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वैष्णव खण्ड · अध्याय 162

दक्षयज्ञ-विध्वंस एवं कामदहन-वर्णन

अध्याय 161अध्याय-सूचीअध्याय 163

श्लोक 1 (skanda.2.162.1)

मैथिल उवाच । ब्रह्मन्निक्ष्वाकुतनयो जलाऽदानाच्च चातकः । त्रिवारमभवत्पश्चान्मद्गृहे गोधिका तथा

maithila uvāca brahmannikṣvākutanayo jalā'dānācca cātakaḥ trivāramabhavatpaścānmadgṛhe godhikā tathā

मैथिल (जनक) ने कहा — हे ब्रह्मन्! इक्ष्वाकु-वंशी वह राजपुत्र जल न देने के कारण पहले चातक पक्षी हुआ, और उसके पश्चात् मेरे घर में तीन बार गोह (गोधा) हुआ।

श्लोक 2 (skanda.2.162.2)

कर्मानुगुणमेतद्धि युक्तं तस्याकृतात्मनः । सतामसेवनात्तस्य गृध्रत्वं सारमेयता

karmānuguṇametaddhi yuktaṁ tasyākṛtātmanaḥ satāmasevanāttasya gṛdhratvaṁ sārameyatā

यह उसके अशुद्ध-आत्मा होने के कारण उसके कर्म के अनुरूप ही उचित था; सत्पुरुषों की सेवा न करने से ही उसे गृध्रता (गिद्ध-योनि) और श्वानता (कुत्ता-योनि) प्राप्त हुई।

श्लोक 3 (skanda.2.162.3)

सप्तवारमिति प्रोक्तं तन्मे भाति च नोचितम् । संतो न दूषितास्तेन न तथा कृपणा अपि

saptavāramiti proktaṁ tanme bhāti ca nocitam saṁto na dūṣitāstena na tathā kṛpaṇā api

यह जो सात बार होने की बात कही गई है, वह मुझे उचित प्रतीत नहीं होती; क्योंकि न तो उससे सत्पुरुष दूषित हुए और न ही कृपण (कंजूस) उतने दोषी हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.162.4)

तस्मादसेविनस्तस्य फलाऽभावो भवेद्ध्रुवम् । नानर्थकरणाभावादिदं हि परपीडनम्

tasmādasevinastasya phalā'bhāvo bhaveddhruvam nānarthakaraṇābhāvādidaṁ hi parapīḍanam

अतः जो सेवा नहीं करता, उसे निश्चय ही फल का अभाव होना चाहिए; परंतु यह तो दूसरों को पीड़ा पहुँचाना है, न कि केवल अनर्थ न करने का अभाव।

श्लोक 5 (skanda.2.162.5)

अनिमित्तमिदं कस्मात्कुयोनित्वमवाप्तवान् । तदेतं संशयं छिंधि शिष्यस्याऽऽत्मप्रियस्य च

animittamidaṁ kasmātkuyonitvamavāptavān tadetaṁ saṁśayaṁ chiṁdhi śiṣyasyā''tmapriyasya ca

बिना किसी (स्पष्ट) कारण के उसे यह निकृष्ट योनि क्यों प्राप्त हुई? आप अपने प्रिय शिष्य के इस संशय को दूर कीजिए।

श्लोक 6 (skanda.2.162.6)

इति राज्ञा सुसंपृष्टः श्रुतदेवो महायशाः । साधुसाध्विति संभाष्य वचो व्याहर्तुमादधे

iti rājñā susaṁpṛṣṭaḥ śrutadevo mahāyaśāḥ sādhusādhviti saṁbhāṣya vaco vyāhartumādadhe

राजा के द्वारा भलीभाँति पूछे जाने पर महायशस्वी श्रुतदेव ने 'साधु, साधु' कहकर उनकी सराहना की और वचन कहना आरम्भ किया।

श्लोक 7 (skanda.2.162.7)

श्रुतदेव उवाच । शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि यत्पृष्टं तु त्वयाऽनघ । शिवायै च शिवेनोक्तं कैलासशिखरेऽमले

śrutadeva uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi yatpṛṣṭaṁ tu tvayā'nagha śivāyai ca śivenoktaṁ kailāsaśikhare'male

श्रुतदेव ने कहा — हे निष्पाप राजन्! सुनो, जो तुमने पूछा है वह मैं कहूँगा — यह वही है जो शिव ने निर्मल कैलास-शिखर पर देवी शिवा (पार्वती) से कहा था।

श्लोक 8 (skanda.2.162.8)

सृष्ट्वेमान्सकलाँल्लोकान्पश्चात्तेषामवस्थितिम् । आमुष्मिकीमैहिकीं च द्विविधां पर्यकल्पयत्

sṛṣṭvemānsakalā~llokānpaścātteṣāmavasthitim āmuṣmikīmaihikīṁ ca dvividhāṁ paryakalpayat

इन समस्त लोकों की सृष्टि करके, महाप्रभु ने पश्चात् उनकी स्थिति के लिए दो प्रकार की व्यवस्था बनाई — पारलौकिक और ऐहिक (इस लोक संबंधी)।

श्लोक 9 (skanda.2.162.9)

हेतुत्रयं च प्रत्येकं हेतुस्थित्यै महाप्रभुः । जलसेवा चान्नसेवा सेवा चैवौषधस्य च

hetutrayaṁ ca pratyekaṁ hetusthityai mahāprabhuḥ jalasevā cānnasevā sevā caivauṣadhasya ca

प्रत्येक स्थिति की निरंतरता के लिए महाप्रभु ने तीन-तीन कारण बनाए — जल की सेवा, अन्न की सेवा और औषध की सेवा।

श्लोक 10 (skanda.2.162.10)

यत्र चैते महाभाग ह्यैहिकस्थिति हेतवः । एवमामुष्मिके राजंस्त्रय एवेरिताः श्रुतौ

yatra caite mahābhāga hyaihikasthiti hetavaḥ evamāmuṣmike rājaṁstraya everitāḥ śrutau

हे महाभाग! जहाँ ये ऐहिक स्थिति के कारण हैं, वहीं हे राजन्, पारलौकिक स्थिति के लिए भी वेद में इसी प्रकार तीन कारण कहे गए हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.162.11)

साधुसेवा विष्णुसेवा सेवा धर्मपथस्य च । पुरा सम्पादिता ह्येते परलोकस्य हेतवः

sādhusevā viṣṇusevā sevā dharmapathasya ca purā sampāditā hyete paralokasya hetavaḥ

सत्पुरुषों की सेवा, विष्णु की सेवा और धर्म-मार्ग की सेवा — ये तीनों पूर्वकाल से ही परलोक-प्राप्ति के कारण मानी गई हैं।

श्लोक 12 (skanda.2.162.12)

गृहे संपादितं यद्वत्पाथेयं पद्धतौ यथा । ऐहिका हेतवो राजन्सद्यः संपादितार्थदाः

gṛhe saṁpāditaṁ yadvatpātheyaṁ paddhatau yathā aihikā hetavo rājansadyaḥ saṁpāditārthadāḥ

जैसे घर में पहले से जुटाया गया पाथेय (मार्ग-भोजन) यात्रा में काम आता है, वैसे ही हे राजन्, ऐहिक कारण तत्काल ही फल देने वाले होते हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.162.13)

