्चित रूप से श्रीकृष्ण उपस्थित रहते हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.153.13)

श्रीमद्भागवतं यत्र श्लोकं श्लोकार्द्धमेव च ।। तत्रापि भगवान्कृष्णो बल्लवीभिर्विराजते

śrīmadbhāgavataṁ yatra ślokaṁ ślokārddhameva ca tatrāpi bhagavānkṛṣṇo ballavībhirvirājate

जहाँ श्रीमद्भागवत का एक श्लोक अथवा आधा श्लोक भी सुनाया जाता है, वहाँ भी भगवान् कृष्ण गोपियों सहित विराजमान रहते हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.153.14)

भारते मानवं जन्म प्राप्य भागवतं न यैः ।। श्रुतं पापपराधीनैरात्मघातस्तु तैः कृतः

bhārate mānavaṁ janma prāpya bhāgavataṁ na yaiḥ śrutaṁ pāpaparādhīnairātmaghātastu taiḥ kṛtaḥ

भारतवर्ष में मनुष्य-जन्म पाकर भी जिन पापाधीन लोगों ने भागवत नहीं सुना, उन्होंने अपने ही आत्मा का घात किया है।

श्लोक 15 (skanda.2.153.15)

श्रीमद्भागवतं शास्त्रं नित्यं यैः परिसेवितम् ।। पितुर्मातुश्च भार्यायाः कुलपंक्तिः सुतारिता

śrīmadbhāgavataṁ śāstraṁ nityaṁ yaiḥ parisevitam piturmātuśca bhāryāyāḥ kulapaṁktiḥ sutāritā

जिन्होंने श्रीमद्भागवत शास्त्र की नित्य सेवा की है, उन्होंने पिता, माता और पत्नी की कुल-परम्परा को भलीभाँति तार दिया है।

श्लोक 16 (skanda.2.153.16)

विद्याप्रकाशो विप्राणां राजां शत्रुजयो विशाम् ।। धनं स्वास्थ्यं च शूद्राणां श्रीमद्भागवताद्भवेत्

vidyāprakāśo viprāṇāṁ rājāṁ śatrujayo viśām dhanaṁ svāsthyaṁ ca śūdrāṇāṁ śrīmadbhāgavatādbhavet

ब्राह्मणों के लिए विद्या का प्रकाश, राजाओं के लिए शत्रुओं पर विजय, वैश्यों-शूद्रों के लिए धन और स्वास्थ्य — यह सब श्रीमद्भागवत से प्राप्त होता है।

श्लोक 17 (skanda.2.153.17)

योषितामपरेषां च सर्ववांछितपूरणम् ।। अतो भागवतं नित्यं को न सेवेत भाग्यवान्

yoṣitāmapareṣāṁ ca sarvavāṁchitapūraṇam ato bhāgavataṁ nityaṁ ko na seveta bhāgyavān

तथा स्त्रियों और अन्य सबकी समस्त कामनाओं की पूर्ति भी इसी से होती है। अतः कौन भाग्यवान् भागवत की नित्य सेवा न करे?

श्लोक 18 (skanda.2.153.18)

अनेकजन्मसंसिद्धः श्रीमद्भागवतं लभेत् ।। प्रकाशो भगवद्भक्तेरुद्भवस्तत्र जायते

anekajanmasaṁsiddhaḥ śrīmadbhāgavataṁ labhet prakāśo bhagavadbhakterudbhavastatra jāyate

अनेक जन्मों में सिद्धि प्राप्त व्यक्ति ही श्रीमद्भागवत को प्राप्त करता है; उसी में भगवद्भक्ति का प्रकाश और उसका उद्भव होता है।

श्लोक 19 (skanda.2.153.19)

सांख्यायनप्रसादाप्तं श्रीमद्भागवतं पुरा ।। बृहस्पतिर्दत्तवान्मे तेनाहं कृष्णवल्लभः

sāṁkhyāyanaprasādāptaṁ śrīmadbhāgavataṁ purā bṛhaspatirdattavānme tenāhaṁ kṛṣṇavallabhaḥ

पूर्व में सांख्यायन की कृपा से प्राप्त श्रीमद्भागवत को बृहस्पति ने मुझे दिया; उसी से मैं कृष्ण का प्रिय बना हूँ।

श्लोक 20 (skanda.2.153.20)

आख्यायिका च तेनोक्ता विष्णुरात निबोध ताम् ।। ज्ञायते संप्रदायोऽपि यत्र भागवतश्रुतेः

ākhyāyikā ca tenoktā viṣṇurāta nibodha tām jñāyate saṁpradāyo'pi yatra bhāgavataśruteḥ

और उन्होंने ही एक आख्यायिका कही थी, हे विष्णुरात, उसे समझो; उससे भागवत-श्रवण की परम्परा भी ज्ञात होती है।

