वैष्णव खण्ड · अध्याय 154
भागवत-स्वरूप, वक्ता-श्रोता-लक्षण एवं सेवन-विधि-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.154.1)
।। श्रीऋषय ऊचुः ।। ।। साधु सूत चिरं जीव चिरमेवं प्रशाधि नः ।। श्रीभागवतमाहात्म्यमपूर्वं त्वन्सुखाच्छ्रुतम्
śrīṛṣaya ūcuḥ sādhu sūta ciraṁ jīva ciramevaṁ praśādhi naḥ śrībhāgavatamāhātmyamapūrvaṁ tvansukhācchrutam
ऋषियों ने कहा — साधु, हे सूत, चिरंजीवी बनो, और इसी प्रकार हमें दीर्घकाल तक उपदेश देते रहो। श्रीभागवत का यह अपूर्व माहात्म्य तुमसे सुखपूर्वक सुना गया।
श्लोक 2 (skanda.2.154.2)
तत्स्वरूपप्रमाणं च विधिं च श्रवणे वद ।। तद्वक्तुर्लक्षणं सूत श्रोतुश्चापि वदाधुना
tatsvarūpapramāṇaṁ ca vidhiṁ ca śravaṇe vada tadvakturlakṣaṇaṁ sūta śrotuścāpi vadādhunā
अब उसका स्वरूप, उसका प्रमाण और श्रवण की विधि बताइए; और हे सूत, अब उसके वक्ता और श्रोता के लक्षण भी बताइए।
श्लोक 3 (skanda.2.154.3)
।। श्रीसूत उवाच ।। ।। श्रीमद्भागवतस्याथ श्रीमद्भगवतः सदा ।। स्वरूपमेकमेवास्ति सच्चिदानन्दलक्षणम्
śrīsūta uvāca śrīmadbhāgavatasyātha śrīmadbhagavataḥ sadā svarūpamekamevāsti saccidānandalakṣaṇam
सूत जी ने कहा — श्रीमद्भागवत का और सदा श्रीभगवान् का स्वरूप एक ही है, जो सच्चिदानन्द से लक्षित है।
श्लोक 4 (skanda.2.154.4)
श्रीकृष्णासक्तभक्तानां तन्माधुर्य्यप्रकाशकम् ।। समुज्जृम्भति यद्वाक्यं विद्धि भागवतं हि तत्
śrīkṛṣṇāsaktabhaktānāṁ tanmādhuryyaprakāśakam samujjṛmbhati yadvākyaṁ viddhi bhāgavataṁ hi tat
श्रीकृष्ण में आसक्त भक्तों के लिए उनकी माधुर्य को प्रकट करने वाला जो वचन प्रस्फुटित होता है, उसी को निश्चय ही भागवत जानो।
श्लोक 5 (skanda.2.154.5)
ज्ञानविज्ञानभक्त्यङ्गचतुष्टयपरं वचः ।। मायामर्दन दक्षं च विद्धि भागवतं च तत्
jñānavijñānabhaktyaṅgacatuṣṭayaparaṁ vacaḥ māyāmardana dakṣaṁ ca viddhi bhāgavataṁ ca tat
ज्ञान, विज्ञान, भक्ति और वैराग्य — इन चार अंगों में तत्पर, तथा माया के मर्दन में समर्थ जो वचन है, उसे भी भागवत जानो।
श्लोक 6 (skanda.2.154.6)
प्रमाणं तस्य को वेद ह्यनंतस्याक्षरात्मनः ।। ब्रह्मणे हरिणा तद्दिक्चतुःश्लोक्या प्रदर्शिता
pramāṇaṁ tasya ko veda hyanaṁtasyākṣarātmanaḥ brahmaṇe hariṇā taddikcatuḥślokyā pradarśitā
उस अनन्त, अक्षर-स्वरूप शास्त्र का प्रमाण भला कौन जानता है? हरि ने ब्रह्मा को केवल चार श्लोकों के द्वारा उसकी दिशा-मात्र दिखाई थी।
श्लोक 7 (skanda.2.154.7)
तदानंत्यावगाहेन स्वेप्सितावहनक्षमाः ।। त एव संति भो विप्रा ब्रह्मविष्णुशिवादयः
tadānaṁtyāvagāhena svepsitāvahanakṣamāḥ ta eva saṁti bho viprā brahmaviṣṇuśivādayaḥ
उसकी अनन्तता में अवगाहन करके ही अपनी अभीष्ट सिद्धि लाने में समर्थ हैं — हे विप्रो, ऐसे ही हैं ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि।
