वैष्णव खण्ड · अध्याय 164
छत्रदान-प्रशंसा एवं हेमकान्त-ब्रह्महत्यादिपाप-शमन-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.164.1)
मैथिल उवाच । यत्कामपत्नीचरितमशून्यशयनं व्रतम् । देवोपदिष्टं तस्याऽस्य विधानं ब्रूहि भूसुर
maithila uvāca yatkāmapatnīcaritamaśūnyaśayanaṁ vratam devopadiṣṭaṁ tasyā'sya vidhānaṁ brūhi bhūsura
मैथिल ने कहा — हे भूसुर! कामदेव की पत्नी (रति) द्वारा किया गया वह अशून्यशयन व्रत जो देवताओं द्वारा उपदिष्ट है, उसकी विधि मुझे बताइए।
श्लोक 2 (skanda.2.164.2)
किं दानं को विधिस्तस्य पूजनं किं फलं तथा । एतदाचक्ष्व भूदेव श्रोतुं कौतूहलं हि मे
kiṁ dānaṁ ko vidhistasya pūjanaṁ kiṁ phalaṁ tathā etadācakṣva bhūdeva śrotuṁ kautūhalaṁ hi me
उसका दान क्या है, विधि क्या है, पूजन कैसा है और फल क्या है? हे भूदेव! यह बताइए, मुझे सुनने की उत्सुकता है।
श्लोक 3 (skanda.2.164.3)
श्रुतदेव उवाच । शृणु भूयः प्रवक्ष्यामि व्रतं पापप्रणाशनम् । अशून्यशयनं नाम रमायै हरिणोदितम्
śrutadeva uvāca śṛṇu bhūyaḥ pravakṣyāmi vrataṁ pāpapraṇāśanam aśūnyaśayanaṁ nāma ramāyai hariṇoditam
श्रुतदेव ने कहा — फिर सुनो, मैं वह पाप-नाशक व्रत बताता हूँ, जिसे 'अशून्यशयन' कहते हैं, और जो हरि द्वारा लक्ष्मी को बताया गया था।
श्लोक 4 (skanda.2.164.4)
येन चीर्णेन देवेशो जीमूताऽऽभः प्रसीदति । लक्ष्मीभर्ता जगन्नाथः समस्ताऽघौघनाशनः
yena cīrṇena deveśo jīmūtā''bhaḥ prasīdati lakṣmībhartā jagannāthaḥ samastā'ghaughanāśanaḥ
इसे पालन करने से मेघ के समान श्यामवर्ण देवेश, लक्ष्मी के पति, जगन्नाथ, जो समस्त पाप-समूहों का नाश करने वाले हैं, प्रसन्न होते हैं।
श्लोक 5 (skanda.2.164.5)
अकृत्वा यस्त्विदं राजन्व्रतं पातकनाशनम् । गार्हस्थ्यमनुवर्तेत तस्येदं निष्फलं भवेत्
akṛtvā yastvidaṁ rājanvrataṁ pātakanāśanam gārhasthyamanuvarteta tasyedaṁ niṣphalaṁ bhavet
हे राजन्! जो इस पाप-नाशक व्रत को किए बिना ही गृहस्थ-धर्म का पालन करता है, उसका यह गार्हस्थ्य निष्फल हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.2.164.6)
श्रावणे शुक्लपक्षे तु द्वितीयायां महीपते । अशून्यशयनाख्यं तद्ग्राह्यं व्रतमनुत्तमम्
śrāvaṇe śuklapakṣe tu dvitīyāyāṁ mahīpate aśūnyaśayanākhyaṁ tadgrāhyaṁ vratamanuttamam
हे महीपते! श्रावण मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया को उस अनुपम अशून्यशयन नामक व्रत को ग्रहण करना चाहिए।
श्लोक 7 (skanda.2.164.7)
चातुर्मास्ये तु संप्राप्ते हविष्याशी भवेन्नरः । चतुर्भिः पारणं मासैः सम्यङ्निष्पाद्यते प्रभो
cāturmāsye tu saṁprāpte haviṣyāśī bhavennaraḥ caturbhiḥ pāraṇaṁ māsaiḥ samyaṅniṣpādyate prabho
चातुर्मास्य आने पर मनुष्य को केवल हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिए; हे प्रभो! चार मासों के बाद विधिपूर्वक पारण किया जाता है।
श्लोक 8 (skanda.2.164.8)
लक्ष्मीयुक्तो जगन्नाथः पूजनीयो जनार्दनः । पारणे दिवसे प्राप्ते भक्ष्यं चैव चतुर्विधम्
lakṣmīyukto jagannāthaḥ pūjanīyo janārdanaḥ pāraṇe divase prāpte bhakṣyaṁ caiva caturvidham
लक्ष्मी सहित जगन्नाथ जनार्दन का पूजन करना चाहिए; पारण के दिन आने पर चार प्रकार के भक्ष्य पदार्थ अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 9 (skanda.2.164.9)
उपायनं च दातव्यं ब्राह्मणाय कुटुंबिने । सौवर्णीं राजतीं चापि मूर्तिं कुर्यान्मनोरमाम्
upāyanaṁ ca dātavyaṁ brāhmaṇāya kuṭuṁbine sauvarṇīṁ rājatīṁ cāpi mūrtiṁ kuryānmanoramām
गृहस्थ ब्राह्मण को उपहार देना चाहिए, तथा एक मनोहर स्वर्णिम अथवा रजत की मूर्ति बनवानी चाहिए।
श्लोक 10 (skanda.2.164.10)
पीताम्बरधरां दिव्यां वनमालाविभूषिताम् । शुक्लपुष्पैः सुगंधैश्च पूजयेत्पुरुषोत्तमम्
pītāmbaradharāṁ divyāṁ vanamālāvibhūṣitām śuklapuṣpaiḥ sugaṁdhaiśca pūjayetpuruṣottamam
पीताम्बर धारण किए, दिव्य, वनमाला से विभूषित उस पुरुषोत्तम की श्वेत सुगन्धित पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 11 (skanda.2.164.11)