श्लोक 21 (skanda.2.153.21)

।। श्रीबृहस्पतिरुवाच ।। ।। ईक्षांचक्रे यदा कृष्णो मायापुरुषरूपधृक् ।। ब्रह्मा विष्णुः शिवश्चापि रजःसत्त्वतमोगुणैः

śrībṛhaspatiruvāca īkṣāṁcakre yadā kṛṣṇo māyāpuruṣarūpadhṛk brahmā viṣṇuḥ śivaścāpi rajaḥsattvatamoguṇaiḥ

बृहस्पति ने कहा — जब मायापुरुष का रूप धारण किए हुए कृष्ण ने दृष्टिपात किया, तब रजः, सत्त्व और तमः गुणों से ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी प्रकट हुए।

श्लोक 22 (skanda.2.153.22)

पुरुषास्त्रय उत्तस्थुरधिकारांस्तदादिशत् ।। उत्पत्तौ पालने चैव संहारे प्रक्रमेण तान्

puruṣāstraya uttasthuradhikārāṁstadādiśat utpattau pālane caiva saṁhāre prakrameṇa tān

तीनों पुरुष उठ खड़े हुए; तब उन्होंने क्रमशः सृष्टि, पालन और संहार में उन्हें अधिकार सौंपे।

श्लोक 23 (skanda.2.153.23)

ब्रह्मा तु नाभिकमलादुत्पन्नस्तं व्यजिज्ञपत् ।। ।। श्रीब्रह्मोवाच ।। ।। नारायणादिपुरुष परमात्मन्नमोऽस्तु ते

brahmā tu nābhikamalādutpannastaṁ vyajijñapat śrībrahmovāca nārāyaṇādipuruṣa paramātmannamo'stu te

नाभि-कमल से उत्पन्न ब्रह्मा ने उनसे निवेदन किया — ब्रह्मा ने कहा — हे नारायणादि पुरुष, हे परमात्मन्, आपको नमस्कार हो।

श्लोक 24 (skanda.2.153.24)

त्वया सर्गे नियुक्तोऽस्मि पापीयान्मां रजोगुणः ।। त्वत्स्मृतौ नैव बाधेत तथैव कृपया प्रभो

tvayā sarge niyukto'smi pāpīyānmāṁ rajoguṇaḥ tvatsmṛtau naiva bādheta tathaiva kṛpayā prabho

आपके द्वारा मुझे सृष्टि-कार्य में नियुक्त किया गया है; पापमय रजोगुण मेरी आपकी स्मृति में कभी बाधा न डाले, हे प्रभो, ऐसी ही कृपा कीजिए।

श्लोक 25 (skanda.2.153.25)

।। श्रीबृहस्पतिरुवाच ।। ।। यदा तु भगवांस्तस्मै श्रीमद्भागवतं पुरा ।। उपदिश्याब्रवीद्ब्रह्मन्सेवस्वैनत्स्वसिद्धये

śrībṛhaspatiruvāca yadā tu bhagavāṁstasmai śrīmadbhāgavataṁ purā upadiśyābravīdbrahmansevasvainatsvasiddhaye

बृहस्पति ने कहा — तब भगवान् ने उन्हें पूर्व में श्रीमद्भागवत का उपदेश देकर कहा — हे ब्रह्मन्, अपनी सिद्धि के लिए इसकी सेवा करो।

श्लोक 26 (skanda.2.153.26)

ब्रह्मा तु परमप्रीतस्तेन कृष्णाप्तयेऽनिशम् ।। सप्तावरणभंगाय सप्ताहं समवर्तयत्

brahmā tu paramaprītastena kṛṣṇāptaye'niśam saptāvaraṇabhaṁgāya saptāhaṁ samavartayat

ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर, निरन्तर कृष्ण-प्राप्ति और सात आवरणों के भेदन के लिए, सप्ताह का प्रवर्तन किया।

श्लोक 27 (skanda.2.153.27)

श्रीभागवतसप्ताहसेवनाप्तमनोरथः ।। सृष्टिं वितनुते नित्यं ससप्ताहः पुनःपुनः

śrībhāgavatasaptāhasevanāptamanorathaḥ sṛṣṭiṁ vitanute nityaṁ sasaptāhaḥ punaḥpunaḥ

श्रीमद्भागवत-सप्ताह की सेवा से मनोरथ प्राप्त करके, वे उस सप्ताह के साथ बार-बार नित्य सृष्टि का विस्तार करते हैं।

श्लोक 28 (skanda.2.153.28)

विष्णुरप्यर्थयामास पुमांसं स्वार्थसिद्धये ।। प्रजानां पालने पुंसा यदनेनापि कल्पितः

viṣṇurapyarthayāmāsa pumāṁsaṁ svārthasiddhaye prajānāṁ pālane puṁsā yadanenāpi kalpitaḥ