श्लोक 8 (skanda.2.154.8)
मितबुद्ध्यादिवृत्तीनां मनुष्याणां हिताय च ।। परीक्षिच्छुकसंवादो योऽसौ व्यासेन कीर्तितः
mitabuddhyādivṛttīnāṁ manuṣyāṇāṁ hitāya ca parīkṣicchukasaṁvādo yo'sau vyāsena kīrtitaḥ
सीमित बुद्धि आदि वृत्ति वाले साधारण मनुष्यों के हित के लिए ही व्यास जी द्वारा वह परीक्षित्-शुक संवाद कहा गया।
श्लोक 9 (skanda.2.154.9)
ग्रन्थोऽष्टादशसाहस्रो योऽसौ भागवताभिधः ।। कलिग्राहगृहीतानां स एव परमाश्रयः
grantho'ṣṭādaśasāhasro yo'sau bhāgavatābhidhaḥ kaligrāhagṛhītānāṁ sa eva paramāśrayaḥ
भागवत नाम से प्रसिद्ध वह अठारह सहस्र श्लोकों का ग्रन्थ ही कलिरूपी ग्राह द्वारा ग्रसे हुए जनों का परम आश्रय है।
श्लोक 10 (skanda.2.154.10)
श्रोतारो ऽथ निरूप्यन्ते श्रीमद्विष्णुकथाश्रयाः ।। प्रवरा अवराश्चेति श्रोतारो द्विविधा मताः
śrotāro 'tha nirūpyante śrīmadviṣṇukathāśrayāḥ pravarā avarāśceti śrotāro dvividhā matāḥ
अब श्रीविष्णु-कथा का आश्रय लेने वाले श्रोताओं का निरूपण किया जाता है — श्रोता दो प्रकार के माने गए हैं, श्रेष्ठ और निकृष्ट।
श्लोक 11 (skanda.2.154.11)
प्रवराश्चातको हंसः शुको मीनादयस्तथा ।। अवरा वृकभूरुण्डवृषोष्ट्राद्याः प्रकीर्तिताः
pravarāścātako haṁsaḥ śuko mīnādayastathā avarā vṛkabhūruṇḍavṛṣoṣṭrādyāḥ prakīrtitāḥ
श्रेष्ठ श्रोता चातक, हंस, शुक और मत्स्य आदि के समान हैं; निकृष्ट श्रोता वृक, भुरुण्ड, वृषभ और उष्ट्र आदि के समान कहे गए हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.154.12)
अखिलोपेक्षया यस्तु कृष्णशास्त्रश्रुतौ व्रती ।। स चातको यथाम्भोदमुक्ते पाथसि चातकः
akhilopekṣayā yastu kṛṣṇaśāstraśrutau vratī sa cātako yathāmbhodamukte pāthasi cātakaḥ
जो सब कुछ छोड़कर केवल कृष्ण-शास्त्र-श्रवण का व्रती है, वह चातक के समान है, जैसे चातक केवल मेघ से मुक्त जल को ही ग्रहण करता है।
श्लोक 13 (skanda.2.154.13)
हंसः स्यात्सारमादत्ते यः श्रोता विविधाच्छ्रुतात् ।। दुग्धेनैक्यं गतात्तोयाद्यथा हंसोऽमलं पयः
haṁsaḥ syātsāramādatte yaḥ śrotā vividhācchrutāt dugdhenaikyaṁ gatāttoyādyathā haṁso'malaṁ payaḥ
जो श्रोता विविध श्रुत में से केवल सार को ग्रहण करता है, वह हंस के समान है, जैसे हंस दूध में मिले हुए जल से केवल निर्मल दूध को ही ग्रहण करता है।
श्लोक 14 (skanda.2.154.14)
शुकः सुष्टु मितं वक्ति व्यासं श्रोतृंश्च हर्षयन् ।। सुपाठितः शुको यद्वच्छिक्षकं पार्श्वगानपि
śukaḥ suṣṭu mitaṁ vakti vyāsaṁ śrotṛṁśca harṣayan supāṭhitaḥ śuko yadvacchikṣakaṁ pārśvagānapi
शुक के समान श्रोता सुष्ठु और मित वचन कहकर व्यास और अन्य श्रोताओं को हर्षित करता है, जैसे सुशिक्षित शुक अपने शिक्षक और पास बैठे हुए लोगों को भी हर्षित करता है।
