वैष्णव खण्ड · अध्याय 155
वैशाख-स्नान माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.2.155.1)
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्
nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam devīṁ sarasvatīṁ vyāsaṁ tato jayamudīrayet
नारायण, नर—मनुष्यों में श्रेष्ठ, देवी सरस्वती और व्यास जी को नमस्कार करके तत्पश्चात् 'जय' शब्द का उच्चारण करना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.2.155.2)
सूत उवाच । भूयोऽप्यंगभुवं राजा ब्रह्मणः परमेष्ठिनः । पुण्यं माधवमाहात्म्यं नारदं पर्यपृच्छत
sūta uvāca bhūyo'pyaṁgabhuvaṁ rājā brahmaṇaḥ parameṣṭhinaḥ puṇyaṁ mādhavamāhātmyaṁ nāradaṁ paryapṛcchata
सूत जी बोले— राजा (अम्बरीष) ने पुनः परमेष्ठी ब्रह्मा के अंग से उत्पन्न नारद जी से माधव (वैशाख मास) के पुण्यमय माहात्म्य के विषय में पूछा।
श्लोक 3 (skanda.2.155.3)
अंबरीष उवाच । सर्वेषामपि मासानां त्वत्तो माहात्म्यमंजसा । श्रुतं मया पुरा ब्रह्मन्यदा चोक्तं तदा त्वया
aṁbarīṣa uvāca sarveṣāmapi māsānāṁ tvatto māhātmyamaṁjasā śrutaṁ mayā purā brahmanyadā coktaṁ tadā tvayā
अम्बरीष ने कहा— हे ब्रह्मन्! जब आपने पूर्वकाल में कहा था, तभी मैंने आपसे समस्त मासों का माहात्म्य भलीभाँति सुन लिया था।
श्लोक 4 (skanda.2.155.4)
वैशाखः प्रवरो मासो मासेष्वेतेषु निश्चितम् । इति तस्माद्विस्तरेण माहात्म्यं माधवस्य च
vaiśākhaḥ pravaro māso māseṣveteṣu niścitam iti tasmādvistareṇa māhātmyaṁ mādhavasya ca
आपने कहा था कि इन सब मासों में निश्चय ही वैशाख श्रेष्ठ मास है। अतः अब माधव (वैशाख) के माहात्म्य का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
श्लोक 5 (skanda.2.155.5)
श्रोतुं कौतूहलं ब्रह्मन्कथं विष्णुप्रियो ह्यसौ । के च विष्णुप्रिया धर्मा मासे माधववल्लभे
śrotuṁ kautūhalaṁ brahmankathaṁ viṣṇupriyo hyasau ke ca viṣṇupriyā dharmā māse mādhavavallabhe
हे ब्रह्मन्! मुझे यह सुनने की उत्सुकता है कि यह मास विष्णु को कैसे प्रिय है, और माधव के इस प्रिय मास में विष्णु को प्रिय कौन-से धर्म हैं।
श्लोक 6 (skanda.2.155.6)
तत्राप्यस्य तु कर्तव्याः के धर्मा विष्णुवल्लभाः । किं दानं किं फलं तस्य कमुद्दिश्याऽऽचरेदिमान्
tatrāpyasya tu kartavyāḥ ke dharmā viṣṇuvallabhāḥ kiṁ dānaṁ kiṁ phalaṁ tasya kamuddiśyā''caredimān
उस मास में कौन-से विष्णु-प्रिय धर्म करने चाहिए? क्या दान करना चाहिए? उसका क्या फल है? किसका उद्देश्य रखकर इनका आचरण करना चाहिए?