विष्णु ने भी अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिए उस पुरुष से प्रार्थना की, क्योंकि उन्हें भी उन्हीं के द्वारा प्रजा-पालन में नियुक्त किया गया था।

श्लोक 29 (skanda.2.153.29)

।। श्रीविष्णुरुवाच ।। ।। प्रजानां पालनं देव करिष्यामि यथोचितम् ।। प्रवृत्त्या च निवृत्त्या च कर्मज्ञानप्रयोजनात्

śrīviṣṇuruvāca prajānāṁ pālanaṁ deva kariṣyāmi yathocitam pravṛttyā ca nivṛttyā ca karmajñānaprayojanāt

विष्णु ने कहा — हे देव, मैं प्रवृत्ति और निवृत्ति के द्वारा, कर्म और ज्ञान के प्रयोजन से, यथोचित रूप से प्रजा-पालन करूँगा।

श्लोक 30 (skanda.2.153.30)

यदायदैव कालेन धर्मग्लानिर्भविष्यति ।। धर्मं संस्थापयिष्यामि ह्यवतारैस्तदा तदा

yadāyadaiva kālena dharmaglānirbhaviṣyati dharmaṁ saṁsthāpayiṣyāmi hyavatāraistadā tadā

जब-जब काल के प्रवाह में धर्म की ग्लानि होगी, तब-तब मैं अवतारों के द्वारा धर्म की पुनर्स्थापना करूँगा।

श्लोक 31 (skanda.2.153.31)

भोगार्थिभ्यस्तु यज्ञादिफलं दास्यामि निश्चितम् ।। मोक्षार्थिभ्यो विरक्तेभ्यो मुक्तिं पञ्चविधां तथा

bhogārthibhyastu yajñādiphalaṁ dāsyāmi niścitam mokṣārthibhyo viraktebhyo muktiṁ pañcavidhāṁ tathā

भोग की इच्छा रखने वालों को मैं निश्चित रूप से यज्ञादि का फल दूँगा, तथा विरक्त, मोक्ष के इच्छुक जनों को पाँच प्रकार की मुक्ति दूँगा।

श्लोक 32 (skanda.2.153.32)

येऽपि मोक्षं न वाञ्छन्ति तान्कथं पालयाम्यहम् ।। आत्मानं च श्रियं चापि पालयामि कथं वद

ye'pi mokṣaṁ na vāñchanti tānkathaṁ pālayāmyaham ātmānaṁ ca śriyaṁ cāpi pālayāmi kathaṁ vada

किन्तु जो मोक्ष की भी इच्छा नहीं रखते, उनका मैं पालन कैसे करूँ? और अपने आत्मा तथा श्री का भी पालन मैं कैसे करूँ? यह बताइए।

श्लोक 33 (skanda.2.153.33)

तस्मा अपि पुमानाद्यः श्रीभागवतमादिशत् ।। उवाच च पठस्वैनत्तव सर्वार्थसिद्धये

tasmā api pumānādyaḥ śrībhāgavatamādiśat uvāca ca paṭhasvainattava sarvārthasiddhaye

उस विष्णु को भी आदि पुरुष ने श्रीमद्भागवत का उपदेश दिया और कहा — इसे पढ़ो, इससे तुम्हारे समस्त प्रयोजन सिद्ध होंगे।

श्लोक 34 (skanda.2.153.34)

ततो विष्णुः प्रसन्नात्मा परमार्थकपालने ।। समर्थोऽभूच्छ्रिया मासिमासि भागवतं स्मरन्

tato viṣṇuḥ prasannātmā paramārthakapālane samartho'bhūcchriyā māsimāsi bhāgavataṁ smaran

तत्पश्चात् प्रसन्नचित्त विष्णु, प्रतिमास भागवत का स्मरण करते हुए, श्री के साथ परम अर्थ के पालन में समर्थ हो गए।

श्लोक 35 (skanda.2.153.35)

यदा विष्णुः स्वयं वक्ता लक्ष्मीश्च श्रवणे रता ।। तदा भागवतश्रावो मासेनैव पुनःपुनः

yadā viṣṇuḥ svayaṁ vaktā lakṣmīśca śravaṇe ratā tadā bhāgavataśrāvo māsenaiva punaḥpunaḥ

जब विष्णु स्वयं वक्ता हों और लक्ष्मी श्रवण में लीन हों, तब भागवत का श्रवण एक मास में ही बार-बार पूर्ण होता है।

श्लोक 36 (skanda.2.153.36)

यदा लक्ष्मीः स्वयं वक्त्री विष्णुश्च श्रवणे रतः ।। मासद्वयं रसास्वादस्तदातीव सुशोभते

yadā lakṣmīḥ svayaṁ vaktrī viṣṇuśca śravaṇe rataḥ māsadvayaṁ rasāsvādastadātīva suśobhate

