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वैष्णव खण्ड · अध्याय 163

कुमार-उत्पत्ति-कथन

अध्याय 162अध्याय-सूचीअध्याय 164

श्लोक 1 (skanda.2.163.1)

मैथिल उवाच । तस्य दग्धस्य कामस्य कस्माज्जन्माऽभवद्विभो । किं दुःखमभवत्तस्मिन्कर्मणः सह लंघनात्

maithila uvāca tasya dagdhasya kāmasya kasmājjanmā'bhavadvibho kiṁ duḥkhamabhavattasminkarmaṇaḥ saha laṁghanāt

मैथिल ने कहा — हे विभो! उस भस्म हुए कामदेव का पुनर्जन्म किस कारण से हुआ? उस (इक्ष्वाकु-पुत्र के) कर्म-उल्लंघन के साथ उसमें क्या दुःख हुआ था?

श्लोक 2 (skanda.2.163.2)

एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मंश्च्छ्रोतुं कौतूहलं हि मे । श्रुतदेव उवाच । कुमारजन्म वक्ष्यामि श्रवणात्पापनाशनम्

etadācakṣva me brahmaṁścchrotuṁ kautūhalaṁ hi me śrutadeva uvāca kumārajanma vakṣyāmi śravaṇātpāpanāśanam

हे ब्रह्मन्! यह मुझे बताइए, क्योंकि मुझे यह सुनने की उत्सुकता है। श्रुतदेव ने कहा — मैं कुमार (स्कन्द) के जन्म का वर्णन करूँगा, जिसके श्रवण मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 3 (skanda.2.163.3)

यशस्यं पुत्रदं धर्म्यं सर्वरोगविनाशनम् । शंभुना तु हते कामे तत्पत्नी रतिसंज्ञिका

yaśasyaṁ putradaṁ dharmyaṁ sarvarogavināśanam śaṁbhunā tu hate kāme tatpatnī ratisaṁjñikā

यह कीर्तिदायक, पुत्रदायक, धर्ममय और समस्त रोगों का नाश करने वाला है। शंभु द्वारा कामदेव के भस्म किए जाने पर, उसकी पत्नी रति नाम्नी,

श्लोक 4 (skanda.2.163.4)

मुमोह पुरतो दृष्ट्वा पतिं भस्मावशेषितम्। जातसंज्ञा मुहूर्तेन विललाप च चित्रधा

mumoha purato dṛṣṭvā patiṁ bhasmāvaśeṣitam jātasaṁjñā muhūrtena vilalāpa ca citradhā

अपने सामने पति को भस्म-मात्र शेष देखकर मूर्च्छित हो गई; एक मुहूर्त में होश में आने पर वह विचित्र प्रकार से विलाप करने लगी।

श्लोक 5 (skanda.2.163.5)

यद्विलापाद्वनं चापि समदुःखमभूत्तदा । तच्चिताग्नौ स्वकायं तु त्यक्तुकामा च माधवम्

yadvilāpādvanaṁ cāpi samaduḥkhamabhūttadā taccitāgnau svakāyaṁ tu tyaktukāmā ca mādhavam

उसके विलाप से वह वन भी मानो समान दुःख से भर गया। तब वह उसी चिता की अग्नि में अपना शरीर त्यागने की इच्छा करने लगी, और माधव (वसंत) को —

श्लोक 6 (skanda.2.163.6)

पत्युः सखायं सस्मार कर्तुं तात्कालिकीं क्रियाम् । स आगतश्चितिं कर्त्तुं वीरपत्न्या महाप्रभुः

patyuḥ sakhāyaṁ sasmāra kartuṁ tātkālikīṁ kriyām sa āgataścitiṁ karttuṁ vīrapatnyā mahāprabhuḥ

—अपने पति के सखा को स्मरण किया, ताकि वह तत्काल की क्रिया (अंत्येष्टि) संपन्न कर सके। वह महाप्रभु (वसंत) उस वीरपत्नी के लिए चिता तैयार करने आ गया।

श्लोक 7 (skanda.2.163.7)

स तु त्रस्तः सखीं दृष्ट्वा क्षणं मूर्च्छापरोऽभवत् । रतिं तु सान्त्वयामास सान्त्वैर्बहुविधैरपि

sa tu trastaḥ sakhīṁ dṛṣṭvā kṣaṇaṁ mūrcchāparo'bhavat ratiṁ tu sāntvayāmāsa sāntvairbahuvidhairapi

अपनी सखी को देखकर वह भी भयभीत हो गया और क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो गया। फिर उसने रति को अनेक प्रकार के सांत्वना-वचनों से समझाया।

श्लोक 8 (skanda.2.163.8)

पुत्रतुल्योऽस्मि ते भद्रे स्थिते मयि च नाऽर्हसि । कायं त्यक्तुं धर्महेतुमित्याद्यैर्बहुधाऽपि सा

putratulyo'smi te bhadre sthite mayi ca nā'rhasi kāyaṁ tyaktuṁ dharmahetumityādyairbahudhā'pi sā

'हे भद्रे, मैं तुम्हारे लिए पुत्र-तुल्य हूँ; जब तक मैं जीवित हूँ, तुम्हें धर्म के नाम पर भी अपना शरीर त्यागना उचित नहीं है' — इस प्रकार अनेक बातों से समझाए जाने पर भी वह,

श्लोक 9 (skanda.2.163.9)

नैव स्थातुं मनश्चक्रे तेन संस्तभिता रतिः । दृष्ट्वा दार्ढ्यं वसन्तोऽपि चितिं चक्रे सरित्तटे

naiva sthātuṁ manaścakre tena saṁstabhitā ratiḥ dṛṣṭvā dārḍhyaṁ vasanto'pi citiṁ cakre sarittaṭe

फिर भी अपने मन को रुकने के लिए तैयार नहीं कर सकी, यद्यपि वसंत ने उसे रोक रखा था। उसकी दृढ़ता देखकर वसंत ने नदी-तट पर ही चिता बना दी।

श्लोक 10 (skanda.2.163.10)

साऽवगाह्य द्युनद्यां च कृत्वा कार्याणि सर्वशः । सन्नियम्येन्द्रियग्रामं निवेश्यात्मनि वै मनः

sā'vagāhya dyunadyāṁ ca kṛtvā kāryāṇi sarvaśaḥ sanniyamyendriyagrāmaṁ niveśyātmani vai manaḥ

उस दिव्य नदी (गंगा) में स्नान करके, सारे आवश्यक कृत्य पूरे करके, इन्द्रियों के समूह को संयत करके तथा मन को आत्मा में स्थिर करके,

श्लोक 11 (skanda.2.163.11)

चितिमारोढुमारेभे ततो जाताऽशरीरवाक् । मा प्रवेशय कल्याणि वह्निं पतिपरायणा

citimāroḍhumārebhe tato jātā'śarīravāk mā praveśaya kalyāṇi vahniṁ patiparāyaṇā

वह चिता पर चढ़ने लगी। तभी आकाशवाणी हुई — 'हे कल्याणी, पति-परायण होकर अग्नि में प्रवेश मत करो।

श्लोक 12 (skanda.2.163.12)

भविष्यति च ते पत्युर्हराद्विष्णोश्च यादवात् । जन्मद्वयं क्रमेणैव तत्र चोत्तरजन्मनि

bhaviṣyati ca te patyurharādviṣṇośca yādavāt janmadvayaṁ krameṇaiva tatra cottarajanmani

