वैष्णव खण्ड · अध्याय 158
वैशाख-धर्म-प्रशंसा
श्लोक 1 (skanda.2.158.1)
नारद उवाच । तैलाभ्यङ्गं दिवास्वापं तथा वै कांस्य भोजनम् । खट्वा निद्रां गृहे स्नानं निषिद्धस्य च भक्षणम्
nārada uvāca tailābhyaṅgaṁ divāsvāpaṁ tathā vai kāṁsya bhojanam khaṭvā nidrāṁ gṛhe snānaṁ niṣiddhasya ca bhakṣaṇam
नारद जी बोले— तेल की मालिश, दिन में सोना, कांसे के पात्र में भोजन, खाट पर सोना, घर में स्नान, तथा निषिद्ध पदार्थों का सेवन —
श्लोक 2 (skanda.2.158.2)
वैशाखे वर्जयेदष्टौ द्विभुऽक्तं नक्तभोजनम् । पद्मपत्रे तु यो भुंक्ते वैशाखे ब्रतसंस्थितः
vaiśākhe varjayedaṣṭau dvibhu'ktaṁ naktabhojanam padmapatre tu yo bhuṁkte vaiśākhe bratasaṁsthitaḥ
—इन आठ को दिन में दो बार भोजन तथा केवल रात्रि-भोजन के साथ वैशाख में वर्जित करना चाहिए। जो व्रतस्थ होकर वैशाख में कमल-पत्र पर भोजन करता है,
श्लोक 3 (skanda.2.158.3)
स तु पापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं च गच्छति । वैशाखे मासि मध्याह्ने श्रौतानां तु द्विजन्मनाम् । पादावनेजनं कुर्यात्तद्व्रतं सुव्रतोत्तमम्
sa tu pāpavinirmukto viṣṇulokaṁ ca gacchati vaiśākhe māsi madhyāhne śrautānāṁ tu dvijanmanām pādāvanejanaṁ kuryāttadvrataṁ suvratottamam
—वह पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को जाता है। वैशाख मास में मध्याह्न के समय वेदपाठी द्विजों के चरण धोना — यह उत्तम व्रतों में श्रेष्ठ व्रत है।
श्लोक 4 (skanda.2.158.4)
अध्वश्रान्तं द्विजं यस्तु मध्याह्ने स्वगृहागतम् । उपवेश्यासने रम्ये कृत्वा पादावनेजनम्
adhvaśrāntaṁ dvijaṁ yastu madhyāhne svagṛhāgatam upaveśyāsane ramye kṛtvā pādāvanejanam
जो मार्ग से थके हुए द्विज को, जो मध्याह्न में उसके घर आया हो, सुंदर आसन पर बैठाकर उसके चरण धोता है,
श्लोक 5 (skanda.2.158.5)
धृत्वा शिरसि ताश्चापो विध्वस्ताखिलबंधनः । गंगादिसर्वतीर्थेषु स्नातो भवति निश्चितम्
dhṛtvā śirasi tāścāpo vidhvastākhilabaṁdhanaḥ gaṁgādisarvatīrtheṣu snāto bhavati niścitam
—और उस जल को अपने सिर पर धारण करता है, वह समस्त बन्धनों से मुक्त होकर निश्चय ही गंगा आदि समस्त तीर्थों में स्नान किए हुए के समान हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.2.158.6)
अस्नायी वाऽप्यपत्राशी वैशाखं तु नयेद्यदि । रासभी योनिमासाद्य पश्चादश्वतरो भवेत्
asnāyī vā'pyapatrāśī vaiśākhaṁ tu nayedyadi rāsabhī yonimāsādya paścādaśvataro bhavet
यदि कोई बिना स्नान किए और बिना दान (पत्तल/भोजन) दिए वैशाख को व्यतीत कर देता है, तो वह गधी की योनि में जन्म लेकर बाद में खच्चर बनता है।
श्लोक 7 (skanda.2.158.7)
दृढाङ्गो रोगहीनश्च तथा स्वस्थोऽपि मानवः । वैशाखे तु गृहे स्नात्वा चांडालीं योनिमाप्नुयात्
