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वैष्णव खण्ड · अध्याय 165

कीर्तिमद्विजय-वर्णन

अध्याय 164अध्याय-सूचीअध्याय 166

श्लोक 1 (skanda.2.165.1)

मैथिल उवाच । वैशाखधर्माः सुलभाः पुण्यराशिविधायकाः । विष्णुप्रीतिकराः सद्यः पुमर्थानां तु हेतवः

maithila uvāca vaiśākhadharmāḥ sulabhāḥ puṇyarāśividhāyakāḥ viṣṇuprītikarāḥ sadyaḥ pumarthānāṁ tu hetavaḥ

मैथिल ने कहा — वैशाख के धर्म सुलभ हैं, पुण्य-राशि के विधाता हैं, विष्णु को प्रसन्न करने वाले हैं, तथा तत्काल ही पुरुषार्थों के कारण हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.165.2)

न प्रख्याताः कथं लोके शाश्वताः श्रुतिचोदिताः । प्रख्याता राजसा धर्मास्तामसा अपि भूरिशः

na prakhyātāḥ kathaṁ loke śāśvatāḥ śruticoditāḥ prakhyātā rājasā dharmāstāmasā api bhūriśaḥ

फिर श्रुति द्वारा कहे गए ये सनातन धर्म संसार में प्रसिद्ध क्यों नहीं हैं, जबकि राजसिक और तामसिक धर्म भी बहुत प्रसिद्ध हैं?

श्लोक 3 (skanda.2.165.3)

दुर्घटा वहुयत्नाश्च वहुद्रव्यव्ययावहाः । केचिन्माघं प्रशंसन्ति चातुर्मास्यान्परे जगुः

durghaṭā vahuyatnāśca vahudravyavyayāvahāḥ kecinmāghaṁ praśaṁsanti cāturmāsyānpare jaguḥ

जो कठिन हैं, अनेक प्रयत्नों वाले हैं, बहुत धन के व्यय वाले हैं — कोई माघ मास की प्रशंसा करता है, कोई चातुर्मास्य व्रतों की बात करता है,

श्लोक 4 (skanda.2.165.4)

व्यतीपातादिधर्माश्च वर्णयन्तीह भूरिशः । एतद्विवेकं विस्तार्य श्रोतुकामाय मे वद

vyatīpātādidharmāśca varṇayantīha bhūriśaḥ etadvivekaṁ vistārya śrotukāmāya me vada

और यहाँ व्यतीपात आदि से जुड़े धर्मों का बहुत वर्णन करते हैं। यह विवेक विस्तारपूर्वक बताइए, क्योंकि मुझे सुनने की इच्छा है।

श्लोक 5 (skanda.2.165.5)

श्रुतदेव उवाच । शृणु भूप प्रवक्ष्यामि न प्रख्याता इमे कथम् । इतरेषां च धर्माणां कथं ख्यातिश्च भूतले

śrutadeva uvāca śṛṇu bhūpa pravakṣyāmi na prakhyātā ime katham itareṣāṁ ca dharmāṇāṁ kathaṁ khyātiśca bhūtale

श्रुतदेव ने कहा — हे राजन्! सुनो, मैं बताता हूँ कि ये धर्म प्रसिद्ध क्यों नहीं हैं, और अन्य धर्मों की पृथ्वी पर ख्याति क्यों है।

श्लोक 6 (skanda.2.165.6)

राजसास्तामसा भूमौ बहवः कामुका जनाः । इच्छंत्यैहिकभोगांस्ते पुत्रपौत्रादिसंपदः

rājasāstāmasā bhūmau bahavaḥ kāmukā janāḥ icchaṁtyaihikabhogāṁste putrapautrādisaṁpadaḥ

पृथ्वी पर राजसिक और तामसिक स्वभाव वाले काम-लोलुप लोग बहुत हैं; वे ऐहिक भोगों तथा पुत्र-पौत्र आदि की संपत्ति की ही इच्छा करते हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.165.7)

क्वचित्कथंचन क्वाऽपि जनेष्वेकोऽतिकृच्छ्रतः । स्वर्गाय यतते लोके तस्माद्यज्ञादिसत्क्रियाः

kvacitkathaṁcana kvā'pi janeṣveko'tikṛcchrataḥ svargāya yatate loke tasmādyajñādisatkriyāḥ

कहीं, किसी प्रकार, कभी-कभार लोगों में कोई एक ही अत्यंत कठिनाई से स्वर्ग के लिए प्रयत्न करता है; इसीलिए संसार में यज्ञ आदि सत्क्रियाओं का प्रचार है।

श्लोक 8 (skanda.2.165.8)

कुरुतेऽतिप्रयत्नेन मोक्षं नोपासते नरः । क्षुद्राशा भूरिकर्माणो जनाः काम्यानुपासते

kurute'tiprayatnena mokṣaṁ nopāsate naraḥ kṣudrāśā bhūrikarmāṇo janāḥ kāmyānupāsate

अत्यंत प्रयत्न से यह करता है, किन्तु मनुष्य मोक्ष की उपासना नहीं करता। तुच्छ इच्छाओं वाले, बहुत कर्मों में लगे लोग तो काम्य कर्मों की ही उपासना करते हैं।

श्लोक 9 (skanda.2.165.9)

प्रख्याता राजसा धर्मास्तामसा अपि तेन वै । न ख्याताः सात्त्विका धर्मा हरिप्रीतिकरा इमे

prakhyātā rājasā dharmāstāmasā api tena vai na khyātāḥ sāttvikā dharmā hariprītikarā ime

इसीलिए राजसिक और तामसिक धर्म ही प्रसिद्ध हैं; हरि को प्रसन्न करने वाले ये सात्त्विक धर्म प्रसिद्ध नहीं हैं,

श्लोक 10 (skanda.2.165.10)

निष्कामिका इमे धर्मा ह्यैहिकाऽऽमुष्मिकप्रदाः । न जानन्ति जना मूढा मोहिता देवमायया

niṣkāmikā ime dharmā hyaihikā''muṣmikapradāḥ na jānanti janā mūḍhā mohitā devamāyayā

क्योंकि ये धर्म निष्काम हैं, फिर भी ऐहिक और पारलौकिक फल देने वाले हैं। देव-माया से मोहित मूढ़ लोग इन्हें जानते नहीं हैं।

श्लोक 11 (skanda.2.165.11)

यथाऽऽधिपत्ये संप्राप्ते सर्वसिद्धो मनोरथः । मोहनार्थं स्थलं प्राप्तमाधिपत्येन हीयते

yathā''dhipatye saṁprāpte sarvasiddho manorathaḥ mohanārthaṁ sthalaṁ prāptamādhipatyena hīyate

जैसे स्वामित्व प्राप्त होने पर सभी मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, फिर भी मोह के कारण प्राप्त वह स्थान स्वामित्व से ही खो दिया जाता है,

श्लोक 12 (skanda.2.165.12)

कारणं च प्रवक्ष्यामि गोपने भूतलेंऽजसा । यद्वैशाखोक्तधर्माणां सात्त्विकानां नृणामिह

kāraṇaṁ ca pravakṣyāmi gopane bhūtaleṁ'jasā yadvaiśākhoktadharmāṇāṁ sāttvikānāṁ nṛṇāmiha

उसी प्रकार मैं तुम्हें सीधा कारण बताता हूँ कि इस पृथ्वी पर वैशाख में कहे गए इन सात्त्विक धर्मों को क्यों छिपा हुआ रखा जाता है,

श्लोक 13 (skanda.2.165.13)

सार्वभौमः पुरा काश्यामिक्ष्वाकुकुलभूषणः । कीर्तिमानिति विख्यातो नृगपुत्रो महायशाः

sārvabhaumaḥ purā kāśyāmikṣvākukulabhūṣaṇaḥ kīrtimāniti vikhyāto nṛgaputro mahāyaśāḥ

रहते हैं गुप्त। पूर्वकाल में काशी में इक्ष्वाकु-कुल के आभूषण, नृग के पुत्र, महायशस्वी कीर्तिमान नामक सार्वभौम राजा हुए।

श्लोक 14 (skanda.2.165.14)

जितेंद्रियो जितक्रोधो ब्रह्मण्यो राजसत्तमः । एकदा मृगयासक्तो वसिष्ठाश्रममाययौ

jiteṁdriyo jitakrodho brahmaṇyo rājasattamaḥ ekadā mṛgayāsakto vasiṣṭhāśramamāyayau

इन्द्रिय-विजयी, क्रोध-विजयी, ब्राह्मणों के हितैषी, राजाओं में श्रेष्ठ वह एक बार मृगया में आसक्त होकर वसिष्ठ के आश्रम में आ पहुँचा।

श्लोक 15 (skanda.2.165.15)

गच्छन्मार्गे ददर्शाऽसौ वैशाखे घर्मनिष्ठुरे । भूयोभूयः कार्यमाणाञ्च्छिष्यांस्तस्य महात्मनः

gacchanmārge dadarśā'sau vaiśākhe gharmaniṣṭhure bhūyobhūyaḥ kāryamāṇāñcchiṣyāṁstasya mahātmanaḥ