किं चेष्टमपि साधूनां मनसो यदि दुस्सहम् । कुतश्चित्कारणाद्राजंस्तच्चानर्थाय कल्पते

kiṁ ceṣṭamapi sādhūnāṁ manaso yadi dussaham kutaścitkāraṇādrājaṁstaccānarthāya kalpate

यदि किसी कारणवश सत्पुरुषों के इष्ट कार्य में भी उनके मन को असह्य कष्ट पहुँचे, तो हे राजन्, वह भी अनर्थ के लिए ही होता है।

श्लोक 14 (skanda.2.162.14)

अप्रियं किमु वक्तव्यं दुःखहेतुरिति स्फुटम् । अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्

apriyaṁ kimu vaktavyaṁ duḥkhaheturiti sphuṭam atraivodāharantīmamitihāsaṁ purātanam

फिर जो स्पष्टतः दुःख का कारण बने, ऐसा अप्रिय कार्य करने की तो बात ही क्या! इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.162.15)

पापघ्नं महदाश्चर्यं शृण्वतां रोमहर्षणम् । यज्ञदीक्षामुपगतः पुरा दक्षः प्रजापतिः

pāpaghnaṁ mahadāścaryaṁ śṛṇvatāṁ romaharṣaṇam yajñadīkṣāmupagataḥ purā dakṣaḥ prajāpatiḥ

वह इतिहास पापनाशक, अत्यंत आश्चर्यजनक और सुनने वालों के रोंगटे खड़े कर देने वाला है। पूर्वकाल में प्रजापति दक्ष ने यज्ञ की दीक्षा ग्रहण की।

श्लोक 16 (skanda.2.162.16)

आह्वानार्थं भूतपतेरगमद्रजताचलम् । तं दृष्ट्वा नोत्थितः शंभुस्तस्यैव हितकाम्यया

āhvānārthaṁ bhūtapateragamadrajatācalam taṁ dṛṣṭvā notthitaḥ śaṁbhustasyaiva hitakāmyayā

भूतपति (शिव) को आमंत्रित करने के लिए वह रजत-पर्वत (कैलास) गए। उन्हें देखकर भी शंभु उनके ही हित की कामना से खड़े नहीं हुए।

श्लोक 17 (skanda.2.162.17)

सर्वामरगुरुश्चाऽहं छन्दोगम्यः सनातनः । भृत्या ह्येते बलिहराश्चन्द्रेन्द्राद्याः सुरेश्वराः

sarvāmaraguruścā'haṁ chandogamyaḥ sanātanaḥ bhṛtyā hyete baliharāścandrendrādyāḥ sureśvarāḥ

(शिव ने सोचा —) मैं समस्त देवताओं का गुरु हूँ, छन्दों द्वारा गम्य, सनातन हूँ; चन्द्र-इन्द्र आदि देवेश्वर तो मेरे लिए बलि लाने वाले सेवक ही हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.162.18)

स्वामी भृत्याय नोत्तिष्ठेत्स्वभार्यायै पतिस्तथा । गुरुः शिष्याय नोत्तिष्ठेदिति शास्त्रविदां मतम्

svāmī bhṛtyāya nottiṣṭhetsvabhāryāyai patistathā guruḥ śiṣyāya nottiṣṭhediti śāstravidāṁ matam

स्वामी सेवक के लिए नहीं उठता, पति अपनी पत्नी के लिए नहीं उठता, गुरु शिष्य के लिए नहीं उठता — यही शास्त्रज्ञों का मत है।

श्लोक 19 (skanda.2.162.19)

न संबन्धो गुरुत्वे च कारणं त्विति वै श्रुतिः । बलं ज्ञानं तपः शांतिर्यत्र चैवाऽधिकं भवेत्

na saṁbandho gurutve ca kāraṇaṁ tviti vai śrutiḥ balaṁ jñānaṁ tapaḥ śāṁtiryatra caivā'dhikaṁ bhavet

श्रुति यह कहती है कि (केवल) संबंध गुरुत्व का कारण नहीं है, अपितु जिसमें बल, ज्ञान, तप और शांति अधिक हो,

श्लोक 20 (skanda.2.162.20)

स गुरुश्चेतरेषां च नीचा ईयुश्च प्रेष्यताम् । उत्तिष्ठन्ति च स्वाम्याद्या भृत्यादीन्यदि चाऽऽग्रहात्

sa guruścetareṣāṁ ca nīcā īyuśca preṣyatām uttiṣṭhanti ca svāmyādyā bhṛtyādīnyadi cā''grahāt

वही औरों का गुरु है, और उससे हीन लोग सेवा को प्राप्त होते हैं। यदि स्वामी आदि आग्रहवश भृत्य आदि के लिए उठ भी जाएँ,

श्लोक 21 (skanda.2.162.21)

आयुर्वित्तं यशस्तेषां सद्यो नश्यति सन्ततिः । तस्मादहं तु नोत्तिष्ठे प्रियोऽयं श्वशुरो मम

āyurvittaṁ yaśasteṣāṁ sadyo naśyati santatiḥ tasmādahaṁ tu nottiṣṭhe priyo'yaṁ śvaśuro mama

तो उनकी आयु, धन, यश और संतति शीघ्र ही नष्ट हो जाती है। इसलिए मैं नहीं उठूँगा, यद्यपि यह मेरा प्रिय श्वशुर है।

श्लोक 22 (skanda.2.162.22)

इति तस्य हितान्वेषी नोच्चचालाऽऽसनाद्विभुः । नोत्थितं तु मृडं दृष्ट्वा कुपितोऽभूत्प्रजापतिः

iti tasya hitānveṣī noccacālā''sanādvibhuḥ notthitaṁ tu mṛḍaṁ dṛṣṭvā kupito'bhūtprajāpatiḥ

इस प्रकार उसी के हित की कामना करते हुए प्रभु अपने आसन से नहीं उठे। मृड (शिव) को न उठा हुआ देखकर प्रजापति दक्ष क्रुद्ध हो गए।

श्लोक 23 (skanda.2.162.23)

अनिंदद्बहुधा तस्मै पुरतो गिरिजापतेः । अहो दर्पमहो दर्पं दरिद्रस्याऽकृतात्मनः

aniṁdadbahudhā tasmai purato girijāpateḥ aho darpamaho darpaṁ daridrasyā'kṛtātmanaḥ

गिरिजापति (शिव) के सामने ही उन्होंने उनकी बहुत निंदा की — 'अहो, इस दरिद्र, असंस्कृत-आत्मा का कैसा घमंड है, कैसा घमंड है!'

