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वैष्णव खण्ड · अध्याय 166

यमदुःखनिरूपण-वर्णन

अध्याय 165अध्याय-सूचीअध्याय 167

श्लोक 1 (skanda.2.166.1)

यम उवाच । शृणु मे वचनं नाथ लोपितोऽहं पितामह । मरणादधिकं मन्ये मत्पदस्य च खण्डनम्

yama uvāca śṛṇu me vacanaṁ nātha lopito'haṁ pitāmaha maraṇādadhikaṁ manye matpadasya ca khaṇḍanam

यम ने कहा — हे नाथ! मेरा वचन सुनिए, हे पितामह! मैं लुप्त कर दिया गया हूँ; मेरे पद के इस खंडन को मैं मृत्यु से भी बढ़कर मानता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.2.166.2)

नियोगी न नियोगं हि करोति कमलासन । प्रभोर्वित्तं समश्नाति स भवेत्काष्ठकीटकः

niyogī na niyogaṁ hi karoti kamalāsana prabhorvittaṁ samaśnāti sa bhavetkāṣṭhakīṭakaḥ

हे कमलासन! जो नियुक्त सेवक अपने नियोग (कार्य) को नहीं करता, फिर भी अपने स्वामी का वेतन भोगता है, वह काठ में रहने वाला कीड़ा बनता है।

श्लोक 3 (skanda.2.166.3)

योऽश्नाति लोभाद्वित्तानि प्रज्ञावांश्च महीपते । स तिर्यग्योनि नरके याति कल्पशतत्रयम्

yo'śnāti lobhādvittāni prajñāvāṁśca mahīpate sa tiryagyoni narake yāti kalpaśatatrayam

हे महीपते! जो बुद्धिमान् होकर भी लोभवश धन का भक्षण करता है, वह तिर्यक्-योनि में और नरक में तीन सौ कल्पों तक जाता है।

श्लोक 4 (skanda.2.166.4)

निःस्पृहो नाऽऽचरेद्यस्तु नियोगं पद्मसंभव । भुक्त्वा तु नरकान्घोरान्स पुमान्वायसो भवेत्

niḥspṛho nā''caredyastu niyogaṁ padmasaṁbhava bhuktvā tu narakānghorānsa pumānvāyaso bhavet

हे पद्मसंभव! जो अनिच्छापूर्वक भी अपने नियोग का पालन नहीं करता, वह मनुष्य घोर नरकों को भोगकर कौआ बनता है।

श्लोक 5 (skanda.2.166.5)

आत्मकार्यपरो यस्तु स्वामिकार्यं विलुंपति । भवेद्वेश्मनि पापात्मा आखुः कल्पशतत्रयम्

ātmakāryaparo yastu svāmikāryaṁ viluṁpati bhavedveśmani pāpātmā ākhuḥ kalpaśatatrayam

जो अपने ही कार्य में लगा रहकर स्वामी के कार्य की उपेक्षा करता है, वह पापात्मा तीन सौ कल्पों तक घर में चूहा बनकर रहता है।

श्लोक 6 (skanda.2.166.6)

नियोगी यश्च भूत्वा वै तिष्ठन्नित्यं स्ववेश्मनि । शक्तस्तु कार्यकरणे मार्जारो जायते नरः

niyogī yaśca bhūtvā vai tiṣṭhannityaṁ svaveśmani śaktastu kāryakaraṇe mārjāro jāyate naraḥ

जो नियुक्त सेवक होकर भी नित्य अपने ही घर में रहता है, कार्य करने में समर्थ होते हुए भी, वह मनुष्य बिल्ली बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 7 (skanda.2.166.7)

सोऽहं देव तवादेशात्प्रजा धर्मेण साधये । पुण्येन पुण्यकर्तारं पापं पापेन कर्मणा

so'haṁ deva tavādeśātprajā dharmeṇa sādhaye puṇyena puṇyakartāraṁ pāpaṁ pāpena karmaṇā