मार्ग में जाते हुए उसने वैशाख की कठोर गर्मी में उस महात्मा के शिष्यों को बार-बार यह कार्य करते हुए देखा —

श्लोक 16 (skanda.2.165.16)

क्वचित्प्रपां प्रकुर्वन्ति छायामण्डपमेव च । तटप्रपातं निस्तीर्य वापीं कुर्वन्ति निर्मलाम्

kvacitprapāṁ prakurvanti chāyāmaṇḍapameva ca taṭaprapātaṁ nistīrya vāpīṁ kurvanti nirmalām

कहीं वे जलाशय (प्याऊ) बना रहे थे और छाया-मण्डप भी; कहीं तट को समतल करके निर्मल बावड़ी तैयार कर रहे थे;

श्लोक 17 (skanda.2.165.17)

सूपविष्टान्क्वचिद्वृक्षे व्यजनैर्वीजयन्ति च । क्वचिद्दद्युर्हीक्षुदण्डान्क्वचिद्गन्धान्क्वचित्फलम्

sūpaviṣṭānkvacidvṛkṣe vyajanairvījayanti ca kvaciddadyurhīkṣudaṇḍānkvacidgandhānkvacitphalam

कहीं वृक्ष के नीचे बैठे हुओं को पंखों से हवा कर रहे थे; कहीं गन्ने के डंडे, कहीं चंदन, कहीं फल दे रहे थे;

श्लोक 18 (skanda.2.165.18)

मध्याह्ने छत्रदानं च सायाह्ने पानकस्य च । क्वचिद्यच्छंति ताम्बूलं नेत्रे कर्पूरलेपनम्

madhyāhne chatradānaṁ ca sāyāhne pānakasya ca kvacidyacchaṁti tāmbūlaṁ netre karpūralepanam

दोपहर में छत्र का दान, सायंकाल शर्बत का दान; कहीं वे पान अर्पित कर रहे थे, कहीं नेत्रों पर कर्पूर का लेप लगा रहे थे;

श्लोक 19 (skanda.2.165.19)

सुच्छाये च वने केचित्सुसंमृष्टांऽगणेषु च । केचिदास्तरयंत्यद्धा वालुकानि हितानि च

succhāye ca vane kecitsusaṁmṛṣṭāṁ'gaṇeṣu ca kecidāstarayaṁtyaddhā vālukāni hitāni ca

कुछ शीतल छाया वाले वन में और सुव्यवस्थित प्रांगणों में — कुछ लोग वहाँ शीतल, उपयुक्त बालू बिछा रहे थे;

श्लोक 20 (skanda.2.165.20)

कुर्वन्त्यांदोलिकां राजन्वृक्षशाखावलंबिनीम् । के यूयमिति पप्रच्छ वासिष्ठा इति तेऽब्रुवन्

kurvantyāṁdolikāṁ rājanvṛkṣaśākhāvalaṁbinīm ke yūyamiti papraccha vāsiṣṭhā iti te'bruvan

हे राजन्! कुछ वृक्ष की शाखा से लटकता हुआ झूला बना रहे थे। उसने पूछा — 'तुम कौन हो?' उन्होंने कहा — 'हम वसिष्ठ के शिष्य हैं।'

श्लोक 21 (skanda.2.165.21)

किमेतदिति पप्रच्छ धर्मा वैशाखचोदिताः । पुमर्थहेतव इमे क्रियन्तेऽस्माभिरञ्जसा

kimetaditi papraccha dharmā vaiśākhacoditāḥ pumarthahetava ime kriyante'smābhirañjasā

उसने पूछा — 'यह क्या है?' उन्होंने कहा — 'ये वैशाख में कहे गए धर्म हैं, पुरुषार्थों के कारणभूत; इन्हें हम सीधे-सीधे ही कर रहे हैं,

श्लोक 22 (skanda.2.165.22)

वसिष्ठस्याऽऽज्ञया चेति तेऽबुवन्नृपसत्तमम् । एतदाचरणे पुंसां किं फलं कस्तु तुष्यति

vasiṣṭhasyā''jñayā ceti te'buvannṛpasattamam etadācaraṇe puṁsāṁ kiṁ phalaṁ kastu tuṣyati

वसिष्ठ की आज्ञा से' — इस प्रकार उन्होंने उस श्रेष्ठ राजा से कहा। राजा ने पूछा — 'इनके पालन से मनुष्यों को क्या फल मिलता है? कौन इससे संतुष्ट होता है?

श्लोक 23 (skanda.2.165.23)

एतद्विस्तार्य मे ब्रूत यूयं सम्यग्यथाश्रुतम् । इति राज्ञा तु संपृष्टाः प्रत्यूचुस्ते महीपतिम्

etadvistārya me brūta yūyaṁ samyagyathāśrutam iti rājñā tu saṁpṛṣṭāḥ pratyūcuste mahīpatim

यह मुझे विस्तारपूर्वक, जैसा तुमने सुना है, बताओ।' राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर उन्होंने उस भूपति को उत्तर दिया।

श्लोक 24 (skanda.2.165.24)

गुरोराज्ञाक्रमेणैव कुर्वतां पथिसत्क्रियाः । नास्माकमवकाशोऽत्र गुरुं पृच्छ यथोचितम्

gurorājñākrameṇaiva kurvatāṁ pathisatkriyāḥ nāsmākamavakāśo'tra guruṁ pṛccha yathocitam

'गुरु की आज्ञा के क्रम से ही हम इन मार्ग-सत्क्रियाओं को कर रहे हैं; हमें इसका अवसर (अधिकार) नहीं है — उचित होगा कि आप गुरु से ही पूछें,

श्लोक 25 (skanda.2.165.25)

स वेत्ति तत्त्वतो नूनं धर्मानेतान्महायशाः । इति शिष्यैर्वसिष्ठस्य प्रत्युक्तस्तु द्रुतं ययौ

sa vetti tattvato nūnaṁ dharmānetānmahāyaśāḥ iti śiṣyairvasiṣṭhasya pratyuktastu drutaṁ yayau

वही, महायशस्वी, इन धर्मों को वस्तुतः जानते हैं।' वसिष्ठ के शिष्यों द्वारा इस प्रकार उत्तर दिए जाने पर राजा शीघ्र ही वहाँ से चल दिया।

श्लोक 26 (skanda.2.165.26)

वसिष्ठस्याऽश्रमं पुण्यं विद्यायोगोपबृंहितम् । समायान्तं नृपं वीक्ष्य वसिष्ठः प्रीतमानसः

vasiṣṭhasyā'śramaṁ puṇyaṁ vidyāyogopabṛṁhitam samāyāntaṁ nṛpaṁ vīkṣya vasiṣṭhaḥ prītamānasaḥ

वसिष्ठ का वह पुण्यमय आश्रम विद्या और योग से समृद्ध था। आते हुए राजा को देखकर वसिष्ठ प्रसन्नचित्त हुए,

श्लोक 27 (skanda.2.165.27)

आतिथ्यं विधिवच्चक्रे सानुगस्य महात्मनः। सूपविष्टः कृताऽतिथ्यः प्रीतः पप्रच्छ तं गुरुम्

ātithyaṁ vidhivaccakre sānugasya mahātmanaḥ sūpaviṣṭaḥ kṛtā'tithyaḥ prītaḥ papraccha taṁ gurum

उस महात्मा राजा और उसके अनुचरों का विधिवत् आतिथ्य किया। आतिथ्य पाकर, बैठकर, प्रसन्नचित्त राजा ने उस गुरु से पूछा।

श्लोक 28 (skanda.2.165.28)

राजोवाच । मार्गे दृष्टं महाश्चर्यं त्वच्छिष्यैश्च कृतं शुभम् । मया पृष्टं च तैर्नोक्तं क्रियमाणं शुभावहम्

rājovāca mārge dṛṣṭaṁ mahāścaryaṁ tvacchiṣyaiśca kṛtaṁ śubham mayā pṛṣṭaṁ ca tairnoktaṁ kriyamāṇaṁ śubhāvaham

राजा ने कहा — मार्ग में मैंने आपके शिष्यों द्वारा किया जाता हुआ एक महान् आश्चर्य, शुभ कार्य देखा; मेरे पूछने पर भी उन्होंने उस शुभप्रद कार्य के विषय में मुझे नहीं बताया,

श्लोक 29 (skanda.2.165.29)

नास्माकमवकाशोऽत्र ह्येतद्धर्मप्रशंसने । कर्तब्या च क्रियाऽस्माभिर्गुरुणा या च चोदिता

nāsmākamavakāśo'tra hyetaddharmapraśaṁsane kartabyā ca kriyā'smābhirguruṇā yā ca coditā

कहकर कि 'इस धर्म की व्याख्या में हमें अवसर नहीं है; हमें तो केवल गुरु द्वारा आदेशित क्रिया करनी है,

श्लोक 30 (skanda.2.165.30)