तुम्हारे पति के हर से और विष्णु के यादव-अवतार से क्रमशः दो जन्म होंगे; और उन दोनों में से उत्तर (बाद के) जन्म में,

श्लोक 13 (skanda.2.163.13)

भैष्म्यां कृष्णान्महाविष्णोः प्रद्युम्नाख्यो भविष्यति । वसिष्यसि त्वं च शापाद्ब्रह्मणः शंबरालये

bhaiṣmyāṁ kṛṣṇānmahāviṣṇoḥ pradyumnākhyo bhaviṣyati vasiṣyasi tvaṁ ca śāpādbrahmaṇaḥ śaṁbarālaye

वह महाविष्णु कृष्ण से भैष्मी (रुक्मिणी) के गर्भ से प्रद्युम्न नाम से जन्म लेगा; और तुम भी ब्रह्मा के शाप से शंबरासुर के घर में निवास करोगी।

श्लोक 14 (skanda.2.163.14)

प्रद्युम्नाख्येन ते पत्या संगतिश्च भविष्यति । इत्युक्त्वा विररामाऽथ वाणी चाऽऽकाशगोचरा

pradyumnākhyena te patyā saṁgatiśca bhaviṣyati ityuktvā virarāmā'tha vāṇī cā''kāśagocarā

वहाँ तुम्हारा पुनर्मिलन उस प्रद्युम्न नाम वाले तुम्हारे पति से ही होगा।' इतना कहकर वह आकाशवाणी शांत हो गई।

श्लोक 15 (skanda.2.163.15)

श्रुत्वा तां तु निवृत्ताऽभून्मरणे कृतनिश्चया । ततो देवाः समाजग्मुः स्वार्थे कामे हते हरात्

śrutvā tāṁ tu nivṛttā'bhūnmaraṇe kṛtaniścayā tato devāḥ samājagmuḥ svārthe kāme hate harāt

यह सुनकर, मरने का निश्चय कर चुकी रति उससे विरत हो गई। इसके बाद, हर के हाथों काम का वध होने से अपना ही स्वार्थ सिद्ध देखकर, देवगण वहाँ एकत्र हुए,

श्लोक 16 (skanda.2.163.16)

रत्या कृतं प्रपश्यन्तो गुर्विन्द्राग्निपुरोगमाः । तां ते निवर्तयामासुर्वरेण महता सतीम्

ratyā kṛtaṁ prapaśyanto gurvindrāgnipurogamāḥ tāṁ te nivartayāmāsurvareṇa mahatā satīm

बृहस्पति, इन्द्र और अग्नि आदि प्रमुख देवगण, रति के इस निश्चय को देखकर, उस सती को एक महान् वरदान देकर उससे विरत करा दिया।

श्लोक 17 (skanda.2.163.17)

अनंगोऽपि भवेत्साऽङ्गो मृत एवाऽक्षिगो भवेत् । इति तां तु विनिर्वर्त्य धर्मं चोपदिदेशिरे

anaṁgo'pi bhavetsā'ṅgo mṛta evā'kṣigo bhavet iti tāṁ tu vinirvartya dharmaṁ copadideśire

'यद्यपि वह अंगरहित (अनंग) हो गया है, फिर भी वह मृत होकर भी दृष्टिगोचर होगा' — इस प्रकार उसे विरत करके उन्होंने उसे धर्म का उपदेश भी दिया।

श्लोक 18 (skanda.2.163.18)

पूर्वकल्पे त्वयं राजा सुंदराख्यो महाप्रभुः । त्वमेव पत्नी तत्राऽपि रजःसंकरकारिणी

pūrvakalpe tvayaṁ rājā suṁdarākhyo mahāprabhuḥ tvameva patnī tatrā'pi rajaḥsaṁkarakāriṇī

पूर्वकल्प में यह महाप्रभु सुंदर नामक राजा था, और तुम ही वहाँ भी उसकी पत्नी थी, किन्तु रजोदोष से युक्त आचरण करने वाली थी।

श्लोक 19 (skanda.2.163.19)

तेनेयञ्च दशाभूत्ते कुर्विदानीं च निष्कृतीम् । मंदाकिन्यां तु वैशाखे प्रातःस्नानं तदा कुरु

teneyañca daśābhūtte kurvidānīṁ ca niṣkṛtīm maṁdākinyāṁ tu vaiśākhe prātaḥsnānaṁ tadā kuru

इसी कारण तुम्हारी यह दशा हुई है; अब इसका प्रायश्चित करो — वैशाख मास में गंगा (मंदाकिनी) में प्रातःकाल स्नान करो,

श्लोक 20 (skanda.2.163.20)

मधुसूदनमभ्यर्च्य कथां दिव्यां तथा शृणु । अशून्यशयनं नाम व्रतमारभ भामिनि

madhusūdanamabhyarcya kathāṁ divyāṁ tathā śṛṇu aśūnyaśayanaṁ nāma vratamārabha bhāmini

मधुसूदन का पूजन करो और उनकी दिव्य कथा सुनो। हे भामिनि, 'अशून्यशयन' नामक व्रत का आरंभ करो।

श्लोक 21 (skanda.2.163.21)

धर्मेणाऽनेन ते भद्रे व्रतेनाऽपि च माधवे । नूनं त भविता पत्युरुपलब्धिर्न संशयः

dharmeṇā'nena te bhadre vratenā'pi ca mādhave nūnaṁ ta bhavitā patyurupalabdhirna saṁśayaḥ

हे भद्रे, इस धर्म से और माधव (विष्णु) संबंधी इस व्रत से निश्चय ही तुम्हें अपने पति की प्राप्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं है।'

श्लोक 22 (skanda.2.163.22)

इति तस्यै वरं दत्त्वा देवा जग्मुर्यथाऽऽगताः । तथा कृच्छ्रान्निवृत्ता सा देवी कामसती तथा

iti tasyai varaṁ dattvā devā jagmuryathā''gatāḥ tathā kṛcchrānnivṛttā sā devī kāmasatī tathā

उसे इस प्रकार वर देकर देवगण जैसे आए थे, वैसे ही चले गए। इस प्रकार अत्यंत कठिनाई से कामदेव की पत्नी वह देवी उस संकल्प से विरत हुई,

श्लोक 23 (skanda.2.163.23)

गंगाऽवगाहनं चक्रे मेषसंस्थे दिवाकरे । अशून्यशयनं नाम व्रतं चाऽपि महामनाः

gaṁgā'vagāhanaṁ cakre meṣasaṁsthe divākare aśūnyaśayanaṁ nāma vrataṁ cā'pi mahāmanāḥ

और सूर्य के मेष राशि में स्थित रहते हुए गंगा में स्नान किया, तथा उस महामना ने अशून्यशयन नामक व्रत भी किया।

श्लोक 24 (skanda.2.163.24)

तेन पुण्यप्रभावेन सद्यः कामोऽक्षिगोचरः । अभूत्तस्यै महाराज लोके चावार्य वीर्यवान्

tena puṇyaprabhāvena sadyaḥ kāmo'kṣigocaraḥ abhūttasyai mahārāja loke cāvārya vīryavān

उस पुण्य के प्रभाव से हे महाराज, कामदेव तत्काल उसकी दृष्टि के समक्ष प्रकट हो गया, संसार में अप्रतिहत वीर्यवान् होकर।

श्लोक 25 (skanda.2.163.25)

