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वैष्णव खण्ड · अध्याय 161

पिशाच-मोक्ष-प्राप्ति

अध्याय 160अध्याय-सूचीअध्याय 162

श्लोक 1 (skanda.2.161.1)

नारद उवाच । राजा तदद्भुतं दृष्ट्वा मैथिलो धर्मवित्तमः । कृताञ्जलिः सुखासीनं विस्मितो वाक्यमब्रवीत्

nārada uvāca rājā tadadbhutaṁ dṛṣṭvā maithilo dharmavittamaḥ kṛtāñjaliḥ sukhāsīnaṁ vismito vākyamabravīt

नारद जी बोले— उस अद्भुत घटना को देखकर धर्म के परम ज्ञाता मिथिला के राजा ने हाथ जोड़कर, आश्चर्यचकित होकर, सुखपूर्वक बैठे हुए श्रुतदेव से यह वचन कहा।

श्लोक 2 (skanda.2.161.2)

मैथिल उवाच । दृष्टमेतन्महाश्चर्यं साधूनां चरितं तथा । येन धर्मेण मुक्तोऽभूद्राजा चेक्ष्वाकुनन्दनः

maithila uvāca dṛṣṭametanmahāścaryaṁ sādhūnāṁ caritaṁ tathā yena dharmeṇa mukto'bhūdrājā cekṣvākunandanaḥ

मैथिल राजा ने कहा— यह महान् आश्चर्य और साधुओं का यह चरित मैंने देखा, जिस धर्म के द्वारा इक्ष्वाकु-नंदन राजा मुक्त हुआ।

श्लोक 3 (skanda.2.161.3)

तं धर्मं विस्तरेणैव श्रोतुं कौतूहलं हि मे । मह्यं श्रद्धावते विद्वत्कृपया विस्तराद्वद

taṁ dharmaṁ vistareṇaiva śrotuṁ kautūhalaṁ hi me mahyaṁ śraddhāvate vidvatkṛpayā vistarādvada

मुझे उस धर्म को विस्तारपूर्वक सुनने की उत्सुकता है। हे विद्वन्! कृपया श्रद्धावान् मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 4 (skanda.2.161.4)

इति राज्ञा सुसंपृष्टः श्रुतदेवो महामनाः । साधुसाध्विति संभाष्य व्याजहार नृपोत्तमम्

iti rājñā susaṁpṛṣṭaḥ śrutadevo mahāmanāḥ sādhusādhviti saṁbhāṣya vyājahāra nṛpottamam

राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर महामना श्रुतदेव ने 'साधु साधु' कहकर उस श्रेष्ठ राजा को संबोधित किया।

श्लोक 5 (skanda.2.161.5)

श्रुतदेव उवाच । सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम । वासुदेवप्रियान्धर्माञ्छ्रोतुं यस्मान्मतिस्तव

śrutadeva uvāca samyagvyavasitā buddhistava rājarṣisattama vāsudevapriyāndharmāñchrotuṁ yasmānmatistava

श्रुतदेव ने कहा— हे राजर्षिश्रेष्ठ! आपकी बुद्धि सम्यक् रूप से स्थिर है, क्योंकि आपका मन वासुदेव को प्रिय धर्मों को सुनने में लगा है।

श्लोक 6 (skanda.2.161.6)

बहुजन्मार्जितं पुण्यं विना कस्यापि देहिनः । वासुदेवकथालापे मतिनैवोपजायते

bahujanmārjitaṁ puṇyaṁ vinā kasyāpi dehinaḥ vāsudevakathālāpe matinaivopajāyate

अनेक जन्मों में अर्जित पुण्य के बिना किसी भी देहधारी का मन वासुदेव की कथा में कभी नहीं लगता।

श्लोक 7 (skanda.2.161.7)

यूने राजाधिराजाय जातेयं मतिरीदृशी । शुद्धं भागवतं मन्ये तेन त्वां साधुसत्तमम्

yūne rājādhirājāya jāteyaṁ matirīdṛśī śuddhaṁ bhāgavataṁ manye tena tvāṁ sādhusattamam