गुरुं गच्छेति तैरुक्त आगतोऽहं तवांतिकम् । मृगयाऽऽसक्तचित्तेन श्रांतेनातिथ्यमिच्छता

guruṁ gaccheti tairukta āgato'haṁ tavāṁtikam mṛgayā''saktacittena śrāṁtenātithyamicchatā

आप गुरु के पास जाइए' — इस प्रकार कहे जाने पर मैं आपके पास आया हूँ। मृगया में आसक्त-चित्त, थका हुआ, आतिथ्य की इच्छा रखने वाले मैंने,

श्लोक 31 (skanda.2.165.31)

दृष्टं मार्गे त्विदं पुण्यं तव शिष्यैश्च कारितम् । जिज्ञासाऽऽसीत्ततः श्रोतुं धर्मानेतान्मुनीश्वर

dṛṣṭaṁ mārge tvidaṁ puṇyaṁ tava śiṣyaiśca kāritam jijñāsā''sīttataḥ śrotuṁ dharmānetānmunīśvara

मार्ग में यह पुण्य कार्य आपके शिष्यों द्वारा किया जाता देखा। हे मुनीश्वर! तब से मुझे इन धर्मों को सुनने की जिज्ञासा हुई है।

श्लोक 32 (skanda.2.165.32)

त्वमादिरादिमान्धर्मान्समाचरसि वै यतः । तान्धर्माञ्च्छ्रोतुकामाय शिष्याय प्रणताय च

tvamādirādimāndharmānsamācarasi vai yataḥ tāndharmāñcchrotukāmāya śiṣyāya praṇatāya ca

आप ही आदिपुरुष के समान इन प्राचीन धर्मों का आचरण करते हैं; अतः इन्हें सुनने की इच्छा रखने वाले, नत, आपके शिष्य के रूप में मुझे,

श्लोक 33 (skanda.2.165.33)

श्रद्दधानाय मे ब्रूहि विस्तरान्मुनिपुंगव । इतीक्ष्वाकुकुलीनेन राज्ञा पृष्टो महायशाः

śraddadhānāya me brūhi vistarānmunipuṁgava itīkṣvākukulīnena rājñā pṛṣṭo mahāyaśāḥ

श्रद्धावान् मुझे, हे मुनिश्रेष्ठ, विस्तारपूर्वक बताइए। इस प्रकार इक्ष्वाकु-कुल के उस राजा द्वारा पूछे जाने पर वे महायशस्वी वसिष्ठ,

श्लोक 34 (skanda.2.165.34)

मनसा तोषमापेदे सम्यक्पृष्टोऽधुनाऽमुना । अहो व्यवसिता बुद्धी राजस्तेऽद्य सुशिक्षिता

manasā toṣamāpede samyakpṛṣṭo'dhunā'munā aho vyavasitā buddhī rājaste'dya suśikṣitā

मन ही मन संतुष्ट हुए, क्योंकि अभी इस राजा ने भलीभाँति प्रश्न पूछा था — 'अहो! हे राजन्, तुम्हारी बुद्धि आज सुशिक्षित और सुदृढ़ है,

श्लोक 35 (skanda.2.165.35)

यस्माद्विष्णुकथायां च तद्धर्माचरणेऽपि च । मतिरात्यंतिकी जाता सुकृतं फलितं तव

yasmādviṣṇukathāyāṁ ca taddharmācaraṇe'pi ca matirātyaṁtikī jātā sukṛtaṁ phalitaṁ tava

क्योंकि विष्णु-कथा में और उनके धर्म के आचरण में तुम्हारी अत्यंत गहरी बुद्धि उत्पन्न हुई है; तुम्हारा सुकृत ही फलित हुआ है।'

श्लोक 36 (skanda.2.165.36)

इति संभाष्य राजानं जातहर्षस्तमब्रवीत् । शृणु भूप प्रवक्ष्यामि यत्पृष्टोऽहं त्वयाधुना

iti saṁbhāṣya rājānaṁ jātaharṣastamabravīt śṛṇu bhūpa pravakṣyāmi yatpṛṣṭo'haṁ tvayādhunā

इस प्रकार राजा से बातचीत करके, हर्षित होकर उन्होंने उससे कहा — 'हे भूप! सुनो, अब तुमने जो मुझसे पूछा है, वह मैं बताता हूँ।

श्लोक 37 (skanda.2.165.37)

यस्य श्रवणमात्रेण मुच्यते सर्वकिल्बिषैः । सर्वधर्मान्परित्यज्य वर्तते विषयात्मकः

yasya śravaṇamātreṇa mucyate sarvakilbiṣaiḥ sarvadharmānparityajya vartate viṣayātmakaḥ

जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है — जो व्यक्ति समस्त धर्मों को त्यागकर विषयासक्त बना रहता है,

श्लोक 38 (skanda.2.165.38)

वैशाखस्नाननिरतः स प्रियो मधुविद्विषः । सांगान्धर्माननुष्ठाय वैशाखो येन नादृतः

vaiśākhasnānanirataḥ sa priyo madhuvidviṣaḥ sāṁgāndharmānanuṣṭhāya vaiśākho yena nādṛtaḥ

यदि वह वैशाख-स्नान में तत्पर रहता है, तो वह मधुसूदन (विष्णु) को प्रिय है। इसके विपरीत, जिसने समस्त अन्य धर्मों का पालन करते हुए भी वैशाख का सम्मान नहीं किया,

श्लोक 39 (skanda.2.165.39)

स्नानदानार्चनैः पुण्यैस्तस्य दूरतरो हरिः । अस्नाप्य चाऽप्यदत्त्वा च वैशाखो येन नीयते

snānadānārcanaiḥ puṇyaistasya dūrataro hariḥ asnāpya cā'pyadattvā ca vaiśākho yena nīyate

उसके स्नान, दान और पूजन के पुण्यों के बावजूद हरि उससे बहुत दूर रहते हैं। जिसने वैशाख को बिना स्नान किए और बिना दान किए बिता दिया,

श्लोक 40 (skanda.2.165.40)

कर्मणा स तु चण्डालो नाऽत्र कार्या विचारणा । वैशाखोक्तैर्महाधर्मैर्येन चाऽऽराधितो हरिः

karmaṇā sa tu caṇḍālo nā'tra kāryā vicāraṇā vaiśākhoktairmahādharmairyena cā''rādhito hariḥ

वह अपने कर्म से चांडाल के समान है, इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है। परंतु जिसने वैशाख में कहे गए महान् धर्मों से हरि की आराधना की है,

श्लोक 41 (skanda.2.165.41)

तैश्च तोषं समायाति प्रददाति समीहितम् । लक्ष्मीभर्त्ता जगन्नाथो ह्यशेषाघौघनाशनः

taiśca toṣaṁ samāyāti pradadāti samīhitam lakṣmībharttā jagannātho hyaśeṣāghaughanāśanaḥ

उनसे लक्ष्मीपति जगन्नाथ, जो समस्त पापों के समूह के नाशक हैं, संतुष्ट होते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.165.42)

धर्मैः सूक्ष्मैश्च प्रीणाति न प्रयासैर्धनैरपि । भक्त्या संपूजितो विष्णुः प्रददाति समीहितम्

dharmaiḥ sūkṣmaiśca prīṇāti na prayāsairdhanairapi bhaktyā saṁpūjito viṣṇuḥ pradadāti samīhitam

वे सूक्ष्म धर्मों से ही प्रसन्न होते हैं, बहुत परिश्रम या धन से नहीं; भक्तिपूर्वक पूजा किए जाने पर विष्णु मनोवांछित फल देते हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.165.43)

तस्माद्राजन्सदा भक्तिः कर्तव्या मधुविद्विषः । जलेनाऽपि जगन्नाथः पूजितः क्लेशहा हरिः

tasmādrājansadā bhaktiḥ kartavyā madhuvidviṣaḥ jalenā'pi jagannāthaḥ pūjitaḥ kleśahā hariḥ

अतः हे राजन्, मधुसूदन के प्रति सदा भक्ति करनी चाहिए। जगन्नाथ, क्लेश-नाशक हरि, केवल जल से भी पूजित होकर,

श्लोक 44 (skanda.2.165.44)

परितोषं व्रजत्याशु तृषार्तः सलिलैर्यथा । महदप्यल्पदं कर्म तथा ह्यल्पं च भूरिदम्

paritoṣaṁ vrajatyāśu tṛṣārtaḥ salilairyathā mahadapyalpadaṁ karma tathā hyalpaṁ ca bhūridam

उसी प्रकार तुरंत संतुष्ट हो जाते हैं जैसे प्यासा व्यक्ति जल से। इस प्रकार बड़े कर्म भी अल्प फल देने वाले हो सकते हैं, और अल्प कर्म भी अत्यधिक फल देने वाले।

श्लोक 45 (skanda.2.165.45)

कर्मणाऽल्पत्वभूरित्वे न हेतू महदल्पके । किन्तु कर्मस्वरूपं च गहना कर्मणो गतिः

karmaṇā'lpatvabhūritve na hetū mahadalpake kintu karmasvarūpaṁ ca gahanā karmaṇo gatiḥ

