वैष्णव खण्ड · अध्याय 157
शय्या, ताम्बूल और पानक-दान
श्लोक 1 (skanda.2.157.1)
नारद उवाच । यो मर्त्यो द्विजवर्याय पर्यंकं तु ददाति हि । यत्र स्वस्थः सुखं शेते शीतानिलनिषेवितः
nārada uvāca yo martyo dvijavaryāya paryaṁkaṁ tu dadāti hi yatra svasthaḥ sukhaṁ śete śītānilaniṣevitaḥ
नारद जी बोले— जो मनुष्य श्रेष्ठ द्विज को ऐसा पलंग देता है जिस पर वह शीतल वायु का सेवन करते हुए स्वस्थ और सुखपूर्वक सोता है,
श्लोक 2 (skanda.2.157.2)
धर्मसाधनभूते हि देहे नैरुज्यमाप्नुते । तं दत्त्वा सकलं तापं निरस्य गतकल्मषः
dharmasādhanabhūte hi dehe nairujyamāpnute taṁ dattvā sakalaṁ tāpaṁ nirasya gatakalmaṣaḥ
—उसका शरीर, जो धर्म-साधन का आधार है, रोगरहित हो जाता है। वह पलंग देकर, समस्त संताप को दूर करके, पापरहित होकर—
श्लोक 3 (skanda.2.157.3)
अखण्डपदवीं याति योगिनामपि दुर्लभाम् । वैशाखे घर्मतप्तानां श्रान्तानां तु द्विजन्मनाम्
akhaṇḍapadavīṁ yāti yogināmapi durlabhām vaiśākhe gharmataptānāṁ śrāntānāṁ tu dvijanmanām
—उस अखण्ड पद को प्राप्त होता है जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है। वैशाख में गर्मी से संतप्त और थके हुए द्विजों को—
श्लोक 4 (skanda.2.157.4)
दत्त्वा श्रमापहं दिव्यं पर्यंकं मनुजेश्वर । न जातु सीदते लोके जन्ममृत्युजरादिभिः
dattvā śramāpahaṁ divyaṁ paryaṁkaṁ manujeśvara na jātu sīdate loke janmamṛtyujarādibhiḥ
—हे मनुजेश्वर! श्रम को दूर करने वाला दिव्य पलंग देकर मनुष्य संसार में जन्म, मृत्यु, जरा आदि से कभी पीड़ित नहीं होता।
श्लोक 5 (skanda.2.157.5)
गृहीत्वा ब्राह्मणो यत्र शेते चाजीवमास्थितः । आसीने सकलं पापं ज्ञानतोऽज्ञानतः कृतम्
gṛhītvā brāhmaṇo yatra śete cājīvamāsthitaḥ āsīne sakalaṁ pāpaṁ jñānato'jñānataḥ kṛtam
जिस पलंग को ग्रहण करके ब्राह्मण जीवनभर उस पर विश्राम करता है, उस पर बैठे रहते समय जाने-अनजाने किए गए उसके समस्त पाप—
श्लोक 6 (skanda.2.157.6)
विलयं याति राजेंद्र कर्पूर इव चाग्निना । शयने ब्रह्मनिर्वाणं स नरो याति निश्चितम्
vilayaṁ yāti rājeṁdra karpūra iva cāgninā śayane brahmanirvāṇaṁ sa naro yāti niścitam
—हे राजेन्द्र! अग्नि में कर्पूर की भाँति विलीन हो जाता है। वह मनुष्य उसी शय्या पर निश्चित रूप से ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होता है।
श्लोक 7 (skanda.2.157.7)
यो दद्यात्कशिपुं मासे वैशाखे स्नानवल्लभे । सर्वभोगसमायुक्तस्तस्मिन्नेव हि जन्मनि
yo dadyātkaśipuṁ māse vaiśākhe snānavallabhe sarvabhogasamāyuktastasminneva hi janmani
जो मनुष्य स्नान-प्रिय वैशाख मास में गद्दा (शय्या-वस्त्र) देता है, वह उसी जन्म में समस्त भोगों से युक्त होकर—
श्लोक 8 (skanda.2.157.8)
सान्वयो वर्तते नूनं रोगादिभिरनाहतः । आयुष्यं परमारोग्यं यशो धैर्यं च विंदति
sānvayo vartate nūnaṁ rogādibhiranāhataḥ āyuṣyaṁ paramārogyaṁ yaśo dhairyaṁ ca viṁdati
—निश्चय ही अपने कुल के साथ रोगादि से अछूता रहता है। वह दीर्घायु, परम आरोग्य, यश और धैर्य प्राप्त करता है।
श्लोक 9 (skanda.2.157.9)
नाधार्मिकः कुले तस्य जायते शतपौरुषम् । भुक्त्वा तु सकलान्भोगांस्ततः पञ्चत्वमेष्यति