पूर्वकल्पेऽप्ययमपि राजा धर्मपरायणः । वैशाखोक्तान्महाधर्मान्नाकरोत्तेन वै स्मरः

pūrvakalpe'pyayamapi rājā dharmaparāyaṇaḥ vaiśākhoktānmahādharmānnākarottena vai smaraḥ

पूर्वकल्प में यह धर्मपरायण राजा (सुंदर) भी वैशाख में कहे गए महाधर्मों को नहीं कर सका था, इसी कारण स्मर (कामदेव) को —

श्लोक 26 (skanda.2.163.26)

देहहानिं प्रपेदेऽसौ पुत्रोऽपि परमात्मनः । वृथा नीते तु वैशाखे मेषसंस्थे दिवाकरे

dehahāniṁ prapede'sau putro'pi paramātmanaḥ vṛthā nīte tu vaiśākhe meṣasaṁsthe divākare

यह परमात्मा का पुत्र भी अपने देह का नाश प्राप्त हुआ, क्योंकि सूर्य के मेष राशि में रहते हुए वैशाख मास व्यर्थ बिता दिया गया था।

श्लोक 27 (skanda.2.163.27)

अवस्थेयं च देवानां मनुष्याणां तु का कथा । त्र्यंबकेंऽतर्हिते पश्चान्निराशा गिरिकन्यका

avastheyaṁ ca devānāṁ manuṣyāṇāṁ tu kā kathā tryaṁbakeṁ'tarhite paścānnirāśā girikanyakā

जब देवताओं की भी यह दशा होती है, तो मनुष्यों की तो बात ही क्या! इधर त्र्यंबक (शिव) के अंतर्धान हो जाने पर, निराश हुई गिरिकन्या (पार्वती),

श्लोक 28 (skanda.2.163.28)

तूष्णीं स्थितां तदा भ्रांतां तां दृष्ट्वा हिमवान्गिरिः । चकितः स्वगृहं निन्ये दोर्भ्यां तां परिरभ्य च

tūṣṇīṁ sthitāṁ tadā bhrāṁtāṁ tāṁ dṛṣṭvā himavāngiriḥ cakitaḥ svagṛhaṁ ninye dorbhyāṁ tāṁ parirabhya ca

मौन खड़ी, भ्रमित-सी उस पार्वती को देखकर हिमवान पर्वत विस्मित हो गए, और अपनी दोनों भुजाओं से उसे आलिंगन कर अपने घर ले गए।

श्लोक 29 (skanda.2.163.29)

रूपौदार्यगुणान्दृष्ट्वा हरस्यैव महात्मनः । स एव मे पतिर्भूयादिति तन्निष्ठमानसा

rūpaudāryaguṇāndṛṣṭvā harasyaiva mahātmanaḥ sa eva me patirbhūyāditi tanniṣṭhamānasā

महात्मा हर के रूप, औदार्य आदि गुणों को देखकर, 'वही मेरे पति हों' — इस दृढ़ निश्चय वाले मन से,

श्लोक 30 (skanda.2.163.30)

गंगोपकूलमापेदे तपस्तप्तुं धृतव्रता । निवारिताऽपि सा देवी पित्रा मात्रा स्वकैर्जनैः

gaṁgopakūlamāpede tapastaptuṁ dhṛtavratā nivāritā'pi sā devī pitrā mātrā svakairjanaiḥ

व्रत धारण किए हुए वह गंगा-तट पर तप करने के लिए गई। पिता, माता तथा अपने स्वजनों द्वारा रोके जाने पर भी वह देवी,

श्लोक 31 (skanda.2.163.31)

अर्चयन्ती महालिंगं निराहारा जटाधरा । दिव्यवर्षसहस्रान्ते प्रत्यक्षोऽभून्महेश्वरः

arcayantī mahāliṁgaṁ nirāhārā jaṭādharā divyavarṣasahasrānte pratyakṣo'bhūnmaheśvaraḥ

महालिंग की पूजा करती हुई, निराहार रहकर, जटा धारण किए हुए तप करती रही। एक सहस्र दिव्य वर्षों के अंत में महेश्वर उसके सामने साक्षात् प्रकट हुए,

श्लोक 32 (skanda.2.163.32)

भूत्वा वर्ण्यपि सायाह्ने पर्णशालामुखे विभुः । स्वनिष्ठमनसो दार्ढ्यं वाक्यैर्नानाविधैरपि

bhūtvā varṇyapi sāyāhne parṇaśālāmukhe vibhuḥ svaniṣṭhamanaso dārḍhyaṁ vākyairnānāvidhairapi

सायंकाल एक ब्रह्मचारी का रूप धारण करके, उसकी पर्णशाला के द्वार पर आकर, अनेक प्रकार के वचनों से उसके निश्चित मन की दृढ़ता को

श्लोक 33 (skanda.2.163.33)

ज्ञात्वा वरादरं भद्रे वरयेति महाप्रभुः । सा वव्रेऽथ पतिं रुद्रं त्वं भवेति वरानना

jñātvā varādaraṁ bhadre varayeti mahāprabhuḥ sā vavre'tha patiṁ rudraṁ tvaṁ bhaveti varānanā

जानकर महाप्रभु ने कहा — 'हे भद्रे, अपना वर माँगो।' तब उस सुमुखी ने रुद्र को ही अपना पति चुनते हुए कहा — 'तुम्हीं मेरे पति बनो।'

श्लोक 34 (skanda.2.163.34)

स तथैव वरं दत्त्वा ऋषीन्सस्मार सप्त च । आजग्मुस्तेऽपि मुनयः स्थिताः प्राञ्जलयः पुरः

sa tathaiva varaṁ dattvā ṛṣīnsasmāra sapta ca ājagmuste'pi munayaḥ sthitāḥ prāñjalayaḥ puraḥ

उन्होंने उसी प्रकार वर देकर सप्तर्षियों का स्मरण किया। वे मुनि भी वहाँ आ गए और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े हो गए।

श्लोक 35 (skanda.2.163.35)

ऋषीणां ज्ञापयामास कन्यां प्रष्टुं हिमालयम् । तथाऽऽदिष्टा भगवता कन्यार्थं हिमवद्गृहम्

ṛṣīṇāṁ jñāpayāmāsa kanyāṁ praṣṭuṁ himālayam tathā''diṣṭā bhagavatā kanyārthaṁ himavadgṛham

उन्होंने उन ऋषियों को कन्या माँगने के लिए हिमालय के पास जाने का आदेश दिया। भगवान् द्वारा इस प्रकार आदेश पाकर वे कन्या के निमित्त हिमवान के घर,

श्लोक 36 (skanda.2.163.36)

प्रापुर्विहायसा सर्वे द्योतयन्तो दिशो दश । प्रत्युज्जगाम स गिरिः सप्तैतान्ब्रह्मवित्तमान्

prāpurvihāyasā sarve dyotayanto diśo daśa pratyujjagāma sa giriḥ saptaitānbrahmavittamān

आकाश-मार्ग से पहुँचे, दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए। उस पर्वत ने ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ उन सातों ऋषियों की अगवानी की।

श्लोक 37 (skanda.2.163.37)

संपूज्य विधिवत्सर्वान्सुखासीनानपृच्छत । धन्योऽस्मि कृतकृत्योऽस्मि यद्भवतो गृहाऽऽगताः

saṁpūjya vidhivatsarvānsukhāsīnānapṛcchata dhanyo'smi kṛtakṛtyo'smi yadbhavato gṛhā''gatāḥ