जब लक्ष्मी स्वयं वक्त्री हों और विष्णु श्रवण में लीन हों, तब दो मास तक चलने वाला रसास्वादन अत्यन्त शोभायमान होता है।

श्लोक 37 (skanda.2.153.37)

अधिकारे स्थितो विष्णुर्लक्ष्मीर्निश्चिन्तमानसा ।। तेन भागवतास्वादस्तस्या भूरि प्रकाशते

adhikāre sthito viṣṇurlakṣmīrniścintamānasā tena bhāgavatāsvādastasyā bhūri prakāśate

अधिकार में स्थित विष्णु और निश्चिन्त-चित्त लक्ष्मी — उनके कारण भागवत का आस्वादन उनके लिए अत्यधिक प्रकाशित होता है।

श्लोक 38 (skanda.2.153.38)

अथ रुद्रोऽपि तं देवं संहाराधिकृतः पुरा ।। पुमांसं प्रार्थयामास स्वसामर्थ्यविवृद्धये

atha rudro'pi taṁ devaṁ saṁhārādhikṛtaḥ purā pumāṁsaṁ prārthayāmāsa svasāmarthyavivṛddhaye

तत्पश्चात् संहार के अधिकारी नियुक्त रुद्र ने भी अपने सामर्थ्य की वृद्धि के लिए उस पुरुष-देव से प्रार्थना की।

श्लोक 39 (skanda.2.153.39)

।। श्रीरुद्र उवाच ।। ।। नित्ये नैमित्तिके चैव संहारे प्राकृते तथा ।। शक्तयो मम विद्यन्ते देवदेव मम प्रभो

śrīrudra uvāca nitye naimittike caiva saṁhāre prākṛte tathā śaktayo mama vidyante devadeva mama prabho

रुद्र ने कहा — हे देवदेव, हे मेरे प्रभो, नित्य, नैमित्तिक तथा प्राकृतिक संहार में मेरी शक्तियाँ विद्यमान हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.153.40)

आत्यंतिके तु संहारे मम शक्तिर्न विद्यते ।। महद्दुःखं ममैतत्तु तेन त्वां प्रार्थयाम्यहम्

ātyaṁtike tu saṁhāre mama śaktirna vidyate mahadduḥkhaṁ mamaitattu tena tvāṁ prārthayāmyaham

किन्तु आत्यन्तिक संहार में मेरी कोई शक्ति नहीं है; यह मेरे लिए महान दुःख की बात है, इसीलिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ।

श्लोक 41 (skanda.2.153.41)

।। श्रीबृहस्पतिरुवाच ।। ।। श्रीमद्भागवतं तस्मा अपि नारायणो ददौ ।। स तु संसेवनादस्य जिग्ये चापि तमोगुणम्

śrībṛhaspatiruvāca śrīmadbhāgavataṁ tasmā api nārāyaṇo dadau sa tu saṁsevanādasya jigye cāpi tamoguṇam

बृहस्पति ने कहा — उन्हें भी नारायण ने श्रीमद्भागवत प्रदान किया; और उन्होंने उसकी सेवा से तमोगुण पर भी विजय प्राप्त कर ली।

श्लोक 42 (skanda.2.153.42)

कथा भागवती तेन सेविता वर्षमात्रतः ।। लये त्वात्यंतिके तेनावाप शक्तिं सदाशिवः

kathā bhāgavatī tena sevitā varṣamātrataḥ laye tvātyaṁtike tenāvāpa śaktiṁ sadāśivaḥ

भागवत कथा का उनके द्वारा एक वर्षपर्यन्त सेवन किया गया; और उसी से सदाशिव ने आत्यन्तिक प्रलय की शक्ति प्राप्त की।

श्लोक 43 (skanda.2.153.43)

।। उद्धव उवाच ।। ।। श्रीभागवतमाहात्म्य इमामाख्यायिकां गुरोः ।। श्रुत्वा भागवतं लब्ध्वा मुमुदेऽहं प्रणम्य तम्

uddhava uvāca śrībhāgavatamāhātmya imāmākhyāyikāṁ guroḥ śrutvā bhāgavataṁ labdhvā mumude'haṁ praṇamya tam

उद्धव ने कहा — गुरु से श्रीमद्भागवत-माहात्म्य की यह आख्यायिका सुनकर और भागवत को प्राप्त करके, मैं उन्हें प्रणाम करके आनन्दित हुआ।

श्लोक 44 (skanda.2.153.44)

ततस्तु वैष्णवीं रीतिं गृहीत्वा मासमात्रतः ।। श्रीमद्भागवतास्वादो मया सम्यङ्निषेवितः

tatastu vaiṣṇavīṁ rītiṁ gṛhītvā māsamātrataḥ śrīmadbhāgavatāsvādo mayā samyaṅniṣevitaḥ