आप जैसे युवा राजाधिराज में ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई है, इससे मैं आपको शुद्ध भागवत और साधुओं में श्रेष्ठ मानता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.2.161.8)

तस्मात्तुभ्यं ब्रुवे सौम्य धर्मान्भागवताञ्च्छुभान् । याञ्ज्ञात्वा मुच्यते जंतुर्जन्मसंसारबन्धनात्

tasmāttubhyaṁ bruve saumya dharmānbhāgavatāñcchubhān yāñjñātvā mucyate jaṁturjanmasaṁsārabandhanāt

इसलिए, हे सौम्य! मैं आपको भगवान् से संबंधित शुभ धर्म बताता हूँ, जिन्हें जानकर प्राणी जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 9 (skanda.2.161.9)

यथा शौचं यथा स्नानं यथा सन्ध्या च तर्पणम् । अग्निहोत्रं यथा श्राद्धं तथा वैशाखसत्क्रियाः

yathā śaucaṁ yathā snānaṁ yathā sandhyā ca tarpaṇam agnihotraṁ yathā śrāddhaṁ tathā vaiśākhasatkriyāḥ

जैसे शौच, स्नान, संध्या और तर्पण, तथा अग्निहोत्र और श्राद्ध महत्त्वपूर्ण हैं, वैसे ही वैशाख की सत्क्रियाएँ महत्त्वपूर्ण हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.161.10)

वैशाखे माधवे धर्मानकृत्वा नोर्ध्वगो भवेत् । न वैशाखसमो धर्मो धर्मजातेषु विद्यते

vaiśākhe mādhave dharmānakṛtvā nordhvago bhavet na vaiśākhasamo dharmo dharmajāteṣu vidyate

माधव-मास वैशाख में धर्मों का पालन किए बिना मनुष्य ऊर्ध्वलोक को नहीं जाता; समस्त धर्मों में वैशाख के समान कोई धर्म नहीं है।

श्लोक 11 (skanda.2.161.11)

संत्येव बहवो धर्माः प्रजाश्चाराजका इव । उपद्रवैश्च लुप्यंति नात्र कार्या विचारणा

saṁtyeva bahavo dharmāḥ prajāścārājakā iva upadravaiśca lupyaṁti nātra kāryā vicāraṇā

और भी बहुत से धर्म हैं, परन्तु राजाविहीन प्रजा की भाँति वे विघ्नों से नष्ट हो जाते हैं — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 12 (skanda.2.161.12)

सुलभाः सकला धर्माः कर्तुं वैशाखचोदिताः । उदकुम्भं प्रपादानं पथिच्छायादिनिर्मितिः

sulabhāḥ sakalā dharmāḥ kartuṁ vaiśākhacoditāḥ udakumbhaṁ prapādānaṁ pathicchāyādinirmitiḥ

वैशाख में विहित समस्त धर्मों का पालन सुलभ है — जलपूर्ण घड़े का दान, जल-शाला की स्थापना, मार्ग में छाया आदि का निर्माण,

श्लोक 13 (skanda.2.161.13)

उपानत्पादुकादानं छत्रव्यजनयोस्तथा । तिलयुक्तमधोर्दानं गोरसानां श्रमापहम्

upānatpādukādānaṁ chatravyajanayostathā tilayuktamadhordānaṁ gorasānāṁ śramāpaham

—जूते-चप्पल का दान, तथा छाता और पंखे का दान, तिल-मिश्रित मधु का दान, तथा श्रम को दूर करने वाले गोरस (दूध आदि) का दान,

श्लोक 14 (skanda.2.161.14)

वापीकूपतडागादिकरणं पथिकाश्रयम् । नारिकेलेक्षुकर्पूरकस्तूरीदानमेव च

vāpīkūpataḍāgādikaraṇaṁ pathikāśrayam nārikelekṣukarpūrakastūrīdānameva ca

—बावड़ी, कुआँ, तालाब आदि बनवाकर पथिकों को आश्रय देना, तथा नारियल, गन्ना, कर्पूर और कस्तूरी का दान,