श्लोक 24 (skanda.2.162.24)

यस्य वित्तं बहुवया वृषश्चर्मावशेषितः । अत एव कपालास्थिधरः पाखण्डगोचरः

yasya vittaṁ bahuvayā vṛṣaścarmāvaśeṣitaḥ ata eva kapālāsthidharaḥ pākhaṇḍagocaraḥ

जिसका सारा धन एक बूढ़ा बैल और एक चर्ममात्र शेष है, इसीलिए यह कपाल और अस्थियाँ धारण करने वाला, पाखण्ड का विषय बना हुआ है।

श्लोक 25 (skanda.2.162.25)

वृथाऽहंकारिणो दैवं कुतो दास्यति मंगलम् । लोके कृत्येन कर्माणि शुचीनीति विदो विदुः

vṛthā'haṁkāriṇo daivaṁ kuto dāsyati maṁgalam loke kṛtyena karmāṇi śucīnīti vido viduḥ

व्यर्थ अहंकार करने वाले को दैव भला मंगल कैसे देगा? विद्वान् लोग कर्मों को उनके कृत्य (परिणाम) से ही शुद्ध जानते हैं।

श्लोक 26 (skanda.2.162.26)

धत्ते दरिद्रः शीतार्तः पवित्रं च गजाजिनम् । वेश्म श्मशानं यस्य स्याद्भुजंगः किल भूषणम्

dhatte daridraḥ śītārtaḥ pavitraṁ ca gajājinam veśma śmaśānaṁ yasya syādbhujaṁgaḥ kila bhūṣaṇam

यह दरिद्र, ठंड से पीड़ित, हाथी की खाल को ही पवित्र वस्त्र मानकर धारण करता है; जिसका घर श्मशान है और भुजंग (सर्प) ही जिसका आभूषण है।

श्लोक 27 (skanda.2.162.27)

न धीरताऽपि च ज्ञानं वृकात्तस्मात्पलायिते । भूतप्रेतपिशाचादि दुर्जनैः संगतोऽनिशम्

na dhīratā'pi ca jñānaṁ vṛkāttasmātpalāyite bhūtapretapiśācādi durjanaiḥ saṁgato'niśam

उसमें न धीरता है और न ज्ञान — वह तो भेड़िये से भी भाग खड़ा होता है; भूत, प्रेत, पिशाच आदि दुर्जनों की संगति में सदा रहता है।

श्लोक 28 (skanda.2.162.28)

न कुलं श्रूयते क्वाऽपि नाऽसौ वै साधुसम्मतः । वृथा विश्रंभितः पूर्वं नारदेन दुरात्मना

na kulaṁ śrūyate kvā'pi nā'sau vai sādhusammataḥ vṛthā viśraṁbhitaḥ pūrvaṁ nāradena durātmanā

उसका कुल कहीं भी सुना नहीं जाता, वह सत्पुरुषों को सम्मत भी नहीं है; व्यर्थ ही दुरात्मा नारद ने पहले मुझे उस पर विश्वास दिलाया था।

श्लोक 29 (skanda.2.162.29)

येनाऽहं बोधितः प्रादां कन्यां चैतां सतीं मम । पृथग्धर्मगता चैषा सुखं वसतु तद्गृहे

yenā'haṁ bodhitaḥ prādāṁ kanyāṁ caitāṁ satīṁ mama pṛthagdharmagatā caiṣā sukhaṁ vasatu tadgṛhe

उसी के समझाने पर मैंने अपनी यह कन्या सती उसे दे दी। यह अपने विचित्र धर्म-मार्ग में लगी हुई है, उसी के घर सुखपूर्वक रहे।

श्लोक 30 (skanda.2.162.30)

नास्माभिः श्लाघनीयोऽसौ मत्सुताऽपि कथंचन । यथा कुलालकलशश्चंडालस्य वशं गतः

nāsmābhiḥ ślāghanīyo'sau matsutā'pi kathaṁcana yathā kulālakalaśaścaṁḍālasya vaśaṁ gataḥ

वह हमारे द्वारा किसी भी प्रकार प्रशंसनीय नहीं है, चाहे वह मेरी पुत्री (का पति) ही क्यों न हो — जैसे कुम्हार का घड़ा चांडाल के वश में चला जाए, वैसे ही मेरी पुत्री उसके वश में चली गई है।

श्लोक 31 (skanda.2.162.31)

इति दक्षो विमूढात्मा ह्युमां नाहूय तं मृडम्। बहुधा तं विनिर्भर्त्स्य तूष्णीमेव गृहं ययौ

iti dakṣo vimūḍhātmā hyumāṁ nāhūya taṁ mṛḍam bahudhā taṁ vinirbhartsya tūṣṇīmeva gṛhaṁ yayau

इस प्रकार मोहित बुद्धि वाले दक्ष ने उमा को भी न बुलाकर, उस मृड की बहुत निंदा करके, चुपचाप ही अपने घर को प्रस्थान किया।

श्लोक 32 (skanda.2.162.32)

यज्ञवाटं ततो गत्वा ऋत्विग्भिर्मुनिभिः सह। ईजे यज्ञविधानेन निंदन्नेव महाप्रभुम्

yajñavāṭaṁ tato gatvā ṛtvigbhirmunibhiḥ saha īje yajñavidhānena niṁdanneva mahāprabhum

तत्पश्चात् यज्ञशाला में जाकर, ऋत्विजों और मुनियों के साथ, महाप्रभु (शिव) की निंदा करते हुए ही उसने यज्ञ-विधि से यजन किया।

श्लोक 33 (skanda.2.162.33)

ब्रह्मविष्णू विहायैव सर्वे देवाः समागताः । सिद्धचारणगन्धर्वा यक्षराक्षसकिन्नराः

brahmaviṣṇū vihāyaiva sarve devāḥ samāgatāḥ siddhacāraṇagandharvā yakṣarākṣasakinnarāḥ

ब्रह्मा और विष्णु को छोड़कर शेष सभी देवता वहाँ एकत्र हुए — सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और किन्नर भी।

श्लोक 34 (skanda.2.162.34)

तदा देवी सती पुण्या स्त्रीचाञ्चल्यात्प्रलोभिता । उत्सुका चोत्सवं द्रष्टुं बन्धूंस्तत्र समागतान्

tadā devī satī puṇyā strīcāñcalyātpralobhitā utsukā cotsavaṁ draṣṭuṁ bandhūṁstatra samāgatān

उस समय पुण्यशीला देवी सती स्त्री-स्वभावसुलभ चंचलता से प्रलोभित हो गईं, और वहाँ एकत्र अपने बंधु-बांधवों तथा उत्सव को देखने के लिए उत्सुक हो उठीं।

श्लोक 35 (skanda.2.162.35)

निवार्यमाणा रुद्रेण तरला स्त्रीस्वभावतः । प्रत्युक्ताऽपि पुनश्चैव गन्तव्यमिति निश्चिता

nivāryamāṇā rudreṇa taralā strīsvabhāvataḥ pratyuktā'pi punaścaiva gantavyamiti niścitā

रुद्र द्वारा मना किए जाने पर भी, स्त्री-स्वभाव से चंचल वह देवी, बार-बार उत्तर दिए जाने पर भी, फिर से यही निश्चय करती रहीं कि उन्हें जाना ही है।

श्लोक 36 (skanda.2.162.36)

स निन्दति सभामध्ये सदा मां वरवर्णिनि । तच्चासह्यं च त्वं श्रुत्वा कायं सत्यं प्रहास्यसि

sa nindati sabhāmadhye sadā māṁ varavarṇini taccāsahyaṁ ca tvaṁ śrutvā kāyaṁ satyaṁ prahāsyasi

(शिव ने कहा —) हे वरवर्णिनी! वह (दक्ष) सभा के मध्य सदा मेरी निंदा करता है; वह असह्य निंदा सुनकर तुम सचमुच अपने प्राण त्याग दोगी।

श्लोक 37 (skanda.2.162.37)

