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वैष्णव खण्ड · अध्याय 156

दान-निरूपण

अध्याय 155अध्याय-सूचीअध्याय 157

श्लोक 1 (skanda.2.156.1)

नारद उवाच । न माधवसमो मासो न कृतेन युगं समम् । न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम्

nārada uvāca na mādhavasamo māso na kṛtena yugaṁ samam na ca vedasamaṁ śāstraṁ na tīrthaṁ gaṁgayā samam

नारद जी बोले— माधव (वैशाख) के समान कोई मास नहीं है, कृतयुग के समान कोई युग नहीं है, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं है, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है।

श्लोक 2 (skanda.2.156.2)

न जलेन समं दानं न सुखं भार्यया समम् । न कृषेस्तु समं वित्तं न लाभो जीवितात्परः

na jalena samaṁ dānaṁ na sukhaṁ bhāryayā samam na kṛṣestu samaṁ vittaṁ na lābho jīvitātparaḥ

जल के समान कोई दान नहीं, पत्नी के समान कोई सुख नहीं, कृषि के समान कोई धन नहीं, और जीवन से बढ़कर कोई लाभ नहीं है।

श्लोक 3 (skanda.2.156.3)

न तपोऽनशनात्तुल्यं न दानात्परमं सुखम् । न धर्मस्तु दयातुल्यो न ज्योतिश्चक्षुषा समम्

na tapo'naśanāttulyaṁ na dānātparamaṁ sukham na dharmastu dayātulyo na jyotiścakṣuṣā samam

उपवास के समान कोई तप नहीं, दान से बढ़कर कोई सुख नहीं, दया के समान कोई धर्म नहीं, और नेत्र के समान कोई ज्योति नहीं है।

श्लोक 4 (skanda.2.156.4)

न तृप्तिरशनात्तुल्या न वाणिज्यं कृषेः समम् । न धर्मेण समं मित्रं न सत्येन समं यशः

na tṛptiraśanāttulyā na vāṇijyaṁ kṛṣeḥ samam na dharmeṇa samaṁ mitraṁ na satyena samaṁ yaśaḥ

भोजन के समान कोई तृप्ति नहीं, कृषि के समान कोई वाणिज्य नहीं, धर्म के समान कोई मित्र नहीं, और सत्य के समान कोई यश नहीं है।

श्लोक 5 (skanda.2.156.5)

नारोग्यसममुत्थानं न त्राता केशवात्परः । न माधवसमं लोके पवित्रं कवयो विदुः

nārogyasamamutthānaṁ na trātā keśavātparaḥ na mādhavasamaṁ loke pavitraṁ kavayo viduḥ

आरोग्य के समान कोई उत्थान नहीं, केशव से बढ़कर कोई रक्षक नहीं; ज्ञानीजन जानते हैं कि संसार में माधव के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।

श्लोक 6 (skanda.2.156.6)

माधवः परमो मासः शेषशायिप्रियः सदा । अव्रतेन क्षिपेद्यस्तु मासं माधववल्लभम्

mādhavaḥ paramo māsaḥ śeṣaśāyipriyaḥ sadā avratena kṣipedyastu māsaṁ mādhavavallabham

माधव सर्वश्रेष्ठ मास है, जो सदा शेषशायी विष्णु को प्रिय है। जो व्यक्ति व्रत के बिना ही माधव-प्रिय इस मास को व्यर्थ बिता देता है—

श्लोक 7 (skanda.2.156.7)

तिर्यग्योनिं स यात्याशु सर्वधर्मबहिष्कृतः । अव्रतेन गतो येषां माधवो मर्त्यधर्मिणाम्

tiryagyoniṁ sa yātyāśu sarvadharmabahiṣkṛtaḥ avratena gato yeṣāṁ mādhavo martyadharmiṇām

—वह शीघ्र ही समस्त धर्मों से बहिष्कृत होकर पशु-योनि को प्राप्त होता है। जिन धर्मशील मनुष्यों का माधव मास बिना व्रत के व्यतीत हो जाता है,

श्लोक 8 (skanda.2.156.8)

इष्टापूर्ते वृथा तेषां धर्मोधर्मभृतां वरः । प्रवृत्तानां तु भक्ष्याणां माधवेऽनियमे कृते

iṣṭāpūrte vṛthā teṣāṁ dharmodharmabhṛtāṁ varaḥ pravṛttānāṁ tu bhakṣyāṇāṁ mādhave'niyame kṛte