विधिवत् सबकी पूजा करके, उन्हें सुखपूर्वक बैठाकर उसने पूछा — 'मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, कि आप सब मेरे घर पधारे हैं।

श्लोक 38 (skanda.2.163.38)

भवदागमनं मन्ये मम जन्मफलं त्विति । न कृत्यं विद्यतेऽस्माभिः पूर्णार्थानां महात्मनाम्

bhavadāgamanaṁ manye mama janmaphalaṁ tviti na kṛtyaṁ vidyate'smābhiḥ pūrṇārthānāṁ mahātmanām

मैं आपके आगमन को अपने जन्म का फल मानता हूँ। आप जैसे परिपूर्ण-अर्थ महात्माओं को हमसे कोई कार्य तो नहीं है,

श्लोक 39 (skanda.2.163.39)

तथाऽपि ब्रूत कार्यं वो यत्कर्तव्यं मयाऽधुना । इत्युक्तास्ते तथा प्रोचुर्हिमवंतं महागिरिम्

tathā'pi brūta kāryaṁ vo yatkartavyaṁ mayā'dhunā ityuktāste tathā procurhimavaṁtaṁ mahāgirim

फिर भी बताइए आपका प्रयोजन, जो मुझे अभी करना है।' इस प्रकार कहे जाने पर उन्होंने महागिरि हिमवान से इस प्रकार कहा।

श्लोक 40 (skanda.2.163.40)

त्वया स्वसदृशं वाक्यमुक्तं गिरिपते दृढम् । अस्मदागमने हेतुं वक्ष्यामस्ते महोदये

tvayā svasadṛśaṁ vākyamuktaṁ giripate dṛḍham asmadāgamane hetuṁ vakṣyāmaste mahodaye

'हे पर्वतपते! आपने अपने अनुरूप ही यह दृढ़ वचन कहा है। हे महामते, अब हम आपको अपने आगमन का कारण बताते हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.163.41)

कन्या ते पार्वती नाम पूर्वं दक्षात्मजा सती । जाता तव कुमारी या यज्ञे त्यक्तकलेवरा

kanyā te pārvatī nāma pūrvaṁ dakṣātmajā satī jātā tava kumārī yā yajñe tyaktakalevarā

तुम्हारी जो कन्या पार्वती नाम की है, वह पहले दक्ष की पुत्री सती थी, जिसने यज्ञ में देह त्याग की थी और अब तुम्हारी पुत्री के रूप में जन्मी है।

श्लोक 42 (skanda.2.163.42)

अस्याः पाणिग्रहे दक्षः शंभुर्नाऽन्यो जगत्त्रये । देया सा शंभवे देवी भवताऽऽनंत्यमिच्छता

asyāḥ pāṇigrahe dakṣaḥ śaṁbhurnā'nyo jagattraye deyā sā śaṁbhave devī bhavatā''naṁtyamicchatā

तीनों लोकों में इसका पाणिग्रहण करने में शंभु के अतिरिक्त और कोई भी समर्थ नहीं है; इसलिए अनन्त कल्याण चाहने वाले आपको यह देवी शंभु को ही देनी चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.2.163.43)

पूर्वजन्मसहस्रेषु भवता सुकृतं कृतम् । इदानीं तव दिष्ट्या तु परिपाकमुपागतम्

pūrvajanmasahasreṣu bhavatā sukṛtaṁ kṛtam idānīṁ tava diṣṭyā tu paripākamupāgatam

हजारों पूर्वजन्मों में तुमने जो पुण्य किया है, वह अब सौभाग्य से अपना फल देने के समय को प्राप्त हो गया है।'

श्लोक 44 (skanda.2.163.44)

तेषां तद्वचनं श्रुत्वा संहृष्टाऽऽत्मा महागिरिः । व्याजहार पुनर्वाक्यं पुत्री वल्कलधारिणी

teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā saṁhṛṣṭā''tmā mahāgiriḥ vyājahāra punarvākyaṁ putrī valkaladhāriṇī

उनका यह वचन सुनकर हर्षित हृदय वाले महागिरि ने पुनः यह वचन कहा — 'मेरी पुत्री वल्कल धारण करने वाली है,

श्लोक 45 (skanda.2.163.45)

गंगातीरे निराहारा तपस्तपति दुश्चरम्। काङ्क्षमाणा पतिं शंभुं तस्या इष्टमिदं त्विति

gaṁgātīre nirāhārā tapastapati duścaram kāṅkṣamāṇā patiṁ śaṁbhuṁ tasyā iṣṭamidaṁ tviti

गंगा-तट पर निराहार रहकर दुष्कर तप कर रही है, और शंभु को ही पति रूप में चाहती है — तो उसकी यही इच्छा है।

श्लोक 46 (skanda.2.163.46)

दत्ता कन्या मया तस्मै त्र्यंबकाय महात्मने । शीघ्रं गत्वा भवंतस्तु यत्र शम्भुर्महाप्रभुः

dattā kanyā mayā tasmai tryaṁbakāya mahātmane śīghraṁ gatvā bhavaṁtastu yatra śambhurmahāprabhuḥ

मैंने अपनी कन्या उस महात्मा त्र्यंबक को दे दी है। आप शीघ्र जाकर, जहाँ महाप्रभु शंभु हैं,

श्लोक 47 (skanda.2.163.47)

प्रीत्या हिमवता दत्तां गृहाणेति निवेद्य च । भवंत एव कुर्वंतु चैतद्वैवाहिकीं क्रियाम्

prītyā himavatā dattāṁ gṛhāṇeti nivedya ca bhavaṁta eva kurvaṁtu caitadvaivāhikīṁ kriyām

और यह निवेदन करके कि हिमवान ने प्रसन्नतापूर्वक उसे दे दिया है, 'ग्रहण कीजिए' — आप ही लोग इस विवाह की क्रिया संपन्न कराइए।'

श्लोक 48 (skanda.2.163.48)

इत्युक्तास्ते हिमवता तमामंत्र्य शिवं ययुः । लक्ष्म्याद्या योषितः सर्वा विष्ण्वाद्या देवता अपि

ityuktāste himavatā tamāmaṁtrya śivaṁ yayuḥ lakṣmyādyā yoṣitaḥ sarvā viṣṇvādyā devatā api

हिमवान द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर वे उससे विदा लेकर शिव के पास गए। लक्ष्मी आदि सभी देवियाँ और विष्णु आदि सभी देवता भी,

श्लोक 49 (skanda.2.163.49)

षण्मातरोऽथ मुनयो द्रष्टुं जग्मुर्महोत्सवम् । शिवः सर्वामरगणैर्मुनिभिर्मातृभिस्तथा

ṣaṇmātaro'tha munayo draṣṭuṁ jagmurmahotsavam śivaḥ sarvāmaragaṇairmunibhirmātṛbhistathā

षट्-मातृकाएँ और मुनिगण भी उस महोत्सव को देखने के लिए गए। शिव भी समस्त देवगणों, मुनियों तथा मातृकाओं के साथ,

श्लोक 50 (skanda.2.163.50)

अन्वितो वृषभारूढः प्रमथानां गणैर्वृतः । भेरीशंखमृदंगाद्यैः काहलीपटहादिकैः

anvito vṛṣabhārūḍhaḥ pramathānāṁ gaṇairvṛtaḥ bherīśaṁkhamṛdaṁgādyaiḥ kāhalīpaṭahādikaiḥ