dṛḍhāṅgo rogahīnaśca tathā svastho'pi mānavaḥ vaiśākhe tu gṛhe snātvā cāṁḍālīṁ yonimāpnuyāt
दृढ़ अंगों वाला, रोगरहित तथा स्वस्थ मनुष्य भी यदि वैशाख में घर में ही स्नान करता है, तो वह चाण्डाली की योनि प्राप्त करता है।
श्लोक 8 (skanda.2.158.8)
वैशाखे मासि राजेन्द्र मेषसंस्थे दिवाकरे । न करोति बहिःस्नानं श्वानयोनिशतं व्रजेत्
vaiśākhe māsi rājendra meṣasaṁsthe divākare na karoti bahiḥsnānaṁ śvānayoniśataṁ vrajet
हे राजेन्द्र! वैशाख मास में सूर्य के मेष राशि में रहते हुए जो बाहर (नदी आदि में) स्नान नहीं करता, वह सौ जन्मों तक कुत्ते की योनि को प्राप्त होता है।
श्लोक 9 (skanda.2.158.9)
अस्नात्वा चाप्यदत्त्वा च वैशाखो येन नीयते । स पिशाचो भवेन्नूनमवैशाखादथो व्रजेत्
asnātvā cāpyadattvā ca vaiśākho yena nīyate sa piśāco bhavennūnamavaiśākhādatho vrajet
जिसके द्वारा बिना स्नान किए और बिना दान दिए वैशाख व्यतीत किया जाता है, वह निश्चय ही पिशाच बनता है और वैशाख के फल से वंचित होकर आगे बढ़ता है।
श्लोक 10 (skanda.2.158.10)
यो न दद्याज्जलं चान्नं वैशाखे लोभमानसः । पापहानिं दुःखहानिं नैवाप्नोति न संशयः
yo na dadyājjalaṁ cānnaṁ vaiśākhe lobhamānasaḥ pāpahāniṁ duḥkhahāniṁ naivāpnoti na saṁśayaḥ
जो लोभी मन वाला वैशाख में जल और अन्न नहीं देता, वह निश्चय ही पाप और दुःख के नाश को कभी प्राप्त नहीं करता।
श्लोक 11 (skanda.2.158.11)
नदीस्नानं तु यः कुर्याद्वैशाखे विष्णुतत्परः । जन्मत्रयार्जितात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
nadīsnānaṁ tu yaḥ kuryādvaiśākhe viṣṇutatparaḥ janmatrayārjitātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
जो विष्णु-परायण होकर वैशाख में नदी में स्नान करता है, वह तीन जन्मों में अर्जित पापों से निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.2.158.12)
समुद्रगनदीस्नानं कुर्यात्प्रातर्भगोदये । सप्तजन्मार्जितैः पापैस्तत्क्षणादेव मुच्यते
samudraganadīsnānaṁ kuryātprātarbhagodaye saptajanmārjitaiḥ pāpaistatkṣaṇādeva mucyate
प्रातःकाल सूर्योदय के समय समुद्र में मिलने वाली नदी में स्नान करना चाहिए; इससे सात जन्मों में अर्जित पापों से उसी क्षण मुक्ति मिल जाती है।
श्लोक 13 (skanda.2.158.13)
कुर्यादुषसि यः स्नानं सप्तगङ्गासु मानवः । कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
kuryāduṣasi yaḥ snānaṁ saptagaṅgāsu mānavaḥ koṭijanmārjitātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
जो मनुष्य प्रातःकाल सप्त-गंगाओं में स्नान करता है, वह करोड़ों जन्मों में अर्जित पापों से निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक 14 (skanda.2.158.14)