—हे धर्मधारियों में श्रेष्ठ! उनके इष्ट और पूर्त कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। किन्तु जो लोग सामान्य भोज्य पदार्थों में प्रवृत्त होकर भी माधव में (सम्पूर्ण) नियम नहीं रख पाते,

श्लोक 9 (skanda.2.156.9)

अवश्यं विष्णुसायुज्यं प्राप्नोत्येव न संशयः । संतीह बहुवित्तानि व्रतानि विविधानि च

avaśyaṁ viṣṇusāyujyaṁ prāpnotyeva na saṁśayaḥ saṁtīha bahuvittāni vratāni vividhāni ca

—वे भी (माधव का इतना भी पालन करने से) निश्चय ही विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं, इसमें संदेह नहीं। इस संसार में बहुत धनसाध्य तथा नाना प्रकार के व्रत विद्यमान हैं,

श्लोक 10 (skanda.2.156.10)

देहाऽऽयासकराण्येव पुनर्जन्मप्रदानि च । वैशाखस्नानमात्रेण न पुनर्जायते भुवि

dehā''yāsakarāṇyeva punarjanmapradāni ca vaiśākhasnānamātreṇa na punarjāyate bhuvi

—जो केवल शरीर को कष्ट देने वाले हैं और पुनः जन्म भी देने वाले हैं। परन्तु केवल वैशाख-स्नान मात्र से मनुष्य पृथ्वी पर पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 11 (skanda.2.156.11)

सर्व दानेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम् । तत्फलं समवाप्नोति माधवे जलदानतः

sarva dāneṣu yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu yatphalam tatphalaṁ samavāpnoti mādhave jaladānataḥ

समस्त दानों में जो पुण्य है और समस्त तीर्थों में जो फल है, वही फल मनुष्य माधव मास में जलदान करने से पूर्णतः प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 12 (skanda.2.156.12)

जलदानासमर्थेन परस्यापि प्रबोधनम् । कर्तव्यं भूतिकामेन सर्वदानाधिकं हितम्

jaladānāsamarthena parasyāpi prabodhanam kartavyaṁ bhūtikāmena sarvadānādhikaṁ hitam

जो जलदान करने में असमर्थ हो, कल्याण की कामना करने वाले उसे भी दूसरे को इसके लिए प्रेरित करना चाहिए; यह समस्त दानों से भी अधिक हितकारी है।

श्लोक 13 (skanda.2.156.13)

एकतः सर्वदानानि जलदानं हि चैकतः । तुलामारोपितं पूर्वं जलदानं विशिष्यते

ekataḥ sarvadānāni jaladānaṁ hi caikataḥ tulāmāropitaṁ pūrvaṁ jaladānaṁ viśiṣyate

एक ओर समस्त दान रखे जाएं और दूसरी ओर केवल जलदान — तराजू पर तौले जाने पर पूर्वकाल में जलदान ही श्रेष्ठ सिद्ध हुआ है।

श्लोक 14 (skanda.2.156.14)

मार्गेऽध्वगानां यो मर्त्यः प्रपादानं करोति हि । स कोटिकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते

mārge'dhvagānāṁ yo martyaḥ prapādānaṁ karoti hi sa koṭikulamuddhṛtya viṣṇuloke mahīyate

जो मनुष्य मार्ग में पथिकों के लिए जल-शाला (प्याऊ) की स्थापना करता है, वह अपने करोड़ों कुलजनों का उद्धार करके विष्णुलोक में सम्मानित होता है।

श्लोक 15 (skanda.2.156.15)

देवानां च पितॄणां च ऋषीणां राजसत्तम । अत्यंत प्रीतिदं सत्यं प्रपादानं न संशयः

devānāṁ ca pitṝṇāṁ ca ṛṣīṇāṁ rājasattama atyaṁta prītidaṁ satyaṁ prapādānaṁ na saṁśayaḥ

हे राजसत्तम! जल-शाला का दान देवताओं, पितरों तथा ऋषियों को अत्यन्त प्रिय है — यह सत्य है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 16 (skanda.2.156.16)