nādhārmikaḥ kule tasya jāyate śatapauruṣam bhuktvā tu sakalānbhogāṁstataḥ pañcatvameṣyati
उसके कुल में सौ पीढ़ियों तक कोई अधर्मी उत्पन्न नहीं होता। वह समस्त भोगों को भोगकर तत्पश्चात् पंचत्व (देहावसान) को प्राप्त होता है,
श्लोक 10 (skanda.2.157.10)
निर्धूताखिलपापस्तु ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति । श्रोत्रियाय द्विजेंद्राय यो दद्यादुपबर्हणम्
nirdhūtākhilapāpastu brahmanirvāṇamṛcchati śrotriyāya dvijeṁdrāya yo dadyādupabarhaṇam
—और समस्त पापों को दूर करके ब्रह्म-निर्वाण को प्राप्त होता है। जो वेदपाठी श्रेष्ठ द्विज को तकिया (उपबर्हण) देता है,
श्लोक 11 (skanda.2.157.11)
सुखं निद्रा विना येन न नृणां जायते क्वचित् । सर्वेषामाश्रयो भूत्वा भुवि साम्राज्यमश्नुते
sukhaṁ nidrā vinā yena na nṛṇāṁ jāyate kvacit sarveṣāmāśrayo bhūtvā bhuvi sāmrājyamaśnute
—जिसके बिना मनुष्यों को सुखद निद्रा कभी नहीं आती — वह सबका आश्रय बनकर पृथ्वी पर साम्राज्य का सुख भोगता है।
श्लोक 12 (skanda.2.157.12)
पुनः सुखी पुनर्भोगी पुनर्धर्मपरायणः । आसप्तजन्म राजेंद्र जायते सर्वतो जयी
punaḥ sukhī punarbhogī punardharmaparāyaṇaḥ āsaptajanma rājeṁdra jāyate sarvato jayī
हे राजेन्द्र! वह बार-बार सुखी, बार-बार भोग-सम्पन्न और बार-बार धर्मपरायण होकर सात जन्मों तक सर्वत्र विजयी होता है।
श्लोक 13 (skanda.2.157.13)
पश्चात्सप्तकुलैर्युक्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते । तार्णं कटं तु यो दद्यात्कटमन्यदथापि वा
paścātsaptakulairyukto brahmabhūyāya kalpate tārṇaṁ kaṭaṁ tu yo dadyātkaṭamanyadathāpi vā
तत्पश्चात् सात पीढ़ियों के कुल सहित वह ब्रह्म-स्वरूप होने योग्य हो जाता है। जो घास की चटाई अथवा अन्य कोई चटाई देता है,
श्लोक 14 (skanda.2.157.14)
तत्र शेते स्वयं विष्णुर्यत्रस्थः परमेश्वरः । यथा जलगता चोर्णा न जलैर्भिद्यते क्वचित्
tatra śete svayaṁ viṣṇuryatrasthaḥ parameśvaraḥ yathā jalagatā corṇā na jalairbhidyate kvacit
—उस पर स्वयं परमेश्वर विष्णु जहाँ-कहीं भी विराजमान रहकर शयन करते हैं। जैसे जल में पड़ा हुआ ऊन कभी जल से भीगता नहीं,
श्लोक 15 (skanda.2.157.15)
तथा संसारगो जन्तुः संसारे न च बध्यते । आसने शयने सक्तः कटदः सर्वतः सुखी
tathā saṁsārago jantuḥ saṁsāre na ca badhyate āsane śayane saktaḥ kaṭadaḥ sarvataḥ sukhī
—वैसे ही संसार में विचरण करने वाला प्राणी संसार से बंधता नहीं। आसन और शय्या का दान करने वाला सब प्रकार से सुखी रहता है।
श्लोक 16 (skanda.2.157.16)
प्रश्रये शयनार्थाय यो दद्यात्कटकंबलम् । तावन्मात्रेण मुक्तः स्यान्नात्र कार्या विचारणा
praśraye śayanārthāya yo dadyātkaṭakaṁbalam tāvanmātreṇa muktaḥ syānnātra kāryā vicāraṇā
जो विनम्रतापूर्वक विश्राम के लिए चटाई और कम्बल देता है, वह इतने मात्र से ही मुक्त हो जाता है — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।
श्लोक 17 (skanda.2.157.17)
निद्रया हीयते दुःखं निद्रया हीयते श्रमः । सा निद्रा कटसंस्थस्य सुखं संजायते धुवम्