जाह्नवी वृद्धगङ्गा च कालिंदी च सरस्वती । कावेरी नर्मदा वेणी सप्तगंगाः प्रकीर्तिताः
jāhnavī vṛddhagaṅgā ca kāliṁdī ca sarasvatī kāverī narmadā veṇī saptagaṁgāḥ prakīrtitāḥ
जाह्नवी (गंगा), वृद्धगंगा, कालिंदी (यमुना), सरस्वती, कावेरी, नर्मदा और वेणी — ये सात गंगाएँ कही गई हैं।
श्लोक 15 (skanda.2.158.15)
देवखातेषु यः कुर्यात्प्रातर्वैशाखमज्जनम् । जन्मारभ्य कृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
devakhāteṣu yaḥ kuryātprātarvaiśākhamajjanam janmārabhya kṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
जो देवताओं द्वारा निर्मित जलाशयों में प्रातःकाल वैशाख का स्नान करता है, वह जन्म से किए हुए पापों से निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक 16 (skanda.2.158.16)
वैशाखे मासि संप्राप्ते यो वापीष्ववगाहनम् । प्रातः कुर्यान्महाराज महापातकनाशनम्
vaiśākhe māsi saṁprāpte yo vāpīṣvavagāhanam prātaḥ kuryānmahārāja mahāpātakanāśanam
हे महाराज! वैशाख मास आने पर जो प्रातःकाल बावड़ियों में डुबकी लगाता है, वह महापातकों का नाश करने वाला कर्म करता है।
श्लोक 17 (skanda.2.158.17)
अपि गोष्पदमात्रेषु बहिःस्थेषु जलेषु च । तिष्ठंति सरितः सर्वा गंगाद्या इति निश्चयः । इति जानन्समाप्नोति सर्वतीर्थाधिकं फलम्
api goṣpadamātreṣu bahiḥstheṣu jaleṣu ca tiṣṭhaṁti saritaḥ sarvā gaṁgādyā iti niścayaḥ iti jānansamāpnoti sarvatīrthādhikaṁ phalam
बाहर के गोष्पदभर (गाय के खुर जितने छोटे) जल में भी गंगा आदि समस्त नदियाँ विद्यमान रहती हैं — यह निश्चित है। यह जानकर मनुष्य समस्त तीर्थों से भी अधिक फल प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (skanda.2.158.18)
क्षीरं रसाधिकं क्षीरादधिकं दधि भूमिप । दध्नोऽधिकं घृतं यद्वदूर्जो मासोऽधिकस्तथा
kṣīraṁ rasādhikaṁ kṣīrādadhikaṁ dadhi bhūmipa dadhno'dhikaṁ ghṛtaṁ yadvadūrjo māso'dhikastathā
हे भूमिप! जैसे रस से दूध श्रेष्ठ है, दूध से दही श्रेष्ठ है और दही से घृत श्रेष्ठ है, वैसे ही ऊर्जा-मास (कार्तिक) अन्य मासों से श्रेष्ठ है।
श्लोक 19 (skanda.2.158.19)
कार्तिकादधिको माघो माघाद्वैशाख उत्तमः । तस्मिन्मासे कृतो धर्मो वर्द्धते वटबीजवत्
kārtikādadhiko māgho māghādvaiśākha uttamaḥ tasminmāse kṛto dharmo varddhate vaṭabījavat
कार्तिक से माघ श्रेष्ठ है और माघ से वैशाख उत्तम है। उस मास में किया गया धर्म वटवृक्ष के बीज की भाँति बढ़ता है।
श्लोक 20 (skanda.2.158.20)
आढ्यो वाऽतिदरिद्रो वा परतंत्रोऽथ वा नरः । यद्वस्तु लभते तेन तद्दातव्यं द्विजातये
āḍhyo vā'tidaridro vā parataṁtro'tha vā naraḥ yadvastu labhate tena taddātavyaṁ dvijātaye