प्रपादानेन संतुष्टा येनाऽध्वश्रमकर्षिताः । तोषितास्तेन देवाश्च ब्रह्मविष्णुशिवादय

prapādānena saṁtuṣṭā yenā'dhvaśramakarṣitāḥ toṣitāstena devāśca brahmaviṣṇuśivādaya

जो मार्ग के श्रम से थके हुए हैं, वे जल-शाला के दान से संतुष्ट होते हैं; उससे ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि देवता भी प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.156.17)

सलिलं सलिलेच्छूनां छत्रं छायामपीच्छताम् । व्यजनं व्यजनेच्छूना वैशाखे मासि भूमिप

salilaṁ salilecchūnāṁ chatraṁ chāyāmapīcchatām vyajanaṁ vyajanecchūnā vaiśākhe māsi bhūmipa

हे भूमिप! वैशाख मास में जल चाहने वालों को जल, छाया चाहने वालों को छाता, और पंखा चाहने वालों को पंखा — यह दान करना चाहिए।

श्लोक 18 (skanda.2.156.18)

जलं छत्रं च व्यजनं दानं येषां विशिष्यते । माधवे मासि संप्राप्ते ब्राह्मणाय कुटुम्बिने

jalaṁ chatraṁ ca vyajanaṁ dānaṁ yeṣāṁ viśiṣyate mādhave māsi saṁprāpte brāhmaṇāya kuṭumbine

जब माधव मास आ जाए तो गृहस्थ ब्राह्मण को जल, छाता और पंखे का दान विशेष रूप से श्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 19 (skanda.2.156.19)

अदत्त्वोदककुम्भं च चातको जायते भुवि

adattvodakakumbhaṁ ca cātako jāyate bhuvi

जो जल का घड़ा दान नहीं करता, वह इस संसार में चातक पक्षी बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 20 (skanda.2.156.20)

यो दद्याच्छीतलं तोयं तृषार्ताय महात्मने । तावन्मात्रेण राजेंद्र राजसूयायुतं लभेत्

yo dadyācchītalaṁ toyaṁ tṛṣārtāya mahātmane tāvanmātreṇa rājeṁdra rājasūyāyutaṁ labhet

जो प्यास से पीड़ित महात्मा को शीतल जल देता है, हे राजेन्द्र! वह इतने मात्र से ही दस हजार राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.2.156.21)

घर्मश्रमार्तविप्राय वीजयेद्व्यजनेन यः । तावन्मात्रेण निष्पापो विहगाधिपतिर्भवेत

gharmaśramārtaviprāya vījayedvyajanena yaḥ tāvanmātreṇa niṣpāpo vihagādhipatirbhaveta

जो गर्मी और श्रम से पीड़ित ब्राह्मण को पंखे से हवा करता है, वह इतने मात्र से ही निष्पाप होकर पक्षियों के स्वामी (गरुड़) का पद पाता है।

श्लोक 22 (skanda.2.156.22)

अदत्त्वा व्यजनं भूप वैशाखे तु द्विजातये । वातरोगशताकीर्णो नरकानेव विंदति

adattvā vyajanaṁ bhūpa vaiśākhe tu dvijātaye vātarogaśatākīrṇo narakāneva viṁdati

हे भूप! जो वैशाख में द्विज को पंखा दान नहीं करता, वह सैकड़ों वातरोगों से पीड़ित होकर नरकों को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 23 (skanda.2.156.23)

यो वीजयेत्पटेनाऽपि पथि श्रांतं द्विजोत्तमम् । तावताथ विमुक्तोऽसौ विष्णुसायुज्यमाप्नुयात्

yo vījayetpaṭenā'pi pathi śrāṁtaṁ dvijottamam tāvatātha vimukto'sau viṣṇusāyujyamāpnuyāt

जो मार्ग में थके हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण को वस्त्र से भी हवा करता है, वह इतने मात्र से ही मुक्त होकर विष्णु-सायुज्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 24 (skanda.2.156.24)

यास्तालव्यजनं वाऽपि दत्त्वा शुद्धेन चेतसा । विधूय सर्वपापानि ब्रह्मलोकं स गच्छति

yāstālavyajanaṁ vā'pi dattvā śuddhena cetasā vidhūya sarvapāpāni brahmalokaṁ sa gacchati

जो शुद्ध चित्त से ताड़-पत्र का पंखा भी दान करता है, वह समस्त पापों को दूर करके ब्रह्मलोक को जाता है।

