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वैष्णव खण्ड · अध्याय 160

गृहगोधिका-आख्यान

अध्याय 159अध्याय-सूचीअध्याय 161

श्लोक 1 (skanda.2.160.1)

नारद उवाच । वैशाखेऽध्वगतप्तानां तृषार्तानां महीपते । जलदानमकुर्वाणस्तिर्शयोनिमवाप्नुयात्

nārada uvāca vaiśākhe'dhvagataptānāṁ tṛṣārtānāṁ mahīpate jaladānamakurvāṇastirśayonimavāpnuyāt

नारद जी बोले— हे महीपते! वैशाख में मार्ग की गर्मी से संतप्त और प्यास से पीड़ित लोगों को जो जल-दान नहीं करता, वह पशु-योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 2 (skanda.2.160.2)

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विप्रस्य गृहगोधायाः संवादं परमाद्भुतम्

atraivodāharantīmamitihāsaṁ purātanam viprasya gṛhagodhāyāḥ saṁvādaṁ paramādbhutam

इस विषय में यह अत्यन्त अद्भुत प्राचीन इतिहास कहा जाता है — एक ब्राह्मण और घर की गोह (छिपकली) के बीच हुए संवाद का।

श्लोक 3 (skanda.2.160.3)

पुरा चेक्ष्वाकुवंशेऽभूद्धेमांग इति भूमिपः । ब्रह्मण्यश्च वदान्यश्च जितामित्रो जितेन्द्रियः

purā cekṣvākuvaṁśe'bhūddhemāṁga iti bhūmipaḥ brahmaṇyaśca vadānyaśca jitāmitro jitendriyaḥ

प्राचीन काल में इक्ष्वाकु वंश में हेमांग नामक एक राजा हुआ, जो ब्राह्मणभक्त, उदार, शत्रुओं पर विजयी और जितेन्द्रिय था।

श्लोक 4 (skanda.2.160.4)

यावत्यो भूमिकणिका यावन्तो जलबिंदवः । यावन्त्युडूनि गगने तावतीरददात्स गाः

yāvatyo bhūmikaṇikā yāvanto jalabiṁdavaḥ yāvantyuḍūni gagane tāvatīradadātsa gāḥ

पृथ्वी के जितने कण हैं, जल की जितनी बूँदें हैं और आकाश में जितने तारे हैं, उतनी ही गौएँ उसने दान में दीं।

श्लोक 5 (skanda.2.160.5)

येनेष्टयज्ञदर्भैश्च भूमिर्बर्हिष्मती शुभा । गोभूतिलहिरण्याद्यैस्तोषिता बहवो द्विजाः

yeneṣṭayajñadarbhaiśca bhūmirbarhiṣmatī śubhā gobhūtilahiraṇyādyaistoṣitā bahavo dvijāḥ

उसके द्वारा यज्ञों और कुशाओं से पृथ्वी शुभ एवं बर्हिष्मती बनाई गई; गौ, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि से अनेक द्विज संतुष्ट किए गए।

श्लोक 6 (skanda.2.160.6)

तेनादत्तानि दानानि न विद्यन्त इति श्रुतम् । तेनादत्तं जलं चैकं सुखलभ्यधिया नृप

tenādattāni dānāni na vidyanta iti śrutam tenādattaṁ jalaṁ caikaṁ sukhalabhyadhiyā nṛpa

ऐसा सुना जाता है कि उसके द्वारा न दिया गया कोई दान शेष नहीं था — केवल एक जल का ही दान उसने नहीं दिया, हे नृप! यह सोचकर कि यह तो सहज ही उपलब्ध है।

श्लोक 7 (skanda.2.160.7)

बोधितो ब्रह्मपुत्रेण वसिष्ठेन महात्मना । अमौल्यं सर्वतो लभ्यं तद्दाता किं फलं लभेत्

bodhito brahmaputreṇa vasiṣṭhena mahātmanā amaulyaṁ sarvato labhyaṁ taddātā kiṁ phalaṁ labhet

ब्रह्मा के पुत्र महात्मा वसिष्ठ द्वारा समझाए जाने पर भी उसने सोचा — 'जो वस्तु मूल्यरहित है और सर्वत्र उपलब्ध है, उसके दाता को क्या फल मिलेगा?'