शय्यादानैर्वस्त्रदानैर्विप्राणां भोजनैस्तथा । दम्पत्योर्भोजनैश्चैव दक्षिणाभिः प्रपूजयेत्
śayyādānairvastradānairviprāṇāṁ bhojanaistathā dampatyorbhojanaiścaiva dakṣiṇābhiḥ prapūjayet
शय्यादान, वस्त्रदान, ब्राह्मणों को भोजन कराने से, तथा दंपती को भोजन और दक्षिणा देकर उसका पूजन करना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.2.164.12)
एवं तु चतुरो मासान्पूजयित्वा जनार्दनम् । मार्गशीर्षादिमासेषु पूजयेत्पूर्ववद्धरिम्
evaṁ tu caturo māsānpūjayitvā janārdanam mārgaśīrṣādimāseṣu pūjayetpūrvavaddharim
इस प्रकार चार मास जनार्दन की पूजा करके, मार्गशीर्ष आदि (अगले चार) मासों में भी पूर्ववत् हरि की पूजा करनी चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.2.164.13)
रक्रवर्णं हरिं ध्यायेद्रुक्मिणीसहितं तथा । चैत्रादींश्चतुरो मासानेवं संपूजयेत्ततः
rakravarṇaṁ hariṁ dhyāyedrukmiṇīsahitaṁ tathā caitrādīṁścaturo māsānevaṁ saṁpūjayettataḥ
रक्तवर्ण हरि का, रुक्मिणी सहित, ध्यान करना चाहिए; इसी प्रकार चैत्र आदि (शेष) चार मासों में भी उनका पूजन करना चाहिए।
श्लोक 14 (skanda.2.164.14)
भूम्या सह स्थितं देवमर्चयेद्भक्तिपूर्वकम् । सनंदनाद्यैर्मुनिभिः स्तूयमानमकल्मषम्
bhūmyā saha sthitaṁ devamarcayedbhaktipūrvakam sanaṁdanādyairmunibhiḥ stūyamānamakalmaṣam
भूमि (देवी) सहित स्थित उस निष्कलंक देव की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए, जिनकी सनंदन आदि मुनियों द्वारा स्तुति की जाती है।
श्लोक 15 (skanda.2.164.15)
आषाढस्य च मासस्य द्वितीयायां समापयेत् । अष्टाक्षरेण मंत्रेण जुहुयादनले शुभे
āṣāḍhasya ca māsasya dvitīyāyāṁ samāpayet aṣṭākṣareṇa maṁtreṇa juhuyādanale śubhe
आषाढ़ मास की द्वितीया को (इस चरण को) पूर्ण करना चाहिए, और अष्टाक्षर मंत्र से पवित्र अग्नि में हवन करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.2.164.16)
मार्गशीर्षादिमासानां पारणे भूमिपालक । जुहुयाद्विष्णुगायत्र्या चैत्रादीनां निबोधय
mārgaśīrṣādimāsānāṁ pāraṇe bhūmipālaka juhuyādviṣṇugāyatryā caitrādīnāṁ nibodhaya
हे भूपालक! मार्गशीर्ष आदि मासों के पारण के समय विष्णु-गायत्री से हवन करना चाहिए; चैत्र आदि मासों के लिए भी सुन लो —
श्लोक 17 (skanda.2.164.17)
पौरुषेण च मंत्रेण जुहुयादनले शुभे । पञ्चामृतं पायसं च ह्यपूपं घृतपाचितम्
pauruṣeṇa ca maṁtreṇa juhuyādanale śubhe pañcāmṛtaṁ pāyasaṁ ca hyapūpaṁ ghṛtapācitam
पवित्र अग्नि में पौरुष-मंत्र से हवन करना चाहिए, साथ ही पंचामृत, खीर और घी में पके हुए अपूप (पूड़े) अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.2.164.18)
एवं क्रमेण द्रव्याणि प्रतिमासु निबोधय । सौवर्णी प्रतिमां दद्याल्लक्ष्मीनारायणस्य च
evaṁ krameṇa dravyāṇi pratimāsu nibodhaya sauvarṇī pratimāṁ dadyāllakṣmīnārāyaṇasya ca
इस प्रकार क्रमशः प्रत्येक मास के लिए योग्य वस्तुएँ जान लो। लक्ष्मीनारायण की स्वर्णमयी प्रतिमा (पहले चार मासों के अंत में) देनी चाहिए,
श्लोक 19 (skanda.2.164.19)
सौवर्णीं मध्यमे दद्यात्कृष्णस्य परमात्मनः । राजतीं त्वंतिमे दद्याद्वराहस्य महात्मनः
sauvarṇīṁ madhyame dadyātkṛṣṇasya paramātmanaḥ rājatīṁ tvaṁtime dadyādvarāhasya mahātmanaḥ
मध्य में परमात्मा कृष्ण की स्वर्णमयी प्रतिमा देनी चाहिए, और अंत में महात्मा वराह की रजतमयी प्रतिमा देनी चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.2.164.20)
ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चान्नामभिः केशवादिभिः । वस्त्रयुग्मैरलंकारैर्यथावित्तानुसारतः
brāhmaṇānbhojayetpaścānnāmabhiḥ keśavādibhiḥ vastrayugmairalaṁkārairyathāvittānusārataḥ
इसके बाद केशव आदि नामों से ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए, तथा अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र-युगल और आभूषण देने चाहिए।