श्लोक 7 (skanda.2.155.7)
कैर्द्रव्यैः पूजनीयोऽसौ माधवो माधवागमे । एतन्नारद विस्तार्य मह्यं श्रद्धावते वद
kairdravyaiḥ pūjanīyo'sau mādhavo mādhavāgame etannārada vistārya mahyaṁ śraddhāvate vada
माधव मास के आगमन पर किन-किन वस्तुओं से भगवान् माधव की पूजा करनी चाहिए? हे नारद! श्रद्धावान् मुझे यह सब विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 8 (skanda.2.155.8)
श्रीनारद उवाच । मया पृष्टः पुरा ब्रह्मा मासधर्मान्पुरातनान् । व्याजहार पुरा प्रोक्तं यच्छ्रियै परमात्मना
śrīnārada uvāca mayā pṛṣṭaḥ purā brahmā māsadharmānpurātanān vyājahāra purā proktaṁ yacchriyai paramātmanā
श्रीनारद जी ने कहा— पूर्वकाल में मेरे द्वारा पूछे जाने पर ब्रह्मा जी ने मासों के प्राचीन धर्मों का वर्णन किया था, जिन्हें परमात्मा ने पूर्वकाल में लक्ष्मी के लिए कहा था।
श्लोक 9 (skanda.2.155.9)
ततो मासा विशिष्योक्ताः कार्तिको माघ एव च । माधवस्तेषु वैशाखं मासानामुत्तमं व्यधात्
tato māsā viśiṣyoktāḥ kārtiko māgha eva ca mādhavasteṣu vaiśākhaṁ māsānāmuttamaṁ vyadhāt
तत्पश्चात् कार्तिक और माघ मासों को विशेष रूप से कहा गया; परन्तु उनमें भी माधव (विष्णु) ने वैशाख को मासों में सर्वश्रेष्ठ बनाया।
श्लोक 10 (skanda.2.155.10)
मातेव सर्वजीवानां सदैवेष्ट प्रदायकः । दानयज्ञ्रव्रतस्नानैः सर्वपापविनाशनः
māteva sarvajīvānāṁ sadaiveṣṭa pradāyakaḥ dānayajñravratasnānaiḥ sarvapāpavināśanaḥ
यह समस्त प्राणियों के लिए माता के समान सदैव इच्छित वस्तुओं का दाता है; दान, यज्ञ, व्रत और स्नान के द्वारा यह सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 11 (skanda.2.155.11)
धर्म यज्ञक्रियासारस्तपःसारः सुरार्चितः । विद्यानां वेदविद्येव मंत्राणां प्रणवो यथा
dharma yajñakriyāsārastapaḥsāraḥ surārcitaḥ vidyānāṁ vedavidyeva maṁtrāṇāṁ praṇavo yathā
यह धर्म और यज्ञ-क्रियाओं का सार, तप का सार तथा देवताओं द्वारा पूजित है — जैसे विद्याओं में वेदविद्या और मन्त्रों में प्रणव (ॐकार) श्रेष्ठ है, वैसे ही यह श्रेष्ठ है।
श्लोक 12 (skanda.2.155.12)
भूरुहाणां सुरतरुर्धेनूनां कामधेनुवत् । शेषवत्सर्वनागानां पक्षिणां गरुडो यथा
bhūruhāṇāṁ suratarurdhenūnāṁ kāmadhenuvat śeṣavatsarvanāgānāṁ pakṣiṇāṁ garuḍo yathā
जैसे वृक्षों में कल्पवृक्ष, गौओं में कामधेनु, समस्त नागों में शेषनाग और पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ हैं, वैसे ही यह मास श्रेष्ठ है।
श्लोक 13 (skanda.2.155.13)
देवानां तु यथा विष्णुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा । प्राणवत्प्रियवस्तूनां भार्येव सुहृदां यथा
devānāṁ tu yathā viṣṇurvarṇānāṁ brāhmaṇo yathā prāṇavatpriyavastūnāṁ bhāryeva suhṛdāṁ yathā
जैसे देवताओं में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है, जैसे प्रिय वस्तुओं में प्राण के समान यह प्रिय है, और सुहृदों में पत्नी के समान है।