श्लोक 15 (skanda.2.154.15)
शब्दं नानिमिषो जातु करोत्यास्वादयन्रसम् ।। श्रोता स्निग्धो भवेन्मीनो मीनः क्षीरनिधौ यथा
śabdaṁ nānimiṣo jātu karotyāsvādayanrasam śrotā snigdho bhavenmīno mīnaḥ kṣīranidhau yathā
जो रस का आस्वादन करते हुए एक क्षण भी शब्द नहीं करता, पलक तक नहीं झपकाता — ऐसा स्निग्ध श्रोता मीन के समान है, जैसे क्षीरसागर में मीन स्थिर रहता है।
श्लोक 16 (skanda.2.154.16)
यस्तुदन्रसिकाञ्च्छ्रोतॄन्विरौत्यज्ञो वृको हि सः ।। वेणुस्वनरसासक्तान्वृकोऽरण्ये मृगान्यथा
yastudanrasikāñcchrotṝnvirautyajño vṛko hi saḥ veṇusvanarasāsaktānvṛko'raṇye mṛgānyathā
जो अज्ञानी रसिक श्रोताओं को पीड़ा देते हुए चिल्लाता है, वह निश्चय ही वृक के समान है, जैसे वन में वृक वंशी-ध्वनि के रस में आसक्त मृगों पर आक्रमण करता है।
श्लोक 17 (skanda.2.154.17)
भूरुण्डः शिक्षयेदन्याञ्च्छ्रुत्वा न स्वयमाचरेत् ।। यथा हिमवतः शृंगे भूरुण्डाख्यो विहंगमः
bhūruṇḍaḥ śikṣayedanyāñcchrutvā na svayamācaret yathā himavataḥ śṛṁge bhūruṇḍākhyo vihaṁgamaḥ
जो दूसरों को सिखाता है, किन्तु स्वयं सुनकर उसका आचरण नहीं करता, वह भुरुण्ड के समान है, जैसे हिमालय के शिखर पर भुरुण्ड नामक पक्षी अपने ही दूसरे मुख को खिलाकर स्वयं नहीं खाता।
श्लोक 18 (skanda.2.154.18)
सर्वं श्रुतमुपादत्ते सारासारान्धधीर्वृषः ।। स्वादु द्राक्षां खलिं चापि निर्विशेषं यथा वृषः
sarvaṁ śrutamupādatte sārāsārāndhadhīrvṛṣaḥ svādu drākṣāṁ khaliṁ cāpi nirviśeṣaṁ yathā vṛṣaḥ
जो सार-असार के प्रति अंधी बुद्धि वाला होकर सब कुछ सुना हुआ बिना भेद के ग्रहण कर लेता है, वह वृषभ के समान है, जैसे वृषभ स्वादिष्ट द्राक्षा और खली को समान रूप से खा लेता है।
श्लोक 19 (skanda.2.154.19)
स उष्ट्रो मधुरं मुञ्चन्विपरीते रमेत यः ।। यथा निम्बं चरत्युष्ट्रो हित्वाऽऽम्रमपि तद्युतम्
sa uṣṭro madhuraṁ muñcanviparīte rameta yaḥ yathā nimbaṁ caratyuṣṭro hitvā''mramapi tadyutam
जो मधुर को छोड़कर विपरीत में रमण करता है, वह उष्ट्र है, जैसे ऊँट आम्र वृक्ष के साथ होने पर भी उसे छोड़कर नीम को ही चरता है।
श्लोक 20 (skanda.2.154.20)
अन्येऽपि बहवो भेदा द्वयोर्भृंगखरादयः ।। विज्ञेयास्तत्तदाचारैस्तत्तत्प्रकृतिसंभवैः
anye'pi bahavo bhedā dvayorbhṛṁgakharādayaḥ vijñeyāstattadācāraistattatprakṛtisaṁbhavaiḥ
इन दोनों के भी भृंग, गर्दभ आदि अनेक अन्य भेद हैं, जिन्हें उनके-उनके स्वभाव से उत्पन्न उन-उन आचरणों से जानना चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.2.154.21)
यः स्थित्वाऽभिमुखं प्रणम्य विधिवत्त्यक्तान्यवादो हरेर्लीलाः श्रोतुमभीप्सतेऽतिनिपुणो नम्रो ऽथ क्लृप्ताञ्जलिः ।। शिष्यो विश्वसितोऽनुचिन्तनपरः प्रश्नेऽनुरक्तः शुचिर्नित्यं कृष्णजनप्रियो निगदितः श्रोता स वै वक्तृभिः