श्लोक 8 (skanda.2.160.8)

दुर्बुद्ध्या हेतुवादैश्च न जलं दत्तवान्द्विजे । अलभ्यदाने पुण्यं स्यादिति वाक्यं सुयुक्तिमत्

durbuddhyā hetuvādaiśca na jalaṁ dattavāndvije alabhyadāne puṇyaṁ syāditi vākyaṁ suyuktimat

इस दुर्बुद्धि और तर्क-वितर्क से उसने द्विजों को जल नहीं दिया, यह सोचकर कि जो वस्तु दुर्लभ हो, उसी का दान पुण्यकारक होता है — यह विचार उसे युक्तिसंगत प्रतीत हुआ।

श्लोक 9 (skanda.2.160.9)

स आनर्च द्विजान्व्यङ्गान्दरिद्रान्वृत्तिकर्शितान् । नार्चयच्छ्रोत्रियान्विप्रांस्तत्त्वज्ञान्ब्रह्मवादिनः

sa ānarca dvijānvyaṅgāndaridrānvṛttikarśitān nārcayacchrotriyānviprāṁstattvajñānbrahmavādinaḥ

वह विकलांग, दरिद्र और आजीविका से क्षीण द्विजों का सम्मान करता था, परन्तु तत्त्वज्ञ और ब्रह्मवादी वेदपाठी ब्राह्मणों का सम्मान नहीं करता था —

श्लोक 10 (skanda.2.160.10)

प्रख्यातान्पूजयिष्यंति सर्वे लोका महार्हणाः । अनाथानामविद्यानां व्यंगानां च द्विजन्मनाम्

prakhyātānpūjayiṣyaṁti sarve lokā mahārhaṇāḥ anāthānāmavidyānāṁ vyaṁgānāṁ ca dvijanmanām

—यह सोचकर कि प्रसिद्ध और अत्यन्त पूजनीय व्यक्तियों की पूजा तो समस्त लोग करेंगे ही; परन्तु अनाथ, अशिक्षित और विकलांग द्विजों की—

श्लोक 11 (skanda.2.160.11)

दरिद्राणां गतिः का वा तस्मात्ते मे दयास्पदम् । इति दुर्धीरपात्रेषु दत्तवान्किमपि स्वयम्

daridrāṇāṁ gatiḥ kā vā tasmātte me dayāspadam iti durdhīrapātreṣu dattavānkimapi svayam

—और दरिद्रों की और क्या गति है? इसलिए वे ही मेरी दया के पात्र हैं — इस दुर्बुद्धि से उसने स्वयं अपात्रों को ही कुछ-न-कुछ दान दिया।

श्लोक 12 (skanda.2.160.12)

तेन दोषेण महता चातकत्वं त्रिजन्मसु । एकजन्मनि गृध्रत्वं श्वाऽभवत्सप्तजन्मसु

tena doṣeṇa mahatā cātakatvaṁ trijanmasu ekajanmani gṛdhratvaṁ śvā'bhavatsaptajanmasu

उस महान् दोष के कारण वह तीन जन्मों तक चातक पक्षी, एक जन्म में गीध, और सात जन्मों तक कुत्ता बना।

श्लोक 13 (skanda.2.160.13)

पश्चान्नृपगृहे जातो भूपोऽयं गृहगोधिका । श्रुतकीर्त्याख्यभूपस्य मिथिलाधिपतेर्नृप

paścānnṛpagṛhe jāto bhūpo'yaṁ gṛhagodhikā śrutakīrtyākhyabhūpasya mithilādhipaternṛpa

तत्पश्चात् यह राजा मिथिला के अधिपति श्रुतकीर्ति नामक राजा के घर में घर की गोह (छिपकली) बनकर उत्पन्न हुआ, हे नृप!