चाहे मनुष्य धनवान् हो, अत्यन्त दरिद्र हो, या परतंत्र हो — उसे जो भी वस्तु प्राप्त हो, उसी से द्विज को दान देना चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.2.158.21)
कन्दमूलफलं शाकं लवणं गुडमेव च । कोलं पत्रं जलं तक्रमानंत्यायोपकल्पते
kandamūlaphalaṁ śākaṁ lavaṇaṁ guḍameva ca kolaṁ patraṁ jalaṁ takramānaṁtyāyopakalpate
कंद, मूल, फल, शाक, नमक, गुड़, बेर, पत्ते, जल और छाछ — इनका दान भी अनंत पुण्य का साधन बन जाता है।
श्लोक 22 (skanda.2.158.22)
नादत्तं लभते क्वापि ब्रह्माद्यैस्त्रिदशैरपि
nādattaṁ labhate kvāpi brahmādyaistridaśairapi
जो दान नहीं किया गया, वह ब्रह्मा आदि देवताओं के द्वारा भी कहीं प्राप्त नहीं किया जा सकता।
श्लोक 23 (skanda.2.158.23)
दानेन हीनो हि भवेदकिंचनो निष्किञ्चनत्वाच्च करोति पापम् । पापादवश्यं नरकं प्रयाति दातव्यमस्मात्सुखमिच्छता तदा
dānena hīno hi bhavedakiṁcano niṣkiñcanatvācca karoti pāpam pāpādavaśyaṁ narakaṁ prayāti dātavyamasmātsukhamicchatā tadā
दान से रहित व्यक्ति निर्धन हो जाता है, निर्धनता के कारण वह पाप करता है, और पाप से अवश्य ही नरक को प्राप्त होता है। इसलिए सुख चाहने वाले को दान अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 24 (skanda.2.158.24)
यथा गृहं सर्वगुणोपपन्नं परिच्छदैर्हीनमशोभनं तथा । मासेषु धर्मः सकलेष्वनुष्ठितो वैशाखहीनस्तु वृथैव याति
yathā gṛhaṁ sarvaguṇopapannaṁ paricchadairhīnamaśobhanaṁ tathā māseṣu dharmaḥ sakaleṣvanuṣṭhito vaiśākhahīnastu vṛthaiva yāti
जैसे समस्त गुणों से सम्पन्न घर भी सामान से रहित होने पर शोभा नहीं देता, वैसे ही समस्त मासों में किया गया धर्म भी वैशाख से रहित होने पर व्यर्थ चला जाता है।
श्लोक 25 (skanda.2.158.25)
यथैव कन्या सकलैश्च लक्षणैर्युक्ताऽपि जीवत्पतिलक्षणा न हि । क्रियाऽपि सांगा सकलाऽपि राजन्वैशाखहीना तु वृथैव तां विदुः
yathaiva kanyā sakalaiśca lakṣaṇairyuktā'pi jīvatpatilakṣaṇā na hi kriyā'pi sāṁgā sakalā'pi rājanvaiśākhahīnā tu vṛthaiva tāṁ viduḥ
जैसे समस्त शुभ लक्षणों से युक्त कन्या भी यदि उसमें जीवित पति का लक्षण न हो तो व्यर्थ है, वैसे ही हे राजन्! समस्त अंगों सहित पूर्ण रीति भी वैशाख से रहित होने पर व्यर्थ ही जानी जाती है।
श्लोक 26 (skanda.2.158.26)
दयाविहीनास्तु यथा गुणा वृथा वैशाखधर्मेण विना तथा क्रियाः । शाकं तु यद्वल्लवणेन हीनं न रोचते सर्वगुणोपपन्नम्
dayāvihīnāstu yathā guṇā vṛthā vaiśākhadharmeṇa vinā tathā kriyāḥ śākaṁ tu yadvallavaṇena hīnaṁ na rocate sarvaguṇopapannam
जैसे दया से रहित गुण व्यर्थ हैं, वैसे ही वैशाख के धर्म के बिना समस्त क्रियाएँ व्यर्थ हैं। और जैसे समस्त गुणों से युक्त शाक भी नमक के बिना नहीं भाता,
श्लोक 27 (skanda.2.158.27)