श्लोक 21 (skanda.2.164.21)
अर्चयित्वा ततो दद्यादपूपान्घृतपाचितान् । उपायनार्थे विप्रेभ्यो द्वादशभ्यो निवेदयेत्
arcayitvā tato dadyādapūpānghṛtapācitān upāyanārthe viprebhyo dvādaśabhyo nivedayet
पूजा करने के बाद घी में पके हुए अपूप देने चाहिए, और उपहार-स्वरूप बारह ब्राह्मणों को अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.164.22)
आचार्याय ततो दद्यात्प्रतिमां पूर्वकल्पिताम् । शय्यां संकल्पितां पूर्णां सर्वालंकारभूषिताम्
ācāryāya tato dadyātpratimāṁ pūrvakalpitām śayyāṁ saṁkalpitāṁ pūrṇāṁ sarvālaṁkārabhūṣitām
तत्पश्चात् आचार्य को पूर्व-निर्मित प्रतिमा, तथा सभी आभूषणों से सज्जित, पूर्ण रूप से संकल्पित शय्या भी देनी चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.2.164.23)
तस्यामभ्यर्च्य विधिवल्लक्ष्मीनारायणं परम् । कांस्यपात्रेण सहितामपूपैर्बहुभिस्तथा
tasyāmabhyarcya vidhivallakṣmīnārāyaṇaṁ param kāṁsyapātreṇa sahitāmapūpairbahubhistathā
उस शय्या पर विधिपूर्वक परम लक्ष्मीनारायण की पूजा करके, कांस्य पात्र सहित तथा अनेक अपूपों सहित,
श्लोक 24 (skanda.2.164.24)
वस्त्रालंकारसहितां दक्षिणाभिस्तथैव च । ब्राह्मणाय विशिष्टाय वैष्णवाय कुटुंबिने
vastrālaṁkārasahitāṁ dakṣiṇābhistathaiva ca brāhmaṇāya viśiṣṭāya vaiṣṇavāya kuṭuṁbine
वस्त्र, आभूषण और दक्षिणा सहित, वह शय्या किसी विशिष्ट, वैष्णव, गृहस्थ ब्राह्मण को —
श्लोक 25 (skanda.2.164.25)
दातव्या विधिवत्पूज्य ब्राह्मणांश्चापि भोजयेत् । दानमन्त्रः । लक्ष्म्या अशून्यं शयनं यथा तव जनार्दन
dātavyā vidhivatpūjya brāhmaṇāṁścāpi bhojayet dānamantraḥ lakṣmyā aśūnyaṁ śayanaṁ yathā tava janārdana
विधिपूर्वक पूजा करके दान करनी चाहिए, और ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। दानमन्त्र है — 'हे जनार्दन! जैसे लक्ष्मी के साथ तुम्हारी शय्या कभी शून्य नहीं होती,
श्लोक 26 (skanda.2.164.26)
शय्या ममाप्यशून्या स्याद्दानेनाऽनेन केशव । एवं सम्प्रार्थ्य देवेशं स्वयं भोजनमाचरेत्
śayyā mamāpyaśūnyā syāddānenā'nena keśava evaṁ samprārthya deveśaṁ svayaṁ bhojanamācaret
वैसे ही हे केशव! इस दान से मेरी भी शय्या कभी शून्य न हो।' इस प्रकार देवेश से प्रार्थना करके स्वयं भोजन करना चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.2.164.27)
पुरुषो वा सती वाऽपि विधवा वा समाचरेत् । अशून्यशयनार्थं च कर्तव्यं व्रतमुत्तमम्
puruṣo vā satī vā'pi vidhavā vā samācaret aśūnyaśayanārthaṁ ca kartavyaṁ vratamuttamam
पुरुष हो या सुहागिन स्त्री या विधवा — सभी को यह अनुपम व्रत अशून्यशयन की प्राप्ति के लिए करना चाहिए।
श्लोक 28 (skanda.2.164.28)
एवं तव मया ख्यातं विस्तरान्नृपसत्तम । सुप्रसन्ने जगन्नाथे भवेयुर्विविधाः प्रजाः
evaṁ tava mayā khyātaṁ vistarānnṛpasattama suprasanne jagannāthe bhaveyurvividhāḥ prajāḥ
हे नृपसत्तम! इस प्रकार मैंने तुम्हें विस्तार से यह बताया है। जगन्नाथ के अत्यंत प्रसन्न होने पर प्रजाएँ विविध रूपों में समृद्ध होती हैं,
श्लोक 29 (skanda.2.164.29)
तस्मिंस्तुष्टे तु देवेशे देवानामपि दुर्लभाः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन व्रतमेतत्समाचरेत्
tasmiṁstuṣṭe tu deveśe devānāmapi durlabhāḥ tasmātsarvaprayatnena vratametatsamācaret
उस देवेश के संतुष्ट होने पर वे वस्तुएँ भी प्राप्त हो जाती हैं जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ हैं। अतः पूरे प्रयत्न से यह व्रत करना चाहिए।
श्लोक 30 (skanda.2.164.30)
अवश्यं गन्तुकामेन तद्विष्णोः परमं पदम् । एवमुक्तं मया सर्वं किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि
avaśyaṁ gantukāmena tadviṣṇoḥ paramaṁ padam evamuktaṁ mayā sarvaṁ kimanyacchrotumicchasi
उसके द्वारा जो निश्चय ही विष्णु के परम पद को जाना चाहता है। इस प्रकार मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया है; अब और क्या सुनना चाहते हो?