श्लोक 14 (skanda.2.160.14)

गृहद्वारप्रतोल्यां च वर्तते कीटकाशना । सप्ताशीतिषु वर्षेषु स्थितं तेन दुरात्मना

gṛhadvārapratolyāṁ ca vartate kīṭakāśanā saptāśītiṣu varṣeṣu sthitaṁ tena durātmanā

वह घर के मुख्य द्वार पर रहती हुई कीड़े-मकोड़े खाकर जीवित रहती थी; उस दुरात्मा ने सत्तासी वर्षों तक वहीं वास किया।

श्लोक 15 (skanda.2.160.15)

विदेहाधिपतेर्गेहे कदाचिदृषिसत्तमः । श्रुतदेव इति ख्यातः श्रौतो मध्याह्न आगतः

videhādhipatergehe kadācidṛṣisattamaḥ śrutadeva iti khyātaḥ śrauto madhyāhna āgataḥ

एक बार विदेह के राजा के घर श्रुतदेव नाम से विख्यात, वेदज्ञ, श्रेष्ठ ऋषि मध्याह्न के समय पधारे।

श्लोक 16 (skanda.2.160.16)

तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय जातहर्षो नराधिपः । मधुपर्कादिभिः पूज्य तस्य पादावनेजनीः

taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya jātaharṣo narādhipaḥ madhuparkādibhiḥ pūjya tasya pādāvanejanīḥ

उन्हें देखकर राजा तुरंत उठ खड़ा हुआ, हर्ष से भर गया; मधुपर्क आदि से उनका सम्मान करके उनके चरण धोने के लिए जल तैयार किया,

श्लोक 17 (skanda.2.160.17)

अपो मूर्ध्ना वहन्क्षिप्रं तदोत्सिक्तैश्च बिंदुभिः । दैवोपदिष्टकालेन प्रोक्षिता गृहगोधिका

apo mūrdhnā vahankṣipraṁ tadotsiktaiśca biṁdubhiḥ daivopadiṣṭakālena prokṣitā gṛhagodhikā

—और उस जल को शीघ्रता से अपने सिर पर धारण किया; उछले हुए कुछ बूँदों से, दैव के संकेतित समय पर, वह घर की गोह भीग गई।

श्लोक 18 (skanda.2.160.18)

सद्यो जातस्मृतिरभूत्स्मृतकर्मादिदुःखिता । त्राहित्राहीति चुक्रोश ब्राह्मणं गृहमागतम्

sadyo jātasmṛtirabhūtsmṛtakarmādiduḥkhitā trāhitrāhīti cukrośa brāhmaṇaṁ gṛhamāgatam

उसे तत्काल पूर्वजन्म की स्मृति हो आई; अपने पूर्वकृत कर्मों को स्मरण करके दुःखी होकर वह घर आए हुए ब्राह्मण से 'बचाओ, बचाओ' पुकार उठी।

श्लोक 19 (skanda.2.160.19)

तिर्यग्जंतुरवं श्रुत्वा ब्राह्मणो विस्मितोऽवदत् । कुतः क्रोशसि गोधे त्वं दशेयं केन कर्मणा

tiryagjaṁturavaṁ śrutvā brāhmaṇo vismito'vadat kutaḥ krośasi godhe tvaṁ daśeyaṁ kena karmaṇā

उस पशु-प्राणी का चीत्कार सुनकर आश्चर्यचकित ब्राह्मण ने कहा — 'हे गोह! तू क्यों पुकार रही है? किस कर्म से तुझे यह दशा प्राप्त हुई है?'