तत्पश्चात् वैष्णवी रीति ग्रहण करके, एक मासपर्यन्त, मेरे द्वारा श्रीमद्भागवत के आस्वादन का सम्यक् सेवन किया गया।

श्लोक 45 (skanda.2.153.45)

तावतैव बभूवाहं कृष्णस्य दयितः सखा ।। कृष्णेनाथ नियुक्तोऽहं व्रजे स्वप्रेयसीगणे

tāvataiva babhūvāhaṁ kṛṣṇasya dayitaḥ sakhā kṛṣṇenātha niyukto'haṁ vraje svapreyasīgaṇe

उतने मात्र से ही मैं कृष्ण का प्रिय सखा बन गया; और तब कृष्ण ने मुझे व्रज में अपनी प्रियतमाओं के समूह के लिए नियुक्त किया।

श्लोक 46 (skanda.2.153.46)

विरहार्त्तासु गोपीषु स्वयं नित्यविहारिणा ।। श्रीभागवतसंदेशो मन्मुखेन प्रयोजितः

virahārttāsu gopīṣu svayaṁ nityavihāriṇā śrībhāgavatasaṁdeśo manmukhena prayojitaḥ

विरह से पीड़ित गोपियों के लिए, स्वयं नित्य-विहारी कृष्ण द्वारा मेरे मुख से श्रीमद्भागवत का संदेश दिलवाया गया।

श्लोक 47 (skanda.2.153.47)

तं यथामति लब्ध्वा ता आसन्विरहवर्ज्जिताः ।। नाज्ञासिषं रहस्यं तच्चमत्कारस्तु लोकितः

taṁ yathāmati labdhvā tā āsanvirahavarjjitāḥ nājñāsiṣaṁ rahasyaṁ taccamatkārastu lokitaḥ

उसे अपनी बुद्धि के अनुसार प्राप्त करके वे विरहरहित हो गईं; मैं स्वयं उस रहस्य को तब नहीं जान सका, किन्तु उसका चमत्कार सबको दिखाई दिया।

श्लोक 48 (skanda.2.153.48)

स्वर्वासं प्रार्थ्य कृष्णं च ब्रह्माद्येषु गतेषु मे ।। श्रीमद्भागवते कृष्णस्तद्रहस्यं स्वयं ददौ

svarvāsaṁ prārthya kṛṣṇaṁ ca brahmādyeṣu gateṣu me śrīmadbhāgavate kṛṣṇastadrahasyaṁ svayaṁ dadau

स्वर्ग-वास की प्रार्थना करके, ब्रह्मा आदि के चले जाने पर, जब मैंने भी वैसी ही याचना की, तब कृष्ण ने स्वयं श्रीमद्भागवत में वह रहस्य मुझे प्रदान किया।

श्लोक 49 (skanda.2.153.49)

पुरतोऽश्वत्थमूलस्य चकार मयि तद्दृढम् ।। तेनात्र व्रजवल्लीषु वसामि बदरीं गतः

purato'śvatthamūlasya cakāra mayi taddṛḍham tenātra vrajavallīṣu vasāmi badarīṁ gataḥ

अश्वत्थ वृक्ष की जड़ के सम्मुख उन्होंने मुझमें उसे दृढ़ कर दिया; उसी से बदरी गया होकर भी मैं यहाँ व्रज की लताओं में निवास करता हूँ।

श्लोक 50 (skanda.2.153.50)

तस्मान्नारदकुण्डेऽत्र तिष्ठामि स्वेच्छया सदा ।। कृष्णप्रकाशो भक्तानां श्रीमद्भागवताद्भवेत्

tasmānnāradakuṇḍe'tra tiṣṭhāmi svecchayā sadā kṛṣṇaprakāśo bhaktānāṁ śrīmadbhāgavatādbhavet

इसलिए मैं यहाँ नारद-कुण्ड पर सदा अपनी इच्छा से निवास करता हूँ; भक्तों के लिए कृष्ण का प्रकाश श्रीमद्भागवत से ही होता है।

श्लोक 51 (skanda.2.153.51)

तदेषामपि कार्य्यार्थं श्रीमद्भागवतं त्वहम् ।। प्रवक्ष्यामि सहायोऽत्र त्वयैवानुष्ठितो भवेत्

tadeṣāmapi kāryyārthaṁ śrīmadbhāgavataṁ tvaham pravakṣyāmi sahāyo'tra tvayaivānuṣṭhito bhavet