कर्म के बड़े या छोटे होने में ही यह कारण नहीं है; अपितु कर्म का स्वरूप ही महत्वपूर्ण है — कर्म की गति अत्यंत गूढ़ है।

श्लोक 46 (skanda.2.165.46)

वैशाखोक्ता इमे धर्माः स्वल्पाऽऽयासकृता अपि । बहुव्ययविनाशाश्च विष्णोः प्रीतिकरा शुभाः

vaiśākhoktā ime dharmāḥ svalpā''yāsakṛtā api bahuvyayavināśāśca viṣṇoḥ prītikarā śubhāḥ

वैशाख में कहे गए ये धर्म, यद्यपि थोड़े परिश्रम से ही किए जाते हैं, फिर भी बहुत व्यय और नाश करने वाले (पापों को नष्ट करने वाले), शुभ और विष्णु को प्रसन्न करने वाले हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.165.47)

तस्मात्त्वमपि भूपाल वैशाखोक्तान्समाचर। त्वद्राष्ट्रीयैर्जनैः सर्वैः कारयेमाञ्च्छुभावहान्

tasmāttvamapi bhūpāla vaiśākhoktānsamācara tvadrāṣṭrīyairjanaiḥ sarvaiḥ kārayemāñcchubhāvahān

अतः हे भूपाल! तुम भी वैशाख में कहे गए धर्मों का पालन करो, और अपने राष्ट्र के समस्त लोगों से भी इन शुभप्रद कर्मों को कराओ।

श्लोक 48 (skanda.2.165.48)

न करोति च यो धर्मान्वैशाखोक्तान्नराधमः । बहुधा शिष्यमाणोऽपि स दण्ड्यस्तव भूपते

na karoti ca yo dharmānvaiśākhoktānnarādhamaḥ bahudhā śiṣyamāṇo'pi sa daṇḍyastava bhūpate

जो नराधम वैशाख में कहे गए धर्मों को नहीं करता, बार-बार समझाए जाने पर भी, हे भूपते, वह तुम्हारे द्वारा दण्डनीय होना चाहिए।

श्लोक 49 (skanda.2.165.49)

इत्यावश्यकतां सम्यक्छास्त्रैर्व्युत्पाद्य तस्य च । पश्चाद्वैशाखनिर्दिष्टान्धर्मान्प्रोवाच सर्वशः

ityāvaśyakatāṁ samyakchāstrairvyutpādya tasya ca paścādvaiśākhanirdiṣṭāndharmānprovāca sarvaśaḥ

इस प्रकार शास्त्रों के आधार पर उसकी अनिवार्यता भलीभाँति सिद्ध करके, वसिष्ठ ने तत्पश्चात् वैशाख में निर्दिष्ट सभी धर्मों का पूर्णतः वर्णन किया।

श्लोक 50 (skanda.2.165.50)

श्रुत्वा तान्सकलान्धर्मान्गुरुं संपूज्य भक्तितः । स राजा गृहमागत्य सर्वान्धर्मांश्चकार ह

śrutvā tānsakalāndharmānguruṁ saṁpūjya bhaktitaḥ sa rājā gṛhamāgatya sarvāndharmāṁścakāra ha

उन समस्त धर्मों को सुनकर, गुरु का भक्तिपूर्वक पूजन करके, वह राजा अपने घर लौटकर उन सभी धर्मों का पालन करने लगा।

श्लोक 51 (skanda.2.165.51)

भक्तिमान्केशवे राजन्देवदेवे निरञ्जने । नाऽन्यं पश्यति देवेशात्पद्मनाभान्महीपतिः

bhaktimānkeśave rājandevadeve nirañjane nā'nyaṁ paśyati deveśātpadmanābhānmahīpatiḥ

हे राजन्! निष्कलंक देवदेव केशव में भक्ति रखने वाला वह भूपति देवेश पद्मनाभ के अतिरिक्त और किसी को नहीं देखता था।

श्लोक 52 (skanda.2.165.52)

भेरीमुद्वाह्य मातंगं स्वराष्ट्रेऽघोषयद्भटैः । अष्टवर्षाधिको मर्त्यो ह्यशीतिर्नहि पूर्यते

bherīmudvāhya mātaṁgaṁ svarāṣṭre'ghoṣayadbhaṭaiḥ aṣṭavarṣādhiko martyo hyaśītirnahi pūryate

उसने हाथी पर भेरी चढ़ाकर अपने राष्ट्र में सैनिकों द्वारा यह घोषणा करवाई — 'आठ वर्ष से बड़ा कोई भी मनुष्य, जिसकी अस्सी वर्ष की आयु पूरी न हुई हो,

श्लोक 53 (skanda.2.165.53)

प्रातर्न स्नाति मेषस्थे सूर्ये सर्वोऽपि यो जनः । स मे दंड्यश्च वध्यश्च निर्यास्यो विषयाद्ध्रुवम्

prātarna snāti meṣasthe sūrye sarvo'pi yo janaḥ sa me daṁḍyaśca vadhyaśca niryāsyo viṣayāddhruvam

जो कोई भी सूर्य के मेष राशि में रहते हुए प्रातःकाल स्नान नहीं करता, वह मेरे द्वारा दंडनीय और वध्य है, तथा निश्चय ही राज्य से निष्कासित किया जाएगा।

श्लोक 54 (skanda.2.165.54)

पिता वा यदि वा पुत्रो भार्या वाऽथ सुहृज्जनः । वैशाखधर्महीनश्च निर्ग्राह्यो दस्युवन्मया

pitā vā yadi vā putro bhāryā vā'tha suhṛjjanaḥ vaiśākhadharmahīnaśca nirgrāhyo dasyuvanmayā

चाहे वह पिता हो, पुत्र हो, पत्नी हो या मित्र-जन — वैशाख के धर्म से हीन व्यक्ति को मैं दस्यु के समान ही पकड़वाऊँगा।

श्लोक 55 (skanda.2.165.55)

दातव्यं विप्रमुख्येभ्यः स्नात्वा प्रातर्जले शुभे । प्रपादानादिधर्मांश्च कुरुध्वं शक्तितोऽनघाः

dātavyaṁ vipramukhyebhyaḥ snātvā prātarjale śubhe prapādānādidharmāṁśca kurudhvaṁ śaktito'naghāḥ

प्रातःकाल शुभ जल में स्नान करके श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दान देना चाहिए। हे निष्पाप जनो! अपनी सामर्थ्य के अनुसार जलशाला-दान आदि धर्मों का पालन करो।'

श्लोक 56 (skanda.2.165.56)

विप्रं च धर्मवक्तारं ग्रामेग्रामे न्यवेशयत् । पञ्चानामपि ग्रामाणामकरोदधिकारिणम्

vipraṁ ca dharmavaktāraṁ grāmegrāme nyaveśayat pañcānāmapi grāmāṇāmakarodadhikāriṇam

उसने प्रत्येक गाँव में धर्म का उपदेश देने वाले एक ब्राह्मण को नियुक्त किया, और पाँच-पाँच गाँवों के लिए एक अधिकारी भी नियुक्त किया,

श्लोक 57 (skanda.2.165.57)

दण्डार्थं त्यक्तधर्माणां दशवाजिनिषेवितम् । एवं प्रवृत्तः सर्वत्र सार्वभौमस्य शासनात्

daṇḍārthaṁ tyaktadharmāṇāṁ daśavājiniṣevitam evaṁ pravṛttaḥ sarvatra sārvabhaumasya śāsanāt

जो धर्म का परित्याग करने वालों को दंड देने के लिए दस अश्वारोहियों से सेवित था। इस प्रकार उस सार्वभौम राजा के शासन से हर जगह यह प्रवृत्त हुआ,

श्लोक 58 (skanda.2.165.58)

प्रवृद्धो धर्मवृक्षोयं सर्वदेशेषु विस्तरात् । ये केचिन्निधनं यांति भूपालविषये नराः

pravṛddho dharmavṛkṣoyaṁ sarvadeśeṣu vistarāt ye kecinnidhanaṁ yāṁti bhūpālaviṣaye narāḥ

और यह धर्म-वृक्ष सभी देशों में विस्तार से बढ़ने लगा। उस राजा के राज्य में जो भी मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होते थे,

श्लोक 59 (skanda.2.165.59)

प्रमादाच्च नृपश्रेष्ठ ते यांति हरिमन्दिरम् । अवश्यं वैष्णवो लोकः प्राप्यते मानवैर्द्रुतम्

pramādācca nṛpaśreṣṭha te yāṁti harimandiram avaśyaṁ vaiṣṇavo lokaḥ prāpyate mānavairdrutam

चाहे प्रमाद से ही क्यों न मरे हों, हे नृपश्रेष्ठ! वे हरि के धाम को जाते थे। मनुष्यों को निश्चय ही वैष्णव लोक शीघ्र प्राप्त हो जाता था,

श्लोक 60 (skanda.2.165.60)

व्याजेनाऽपि सकृत्स्नातः प्रातर्मेषगते रवौ । सर्वपापविनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम्

vyājenā'pi sakṛtsnātaḥ prātarmeṣagate ravau sarvapāpavinirmukto yāti viṣṇoḥ paraṁ padam