श्लोक 14 (skanda.2.155.14)
आपगानां यथा गंगा तेजसां तु रविर्यथा । आयुधानां यथा चक्रं धातूनां कांचनं यथा
āpagānāṁ yathā gaṁgā tejasāṁ tu raviryathā āyudhānāṁ yathā cakraṁ dhātūnāṁ kāṁcanaṁ yathā
जैसे नदियों में गंगा, तेजों में सूर्य, आयुधों में चक्र और धातुओं में स्वर्ण श्रेष्ठ है, वैसे ही यह श्रेष्ठ है।
श्लोक 15 (skanda.2.155.15)
वैष्णवानां यथा रुद्रो रत्नानां कौस्तुभो यथा । मासानां धर्महेतूनां वैशाखश्चोत्तमस्तथा
vaiṣṇavānāṁ yathā rudro ratnānāṁ kaustubho yathā māsānāṁ dharmahetūnāṁ vaiśākhaścottamastathā
जैसे वैष्णवों में रुद्र और रत्नों में कौस्तुभमणि श्रेष्ठ है, वैसे ही धर्म के कारणभूत मासों में वैशाख सर्वश्रेष्ठ है।
श्लोक 16 (skanda.2.155.16)
नानेन सदृशो लोके विष्णुप्रीतिविधायकः । वैशाखस्नाननिरते मेषे प्रागर्यमोदयात्
nānena sadṛśo loke viṣṇuprītividhāyakaḥ vaiśākhasnānanirate meṣe prāgaryamodayāt
संसार में इसके समान विष्णु को प्रसन्न करने वाला अन्य कुछ नहीं है। सूर्य के मेष राशि में रहते हुए सूर्योदय से पूर्व वैशाख-स्नान में तत्पर रहने वाले पुरुष पर—
श्लोक 17 (skanda.2.155.17)
लक्ष्मीसहायो भगवान्प्रीतिं तस्मिन्करोत्यलम् । जंतूनां प्रीणनं यद्वदन्नेनैव हि जायते
lakṣmīsahāyo bhagavānprītiṁ tasminkarotyalam jaṁtūnāṁ prīṇanaṁ yadvadannenaiva hi jāyate
—लक्ष्मी सहित भगवान् अत्यन्त प्रसन्नता प्रकट करते हैं। जैसे प्राणियों की तृप्ति अन्न से ही होती है,
श्लोक 18 (skanda.2.155.18)
तद्वद्वैशाखस्नानेन विष्णुः प्रीणात्यसंशयम् । वैशाखस्नाननिरताञ्जनान्दृष्ट्वाऽनुमोदते
tadvadvaiśākhasnānena viṣṇuḥ prīṇātyasaṁśayam vaiśākhasnānaniratāñjanāndṛṣṭvā'numodate
वैसे ही वैशाख-स्नान से विष्णु निःसंदेह प्रसन्न होते हैं। वैशाख-स्नान में लगे हुए मनुष्यों को देखकर वे प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.155.19)
तावतापि विमुक्तोऽघैर्विष्णुलोके महीयते । सकृत्स्नात्वा मेषसंस्थे सूर्ये प्रातः कृताह्निकः
tāvatāpi vimukto'ghairviṣṇuloke mahīyate sakṛtsnātvā meṣasaṁsthe sūrye prātaḥ kṛtāhnikaḥ
इतने मात्र से ही मनुष्य पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक में सम्मानित होता है। सूर्य के मेष राशि में रहते हुए प्रातःकाल एक बार भी स्नान कर आह्निक-कर्म करने वाला—
श्लोक 20 (skanda.2.155.20)
महापापैर्विमुक्तोऽसौ विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् । स्नानार्थं मासि वैशाखे पादमेकं चरेद्यदि
mahāpāpairvimukto'sau viṣṇoḥ sāyujyamāpnuyāt snānārthaṁ māsi vaiśākhe pādamekaṁ caredyadi
—वह महापापों से मुक्त होकर विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है। यदि कोई वैशाख मास में स्नान के लिए एक कदम भी चले,
श्लोक 21 (skanda.2.155.21)