yaḥ sthitvā'bhimukhaṁ praṇamya vidhivattyaktānyavādo harerlīlāḥ śrotumabhīpsate'tinipuṇo namro 'tha klṛptāñjaliḥ śiṣyo viśvasito'nucintanaparaḥ praśne'nuraktaḥ śucirnityaṁ kṛṣṇajanapriyo nigaditaḥ śrotā sa vai vaktṛbhiḥ
जो सम्मुख बैठकर, विधिपूर्वक प्रणाम करके, अन्य सब वार्ता छोड़कर, अत्यन्त निपुण, विनम्र और हाथ जोड़े हुए केवल हरि की लीलाओं को सुनने की अभिलाषा रखता है; जो विश्वस्त शिष्य, अनुचिन्तन में तत्पर, प्रश्न में अनुरक्त, पवित्र और सदा कृष्ण-भक्तों का प्रिय है — उसे ही आचार्यों ने सच्चा श्रोता कहा है।
श्लोक 22 (skanda.2.154.22)
भगवन्मतिरनपेक्षः सुहृदो दीनेषु सानुकम्पो यः ।। बहुधाबोधनचतुरो वक्ता संमानितो मुनिभिः
bhagavanmatiranapekṣaḥ suhṛdo dīneṣu sānukampo yaḥ bahudhābodhanacaturo vaktā saṁmānito munibhiḥ
जिसका मन भगवान् में लगा है, जो निरपेक्ष है, सबका सुहृद् है, दीनों पर अनुकम्पा रखने वाला है, और नाना प्रकार से बोध कराने में चतुर है — ऐसा वक्ता ही मुनियों द्वारा सम्मानित होता है।
श्लोक 23 (skanda.2.154.23)
अथ भारतभूस्थाने श्रीभागवतसेवने ।। विधिं शृणुत भो विप्रा येन स्यात्सुखसंततिः
atha bhāratabhūsthāne śrībhāgavatasevane vidhiṁ śṛṇuta bho viprā yena syātsukhasaṁtatiḥ
अब हे विप्रो, भारतभूमि में श्रीभागवत-सेवन की विधि सुनो, जिससे सुख की निरन्तर परम्परा बनी रहे।
श्लोक 24 (skanda.2.154.24)
राजसं सात्त्विकं चापि तामसं निर्गुणं तथा ।। चतुर्विधं तु विज्ञेयं श्रीभागवत सेवनम्
rājasaṁ sāttvikaṁ cāpi tāmasaṁ nirguṇaṁ tathā caturvidhaṁ tu vijñeyaṁ śrībhāgavata sevanam
श्रीभागवत का सेवन चार प्रकार का जानना चाहिए — राजसिक, सात्त्विक, तामसिक और निर्गुण।
श्लोक 25 (skanda.2.154.25)
सप्ताहं यज्ञवद्यत्तु सश्रमं सत्वरं मुदा ।। सेवितं राजसं तत्तु बहुपूजादिशोभनम्
saptāhaṁ yajñavadyattu saśramaṁ satvaraṁ mudā sevitaṁ rājasaṁ tattu bahupūjādiśobhanam
जो सप्ताह में यज्ञ के समान, श्रमपूर्वक, शीघ्रता से, हर्षपूर्वक तथा अनेक पूजादि से शोभित होकर किया जाता है, वह सेवन राजसिक है।
श्लोक 26 (skanda.2.154.26)
मासेन ऋतुना वापि श्रवणं स्वादसंयुतम् ।। सात्त्विकं यदनायासं समस्तानन्दवर्द्धनम्
māsena ṛtunā vāpi śravaṇaṁ svādasaṁyutam sāttvikaṁ yadanāyāsaṁ samastānandavarddhanam
जो एक मास अथवा एक ऋतु में, आस्वाद से युक्त, अनायास तथा सम्पूर्ण आनन्द को बढ़ाने वाला श्रवण है, वह सात्त्विक है।
श्लोक 27 (skanda.2.154.27)
तामसं यत्तु वर्षेण सालसं श्रद्धयाऽयुतम् ।। विस्मृतिस्मृतिसंयुक्तं सेवनं तच्च सौख्यदम्
tāmasaṁ yattu varṣeṇa sālasaṁ śraddhayā'yutam vismṛtismṛtisaṁyuktaṁ sevanaṁ tacca saukhyadam