श्लोक 31 (skanda.2.164.31)
इत्युक्तस्तेन राजर्षिः पुनरप्याह तं मुनिम् । वैशाखे छत्रदानस्य माहात्म्यं विस्तराद्वद
ityuktastena rājarṣiḥ punarapyāha taṁ munim vaiśākhe chatradānasya māhātmyaṁ vistarādvada
इस प्रकार कहे जाने पर उस राजर्षि ने पुनः उस मुनि से कहा — 'वैशाख में छत्रदान की महिमा विस्तारपूर्वक बताइए।
श्लोक 32 (skanda.2.164.32)
शृण्वतोऽपि न तृप्तिर्मे वैशाखोक्ताञ्च्छुभावहान्
śṛṇvato'pi na tṛptirme vaiśākhoktāñcchubhāvahān
वैशाख में कहे गए इन शुभप्रद विधानों को सुनते हुए भी मेरी तृप्ति नहीं होती।'
श्लोक 33 (skanda.2.164.33)
इति तद्वचनं श्रुत्वा यशस्यं पुण्यवर्द्धनम् । प्रत्युवाच महाभागं श्रुतदेवो महायशाः
iti tadvacanaṁ śrutvā yaśasyaṁ puṇyavarddhanam pratyuvāca mahābhāgaṁ śrutadevo mahāyaśāḥ
उस कीर्तिदायक, पुण्य बढ़ाने वाले वचन को सुनकर महायशस्वी श्रुतदेव ने उस महाभाग राजा को उत्तर दिया।
श्लोक 34 (skanda.2.164.34)
श्रुतदेव उवाच । वैशाखे घर्मतप्तानां मानवानां महात्मनाम् । ये कुर्वन्त्यातपत्राणं तेषां पुण्यमनंतकम्
śrutadeva uvāca vaiśākhe gharmataptānāṁ mānavānāṁ mahātmanām ye kurvantyātapatrāṇaṁ teṣāṁ puṇyamanaṁtakam
श्रुतदेव ने कहा — जो लोग वैशाख की गर्मी से संतप्त महात्मा मनुष्यों के लिए आतप-निवारण (छाया) की व्यवस्था करते हैं, उनका पुण्य अनंत होता है।
श्लोक 35 (skanda.2.164.35)
अत्रैवोदाहरन्तीममिति हासं पुरातनम् । वैशाखधर्ममुद्दिश्य पुरा कृतयुगे कृतम्
atraivodāharantīmamiti hāsaṁ purātanam vaiśākhadharmamuddiśya purā kṛtayuge kṛtam
इस विषय में लोग एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं, जो कृतयुग में वैशाख-धर्म के संबंध में घटित हुआ था।
श्लोक 36 (skanda.2.164.36)
वङ्गदेशे पुरा कश्चिद्धेमकान्त इति श्रुतः । कुशकेतोः सुतो धीमान्राजा शस्त्रभृतां वरः । एकदा मृगयाऽऽसक्तो गहनं वनमाविशत्
vaṅgadeśe purā kaściddhemakānta iti śrutaḥ kuśaketoḥ suto dhīmānrājā śastrabhṛtāṁ varaḥ ekadā mṛgayā''sakto gahanaṁ vanamāviśat
पूर्वकाल में वंग देश में हेमकांत नाम से प्रसिद्ध कुशकेतु का बुद्धिमान् पुत्र, शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, एक राजा था। एक बार मृगया में आसक्त होकर वह घने वन में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 37 (skanda.2.164.37)
तत्र नानाविधान्हत्वा मृगान्क्रोडादिकान्बहून्। श्रांतो मध्याह्नवेलायां मुनीनामाश्रमं ययौ
tatra nānāvidhānhatvā mṛgānkroḍādikānbahūn śrāṁto madhyāhnavelāyāṁ munīnāmāśramaṁ yayau
वहाँ अनेक प्रकार के हिरण, वराह आदि पशुओं का वध करके, थका हुआ, दोपहर के समय वह मुनियों के आश्रम में गया।
श्लोक 38 (skanda.2.164.38)
तदा शतर्चिनोनाम ऋषयः शंसितव्रताः । समाधिस्था न जानन्ति बाह्यकृत्यं च किंचन
tadā śatarcinonāma ṛṣayaḥ śaṁsitavratāḥ samādhisthā na jānanti bāhyakṛtyaṁ ca kiṁcana
उस समय शतर्चिन नामक शुद्ध व्रतधारी ऋषिगण समाधि में स्थित थे, और बाहरी किसी भी कार्य को नहीं जानते थे।
श्लोक 39 (skanda.2.164.39)
तान्दृष्ट्वा निश्चलान्विप्रान्क्रुद्धो हंतुं मनो दधे । भूपं निवारयामास शिष्याणामयुतं तदा
tāndṛṣṭvā niścalānviprānkruddho haṁtuṁ mano dadhe bhūpaṁ nivārayāmāsa śiṣyāṇāmayutaṁ tadā
उन निश्चल ब्राह्मणों को देखकर वह क्रुद्ध होकर उनका वध करने का विचार करने लगा। तब उनके दस हजार शिष्यों ने राजा को रोका।
श्लोक 40 (skanda.2.164.40)
दुर्बुद्ध शृणु नो वाक्यं गुरवस्तु समाधिगाः । नो जानन्ति बहिःकृत्यं तस्मात्क्रोधं न चार्हसि
durbuddha śṛṇu no vākyaṁ guravastu samādhigāḥ no jānanti bahiḥkṛtyaṁ tasmātkrodhaṁ na cārhasi
कहते हुए — 'हे दुर्बुद्धे! हमारा वचन सुनो — गुरुजन समाधि में लीन हैं, वे बाहरी किसी कार्य को नहीं जानते; अतः क्रोध करना उचित नहीं है।'
श्लोक 41 (skanda.2.164.41)
