वैष्णव खण्ड · अध्याय 159
वैशाख-श्रेष्ठत्व-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.159.1)
अम्बरीष उवाच । वैशाखः सर्वधर्मेभ्यस्तपोधर्मेभ्य एव च । स कथं सर्वमासेभ्यो दानेभ्योऽप्यधिकोऽभवत्
ambarīṣa uvāca vaiśākhaḥ sarvadharmebhyastapodharmebhya eva ca sa kathaṁ sarvamāsebhyo dānebhyo'pyadhiko'bhavat
अम्बरीष ने कहा— वैशाख समस्त धर्मों से, तपोधर्मों से, समस्त मासों से और दानों से भी किस प्रकार श्रेष्ठ हो गया?
श्लोक 2 (skanda.2.159.2)
नारद उवाच । तद्वक्ष्यामि महाप्राज्ञ शृणु चैकमना भव । कल्पांते देवराड्विष्णुः शेषशायी महाप्रभुः
nārada uvāca tadvakṣyāmi mahāprājña śṛṇu caikamanā bhava kalpāṁte devarāḍviṣṇuḥ śeṣaśāyī mahāprabhuḥ
नारद जी बोले— हे महाप्राज्ञ! मैं वह बताता हूँ, एकाग्र मन से सुनो। कल्प के अंत में देवराज विष्णु, शेषशायी महाप्रभु,
श्लोक 3 (skanda.2.159.3)
कुक्षिस्थ लोकसङ्घोऽयं स शेते प्रलयार्णवे । अनेको ह्येकतां प्राप्य भूतिभिर्योगमायया
kukṣistha lokasaṅgho'yaṁ sa śete pralayārṇave aneko hyekatāṁ prāpya bhūtibhiryogamāyayā
—समस्त लोकों के समूह को अपनी कुक्षि में लिए हुए प्रलय के सागर में शयन करते हैं; अनेक होते हुए भी अपनी योगमाया की विभूतियों से एकता को प्राप्त होकर,
श्लोक 4 (skanda.2.159.4)
निमेषस्यावसाने तु श्रुतिभिर्बोधितस्ततः । कुक्षिस्थजीवसंघानां रक्षां चक्रे दयानिधिः
nimeṣasyāvasāne tu śrutibhirbodhitastataḥ kukṣisthajīvasaṁghānāṁ rakṣāṁ cakre dayānidhiḥ
—तत्पश्चात् उस निमेष (कल्प-रात्रि) के अंत में श्रुतियों द्वारा जगाए जाने पर, दया के सागर उस प्रभु ने अपने उदर में स्थित जीव-समूहों की रक्षा का संकल्प किया।
श्लोक 5 (skanda.2.159.5)
तत्तत्कर्मफलप्राप्त्यै सृष्टिं स्रष्टुं मनो दधे । तस्य नाभेरभूत्पद्म सौवर्णं भुवनाश्रयम्
tattatkarmaphalaprāptyai sṛṣṭiṁ sraṣṭuṁ mano dadhe tasya nābherabhūtpadma sauvarṇaṁ bhuvanāśrayam
उन-उन जीवों को उनके कर्मों का फल दिलाने के लिए उन्होंने सृष्टि रचने का संकल्प किया। उनकी नाभि से सुवर्णमय, लोकों का आश्रयभूत कमल प्रकट हुआ।
श्लोक 6 (skanda.2.159.6)
ब्रह्माणं जनयामास वैराजं पुरुषाह्वयम् । तस्मिन्ससर्ज भगवान्भुवनानि चतुर्दश
brahmāṇaṁ janayāmāsa vairājaṁ puruṣāhvayam tasminsasarja bhagavānbhuvanāni caturdaśa
उस कमल से उन्होंने विराट पुरुष नाम वाले ब्रह्मा को उत्पन्न किया; उसी में भगवान् ने चौदह लोकों की रचना की।
श्लोक 7 (skanda.2.159.7)
भिन्नकर्माशयान्प्राणिसङ्घांश्च विविधान्बहून् । त्रिगुणान्प्रकृतिं लोके मर्यादाश्चाधिपांस्तथा