श्लोक 20 (skanda.2.160.20)

त्वं देवः पुरुषः कश्चिन्नृपो वाऽथ द्विजोऽथ वा । कस्त्वं ब्रूहि महाभाग त्वामद्याहं समुद्धरे

tvaṁ devaḥ puruṣaḥ kaścinnṛpo vā'tha dvijo'tha vā kastvaṁ brūhi mahābhāga tvāmadyāhaṁ samuddhare

'क्या तू कोई देवता है, कोई मनुष्य है, राजा है, या द्विज है? तू कौन है, बता, हे महाभाग! आज मैं तेरा उद्धार करूँगा।'

श्लोक 21 (skanda.2.160.21)

इत्युक्तः स नृपः प्राह श्रुतदेवं महामतिम् । अहमिक्ष्वाकुकुलजो वेदशास्त्रविशारदः

ityuktaḥ sa nṛpaḥ prāha śrutadevaṁ mahāmatim ahamikṣvākukulajo vedaśāstraviśāradaḥ

ऐसा पूछे जाने पर उस (पूर्व) राजा ने महामति श्रुतदेव से कहा — 'मैं इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न, वेद-शास्त्रों में निपुण था।'

श्लोक 22 (skanda.2.160.22)

यावत्यो भूमिकणिका यावन्तस्तोयबिंदवः । यावंत्युडूनि गगने तावतीरददं स्म गाः

yāvatyo bhūmikaṇikā yāvantastoyabiṁdavaḥ yāvaṁtyuḍūni gagane tāvatīradadaṁ sma gāḥ

'पृथ्वी के जितने कण हैं, जितनी जल की बूँदें हैं और आकाश में जितने तारे हैं, उतनी ही गौएँ मैंने दान में दी थीं।'

श्लोक 23 (skanda.2.160.23)

सर्वे यज्ञा मया चेष्टाः पूर्तान्याचरितानि मे । दानन्यपि च दत्तानि धर्मराजस्त्वनुष्ठितः

sarve yajñā mayā ceṣṭāḥ pūrtānyācaritāni me dānanyapi ca dattāni dharmarājastvanuṣṭhitaḥ

'मैंने समस्त यज्ञ किए, पूर्त-कर्म किए, दान भी दिए, और धर्मराज के समान आचरण किया।'

श्लोक 24 (skanda.2.160.24)

तथापि दुर्गतिर्जाता मम चोर्ध्वगतिं विना । त्रिवारं चातकत्वं मे गृध्रत्वं चैकजन्मनि

tathāpi durgatirjātā mama cordhvagatiṁ vinā trivāraṁ cātakatvaṁ me gṛdhratvaṁ caikajanmani

'फिर भी मुझे उच्च गति के बदले दुर्गति ही प्राप्त हुई — तीन बार मैं चातक बना और एक जन्म में गीध बना,'

श्लोक 25 (skanda.2.160.25)

सप्तजन्मस्वलर्कत्वं प्राप्तं पूर्वं मया द्विज । सिंचताऽनेन भूपेन त्वपः पादावनेजनीः

saptajanmasvalarkatvaṁ prāptaṁ pūrvaṁ mayā dvija siṁcatā'nena bhūpena tvapaḥ pādāvanejanīḥ

'—और इससे पहले सात जन्मों तक कुत्ते की योनि प्राप्त की, हे द्विज! अभी जब इस राजा ने पाद-प्रक्षालन का जल छिड़का,'

श्लोक 26 (skanda.2.160.26)

बिंदवो दूरमुत्क्षिप्तास्तैः सिक्तोऽहं कथंचन । तेन जन्मस्मृतिरभूत्सर्वपाप्मा हतश्च मे

biṁdavo dūramutkṣiptāstaiḥ sikto'haṁ kathaṁcana tena janmasmṛtirabhūtsarvapāpmā hataśca me

'—बूँदें दूर तक उछलीं और उनसे मैं किसी प्रकार भीग गया; उससे मुझे जन्म-स्मृति हो आई और मेरा समस्त पाप नष्ट हो गया।'

श्लोक 27 (skanda.2.160.27)