ततः शिष्यानुवाचेदं वचनं क्रोधविह्वलः । यूयं कुरुध्वमातिथ्यमध्वश्रांतस्य मे द्विजाः
tataḥ śiṣyānuvācedaṁ vacanaṁ krodhavihvalaḥ yūyaṁ kurudhvamātithyamadhvaśrāṁtasya me dvijāḥ
तब क्रोध से व्याकुल राजा ने शिष्यों से यह वचन कहा — 'हे द्विजो! तुम लोग मार्ग-श्रांत मेरा आतिथ्य करो।'
श्लोक 42 (skanda.2.164.42)
एवमुक्ताश्च भूपेन शिष्या ऊचुस्तदा नृपम् । नाऽऽज्ञप्ता गुरुभिर्भूप वयं भिक्षाशिनः पुनः
evamuktāśca bhūpena śiṣyā ūcustadā nṛpam nā''jñaptā gurubhirbhūpa vayaṁ bhikṣāśinaḥ punaḥ
राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर शिष्यों ने उससे कहा — 'हे राजन्! हमें गुरुओं द्वारा आदेश नहीं दिया गया है; हम तो स्वयं भिक्षा माँगकर जीने वाले हैं,
श्लोक 43 (skanda.2.164.43)
गुरुतन्त्राः कथं कर्तुमातिथ्यं ते वयं क्षमाः । प्रत्याख्यातो नृपः शिष्यैस्तान्हंतुं धनुराददे
gurutantrāḥ kathaṁ kartumātithyaṁ te vayaṁ kṣamāḥ pratyākhyāto nṛpaḥ śiṣyaistānhaṁtuṁ dhanurādade
गुरु के अधीन हम आपका आतिथ्य कैसे कर सकते हैं?' शिष्यों द्वारा इस प्रकार अस्वीकृत होने पर राजा ने उनके वध के लिए धनुष उठा लिया।
श्लोक 44 (skanda.2.164.44)
मृगदस्युभयादिभ्यो बहुधा रक्षिता मया । ते मामेवोपशिक्षंति मया दत्तप्रतिग्रहाः
mṛgadasyubhayādibhyo bahudhā rakṣitā mayā te māmevopaśikṣaṁti mayā dattapratigrahāḥ
(राजा ने सोचा —) 'मृगों, चोरों आदि के भय से मैंने इन्हें अनेक बार रक्षा दी है; मेरे द्वारा भेंट पाकर भी ये मुझे ही उपदेश देते हैं।
श्लोक 45 (skanda.2.164.45)
एते मां न विजानंति कृतघ्ना भूरिमानिनः । घ्नतोपि मे न दोषः स्यादेतान्वै ह्याततायिनः
ete māṁ na vijānaṁti kṛtaghnā bhūrimāninaḥ ghnatopi me na doṣaḥ syādetānvai hyātatāyinaḥ
ये कृतघ्न, अत्यंत अभिमानी लोग मुझे पहचानते नहीं हैं। इन आततायियों का वध करने पर भी मुझे कोई दोष नहीं लगेगा।'
श्लोक 46 (skanda.2.164.46)
एवं विक्रुद्धमानः सञ्छरान्मुंचञ्च्छरासनात् । तान्विद्रुताननुद्रुत्य जघ्ने शिष्यशतत्रयम्
evaṁ vikruddhamānaḥ sañcharānmuṁcañccharāsanāt tānvidrutānanudrutya jaghne śiṣyaśatatrayam
इस प्रकार अत्यंत क्रुद्ध होकर, धनुष से बाण छोड़ते हुए, भागते हुए उन शिष्यों का पीछा करके उसने तीन सौ शिष्यों का वध कर डाला।
श्लोक 47 (skanda.2.164.47)
दुद्रुवुर्भयतः सर्वे विहायाऽऽश्रममञ्जसा । विद्रावितेषु शिष्येषु बलादाश्रमसंस्थितान्
dudruvurbhayataḥ sarve vihāyā''śramamañjasā vidrāviteṣu śiṣyeṣu balādāśramasaṁsthitān
शेष सभी भय से आश्रम छोड़कर भाग खड़े हुए। शिष्यों के भाग जाने पर, आश्रम में जो शेष सामग्री रह गई थी, उसे बलपूर्वक
श्लोक 48 (skanda.2.164.48)
संभाराञ्जगृहुः शीघ्रं सैनिकाः पापबुद्धयः । यथेष्टं भोजनं चक्रुर्नृपेणैवानुमोदिताः
saṁbhārāñjagṛhuḥ śīghraṁ sainikāḥ pāpabuddhayaḥ yatheṣṭaṁ bhojanaṁ cakrurnṛpeṇaivānumoditāḥ
पापबुद्धि सैनिकों ने शीघ्र ही ग्रहण कर लिया, और राजा की ही अनुमति से उन्होंने मनमाने ढंग से भोजन किया।
श्लोक 49 (skanda.2.164.49)
ततः सेनाऽऽवृतो राजा पुरीमागाद्दिनात्यये । कुशकेतुस्ततः श्रुत्वा तनयस्य विचेष्टितम्
tataḥ senā''vṛto rājā purīmāgāddinātyaye kuśaketustataḥ śrutvā tanayasya viceṣṭitam
तत्पश्चात् सेना से घिरा हुआ राजा दिन के अंत में नगर लौटा। कुशकेतु ने अपने पुत्र का यह आचरण सुनकर,
श्लोक 50 (skanda.2.164.50)
पुरान्निर्यातयामास गर्हयन्गर्हयन्सुतम् । राज्यानर्हं क्षमाहीनं स्वदेशादपि भूमिप
purānniryātayāmāsa garhayangarhayansutam rājyānarhaṁ kṣamāhīnaṁ svadeśādapi bhūmipa
हे भूमिप! अपने पुत्र की बार-बार निंदा करते हुए, उसे राज्य के अयोग्य और क्षमारहित मानकर, अपने राज्य से ही निष्कासित कर दिया।
श्लोक 51 (skanda.2.164.51)
पित्रा त्यक्तस्ततो राजा हेमकांतोऽतिविह्वलः । वनं विवेश गहनं हत्याभिश्च सुपीडितः