श्लोक 15 (skanda.2.161.15)

गन्धानुलेपनं शय्या खट्वा दानं तथैव च । तथा चूतफलं रम्यमुर्वारुक रसायनम्

gandhānulepanaṁ śayyā khaṭvā dānaṁ tathaiva ca tathā cūtaphalaṁ ramyamurvāruka rasāyanam

—सुगंधित लेप, शय्या और खाट का दान, सुंदर आम्रफल तथा ककड़ी का शीतल रसायन,

श्लोक 16 (skanda.2.161.16)

दानं दमनपुष्पाणां तथा सायं गुडोदकम् । चित्राण्यन्नानि पूर्णायां दध्यन्नं प्रत्यहं तथा

dānaṁ damanapuṣpāṇāṁ tathā sāyaṁ guḍodakam citrāṇyannāni pūrṇāyāṁ dadhyannaṁ pratyahaṁ tathā

—दमनक पुष्पों का दान, सायंकाल गुड़-जल, पूर्णिमा को नाना प्रकार के व्यंजन, तथा प्रतिदिन दही-भात,

श्लोक 17 (skanda.2.161.17)

तांबूलस्य सदा दानं चैत्रदर्शे करीरकम् । रवावनुदिते सूर्ये प्रातः स्नानं दिनेदिने

tāṁbūlasya sadā dānaṁ caitradarśe karīrakam ravāvanudite sūrye prātaḥ snānaṁ dinedine

—ताम्बूल का सदैव दान, चैत्र अमावस्या को कोमल बाँस-कोंपल, सूर्योदय से पूर्व प्रतिदिन प्रातः स्नान,

श्लोक 18 (skanda.2.161.18)

मधुसूदनपूजा च कथायाः श्रवणं तथा । अभ्यंगवर्जने चैव तथा वै पत्रभोजनम्

madhusūdanapūjā ca kathāyāḥ śravaṇaṁ tathā abhyaṁgavarjane caiva tathā vai patrabhojanam

—मधुसूदन की पूजा और कथा-श्रवण, तेल-मालिश का त्याग, तथा पत्तल पर भोजन,

श्लोक 19 (skanda.2.161.19)

मध्येमध्ये श्रमार्तानां वीजनं व्यजनेन च । सुगंधैः कोमलैः पुष्पैः प्रत्यहं पूजनं हरेः

madhyemadhye śramārtānāṁ vījanaṁ vyajanena ca sugaṁdhaiḥ komalaiḥ puṣpaiḥ pratyahaṁ pūjanaṁ hareḥ

—बीच-बीच में श्रमित लोगों को पंखे से हवा करना, तथा प्रतिदिन सुगंधित कोमल फूलों से हरि की पूजा,

श्लोक 20 (skanda.2.161.20)

फलं दध्यन्न नैवेद्यं धूपदीपौ दिनेदिने । गोग्रासं वृषपत्नीनां द्विजपादावनेजनम्

phalaṁ dadhyanna naivedyaṁ dhūpadīpau dinedine gogrāsaṁ vṛṣapatnīnāṁ dvijapādāvanejanam

—फल और दही-भात का नैवेद्य, प्रतिदिन धूप-दीप, गौओं को ग्रास देना, तथा द्विजों के चरण धोना,

श्लोक 21 (skanda.2.161.21)

गुडनागरदानं च धात्रीपिष्टप्रदापनम् । पथिकानां प्रश्रयं च दानं तन्दुल शाकयोः । एते धर्माः प्रशस्ता हि वैशाखे माधवप्रिये

guḍanāgaradānaṁ ca dhātrīpiṣṭapradāpanam pathikānāṁ praśrayaṁ ca dānaṁ tandula śākayoḥ ete dharmāḥ praśastā hi vaiśākhe mādhavapriye