यहाँ तक कि जो केवल बहाने से भी एक बार सूर्य के मेष राशि में रहते हुए प्रातःकाल स्नान कर लेता था, वह भी समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता था।

श्लोक 61 (skanda.2.165.61)

न प्राप्नोति यमं धर्मं सकृद्वैशाखस्नानतः । वैलेख्यमगमद्राजा रविसूनुस्तदा नृप

na prāpnoti yamaṁ dharmaṁ sakṛdvaiśākhasnānataḥ vailekhyamagamadrājā ravisūnustadā nṛpa

एक बार भी वैशाख-स्नान करने से मनुष्य यमराज को प्राप्त नहीं होता। हे राजन्! उस समय सूर्य-पुत्र राजा यम का लेखा-कार्य ही ठप्प हो गया।

श्लोक 62 (skanda.2.165.62)

लेख्यकर्मणि विश्रान्तश्चित्रगुप्तोऽभवत्तदा । मार्जितानि च लेख्यानि पुरा पापोद्भवानि च

lekhyakarmaṇi viśrāntaścitragupto'bhavattadā mārjitāni ca lekhyāni purā pāpodbhavāni ca

चित्रगुप्त का लेखन-कार्य ठहर गया, और पहले के पाप-कर्मों से उत्पन्न लिखित अभिलेख भी मिटा दिए गए,

श्लोक 63 (skanda.2.165.63)

गच्छद्भिर्वैष्णवं लोकं स्वकर्मस्थैर्जनैः क्षणात् । शून्यास्तु नरकाः सर्वे पापिप्राणिविवर्जिताः

gacchadbhirvaiṣṇavaṁ lokaṁ svakarmasthairjanaiḥ kṣaṇāt śūnyāstu narakāḥ sarve pāpiprāṇivivarjitāḥ

क्योंकि वे लोग, अपने-अपने कर्मों में स्थित रहते हुए भी, क्षणभर में ही वैष्णव लोक को जाने लगे। सभी नरक शून्य हो गए, पापी प्राणियों से रहित,

श्लोक 64 (skanda.2.165.64)

भग्नयानोऽभवन्मार्गो वैशाखस्य प्रभावतः । सर्वेऽपि विमलाकारा जना यान्ति हरेः पदम्

bhagnayāno'bhavanmārgo vaiśākhasya prabhāvataḥ sarve'pi vimalākārā janā yānti hareḥ padam

और वैशाख के प्रभाव से (नरक का) मार्ग ही टूट गया। सभी लोग, निर्मल स्वरूप वाले होकर, हरि के धाम को जाने लगे।

श्लोक 65 (skanda.2.165.65)

दिवौकसां तु ये लोकाः शून्याः सर्वे तथाऽभवन् । शून्ये त्रिविष्टपे जाते शून्येषु नर केषु च

divaukasāṁ tu ye lokāḥ śūnyāḥ sarve tathā'bhavan śūnye triviṣṭape jāte śūnyeṣu nara keṣu ca

देवताओं के जो अन्य लोक थे, वे भी सभी इसी प्रकार शून्य हो गए। स्वर्ग के शून्य हो जाने पर और नरकों के भी शून्य हो जाने पर,

श्लोक 66 (skanda.2.165.66)

नारदो धर्मराजानं गत्वा चेदमुवाच ह । नाक्रन्दः श्रूयते राजन्प्राक्च्छ्रुतो नरके यथा

nārado dharmarājānaṁ gatvā cedamuvāca ha nākrandaḥ śrūyate rājanprākcchruto narake yathā

नारद ने धर्मराज (यम) के पास जाकर यह कहा — 'हे राजन्! अब नरक में वह क्रंदन सुनाई नहीं देता जो पहले सुनाई देता था;

श्लोक 67 (skanda.2.165.67)

तथा न क्रियते लेख्यं किंचिद्दुष्कृतकर्मणाम्। चित्रगुप्तो मुनिरिव स्थितोऽयं मौनसंस्थितः

tathā na kriyate lekhyaṁ kiṁcidduṣkṛtakarmaṇām citragupto muniriva sthito'yaṁ maunasaṁsthitaḥ

इसी प्रकार दुष्कर्मों का कोई भी लेखा नहीं तैयार किया जा रहा है; यह चित्रगुप्त मुनि के समान मौन धारण किए बैठा है।

श्लोक 68 (skanda.2.165.68)

कारणं ब्रूहि राजेंद्र न यान्ति तव मन्दिरम् । मनुष्याः पापकर्माणो मायादम्भविवर्धिताः

kāraṇaṁ brūhi rājeṁdra na yānti tava mandiram manuṣyāḥ pāpakarmāṇo māyādambhavivardhitāḥ

हे राजेन्द्र! बताइए, इसका कारण क्या है कि माया और दंभ से बढ़े हुए, पापकर्मी मनुष्य भी अब आपके धाम को नहीं जा रहे हैं?'

श्लोक 69 (skanda.2.165.69)

एवमुक्ते तु वचने नारदेन महात्मना । प्राह वैवस्वतो राजा किंचिद्दैन्यसमन्वितः

evamukte tu vacane nāradena mahātmanā prāha vaivasvato rājā kiṁciddainyasamanvitaḥ

महात्मा नारद द्वारा इस प्रकार वचन कहे जाने पर, वैवस्वत राजा (यम) ने कुछ दीनता के साथ कहा।

श्लोक 70 (skanda.2.165.70)

योऽयं नारद भूपालः पृथिव्यां सांप्रतं स्थितः । सोऽतिभक्तो हृषीकेशे पुराणपुरुषोत्तमे

yo'yaṁ nārada bhūpālaḥ pṛthivyāṁ sāṁprataṁ sthitaḥ so'tibhakto hṛṣīkeśe purāṇapuruṣottame

'हे नारद! जो यह भूपाल इस समय पृथ्वी पर विद्यमान है, वह पुराण-पुरुषोत्तम हृषीकेश (विष्णु) का अत्यंत भक्त है।

श्लोक 71 (skanda.2.165.71)

प्रबोधयति वैशाखधर्मे भेरीस्वनेन च । अष्टवर्षाधिको मर्त्यो ह्यशीतिर्न हि पूर्यते

prabodhayati vaiśākhadharme bherīsvanena ca aṣṭavarṣādhiko martyo hyaśītirna hi pūryate

वह भेरी की ध्वनि के साथ वैशाख-धर्म में लोगों को जगाता है — 'आठ वर्ष से अधिक आयु का, अस्सी वर्ष से कम आयु वाला जो भी मनुष्य,

श्लोक 72 (skanda.2.165.72)

यो वै ह्यकृतवैशाखः स मे दण्ड्यो न संशयः । तद्भयाद्धि जनाः सर्वे नोल्लंघंति कदाचन

yo vai hyakṛtavaiśākhaḥ sa me daṇḍyo na saṁśayaḥ tadbhayāddhi janāḥ sarve nollaṁghaṁti kadācana

जो वैशाख-धर्म का पालन नहीं करता, वह मेरे द्वारा दंडनीय है, इसमें संदेह नहीं।' उसके भय से समस्त लोग कभी भी इसका उल्लंघन नहीं करते,

श्लोक 73 (skanda.2.165.73)

गच्छंति वैष्णवं धाम कर्मणा तेन नारद । वैशाखसेवनाल्लोका यास्यंति हरिमंदिरम्

gacchaṁti vaiṣṇavaṁ dhāma karmaṇā tena nārada vaiśākhasevanāllokā yāsyaṁti harimaṁdiram

और इस कर्म से, हे नारद, वे वैष्णव धाम को जाते हैं। वैशाख के पालन से लोग हरि-मंदिर को ही जाएँगे,

श्लोक 74 (skanda.2.165.74)

तेन राज्ञा मुनिश्रेष्ठ मार्गो लुप्तो ममाऽधुना । कृता हि नरकाः शून्या लोकाश्चापि दिवौकसाम्

tena rājñā muniśreṣṭha mārgo lupto mamā'dhunā kṛtā hi narakāḥ śūnyā lokāścāpi divaukasām

इसी कारण, हे मुनिश्रेष्ठ, उस राजा के कारण अब मेरा मार्ग ही लुप्त हो गया है; उसने नरकों को और देवताओं के लोकों को भी शून्य कर दिया है।

श्लोक 75 (skanda.2.165.75)

विश्रांतो लेखको लेखे लिखितं मार्जितं जनैः । वैशाखमासधर्मस्य माहात्म्यं त्वीदृशं मुने

viśrāṁto lekhako lekhe likhitaṁ mārjitaṁ janaiḥ vaiśākhamāsadharmasya māhātmyaṁ tvīdṛśaṁ mune

मेरा लेखक अपने लेखन-कार्य से विश्राम में है, और लिखे हुए लेख भी लोगों द्वारा (उनके सुकृत से) मिटा दिए गए हैं। हे मुने! वैशाख मास के धर्म की महिमा ऐसी ही है।

श्लोक 76 (skanda.2.165.76)