जो सेवन एक वर्ष में, आलस्य से, श्रद्धारहित होकर, विस्मृति और स्मृति से युक्त होकर किया जाता है, वह तामसिक है, तथापि वह भी सुखदायक ही है।
श्लोक 28 (skanda.2.154.28)
वर्षमासदिनानां तु विमुच्य नियमाग्रहम् ।। सर्वदा प्रेमभक्त्यैव सेवनं निर्गुणं मतम्
varṣamāsadinānāṁ tu vimucya niyamāgraham sarvadā premabhaktyaiva sevanaṁ nirguṇaṁ matam
जो वर्ष, मास और दिन के नियम के आग्रह को छोड़कर सदा केवल प्रेम-भक्ति से ही किया जाता है, वह सेवन निर्गुण माना गया है।
श्लोक 29 (skanda.2.154.29)
पारीक्षितेऽपि संवादे निर्गुणं तत्प्रकीर्तितम् ।। तत्र सप्तदिनाख्यानं तदायुर्दिनसंख्यया
pārīkṣite'pi saṁvāde nirguṇaṁ tatprakīrtitam tatra saptadinākhyānaṁ tadāyurdinasaṁkhyayā
परीक्षित् के संवाद में भी उसे निर्गुण ही कहा गया है; वहाँ सात दिनों की कथा उनकी शेष आयु के दिनों की संख्या के अनुरूप थी।
श्लोक 30 (skanda.2.154.30)
अन्यत्र त्रिगुणं चापि निर्गुणं च यथेच्छया ।। यथा कथंचित्कर्तव्यं सेवनं भगवच्छ्रुतेः
anyatra triguṇaṁ cāpi nirguṇaṁ ca yathecchayā yathā kathaṁcitkartavyaṁ sevanaṁ bhagavacchruteḥ
अन्यत्र, तीनों गुणों से युक्त हो अथवा निर्गुण, अपनी इच्छा के अनुसार, जैसे भी संभव हो, भगवत्-श्रवण का सेवन करना चाहिए।
श्लोक 31 (skanda.2.154.31)
ये श्रीकृष्णविहारैकभजनास्वादलोलुपाः ।। मुक्तावपि निराकांक्षास्तेषां भागवतं धनम्
ye śrīkṛṣṇavihāraikabhajanāsvādalolupāḥ muktāvapi nirākāṁkṣāsteṣāṁ bhāgavataṁ dhanam
जो श्रीकृष्ण के विहार की एकमात्र भजन-आस्वाद के लिए लालायित हैं, जिन्हें मुक्ति की भी कोई आकांक्षा नहीं है — उनके लिए भागवत ही धन है।
श्लोक 32 (skanda.2.154.32)
येऽपि संसारसंतापनिर्विण्णा मोक्षकांक्षिणः ।। तेषां भवौषधं चैतत्कलौ सेव्यं प्रयत्नतः
ye'pi saṁsārasaṁtāpanirviṇṇā mokṣakāṁkṣiṇaḥ teṣāṁ bhavauṣadhaṁ caitatkalau sevyaṁ prayatnataḥ
और जो संसार के संताप से खिन्न होकर मोक्ष की कामना रखते हैं, उनके लिए भी यही संसार-रोग की औषधि है, जिसे कलियुग में प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए।
श्लोक 33 (skanda.2.154.33)
ये चापि विषयारामाः सांसारिकसुखस्पृहाः ।। तेषां तु कर्ममार्गेण या सिद्धिः साऽधुना कलौ
ye cāpi viṣayārāmāḥ sāṁsārikasukhaspṛhāḥ teṣāṁ tu karmamārgeṇa yā siddhiḥ sā'dhunā kalau
और जो विषयों में रमने वाले, सांसारिक सुख की स्पृहा रखने वाले हैं, उनके लिए कर्म-मार्ग से जो सिद्धि होती है, वह अब इस कलियुग में —
श्लोक 34 (skanda.2.154.34)
सामर्थ्यधनविज्ञानाभावादत्यन्तदुर्ल्लभा ।। तस्मात्तैरपि संसेव्या श्रीमद्भागवती कथा
sāmarthyadhanavijñānābhāvādatyantadurllabhā tasmāttairapi saṁsevyā śrīmadbhāgavatī kathā
— सामर्थ्य, धन और विज्ञान के अभाव में अत्यन्त दुर्लभ हो गई है। इसलिए उन्हें भी श्रीमद्भागवती कथा का ही सेवन करना चाहिए।