श्लोक 25 (skanda.2.156.25)

सद्यः श्रमहरं पुण्यं न दद्याद्व्यजनं नरः । नारकीं यातनां भुक्त्वा कश्मलो जायते भुवि

sadyaḥ śramaharaṁ puṇyaṁ na dadyādvyajanaṁ naraḥ nārakīṁ yātanāṁ bhuktvā kaśmalo jāyate bhuvi

जो मनुष्य श्रम को तुरंत दूर करने वाला ऐसा पुण्यरूप पंखा दान नहीं करता, वह नरक की यातना भोगकर संसार में मलिन होकर जन्म लेता है।

श्लोक 26 (skanda.2.156.26)

आध्यात्मिकादिदुःखानां शांतये मनुजेश्वर । छत्रं दद्यात्प्रयत्नेन वैशाखे मासि वासकृत्

ādhyātmikādiduḥkhānāṁ śāṁtaye manujeśvara chatraṁ dadyātprayatnena vaiśākhe māsi vāsakṛt

हे मनुजेश्वर! आध्यात्मिक आदि दुःखों की शांति के लिए वैशाख मास में निवास करने वाले को प्रयत्नपूर्वक छाता दान करना चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.2.156.27)

अच्छत्रदो नरो यस्तु वैशाखे माधवप्रिये । छायाहीनो महाक्रूरः पिशाचो भुवि जायते

acchatrado naro yastu vaiśākhe mādhavapriye chāyāhīno mahākrūraḥ piśāco bhuvi jāyate

जो व्यक्ति माधव-प्रिय वैशाख में छाता दान नहीं करता, वह छाया-रहित, महाक्रूर पिशाच बनकर संसार में जन्म लेता है।

श्लोक 28 (skanda.2.156.28)

यो दद्यात्पादुके दिव्ये माधवे माधवप्रिये । यमदूतौ तिरस्कृत्य विष्णुलोकं स गच्छति

yo dadyātpāduke divye mādhave mādhavapriye yamadūtau tiraskṛtya viṣṇulokaṁ sa gacchati

जो माधव-प्रिय माधव मास में दिव्य पादुकाओं का दान करता है, वह यमदूतों को तिरस्कृत करके विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 29 (skanda.2.156.29)

पादत्राणं तु यो दद्याद्वैशाखे माधवागमे । न तस्य नारको लोको न क्लेशा ऐहिकाश्च ये

pādatrāṇaṁ tu yo dadyādvaiśākhe mādhavāgame na tasya nārako loko na kleśā aihikāśca ye

जो वैशाख में माधव के आगमन पर पादत्राण (जूता) दान करता है, उसके लिए न नरक-लोक है और न इस लोक के कोई क्लेश हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.156.30)

पादुके याचमानाय यो दद्याद्ब्राह्मणाय च । स भूपालो भवेद्भूमौ कोटिजन्मस्वसंशयम्

pāduke yācamānāya yo dadyādbrāhmaṇāya ca sa bhūpālo bhavedbhūmau koṭijanmasvasaṁśayam

जो याचना करने वाले ब्राह्मण को पादुकाएँ देता है, वह निःसंदेह करोड़ों जन्मों तक पृथ्वी पर राजा होता है।

श्लोक 31 (skanda.2.156.31)

अनाथमंडपं मार्गे श्रमहारि करोति यः । तस्य पुण्यफलं वक्तुं ब्रह्मणाऽपि न शक्यते

anāthamaṁḍapaṁ mārge śramahāri karoti yaḥ tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ brahmaṇā'pi na śakyate

जो मार्ग में अनाथों के लिए श्रम दूर करने वाला विश्रामगृह बनवाता है, उसके पुण्यफल का वर्णन ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।

श्लोक 32 (skanda.2.156.32)

मध्याह्ने ब्राह्मणं प्राप्तमतिथिं भोजयेद्यदि । न तस्य फलविश्रांतिर्ब्रह्मणाऽपि निरूपिता

madhyāhne brāhmaṇaṁ prāptamatithiṁ bhojayedyadi na tasya phalaviśrāṁtirbrahmaṇā'pi nirūpitā

यदि मध्याह्न में आए हुए ब्राह्मण अतिथि को भोजन कराया जाए, तो उसके फल की सीमा ब्रह्मा भी निर्धारित नहीं कर सकते।