nidrayā hīyate duḥkhaṁ nidrayā hīyate śramaḥ sā nidrā kaṭasaṁsthasya sukhaṁ saṁjāyate dhuvam
नींद से दुःख दूर होता है, नींद से थकान दूर होती है। चटाई पर सोने वाले की वह निद्रा सुखदाता के लिए निश्चय ही सुखरूप बन जाती है।
श्लोक 18 (skanda.2.157.18)
यो दयात्कंबलं राजन्वैशाखे माधवाऽऽगमे । अपमृत्योः कालमृत्योर्मुक्तो जीवति वै शतम्
yo dayātkaṁbalaṁ rājanvaiśākhe mādhavā''game apamṛtyoḥ kālamṛtyormukto jīvati vai śatam
हे राजन्! जो वैशाख में माधव के आगमन पर कम्बल देता है, वह अपमृत्यु और कालमृत्यु दोनों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है।
श्लोक 19 (skanda.2.157.19)
दद्याद्वस्त्रं सूक्ष्मतरं द्विजेंद्रे घर्मकर्शिते । पूर्णमायुः समाप्नोति परत्र च परां गतिम्
dadyādvastraṁ sūkṣmataraṁ dvijeṁdre gharmakarśite pūrṇamāyuḥ samāpnoti paratra ca parāṁ gatim
गर्मी से क्षीण हुए श्रेष्ठ द्विज को अत्यन्त सूक्ष्म वस्त्र देना चाहिए; ऐसा करने वाला पूर्ण आयु प्राप्त करता है और परलोक में परम गति पाता है।
श्लोक 20 (skanda.2.157.20)
अतस्तापहरं दिव्यं कर्पूरं तु द्विजातये । दत्त्वा मोक्षमवाप्नोति दुःखशांतिं च विंदति
atastāpaharaṁ divyaṁ karpūraṁ tu dvijātaye dattvā mokṣamavāpnoti duḥkhaśāṁtiṁ ca viṁdati
इसलिए द्विज को संताप हरने वाला दिव्य कर्पूर देकर मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है और दुःख की शांति पाता है।
श्लोक 21 (skanda.2.157.21)
कुसुमानि च यो दद्यात्कुकुमं च द्विजातये । सार्वभौमो भवेद्राजा सर्वलोकवशंकरः
kusumāni ca yo dadyātkukumaṁ ca dvijātaye sārvabhaumo bhavedrājā sarvalokavaśaṁkaraḥ
जो द्विज को फूल और कुंकुम देता है, वह सम्पूर्ण लोकों को वश में करने वाला सार्वभौम राजा बनता है।
श्लोक 22 (skanda.2.157.22)
पुत्रपौत्रादिभोगांश्च भुक्त्वा मोक्षमवाप्नुयात् । त्वगस्थिगतसंतापं सद्यो हरति चन्दनम्
putrapautrādibhogāṁśca bhuktvā mokṣamavāpnuyāt tvagasthigatasaṁtāpaṁ sadyo harati candanam
वह पुत्र-पौत्र आदि के भोगों को भोगकर मोक्ष प्राप्त करता है। चन्दन त्वचा और अस्थि तक पहुँचे हुए संताप को तत्काल हर लेता है;
श्लोक 23 (skanda.2.157.23)
तापत्रयविनिर्मुक्तस्तद्दत्त्वा मोक्षमाप्नुयात् । औशीरं चाषकं कौशं यो दद्याज्जलवासितम्
tāpatrayavinirmuktastaddattvā mokṣamāpnuyāt auśīraṁ cāṣakaṁ kauśaṁ yo dadyājjalavāsitam
—उसका दान करने से मनुष्य त्रिविध ताप से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। जो जल में बसाया हुआ खस अथवा रेशमी पंखा देता है,
श्लोक 24 (skanda.2.157.24)
सर्वभोगेषु राजेंद्र स तु देवसहायवान् । पापहानिं दुःखहानिं प्राप्य निर्वृतिमाप्नुयात्
sarvabhogeṣu rājeṁdra sa tu devasahāyavān pāpahāniṁ duḥkhahāniṁ prāpya nirvṛtimāpnuyāt
—हे राजेन्द्र! वह समस्त भोगों में देवताओं का सहयोगी बनता है। पाप और दुःख दोनों का नाश पाकर वह परम शांति प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (skanda.2.157.25)
गोरोचं मृगनाभिं च दद्याद्वैशाखधर्मवित् । तापत्रयविनिर्मुक्तः परं निर्वाणमृच्छति
gorocaṁ mṛganābhiṁ ca dadyādvaiśākhadharmavit tāpatrayavinirmuktaḥ paraṁ nirvāṇamṛcchati