pitrā tyaktastato rājā hemakāṁto'tivihvalaḥ vanaṁ viveśa gahanaṁ hatyābhiśca supīḍitaḥ
पिता द्वारा त्यागा गया राजा हेमकांत अत्यंत व्याकुल होकर, और उन हत्याओं से अत्यंत पीड़ित होकर, घने वन में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 52 (skanda.2.164.52)
बहुकालमवासीच्च गह्वरे निर्जने वने । आहारं कल्पयामास व्याधधर्ममुपाश्रितः
bahukālamavāsīcca gahvare nirjane vane āhāraṁ kalpayāmāsa vyādhadharmamupāśritaḥ
वह बहुत समय तक निर्जन वन की गुफा में रहा, और व्याध के धर्म का आश्रय लेकर अपना आहार जुटाता रहा।
श्लोक 53 (skanda.2.164.53)
न क्वाऽपि स्थितिमापेदे हत्ययाऽभिद्रुतो भृशम् । अष्टाविंशतिवर्षाणि गतान्यस्य दुरात्मनः
na kvā'pi sthitimāpede hatyayā'bhidruto bhṛśam aṣṭāviṁśativarṣāṇi gatānyasya durātmanaḥ
उस हत्या (के पाप) से अत्यंत त्रस्त होकर वह कहीं भी स्थिर नहीं रह सका। उस दुरात्मा के अट्ठाईस वर्ष इस प्रकार बीत गए।
श्लोक 54 (skanda.2.164.54)
तीर्थयात्राप्रसंगेन त्रितो नाम महामुनिः । तस्मिन्नरण्ये वैशाखे रवौ मध्यंदिने गते
tīrthayātrāprasaṁgena trito nāma mahāmuniḥ tasminnaraṇye vaiśākhe ravau madhyaṁdine gate
एक बार तीर्थयात्रा के प्रसंग में त्रित नामक महामुनि, वैशाख मास में, सूर्य के मध्याह्न में पहुँचने पर, उसी वन में,
श्लोक 55 (skanda.2.164.55)
गच्छन्नातपविक्लांतस्तृषया चाऽपि पीडितः । क्वचिद्वृक्षविहीने तु प्रदेशे मूर्च्छितोऽभवत्
gacchannātapaviklāṁtastṛṣayā cā'pi pīḍitaḥ kvacidvṛkṣavihīne tu pradeśe mūrcchito'bhavat
चलते-चलते धूप से थका हुआ और प्यास से भी पीड़ित होकर, वृक्षरहित किसी स्थान पर मूर्च्छित हो गया।
श्लोक 56 (skanda.2.164.56)
दैवाद्दृष्ट्वा हेमकांतस्त्रितं नाम महामुनिम् । तृषार्तं मूर्छितं श्रांतं कृपां चक्रे नृपाधमः
daivāddṛṣṭvā hemakāṁtastritaṁ nāma mahāmunim tṛṣārtaṁ mūrchitaṁ śrāṁtaṁ kṛpāṁ cakre nṛpādhamaḥ
दैव संयोग से उस त्रित नामक महामुनि को प्यास से व्याकुल, मूर्च्छित और थका हुआ देखकर, उस निकृष्ट राजा को भी दया आ गई।
श्लोक 57 (skanda.2.164.57)
ब्रह्मपत्रैस्तदा छत्रं कृत्वा चाऽऽतपवारणम्। मुनेर्जग्राह शिरसि ह्यलाबुस्थं जलं ददौ
brahmapatraistadā chatraṁ kṛtvā cā''tapavāraṇam munerjagrāha śirasi hyalābusthaṁ jalaṁ dadau
उसने पत्तों से एक छत्र बनाकर धूप से रक्षा की व्यवस्था की, उसे मुनि के सिर पर धारण किया, और तूंबे में रखा हुआ जल उन्हें पिलाया।
श्लोक 58 (skanda.2.164.58)
लब्धसंज्ञोऽभवत्तेन ह्युपचारेण वै मुनिः । पत्रच्छत्रं क्षत्रदत्तं गृहीत्वा गतविक्लमः
labdhasaṁjño'bhavattena hyupacāreṇa vai muniḥ patracchatraṁ kṣatradattaṁ gṛhītvā gataviklamaḥ
इस उपचार से मुनि को होश आ गया। क्षत्रिय द्वारा दिए गए उस पत्र-छत्र को धारण करके, कष्ट से मुक्त होकर,
श्लोक 59 (skanda.2.164.59)
ग्रामं क्वचिच्छनैः प्राप्य किञ्चिदाप्यायितेन्द्रियः । तेन पुण्यप्रभावेन ब्रह्महत्याशतत्रयम्
grāmaṁ kvacicchanaiḥ prāpya kiñcidāpyāyitendriyaḥ tena puṇyaprabhāvena brahmahatyāśatatrayam
वह धीरे-धीरे किसी गाँव में पहुँचा, इंद्रियों में कुछ तृप्ति पाकर। उस पुण्य के प्रभाव से हेमकांत के तीन सौ ब्रह्महत्याओं के पाप
श्लोक 60 (skanda.2.164.60)
विनष्टमभवत्तस्य क्षणादेव महात्मनः । ततो विस्मयमापन्नो हेमकान्तो महारथः
vinaṣṭamabhavattasya kṣaṇādeva mahātmanaḥ tato vismayamāpanno hemakānto mahārathaḥ
उस महात्मा के क्षणभर में ही नष्ट हो गए। तब महारथी हेमकांत को अत्यंत विस्मय हुआ,
श्लोक 61 (skanda.2.164.61)
बहुधा पीड्यमानस्य ब्रह्महत्याः कथं गताः । केनाऽपि निष्कृता ह्येताः क्व गताः केन हेतुना
bahudhā pīḍyamānasya brahmahatyāḥ kathaṁ gatāḥ kenā'pi niṣkṛtā hyetāḥ kva gatāḥ kena hetunā
सोचने लगा — इतनी बार पीड़ित होने वाली मेरी ये ब्रह्महत्याएँ कैसे चली गईं? किसके द्वारा इनका निष्कृति हुआ? ये कहाँ गईं, किस कारण से?