गोधा जन्मानि भाव्यानि ह्यष्टाविंशतिकानि मे । दृश्यन्ते दैवसृष्टानि बिभ्ये तैर्जन्मभिर्भृशम्

godhā janmāni bhāvyāni hyaṣṭāviṁśatikāni me dṛśyante daivasṛṣṭāni bibhye tairjanmabhirbhṛśam

'फिर भी मुझे अट्ठाईस और गोह-जन्म प्राप्त होने वाले दिखाई दे रहे हैं, जो दैव द्वारा निश्चित किए गए हैं; उन जन्मों से मैं अत्यन्त भयभीत हूँ।'

श्लोक 28 (skanda.2.160.28)

न कारणं प्रपश्याभि तन्मे विस्तरतो वद । इत्युक्तः स ऋषिः प्राह ज्ञात्वा विज्ञानचक्षुषा

na kāraṇaṁ prapaśyābhi tanme vistarato vada ityuktaḥ sa ṛṣiḥ prāha jñātvā vijñānacakṣuṣā

'मुझे इसका कारण दिखाई नहीं देता; कृपया इसे मुझे विस्तार से बताइए।' ऐसा कहे जाने पर उन ऋषि ने अपनी ज्ञान-दृष्टि से जानकर कहा —

श्लोक 29 (skanda.2.160.29)

शृणु भूप प्रवक्ष्यामि तव दुर्योनिकारणम् । न जलं तु त्वया दत्तं वैशाखे माधवप्रिये

śṛṇu bhūpa pravakṣyāmi tava duryonikāraṇam na jalaṁ tu tvayā dattaṁ vaiśākhe mādhavapriye

'हे भूप! सुनो, मैं तुम्हारी दुर्योनि का कारण बताता हूँ — तुमने माधव-प्रिय वैशाख मास में जल का दान नहीं किया,'

श्लोक 30 (skanda.2.160.30)

तज्जलं सुलभं मत्वा ह्यमूल्यमिति निश्चितम् । नाध्वगानां द्विजातीनां घर्मकालेऽप्यजानता

tajjalaṁ sulabhaṁ matvā hyamūlyamiti niścitam nādhvagānāṁ dvijātīnāṁ gharmakāle'pyajānatā

'—यह सोचकर कि जल तो सुलभ है और निश्चय ही निःशुल्क है, तुमने अज्ञानवश गर्मी के समय भी मार्गगामी द्विजों को जल नहीं दिया।'

श्लोक 31 (skanda.2.160.31)

तथा पात्रं समुत्सृज्य ह्यपात्रे प्रतिदत्तवान् । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य नहि भस्मनि हूयते

tathā pātraṁ samutsṛjya hyapātre pratidattavān jvalantamagnimutsṛjya nahi bhasmani hūyate

'तुमने योग्य पात्रों को छोड़कर अयोग्य पात्रों को ही दान दिया; परन्तु प्रज्वलित अग्नि को छोड़कर कोई राख में हवन नहीं करता।'

श्लोक 32 (skanda.2.160.32)

बहुधा वर्णितस्याऽपि सौगन्ध्यादियुतस्य च । कण्टकान्वितवृक्षस्य न कुर्वंति समर्चनम्

bahudhā varṇitasyā'pi saugandhyādiyutasya ca kaṇṭakānvitavṛkṣasya na kurvaṁti samarcanam

'कांटों से भरे वृक्ष की, चाहे वह अनेक प्रकार से वर्णित हो और सुगंध आदि से युक्त भी हो, कोई पूजा नहीं करता।'

श्लोक 33 (skanda.2.160.33)

विशिष्टानां पादपानामश्वत्थः सेव्यतां गतः । तुलसीं तु समुत्सृज्य बृहती पूज्यते नु किम्

viśiṣṭānāṁ pādapānāmaśvatthaḥ sevyatāṁ gataḥ tulasīṁ tu samutsṛjya bṛhatī pūjyate nu kim

'विशिष्ट वृक्षों में पीपल ही सेवनीय माना गया है; क्या तुलसी को छोड़कर कोई बड़ी कंटीली झाड़ी की पूजा करता है?'