bhinnakarmāśayānprāṇisaṅghāṁśca vividhānbahūn triguṇānprakṛtiṁ loke maryādāścādhipāṁstathā
—तथा भिन्न-भिन्न कर्माशय वाले नाना प्रकार के अनेक प्राणि-समूहों को, त्रिगुणमयी प्रकृति को लोक में, मर्यादाओं को और उनके अधिपतियों को भी रचा।
श्लोक 8 (skanda.2.159.8)
वर्णाश्रमविभागांश्च धर्मक्लृप्तिं च सोऽकरोत् । वेदैश्चतुर्भिस्तत्रैश्च सहितान्स्मृतिभिस्तथा
varṇāśramavibhāgāṁśca dharmaklṛptiṁ ca so'karot vedaiścaturbhistatraiśca sahitānsmṛtibhistathā
उन्होंने वर्ण और आश्रम के विभागों की तथा धर्म की व्यवस्था की, साथ ही चारों वेदों और स्मृतियों की भी रचना की,
श्लोक 9 (skanda.2.159.9)
पुराणैरितिहासैश्च स्वाज्ञारूपैर्महेश्वरः । ऋषीन्प्रवर्तकांश्चक्रे धर्मगुप्त्यै महाप्रभुः
purāṇairitihāsaiśca svājñārūpairmaheśvaraḥ ṛṣīnpravartakāṁścakre dharmaguptyai mahāprabhuḥ
—पुराणों और इतिहासों सहित, जो उन्हीं के आज्ञा-स्वरूप हैं। उन महाप्रभु महेश्वर ने धर्म की रक्षा के लिए ऋषियों को इन सबका प्रवर्तक बनाया।
श्लोक 10 (skanda.2.159.10)
तैः प्रवर्तितधर्मास्तु वर्णाश्रमविभागजाः । प्रजाः श्रद्दधिरे सर्वाः स्वोचितान्विष्णुतोषदान्
taiḥ pravartitadharmāstu varṇāśramavibhāgajāḥ prajāḥ śraddadhire sarvāḥ svocitānviṣṇutoṣadān
उन ऋषियों द्वारा प्रवर्तित, वर्ण और आश्रम के विभागों से उत्पन्न, अपने-अपने अनुकूल तथा विष्णु को संतुष्ट करने वाले धर्मों पर समस्त प्रजाओं ने श्रद्धा की।
श्लोक 11 (skanda.2.159.11)
तांस्तु प्रवर्तमानांस्तु स्वाश्रमान्द्रष्टुमीश्वरः । हृदिस्थोऽप्यव्ययः साक्षाद्विभीषार्थं परीक्षया
tāṁstu pravartamānāṁstu svāśramāndraṣṭumīśvaraḥ hṛdistho'pyavyayaḥ sākṣādvibhīṣārthaṁ parīkṣayā
अपने-अपने आश्रम-धर्मों में प्रवृत्त उन प्रजाओं को देखने के लिए, हृदय में स्थित होते हुए भी वे अविनाशी ईश्वर परीक्षा द्वारा उनमें भय उत्पन्न करने हेतु स्वयं प्रकट हुए —
श्लोक 12 (skanda.2.159.12)
अनूनान्कुशलान्यत्र धर्मान्कुर्वंति वै प्रजाः । स कालः को भवेद्विद्वानिति सर्चितयत्प्रभुः
anūnānkuśalānyatra dharmānkurvaṁti vai prajāḥ sa kālaḥ ko bhavedvidvāniti sarcitayatprabhuḥ
—(यह सोचते हुए कि) किस काल में प्रजाएँ अपने धर्मों का पूर्ण और कुशलतापूर्वक पालन करती हैं — वह काल कौन-सा होगा? इस प्रकार उन विद्वान् प्रभु ने विचार किया।
श्लोक 13 (skanda.2.159.13)
वर्षाकालो मया सृष्टः सीदंत्यस्ता इमाः प्रजाः । तत्रानूनान्न कुर्वंति धर्मान्पंकाद्युपद्रुताः
varṣākālo mayā sṛṣṭaḥ sīdaṁtyastā imāḥ prajāḥ tatrānūnānna kurvaṁti dharmānpaṁkādyupadrutāḥ