वृषभ पर आरूढ़ होकर, प्रमथगणों से घिरे हुए, भेरी, शंख, मृदंग आदि तथा काहली, पटह आदि वाद्यों की ध्वनि के साथ,

श्लोक 51 (skanda.2.163.51)

ब्रह्मघोषैर्बंदिभिश्च प्राविशद्धिमवत्पुरीम् । सुमुहूर्ते शुभे लग्ने शुभग्रहनिरीक्षिते

brahmaghoṣairbaṁdibhiśca prāviśaddhimavatpurīm sumuhūrte śubhe lagne śubhagrahanirīkṣite

तथा वेदघोष और भाटों की स्तुति के साथ, हिमवान की नगरी में प्रविष्ट हुए। शुभ मुहूर्त में, शुभ लग्न में, शुभ ग्रहों से देखे गए समय पर,

श्लोक 52 (skanda.2.163.52)

विवाहमकरोच्छैलः प्रहृष्टेनांतरात्मना । महोत्सवस्तदा चाऽऽसीत्त्रिलोक्यां प्राणिनां नृप

vivāhamakarocchailaḥ prahṛṣṭenāṁtarātmanā mahotsavastadā cā''sīttrilokyāṁ prāṇināṁ nṛpa

पर्वतराज ने प्रसन्नचित्त होकर विवाह संपन्न कराया। हे राजन्! उस समय तीनों लोकों के समस्त प्राणियों में महान् उत्सव हुआ।

श्लोक 53 (skanda.2.163.53)

महोत्सवे निवृत्ते तु शंकरो लोकशंकरः । रेमे स्वच्छंदया देव्या लोकधर्माननुव्रतः

mahotsave nivṛtte tu śaṁkaro lokaśaṁkaraḥ reme svacchaṁdayā devyā lokadharmānanuvrataḥ

उत्सव समाप्त होने पर, लोक-कल्याणकारी शंकर, लोक-व्यवहार का अनुसरण करते हुए, स्वच्छंद विहार करने वाली देवी के साथ रमण करने लगे।

श्लोक 54 (skanda.2.163.54)

ऋद्धिमद्धिमवद्गेहे देवेंद्रभवनोपमे । शर्वर्यां नंदिनीतीरे वनराजिषु शंकरः

ṛddhimaddhimavadgehe deveṁdrabhavanopame śarvaryāṁ naṁdinītīre vanarājiṣu śaṁkaraḥ

इन्द्रभवन के समान समृद्धिशाली हिमवान के घर में, रात्रि में नंदिनी नदी के तट पर, वन-पंक्तियों में, शंकर,

श्लोक 55 (skanda.2.163.55)

मत्तालिद्विजसन्नादमयूररवमंडिते । दिव्यवर्षसहस्राणि रेमे स्वच्छंदया विभुः

mattālidvijasannādamayūraravamaṁḍite divyavarṣasahasrāṇi reme svacchaṁdayā vibhuḥ

जो मतवाले भ्रमरों, पक्षियों की ध्वनि और मयूरों के कूजन से सुशोभित थे, वहाँ प्रभु ने स्वच्छंद विहार करने वाली देवी के साथ हजार दिव्य वर्षों तक रमण किया।

श्लोक 56 (skanda.2.163.56)

स्त्रीणामिंद्रवराभावात्तस्मिन्काले नृपोत्तम । पुंसः संगात्पुनर्गर्भो नारीणां स्रवति धुवम्

strīṇāmiṁdravarābhāvāttasminkāle nṛpottama puṁsaḥ saṁgātpunargarbho nārīṇāṁ sravati dhuvam

हे नृपोत्तम! उस काल में स्त्रियों में इंद्र के वरदान का अभाव होने से, पुरुष के संग से स्त्रियों का गर्भ निश्चय ही (बार-बार) गिर जाता था।

श्लोक 57 (skanda.2.163.57)

प्रत्यहं रमणाद्देव्यां नाभूद्गर्भो हराद्बत । देवानामभवच्चिन्ता पुत्रालाभाद्वराद्विभो

pratyahaṁ ramaṇāddevyāṁ nābhūdgarbho harādbata devānāmabhavaccintā putrālābhādvarādvibho

इस कारण प्रतिदिन रमण करने पर भी हर के द्वारा देवी में गर्भ स्थापित नहीं हो सका। हे विभो! उस वर के कारण पुत्र-प्राप्ति न होने से देवताओं को चिंता होने लगी।

श्लोक 58 (skanda.2.163.58)

सर्वे संगत्य संमंत्र्य मिथ एवं बभाषिरे । कामीवाऽभूद्रतौ नित्यं सक्तो देव्या हरः स्वराट्

sarve saṁgatya saṁmaṁtrya mitha evaṁ babhāṣire kāmīvā'bhūdratau nityaṁ sakto devyā haraḥ svarāṭ

सब मिलकर परामर्श करके आपस में इस प्रकार कहने लगे — 'स्वयं-प्रकाश हर तो देवी के साथ रति में नित्य आसक्त कामी के समान हो गए हैं;

श्लोक 59 (skanda.2.163.59)

नाऽस्माकं सिद्ध्यते कार्यं नित्यं गर्भस्य संस्रवात् । पुना रतिर्यथा नाऽभूत्तथाऽस्माभिर्विधीयताम्

nā'smākaṁ siddhyate kāryaṁ nityaṁ garbhasya saṁsravāt punā ratiryathā nā'bhūttathā'smābhirvidhīyatām

किंतु गर्भ का बार-बार गिर जाना ही हो रहा है, हमारा कार्य सिद्ध नहीं हो रहा है। अतः हमें ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि उनका पुनः समागम ही न हो।'

श्लोक 60 (skanda.2.163.60)

मिथ एवं तु संभाष्य व्यचिन्वन्क्षणमत्र ते । अग्निं कृत्ये विनिश्चित्य ह्यूचुर्मानपुरःसरम्

mitha evaṁ tu saṁbhāṣya vyacinvankṣaṇamatra te agniṁ kṛtye viniścitya hyūcurmānapuraḥsaram

इस प्रकार आपस में बातचीत करके वे कुछ क्षण विचार करते रहे। फिर इस कार्य के लिए अग्नि को निश्चित करके, आदरपूर्वक उससे यह बोले।

श्लोक 61 (skanda.2.163.61)

अग्ने मुखं त्वं देवानां त्वं बन्धुर्गतिरेव च । इदानीमपि गच्छ त्वं रमते यत्र वै हरः

agne mukhaṁ tvaṁ devānāṁ tvaṁ bandhurgatireva ca idānīmapi gaccha tvaṁ ramate yatra vai haraḥ

'हे अग्नि! तुम देवताओं के मुख हो, तुम्हीं बंधु हो और तुम्हीं गति हो। अब भी तुम वहाँ जाओ, जहाँ हर रमण कर रहे हैं,

श्लोक 62 (skanda.2.163.62)

रत्यन्ते दर्शयाऽऽत्मानं पुना रतिर्यथा न वै । त्वां दृष्ट्वा व्रीडिता देवी ततश्चापसरेद्ध्रुवम्

ratyante darśayā''tmānaṁ punā ratiryathā na vai tvāṁ dṛṣṭvā vrīḍitā devī tataścāpasareddhruvam