—गुड़ और सोंठ का दान, आँवले के लेप का दान, पथिकों को आश्रय देना, तथा चावल और शाक का दान — ये सभी धर्म माधव-प्रिय वैशाख में प्रशंसित हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.161.22)

तथा च विष्णौः कुसुमार्पणं हरेः पूजा च कालोचित पल्लवाद्यैः । दध्यन्ननैवेद्यनिवेदनं च समस्तपापौघ विनाशहेतुः

tathā ca viṣṇauḥ kusumārpaṇaṁ hareḥ pūjā ca kālocita pallavādyaiḥ dadhyannanaivedyanivedanaṁ ca samastapāpaugha vināśahetuḥ

इसी प्रकार विष्णु को पुष्प अर्पित करना, ऋतु के अनुकूल कोमल पत्तों आदि से हरि की पूजा करना, और दही-भात के नैवेद्य का निवेदन करना — ये समस्त पाप-समूह के नाश का कारण हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.161.23)

नारी पुष्पैर्माधवं नार्चयेद्या कालोत्पन्नैर्मन्दिरे वा गृहे वा । पुत्रं सौख्यं क्वाऽपि नाप्नोति हंति चायुर्भर्तुः स्वात्मनो वा महात्मन्

nārī puṣpairmādhavaṁ nārcayedyā kālotpannairmandire vā gṛhe vā putraṁ saukhyaṁ kvā'pi nāpnoti haṁti cāyurbhartuḥ svātmano vā mahātman

हे महात्मन्! जो स्त्री मंदिर में अथवा घर में ऋतु में उत्पन्न पुष्पों से माधव की पूजा नहीं करती, वह न तो पुत्र और न सुख कहीं पाती है, और अपने पति की अथवा स्वयं की आयु का नाश करती है।

श्लोक 24 (skanda.2.161.24)

रमासहाये माधवे मासि विष्णौ परीक्षायै धर्मसेतोः प्रजानाम् । गृहं याते मुनिभिर्दैवतैश्च काले पुष्पैर्नार्चयेद्यस्तु मूढः

ramāsahāye mādhave māsi viṣṇau parīkṣāyai dharmasetoḥ prajānām gṛhaṁ yāte munibhirdaivataiśca kāle puṣpairnārcayedyastu mūḍhaḥ

जब लक्ष्मी सहित विष्णु माधव मास में, मुनियों और देवताओं के साथ, धर्म की मर्यादा में रहने वाली प्रजा की परीक्षा के लिए घर-घर पधारते हैं, उस समय जो मूर्ख उन्हें ऋतु के फूलों से नहीं पूजता,

श्लोक 25 (skanda.2.161.25)

स मूढात्मा रौरवं प्राप्य पश्चाद्यायाद्योनिं राक्षसीं पञ्चवारम् । जलं चान्नं सर्वदा देयमस्मिन्क्षुधार्तानां प्राणिनां प्राणहेतुः

sa mūḍhātmā rauravaṁ prāpya paścādyāyādyoniṁ rākṣasīṁ pañcavāram jalaṁ cānnaṁ sarvadā deyamasminkṣudhārtānāṁ prāṇināṁ prāṇahetuḥ

—वह मूर्ख आत्मा रौरव नरक भोगकर तत्पश्चात् पाँच बार राक्षस-योनि को प्राप्त होता है। इस मास में जल और अन्न सदैव देने चाहिए, क्योंकि वे भूख से पीड़ित प्राणियों के प्राण के आधार हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.161.26)

तिर्यग्जंतुर्जायते वार्यदानादन्नादानाज्जायते वै पिशाचः । अन्नादाने चानुभूतां कथां ते ह्यहं वक्ष्ये चाद्भुतां भूमिपाल

tiryagjaṁturjāyate vāryadānādannādānājjāyate vai piśācaḥ annādāne cānubhūtāṁ kathāṁ te hyahaṁ vakṣye cādbhutāṁ bhūmipāla