अतः इनके प्रयोजन के लिए भी मैं श्रीमद्भागवत का वर्णन करूँगा; इसमें सहायता तुम्हारे द्वारा ही की जानी चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.2.153.52)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। विष्णुरातस्तु श्रुत्वा तदुद्धवं प्रणतोऽब्रवीत् ।। ।। श्रीपरीक्षिदुवाच ।। ।। हरिदास त्वया कार्य्यं श्रीभागवतकीर्तनम्

śrīsūta uvāca viṣṇurātastu śrutvā taduddhavaṁ praṇato'bravīt śrīparīkṣiduvāca haridāsa tvayā kāryyaṁ śrībhāgavatakīrtanam

सूत जी ने कहा — विष्णुरात यह सुनकर प्रणत होकर उद्धव से बोले। परीक्षित् ने कहा — हे हरिदास, श्रीभागवत का कीर्तन आपके द्वारा किया जाना चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.2.153.53)

आज्ञाप्योऽहं यथाकार्य्यं सहायोऽत्र मया तथा ।। ।। श्रीसूत उवाच ।। ।। श्रुत्वैतदुद्धवो वाक्यमुवाच प्रीतमानसः

ājñāpyo'haṁ yathākāryyaṁ sahāyo'tra mayā tathā śrīsūta uvāca śrutvaitaduddhavo vākyamuvāca prītamānasaḥ

मुझे जैसा कार्य हो, वैसी आज्ञा दी जाए; इसमें मैं उसी प्रकार सहायक बनूँगा। सूत जी ने कहा — यह वचन सुनकर प्रसन्नचित्त उद्धव ने कहा।

श्लोक 54 (skanda.2.153.54)

।। उद्धव उवाच ।। ।। श्रीकृष्णेन परित्यक्ते भूतले बलवान्कलिः ।। करिष्यति परं विघ्नं सत्कार्ये समुपस्थिते

uddhava uvāca śrīkṛṣṇena parityakte bhūtale balavānkaliḥ kariṣyati paraṁ vighnaṁ satkārye samupasthite

उद्धव ने कहा — श्रीकृष्ण द्वारा त्यागी गई इस पृथ्वी पर बलवान् कलि इस सत्कार्य के उपस्थित होने पर बड़ा विघ्न उत्पन्न करेगा।

श्लोक 55 (skanda.2.153.55)

तस्माद्दिग्विजयं याहि कलिनिग्रहमाचर ।। अहं तु मासमात्रेण वैष्णवीं रीतिमास्थितः

tasmāddigvijayaṁ yāhi kalinigrahamācara ahaṁ tu māsamātreṇa vaiṣṇavīṁ rītimāsthitaḥ

इसलिए तुम दिग्विजय पर जाओ और कलि का निग्रह करो; मैं तो एक मास में ही वैष्णवी रीति में स्थित होकर —

श्लोक 56 (skanda.2.153.56)

श्रीमद्भागवतास्वादं प्रचार्य त्वत्सहायतः ।। एतान्सम्प्रापयिष्यामि नित्यधाम्नि मधुद्विषः

śrīmadbhāgavatāsvādaṁ pracārya tvatsahāyataḥ etānsamprāpayiṣyāmi nityadhāmni madhudviṣaḥ

— तुम्हारी सहायता से श्रीमद्भागवत के आस्वादन का प्रचार करके इन सबको मधुसूदन के नित्य धाम को पहुँचा दूँगा।

श्लोक 57 (skanda.2.153.57)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। श्रुत्वैवं तद्वचो राजा मुदितश्चिन्तयातुरः ।। तदा विज्ञापयामास स्वाभिप्रायं तमुद्धवम्

śrīsūta uvāca śrutvaivaṁ tadvaco rājā muditaścintayāturaḥ tadā vijñāpayāmāsa svābhiprāyaṁ tamuddhavam

सूत जी ने कहा — यह वचन सुनकर राजा हर्षित होते हुए भी किसी चिन्ता से आतुर हो गए, और तब उन्होंने उद्धव को अपना अभिप्राय बताया।

श्लोक 58 (skanda.2.153.58)

।। श्रीपरीक्षिदुवाच ।। ।। कलिं तु निग्रहीष्यामि तात ते वचसि स्थितः ।। श्रीभागवतसंप्राप्तिः कथं मम भविष्यति

śrīparīkṣiduvāca kaliṁ tu nigrahīṣyāmi tāta te vacasi sthitaḥ śrībhāgavatasaṁprāptiḥ kathaṁ mama bhaviṣyati

परीक्षित् ने कहा — हे तात, आपके वचन में स्थित रहकर मैं कलि का निग्रह करूँगा; किन्तु मुझे श्रीभागवत की प्राप्ति कैसे होगी?