असह्यमपि सोढव्यं मयाऽपि गृहमिच्छता । मया यथा कृतं देवि तथा त्वं नैव वर्तसे

asahyamapi soḍhavyaṁ mayā'pi gṛhamicchatā mayā yathā kṛtaṁ devi tathā tvaṁ naiva vartase

गृहस्थ-धर्म चाहने वाले मुझे भी असह्य को सहना पड़ता है; परंतु हे देवि, मैंने जैसा आचरण किया है, तुम वैसा आचरण नहीं करती हो।

श्लोक 38 (skanda.2.162.38)

तस्मान्मा गच्छ शालां वै न शुभं तु भवेद्ध्रुवम्। इत्येवं बोधिता देवी चापल्यं पुनरागमत्

tasmānmā gaccha śālāṁ vai na śubhaṁ tu bhaveddhruvam ityevaṁ bodhitā devī cāpalyaṁ punarāgamat

इसलिए उस यज्ञशाला में मत जाओ, निश्चय ही इसमें शुभ नहीं होगा। इस प्रकार समझाए जाने पर भी देवी में पुनः चंचलता आ गई।

श्लोक 39 (skanda.2.162.39)

निश्चक्राम सती गेहादेकाकी पादचारिणी । तां दृष्ट्वा वृषभस्तूष्णीं पृष्ठे देवीमुवाह सः

niścakrāma satī gehādekākī pādacāriṇī tāṁ dṛṣṭvā vṛṣabhastūṣṇīṁ pṛṣṭhe devīmuvāha saḥ

सती अकेली ही पैदल घर से निकल पड़ीं। उन्हें देखकर वृषभ (नंदी) ने चुपचाप ही देवी को अपनी पीठ पर बिठाकर ले चला।

श्लोक 40 (skanda.2.162.40)

कोटिशो भूतसंघाश्च ह्यनुजग्मुः सतीं तदा । यज्ञवाटं तु सा गत्वा पत्नीशालां ययौ पुरा

koṭiśo bhūtasaṁghāśca hyanujagmuḥ satīṁ tadā yajñavāṭaṁ tu sā gatvā patnīśālāṁ yayau purā

उस समय करोड़ों भूतगण सती के पीछे-पीछे चले। यज्ञशाला में पहुँचकर वे पहले पत्नी-शाला (यजमान-पत्नियों के मण्डप) में गईं।

श्लोक 41 (skanda.2.162.41)

तूष्णीमास सतीं दृष्ट्वा खेदात्तस्माद्विनिर्गता । पतिवाक्यं तु संस्मृत्य जगामोत्तरवेदिकाम्

tūṣṇīmāsa satīṁ dṛṣṭvā khedāttasmādvinirgatā pativākyaṁ tu saṁsmṛtya jagāmottaravedikām

सती को देखकर वहाँ सब मौन रहे; इससे दुःखी होकर वे वहाँ से निकल पड़ीं और पति के वचन का स्मरण करती हुई उत्तर-वेदिका की ओर गईं।

श्लोक 42 (skanda.2.162.42)

पिता सभ्याश्च तां दृष्ट्वा स्थितास्तूष्णीं हताशिषः । सा रुद्राहुतिपर्यंतं पश्यंती पितृचेष्टितम्। त्यक्त्वा रुद्रं च जुह्वंतमुवाचाऽश्रुकुलेक्षणा

pitā sabhyāśca tāṁ dṛṣṭvā sthitāstūṣṇīṁ hatāśiṣaḥ sā rudrāhutiparyaṁtaṁ paśyaṁtī pitṛceṣṭitam tyaktvā rudraṁ ca juhvaṁtamuvācā'śrukulekṣaṇā

पिता और सभासद उन्हें देखकर मौन खड़े रहे, मानो आशीर्वाद देना ही भूल गए हों। रुद्र के लिए आहुति न दिए जाने तक पिता की चेष्टा देखती हुई, अश्रुपूर्ण नेत्रों वाली वह देवी, जो रुद्र को छोड़कर ही हवन कर रहे थे, बोल उठीं।

श्लोक 43 (skanda.2.162.43)

देव्युवाच । महदुल्लंघनं पुंसां न प्रायः श्रेयसे भवेत् । लोककर्ता लोकभर्ता सर्वेषां प्रभुरव्ययः

devyuvāca mahadullaṁghanaṁ puṁsāṁ na prāyaḥ śreyase bhavet lokakartā lokabhartā sarveṣāṁ prabhuravyayaḥ

देवी ने कहा — पुरुषों का महान् उल्लंघन (अपराध) प्रायः कल्याणकारी नहीं होता। वे लोक के रचयिता, लोक के पालक, सबके अविनाशी प्रभु हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.162.44)

एवंभूतस्य रुद्रस्य कथं नो दीयते हविः । जातां न किं ते दुर्बुद्धिं हरंत्यन्ये समागताः

evaṁbhūtasya rudrasya kathaṁ no dīyate haviḥ jātāṁ na kiṁ te durbuddhiṁ haraṁtyanye samāgatāḥ

ऐसे रुद्र को यहाँ हवि (आहुति) क्यों नहीं दी जाती? क्या यहाँ एकत्र हुए अन्य लोग तुम्हारी इस दुर्बुद्धि को दूर नहीं करते?

श्लोक 45 (skanda.2.162.45)

न चेदृशा महात्मानः किमेषां विमुखो विधिः

na cedṛśā mahātmānaḥ kimeṣāṁ vimukho vidhiḥ

यहाँ उपस्थित ये महात्मा भी ऐसे नहीं हैं — क्या इन सबसे भी विधाता विमुख हो गया है?

श्लोक 46 (skanda.2.162.46)

इत्येवं भाषमाणां तां पूषा देवो जहास ह । श्मश्रूणां चालनं चक्रे भृगुर्हतशुभस्तथा

ityevaṁ bhāṣamāṇāṁ tāṁ pūṣā devo jahāsa ha śmaśrūṇāṁ cālanaṁ cakre bhṛgurhataśubhastathā

इस प्रकार बोलती हुई उनको देखकर पूषा देव हँस पड़े, और अशुभ भृगु ने भी उपहासपूर्वक अपनी दाढ़ी हिलाई।

श्लोक 47 (skanda.2.162.47)

भुजपादोरुकक्षाणां स्फालनं चक्रिरे परे । बहुधा निन्दनं चक्रे तत्पिता हतभाग्यवान्

bhujapādorukakṣāṇāṁ sphālanaṁ cakrire pare bahudhā nindanaṁ cakre tatpitā hatabhāgyavān

अन्य लोगों ने भी भुजा, पैर, जंघा और कक्ष (कांख) बजाकर उपहास किया; और उस अभागे पिता ने भी बहुत प्रकार से निंदा की।

श्लोक 48 (skanda.2.162.48)

तच्छ्रुत्वा रुद्रभार्या सा कोपाकुलितमानसा । प्रायश्चित्तं श्रुतेः कर्तुं देहं तत्याज सा सती । होमाग्नौ वेदिकामध्ये सर्वेषामेव पश्यताम्

tacchrutvā rudrabhāryā sā kopākulitamānasā prāyaścittaṁ śruteḥ kartuṁ dehaṁ tatyāja sā satī homāgnau vedikāmadhye sarveṣāmeva paśyatām

यह सुनकर, क्रोध से व्याकुल-मन वह रुद्रपत्नी सती, श्रुति (वेद-वाणी) के प्रायश्चित्त के रूप में, वेदिका के मध्य होमाग्नि में, सबके देखते-देखते अपना शरीर त्याग दिया।