जल न देने से मनुष्य पशु बनता है, अन्न न देने से वह पिशाच बनता है। हे भूमिपाल! अन्न न देने से संबंधित एक अद्भुत कथा, जो मैंने स्वयं अनुभव की, वह मैं आपको सुनाता हूँ।

श्लोक 27 (skanda.2.161.27)

रेवातीरे मत्पिताऽभूत्पिशाचः स्वमांसाशी क्षुत्तृषाश्रांतगात्रः । छायाहीने शाल्मलीवृक्षमूले ह्यन्नाभावान्नष्टचैतन्य एषः

revātīre matpitā'bhūtpiśācaḥ svamāṁsāśī kṣuttṛṣāśrāṁtagātraḥ chāyāhīne śālmalīvṛkṣamūle hyannābhāvānnaṣṭacaitanya eṣaḥ

नर्मदा के तट पर मेरे पिता पिशाच बन गए, अपने ही मांस को खाने वाले, भूख-प्यास से क्लांत शरीर वाले; छायारहित शाल्मली वृक्ष के नीचे अन्न के अभाव से उनकी चेतना नष्ट हो चुकी थी।

श्लोक 28 (skanda.2.161.28)

क्षुधा तृषा कर्मणा यस्य बह्वी सूक्ष्मं छिद्रं कण्ठनालस्य चाऽसीत् । मांसं चान्तःकण्ठमध्ये निषण्णं कुर्यात्पीडां प्राणपर्यन्तमेव

kṣudhā tṛṣā karmaṇā yasya bahvī sūkṣmaṁ chidraṁ kaṇṭhanālasya cā'sīt māṁsaṁ cāntaḥkaṇṭhamadhye niṣaṇṇaṁ kuryātpīḍāṁ prāṇaparyantameva

अपने ही कर्मों के कारण उनकी भूख-प्यास अत्यधिक थी, और उनकी गर्दन की नली का छिद्र अत्यंत सूक्ष्म था; गले के भीतर अटका हुआ मांस उन्हें प्राण-पर्यंत पीड़ा देता था।

श्लोक 29 (skanda.2.161.29)

जलं दृष्ट्वा कालकूटप्रकल्पं कौप्यं शीतं वाऽपि कासारसंस्थम् । तस्यास्तीरे चागतं दैवयोगाद्गङ्गायात्राकारणान्मार्गमध्ये

jalaṁ dṛṣṭvā kālakūṭaprakalpaṁ kaupyaṁ śītaṁ vā'pi kāsārasaṁstham tasyāstīre cāgataṁ daivayogādgaṅgāyātrākāraṇānmārgamadhye

जल को — चाहे वह कुएँ का हो या तालाब में स्थित शीतल जल — वे कालकूट विष के समान देखते थे। दैवयोग से गंगा-यात्रा के निमित्त मार्ग में जाते हुए मैं उसी नदी के तट पर पहुँचा,

श्लोक 30 (skanda.2.161.30)

दृष्ट्वाऽद्भुतं शाल्मली वृक्षमूले त्रुटवा त्रुट्वा भक्षयन्तं स्वमांसम् । क्रोशन्तं तं बहुधा शोचमानं क्षुधातृषाव्याधितं कर्मभिः स्वैः

dṛṣṭvā'dbhutaṁ śālmalī vṛkṣamūle truṭavā truṭvā bhakṣayantaṁ svamāṁsam krośantaṁ taṁ bahudhā śocamānaṁ kṣudhātṛṣāvyādhitaṁ karmabhiḥ svaiḥ

—और वहाँ शाल्मली वृक्ष के नीचे एक अद्भुत दृश्य देखा — वह अपने ही मांस को नोच-नोचकर खा रहा था, बार-बार चीत्कार कर रहा था, विलाप कर रहा था, अपने ही कर्मों से भूख-प्यास से पीड़ित था।

श्लोक 31 (skanda.2.161.31)