श्लोक 59 (skanda.2.153.59)

अहं तु समनुग्राह्यस्तव पादतले श्रितः ।। ।। श्रीसूत उवाच ।। ।। श्रुत्वैतद्वचनं भूयोऽप्युद्धवस्तमुवाच ह

ahaṁ tu samanugrāhyastava pādatale śritaḥ śrīsūta uvāca śrutvaitadvacanaṁ bhūyo'pyuddhavastamuvāca ha

मैं आपके चरणों की शरण में हूँ और आपकी कृपा का पात्र हूँ। सूत जी ने कहा — यह वचन सुनकर उद्धव ने पुनः उनसे कहा।

श्लोक 60 (skanda.2.153.60)

।। उद्धव उवाच ।। ।। राजंश्चिन्ता तु ते काऽपि नैव कार्या कथंचन ।। तवैव भगवच्छास्त्रे यतो मुख्याधिकारिता

uddhava uvāca rājaṁścintā tu te kā'pi naiva kāryā kathaṁcana tavaiva bhagavacchāstre yato mukhyādhikāritā

उद्धव ने कहा — हे राजन्, तुम्हें किसी प्रकार की भी चिन्ता नहीं करनी चाहिए, क्योंकि इस भगवच्छास्त्र का मुख्य अधिकार तुम्हारा ही है।

श्लोक 61 (skanda.2.153.61)

एतावत्कालपर्य्यन्तं प्रायो भागवतश्रुतेः ।। वार्तामपि न जानन्ति मनुष्याः कर्मतत्पराः

etāvatkālaparyyantaṁ prāyo bhāgavataśruteḥ vārtāmapi na jānanti manuṣyāḥ karmatatparāḥ

इस समय तक, कर्म में तत्पर मनुष्य प्रायः भागवत-श्रवण की बात तक नहीं जानते हैं।

श्लोक 62 (skanda.2.153.62)

त्वत्प्रसादेन बहवो मनुष्या भारताजिरे ।। श्रीमद्भागवतप्राप्तौ सुखं प्राप्स्यन्ति शाश्वतम्

tvatprasādena bahavo manuṣyā bhāratājire śrīmadbhāgavataprāptau sukhaṁ prāpsyanti śāśvatam

तुम्हारी कृपा से भारत-भूमि पर अनेक मनुष्य श्रीमद्भागवत की प्राप्ति से शाश्वत सुख को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 63 (skanda.2.153.63)

नन्दनन्दनरूपस्तु श्रीशुको भगवानृषिः ।। श्रीमद्भागवतं तुभ्यं श्रावयिष्यत्यसंशयः

nandanandanarūpastu śrīśuko bhagavānṛṣiḥ śrīmadbhāgavataṁ tubhyaṁ śrāvayiṣyatyasaṁśayaḥ

नन्दनन्दन के ही रूप में भगवान् ऋषि श्रीशुक निःसंदेह तुम्हें श्रीमद्भागवत सुनाएँगे।

श्लोक 64 (skanda.2.153.64)

तेन प्राप्स्यसि राजंस्त्वं नित्यं धाम व्रजेशितुः ।। श्रीभागवतसंचारस्ततो भुवि भविष्यति

tena prāpsyasi rājaṁstvaṁ nityaṁ dhāma vrajeśituḥ śrībhāgavatasaṁcārastato bhuvi bhaviṣyati

उसी से, हे राजन्, तुम व्रजेश्वर के नित्य धाम को प्राप्त करोगे; और उसी से पृथ्वी पर श्रीभागवत का प्रसार होगा।

श्लोक 65 (skanda.2.153.65)

तस्मात्त्वं गच्छ राजेन्द्र कलिनिग्रहमाचर ।। ।। श्रीसूत उवाच ।। ।। इत्युक्तस्तं परिक्रम्य गतो राजा दिशां जये

tasmāttvaṁ gaccha rājendra kalinigrahamācara śrīsūta uvāca ityuktastaṁ parikramya gato rājā diśāṁ jaye

इसलिए हे राजेन्द्र, तुम जाओ और कलि का निग्रह करो। सूत जी ने कहा — यह कहे जाने पर राजा उनकी परिक्रमा करके दिग्विजय के लिए चले गए।

श्लोक 66 (skanda.2.153.66)

वज्रस्तु निजराज्येशं प्रतिबाहुं विधाय च ।। तत्रैव मातृभिः साकं तस्थौ भागवताशया

vajrastu nijarājyeśaṁ pratibāhuṁ vidhāya ca tatraiva mātṛbhiḥ sākaṁ tasthau bhāgavatāśayā

वज्र ने अपने राज्य पर एक प्रतिनिधि नियुक्त करके, वहीं अपनी माताओं के साथ भागवत की आशा से निवास किया।

श्लोक 67 (skanda.2.153.67)

अथ वृन्दावने मासं गोवर्द्धनसमीपतः ।। श्रीमद्भागवतास्वादस्तूद्धवेन प्रवर्तितः

atha vṛndāvane māsaṁ govarddhanasamīpataḥ śrīmadbhāgavatāsvādastūddhavena pravartitaḥ