श्लोक 62 (skanda.2.164.62)
इत्येवं चिन्तयामास ब्रह्महत्याविमोचनम्। एवं चाऽज्ञस्थिते राज्ञि यमदूता अथाऽऽगमन्
ityevaṁ cintayāmāsa brahmahatyāvimocanam evaṁ cā'jñasthite rājñi yamadūtā athā''gaman
इस प्रकार वह अपनी ब्रह्महत्याओं से मुक्ति के विषय में सोचता रहा। इस प्रकार राजा के अनजान बने रहने पर ही यमदूत वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 63 (skanda.2.164.63)
नेतुमेनं महात्मानं हेमकांतं वने स्थितम् । ग्रहणीं जनयामासुः प्राणान्हर्तुं महात्मनः
netumenaṁ mahātmānaṁ hemakāṁtaṁ vane sthitam grahaṇīṁ janayāmāsuḥ prāṇānhartuṁ mahātmanaḥ
उस महात्मा हेमकांत को, जो वन में स्थित था, ले जाने के लिए। उस महात्मा के प्राण हरने के लिए उन्होंने उसे एक भयंकर रोग (ग्रहणी) से पीड़ित कर दिया।
श्लोक 64 (skanda.2.164.64)
तदा प्राणवियोगार्तः पुरुषांस्त्रीन्ददर्श ह । यमदूतान्महाघोरानूर्ध्वकेशान्भयंकरान्
tadā prāṇaviyogārtaḥ puruṣāṁstrīndadarśa ha yamadūtānmahāghorānūrdhvakeśānbhayaṁkarān
उस समय प्राण-वियोग से पीड़ित होकर उसने तीन पुरुषों को देखा — अत्यंत भयंकर, ऊर्ध्व केशों वाले, भयानक यमदूतों को।
श्लोक 65 (skanda.2.164.65)
चिन्तयानः स्वकर्माणि तूष्णीमासीत्तदा नृपः । छत्रदानप्रभावेन जाता विष्णुस्मृतिर्नृप
cintayānaḥ svakarmāṇi tūṣṇīmāsīttadā nṛpaḥ chatradānaprabhāvena jātā viṣṇusmṛtirnṛpa
अपने कर्मों का चिंतन करते हुए राजा उस समय मौन हो गया। हे राजन्! छत्रदान के प्रभाव से उसे विष्णु का स्मरण हो आया,
श्लोक 66 (skanda.2.164.66)
तेन स्मृतो महाविष्णुर्विष्वक्सेन स्वमंत्रिणम् । उवाच तूर्णं त्वं गच्छ यमदूतान्निवारय
tena smṛto mahāviṣṇurviṣvaksena svamaṁtriṇam uvāca tūrṇaṁ tvaṁ gaccha yamadūtānnivāraya
और उसके द्वारा स्मरण किए जाने पर महाविष्णु ने अपने मंत्री विष्वक्सेन से कहा — 'शीघ्र जाओ और यमदूतों को रोको।
श्लोक 67 (skanda.2.164.67)
वैशाखधर्मनिरतं हेमकांतं तु पालय । निष्पापमेनं मद्भक्तं पित्रे देहि पुरं गतः
vaiśākhadharmanirataṁ hemakāṁtaṁ tu pālaya niṣpāpamenaṁ madbhaktaṁ pitre dehi puraṁ gataḥ
वैशाख-धर्म में तत्पर हेमकांत की रक्षा करो; इस निष्पाप, मेरे भक्त को, नगर जाकर उसके पिता को सौंप दो।
श्लोक 68 (skanda.2.164.68)
मदीरितेन वाक्येन कुशकेतुं च बोधय । सर्वधर्म्मोज्झितो वापि ब्रह्मचर्यादिवर्जितः
madīritena vākyena kuśaketuṁ ca bodhaya sarvadharmmojjhito vāpi brahmacaryādivarjitaḥ
मेरे कहे वचनों से कुशकेतु को यह भी समझाओ — चाहे कोई समस्त धर्मों से रहित हो, ब्रह्मचर्य आदि से वर्जित हो,
श्लोक 69 (skanda.2.164.69)
वैशाखधर्मनिरतो मत्प्रियः स्यान्न संशयः। कृतागाश्चाऽपि त्वत्पुत्रो मुनित्राणपरायणः
vaiśākhadharmanirato matpriyaḥ syānna saṁśayaḥ kṛtāgāścā'pi tvatputro munitrāṇaparāyaṇaḥ
यदि वैशाख-धर्म में तत्पर है, तो वह मेरा प्रिय है, इसमें कोई संशय नहीं। अपराधी होते हुए भी तुम्हारा पुत्र मुनि-रक्षा में तत्पर रहा है,
श्लोक 70 (skanda.2.164.70)
वैशाखे छत्रदानेन निष्पापो नाऽत्र संशयः । तेन पुण्यप्रभावेन शांतो दान्तश्चिरायुषः
vaiśākhe chatradānena niṣpāpo nā'tra saṁśayaḥ tena puṇyaprabhāvena śāṁto dāntaścirāyuṣaḥ
और वैशाख में छत्रदान के द्वारा वह निष्पाप हो चुका है, इसमें कोई संशय नहीं। उस पुण्य के प्रभाव से वह शांत, संयमी और दीर्घायु हो गया है,
श्लोक 71 (skanda.2.164.71)
शौर्योदार्यगुणोपेतस्त्वत्समोऽयं गुणैरपि । तस्मादेनं राज्यभारे संस्थापय महाबलम्
śauryodāryaguṇopetastvatsamo'yaṁ guṇairapi tasmādenaṁ rājyabhāre saṁsthāpaya mahābalam
शौर्य और औदार्य के गुणों से युक्त, गुणों में भी तुम्हारे तुल्य। अतः इस महाबली को राज्य के भार पर पुनः स्थापित कर दो।
श्लोक 72 (skanda.2.164.72)
विष्णुनैव समाज्ञप्तमित्यादिश्य नृपोत्तमम् । पितुर्वंशे हेमकांतं स्थाप्याऽऽयाहि च मां पुनः
viṣṇunaiva samājñaptamityādiśya nṛpottamam piturvaṁśe hemakāṁtaṁ sthāpyā''yāhi ca māṁ punaḥ
यह कहकर कि यह विष्णु का ही आदेश है, हे नृपोत्तम, हेमकांत को उसके पिता के वंश में स्थापित करके तुम मेरे पास पुनः लौट आना।'
श्लोक 73 (skanda.2.164.73)
इत्यादिष्टो भगवता विष्वक्सेनो महाबलः । हेमकान्तं समासाद्य यमदूतान्निवार्य च
ityādiṣṭo bhagavatā viṣvakseno mahābalaḥ hemakāntaṁ samāsādya yamadūtānnivārya ca