हे देव! आपकी आज्ञा से मैं ही धर्मपूर्वक प्रजा का न्याय करता हूँ — पुण्यकर्ता को पुण्य से, और पापी को पाप-कर्म से (उसका फल देते हुए)।

श्लोक 8 (skanda.2.166.8)

सम्यग्विचार्य मुनिभिर्धर्मशास्त्रान्वितैः प्रभो । कल्पादौ वर्तमानस्य यातना दापयन्मम

samyagvicārya munibhirdharmaśāstrānvitaiḥ prabho kalpādau vartamānasya yātanā dāpayanmama

हे प्रभो! धर्मशास्त्र में पारंगत मुनियों द्वारा भलीभाँति विचार करके, इस कल्प के आरंभ से जो मेरी नियुक्ति हुई, वह यातना देने के लिए ही थी।

श्लोक 9 (skanda.2.166.9)

कर्तुं नियोगमेवं हि त्वदीयो नैव शक्नुयाम् । राज्ञा कीर्तिमता भग्नो नियोगस्तव च क्षितौ

kartuṁ niyogamevaṁ hi tvadīyo naiva śaknuyām rājñā kīrtimatā bhagno niyogastava ca kṣitau

किंतु अब मैं, आपका ही सेवक होते हुए भी, इस नियोग को पूरा करने में समर्थ नहीं हूँ; राजा कीर्तिमान् द्वारा पृथ्वी पर आपका ही यह नियोग तोड़ दिया गया है।

श्लोक 10 (skanda.2.166.10)

भयादस्य जगन्नाथ पृथिवीं सागराम्बराम् । वैशाखधर्मसहितां पालयन्वर्तते क्वचित्

bhayādasya jagannātha pṛthivīṁ sāgarāmbarām vaiśākhadharmasahitāṁ pālayanvartate kvacit

हे जगन्नाथ! उसके भय से समुद्र-वस्त्रा इस पृथ्वी को वैशाख-धर्म सहित पालन करते हुए, वह कहीं भी (नियमों का उल्लंघन होने) स्थान नहीं रहने देता।

श्लोक 11 (skanda.2.166.11)

विहाय सर्वधर्मांश्च विहाय पितृपूजनम् । विहायाऽग्निसपर्यां तु तीर्थ यात्रादिसत्क्रियाः

vihāya sarvadharmāṁśca vihāya pitṛpūjanam vihāyā'gnisaparyāṁ tu tīrtha yātrādisatkriyāḥ

समस्त अन्य धर्मों को छोड़कर, पितृ-पूजन को छोड़कर, अग्नि-सेवा को छोड़कर, तीर्थयात्रा आदि सत्क्रियाओं को छोड़कर,

श्लोक 12 (skanda.2.166.12)

योगसांख्यावुभौ त्यक्त्वा त्यक्त्वा प्राणनिरोधनम् । त्यक्त्वा होमं च स्वाध्यायं कृत्वा पापानि भूरिशः

yogasāṁkhyāvubhau tyaktvā tyaktvā prāṇanirodhanam tyaktvā homaṁ ca svādhyāyaṁ kṛtvā pāpāni bhūriśaḥ

योग और सांख्य दोनों को छोड़कर, प्राणायाम को छोड़कर, हवन और स्वाध्याय को भी छोड़कर — यहाँ तक कि बहुत से पाप करने के बाद भी,

श्लोक 13 (skanda.2.166.13)

प्रयान्ति वैष्णवं लोकं कृत्वा वैशाखसत्क्रियाः । मनुजाः पितृभिः सार्द्धं तथैव च पितामहैः

prayānti vaiṣṇavaṁ lokaṁ kṛtvā vaiśākhasatkriyāḥ manujāḥ pitṛbhiḥ sārddhaṁ tathaiva ca pitāmahaiḥ

मनुष्य केवल वैशाख की सत्क्रियाएँ करके अपने पितरों और पितामहों सहित वैष्णव लोक को चले जाते हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.166.14)