(उन्होंने सोचा—) 'वर्षा ऋतु मेरे द्वारा रची गई है; उसमें ये प्रजाएँ पीड़ित रहती हैं। वहाँ कीचड़ आदि से त्रस्त होकर वे धर्मों का पूर्ण रूप से पालन नहीं करतीं।'
श्लोक 14 (skanda.2.159.14)
तान्दृष्ट्वा कोप एव स्यात्तेषु तुष्टिर्न मे भवेत् । मयेक्षिता न सीदंतु तस्मात्तानवलोकये
tāndṛṣṭvā kopa eva syātteṣu tuṣṭirna me bhavet mayekṣitā na sīdaṁtu tasmāttānavalokaye
'उन्हें देखकर मुझे केवल क्रोध ही होगा, संतोष नहीं होगा। मेरे द्वारा देखे गए लोग कष्ट में न पड़ें, इसलिए मैं उस समय उन्हें नहीं देखूँगा।'
श्लोक 15 (skanda.2.159.15)
शरद्यपि तथा पूर्तिः कर्षणान्नैव जायते । केचित्पक्वफलासक्ताः केचिद्वृष्टिभिरर्दिताः
śaradyapi tathā pūrtiḥ karṣaṇānnaiva jāyate kecitpakvaphalāsaktāḥ kecidvṛṣṭibhirarditāḥ
'शरद ऋतु में भी खेती-बाड़ी के कारण पूर्णता नहीं आती। कोई पके फलों के संग्रह में लगे रहते हैं, कोई वर्षा से पीड़ित रहते हैं,'
श्लोक 16 (skanda.2.159.16)
केचिच्छीतार्दिताश्चैव तान्दृष्ट्वा रोष एव मे । वैगुण्यं पश्यतश्चैव न मे तोषोऽभिजायते
kecicchītārditāścaiva tāndṛṣṭvā roṣa eva me vaiguṇyaṁ paśyataścaiva na me toṣo'bhijāyate
'और कोई ठंड से पीड़ित रहते हैं — उन्हें देखकर मुझे केवल कोप ही होगा। उनकी त्रुटियों को देखते हुए मुझे संतोष उत्पन्न नहीं होगा।'
श्लोक 17 (skanda.2.159.17)
उत्थापनं तु नेच्छंति प्रातर्हेमंत आगते । कोपो मेऽनुत्थितान्दृष्ट्वा प्रातः सूर्योदये सति
utthāpanaṁ tu necchaṁti prātarhemaṁta āgate kopo me'nutthitāndṛṣṭvā prātaḥ sūryodaye sati
'हेमंत ऋतु के आने पर वे प्रातःकाल उठना नहीं चाहते। सूर्योदय हो जाने पर भी उन्हें न उठा हुआ देखकर मुझे क्रोध होगा।'
श्लोक 18 (skanda.2.159.18)
शिशिरेऽपि तथैवार्ताः प्रातःकाल इमाः प्रजाः । तथा पक्वफलादानाशक्ता ह्यनिशमंजसा
śiśire'pi tathaivārtāḥ prātaḥkāla imāḥ prajāḥ tathā pakvaphalādānāśaktā hyaniśamaṁjasā
'शिशिर ऋतु में भी ये प्रजाएँ प्रातःकाल इसी प्रकार पीड़ित रहती हैं, और रात-दिन पके फल जुटाने में असमर्थ रहती हैं।'
श्लोक 19 (skanda.2.159.19)
पुनः शीतार्दिताः प्रातःस्नानार्थमिति चिंतिताः । तेषां तु कर्मलोपः स्यान्नैव पूर्तिः कथंचन
punaḥ śītārditāḥ prātaḥsnānārthamiti ciṁtitāḥ teṣāṁ tu karmalopaḥ syānnaiva pūrtiḥ kathaṁcana
'ठंड से पीड़ित रहते हुए वे प्रातः स्नान के विषय में चिंतित रहते हैं — उनके कर्म में लोप होगा ही, किसी भी प्रकार पूर्णता नहीं आएगी।'
श्लोक 20 (skanda.2.159.20)