और मैथुन के अंत में स्वयं को प्रकट करो, ताकि पुनः समागम न हो सके; तुम्हें देखकर लज्जित देवी निश्चय ही वहाँ से हट जाएँगी।

श्लोक 63 (skanda.2.163.63)

शिष्यो भूत्वा तु रत्यन्ते पृच्छ तत्त्वं स्मरान्तकम् । तत्त्वसम्प्रश्नव्याजेन कालं बहु नय प्रभो

śiṣyo bhūtvā tu ratyante pṛccha tattvaṁ smarāntakam tattvasampraśnavyājena kālaṁ bahu naya prabho

एक शिष्य बनकर, समागम के बाद, कामांतक (शिव) से तत्त्व के विषय में पूछो; तत्त्व-प्रश्न के बहाने से, हे प्रभो, बहुत समय व्यतीत करा दो।

श्लोक 64 (skanda.2.163.64)

बहुकाले गते देवी कुमारं प्रसविष्यति । देवैरेवं प्रार्थितोऽग्निरोमित्युक्त्वा हरं ययौ

bahukāle gate devī kumāraṁ prasaviṣyati devairevaṁ prārthito'gniromityuktvā haraṁ yayau

बहुत समय बीत जाने पर देवी कुमार को जन्म देंगी।' देवताओं द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर अग्नि 'ॐ, ऐसा ही होगा' कहकर हर के पास गए।

श्लोक 65 (skanda.2.163.65)

वीर्योत्सर्गात्पूर्वमेव गतो वह्नी रतांतरे । तं दृष्ट्वा व्रीडिता देवी विवस्त्रा विमना ययौ

vīryotsargātpūrvameva gato vahnī ratāṁtare taṁ dṛṣṭvā vrīḍitā devī vivastrā vimanā yayau

अग्नि उस समागम के मध्य वीर्य-स्खलन से पहले ही जा पहुँचे। उन्हें देखकर लज्जित देवी विवस्त्र और उदास होकर वहाँ से चली गईं।

श्लोक 66 (skanda.2.163.66)

रति विहाय त्वरया ततो रुद्रोऽतिकोपितः । वह्निं प्राह गृहाणेदमभिसृष्टं तु दुर्मते

rati vihāya tvarayā tato rudro'tikopitaḥ vahniṁ prāha gṛhāṇedamabhisṛṣṭaṁ tu durmate

रति-क्रिया को तत्काल छोड़कर रुद्र अत्यंत क्रोधित हो गए, और अग्नि से कहा — 'हे दुर्बुद्धे! अभी छोड़ा गया यह वीर्य ग्रहण करो।

श्लोक 67 (skanda.2.163.67)

मद्वीर्यं दुःसहं पाप रतौ विघ्नस्त्वयाऽभवत् । उत्सृजामि च मद्वीर्यं त्वन्मुखे हव्यवाहन

madvīryaṁ duḥsahaṁ pāpa ratau vighnastvayā'bhavat utsṛjāmi ca madvīryaṁ tvanmukhe havyavāhana

हे पापी! मेरे इस दुःसह वीर्य में तुमने विघ्न डाला है; अतः हे हव्यवाहन (अग्नि), मैं अपना यह वीर्य तुम्हारे ही मुख में डालता हूँ।'

श्लोक 68 (skanda.2.163.68)

इत्युक्त्वोत्सृष्टवान्वीर्यं हव्यवाहमुखे हरः । तद्धृत्वा दह्यमानः सन्स्वोदरे वीर्यमुल्बणम्

ityuktvotsṛṣṭavānvīryaṁ havyavāhamukhe haraḥ taddhṛtvā dahyamānaḥ sansvodare vīryamulbaṇam

यह कहकर हर ने अपना वीर्य अग्नि के मुख में छोड़ दिया। उसे धारण करके, उस उग्र वीर्य से अपने उदर में जलता हुआ,

श्लोक 69 (skanda.2.163.69)

चिंतयानो ययौ धाम देवानां यज्ञपूरुषः । कथंचित्प्राणतो मुक्तो देवेभ्यस्तन्न्यवेदयत्

ciṁtayāno yayau dhāma devānāṁ yajñapūruṣaḥ kathaṁcitprāṇato mukto devebhyastannyavedayat

अत्यंत चिंतित हुआ यज्ञपुरुष अग्नि देवताओं के धाम को गया। किसी प्रकार अपने प्राणों की रक्षा करके उसने यह वृत्तांत देवताओं को सुनाया।

श्लोक 70 (skanda.2.163.70)

देवा वह्नीरितं श्रुत्वा हर्षशोकौ समाययुः । स्थितं वीर्यमिति ह्रादं कथं तु प्रसवो भवेत्

devā vahnīritaṁ śrutvā harṣaśokau samāyayuḥ sthitaṁ vīryamiti hrādaṁ kathaṁ tu prasavo bhavet

देवगण अग्नि की यह बात सुनकर हर्ष और शोक दोनों से भर गए — यह सोचकर कि वीर्य तो स्थित हो गया है, पर इससे प्रसव कैसे होगा।

श्लोक 71 (skanda.2.163.71)

इति दुःखं तदा चाऽऽसीद्वह्नेः कुक्षौ तु शांभवम् । ववृधे तेज आक्षिप्तं दश मासा गतास्तदा

iti duḥkhaṁ tadā cā''sīdvahneḥ kukṣau tu śāṁbhavam vavṛdhe teja ākṣiptaṁ daśa māsā gatāstadā

उस समय यही दुःख था। अग्नि के उदर में वह शांभव तेज बढ़ता गया, और इस प्रकार दस मास बीत गए।

श्लोक 72 (skanda.2.163.72)

नाऽपश्यत्प्रसवोपायं बहुदुःखपरायणः । देवान्वै शरणं प्राप गर्भमोचनहेतवे

nā'paśyatprasavopāyaṁ bahuduḥkhaparāyaṇaḥ devānvai śaraṇaṁ prāpa garbhamocanahetave

अत्यंत दुःख से भरे अग्नि को प्रसव का कोई उपाय नहीं सूझा, अतः उसने गर्भ-मोचन के लिए देवताओं की शरण ली।

श्लोक 73 (skanda.2.163.73)

ते देवा वह्निना साकं प्रापुर्गंगां यशस्विनीम् । गंगा स्तोत्रेण ते स्तुत्या प्रार्थयामासुरंजसा

te devā vahninā sākaṁ prāpurgaṁgāṁ yaśasvinīm gaṁgā stotreṇa te stutyā prārthayāmāsuraṁjasā

वे देवगण अग्नि के साथ यशस्विनी गंगा के पास पहुँचे, और उन्होंने स्तोत्र द्वारा उसकी स्तुति करते हुए सीधे यह प्रार्थना की।

श्लोक 74 (skanda.2.163.74)

त्वं माता सर्वदेवानां त्वमेव जगतां पतिः । देवतार्थं तु त्वं भद्रे धत्स्व तेजस्तु शांभवम्

tvaṁ mātā sarvadevānāṁ tvameva jagatāṁ patiḥ devatārthaṁ tu tvaṁ bhadre dhatsva tejastu śāṁbhavam

'तुम समस्त देवताओं की माता हो, तुम ही जगत् की पालनकर्त्री हो। हे भद्रे! देवताओं के हित के लिए तुम इस शांभव तेज को धारण करो।

श्लोक 75 (skanda.2.163.75)