वैशाखहीनं तु तथैव पुण्यं न साधुसेव्यं न फलाप्तिहेतुः । यद्वन्न भूषासहिताऽपि शोभते वस्त्रेण हीना ललना सुरूपा । क्रियाकलापः सुकृतोऽपि पुंभिर्न भासते तन्मधुमासहीनम्
vaiśākhahīnaṁ tu tathaiva puṇyaṁ na sādhusevyaṁ na phalāptihetuḥ yadvanna bhūṣāsahitā'pi śobhate vastreṇa hīnā lalanā surūpā kriyākalāpaḥ sukṛto'pi puṁbhirna bhāsate tanmadhumāsahīnam
—वैसे ही वैशाख से रहित पुण्य न तो साधुजनों द्वारा सेवनीय है और न फल-प्राप्ति का कारण है। जैसे वस्त्र से रहित सुंदर स्त्री आभूषणों सहित होने पर भी शोभा नहीं पाती, वैसे ही मधुमास (वैशाख) से रहित सुसंपन्न कर्मकांड भी मनुष्यों के समक्ष शोभा नहीं पाता।
श्लोक 28 (skanda.2.158.28)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन येन केनाऽपि जन्तुना । धर्मो वैशाखमासे तु कर्तव्य इति निश्चयः
tasmātsarvaprayatnena yena kenā'pi jantunā dharmo vaiśākhamāse tu kartavya iti niścayaḥ
इसलिए किसी भी प्राणी को समस्त प्रयत्नों से वैशाख मास में धर्म अवश्य करना चाहिए — यह निश्चित सिद्धांत है।
श्लोक 29 (skanda.2.158.29)
मधुसूदनमुद्दिश्य मेषसंस्थे दिवाकरे । प्रातः स्नात्वाऽर्चयद्विष्णुमन्यथा नरकं व्रजेत्
madhusūdanamuddiśya meṣasaṁsthe divākare prātaḥ snātvā'rcayadviṣṇumanyathā narakaṁ vrajet
सूर्य के मेष राशि में रहते हुए मधुसूदन को उद्दिष्ट कर प्रातःकाल स्नान करके विष्णु की पूजा करनी चाहिए, अन्यथा मनुष्य नरक को जाता है।
श्लोक 30 (skanda.2.158.30)
कश्चिन्महीरथो राजा कामासक्तो जितेन्द्रियः । वैशाखस्नानयोगेन वैकुण्ठं गतवान्स्वयम्
kaścinmahīratho rājā kāmāsakto jitendriyaḥ vaiśākhasnānayogena vaikuṇṭhaṁ gatavānsvayam
महीरथ नामक एक राजा, यद्यपि विषय-भोगों में आसक्त था तथापि जितेन्द्रिय था; वह वैशाख-स्नान के प्रताप से स्वयं वैकुण्ठ को प्राप्त हुआ।
श्लोक 31 (skanda.2.158.31)
वैशाखः सफलो मासो मधुसूदनदैवतः । तीर्थयात्रातपोयज्ञदानहोमफलाधिकः
vaiśākhaḥ saphalo māso madhusūdanadaivataḥ tīrthayātrātapoyajñadānahomaphalādhikaḥ
वैशाख सफल मास है, जिसका अधिष्ठाता देव मधुसूदन है; इसका फल तीर्थयात्रा, तप, यज्ञ, दान और होम के फल से भी अधिक है।
श्लोक 32 (skanda.2.158.32)
प्रार्थनामंत्रः । मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ । प्रातः स्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव
prārthanāmaṁtraḥ madhusūdana deveśa vaiśākhe meṣage ravau prātaḥ snānaṁ kariṣyāmi nirvighnaṁ kuru mādhava
[प्रार्थना-मंत्र] हे मधुसूदन! हे देवेश! वैशाख में सूर्य के मेष राशि में रहते हुए मैं प्रातः स्नान करूँगा; हे माधव! इसे निर्विघ्न कीजिए।
श्लोक 33 (skanda.2.158.33)