श्लोक 35 (skanda.2.154.35)
धनं पुत्रांस्तथा दारान्वाहनादि यशो गृहान् ।। असापत्न्यं च राज्यं च दद्याद्भागवती कथा
dhanaṁ putrāṁstathā dārānvāhanādi yaśo gṛhān asāpatnyaṁ ca rājyaṁ ca dadyādbhāgavatī kathā
धन, पुत्र, पत्नी, वाहन आदि, यश, गृह, निष्कण्टक राज्य — यह सब भागवती कथा प्रदान करती है।
श्लोक 36 (skanda.2.154.36)
इह लोके वरान्भुक्त्वा भोगान्वै मनसेप्सितान् ।। श्रीभागवतसंगेन यात्यन्ते श्रीहरेः पदम्
iha loke varānbhuktvā bhogānvai manasepsitān śrībhāgavatasaṁgena yātyante śrīhareḥ padam
इस लोक में मन-वांछित उत्तम भोगों को भोगकर, श्रीभागवत के संग से अन्त में मनुष्य श्रीहरि के पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 37 (skanda.2.154.37)
यत्र भागवती वार्ता ये च तच्छ्रवणे रताः ।। तेषां संसेवनं कुर्याद्देहेन च धनेन च
yatra bhāgavatī vārtā ye ca tacchravaṇe ratāḥ teṣāṁ saṁsevanaṁ kuryāddehena ca dhanena ca
जहाँ भागवत की चर्चा हो, और जो उसके श्रवण में रत हों, उनकी सेवा शरीर से और धन से भी करनी चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.2.154.38)
तदनुग्रहतोऽस्यापि श्रीभागवतसेवनम् ।। श्रीकृष्णव्यतिरिक्तं यत्तत्सर्वं धनसंज्ञितम्
tadanugrahato'syāpi śrībhāgavatasevanam śrīkṛṣṇavyatiriktaṁ yattatsarvaṁ dhanasaṁjñitam
उनकी कृपा से ही इस सेवा करने वाले को भी श्रीभागवत-सेवन प्राप्त होता है। श्रीकृष्ण से भिन्न जो कुछ भी है, वह सब केवल "धन" कहा गया है।
श्लोक 39 (skanda.2.154.39)
कृष्णार्थीति धनार्थीति श्रोता वक्ता द्विधा मतः ।। यथा वक्ता तथा श्रोता तत्र सौख्यं विवर्द्धते
kṛṣṇārthīti dhanārthīti śrotā vaktā dvidhā mataḥ yathā vaktā tathā śrotā tatra saukhyaṁ vivarddhate
वक्ता और श्रोता दोनों दो प्रकार के माने गए हैं — कृष्णार्थी और धनार्थी; जैसा वक्ता होता है, वैसा ही श्रोता होता है, और उसी से सुख की वृद्धि होती है।
श्लोक 40 (skanda.2.154.40)
उभयोर्वैपरीत्ये तु रसाभासे फलच्युतिः ।। किन्तु कृष्णार्थिनां सिद्धिर्विलम्बेनापि जायते
ubhayorvaiparītye tu rasābhāse phalacyutiḥ kintu kṛṣṇārthināṁ siddhirvilambenāpi jāyate
किन्तु दोनों के विपरीत होने पर रसाभास होता है और फल की च्युति हो जाती है; परन्तु कृष्णार्थी जनों की सिद्धि विलम्ब से ही सही, अवश्य होती है।
श्लोक 41 (skanda.2.154.41)
धनार्थिनस्तु संसिद्धिर्विधिसंपूर्णतावशात् ।। कृष्णार्थिनोऽगुणस्यापि प्रेमैव विधिरुत्तमः
dhanārthinastu saṁsiddhirvidhisaṁpūrṇatāvaśāt kṛṣṇārthino'guṇasyāpi premaiva vidhiruttamaḥ
धनार्थी की सिद्धि तो विधि की सम्पूर्णता पर ही निर्भर है; किन्तु कृष्णार्थी के लिए, वह गुणहीन भी हो तो भी, प्रेम ही सर्वोत्तम विधि है।