वैशाख के धर्म को जानने वाला गोरोचन और कस्तूरी का दान करे; वह त्रिविध ताप से मुक्त होकर परम निर्वाण को प्राप्त होता है।
श्लोक 26 (skanda.2.157.26)
तांबूलं च सकर्पूरं यो दद्यान्मेषगे रवौ । सार्वभौमसुखं भुक्त्वा परं निर्वाणमृच्छति
tāṁbūlaṁ ca sakarpūraṁ yo dadyānmeṣage ravau sārvabhaumasukhaṁ bhuktvā paraṁ nirvāṇamṛcchati
जो सूर्य के मेष राशि में रहते हुए कर्पूर-युक्त ताम्बूल देता है, वह सार्वभौम सुख भोगकर परम निर्वाण को प्राप्त होता है।
श्लोक 27 (skanda.2.157.27)
शतपत्रीं च यूथीं च मेषमासे ददन्नरः । स सार्वभौमो भवति पश्चान्मोक्षं च विंदति
śatapatrīṁ ca yūthīṁ ca meṣamāse dadannaraḥ sa sārvabhaumo bhavati paścānmokṣaṁ ca viṁdati
मेष-मास में शतपत्री (कमल/गुलाब) और चमेली के फूल देने वाला मनुष्य सार्वभौम राजा बनता है और तत्पश्चात् मोक्ष भी प्राप्त करता है।
श्लोक 28 (skanda.2.157.28)
केतकीं मल्लिकां वाऽपि यो दद्यान्माधवाऽऽगमे । स तु मोक्षमवाप्नोति मधुशासनशासनात्
ketakīṁ mallikāṁ vā'pi yo dadyānmādhavā''game sa tu mokṣamavāpnoti madhuśāsanaśāsanāt
जो माधव के आगमन पर केतकी अथवा मल्लिका (चमेली) के फूल देता है, वह मधुसूदन (विष्णु) की आज्ञा से मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 29 (skanda.2.157.29)
पूगीफलं तु यो दद्यात्सुगन्धं तु द्विजातये । नारिकेलफलं राजंस्तस्य पुण्यफलं शृणु
pūgīphalaṁ tu yo dadyātsugandhaṁ tu dvijātaye nārikelaphalaṁ rājaṁstasya puṇyaphalaṁ śṛṇu
जो द्विज को सुपारी, सुगंधित पदार्थ अथवा नारियल का फल देता है — हे राजन्! उसके पुण्यफल को सुनिए।
श्लोक 30 (skanda.2.157.30)
सप्त जन्म भवेद्विप्रो धनाढ्यो वेदपारगः । पश्चात्सप्तकुलैर्युक्तो विष्णुलोकं स गच्छति
sapta janma bhavedvipro dhanāḍhyo vedapāragaḥ paścātsaptakulairyukto viṣṇulokaṁ sa gacchati
वह सात जन्मों तक धनाढ्य और वेदपारंगत ब्राह्मण होता है; तत्पश्चात् सात पीढ़ियों के कुल के साथ विष्णुलोक को जाता है।
श्लोक 31 (skanda.2.157.31)
विश्राममण्डपं यस्तु कृत्वा दद्याद्द्विजन्मने । तस्य पुण्यफलं वक्तुं नाहं शक्नोमि भूपते
viśrāmamaṇḍapaṁ yastu kṛtvā dadyāddvijanmane tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ nāhaṁ śaknomi bhūpate
हे भूपते! जो द्विज के लिए विश्राम-मण्डप बनवाकर देता है, उसके पुण्यफल का वर्णन मैं भी नहीं कर सकता।
श्लोक 32 (skanda.2.157.32)
सुच्छायामण्डपं यस्तु सिकताऽऽकीर्णमञ्जसा । सप्रपं कारयेद्यस्तु स तु लोकाधिपो भवेत्
succhāyāmaṇḍapaṁ yastu sikatā''kīrṇamañjasā saprapaṁ kārayedyastu sa tu lokādhipo bhavet
जो सुंदर छायादार मण्डप बनवाता है, बालू से आच्छादित तथा जल-शाला सहित, वह लोकों का अधिपति बनता है।
श्लोक 33 (skanda.2.157.33)
मार्गोद्यानं तडागं वा कूपं मण्डपमेव च । यः करोति स धर्मात्मा तस्य पुत्रैस्तु किं फलम्
mārgodyānaṁ taḍāgaṁ vā kūpaṁ maṇḍapameva ca yaḥ karoti sa dharmātmā tasya putraistu kiṁ phalam
जो मार्ग में उद्यान, तालाब, कुआँ अथवा मण्डप बनवाता है, वह धर्मात्मा है — उसे पुत्रों से भी और क्या फल चाहिए?