श्लोक 34 (skanda.2.160.34)

अनाथत्वं पूज्यतायां न प्रयोजकतामियात् । पंग्वाद्या येऽप्यनाथा हि दयापात्रं हि केवलम्

anāthatvaṁ pūjyatāyāṁ na prayojakatāmiyāt paṁgvādyā ye'pyanāthā hi dayāpātraṁ hi kevalam

'अनाथ होना पूजनीयता का कारण नहीं बन सकता; लंगड़े आदि जो भी अनाथ हैं, वे केवल दया के पात्र हैं (पूजा के नहीं)।'

श्लोक 35 (skanda.2.160.35)

तपोनिष्ठा ज्ञाननिष्ठाः श्रुतिशास्त्रविशारदाः । विष्णुरूपाः सदा पूज्या नेतरे तु कदाचन

taponiṣṭhā jñānaniṣṭhāḥ śrutiśāstraviśāradāḥ viṣṇurūpāḥ sadā pūjyā netare tu kadācana

'तपोनिष्ठ, ज्ञाननिष्ठ और श्रुति-शास्त्रों में निपुण व्यक्ति ही, विष्णु के स्वरूप होने के कारण, सदा पूजनीय हैं — अन्य कभी नहीं।'

श्लोक 36 (skanda.2.160.36)

तत्रापि ज्ञानिनोऽत्यर्थं विप्रा विष्णोः सदैव हि । ज्ञानिनामपि भूपाल विष्णुरेव सदा प्रियः । तस्माज्ज्ञानी सदा पूज्यः पूज्यात्पूज्यतरः स्मृतः

tatrāpi jñānino'tyarthaṁ viprā viṣṇoḥ sadaiva hi jñānināmapi bhūpāla viṣṇureva sadā priyaḥ tasmājjñānī sadā pūjyaḥ pūjyātpūjyataraḥ smṛtaḥ

'उनमें भी ज्ञानी ब्राह्मण विष्णु को सदा अत्यन्त प्रिय हैं; और हे भूपाल! ज्ञानियों को भी विष्णु ही सदा प्रिय हैं। इसलिए ज्ञानी सदा पूजनीय है, और पूज्यों में भी अधिक पूज्य कहा गया है।'

श्लोक 37 (skanda.2.160.37)

अवज्ञा साधुवृत्तानामिहाऽमुत्र च दुःखदा । सेवा वै महतां पुंसां पुमर्थानां हि कारणम्

avajñā sādhuvṛttānāmihā'mutra ca duḥkhadā sevā vai mahatāṁ puṁsāṁ pumarthānāṁ hi kāraṇam

'साधु-आचरण वालों का अनादर इस लोक और परलोक दोनों में दुःखदायी है; महापुरुषों की सेवा ही पुरुषार्थों की सिद्धि का कारण है।'

श्लोक 38 (skanda.2.160.38)

कोटयोऽप्यन्धजातीनां न पश्यंति यथाऽयथम् । एवं मन्दायुतानां तु संगतिर्नार्थदा भवेत्

koṭayo'pyandhajātīnāṁ na paśyaṁti yathā'yatham evaṁ mandāyutānāṁ tu saṁgatirnārthadā bhavet

'जन्म से अंधे करोड़ों लोग भी सही-गलत नहीं देख पाते; इसी प्रकार मूर्खों की भीड़ के साथ संग करना भी कोई लाभ नहीं देता।'

श्लोक 39 (skanda.2.160.39)

नह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः । ते पुनंत्युरुकालेन दर्शनादेव साधवः

nahyammayāni tīrthāni na devā mṛcchilāmayāḥ te punaṁtyurukālena darśanādeva sādhavaḥ

'तीर्थ केवल जल-मात्र नहीं हैं, न देवता केवल मिट्टी-पत्थर के हैं; वे दीर्घकाल में पवित्र करते हैं, जबकि साधु पुरुष तो दर्शनमात्र से ही पवित्र कर देते हैं।'