श्लोक 42 (skanda.2.154.42)
आसमाप्ति सकामेन कर्तव्यो हि विधिः स्वयम् ।। स्नातो नित्य क्रियां कृत्वा प्राश्य पादोदकं हरेः
āsamāpti sakāmena kartavyo hi vidhiḥ svayam snāto nitya kriyāṁ kṛtvā prāśya pādodakaṁ hareḥ
सकाम पुरुष को समाप्ति तक स्वयं विधि का पालन करना चाहिए — स्नान करके, नित्यकर्म करके, हरि के चरणोदक का पान करके —
श्लोक 43 (skanda.2.154.43)
पुस्तकं च गुरुं चैव पूजयित्वोपचारतः ।। ब्रूयाद्वा शृणुयाद्वापि श्रीमद्भागवतं मुदा
pustakaṁ ca guruṁ caiva pūjayitvopacārataḥ brūyādvā śṛṇuyādvāpi śrīmadbhāgavataṁ mudā
और पुस्तक तथा गुरु की उपचार-पूर्वक पूजा करके, हर्षपूर्वक श्रीमद्भागवत का वाचन अथवा श्रवण करना चाहिए।
श्लोक 44 (skanda.2.154.44)
पयसा वा हविष्येण मौनं भोजनमाचरेत् ।। ब्रह्मचर्य्यमधःसुप्तिं क्रोधलोभादिवर्ज्जनम्
payasā vā haviṣyeṇa maunaṁ bhojanamācaret brahmacaryyamadhaḥsuptiṁ krodhalobhādivarjjanam
दूध अथवा हविष्यान्न से मौन रहकर भोजन करना चाहिए; ब्रह्मचर्य का पालन, भूमि पर शयन, तथा क्रोध-लोभ आदि का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 45 (skanda.2.154.45)
कथान्ते कीर्तनं नित्यं समाप्तौ जागरं चरेत् ।। ब्राह्मणान्भोजयित्वा तु दक्षिणाभिः प्रतोषयेत्
kathānte kīrtanaṁ nityaṁ samāptau jāgaraṁ caret brāhmaṇānbhojayitvā tu dakṣiṇābhiḥ pratoṣayet
कथा की प्रतिदिन की समाप्ति पर नित्य कीर्तन करना चाहिए, और अन्तिम समाप्ति पर जागरण करना चाहिए; ब्राह्मणों को भोजन कराकर दक्षिणा से प्रसन्न करना चाहिए।
श्लोक 46 (skanda.2.154.46)
गुरवे वस्त्रभूषादि दत्त्वा गां च समर्पयेत् ।। एवं कृते विधाने तु लभते वाञ्छितं फलम्
gurave vastrabhūṣādi dattvā gāṁ ca samarpayet evaṁ kṛte vidhāne tu labhate vāñchitaṁ phalam
गुरु को वस्त्र-आभूषण आदि देकर गौ भी समर्पित करनी चाहिए। इस प्रकार विधान का पालन करने पर मनुष्य वांछित फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 47 (skanda.2.154.47)
दारागारसुतान्राज्यं धनादि च यदीप्सितम् ।। परन्तु शोभते नात्र सकामत्वं विडम्बनम्
dārāgārasutānrājyaṁ dhanādi ca yadīpsitam parantu śobhate nātra sakāmatvaṁ viḍambanam
पत्नी, घर, पुत्र, राज्य, धन आदि जो कुछ भी अभीष्ट है, वह इससे प्राप्त हो सकता है; किन्तु यहाँ सकामता शोभा नहीं देती, वह मात्र एक विडम्बना है।
श्लोक 48 (skanda.2.154.48)
कृष्णप्राप्तिकरं शश्वत्प्रेमानन्दफलप्रदम् ।। श्रीमद्भागवतं शास्त्रं कलौ कीरेण भाषितम्
kṛṣṇaprāptikaraṁ śaśvatpremānandaphalapradam śrīmadbhāgavataṁ śāstraṁ kalau kīreṇa bhāṣitam
कृष्ण की प्राप्ति कराने वाला, शाश्वत प्रेमानन्द का फल देने वाला श्रीमद्भागवत शास्त्र कलियुग में "कीर" (शुक) के द्वारा कहा गया।