प्रेक्षायाः समयो नाऽयमिति चिंताऽऽकुलो विभुः । वसंत समयं मेने सर्वापत्तिनिवारकम्
prekṣāyāḥ samayo nā'yamiti ciṁtā''kulo vibhuḥ vasaṁta samayaṁ mene sarvāpattinivārakam
'यह परीक्षा का समय नहीं है' — इस प्रकार चिंता से व्याकुल हुए उन सर्वव्यापी प्रभु ने वसंत ऋतु को समस्त विपत्तियों को दूर करने वाला समय माना।
श्लोक 21 (skanda.2.159.21)
स्नाने दाने तथा यागे क्रियायां भोग एव च । नानाधर्मविधाने च ह्यनुकूलस्त्वयं ह्यृतुः
snāne dāne tathā yāge kriyāyāṁ bhoga eva ca nānādharmavidhāne ca hyanukūlastvayaṁ hyṛtuḥ
(उन्होंने विचार किया—) 'स्नान, दान, यज्ञ, अन्य क्रियाओं, भोग तथा नाना धर्मों के विधान के लिए यही ऋतु सर्वथा अनुकूल है।'
श्लोक 22 (skanda.2.159.22)
अप्रयासेन लभ्यानि द्रव्याण्यसुभृतां धुवम् । येन केनापि द्रव्येण तुष्टिस्तनुभृतां भवेत्
aprayāsena labhyāni dravyāṇyasubhṛtāṁ dhuvam yena kenāpi dravyeṇa tuṣṭistanubhṛtāṁ bhavet
'इसमें प्राणियों को साधन-सामग्री बिना प्रयास के ही निश्चय ही सुलभ हो जाती है; किसी भी वस्तु से देहधारियों को संतोष प्राप्त हो जाता है।'
श्लोक 23 (skanda.2.159.23)
विष्णोराधारभूतानां तद्द्रव्यं धर्मसाधनम् । वसंते सकलं द्रव्यं प्राणिनां तु सुखावहम्
viṣṇorādhārabhūtānāṁ taddravyaṁ dharmasādhanam vasaṁte sakalaṁ dravyaṁ prāṇināṁ tu sukhāvaham
'विष्णु का आश्रय लेने वालों के लिए वह वस्तु धर्म का साधन बन जाती है। वसंत में समस्त वस्तुएँ प्राणियों के लिए सुखदायी होती हैं,'
श्लोक 24 (skanda.2.159.24)
दानयोग्यं धर्मयोग्यं भोगयोग्यं तु सर्वशः । निर्धनानां तु पङ्वादि विकलानां महात्मनाम्
dānayogyaṁ dharmayogyaṁ bhogayogyaṁ tu sarvaśaḥ nirdhanānāṁ tu paṅvādi vikalānāṁ mahātmanām
'—वे दान के योग्य, धर्म के योग्य और सब प्रकार से भोग के योग्य होती हैं। निर्धनों, लंगड़ों, विकलांगों और महात्माओं के लिए भी'
श्लोक 25 (skanda.2.159.25)
द्रव्याणि च सुलभ्यानि जलादीनि न संशयः । द्रव्यैरेतैः स्वात्महितं धर्मं कुर्वंति मत्प्रियाः
dravyāṇi ca sulabhyāni jalādīni na saṁśayaḥ dravyairetaiḥ svātmahitaṁ dharmaṁ kurvaṁti matpriyāḥ
'—जल आदि वस्तुएँ निःसंदेह सुलभ रहती हैं। इन्हीं वस्तुओं से मुझे प्रिय लोग अपने ही हित के लिए धर्म का आचरण करते हैं —'
श्लोक 26 (skanda.2.159.26)
पत्रैः पुष्पैः फलैरन्यैः शाकैश्चापि प्रियोक्तिभिः । स्रक्तांबूलैश्चन्दनाद्यैः पादप्रक्षालनादिभिः
patraiḥ puṣpaiḥ phalairanyaiḥ śākaiścāpi priyoktibhiḥ sraktāṁbūlaiścandanādyaiḥ pādaprakṣālanādibhiḥ