श्लोक 34 (skanda.2.157.34)
कूपस्तडागमुद्यानं मण्डपं च प्रपा तथा । सद्धर्मकरणं पुत्रः संतानं सप्तधोच्यते
kūpastaḍāgamudyānaṁ maṇḍapaṁ ca prapā tathā saddharmakaraṇaṁ putraḥ saṁtānaṁ saptadhocyate
कुआँ, तालाब, उद्यान, मण्डप और जल-शाला, सद्धर्म का आचरण, तथा पुत्र — संतान सात प्रकार की कही गई है।
श्लोक 35 (skanda.2.157.35)
एतेष्वन्यतमाभावे नोर्ध्वं गच्छंति मानवाः । सच्छास्त्र श्रवणं तीर्थयात्रा सजनसंगतिः
eteṣvanyatamābhāve nordhvaṁ gacchaṁti mānavāḥ sacchāstra śravaṇaṁ tīrthayātrā sajanasaṁgatiḥ
इनमें से किसी एक के भी अभाव में मनुष्य ऊर्ध्वलोक को नहीं जाते। सच्छास्त्रों का श्रवण, तीर्थयात्रा, सज्जनों का संग,
श्लोक 36 (skanda.2.157.36)
जलदानं चान्नदानमश्वत्थारोपणं तथा । पुत्रश्चेति च संतानं सप्तेमेऽतिविदो विदुः
jaladānaṁ cānnadānamaśvatthāropaṇaṁ tathā putraśceti ca saṁtānaṁ sapteme'tivido viduḥ
—जल-दान, अन्न-दान, पीपल के वृक्ष का रोपण, और पुत्र — इन सातों को अति-ज्ञानी लोग 'संतान' कहते हैं।
श्लोक 37 (skanda.2.157.37)
नासंततिर्लभेल्लोकान्कृत्वा धर्मशतान्यपि । तस्मात्संतानमन्विच्छेत्संतानेष्वेकतो व्रजेत्
nāsaṁtatirlabhellokānkṛtvā dharmaśatānyapi tasmātsaṁtānamanvicchetsaṁtāneṣvekato vrajet
जिसके पास ये संतान नहीं, वह सैकड़ों धर्म-कार्य करने पर भी उन लोकों को प्राप्त नहीं करता। अतः मनुष्य को संतान की खोज करनी चाहिए, अथवा इनमें से कम-से-कम किसी एक का सहारा लेना चाहिए।
श्लोक 38 (skanda.2.157.38)
पशूनां पक्षिणां चैव मृगाणां चैव भूरुहाम् । नोर्ध्वलोकं सुखं याति मनुष्याणां तु का कथा
paśūnāṁ pakṣiṇāṁ caiva mṛgāṇāṁ caiva bhūruhām nordhvalokaṁ sukhaṁ yāti manuṣyāṇāṁ tu kā kathā
पशु, पक्षी, मृग और वृक्ष तक बिना इसके सुखपूर्वक ऊर्ध्वलोक को नहीं जाते — फिर मनुष्यों की तो बात ही क्या!