ब्रह्महत्यादिपापानि विमुक्तानि जनैर्द्विज । कृत्वा वैशाखकृत्यानि यांति विष्णोः परं पदम्

brahmahatyādipāpāni vimuktāni janairdvija kṛtvā vaiśākhakṛtyāni yāṁti viṣṇoḥ paraṁ padam

हे द्विज! लोगों ने ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्ति पा ली है; वैशाख के कृत्यों को करके वे विष्णु के परम पद को जा रहे हैं।

श्लोक 77 (skanda.2.165.77)

सोऽहं काष्ठसमो जातो न कश्चिन्मम गोचरः । युद्धं कृत्वा तु तं हन्मि सर्वथाऽद्य महाबलम्

so'haṁ kāṣṭhasamo jāto na kaścinmama gocaraḥ yuddhaṁ kṛtvā tu taṁ hanmi sarvathā'dya mahābalam

मैं तो अब काठ के समान निष्क्रिय हो गया हूँ, कोई भी मेरे कार्यक्षेत्र में नहीं आता। अतः आज मैं युद्ध करके उस महाबली को सर्वथा मार डालूँगा,

श्लोक 78 (skanda.2.165.78)

अकृत्वा स्वामिकार्यं तु निर्व्यापारो यदि स्थितः । तस्य वित्तं समश्नाति स याति नरकं धुवम्

akṛtvā svāmikāryaṁ tu nirvyāpāro yadi sthitaḥ tasya vittaṁ samaśnāti sa yāti narakaṁ dhuvam

क्योंकि जो अपने स्वामी का कार्य किए बिना निष्क्रिय बना रहता है, वह उसका वेतन भोगता हुआ भी निश्चय ही नरक को जाता है।

श्लोक 79 (skanda.2.165.79)

यदि देवादवध्योऽयं तदा ब्रह्माणमेत्य च । निवेद्य तस्मै तत्सर्वं पश्चात्स्वस्थस्थितिर्भवम्

yadi devādavadhyo'yaṁ tadā brahmāṇametya ca nivedya tasmai tatsarvaṁ paścātsvasthasthitirbhavam

यदि यह किसी देवता के वरदान से अवध्य है, तो मैं ब्रह्मा के पास जाकर उन्हें यह सब निवेदन करूँगा, और तत्पश्चात् ही मेरी स्वस्थ स्थिति होगी।'

श्लोक 80 (skanda.2.165.80)

इत्युक्त्वा द्विजमामंत्र्य सानुगः प्रययौ भुवम् । स कालो महिषारूढो दण्डमुद्यम्य भीषणम्

ityuktvā dvijamāmaṁtrya sānugaḥ prayayau bhuvam sa kālo mahiṣārūḍho daṇḍamudyamya bhīṣaṇam

यह कहकर उस ब्राह्मण (नारद) से विदा लेकर वह अपने अनुचरों के साथ पृथ्वी पर चल पड़ा — वह काल-रूप यम, भैंसे पर आरूढ़, भीषण दंड उठाए हुए,

श्लोक 81 (skanda.2.165.81)

मृत्युरोगजराद्यैश्च पार्षदैश्च महोत्कटः । पञ्चाशत्कोटिसंख्याकैर्यमदूतैर्वृतस्ततः

mṛtyurogajarādyaiśca pārṣadaiśca mahotkaṭaḥ pañcāśatkoṭisaṁkhyākairyamadūtairvṛtastataḥ

मृत्यु, रोग, जरा आदि उग्र पार्षदों तथा पचास करोड़ यमदूतों से घिरा हुआ,

श्लोक 82 (skanda.2.165.82)

स तूर्णं तस्य राजर्षे रुरोध सकलां पुरीम् । शंखं दध्मौ महाघोरं सर्वलोकभयंकरम्

sa tūrṇaṁ tasya rājarṣe rurodha sakalāṁ purīm śaṁkhaṁ dadhmau mahāghoraṁ sarvalokabhayaṁkaram

उसने तत्काल उस राजर्षि की समूची राजधानी को घेर लिया, और एक अत्यंत भयंकर, सभी लोकों को भयभीत करने वाला शंख बजाया।

श्लोक 83 (skanda.2.165.83)

तच्छुत्वा स तु राजर्षि र्ज्ञात्वा वैवस्वतं यमम् । स सज्जीकृतसर्वस्वः पत्तनान्निर्ययौ रुषा

tacchutvā sa tu rājarṣi rjñātvā vaivasvataṁ yamam sa sajjīkṛtasarvasvaḥ pattanānniryayau ruṣā

यह सुनकर उस राजर्षि ने वैवस्वत यम को पहचान लिया, और अपनी समस्त सेना को सुसज्जित करके क्रोधपूर्वक नगर से बाहर निकल आया।

श्लोक 84 (skanda.2.165.84)

तयोर्युद्धमभूत्तत्र भीषणं रोमहर्षणम् । मृत्युं कालं तथा रोगं यमं दूतपतिं तथा

tayoryuddhamabhūttatra bhīṣaṇaṁ romaharṣaṇam mṛtyuṁ kālaṁ tathā rogaṁ yamaṁ dūtapatiṁ tathā

उन दोनों के बीच वहाँ भीषण, रोमांचकारी युद्ध हुआ। मृत्यु, काल, रोग तथा दूतों के स्वामी यम को —

श्लोक 85 (skanda.2.165.85)

जित्वा क्षणेन राजर्षिर्द्रावयामास रोषतः । ततः क्रुद्धो यमो राजा स्वयमभ्येत्य तं रुषा

jitvā kṣaṇena rājarṣirdrāvayāmāsa roṣataḥ tataḥ kruddho yamo rājā svayamabhyetya taṁ ruṣā

उस राजर्षि ने क्षणभर में जीतकर क्रोधपूर्वक भगा दिया। तब क्रुद्ध राजा यम स्वयं क्रोध के साथ आगे बढ़े,

श्लोक 86 (skanda.2.165.86)

युयोध बहुभिर्बाणैः सिंहनादं चकार ह । चकर्त राजा तस्याऽपि कार्मुकं विशिखैस्त्रिभिः

yuyodha bahubhirbāṇaiḥ siṁhanādaṁ cakāra ha cakarta rājā tasyā'pi kārmukaṁ viśikhaistribhiḥ

अनेक बाणों से युद्ध किया और सिंहनाद किया। राजा ने भी तीन बाणों से उनके धनुष को काट डाला।

श्लोक 87 (skanda.2.165.87)

पुनश्चर्मासिमादाय यमो हंतुमथाऽऽगमत् । तं दृष्ट्वा तु नृपः क्रुद्धः पुनश्छित्त्वाऽसिचर्मणी

punaścarmāsimādāya yamo haṁtumathā''gamat taṁ dṛṣṭvā tu nṛpaḥ kruddhaḥ punaśchittvā'sicarmaṇī

फिर तलवार और ढाल लेकर यम उसे मारने के लिए आगे बढ़े। उन्हें देखकर क्रुद्ध राजा ने पुनः उनकी तलवार और ढाल को काट डाला,

श्लोक 88 (skanda.2.165.88)

निचखान ललाटे च शरं कालोरगप्रभम् । यमस्तेनाऽऽहतः क्रुद्धस्ततो दंडमुपाददे । ब्रह्मास्त्रेण च संमंत्र्य दण्डं तस्मै मुमोच ह

nicakhāna lalāṭe ca śaraṁ kāloragaprabham yamastenā''hataḥ kruddhastato daṁḍamupādade brahmāstreṇa ca saṁmaṁtrya daṇḍaṁ tasmai mumoca ha

और काल-सर्प के समान तेजस्वी बाण उनके मस्तक में गाड़ दिया। इससे आहत होकर क्रुद्ध यम ने अपना दंड उठाया, और उसे ब्रह्मास्त्र से अभिमंत्रित करके राजा पर छोड़ दिया।

श्लोक 89 (skanda.2.165.89)

हाहाकारो महानासीज्जनानां पश्यतां तदा । तदा विष्णुः स्वभक्तस्य रक्षायै प्राहिणोदरि

hāhākāro mahānāsījjanānāṁ paśyatāṁ tadā tadā viṣṇuḥ svabhaktasya rakṣāyai prāhiṇodari

उसे देखते हुए लोगों में तब एक भारी हाहाकार मच गया। तभी विष्णु ने अपने भक्त की रक्षा के लिए अपने शत्रु-नाशक चक्र को भेजा,

श्लोक 90 (skanda.2.165.90)

विष्णुमुक्तं तदा चक्रं शीघ्रमागत्य तद्रणे । यमदण्डेन संयुध्य तद्ब्रह्मास्त्रं निवार्य च

viṣṇumuktaṁ tadā cakraṁ śīghramāgatya tadraṇe yamadaṇḍena saṁyudhya tadbrahmāstraṁ nivārya ca

और विष्णु द्वारा छोड़ा गया वह चक्र शीघ्र ही उस युद्ध-भूमि में आकर, यम के दंड से युद्ध करके, उस ब्रह्मास्त्र को निवारित करके,

श्लोक 91 (skanda.2.165.91)