श्लोक 49 (skanda.2.162.49)

हाहाकारो महानासीद्दुद्रुवुः प्रमथा द्रुतम् । आचख्युर्देवदेवाय वृत्तान्तमखिलं तदा

hāhākāro mahānāsīddudruvuḥ pramathā drutam ācakhyurdevadevāya vṛttāntamakhilaṁ tadā

तब भारी हाहाकार मच गया; प्रमथगण दौड़ पड़े और उन्होंने समस्त वृत्तांत जाकर देवदेव (शिव) को सुनाया।

श्लोक 50 (skanda.2.162.50)

तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय रुद्रः कालांतकोपमः । जटामुत्पाट्य हस्तेन भूतले तामताडयत्

tacchrutvā sahasotthāya rudraḥ kālāṁtakopamaḥ jaṭāmutpāṭya hastena bhūtale tāmatāḍayat

यह सुनकर काल के समान भयंकर रुद्र सहसा उठ खड़े हुए, और अपने हाथ से जटा उखाड़कर उसे पृथ्वी पर दे मारा।

श्लोक 51 (skanda.2.162.51)

ततोऽभवन्महाकायो वीरभद्रो महाबलः । सहस्रबाहुरभवत्कालांतकसमप्रभः

tato'bhavanmahākāyo vīrabhadro mahābalaḥ sahasrabāhurabhavatkālāṁtakasamaprabhaḥ

उससे महाकाय, महाबली वीरभद्र प्रकट हुए, जो सहस्र भुजाओं वाले और काल के समान तेजस्वी थे।

श्लोक 52 (skanda.2.162.52)

बद्धांजलिपुटो भूत्वा व्याजहार हरं तदा । मत्सृष्टिस्तु यदर्थं ते तदर्थं मा नियोजय

baddhāṁjalipuṭo bhūtvā vyājahāra haraṁ tadā matsṛṣṭistu yadarthaṁ te tadarthaṁ mā niyojaya

हाथ जोड़कर उसने हर से कहा — जिस उद्देश्य से आपने मुझे उत्पन्न किया है, उसी कार्य में मुझे नियुक्त कीजिए।

श्लोक 53 (skanda.2.162.53)

इत्युक्तः प्राह तं क्रुद्धो धूर्जटिश्च पुरः स्थितम्

ityuktaḥ prāha taṁ kruddho dhūrjaṭiśca puraḥ sthitam

इस प्रकार कहे जाने पर क्रुद्ध धूर्जटि (शिव) ने अपने सम्मुख खड़े उससे कहा।

श्लोक 54 (skanda.2.162.54)

हन त्वं निन्दकं दक्षं यदर्थे मत्प्रिया हता । भूतसंघास्तु गच्छन्तु सहैतेन महाबलाः

hana tvaṁ nindakaṁ dakṣaṁ yadarthe matpriyā hatā bhūtasaṁghāstu gacchantu sahaitena mahābalāḥ

तुम उस निंदक दक्ष का वध करो, जिसके कारण मेरी प्रिया की मृत्यु हुई; इसके साथ महाबली भूतगण भी जाएँ।

श्लोक 55 (skanda.2.162.55)

इत्यादिष्टा भगवता ययुर्यज्ञसभां तदा । जघ्नुः सर्वान्महावीरान्देवासुरनरादिकान्

ityādiṣṭā bhagavatā yayuryajñasabhāṁ tadā jaghnuḥ sarvānmahāvīrāndevāsuranarādikān

भगवान् द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर वे उसी क्षण यज्ञसभा में गए और वहाँ देवता, असुर, मनुष्य आदि सभी महावीरों का संहार कर डाला।

श्लोक 56 (skanda.2.162.56)

पूष्णश्च हसतो दंताञ्जटाभूश्च बभञ्ज ह । श्मश्रूण्युत्पाटयांचक्रे भृगोस्तस्य दुरात्मनः

pūṣṇaśca hasato daṁtāñjaṭābhūśca babhañja ha śmaśrūṇyutpāṭayāṁcakre bhṛgostasya durātmanaḥ

जटाभू (वीरभद्र) ने हँसते हुए पूषा के दाँत तोड़ डाले और उस दुरात्मा भृगु की दाढ़ी उखाड़ डाली।

श्लोक 57 (skanda.2.162.57)

यद्यदास्फालितं पूर्वं तत्तच्चिच्छेद वीर्यवान् । ततो दक्षशिरो हर्तुं बहूद्योगं चकार ह

yadyadāsphālitaṁ pūrvaṁ tattacciccheda vīryavān tato dakṣaśiro hartuṁ bahūdyogaṁ cakāra ha

पहले जिन-जिन अंगों को थपथपाया गया था, उस वीर्यवान् ने उन सबको काट डाला। तत्पश्चात् उसने दक्ष का सिर काटने का बहुत प्रयत्न किया।

श्लोक 58 (skanda.2.162.58)

मुनिमंत्रप्रगुप्तं तु नैव कृंतति तद्बलात् । हरो ज्ञात्वा तु चिच्छेद स्वयमेत्य दुरात्मनः

munimaṁtrapraguptaṁ tu naiva kṛṁtati tadbalāt haro jñātvā tu ciccheda svayametya durātmanaḥ

मुनि-मंत्रों से सुरक्षित होने के कारण वह बल-पूर्वक भी कट नहीं सका। यह जानकर हर स्वयं वहाँ आए और उस दुरात्मा का सिर काट डाला।

श्लोक 59 (skanda.2.162.59)

एवं मखगतान्हत्वा साऽनुगः स्वालयं ययौ । हतावशिष्टाः केचित्तु ब्रह्माणं शरणं ययुः

evaṁ makhagatānhatvā sā'nugaḥ svālayaṁ yayau hatāvaśiṣṭāḥ kecittu brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

इस प्रकार यज्ञ में उपस्थित लोगों को मारकर वे अपने अनुचरों सहित अपने धाम को लौट गए। मारे जाने से बचे हुए कुछ लोग ब्रह्मा की शरण में गए।

श्लोक 60 (skanda.2.162.60)

तैरन्वितो ययौ ब्रह्मा कैलासं तु शिवालयम् । ततो रुद्रं सान्त्वयित्वा वचोभिर्विविधैरपि

tairanvito yayau brahmā kailāsaṁ tu śivālayam tato rudraṁ sāntvayitvā vacobhirvividhairapi

उनके साथ ब्रह्मा शिव के धाम कैलास को गए, और वहाँ अनेक प्रकार के वचनों से रुद्र को शांत करके,

श्लोक 61 (skanda.2.162.61)

तेनैव सहितः प्रागाद्यज्ञवाटं महाप्रभुः । तेनैवोज्जीवयामास सर्वान्यज्ञसमागतान्

tenaiva sahitaḥ prāgādyajñavāṭaṁ mahāprabhuḥ tenaivojjīvayāmāsa sarvānyajñasamāgatān

महाप्रभु उन्हीं के साथ यज्ञशाला की ओर गए, और उन्होंने ही यज्ञ में उपस्थित सभी मृतकों को पुनर्जीवित कर दिया।

श्लोक 62 (skanda.2.162.62)