'—पत्तों, फूलों, फलों, शाकों तथा प्रिय वचनों से, मालाओं, ताम्बूल, चन्दन आदि से, तथा चरण-प्रक्षालन आदि से,'
श्लोक 27 (skanda.2.159.27)
प्रश्रयाद्यैरहो तेषां वरदोऽहमितीरयन् । संचिंत्य भगवान्विष्णुः प्रतस्थे रमया सह
praśrayādyairaho teṣāṁ varado'hamitīrayan saṁciṁtya bhagavānviṣṇuḥ pratasthe ramayā saha
'—और विनय आदि से (जो मेरी पूजा करते हैं) — अहो! उनके लिए मैं वरदाता हूँ' — ऐसा विचार और उद्घोष करके भगवान् विष्णु लक्ष्मी के साथ यात्रा पर निकल पड़े।
श्लोक 28 (skanda.2.159.28)
वनानि सर्वतः पश्यन्विकसत्कुसुमानि च । हृष्टपुष्टजनाकीर्णं मत्तालिद्विजसेवितम्
vanāni sarvataḥ paśyanvikasatkusumāni ca hṛṣṭapuṣṭajanākīrṇaṁ mattālidvijasevitam
वे चारों ओर खिले हुए फूलों से युक्त वनों को, हर्षित एवं पुष्ट लोगों से भरे हुए, मतवाले भ्रमरों और पक्षियों से सेवित प्रदेश को देखते हुए चले,
श्लोक 29 (skanda.2.159.29)
आश्रमाणां महार्हाणां वनग्रामनिवासिनाम् । प्रांगणादीनि रम्याणि ह्युद्यानानि स्थलानि च
āśramāṇāṁ mahārhāṇāṁ vanagrāmanivāsinām prāṁgaṇādīni ramyāṇi hyudyānāni sthalāni ca
—तथा वनग्रामों में रहने वाले, पूजनीय आश्रमों के सुंदर आँगनों, उद्यानों और स्थलों को देखते हुए,
श्लोक 30 (skanda.2.159.30)
रमायै दर्शयन्विष्णुः सह देवैर्मुनीश्वरैः । सिद्धचारणगन्धर्वकिन्नरोरगराक्षसैः
ramāyai darśayanviṣṇuḥ saha devairmunīśvaraiḥ siddhacāraṇagandharvakinnaroragarākṣasaiḥ
—विष्णु ने देवताओं, मुनीश्वरों, सिद्धों, चारणों, गंधर्वों, किन्नरों, नागों और राक्षसों के साथ, यह सब लक्ष्मी को दिखाया।
श्लोक 31 (skanda.2.159.31)
स्तूयमानोऽभ्यगाद्गेहान्वर्णाश्रमनिवासिनाम् । मीनादिकर्कटांतं वै स तिष्ठन्रमया सुरैः
stūyamāno'bhyagādgehānvarṇāśramanivāsinām mīnādikarkaṭāṁtaṁ vai sa tiṣṭhanramayā suraiḥ
—स्तुति किए जाते हुए वे वर्ण-आश्रम में रहने वाले लोगों के घरों में गए। मीन राशि से लेकर कर्क राशि के अंत तक वे लक्ष्मी और देवताओं के साथ वहाँ ठहरे रहे,
श्लोक 32 (skanda.2.159.32)
सार्द्धं प्रतीक्ष्य पुरुषान्कृताकृत सपर्यया । तत्र धर्मवतां पुंसां ददातीष्टान्मनोरथान्
sārddhaṁ pratīkṣya puruṣānkṛtākṛta saparyayā tatra dharmavatāṁ puṁsāṁ dadātīṣṭānmanorathān
—यह देखने की प्रतीक्षा करते हुए कि लोगों ने पूजा की है या नहीं। वहाँ वे धर्मपरायण पुरुषों को उनके इच्छित मनोरथ प्रदान करते हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.159.33)
मत्तान्न सहते पुंसो हरत्यायुर्धनादिकम् । यदि कुर्वंति वैशाखे सपर्या परमात्मनः