स मां हन्तुं प्राद्रवत्पापकर्मा मत्तेजसा निहतो दुद्रुवे च । तं चाऽब्रवं कृपया क्लिन्नचित्तो मा भैष्ट त्वं ह्यभयं मे हि दत्तम्

sa māṁ hantuṁ prādravatpāpakarmā mattejasā nihato dudruve ca taṁ cā'bravaṁ kṛpayā klinnacitto mā bhaiṣṭa tvaṁ hyabhayaṁ me hi dattam

वह पापी मुझे मारने के लिए दौड़ा, परन्तु मेरे तेज से आहत होकर उलटा भाग गया। दया से द्रवित हृदय होकर मैंने उससे कहा — 'मत डरो, मैंने तुम्हें अभय दिया है।'

श्लोक 32 (skanda.2.161.32)

कस्त्वं तात ब्रूहि सद्योऽत्र हेतुं कृच्छ्रादस्मान्मोचये मा विषीद । इत्युक्तो मां प्राह पुत्रं त्वजानन्पुरानर्ते भूवराख्ये पुरे च

kastvaṁ tāta brūhi sadyo'tra hetuṁ kṛcchrādasmānmocaye mā viṣīda ityukto māṁ prāha putraṁ tvajānanpurānarte bhūvarākhye pure ca

'हे तात! तुम कौन हो? इसका कारण अभी बताओ; मैं तुम्हें इस कष्ट से मुक्त करूँगा — विषाद मत करो।' ऐसा पूछे जाने पर, मुझे अपना पुत्र न पहचानते हुए उसने कहा — 'पूर्वकाल में भूवर नामक नगर में'

श्लोक 33 (skanda.2.161.33)

नाम्ना मैत्रः सांकृतेर्गोत्रजोऽहं तपोविद्यादानयज्ञादिनिष्ठः । मयाऽधीताध्यापिताः सर्वविद्याः कृतो मया सर्वतीर्थाऽवगाहः

nāmnā maitraḥ sāṁkṛtergotrajo'haṁ tapovidyādānayajñādiniṣṭhaḥ mayā'dhītādhyāpitāḥ sarvavidyāḥ kṛto mayā sarvatīrthā'vagāhaḥ

'—मैत्र नाम से, सांकृति गोत्र में उत्पन्न, तप-विद्या-दान-यज्ञ आदि में निरत, मैंने समस्त विद्याओं का अध्ययन और अध्यापन किया, तथा समस्त तीर्थों में स्नान किया।'

श्लोक 34 (skanda.2.161.34)

दत्तं नाऽन्नं मासि वैशाखसंज्ञे लोभाद्भिक्षामात्रमप्येव काले । शोचे चाऽहं प्राप्य पैशाचयोनिं नाऽन्यो हेतुः सत्यमेवोक्तमङ्ग

dattaṁ nā'nnaṁ māsi vaiśākhasaṁjñe lobhādbhikṣāmātramapyeva kāle śoce cā'haṁ prāpya paiśācayoniṁ nā'nyo hetuḥ satyamevoktamaṅga

'परन्तु लोभवश मैंने वैशाख नामक मास में अन्न नहीं दिया, समय पर भिक्षामात्र भी नहीं। पिशाच-योनि पाकर मैं शोक करता हूँ; हे वत्स! इसका कोई अन्य कारण नहीं है — यह मैंने तुमसे सत्य ही कहा है।'

श्लोक 35 (skanda.2.161.35)

पुत्रोऽधुना वर्तते मद्गृहे च भूरिख्यातिः श्रुतदेवाऽभिधानः । वाच्या तस्मै मद्दशा चाऽऽत्मजाय वैशाखान्नादानतोऽभूत्पिशाचः

putro'dhunā vartate madgṛhe ca bhūrikhyātiḥ śrutadevā'bhidhānaḥ vācyā tasmai maddaśā cā''tmajāya vaiśākhānnādānato'bhūtpiśācaḥ

'मेरा एक पुत्र अभी मेरे घर में है, जो अत्यंत ख्यातिप्राप्त है और श्रुतदेव नाम से जाना जाता है। मेरी यह दशा उस पुत्र को बताई जाए — कि वैशाख में अन्नदान न करने के कारण मैं पिशाच बन गया।'