तब वृन्दावन में, गोवर्धन के समीप, एक मासपर्यन्त, उद्धव द्वारा श्रीमद्भागवत के आस्वादन का प्रवर्तन किया गया।

श्लोक 68 (skanda.2.153.68)

तस्मिन्नास्वाद्यमाने तु सच्चिदानन्दरूपिणी ।। प्रचकाशे हरेर्लीला सर्वतः कृष्ण एव च

tasminnāsvādyamāne tu saccidānandarūpiṇī pracakāśe harerlīlā sarvataḥ kṛṣṇa eva ca

उसका आस्वादन होते-होते सच्चिदानन्द-स्वरूपिणी हरि की लीला सब ओर प्रकाशित हुई, और स्वयं कृष्ण भी प्रकट हुए।

श्लोक 69 (skanda.2.153.69)

आत्मानं च तदन्तःस्थं सर्वेऽपि ददृशुस्तदा ।। वज्रस्तु दक्षिणे दृष्ट्वा कृष्णपादसरोरुहे

ātmānaṁ ca tadantaḥsthaṁ sarve'pi dadṛśustadā vajrastu dakṣiṇe dṛṣṭvā kṛṣṇapādasaroruhe

तब सभी ने अपने भीतर स्थित अपने आत्मा को देखा; और वज्र ने कृष्ण के दाहिने चरण-कमल में स्वयं को देखकर —

श्लोक 70 (skanda.2.153.70)

स्वात्मानं कृष्णवैधुर्य्यान्मुक्तस्तद्भुव्यशोभत ।। ताश्च तन्मातरः कृष्णे रासरात्रिप्रकाशिनि

svātmānaṁ kṛṣṇavaidhuryyānmuktastadbhuvyaśobhata tāśca tanmātaraḥ kṛṣṇe rāsarātriprakāśini

— कृष्ण-वियोग की पीड़ा से मुक्त होकर उसी स्थान में सुशोभित हुए। और उनकी वे माताएँ, रास-रात्रि में प्रकाशित होने वाले कृष्ण में —

श्लोक 71 (skanda.2.153.71)

चंद्रे कलाप्रभारूपमात्मानं वीक्ष्य विस्मिताः ।। स्वप्रेष्ठ विरहव्याधिविमुक्ताः स्वपदं ययुः

caṁdre kalāprabhārūpamātmānaṁ vīkṣya vismitāḥ svapreṣṭha virahavyādhivimuktāḥ svapadaṁ yayuḥ

— उस चन्द्र में अपनी कलाओं की प्रभा के रूप में स्वयं को देखकर, विस्मित होकर, अपने प्रियतम के विरह-रोग से मुक्त होकर, वे अपने पद को प्राप्त हुईं।

श्लोक 72 (skanda.2.153.72)

येऽन्ये च तत्र ते सर्वे नित्यलीलान्तरं गताः ।। व्यावहारिकलोकेभ्यः सद्योऽदर्शनमागताः

ye'nye ca tatra te sarve nityalīlāntaraṁ gatāḥ vyāvahārikalokebhyaḥ sadyo'darśanamāgatāḥ

और वहाँ उपस्थित अन्य सभी लोग भी नित्य-लीला के मध्य में चले गए, और व्यावहारिक लोगों की दृष्टि से तत्काल अदृश्य हो गए।

श्लोक 73 (skanda.2.153.73)

गोवर्द्धननिकुञ्जेषु गोषु वृन्दावनादिषु ।। नित्यं कृष्णेन मोदन्ते दृश्यन्ते प्रेमतत्परैः

govarddhananikuñjeṣu goṣu vṛndāvanādiṣu nityaṁ kṛṣṇena modante dṛśyante prematatparaiḥ

गोवर्धन के निकुंजों में, गौओं के मध्य, वृन्दावन आदि में, वे नित्य कृष्ण के साथ आनन्दित रहते हैं, और केवल प्रेम में तत्पर भक्तों द्वारा ही देखे जाते हैं।

श्लोक 74 (skanda.2.153.74)

।। श्रीसूत उवाच ।। ।। य एतां भगवत्प्राप्तिं शृणुयाच्चापि कीर्तयेत् ।। तस्य वै भगवत्प्राप्तिर्दुःखहानिश्च जायते

śrīsūta uvāca ya etāṁ bhagavatprāptiṁ śṛṇuyāccāpi kīrtayet tasya vai bhagavatprāptirduḥkhahāniśca jāyate

सूत जी ने कहा — जो कोई भगवत्प्राप्ति की इस कथा को सुनता है, अथवा कीर्तन भी करता है, उसे निश्चय ही भगवत्प्राप्ति और दुःख का नाश प्राप्त होता है।

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