तद्वह्नेर्वर्द्धते गर्भो नास्त्रीत्वात्प्रसवोऽस्य च । तस्मादेनं च नः सर्वान्समुद्धर दयां कुरु

tadvahnervarddhate garbho nāstrītvātprasavo'sya ca tasmādenaṁ ca naḥ sarvānsamuddhara dayāṁ kuru

अग्नि में वह गर्भ बढ़ता ही जा रहा है, किन्तु स्त्रीत्व के अभाव में इसका प्रसव संभव नहीं है; अतः हम सभी का उद्धार करो, हम पर दया करो।'

श्लोक 76 (skanda.2.163.76)

इत्येवं प्रार्थिता देवी तथास्त्विति वचोऽब्रवीत् । देवास्तु वह्नये प्राहुर्मंत्रं गर्भविमोचनम्

ityevaṁ prārthitā devī tathāstviti vaco'bravīt devāstu vahnaye prāhurmaṁtraṁ garbhavimocanam

इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर देवी गंगा ने 'ऐसा ही हो' कहा। तत्पश्चात् देवताओं ने अग्नि को गर्भ-विमोचन का मंत्र बताया।

श्लोक 77 (skanda.2.163.77)

तन्मंत्राद्गर्भमाकृष्य व्यसृजद्धव्यवाहनः । गंगायां शांभवं तेजो भास्वल्लोकसुदुःसहम्

tanmaṁtrādgarbhamākṛṣya vyasṛjaddhavyavāhanaḥ gaṁgāyāṁ śāṁbhavaṁ tejo bhāsvallokasuduḥsaham

उस मंत्र के प्रभाव से हव्यवाहन (अग्नि) ने गर्भ को खींचकर उस देदीप्यमान, संसार के लिए अत्यंत असह्य शांभव तेज को गंगा में विसर्जित कर दिया।

श्लोक 78 (skanda.2.163.78)

सा चोढ्वा कतिचिन्मासान्न शशाक ततः परम् । निर्जला तत्प्रभावेण स्फुटद्रक्तकलेवरा

sā coḍhvā katicinmāsānna śaśāka tataḥ param nirjalā tatprabhāveṇa sphuṭadraktakalevarā

उसे कुछ मास धारण करने के बाद गंगा भी आगे धारण न कर सकीं; उसके प्रभाव से उनका जल सूख गया और उनकी देह रक्त से फटने लगी।

श्लोक 79 (skanda.2.163.79)

बहुदुःखाऽऽकुला देवी पातिव्रत्यप्रभावतः । उज्जहार स्वोदरस्थं गर्भं लोकैकपावनी

bahuduḥkhā''kulā devī pātivratyaprabhāvataḥ ujjahāra svodarasthaṁ garbhaṁ lokaikapāvanī

अत्यंत दुःख से व्याकुल उस देवी ने अपने पातिव्रत्य के प्रभाव से, लोक की एकमात्र पवित्र करने वाली उस गंगा ने, अपने उदर में स्थित गर्भ को बाहर निकाल दिया,

श्लोक 80 (skanda.2.163.80)

शरकांडे तु चिक्षेप दह्यमानं समन्ततः । शरकांडैस्तु संभिन्नः षोढा भिन्नो बभूव ह

śarakāṁḍe tu cikṣepa dahyamānaṁ samantataḥ śarakāṁḍaistu saṁbhinnaḥ ṣoḍhā bhinno babhūva ha

और सर्वत्र जलते हुए उस गर्भ को शर (सरकंडे) के वन में डाल दिया। शरकांडों से टकराकर वह छह भागों में विभक्त हो गया।

श्लोक 81 (skanda.2.163.81)

षट्कृऽत्तिकाः समाजग्मुर्ब्रह्मणा चोदितास्तदा । शरकांडे विनिर्भिन्नं षोढा संधाय शांभवम्

ṣaṭkṛ'ttikāḥ samājagmurbrahmaṇā coditāstadā śarakāṁḍe vinirbhinnaṁ ṣoḍhā saṁdhāya śāṁbhavam

तब ब्रह्मा द्वारा प्रेरित होकर छहों कृत्तिकाएँ वहाँ आ गईं, और शरकांडों में छह भागों में विभक्त उस शांभव तेज को जोड़कर,

श्लोक 82 (skanda.2.163.82)

षण्मुखं पुरुषं कृत्वा त्वेकदेहमिति स्फुटम् । कृत्तिका विधिनाऽऽज्ञप्तास्तं तथा चक्रिरे दृढम्

ṣaṇmukhaṁ puruṣaṁ kṛtvā tvekadehamiti sphuṭam kṛttikā vidhinā''jñaptāstaṁ tathā cakrire dṛḍham

विधाता की इस आज्ञा से उसे एक ही देह में छह मुख वाला पुरुष बनाकर दृढ़तापूर्वक स्थापित कर दिया।

श्लोक 83 (skanda.2.163.83)

तद्देहं पुरुषाकारं षण्मुखं शरकांडगम् । अरक्ष्यमाणमेवासीच्छरकांडेषु वै चिरम्

taddehaṁ puruṣākāraṁ ṣaṇmukhaṁ śarakāṁḍagam arakṣyamāṇamevāsīccharakāṁḍeṣu vai ciram

मानव-आकार का, छह मुख वाला वह शरीर बिना किसी संरक्षण के ही उन शरकांडों के बीच बहुत समय तक पड़ा रहा।

श्लोक 84 (skanda.2.163.84)

एकदा वृषभाऽरूढौ पार्वतीपरमेश्वरौ । श्रीशैलं गंतुमनसौ तत्स्थलं परिजग्मतुः

ekadā vṛṣabhā'rūḍhau pārvatīparameśvarau śrīśailaṁ gaṁtumanasau tatsthalaṁ parijagmatuḥ

एक बार वृषभ पर आरूढ़ पार्वती और परमेश्वर, श्रीशैल जाने की इच्छा से उसी स्थान से होकर गुजरे।

श्लोक 85 (skanda.2.163.85)

तदासीत्पार्वती देवी सद्यः स्नुतपयोधरा । विस्मिता चावदद्रुद्रं स्नुतौ कस्मात्पयोधरौ

tadāsītpārvatī devī sadyaḥ snutapayodharā vismitā cāvadadrudraṁ snutau kasmātpayodharau

उस समय देवी पार्वती के स्तनों से अकस्मात् दूध बहने लगा। विस्मित होकर उन्होंने रुद्र से पूछा — 'मेरे स्तनों से दूध क्यों बह रहा है?