श्लोक 36 (skanda.2.161.36)

दृष्टस्तीरे ते पिता नर्मदाया नोर्ध्वं गतो वर्तते वृक्षमूले । खादन्मांसं स्वीयमेवाऽन्वखिद्यत्पितुर्मुक्त्यै मासि वैशाखसंज्ञे

dṛṣṭastīre te pitā narmadāyā nordhvaṁ gato vartate vṛkṣamūle khādanmāṁsaṁ svīyamevā'nvakhidyatpiturmuktyai māsi vaiśākhasaṁjñe

'(उसे बताना कि) तुम्हारा पिता नर्मदा के तट पर देखा गया — वह उच्च गति को प्राप्त नहीं हुआ, वृक्ष के नीचे रहकर अपना ही मांस खा रहा है और विलाप कर रहा है। पिता की मुक्ति के लिए वैशाख नामक मास में—'

श्लोक 37 (skanda.2.161.37)

प्रातः स्नात्वा पूजयित्वा च विष्णुं निर्व्याजान्मां तर्पयित्वा जलैश्च । देयं चाऽन्नं द्विजवर्ये गुणाढ्ये मुक्तो यो वै याति विष्णोः पदं च

prātaḥ snātvā pūjayitvā ca viṣṇuṁ nirvyājānmāṁ tarpayitvā jalaiśca deyaṁ cā'nnaṁ dvijavarye guṇāḍhye mukto yo vai yāti viṣṇoḥ padaṁ ca

'—प्रातः स्नान करके, विष्णु की पूजा करके, निष्कपट भाव से जल द्वारा मेरा तर्पण करके, गुणवान् श्रेष्ठ ब्राह्मण को अन्नदान करना चाहिए; ऐसा करने से मुक्त हुआ व्यक्ति विष्णु के पद को प्राप्त करता है।'

श्लोक 38 (skanda.2.161.38)

इत्थं चोक्तं त्वत्पुरस्ताद्वदेति दया चैषा मत्कृते नाऽत्र शंका । भद्रं भूयात्सर्वतो मंगलं ते श्रुत्वा चाऽहं भाषितं मे पितुश्च

itthaṁ coktaṁ tvatpurastādvadeti dayā caiṣā matkṛte nā'tra śaṁkā bhadraṁ bhūyātsarvato maṁgalaṁ te śrutvā cā'haṁ bhāṣitaṁ me pituśca

'उसने यह भी कहा — यह बात तुम्हारे समक्ष कहना — यह उसकी मेरे प्रति दया है, इसमें कोई संशय नहीं। तुम्हारा सर्वत्र भद्र और मंगल हो।' अपने पिता के ये वचन सुनकर,

श्लोक 39 (skanda.2.161.39)

दुःखात्कायं दंडवत्पातयित्वा भृशार्तोऽहं पादयोर्भूरिकालम् । निदन्निदन्भूर्यहं बाष्पनेत्रः पुत्रोऽहं ते तात दैवाऽऽगतोऽहम्

duḥkhātkāyaṁ daṁḍavatpātayitvā bhṛśārto'haṁ pādayorbhūrikālam nidannidanbhūryahaṁ bāṣpanetraḥ putro'haṁ te tāta daivā''gato'ham

—दुःख से अपने शरीर को दंड के समान गिराकर, अत्यंत व्याकुल होकर मैं बहुत देर तक उनके चरणों में पड़ा रहा, बार-बार स्वयं को धिक्कारता हुआ, अश्रुपूरित नेत्रों से — 'हे पिता! मैं आपका पुत्र हूँ, दैव-योग से यहाँ आ पहुँचा हूँ।'

श्लोक 40 (skanda.2.161.40)