श्लोक 40 (skanda.2.160.40)

न साधुसेवनात्क्वापि सीदन्ते तैः सुशिक्षिताः । जन्ममृत्युजराद्यैर्वा सुधयाऽऽप्यायिता यथा

na sādhusevanātkvāpi sīdante taiḥ suśikṣitāḥ janmamṛtyujarādyairvā sudhayā''pyāyitā yathā

'साधुओं की सेवा से सुशिक्षित व्यक्ति जन्म-मृत्यु-जरा आदि से कहीं भी पीड़ित नहीं होते, ठीक जैसे अमृत से तृप्त व्यक्ति (कभी क्षीण नहीं होते)।'

श्लोक 41 (skanda.2.160.41)

न जलं तु त्वया दत्तं साधवो वा न सेविताः । तेन ते दुर्गतिश्चेयं प्राप्ता चेक्ष्वाकुनंदन

na jalaṁ tu tvayā dattaṁ sādhavo vā na sevitāḥ tena te durgatiśceyaṁ prāptā cekṣvākunaṁdana

'तुमने न तो जल दिया और न साधुओं की सेवा की; इसीलिए, हे इक्ष्वाकु-नंदन! तुम्हें यह दुर्गति प्राप्त हुई है।'

श्लोक 42 (skanda.2.160.42)

वैशाखे मत्कृतं पुण्यं तुभ्यं दास्यामि शान्तये । भूतं भव्यं भवद्येन कर्मजातं विजेष्यसि

vaiśākhe matkṛtaṁ puṇyaṁ tubhyaṁ dāsyāmi śāntaye bhūtaṁ bhavyaṁ bhavadyena karmajātaṁ vijeṣyasi

'वैशाख में मेरे द्वारा अर्जित पुण्य मैं तुम्हारी शांति के लिए तुम्हें दूँगा, जिससे तुम भूत, भविष्य और वर्तमान — समस्त कर्मों पर विजय पा सकोगे।'

श्लोक 43 (skanda.2.160.43)

इत्युक्त्वाऽप उपस्पृश्य ददौ पुण्यमनुत्तमम्

ityuktvā'pa upaspṛśya dadau puṇyamanuttamam

ऐसा कहकर जल का स्पर्श करके उन्होंने वह उत्कृष्ट पुण्य उसे प्रदान कर दिया।

श्लोक 44 (skanda.2.160.44)

यदा दत्तं ब्राह्मणेन स्नानं चैकदिने कृतम् । तेन ध्वस्ताऽखिलाघस्तु त्यक्त्वा तां गृहगोधिकाम्

yadā dattaṁ brāhmaṇena snānaṁ caikadine kṛtam tena dhvastā'khilāghastu tyaktvā tāṁ gṛhagodhikām

जब ब्राह्मण के द्वारा यह दान दिया गया, जो एक दिन के वैशाख-स्नान के तुल्य था, तो उससे समस्त पाप नष्ट होकर उसने उस गृहगोधिका-शरीर को त्याग दिया,

श्लोक 45 (skanda.2.160.45)

दिव्यं विमानमारुह्य दिव्यस्रग्वस्त्रभूषणः । पश्यतामेव भूतानां मैथिलस्य गृहांतरे

divyaṁ vimānamāruhya divyasragvastrabhūṣaṇaḥ paśyatāmeva bhūtānāṁ maithilasya gṛhāṁtare

—और दिव्य विमान पर चढ़कर, दिव्य माला, वस्त्र और आभूषणों से सुशोभित होकर, मिथिलापति के घर में उपस्थित सबके देखते-देखते —

श्लोक 46 (skanda.2.160.46)

बद्धाञ्जलिपुटो भूत्वा परिक्रम्य प्रणम्य च । अनुज्ञातो ययौ राजा स्तूयमानोऽमरैर्दिवम्

baddhāñjalipuṭo bhūtvā parikramya praṇamya ca anujñāto yayau rājā stūyamāno'marairdivam