श्लोक 39 (skanda.2.157.39)
पूगीफलसमायुक्तं नागवल्लीदलैर्युतम् । कपूरागुरुसंयुक्तं ददत्तांबूलमुत्तमम्
pūgīphalasamāyuktaṁ nāgavallīdalairyutam kapūrāgurusaṁyuktaṁ dadattāṁbūlamuttamam
जो सुपारी से युक्त, पान के पत्तों से युक्त, कर्पूर और अगुरु से संयुक्त उत्तम ताम्बूल देता है,
श्लोक 40 (skanda.2.157.40)
शारीरैः सकलैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः । तांबूलदो यशो धैर्यं श्रियमाप्नोति निश्चितम्
śārīraiḥ sakalaiḥ pāpairmucyate nātra saṁśayaḥ tāṁbūlado yaśo dhairyaṁ śriyamāpnoti niścitam
—वह निःसंदेह समस्त शारीरिक पापों से मुक्त हो जाता है। ताम्बूल-दाता निश्चय ही यश, धैर्य और लक्ष्मी प्राप्त करता है।
श्लोक 41 (skanda.2.157.41)
रोगी दत्त्वा विरोगः स्यादरोगी मोक्षमाप्नुयात् । वैशाखे मासि यो दद्यात्तक्रं तापविनाशनम्
rogī dattvā virogaḥ syādarogī mokṣamāpnuyāt vaiśākhe māsi yo dadyāttakraṁ tāpavināśanam
यह दान करने से रोगी रोगमुक्त हो जाता है और नीरोग मोक्ष प्राप्त करता है। जो वैशाख मास में संताप-नाशक छाछ (तक्र) देता है,
श्लोक 42 (skanda.2.157.42)
विद्यावान्धनवान्भूमौ जायते नात्र संशयः । न तक्रसदृशं दानं घर्मकालेषु विद्यते
vidyāvāndhanavānbhūmau jāyate nātra saṁśayaḥ na takrasadṛśaṁ dānaṁ gharmakāleṣu vidyate
—वह निःसंदेह पृथ्वी पर विद्यावान् और धनवान् होकर जन्म लेता है। ग्रीष्मकाल में छाछ के समान कोई दान नहीं है।
श्लोक 43 (skanda.2.157.43)
तस्मात्तक्रं प्रदातव्यमध्वश्रांतद्विजातये । जंबीरसुरसोपेतं लसल्लवणमिश्रितम्
tasmāttakraṁ pradātavyamadhvaśrāṁtadvijātaye jaṁbīrasurasopetaṁ lasallavaṇamiśritam
अतः मार्ग से थके हुए द्विज को छाछ अवश्य देनी चाहिए, नीबू और सुगन्धित द्रव्यों से युक्त तथा थोड़े नमक से मिश्रित।
श्लोक 44 (skanda.2.157.44)
यस्तक्रमरुचिघ्नं तु दत्त्वा मोक्षमवाप्नुयात् । यो दद्याद्दधिखंडं तु वैशाखे घर्मशांतये
yastakramarucighnaṁ tu dattvā mokṣamavāpnuyāt yo dadyāddadhikhaṁḍaṁ tu vaiśākhe gharmaśāṁtaye
जो रुचि-भंग को दूर करने वाली यह छाछ देता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है। जो वैशाख में गर्मी की शांति के लिए दही का टुकड़ा (मिष्ठान्न) देता है,
श्लोक 45 (skanda.2.157.45)
तस्य पुण्यफलं वक्तुं नाहं शक्नोमि भूमिप । यो दद्यात्तंडुलान्दिव्यान्मधुसूदनवल्लभे
tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ nāhaṁ śaknomi bhūmipa yo dadyāttaṁḍulāndivyānmadhusūdanavallabhe
—हे भूमिप! उसके पुण्यफल का वर्णन मैं भी नहीं कर सकता। जो मधुसूदन-प्रिय इस मास में उत्तम चावल देता है,
श्लोक 46 (skanda.2.157.46)
स लभेत्पूर्णमायुष्यं सर्वयज्ञफलं लभेत् । यो घृतं तेजसो रूपं गव्यं दद्याद्द्विजातये । सोऽश्वमेधफलं प्राप्य मोदते विष्णुमंदिरे
sa labhetpūrṇamāyuṣyaṁ sarvayajñaphalaṁ labhet yo ghṛtaṁ tejaso rūpaṁ gavyaṁ dadyāddvijātaye so'śvamedhaphalaṁ prāpya modate viṣṇumaṁdire
—वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है और समस्त यज्ञों का फल पाता है। जो तेज का साक्षात् स्वरूप गोघृत द्विज को देता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल पाकर विष्णु-मंदिर में आनंदित रहता है।
श्लोक 47 (skanda.2.157.47)
उर्वारुगुडसंमिश्रं वैशाखे मेषगे रवौ । सर्वपापविनिर्मुक्तः श्वेतद्वीपे वसेद्ध्रुवम्
urvāruguḍasaṁmiśraṁ vaiśākhe meṣage ravau sarvapāpavinirmuktaḥ śvetadvīpe vaseddhruvam
वैशाख में सूर्य के मेष राशि में रहते हुए जो ककड़ी को गुड़ में मिलाकर देता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर निश्चय ही श्वेतद्वीप में निवास करता है।
श्लोक 48 (skanda.2.157.48)
यश्चेक्षुदंडं सायाह्ने दिवा तापोपशान्तये । ब्राह्मणाय च यो दद्यात्तस्य पुण्यमनंतकम्
yaścekṣudaṁḍaṁ sāyāhne divā tāpopaśāntaye brāhmaṇāya ca yo dadyāttasya puṇyamanaṁtakam
जो दिन के ताप की शांति के लिए सायंकाल ब्राह्मण को गन्ने का डंडा देता है, उसका पुण्य अनंत है।
श्लोक 49 (skanda.2.157.49)
वैशाखे पानकं दत्त्वा सायाह्ने श्रमशान्तये । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात्
vaiśākhe pānakaṁ dattvā sāyāhne śramaśāntaye sarvapāpavinirmukto viṣṇoḥ sāyujyamāpnuyāt
वैशाख में सायंकाल श्रम की शांति के लिए पानक (शर्बत) देकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है।
श्लोक 50 (skanda.2.157.50)
सफलं पानकं मेषमासे सायं द्विजातये । दद्यात्तेन पितॄणां तु सुधापानं न संशयः
saphalaṁ pānakaṁ meṣamāse sāyaṁ dvijātaye dadyāttena pitṝṇāṁ tu sudhāpānaṁ na saṁśayaḥ
जो मेष-मास में सायंकाल द्विज को फलयुक्त पानक देता है, उससे निश्चय ही उसके पितरों को अमृतपान प्राप्त होता है।
श्लोक 51 (skanda.2.157.51)
वैशाखे पानकं चूतसुपक्वफलसंयुतम् । तस्य सर्वाणि पापानि विनाशं यांति निश्चितम्
vaiśākhe pānakaṁ cūtasupakvaphalasaṁyutam tasya sarvāṇi pāpāni vināśaṁ yāṁti niścitam
वैशाख में पके हुए आम के फल से युक्त पानक देने वाले के समस्त पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 52 (skanda.2.157.52)
यो दद्याच्चैत्रदर्शे तु कुम्भं पूर्णं तु पानकैः । गयाश्राद्धशतं तेन कृतमेव न संशयः
yo dadyāccaitradarśe tu kumbhaṁ pūrṇaṁ tu pānakaiḥ gayāśrāddhaśataṁ tena kṛtameva na saṁśayaḥ
जो चैत्र की अमावस्या को पानक से भरा हुआ घड़ा देता है, उसने निश्चय ही सौ गया-श्राद्ध कर लिए हैं।
श्लोक 53 (skanda.2.157.53)
कस्तूरी कर्पुरोपेतं मल्लिकोशीरसंयुतम् । कलशं पानकैः पूर्णं चैत्रदर्शे तु मानवः । दद्यात्पितॄन्समुद्दिश्य स षण्णवतिदो भवेत्
kastūrī karpuropetaṁ mallikośīrasaṁyutam kalaśaṁ pānakaiḥ pūrṇaṁ caitradarśe tu mānavaḥ dadyātpitṝnsamuddiśya sa ṣaṇṇavatido bhavet
जो मनुष्य चैत्र की अमावस्या को कस्तूरी और कर्पूर से सुगंधित, चमेली और खस से युक्त, पानक से भरा हुआ कलश अपने पितरों के उद्देश्य से देता है, वह छियानबे (पीढ़ियों/श्राद्धों) के फल का दाता होता है।