अर्घ्यमंत्राः । वैशाखे मेषगे भानौ प्रातःस्नानपरायणः । अर्घ्यं तेऽहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन
arghyamaṁtrāḥ vaiśākhe meṣage bhānau prātaḥsnānaparāyaṇaḥ arghyaṁ te'haṁ pradāsyāmi gṛhāṇa madhusūdana
[अर्घ्य-मंत्र] वैशाख में सूर्य के मेष राशि में रहते हुए, प्रातः स्नान में तत्पर होकर, मैं आपको अर्घ्य दूँगा; हे मधुसूदन! इसे ग्रहण कीजिए।
श्लोक 34 (skanda.2.158.34)
गंगाद्याः सरितः सर्वास्तीर्थानि च ह्रदाश्च ये । प्रगृह्णीत मया दत्तमर्घ्यं सम्यक्प्रसीदथ
gaṁgādyāḥ saritaḥ sarvāstīrthāni ca hradāśca ye pragṛhṇīta mayā dattamarghyaṁ samyakprasīdatha
हे गंगा आदि समस्त नदियो, तीर्थो और सरोवरो! मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य ग्रहण करो और सम्यक् रूप से प्रसन्न होओ।
श्लोक 35 (skanda.2.158.35)
ऋषभः पापिनां शास्ता त्वं यमः समदर्शनः । गृहाणार्घ्यं मया दत्तं यथोक्तफलदो भव
ṛṣabhaḥ pāpināṁ śāstā tvaṁ yamaḥ samadarśanaḥ gṛhāṇārghyaṁ mayā dattaṁ yathoktaphalado bhava
आप पापियों के शासक और श्रेष्ठ यम हैं, जो सबको समान दृष्टि से देखते हैं। मेरे द्वारा दिया गया यह अर्घ्य ग्रहण कीजिए और यथोक्त फल प्रदान कीजिए।
श्लोक 36 (skanda.2.158.36)
इति चार्घ्यं समर्प्याथ पश्चात्स्नानं समाचरेत् । वाससी परिधायाथ कृत्वा कर्माणि सर्वशः
iti cārghyaṁ samarpyātha paścātsnānaṁ samācaret vāsasī paridhāyātha kṛtvā karmāṇi sarvaśaḥ
इस प्रकार अर्घ्य समर्पित करके तत्पश्चात् स्नान करना चाहिए। फिर वस्त्र धारण करके समस्त नित्यकर्मों को पूर्ण करके,
श्लोक 37 (skanda.2.158.37)
मधुसूदनमभ्यर्च्य प्रसूनैर्माधवोद्भवैः । श्रुत्वा विष्णुकथां दिव्यामेतन्मासप्रशंसिनीम्
madhusūdanamabhyarcya prasūnairmādhavodbhavaiḥ śrutvā viṣṇukathāṁ divyāmetanmāsapraśaṁsinīm
—माधव-मास में उत्पन्न फूलों से मधुसूदन की पूजा करके, और इस मास की प्रशंसा करने वाली विष्णु-कथा को दिव्य रूप से सुनकर,
श्लोक 38 (skanda.2.158.38)
कोटिजन्मार्जितात्पापान्मुक्तो मोक्षमवाप्नुयात्
koṭijanmārjitātpāpānmukto mokṣamavāpnuyāt
—मनुष्य करोड़ों जन्मों में अर्जित पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
श्लोक 39 (skanda.2.158.39)
न जातु खिद्यते भूमौ न स्वर्गे न रसातले । न गर्भे जायते क्वापि न भूयः स्तनपो भवेत्
na jātu khidyate bhūmau na svarge na rasātale na garbhe jāyate kvāpi na bhūyaḥ stanapo bhavet
वह न कभी पृथ्वी पर, न स्वर्ग में, न पाताल में दुःख पाता है; वह पुनः कहीं गर्भ में जन्म नहीं लेता और न फिर कभी दूध पीने वाला शिशु बनता है।
श्लोक 40 (skanda.2.158.40)
वैशाखे कांस्यभोजी यस्तथा चाश्रुतसत्कथः । न स्नातो नापि दाता च नरकानेव गच्छति
vaiśākhe kāṁsyabhojī yastathā cāśrutasatkathaḥ na snāto nāpi dātā ca narakāneva gacchati