यमं हंतुमथारेभे सहस्रारं महाद्भुतम् । देवभक्तस्ततो भीतस्तदाऽस्तौच्चक्रमञ्जसा

yamaṁ haṁtumathārebhe sahasrāraṁ mahādbhutam devabhaktastato bhītastadā'stauccakramañjasā

और उस अद्भुत सहस्रार चक्र ने यम को मारने के लिए उद्यत हो गया। तब देवभक्त राजा भयभीत होकर उस चक्र की सीधे स्तुति करने लगा।

श्लोक 92 (skanda.2.165.92)

सहस्रार नमस्तेऽस्तु विष्णुपाणिविभूषण । त्वं सर्वलोकरक्षायै हरिणा च धृतं पुरा

sahasrāra namaste'stu viṣṇupāṇivibhūṣaṇa tvaṁ sarvalokarakṣāyai hariṇā ca dhṛtaṁ purā

'हे सहस्रार! तुम्हें नमस्कार है, तुम विष्णु के हाथ के आभूषण हो। पहले हरि ने तुम्हें समस्त लोकों की रक्षा के लिए धारण किया था;

श्लोक 93 (skanda.2.165.93)

त्वां याचेऽद्य यमं त्रातुं विष्णुभक्तं महाबलम्

tvāṁ yāce'dya yamaṁ trātuṁ viṣṇubhaktaṁ mahābalam

मैं आज तुमसे उस विष्णु-भक्त, महाबली यम की रक्षा की याचना करता हूँ।

श्लोक 94 (skanda.2.165.94)

नृणां देवद्रुहां कालस्त्वमेव हि न चाऽपरः। तस्मादेनं यमं रक्ष कृपां कुरु जगत्पते

nṛṇāṁ devadruhāṁ kālastvameva hi na cā'paraḥ tasmādenaṁ yamaṁ rakṣa kṛpāṁ kuru jagatpate

तुम ही मनुष्यों में देव-द्रोहियों के लिए काल हो, कोई अन्य नहीं। अतः इस यम की रक्षा करो, हे जगत्पते, इस पर कृपा करो।'

श्लोक 95 (skanda.2.165.95)

नृपेणैवं स्तुतं चक्रं यमं हित्वा नृपांतिकम् । पुनर्ययौ महाराज देवानां पश्यतां दिवि

nṛpeṇaivaṁ stutaṁ cakraṁ yamaṁ hitvā nṛpāṁtikam punaryayau mahārāja devānāṁ paśyatāṁ divi

राजा द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, चक्र यम को छोड़कर राजा के समीप आया, और हे महाराज! देवताओं के देखते-देखते पुनः स्वर्ग को लौट गया।

श्लोक 96 (skanda.2.165.96)

ततो यमोऽतिनिर्विण्णो ब्रह्मणः सदनं ययौ । स ददर्श समासीनं मूर्तामूर्तजनैर्वृतम्

tato yamo'tinirviṇṇo brahmaṇaḥ sadanaṁ yayau sa dadarśa samāsīnaṁ mūrtāmūrtajanairvṛtam

तत्पश्चात् अत्यंत खिन्न हुए यम ब्रह्मा के भवन को गए। उन्होंने वहाँ मूर्त और अमूर्त जनों से घिरे हुए, आसीन ब्रह्मा को देखा,

श्लोक 97 (skanda.2.165.97)

धुवाश्रयं जगद्बीजं सर्वलोकपितामहम्। उपास्यमानं विबुधैर्लोकपालैर्दिगीश्वरैः

dhuvāśrayaṁ jagadbījaṁ sarvalokapitāmaham upāsyamānaṁ vibudhairlokapālairdigīśvaraiḥ

जो सबका स्थिर आश्रय, जगत् का बीज, समस्त लोकों के पितामह हैं, और जिनकी देवताओं, लोकपालों तथा दिशाओं के स्वामियों द्वारा उपासना की जा रही थी,

श्लोक 98 (skanda.2.165.98)

इतिहासपुराणाद्यैर्देवैर्विग्रहसंस्थितैः । मूर्तिमद्भिः समुद्रैश्च नदीभिश्च सरोवरैः

itihāsapurāṇādyairdevairvigrahasaṁsthitaiḥ mūrtimadbhiḥ samudraiśca nadībhiśca sarovaraiḥ

इतिहास-पुराण आदि के अधिष्ठाता देवताओं द्वारा, शरीरधारी समुद्रों, नदियों और सरोवरों द्वारा,

श्लोक 99 (skanda.2.165.99)

देहवद्भिस्तथा वृक्षैरश्वत्थाद्यैरशेषितैः । वापीकूपतडागैश्च मूर्तिमद्भिश्च पर्वतैः

dehavadbhistathā vṛkṣairaśvatthādyairaśeṣitaiḥ vāpīkūpataḍāgaiśca mūrtimadbhiśca parvataiḥ

देह धारण करने वाले अश्वत्थ आदि समस्त वृक्षों द्वारा, तथा शरीरधारी बावड़ियों, कुओं, तालाबों और पर्वतों द्वारा,

श्लोक 100 (skanda.2.165.100)

अहोरात्रैस्तथा पक्षैर्मासैः संवत्सरैस्तथा । कलाकाष्ठा निमेषैश्च ऋतुभिश्चाऽयनैर्युगैः

ahorātraistathā pakṣairmāsaiḥ saṁvatsaraistathā kalākāṣṭhā nimeṣaiśca ṛtubhiścā'yanairyugaiḥ

दिन-रात, पक्ष, मास और संवत्सरों द्वारा, कला-काष्ठा-निमेष द्वारा, ऋतुओं, अयनों और युगों द्वारा,

श्लोक 101 (skanda.2.165.101)

संकल्पैश्च विकल्पैश्च निमिषोन्मेषणैस्तथा । ऋक्षैर्योगैश्च करणैः पूर्णिमाभिः सुसंक्षयैः

saṁkalpaiśca vikalpaiśca nimiṣonmeṣaṇaistathā ṛkṣairyogaiśca karaṇaiḥ pūrṇimābhiḥ susaṁkṣayaiḥ

संकल्पों और विकल्पों द्वारा, पलक झपकने और खुलने द्वारा, नक्षत्रों, योगों, करणों, पूर्णिमाओं और अमावस्याओं द्वारा,

श्लोक 102 (skanda.2.165.102)

सुखैर्दुःखैर्भयैश्चैव लाभाऽलाभैर्जयाजयैः। सत्त्वेन रजसा चैव तमसा च समन्वितम्

sukhairduḥkhairbhayaiścaiva lābhā'lābhairjayājayaiḥ sattvena rajasā caiva tamasā ca samanvitam

सुख, दुःख, भय, लाभ-हानि, जय-पराजय द्वारा — और सत्त्व, रज और तम गुणों से युक्त,

श्लोक 103 (skanda.2.165.103)

शांतमूढाऽतिप्रौढैश्च विकारैः प्राकृतैरपि । वायुना देवदेवेन श्लेष्मपित्तादिभिर्वृतम्

śāṁtamūḍhā'tiprauḍhaiśca vikāraiḥ prākṛtairapi vāyunā devadevena śleṣmapittādibhirvṛtam

शांत, मूढ़ और उग्र प्राकृतिक विकारों द्वारा, देवरूप वायु द्वारा, तथा कफ-पित्त आदि द्वारा घिरे हुए ब्रह्मा को —

श्लोक 104 (skanda.2.165.104)

तेषां मध्येऽविशत्सौरिः सव्रीडा च वधूर्यथा । विलोकयन्धरापृष्ठं म्लानवक्त्रं व्यदर्शयत्

teṣāṁ madhye'viśatsauriḥ savrīḍā ca vadhūryathā vilokayandharāpṛṣṭhaṁ mlānavaktraṁ vyadarśayat

उन सबके बीच सूर्यपुत्र यम, लज्जित नववधू के समान, प्रविष्ट हुए; भूमि की ओर देखते हुए उन्होंने अपना म्लान मुख प्रकट किया।

श्लोक 105 (skanda.2.165.105)

संप्रविष्टं यमं दृष्ट्वा सकाशस्थं सहानुगम् । विस्मितास्ते मिथः प्रोचुः किमर्थं भास्करिस्त्विह

saṁpraviṣṭaṁ yamaṁ dṛṣṭvā sakāśasthaṁ sahānugam vismitāste mithaḥ procuḥ kimarthaṁ bhāskaristviha

इस प्रकार प्रविष्ट होकर, अपने अनुचरों सहित समीप खड़े यम को देखकर, वे सब विस्मित होकर आपस में कहने लगे — 'सूर्यपुत्र यहाँ किसलिए आए हैं?