ख्यात्यै प्रादादजमुखं दक्षस्य तु तदा शिवः । अजश्मश्रूण्यदाच्छंभुर्भृगवे तु महात्मने

khyātyai prādādajamukhaṁ dakṣasya tu tadā śivaḥ ajaśmaśrūṇyadācchaṁbhurbhṛgave tu mahātmane

उस समय शिव ने प्रसिद्धि के लिए दक्ष को बकरे का मुख दिया, और महात्मा भृगु को बकरे की दाढ़ी प्रदान की।

श्लोक 63 (skanda.2.162.63)

पूष्णश्च दंतान्न प्रादात्पिष्टादं च चकार ह । तदङ्गानां व्यतिकरं केषांचिदपि वै शिवः

pūṣṇaśca daṁtānna prādātpiṣṭādaṁ ca cakāra ha tadaṅgānāṁ vyatikaraṁ keṣāṁcidapi vai śivaḥ

पूषा को दाँत नहीं दिए गए, अपितु उन्हें पिसे हुए अन्न (सत्तू आदि) खाने वाला बना दिया गया। शिव ने कुछ अन्य लोगों के अंगों की भी अदला-बदली की।

श्लोक 64 (skanda.2.162.64)

शिवमापुश्च ते सर्वे ब्रह्मणा च शिवेन च । पुनः प्रवर्तितो यज्ञो यथापूर्वं महात्मनः

śivamāpuśca te sarve brahmaṇā ca śivena ca punaḥ pravartito yajño yathāpūrvaṁ mahātmanaḥ

ब्रह्मा और शिव दोनों की कृपा से वे सभी कल्याण को प्राप्त हुए, और महात्मा दक्ष का वह यज्ञ पूर्ववत् पुनः चलाया गया।

श्लोक 65 (skanda.2.162.65)

यज्ञान्ते सर्वदेवाश्च जग्मुस्ते स्वस्वमालयम् । नैष्ठिकं ब्रह्मचर्यं तु कृत्वा रुद्रो महातपाः

yajñānte sarvadevāśca jagmuste svasvamālayam naiṣṭhikaṁ brahmacaryaṁ tu kṛtvā rudro mahātapāḥ

यज्ञ के अंत में सभी देवता अपने-अपने धाम को चले गए। महातपस्वी रुद्र ने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य धारण करके,

श्लोक 66 (skanda.2.162.66)

तेपे गंगातटे रुद्रः पुन्नागतरुमूलगः । दक्षात्मजा सती देवी त्यक्तदेहा पतिव्रता

tepe gaṁgātaṭe rudraḥ punnāgatarumūlagaḥ dakṣātmajā satī devī tyaktadehā pativratā

और गंगा-तट पर पुन्नाग वृक्ष के मूल में बैठकर तप करने लगे। इधर देह त्याग करने वाली दक्ष-पुत्री, पतिव्रता देवी सती,

श्लोक 67 (skanda.2.162.67)

जज्ञे हिमाद्रेर्मेनक्यां ववृधे तस्य वेश्मनि। एतस्मिन्नेव काले तु तारकाख्यो महासुरः

jajñe himādrermenakyāṁ vavṛdhe tasya veśmani etasminneva kāle tu tārakākhyo mahāsuraḥ

हिमाचल की पत्नी मेना के गर्भ से जन्म लेकर उन्हीं के घर में बढ़ने लगीं। इसी समय तारक नामक महासुर,

श्लोक 68 (skanda.2.162.68)

स तीव्रतपसाऽऽराध्य ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् । अवध्यत्वं वरं वव्रे देवासुरनरोरगैः

sa tīvratapasā''rādhya brahmāṇaṁ parameṣṭhinam avadhyatvaṁ varaṁ vavre devāsuranaroragaiḥ

घोर तप से परमेष्ठी ब्रह्मा की आराधना करके, देवता, असुर, मनुष्य और नाग — इन सबसे अवध्य होने का वरदान माँगा।

श्लोक 69 (skanda.2.162.69)

आयुधैरस्त्रसंघैश्च सर्वैरेव महाबलैः । रुद्रपुत्रं विना दैत्य ह्यवध्यः सकलैरपि

āyudhairastrasaṁghaiśca sarvaireva mahābalaiḥ rudraputraṁ vinā daitya hyavadhyaḥ sakalairapi

तथा समस्त आयुधों और महाबली अस्त्र-समूहों से भी अवध्य होने का वरदान माँगा — केवल रुद्रपुत्र के अतिरिक्त वह दैत्य सबके द्वारा अवध्य हो।

श्लोक 70 (skanda.2.162.70)

इति तस्मै वरं प्रादाद्ब्रह्मा लोकपितामहः । अस्त्रीकत्वादपुत्रत्वाद्रुद्रस्येति तथास्त्विति

iti tasmai varaṁ prādādbrahmā lokapitāmahaḥ astrīkatvādaputratvādrudrasyeti tathāstviti

लोकपितामह ब्रह्मा ने उसे यह वरदान दे दिया — यह सोचकर कि रुद्र तो स्त्री-रहित और अपुत्र हैं, अतः 'ऐसा ही हो' कहकर स्वीकृति दी।

श्लोक 71 (skanda.2.162.71)

वरं गृहीत्वा स्वगृहं प्राप्य लोकान्बबाध ह । दासा देवा मार्जनादौ दास्यो देव्यश्च तद्गृहे

varaṁ gṛhītvā svagṛhaṁ prāpya lokānbabādha ha dāsā devā mārjanādau dāsyo devyaśca tadgṛhe

वरदान पाकर वह अपने घर लौटा और उसने संसार को पीड़ित करना शुरू कर दिया; उसके घर में देवगण झाड़ू लगाने जैसे कामों में दास बना दिए गए, और देवियाँ दासियाँ बना दी गईं।

श्लोक 72 (skanda.2.162.72)

ततस्तत्पीडिता देवा ब्रह्माणं शरणं ययुः । तैः पीडां वर्णितां श्रुत्वा वेधाः प्राह सुरानिदम्

tatastatpīḍitā devā brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ taiḥ pīḍāṁ varṇitāṁ śrutvā vedhāḥ prāha surānidam

तब पीड़ित देवगण ब्रह्मा की शरण में गए। उनके द्वारा वर्णित पीड़ा सुनकर विधाता ने देवताओं से यह कहा।

श्लोक 73 (skanda.2.162.73)

वरप्रदानकालेऽहं रुद्रपुत्रं विना सुराः । नख्यैवध्य इति प्रादां वरं तस्मै दुरात्मने

varapradānakāle'haṁ rudraputraṁ vinā surāḥ nakhyaivadhya iti prādāṁ varaṁ tasmai durātmane

हे देवगण! वर देते समय मैंने उस दुरात्मा को यह वर दिया था कि रुद्रपुत्र के अतिरिक्त वह किसी के भी नखों से भी अवध्य होगा।

श्लोक 74 (skanda.2.162.74)

पुरा सती रुद्रपत्नी सत्रे त्यक्तकलेवरा । जाता हिमवतः पुत्री पार्वतीति च यां विदुः

purā satī rudrapatnī satre tyaktakalevarā jātā himavataḥ putrī pārvatīti ca yāṁ viduḥ

पहले जो रुद्रपत्नी सती यज्ञ में शरीर त्याग चुकी थीं, वे अब हिमवान की पुत्री के रूप में जन्म ले चुकी हैं, जिन्हें पार्वती के नाम से जाना जाता है।