श्लोक 86 (skanda.2.163.86)

कारणं ब्रूहि विश्वात्मन्नित्युक्तस्तु हरोऽब्रवीत् । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि पुत्रोऽधो वर्तते तव

kāraṇaṁ brūhi viśvātmannityuktastu haro'bravīt śṛṇu devi pravakṣyāmi putro'dho vartate tava

हे विश्वात्मन्! इसका कारण बताइए।' इस प्रकार कहे जाने पर हर ने कहा — 'हे देवि, सुनो, मैं बताता हूँ; तुम्हारा पुत्र नीचे ही कहीं है।

श्लोक 87 (skanda.2.163.87)

त्वयि वीर्यमनुत्सृष्टं प्रागेवाऽऽगाद्धविर्वहः । तं दृष्ट्वा व्रीडिता त्वं वै प्रविष्टा च स्थलान्तरम्

tvayi vīryamanutsṛṣṭaṁ prāgevā''gāddhavirvahaḥ taṁ dṛṣṭvā vrīḍitā tvaṁ vai praviṣṭā ca sthalāntaram

तुममें वीर्य न छोड़े जाने से पहले ही अग्नि आ गया था। उसे देखकर लज्जित होकर तुम वहाँ से दूसरे स्थान पर चली गई थीं।

श्लोक 88 (skanda.2.163.88)

मया कोपाद्वह्नि मुखे विसृष्टं वीर्यमुल्बणम् । देवानां च प्रसादेन गंगायां व्यसृजद्विभुः

mayā kopādvahni mukhe visṛṣṭaṁ vīryamulbaṇam devānāṁ ca prasādena gaṁgāyāṁ vyasṛjadvibhuḥ

मैंने क्रोधवश वह उग्र वीर्य अग्नि के मुख में छोड़ दिया था। देवताओं के अनुग्रह से उस प्रभु ने उसे गंगा में विसर्जित कर दिया।

श्लोक 89 (skanda.2.163.89)

गंगा च दह्यमाना सा व्यक्षिपञ्च शरान्तरं । तत्र षोढा प्रभिन्नं तु मातृभिश्च दृढीकृतम्

gaṁgā ca dahyamānā sā vyakṣipañca śarāntaraṁ tatra ṣoḍhā prabhinnaṁ tu mātṛbhiśca dṛḍhīkṛtam

जलती हुई गंगा ने उसे शर-वन में डाल दिया। वहाँ वह छह भागों में विभक्त हुआ, और मातृकाओं द्वारा दृढ़ किया गया।

श्लोक 90 (skanda.2.163.90)

पुरुषाकृतिमापेदे तं दृष्ट्वा ते स्तनौ सुतौ । पालनीयं महावीर्यं विष्णुना समविक्रमम्

puruṣākṛtimāpede taṁ dṛṣṭvā te stanau sutau pālanīyaṁ mahāvīryaṁ viṣṇunā samavikramam

वह पुरुष के आकार को प्राप्त हुआ। हे प्रिये, उसे अपना ही पुत्र जानकर, विष्णु के समान पराक्रमी और महावीर्यवान् उसका पालन तुम्हें ही करना चाहिए।

श्लोक 91 (skanda.2.163.91)

अयमे वौरसः पुत्रस्तव भाति विनिश्चितम् । तस्माद्गृहाण शीघ्रं त्वं तेनाऽऽख्यातिरतीव ते

ayame vaurasaḥ putrastava bhāti viniścitam tasmādgṛhāṇa śīghraṁ tvaṁ tenā''khyātiratīva te

यह निश्चय ही तुम्हारा अपना, औरस पुत्र है। इसलिए तुम शीघ्र ही उसे ग्रहण करो; उसी से तुम्हारी अत्यंत ख्याति होगी।'

श्लोक 92 (skanda.2.163.92)

इत्याऽऽज्ञप्ता शंभुना सा तमादायाऽर्भकं द्रुतम् । अंकमारोप्य तं देवी पाययामास सा स्तनौ

ityā''jñaptā śaṁbhunā sā tamādāyā'rbhakaṁ drutam aṁkamāropya taṁ devī pāyayāmāsa sā stanau

शंभु द्वारा इस प्रकार आज्ञा दिए जाने पर देवी ने शीघ्र ही उस बालक को उठाकर अपनी गोद में बिठाया, और उसे अपने स्तनों का पान कराया।

श्लोक 93 (skanda.2.163.93)

देवेन मोहिता देवी पुत्रस्नेहपराऽभवत् । पुनः कैलासमगमत्प्रभुणा सह शांकरी

devena mohitā devī putrasnehaparā'bhavat punaḥ kailāsamagamatprabhuṇā saha śāṁkarī

देव द्वारा मोहित हुई वह देवी पुत्र-स्नेह में लीन हो गईं, और शांकरी (पार्वती) प्रभु के साथ पुनः कैलास को गईं।

श्लोक 94 (skanda.2.163.94)

लालयंती सुतं देवी संतोषं परमं ययौ । एवं कुमारजननं वर्णितं ते मयाऽद्भुतम्

lālayaṁtī sutaṁ devī saṁtoṣaṁ paramaṁ yayau evaṁ kumārajananaṁ varṇitaṁ te mayā'dbhutam

अपने पुत्र को दुलारती हुई देवी परम संतोष को प्राप्त हुईं। इस प्रकार मैंने तुम्हें कुमार के जन्म का यह अद्भुत वर्णन सुनाया।

श्लोक 95 (skanda.2.163.95)

य इदं शृणुयान्नित्यं कुमारजननं शुभम् । पुत्रपौत्राभिवृद्धिं तु लभते नाऽत्र संशयः

ya idaṁ śṛṇuyānnityaṁ kumārajananaṁ śubham putrapautrābhivṛddhiṁ tu labhate nā'tra saṁśayaḥ

जो कोई इस शुभ कुमार-जन्म-कथा को नित्य सुनता है, वह पुत्र-पौत्रों की वृद्धि प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 96 (skanda.2.163.96)

महद्दुःखं तु जनने हरस्याऽपि यतोऽभवत् । प्रीत्यानुश्रुतवैशाखधर्मोऽप्यप्रतिमो भवेत्

mahadduḥkhaṁ tu janane harasyā'pi yato'bhavat prītyānuśrutavaiśākhadharmo'pyapratimo bhavet

क्योंकि हर के इस पुत्र के जन्म में भी इतना महान् दुःख हुआ था; अतः जो प्रेमपूर्वक वैशाख-धर्म का श्रवण करता है, वह भी अनुपम फल का भागी होता है।

श्लोक 97 (skanda.2.163.97)

तस्माद्वैशाखधर्मो हि सर्वाघौघविनाशनः । अवैधव्यप्रदः पुण्यः सर्वसंपद्विधायकः

tasmādvaiśākhadharmo hi sarvāghaughavināśanaḥ avaidhavyapradaḥ puṇyaḥ sarvasaṁpadvidhāyakaḥ

अतः वैशाख-धर्म ही समस्त पापों के समूह का नाश करने वाला है; यह अवैधव्य (सौभाग्य) देने वाला, पुण्यमय और सभी संपदाओं का विधाता है।

श्लोक 98 (skanda.2.163.98)

अनंगोपि हि सांगत्वं यत्प्रभावात्समाप्तवान् । अस्नात्वा चाप्यदत्त्वा च वैशाखो यस्य वै गतः

anaṁgopi hi sāṁgatvaṁ yatprabhāvātsamāptavān asnātvā cāpyadattvā ca vaiśākho yasya vai gataḥ

इसी के प्रभाव से अनंग (कामदेव) भी सांग हो गया। किंतु जिसका वैशाख मास बिना स्नान किए और बिना दान किए बीत गया,

श्लोक 99 (skanda.2.163.99)

अपि धर्मकृतो वाऽपि भवेद्दुःखपरंपरा । सर्वधर्मो हितः स्याच्च यद्येकोऽयमनुष्ठितः

api dharmakṛto vā'pi bhavedduḥkhaparaṁparā sarvadharmo hitaḥ syācca yadyeko'yamanuṣṭhitaḥ

वह चाहे अन्य धर्म करने वाला ही क्यों न हो, उसे दुःखों की परंपरा प्राप्त होती है। यदि यह एक ही धर्म पूर्णतः पालन किया जाए, तो वह सभी धर्मों का हितकारी फल देने वाला होता है।

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