श्लोक 33 (skanda.2.156.33)

सद्यः स्वाप्यायनं नृणामन्नदानं नराधिप । तस्मान्नान्नेन सदृशं दानं लोकेषु विद्यते

sadyaḥ svāpyāyanaṁ nṛṇāmannadānaṁ narādhipa tasmānnānnena sadṛśaṁ dānaṁ lokeṣu vidyate

हे नराधिप! अन्नदान मनुष्यों को तत्काल तृप्ति देने वाला है; इसलिए लोकों में अन्न के समान कोई दान नहीं है।

श्लोक 34 (skanda.2.156.34)

मार्गश्रांताय विप्राय प्रश्रयं प्रददाति यः । तस्य पुण्यफलं वक्तुं ब्रह्मणाऽपि न शक्यते

mārgaśrāṁtāya viprāya praśrayaṁ pradadāti yaḥ tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ brahmaṇā'pi na śakyate

जो मार्ग से थके हुए ब्राह्मण को आश्रय (ठहरने का स्थान) देता है, उसके पुण्यफल का वर्णन ब्रह्मा भी नहीं कर सकते।

श्लोक 35 (skanda.2.156.35)

दारापत्यगृहादीनि वासोऽलंकारभूषणम् । असह्यं नाश्नतः पुंसः सह्यं भुक्तवतो ध्रुवम्

dārāpatyagṛhādīni vāso'laṁkārabhūṣaṇam asahyaṁ nāśnataḥ puṁsaḥ sahyaṁ bhuktavato dhruvam

पत्नी, संतान, घर आदि, वस्त्र और आभूषण — ये सब भूखे मनुष्य के लिए असह्य होते हैं, और भोजन कर लेने पर निश्चय ही सह्य हो जाते हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.156.36)

तस्मादन्नसमं दानं न भूतं न भविष्यति । वैशाखे येन चादत्तं मार्गश्रांते च भूसुरे

tasmādannasamaṁ dānaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati vaiśākhe yena cādattaṁ mārgaśrāṁte ca bhūsure

इसलिए अन्न के समान कोई दान न हुआ है, न होगा। जो वैशाख में मार्ग से थके हुए ब्राह्मण को अन्न नहीं देता,

श्लोक 37 (skanda.2.156.37)

स पिशाचो भवेद्भूमौ स्वमांसान्येव खादति । यथाविभूति दातव्यं तस्मादन्नं द्विजातये

sa piśāco bhavedbhūmau svamāṁsānyeva khādati yathāvibhūti dātavyaṁ tasmādannaṁ dvijātaye

—वह पृथ्वी पर पिशाच बनकर अपने ही मांस को खाता है। इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार द्विज को अन्न अवश्य देना चाहिए।

श्लोक 38 (skanda.2.156.38)

अन्नदो मातृपित्रादीन्विस्मारयति भूमिप । तस्मादन्नं प्रशंसंति लोकास्त्रैलोक्यवर्तिनः

annado mātṛpitrādīnvismārayati bhūmipa tasmādannaṁ praśaṁsaṁti lokāstrailokyavartinaḥ

हे भूमिप! अन्नदाता माता-पिता तक को भुला देता है; इसलिए त्रिलोकवासी लोग अन्न की प्रशंसा करते हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.156.39)

मातरः पितरश्चापि केवलं जन्महेतवः । अन्नदं पितरं लोके वदन्ति च मनीषिणः

mātaraḥ pitaraścāpi kevalaṁ janmahetavaḥ annadaṁ pitaraṁ loke vadanti ca manīṣiṇaḥ

माता-पिता तो केवल जन्म के कारण मात्र हैं; परन्तु मनीषी जन अन्नदाता को ही संसार में सच्चा पिता कहते हैं।

श्लोक 40 (skanda.2.156.40)

अन्नदे सर्वतीर्थानि अन्नदे सर्वदेवताः । अन्नदे सर्वधर्माश्च तिष्ठंत्यरिधराजय

annade sarvatīrthāni annade sarvadevatāḥ annade sarvadharmāśca tiṣṭhaṁtyaridharājaya

अन्नदाता में समस्त तीर्थ निवास करते हैं, अन्नदाता में समस्त देवता निवास करते हैं, अन्नदाता में समस्त धर्म निवास करते हैं — हे शत्रुदमन राजन्!

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