श्लोक 75 (skanda.2.162.75)

रुद्रो हिमवतः पृष्ठे तपश्चरति दुश्चरम् । योजयध्वं च पार्वत्या रुद्रं लोकेश्वरं प्रभुम्

rudro himavataḥ pṛṣṭhe tapaścarati duścaram yojayadhvaṁ ca pārvatyā rudraṁ lokeśvaraṁ prabhum

रुद्र हिमालय की पीठ पर दुष्कर तप कर रहे हैं। तुम लोग लोकेश्वर प्रभु रुद्र का संयोग पार्वती से करा दो।'

श्लोक 76 (skanda.2.162.76)

पुनर्देवेन्द्रसदने संगतैरमरेश्वरैः । धिषणेनाऽपि सम्मंत्र्य देवेंद्रः पाकशासनः

punardevendrasadane saṁgatairamareśvaraiḥ dhiṣaṇenā'pi sammaṁtrya deveṁdraḥ pākaśāsanaḥ

फिर देवराज के भवन में एकत्र देवेश्वरों के साथ, तथा बृहस्पति के साथ भी परामर्श करके, पाकशासन (इन्द्र) ने

श्लोक 77 (skanda.2.162.77)

सस्मार च स कार्यार्थं नारदं स्मरमेव च । तत्राऽऽगतौ ततस्तौ तु बलभिद्वाक्यमब्रवीत्

sasmāra ca sa kāryārthaṁ nāradaṁ smarameva ca tatrā''gatau tatastau tu balabhidvākyamabravīt

उस कार्य के लिए नारद का और कामदेव का भी स्मरण किया। दोनों वहाँ आ गए, तब बलभिद् (इन्द्र) ने उनसे यह वचन कहा।

श्लोक 78 (skanda.2.162.78)

हिमवन्तं भवान्गत्वा वचसा तं निबोधय । पुत्री तव प्राग्दक्षस्य हरपत्नी सुता सती

himavantaṁ bhavāngatvā vacasā taṁ nibodhaya putrī tava prāgdakṣasya harapatnī sutā satī

आप हिमालय के पास जाकर वचन द्वारा उन्हें यह समझाइए — तुम्हारी पुत्री, जो पहले दक्ष की पुत्री और हरपत्नी सती थी,

श्लोक 79 (skanda.2.162.79)

तपश्चरति ते शृंगे वियुक्ता दशकन्यया । मृडस्तस्य सपर्यायै विनियोजय तत्प्रियाम्

tapaścarati te śṛṁge viyuktā daśakanyayā mṛḍastasya saparyāyai viniyojaya tatpriyām

अब तुम्हारे शिखर पर, दस सखियों से भी विरहित होकर तप कर रही है। मृड की उस प्रिया को उन्हीं की सेवा में नियुक्त कर दो।

श्लोक 80 (skanda.2.162.80)

तस्यैव पत्नी भविता स एव भविता पतिः । इत्याऽऽदिष्टो मघोना च नारदोपेत्य तं गिरिम्

tasyaiva patnī bhavitā sa eva bhavitā patiḥ ityā''diṣṭo maghonā ca nāradopetya taṁ girim

वह उन्हीं की पत्नी होगी, और वे ही उसके पति होंगे।' इस प्रकार मघवा (इन्द्र) द्वारा आदेश दिए जाने पर नारद उस पर्वत के पास गए।

श्लोक 81 (skanda.2.162.81)

तथैव कारयामास देवेन्द्रेणोदितं यथा । पश्चात्कामं समाहूय मघवानिद माह च

tathaiva kārayāmāsa devendreṇoditaṁ yathā paścātkāmaṁ samāhūya maghavānida māha ca

उन्होंने वैसा ही करवाया जैसा देवेन्द्र ने कहा था। तत्पश्चात् मघवा ने कामदेव को बुलाकर यह कहा।

श्लोक 82 (skanda.2.162.82)

देवानां च हितार्थाय तथा मृडहिताय च । वसन्तेन समायुक्तो गत्वा रुद्रतपोवनम्

devānāṁ ca hitārthāya tathā mṛḍahitāya ca vasantena samāyukto gatvā rudratapovanam

देवताओं के हित के लिए तथा मृड के भी हित के लिए, तुम वसंत को साथ लेकर रुद्र के तपोवन में जाओ।

श्लोक 83 (skanda.2.162.83)

गुणान्विजृम्भयित्वा तु वासं तान्हृच्छयावहान् । यदा सन्निहिता देवी पार्वती तु मृडस्य च

guṇānvijṛmbhayitvā tu vāsaṁ tānhṛcchayāvahān yadā sannihitā devī pārvatī tu mṛḍasya ca

वहाँ हृदय में काम-भाव उत्पन्न करने वाले गुणों (वासंतिक वातावरण) को फैलाकर — और जब देवी पार्वती मृड के समीप उपस्थित हों,

श्लोक 84 (skanda.2.162.84)

तदा प्रयुज्य त्वं वाणान्मोहयस्व महाप्रभुम् । तयोस्तु संगमे जाते कार्यं नोऽद्धा भविष्यति

tadā prayujya tvaṁ vāṇānmohayasva mahāprabhum tayostu saṁgame jāte kāryaṁ no'ddhā bhaviṣyati

तब तुम अपने बाण चलाकर महाप्रभु को मोहित कर देना; उन दोनों का संयोग हो जाने पर हमारा कार्य निश्चय ही सिद्ध हो जाएगा।

श्लोक 85 (skanda.2.162.85)

इत्यादिष्टः स्मरस्तूर्णं प्रतस्थे बाढमित्यथ । सवसंतः सरतिकः सानुगस्तद्वनं ययौ

ityādiṣṭaḥ smarastūrṇaṁ pratasthe bāḍhamityatha savasaṁtaḥ saratikaḥ sānugastadvanaṁ yayau

इस प्रकार आदेश पाकर स्मर (कामदेव) ने 'ऐसा ही होगा' कहकर तुरंत प्रस्थान किया, और वसंत, रति तथा अपने अनुचरों सहित उस वन में गया।

श्लोक 86 (skanda.2.162.86)

अकाले तु वसंतर्तुं जृंभयित्वा स्वशक्तितः । तद्वने सर्वतो रम्ये मन्दाऽनिलनिषेविते

akāle tu vasaṁtartuṁ jṛṁbhayitvā svaśaktitaḥ tadvane sarvato ramye mandā'nilaniṣevite

अकाल में ही अपनी शक्ति से वसंत ऋतु का विस्तार करके, उस सर्वत्र रमणीय, मंद वायु से सेवित वन में,

श्लोक 87 (skanda.2.162.87)

कदाचिद्देवदेवोऽपि पार्वत्याश्च सपर्यया । प्रीतः स्वाङ्कं समारोप्य किंचिद्व्याहर्तुमारभत्

kadāciddevadevo'pi pārvatyāśca saparyayā prītaḥ svāṅkaṁ samāropya kiṁcidvyāhartumārabhat

एक बार देवदेव (शिव) भी पार्वती की सेवा से प्रसन्न होकर, उन्हें अपनी गोद में बिठाकर कुछ बातचीत करने लगे।

श्लोक 88 (skanda.2.162.88)