जो वैशाख में कांसे के पात्र में भोजन करता है, जिसने सत्कथा नहीं सुनी, जो न स्नान करता है और न दान देता है, वह नरकों को ही प्राप्त होता है।
श्लोक 41 (skanda.2.158.41)
ब्रह्महत्यासहस्रस्य पापं शाम्येत्कथंचन । वैशाखे येन न स्नातं तत्पापं नैव गच्छति
brahmahatyāsahasrasya pāpaṁ śāmyetkathaṁcana vaiśākhe yena na snātaṁ tatpāpaṁ naiva gacchati
हजार ब्रह्महत्याओं का पाप भी किसी प्रकार शांत हो सकता है, परन्तु वैशाख में स्नान न करने का पाप कभी दूर नहीं होता।
श्लोक 42 (skanda.2.158.42)
स्वाधीनेन स्वकायेन जले स्वातंत्र्य वर्तिनि । स्वाधीनजिह्वयोच्चार्यं हरिरित्यक्षरद्वयम्
svādhīnena svakāyena jale svātaṁtrya vartini svādhīnajihvayoccāryaṁ harirityakṣaradvayam
अपने वश में रहने वाले शरीर के साथ, स्वतंत्र रूप से जल में खड़े होकर, अपने वश में रहने वाली जिह्वा से 'हरि' — इन दो अक्षरों का उच्चारण करना चाहिए।
श्लोक 43 (skanda.2.158.43)
न कुर्याद्यदि वैशाखे प्रातःस्नानं नराधमः । जीवन्नेव स पंचत्वमागतो नात्र संशयः
na kuryādyadi vaiśākhe prātaḥsnānaṁ narādhamaḥ jīvanneva sa paṁcatvamāgato nātra saṁśayaḥ
यदि अधम मनुष्य वैशाख में प्रातःस्नान नहीं करता, तो वह जीवित रहते हुए भी निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त हो चुका माना जाता है।
श्लोक 44 (skanda.2.158.44)
येन केनाप्युपायेन माधवे मधुसूदनम् । नार्चयेद्यदि मूढात्मा शौकरीं योनिमाप्नुयात्
yena kenāpyupāyena mādhave madhusūdanam nārcayedyadi mūḍhātmā śaukarīṁ yonimāpnuyāt
यदि कोई मूढ़ आत्मा किसी भी उपाय से माधव मास में मधुसूदन की पूजा नहीं करता, तो वह सूअरी की योनि प्राप्त करता है।
श्लोक 45 (skanda.2.158.45)
योऽर्चयेत्तुलसीपत्रैर्वैशाखे मधुसूदनम् । नृपो भूत्वा सार्वभौमः कोटिजन्मसु भोगवान् । पश्चात्कोटिकुलैर्युक्तो विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात्
yo'rcayettulasīpatrairvaiśākhe madhusūdanam nṛpo bhūtvā sārvabhaumaḥ koṭijanmasu bhogavān paścātkoṭikulairyukto viṣṇoḥ sāyujyamāpnuyāt
जो वैशाख में तुलसी-पत्रों से मधुसूदन की पूजा करता है, वह करोड़ों जन्मों तक सार्वभौम राजा बनकर समस्त भोगों को भोगता है, और तत्पश्चात् करोड़ों कुलजनों सहित विष्णु का सायुज्य प्राप्त करता है।
श्लोक 46 (skanda.2.158.46)
विविधैर्भक्तिमार्गैश्च विष्णुं सेवेत यौ व्रतैः । सगुणं निर्गुणं वाऽपि नित्यं ध्यायेदनन्यधीः
vividhairbhaktimārgaiśca viṣṇuṁ seveta yau vrataiḥ saguṇaṁ nirguṇaṁ vā'pi nityaṁ dhyāyedananyadhīḥ
मनुष्य को चाहिए कि वह विविध भक्ति-मार्गों और व्रतों से विष्णु की सेवा करे, तथा अनन्य चित्त से सगुण अथवा निर्गुण स्वरूप का सदैव ध्यान करे।