कर्मभ्रष्टो भूसुराणां विनिन्द्यो नाऽभूद्यस्मात्क्लेशमोक्षः पितॄणाम् । आख्याहि त्वं कर्मणा केन मुक्तो भविता वै तत्करोमि द्विजेंद्र

karmabhraṣṭo bhūsurāṇāṁ vinindyo nā'bhūdyasmātkleśamokṣaḥ pitṝṇām ākhyāhi tvaṁ karmaṇā kena mukto bhavitā vai tatkaromi dvijeṁdra

'मैं कर्म से भ्रष्ट और ब्राह्मणों में निंदित हूँ, क्योंकि अभी तक मेरे पितरों का दुःख से मोचन नहीं हुआ। हे द्विजेंद्र! आप बताइए, किस कर्म से आप मुक्त होंगे — मैं वही करूँगा।'

श्लोक 41 (skanda.2.161.41)

ततः प्राह प्रीतसर्वान्तरात्मा यात्रां कृत्वा शीघ्रमागत्य गेहम् । प्राप्ते मासे मेषसंस्थे च भानौ निवेद्याऽन्नं विष्णवे त्वं गुणाढ्यम्

tataḥ prāha prītasarvāntarātmā yātrāṁ kṛtvā śīghramāgatya geham prāpte māse meṣasaṁsthe ca bhānau nivedyā'nnaṁ viṣṇave tvaṁ guṇāḍhyam

तब उन्होंने अपने संपूर्ण अंतरात्मा में प्रसन्न होकर कहा — 'यात्रा पूर्ण करके शीघ्र घर लौट जाओ; सूर्य के मेष राशि में स्थित होने पर उस मास के आने पर तुम विष्णु को गुणयुक्त अन्न अर्पित करके',

श्लोक 42 (skanda.2.161.42)

दानं देहि द्विजवर्ये महात्मंस्तस्मान्मोक्षो भविता सान्वयस्य । पित्राऽऽदिष्टः कृतयात्रः स्वगेहे प्राप्याऽकरं माधवे चाऽन्नदानम्

dānaṁ dehi dvijavarye mahātmaṁstasmānmokṣo bhavitā sānvayasya pitrā''diṣṭaḥ kṛtayātraḥ svagehe prāpyā'karaṁ mādhave cā'nnadānam

'—हे महात्मन्! किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को वह दान दो; इससे कुल सहित मेरी मुक्ति होगी।' पिता की इस आज्ञा से मैंने यात्रा पूर्ण की और अपने घर पहुँचकर माधव मास में अन्नदान संपन्न किया।

श्लोक 43 (skanda.2.161.43)

तस्मान्मुक्तो मत्पिता मां समेत्य यानारूढो ह्यभिनंद्याऽऽशिषा च । गतो लोकं श्रीपतेर्दुर्विभाव्यं यस्मिन्गता न निवर्तंति भूयः

tasmānmukto matpitā māṁ sametya yānārūḍho hyabhinaṁdyā''śiṣā ca gato lokaṁ śrīpaterdurvibhāvyaṁ yasmingatā na nivartaṁti bhūyaḥ

उससे मुक्त हुए मेरे पिता मुझसे मिलकर, दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, आशीर्वाद देते हुए, श्रीपति (विष्णु) के उस अकल्पनीय लोक को चले गए, जहाँ जाने वाले पुनः लौटकर नहीं आते।

श्लोक 44 (skanda.2.161.44)

तस्माद्दानं सर्वशास्त्रेषु चोक्तं तुभ्यं प्रोक्तं धर्मसारं सुधर्म्यम् । किमन्यत्ते श्रोतुमिच्छा वदस्व श्रुत्वा सर्वं ते वदामीति सत्यम्

tasmāddānaṁ sarvaśāstreṣu coktaṁ tubhyaṁ proktaṁ dharmasāraṁ sudharmyam kimanyatte śrotumicchā vadasva śrutvā sarvaṁ te vadāmīti satyam

इसलिए समस्त शास्त्रों में दान की महिमा कही गई है; मैंने आपको यह उत्तम धर्मसार बताया है। और क्या सुनने की इच्छा है? कहिए; सुनकर मैं आपको सत्य ही सब कुछ बताऊँगा।

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