सोऽश्वमेधायुतानां च फलमाप्नोत्यसंशयम् । अथवा कूटचित्तस्तु कुर्यात्संकल्पमात्रकम्
so'śvamedhāyutānāṁ ca phalamāpnotyasaṁśayam athavā kūṭacittastu kuryātsaṁkalpamātrakam
—तो वह निःसंदेह दस हजार अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है। अथवा जिसका मन चंचल है, वह भी यदि केवल संकल्प मात्र कर ले,
श्लोक 22 (skanda.2.155.22)
सोऽपि क्रतुशतं पुण्यं लभेदेव न संशयः । यो गच्छेद्धनुरायामं स्नातुं मेषगते रवौ
so'pi kratuśataṁ puṇyaṁ labhedeva na saṁśayaḥ yo gaccheddhanurāyāmaṁ snātuṁ meṣagate ravau
—वह भी निःसंदेह सौ यज्ञों का पुण्य प्राप्त करता है। जो सूर्य के मेष राशि में रहते हुए स्नान हेतु एक धनुष जितनी दूरी तक भी जाता है,
श्लोक 23 (skanda.2.155.23)
सर्वबंधविनिर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् । त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि ब्रह्मांडांतर्गतानि च
sarvabaṁdhavinirmukto viṣṇoḥ sāyujyamāpnuyāt trailokye yāni tīrthāni brahmāṁḍāṁtargatāni ca
—वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है। त्रिलोक में तथा इस ब्रह्माण्ड के भीतर जितने भी तीर्थ हैं,
श्लोक 24 (skanda.2.155.24)
तानि सर्वाणि राजेन्द्र संति बाह्येऽल्पके जले । तावल्लिखितपापानि गर्जंति यमशासने
tāni sarvāṇi rājendra saṁti bāhye'lpake jale tāvallikhitapāpāni garjaṁti yamaśāsane
—हे राजेन्द्र! वे सभी थोड़े-से भी बाहरी जल में विद्यमान रहते हैं। जब तक प्राणी वैशाख में जल-स्नान नहीं करता, तब तक उसके लिखे हुए पाप यम के शासन में गरजते रहते हैं,
श्लोक 25 (skanda.2.155.25)
यावन्न कुरुते जंतुर्वैशाखे स्नानमंभसि । तीर्थादिदेवताः सर्वा वैशाखे मासि भूमिप
yāvanna kurute jaṁturvaiśākhe snānamaṁbhasi tīrthādidevatāḥ sarvā vaiśākhe māsi bhūmipa
—जब तक जीव वैशाख में जल-स्नान नहीं करता। हे भूमिप! वैशाख मास में तीर्थों आदि की समस्त देवताएँ
श्लोक 26 (skanda.2.155.26)
बहिर्जलं समाश्रित्य सदा सन्निहिता नृप । सूर्योदयं समारभ्य यावत्षड्घटिकावधि
bahirjalaṁ samāśritya sadā sannihitā nṛpa sūryodayaṁ samārabhya yāvatṣaḍghaṭikāvadhi
—हे नृप! बाहर के जल का आश्रय लेकर सदैव वहाँ उपस्थित रहती हैं। सूर्योदय से लेकर छह घड़ी तक—
श्लोक 27 (skanda.2.155.27)
तिष्ठंति चाऽऽज्ञया विष्णोर्नराणां हितकाम्यया । तावन्नागच्छतां पुंसां शापं दत्त्वा सुदारुणम् । स्वस्थानं यांति राजेन्द्र तस्मात्स्नानं समाचरेत्
tiṣṭhaṁti cā''jñayā viṣṇornarāṇāṁ hitakāmyayā tāvannāgacchatāṁ puṁsāṁ śāpaṁ dattvā sudāruṇam svasthānaṁ yāṁti rājendra tasmātsnānaṁ samācaret
—वे विष्णु की आज्ञा से मनुष्यों के हित की कामना से वहाँ ठहरती हैं; और उस समय तक जो पुरुष स्नान करने नहीं आते, उन्हें अत्यन्त भयंकर शाप देकर, हे राजेन्द्र! वे अपने-अपने स्थान को चली जाती हैं। इसलिए वैशाख में स्नान अवश्य करना चाहिए।