mattānna sahate puṁso haratyāyurdhanādikam yadi kurvaṁti vaiśākhe saparyā paramātmanaḥ
वे उन्मत्त (उपेक्षा करने वाले) पुरुषों को सहन नहीं करते और उनकी आयु, धन आदि हर लेते हैं — जब तक कि वे वैशाख में परमात्मा की पूजा नहीं करते।
श्लोक 34 (skanda.2.159.34)
तत्रापि चलमूर्तीनां साधूनां यत्र वै विभुः । मासेवन्येषु यज्जातं कर्मलोपं सहिष्यति
tatrāpi calamūrtīnāṁ sādhūnāṁ yatra vai vibhuḥ māsevanyeṣu yajjātaṁ karmalopaṁ sahiṣyati
वहाँ भी, साधु पुरुषों की चल-मूर्तियों के समक्ष जहाँ भी वे सर्वव्यापी प्रभु विराजमान हैं, अन्य मासों में हुए कर्म-लोप को वे सहन कर लेंगे (क्षमा कर देंगे)।
श्लोक 35 (skanda.2.159.35)
यथा देशागतं भूपं दृष्ट्वा जानपदाः प्रजाः । यदि तं चोपतिष्ठन्ति प्रश्रयाद्यैर्महार्हणैः
yathā deśāgataṁ bhūpaṁ dṛṣṭvā jānapadāḥ prajāḥ yadi taṁ copatiṣṭhanti praśrayādyairmahārhaṇaiḥ
जैसे अपने प्रदेश में आए हुए राजा को देखकर यदि जनपद की प्रजाएँ विनय आदि के साथ महान सम्मान से उसकी सेवा में उपस्थित होती हैं,
श्लोक 36 (skanda.2.159.36)
तदा करादिकं न्यूनं पूर्णं जानाति पार्थिवः । पुनरप्यधिकं चेष्टं तुष्टो दास्यति निश्चितम्
tadā karādikaṁ nyūnaṁ pūrṇaṁ jānāti pārthivaḥ punarapyadhikaṁ ceṣṭaṁ tuṣṭo dāsyati niścitam
—तो राजा उनके कर या भेंट में हुई कमी को भी पूर्ण मान लेता है, और प्रसन्न होकर निश्चय ही उन्हें पुनः और भी अधिक इच्छित वस्तुएँ देगा।
श्लोक 37 (skanda.2.159.37)
तदा त्वकृतपूजानां दण्डं तेषां करोति च । तथा विष्णुः स्वकीयानां वैशाखे माधवागमे
tadā tvakṛtapūjānāṁ daṇḍaṁ teṣāṁ karoti ca tathā viṣṇuḥ svakīyānāṁ vaiśākhe mādhavāgame
किंतु जिन्होंने उसकी पूजा-सेवा नहीं की, उन्हें वह दंड भी देता है। उसी प्रकार विष्णु भी अपने भक्तों के प्रति, वैशाख में माधव के आगमन पर,
श्लोक 38 (skanda.2.159.38)
सपर्यां कुर्वतां पुंसां ददातीष्टान्मनोरथान् । अकुर्वतां तथा पुंसां धनादीनि हरत्यलम्
saparyāṁ kurvatāṁ puṁsāṁ dadātīṣṭānmanorathān akurvatāṁ tathā puṁsāṁ dhanādīni haratyalam
—पूजा करने वाले पुरुषों को उनके इच्छित मनोरथ प्रदान करते हैं, और न करने वाले पुरुषों का धन आदि पूर्णतः हर लेते हैं।
श्लोक 39 (skanda.2.159.39)
धर्मगोप्तुर्महाविष्णोर्देवदेवस्य शार्ङ्गिणः । परीक्षाकाल एवाऽयं तस्मान्मासोत्तमो ह्ययम्
dharmagopturmahāviṣṇordevadevasya śārṅgiṇaḥ parīkṣākāla evā'yaṁ tasmānmāsottamo hyayam
धर्म के रक्षक, देवाधिदेव, शार्ङ्गधारी महाविष्णु की यह परीक्षा का समय ही है — इसीलिए यह मास सबसे श्रेष्ठ है।