—हाथ जोड़कर, प्रदक्षिणा करके और प्रणाम करके, आज्ञा प्राप्त कर वह राजा देवताओं द्वारा स्तुति किया जाता हुआ स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 47 (skanda.2.160.47)

तत्र भुक्त्वा महाभोगान्वर्षायुतमतन्द्रितः । स एव चेक्ष्वाकुकुले काकुत्स्थोऽभून्महाप्रभुः

tatra bhuktvā mahābhogānvarṣāyutamatandritaḥ sa eva cekṣvākukule kākutstho'bhūnmahāprabhuḥ

वहाँ दस हजार वर्षों तक बिना किसी शिथिलता के महान भोगों को भोगकर, वही आत्मा इक्ष्वाकु कुल में काकुत्स्थ नामक महाप्रभु के रूप में उत्पन्न हुई,

श्लोक 48 (skanda.2.160.48)

सप्तद्वीपवतीपालो ब्रह्मण्यः साधुसंमतः । देवेन्द्रस्य सखा विष्णोरंश एव महाप्रभुः

saptadvīpavatīpālo brahmaṇyaḥ sādhusaṁmataḥ devendrasya sakhā viṣṇoraṁśa eva mahāprabhuḥ

—जो सातों द्वीपों वाली पृथ्वी का पालक, ब्राह्मणभक्त, साधुजनों द्वारा सम्मानित, देवराज इन्द्र का सखा तथा साक्षात् विष्णु का अंश ही महाप्रभु था।

श्लोक 49 (skanda.2.160.49)

बोधितस्तु वसिष्ठेन वैशाखोक्तान्मनोरमान् । अनुष्ठायाखिलान्धर्मांस्तेन ध्वस्ताखिलाऽशुभः

bodhitastu vasiṣṭhena vaiśākhoktānmanoramān anuṣṭhāyākhilāndharmāṁstena dhvastākhilā'śubhaḥ

वसिष्ठ के द्वारा उपदेश दिए जाने पर, वैशाख में कहे गए मनोहर समस्त धर्मों का आचरण करके, उसके द्वारा समस्त अशुभ नष्ट कर दिया गया,

श्लोक 50 (skanda.2.160.50)

दिव्यं ज्ञानं समासाद्य विष्णोः सायुज्यमाप्तवान् । वैशाखः शुभदस्तस्मात्पुंभिः सर्वैरनुष्ठितः

divyaṁ jñānaṁ samāsādya viṣṇoḥ sāyujyamāptavān vaiśākhaḥ śubhadastasmātpuṁbhiḥ sarvairanuṣṭhitaḥ

—और दिव्य ज्ञान प्राप्त करके उसने विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लिया। इसीलिए शुभदायक वैशाख का पालन समस्त मनुष्यों को करना चाहिए।

श्लोक 51 (skanda.2.160.51)

आयुर्यशःपुष्टिदोऽयं महापापौघनाशनः । पुमर्थानां निदानं च विष्णुः प्रीणात्यनेन तु

āyuryaśaḥpuṣṭido'yaṁ mahāpāpaughanāśanaḥ pumarthānāṁ nidānaṁ ca viṣṇuḥ prīṇātyanena tu

यह मास आयु, यश और पुष्टि प्रदान करने वाला तथा महापापों के समूह का नाश करने वाला है; यह पुरुषार्थों का मूल कारण है, और इसी से विष्णु प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 52 (skanda.2.160.52)

चातुर्वर्ण्यनरैः सर्वैश्चतुराश्रमवर्तिभिः । अनुष्ठेयो महाधर्मो वैशाखे माधवागमे

cāturvarṇyanaraiḥ sarvaiścaturāśramavartibhiḥ anuṣṭheyo mahādharmo vaiśākhe mādhavāgame

चारों वर्णों के समस्त मनुष्यों तथा चारों आश्रमों में रहने वालों को माधव के आगमन पर वैशाख में यह महान् धर्म अवश्य करना चाहिए।

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