श्लोक 106 (skanda.2.165.106)

संप्राप्तो लोककर्तारं द्रष्टुं देवं पितामहम् । निर्व्यापारः क्षणमपि योऽयं नास्ति रवेः सुतः

saṁprāpto lokakartāraṁ draṣṭuṁ devaṁ pitāmaham nirvyāpāraḥ kṣaṇamapi yo'yaṁ nāsti raveḥ sutaḥ

क्या वे लोक-कर्ता, पितामह देव के दर्शन के लिए आए हैं? यह सूर्य-पुत्र तो एक क्षण भी बिना कार्य के नहीं रहता,

श्लोक 107 (skanda.2.165.107)

सोऽयमभ्यागतः कस्मात्कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम् । आश्चर्याऽतिशयोऽयं च संमार्जितपटस्त्वयम्

so'yamabhyāgataḥ kasmātkaccitkṣemaṁ divaukasām āścaryā'tiśayo'yaṁ ca saṁmārjitapaṭastvayam

फिर वह क्यों आया है? क्या देवताओं का कुशल तो है? और यह भी अत्यंत आश्चर्य की बात है कि इसकी लेखन-पट्टिका पूर्णतः साफ है,

श्लोक 108 (skanda.2.165.108)

लेखकस्तमनुप्राप्तो दैन्येन महताऽन्वितः । न कदाचित्पटो ह्यस्य मार्जितो धर्मभीरुणा

lekhakastamanuprāpto dainyena mahatā'nvitaḥ na kadācitpaṭo hyasya mārjito dharmabhīruṇā

और उसका लेखक भी अत्यंत दीनता से युक्त होकर उसके पीछे-पीछे आया है। धर्म-भीरु उसकी यह पट्टिका पहले कभी साफ नहीं हुई थी।

श्लोक 109 (skanda.2.165.109)

यन्न दृष्टं श्रुतं वाऽपि तदिहाऽद्य प्रपद्यते । एवमुच्चरतां तेषां भूतानां भूतशासनः । निष्पपाताऽग्रतो भूमौ ब्रह्मणो रविनंदनः

yanna dṛṣṭaṁ śrutaṁ vā'pi tadihā'dya prapadyate evamuccaratāṁ teṣāṁ bhūtānāṁ bhūtaśāsanaḥ niṣpapātā'grato bhūmau brahmaṇo ravinaṁdanaḥ

जो न कभी देखा गया, न सुना गया, वह आज यहाँ घटित हो रहा है।' इस प्रकार उन समस्त प्राणियों के इस तरह बोलते रहने पर, सूर्यपुत्र यम, ब्रह्मा के सामने भूमि पर गिर पड़े।

श्लोक 110 (skanda.2.165.110)

कृत्तमूलो यथा शाखी त्राहित्राहीति वै रुदन्। परिभूतोऽस्मि देवेश संमार्जितपटःकृतः

kṛttamūlo yathā śākhī trāhitrāhīti vai rudan paribhūto'smi deveśa saṁmārjitapaṭaḥkṛtaḥ

जैसे जड़ से कटा हुआ वृक्ष गिर पड़े, वैसे ही वे 'रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए रोने लगे — 'हे देवेश! मैं अपमानित हुआ हूँ, मेरी पट्टिका पूर्णतः मिटा दी गई है,

श्लोक 111 (skanda.2.165.111)

त्वयि नाथे न विफलं पश्यामि कमलासन

tvayi nāthe na viphalaṁ paśyāmi kamalāsana

फिर भी, हे कमलासन! आप मेरे स्वामी होते हुए, मुझे कुछ भी विफल होता नहीं दिखता।

श्लोक 112 (skanda.2.165.112)

एवमुक्त्वा हि निश्चेष्टो बभूव नृपसत्तम । ततः कोलाहलः शब्दः सभायां समजायत

evamuktvā hi niśceṣṭo babhūva nṛpasattama tataḥ kolāhalaḥ śabdaḥ sabhāyāṁ samajāyata

इस प्रकार कहकर, हे नृपसत्तम, वे निश्चेष्ट हो गए। तत्पश्चात् उस सभा में एक कोलाहल उत्पन्न हो गया,

श्लोक 113 (skanda.2.165.113)

यो हि खेदयते मर्त्यान्सर्वान्स्थावरजंगमान् । स वै रुदति दुःखार्तः कस्माद्वैवस्वतो यमः

yo hi khedayate martyānsarvānsthāvarajaṁgamān sa vai rudati duḥkhārtaḥ kasmādvaivasvato yamaḥ

क्योंकि जो सभी मनुष्यों तथा स्थावर-जंगम प्राणियों को दुःख देते हैं, वे वैवस्वत यम स्वयं ही दुःख से पीड़ित होकर क्यों रो रहे हैं?

श्लोक 114 (skanda.2.165.114)

जनसंतापकर्त्ता यः सोचिराद्यात्यशोभनम् । नहि दुष्कृतकर्त्ता हि नरः प्राप्नोति शोभनम्

janasaṁtāpakarttā yaḥ socirādyātyaśobhanam nahi duṣkṛtakarttā hi naraḥ prāpnoti śobhanam

जो लोगों को संताप देता है, उसे शीघ्र ही अशुभ प्राप्त होता है — दुष्कर्म करने वाला मनुष्य कभी शुभ को प्राप्त नहीं करता।

श्लोक 115 (skanda.2.165.115)

ततो निवारयामास वायुस्तेषां वचस्तदा । लोकानां समवेतानां मतं ज्ञात्वा स वेधसः

tato nivārayāmāsa vāyusteṣāṁ vacastadā lokānāṁ samavetānāṁ mataṁ jñātvā sa vedhasaḥ

तब वायु ने उनके इन वचनों को रोका, और उन एकत्रित लोगों का यह मत जानकर, विधाता (ब्रह्मा) के,

श्लोक 116 (skanda.2.165.116)

निवार्य लोकान्मार्तंडि शनैरुत्थापयन्मरुत् । भुजाभ्यां शालपीनाभ्यां लोकसूत्र उदारधीः

nivārya lokānmārtaṁḍi śanairutthāpayanmarut bhujābhyāṁ śālapīnābhyāṁ lokasūtra udāradhīḥ

लोगों को शांत करके, वायु ने सूर्यपुत्र यम को धीरे-धीरे उठाना शुरू किया — लोकसूत्र के समान उदार-बुद्धि वायु ने अपनी शाल-वृक्ष जैसी सुदृढ़ भुजाओं से,

श्लोक 117 (skanda.2.165.117)

विह्वलं तं परायत्तमासने संन्यवेशयत् । आसनस्थमुवाचेदं व्योमसूनू रवेः सुतम्

vihvalaṁ taṁ parāyattamāsane saṁnyaveśayat āsanasthamuvācedaṁ vyomasūnū raveḥ sutam

उस विह्वल, दूसरे के अधीन हुए यम को एक आसन पर बिठा दिया, और आकाश-पुत्र वायु ने आसन पर बैठे उस सूर्य-पुत्र से यह कहा।

श्लोक 118 (skanda.2.165.118)

केन त्वमभिभूतोऽसि केन स्थानान्निवारितः । केनाऽयं मार्जितो देव पटो लेखपटस्तव

kena tvamabhibhūto'si kena sthānānnivāritaḥ kenā'yaṁ mārjito deva paṭo lekhapaṭastava

'तुम किसके द्वारा पराजित हुए हो? किसने तुम्हें तुम्हारे स्थान से हटा दिया है? हे देव! किसने तुम्हारी इस लेख-पट्टिका को मिटा दिया है?

श्लोक 119 (skanda.2.165.119)

ब्रूहि सर्वमशेषेण कुतो हैतोस्त्वमागतः । यः प्रभुस्तात सर्वेषां स ते कर्ता ममाऽपि च । अपि कस्माच्च मार्तंडे दुःखं हृदयसंस्थितम्

brūhi sarvamaśeṣeṇa kuto haitostvamāgataḥ yaḥ prabhustāta sarveṣāṁ sa te kartā mamā'pi ca api kasmācca mārtaṁḍe duḥkhaṁ hṛdayasaṁsthitam

यह सब पूरी तरह बताओ, तुम यहाँ किस कारण से आए हो। हे तात! जो सबका स्वामी है, वही तुम्हारा भी और मेरा भी कर्ता है — और हे मार्तण्ड-पुत्र! तुम्हारे हृदय में यह दुःख किस कारण से स्थित है?

श्लोक 120 (skanda.2.165.120)

स एवमुक्तः श्वसनेन सत्यमादित्यसूनुर्वचनं बभाषे । विलोक्य वक्त्रं कुशकेतुसूनोः सगद्गदं चेदमहोऽतिदीनम्

sa evamuktaḥ śvasanena satyamādityasūnurvacanaṁ babhāṣe vilokya vaktraṁ kuśaketusūnoḥ sagadgadaṁ cedamaho'tidīnam

वायु द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर सूर्य-पुत्र यम ने सच्चा वृत्तांत कहना आरंभ किया, और कुशकेतु-पुत्र का मुख स्मरण करते हुए, गद्गद स्वर में, अत्यंत दीनतापूर्वक, यह वचन कहा। (मूल श्लोक में यहाँ 'कुशकेतुसूनोः' नाम आया है, जो संभवतः पूर्व अध्याय की कथा से आया एक पाठभेद/पुनरावृत्ति है, क्योंकि इस अध्याय का राजा नृगपुत्र कीर्तिमान है, कुशकेतु-पुत्र हेमकांत नहीं।)

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