प्राणप्रिया सङ्गमस्य कालोऽयमिति निश्चितः । पेशलं धनुरादाय स तस्थौ हरपृष्ठतः

prāṇapriyā saṅgamasya kālo'yamiti niścitaḥ peśalaṁ dhanurādāya sa tasthau harapṛṣṭhataḥ

यह प्राणों से भी प्रिय संगम का समय है, ऐसा निश्चय करके कामदेव ने अपना सुकुमार धनुष उठाया और हर के पीछे जाकर खड़ा हो गया।

श्लोक 89 (skanda.2.162.89)

कृत्वा जवनिकां वृक्षं बाणमेकं मुमोच ह । द्वितीयमपि संधाय चक्रे मोक्तुं महोद्यमम्

kṛtvā javanikāṁ vṛkṣaṁ bāṇamekaṁ mumoca ha dvitīyamapi saṁdhāya cakre moktuṁ mahodyamam

एक वृक्ष को आड़ बनाकर उसने एक बाण छोड़ा, और दूसरा बाण भी संधान करके उसे छोड़ने का बड़ा प्रयत्न किया।

श्लोक 90 (skanda.2.162.90)

अथ क्षुब्धमना भूत्वा मृडश्चिंतामवाप ह । न मे मनश्चलेत्क्वापि केन वा कश्मलीकृतम्

atha kṣubdhamanā bhūtvā mṛḍaściṁtāmavāpa ha na me manaścaletkvāpi kena vā kaśmalīkṛtam

तब मृड का मन क्षुब्ध हो उठा और उन्हें यह चिंता हुई — 'मेरा मन कहीं भी विचलित नहीं होता, फिर यह किसके द्वारा और क्यों विकृत किया गया?'

श्लोक 91 (skanda.2.162.91)

इति चिन्ताकुलो वामे पार्श्वे कामं ददर्श ह । क्रुद्धोन्मील्य ललाटाक्षं स्वाङ्काद्देवीमपास्य च

iti cintākulo vāme pārśve kāmaṁ dadarśa ha kruddhonmīlya lalāṭākṣaṁ svāṅkāddevīmapāsya ca

इस प्रकार चिंता में व्याकुल होकर उन्होंने अपनी बाईं ओर कामदेव को देखा, और क्रुद्ध होकर अपना ललाट-नेत्र खोलकर, देवी को अपनी गोद से हटाकर,

श्लोक 92 (skanda.2.162.92)

तस्याक्ष्णः समभूदग्निस्तीक्ष्णो लोकविभीषणः । तेन दग्धोऽभवत्सद्यो मन्मथः सशरासनः

tasyākṣṇaḥ samabhūdagnistīkṣṇo lokavibhīṣaṇaḥ tena dagdho'bhavatsadyo manmathaḥ saśarāsanaḥ

उस नेत्र से एक तीक्ष्ण, संसार को भयभीत करने वाली अग्नि प्रकट हुई। उस अग्नि से मन्मथ (कामदेव) अपने धनुष सहित तत्काल भस्म हो गया।

श्लोक 93 (skanda.2.162.93)

कार्यसिद्धिं च पश्यंतो दुद्रुवुश्चामरा दिवम् । शंकमानाः स्वदण्डं च वसन्तो रतिरेव च

kāryasiddhiṁ ca paśyaṁto dudruvuścāmarā divam śaṁkamānāḥ svadaṇḍaṁ ca vasanto ratireva ca

कार्य की सिद्धि देखकर देवगण स्वर्ग की ओर भाग गए; वसंत और रति भी अपने ऊपर आने वाले दंड की आशंका करते हुए वहाँ से भाग गए।

श्लोक 94 (skanda.2.162.94)

निमील्य लोचने भीता देवी दूरं प्रदुद्रुवे । सन्निधानं स्त्रियो हर्तुं मृडोप्यंतरधीयत

nimīlya locane bhītā devī dūraṁ pradudruve sannidhānaṁ striyo hartuṁ mṛḍopyaṁtaradhīyata

भयभीत देवी ने अपने नेत्र बंद कर लिए और दूर भाग गईं। स्त्री की उपस्थिति को दूर करके मृड भी अंतर्धान हो गए।

श्लोक 95 (skanda.2.162.95)

रुद्रस्येष्टं प्रकुर्वाणो देवश्च मनसो हितम् । लेभेऽनर्थमनिर्वृत्तं विप्रियं कुर्वतस्तु किम्

rudrasyeṣṭaṁ prakurvāṇo devaśca manaso hitam lebhe'narthamanirvṛttaṁ vipriyaṁ kurvatastu kim

रुद्र का इष्ट और उनके मन का हित करते हुए भी देव (कामदेव) को इस प्रकार का असमाप्त अनर्थ प्राप्त हुआ — तो जो अप्रिय कार्य करे, उसका तो कहना ही क्या!

श्लोक 96 (skanda.2.162.96)

तस्मादिक्ष्वाकुतनयः साधूनामप्रियः सदा । तस्मादात्महितां सेवां नाऽकरोन्मन्दधीः सताम्

tasmādikṣvākutanayaḥ sādhūnāmapriyaḥ sadā tasmādātmahitāṁ sevāṁ nā'karonmandadhīḥ satām

इसलिए वह इक्ष्वाकु-पुत्र सदा सत्पुरुषों के लिए अप्रिय कार्य करने वाला रहा; इसीलिए उस मंदबुद्धि ने सत्पुरुषों की, अपने ही हित की, सेवा नहीं की।

श्लोक 97 (skanda.2.162.97)

अनुभूतं महद्दुःखं तस्माद्दुर्योनिरेव च । तस्मात्कुर्यात्तु साधूनां सेवां सर्वार्थसाधिनीम्

anubhūtaṁ mahadduḥkhaṁ tasmādduryonireva ca tasmātkuryāttu sādhūnāṁ sevāṁ sarvārthasādhinīm

इसी कारण उसने महान् दुःख भोगा और निकृष्ट योनियाँ भी प्राप्त कीं। अतः मनुष्य को सत्पुरुषों की, सभी अर्थों को सिद्ध करने वाली, सेवा अवश्य करनी चाहिए।

श्लोक 98 (skanda.2.162.98)

रुद्रस्याऽप्रियकारित्वात्स्मरो भाविनि जन्मनि । दुःखं तु बहुलं लेभे जन्मकाले महाप्रभुः

rudrasyā'priyakāritvātsmaro bhāvini janmani duḥkhaṁ tu bahulaṁ lebhe janmakāle mahāprabhuḥ

रुद्र के प्रति अप्रिय आचरण करने के कारण ही स्मर (कामदेव) को आगामी जन्म में भी बहुत दुःख उठाना पड़ा — जन्म के समय ही उस महाप्रभु को यह भारी कष्ट प्राप्त हुआ।

श्लोक 99 (skanda.2.162.99)

इतिहासमिमं पुण्यं ये शृण्वन्ति दिवानिशम् । जन्ममृत्युजरादिभ्यो मुच्यंतेनाऽत्र संशयः

itihāsamimaṁ puṇyaṁ ye śṛṇvanti divāniśam janmamṛtyujarādibhyo mucyaṁtenā'tra saṁśayaḥ

जो लोग इस पुण्यमय इतिहास को दिन-रात श्रवण करते हैं, वे जन्म, मृत्यु, जरा आदि से मुक्त हो जाते हैं — इसमें कोई संशय नहीं है।

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