भगवान् द्वारा इस प्रकार आदेश पाकर महाबली विष्वक्सेन ने हेमकांत के पास पहुँचकर यमदूतों को रोका,
श्लोक 74 (skanda.2.164.74)
पाणिना शंतमेनैव पस्पर्शांगेषु भूमिपम् । भगवद्भक्तसंस्पर्शाद्धतव्याधिः क्षणादभूत्
pāṇinā śaṁtamenaiva pasparśāṁgeṣu bhūmipam bhagavadbhaktasaṁsparśāddhatavyādhiḥ kṣaṇādabhūt
अपने शांतिदायक हाथ से उस भूमिपति के अंगों का स्पर्श किया। भगवद्भक्त के उस स्पर्श से वह क्षणभर में ही रोगमुक्त हो गया।
श्लोक 75 (skanda.2.164.75)
विष्वक्सेनस्ततस्तेन सह तस्य पुरीं ययौ । तं दृष्ट्वा विस्मितो भूत्वा कुशकेतुर्महाप्रभुः
viṣvaksenastatastena saha tasya purīṁ yayau taṁ dṛṣṭvā vismito bhūtvā kuśaketurmahāprabhuḥ
तत्पश्चात् विष्वक्सेन उसके साथ उसकी राजधानी को गए। उन्हें देखकर महाप्रभु कुशकेतु अत्यंत विस्मित हो गए,
श्लोक 76 (skanda.2.164.76)
ननाम शिरसा भक्त्या दण्डवत्पतितो भुवि । गृहं प्रवेशयामास पार्षदं परमात्मनः
nanāma śirasā bhaktyā daṇḍavatpatito bhuvi gṛhaṁ praveśayāmāsa pārṣadaṁ paramātmanaḥ
भक्तिपूर्वक दण्डवत् भूमि पर गिरकर सिर से प्रणाम किया, और परमात्मा के उस पार्षद को अपने घर में प्रवेश कराया।
श्लोक 77 (skanda.2.164.77)
स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्रैः पूजयामास वैभवैः । तस्मै प्रीतमनाः प्राह विष्वक्सेनो महाबलः
stutvā ca vividhaiḥ stotraiḥ pūjayāmāsa vaibhavaiḥ tasmai prītamanāḥ prāha viṣvakseno mahābalaḥ
अनेक स्तोत्रों से स्तुति करके, अपने वैभव के अनुसार उसकी पूजा की। उस पर प्रसन्नचित्त होकर महाबली विष्वक्सेन ने उससे कहा,
श्लोक 78 (skanda.2.164.78)
हेमकान्तं समुद्दिश्य यदुक्तं विष्णुना पुरा । तच्छ्रुत्वा कुशकेतुश्च पुत्रं राज्ये निवेश्य च
hemakāntaṁ samuddiśya yaduktaṁ viṣṇunā purā tacchrutvā kuśaketuśca putraṁ rājye niveśya ca
जो कुछ विष्णु ने पहले हेमकांत के विषय में कहा था। यह सुनकर कुशकेतु ने अपने पुत्र को राज्य पर पुनः स्थापित किया,
श्लोक 79 (skanda.2.164.79)
विष्वक्सेनाभ्यनुज्ञातः सभार्यो वनमाविशत् । विष्वक्सेनो हेमकान्तमनुमंत्र्याभिपूज्य च
viṣvaksenābhyanujñātaḥ sabhāryo vanamāviśat viṣvakseno hemakāntamanumaṁtryābhipūjya ca
और विष्वक्सेन की अनुमति लेकर अपनी पत्नी सहित वन में प्रविष्ट हुआ। विष्वक्सेन ने हेमकांत को उपदेश देकर उसका सम्मान करके,
श्लोक 80 (skanda.2.164.80)
श्वेतद्वीपं ययौ धीमान्विष्णुपार्श्वे महामनाः । हेमकांतस्ततो राजा वैशाखोक्ताञ्च्छुभावहान
śvetadvīpaṁ yayau dhīmānviṣṇupārśve mahāmanāḥ hemakāṁtastato rājā vaiśākhoktāñcchubhāvahāna
उस बुद्धिमान्, महामना ने श्वेतद्वीप को प्रस्थान किया, विष्णु के पार्श्व में जाकर। तत्पश्चात् राजा हेमकांत ने वैशाख में कहे गए शुभप्रद
श्लोक 81 (skanda.2.164.81)
विष्णुप्रीतिकरान्धर्मान्प्रतिवर्षं चकार ह । ब्रह्मण्यो धर्ममार्गस्थः शान्तो दान्तो जितेन्द्रियः
viṣṇuprītikarāndharmānprativarṣaṁ cakāra ha brahmaṇyo dharmamārgasthaḥ śānto dānto jitendriyaḥ
विष्णु को प्रिय धर्मों का प्रतिवर्ष पालन किया — ब्राह्मणों का हितैषी, धर्म-मार्ग पर स्थित, शांत, संयमी, जितेन्द्रिय,
श्लोक 82 (skanda.2.164.82)
दयालुः सर्वभूतेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । प्रवृद्धः सर्वसम्पद्भिः पुत्रपौत्रादिभिर्वृतः
dayāluḥ sarvabhūteṣu sarvayajñeṣu dīkṣitaḥ pravṛddhaḥ sarvasampadbhiḥ putrapautrādibhirvṛtaḥ
समस्त प्राणियों पर दयालु, समस्त यज्ञों में दीक्षित, समस्त संपदाओं से समृद्ध, पुत्र-पौत्र आदि से घिरा हुआ,
श्लोक 83 (skanda.2.164.83)
भुक्त्वा भोगान्समस्तांश्च विष्णुलोकमवाप्तवान्
bhuktvā bhogānsamastāṁśca viṣṇulokamavāptavān
समस्त भोगों को भोगकर, अंत में उसने विष्णु-लोक को प्राप्त किया।
श्लोक 84 (skanda.2.164.84)
नेक्षे तु वैशाखसमांश्च धर्मान्सुखप्रयत्नान्बहुपुण्यहेतून् । पापेन्धनाद्यग्निनिभान्सुलभ्यान्धर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतून्
nekṣe tu vaiśākhasamāṁśca dharmānsukhaprayatnānbahupuṇyahetūn pāpendhanādyagninibhānsulabhyāndharmādimokṣāntapumarthahetūn
मुझे वैशाख के समान अन्य कोई धर्म नहीं दिखता, जो सुखपूर्वक साध्य हो, महान् पुण्य का कारण हो, पाप-रूपी ईंधन को भस्म करने में अग्नि के समान हो, सुलभ हो, तथा धर्म से लेकर मोक्ष तक के समस्त पुरुषार्थों का कारण हो।