तेषामतीतपितरः पितॄणां पितरस्तथा । तथा मातामहा यांति तेषां वै जनकादयः

teṣāmatītapitaraḥ pitṝṇāṁ pitarastathā tathā mātāmahā yāṁti teṣāṁ vai janakādayaḥ

उनके पहले के पितर, पितरों के भी पितर, तथा नाना और उनके भी जनक आदि पूर्वज सभी वहाँ चले जाते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.166.15)

तेषामपि च नेतारो जनित्रीणां च पूर्वजाः । एतद्दुःखं पुनर्देव मम मस्तकभेदनम्

teṣāmapi ca netāro janitrīṇāṁ ca pūrvajāḥ etadduḥkhaṁ punardeva mama mastakabhedanam

उनके भी आगे के पूर्वज तथा माताओं के पूर्वज भी — यह मेरे लिए बार-बार सिर फटने जैसा दुःख है, हे देव!

श्लोक 16 (skanda.2.166.16)

प्रियायाः पितरो यान्ति मार्जयित्वा लिपिं मम । पितॄणां बीजजो यस्तु धात्र्या कुक्षौ धृतो विभो

priyāyāḥ pitaro yānti mārjayitvā lipiṁ mama pitṝṇāṁ bījajo yastu dhātryā kukṣau dhṛto vibho

पत्नी के पितर भी मेरी लेख-पट्टिका मिटाकर वहाँ चले जाते हैं। हे विभो! जो पितरों के बीज से उत्पन्न होकर माता के गर्भ में धारण किया जाता है,

श्लोक 17 (skanda.2.166.17)

यदंकेन कृतं कर्म तदेकेनैव भुज्यते । तन्निरस्य कृतं सर्वं जानंस्त्वेकः कुले तु यः

yadaṁkena kṛtaṁ karma tadekenaiva bhujyate tannirasya kṛtaṁ sarvaṁ jānaṁstvekaḥ kule tu yaḥ

जो कर्म प्रत्येक अंग (व्यक्ति) द्वारा किया जाता है, उसे वह अकेला ही भोगता है; परंतु इस नियम को हटाकर, कुल में जो एक ही व्यक्ति यह सब जानते हुए,

श्लोक 18 (skanda.2.166.18)

तारयेत्तावुभौ पक्षौ षड्विंशोपर्यलं विभो । प्रियायाश्चाऽपि वै तात सर्वे वै कुक्षिसंभवाः

tārayettāvubhau pakṣau ṣaḍviṁśoparyalaṁ vibho priyāyāścā'pi vai tāta sarve vai kukṣisaṁbhavāḥ

वैशाख का पालन करता है, तो हे विभो! वह दोनों पक्षों की छब्बीस पीढ़ियों से भी अधिक को तार देता है; हे तात! पत्नी के गर्भ से उत्पन्न सभी संबंधी भी,

श्लोक 19 (skanda.2.166.19)

तेऽपि सर्वे जगन्नाथ यान्ति विष्णोः परं पदम् । न मे प्रयोजनं देव नियोगेनेदृशेन वै

te'pi sarve jagannātha yānti viṣṇoḥ paraṁ padam na me prayojanaṁ deva niyogenedṛśena vai

हे जगन्नाथ! वे सब भी विष्णु के परम पद को चले जाते हैं। हे देव! ऐसे नियोग से मुझे भला क्या प्रयोजन है?

श्लोक 20 (skanda.2.166.20)

वैशाखधर्मनिरतः स मां त्यक्त्वा व्रजेद्धरिम् । त्रिःसप्तकुलमुद्धत्य त्यक्तपापोऽतिशोभनः

vaiśākhadharmanirataḥ sa māṁ tyaktvā vrajeddharim triḥsaptakulamuddhatya tyaktapāpo'tiśobhanaḥ

वैशाख-धर्म में तत्पर वह व्यक्ति मुझे छोड़कर हरि के पास चला जाता है; इक्कीस पीढ़ियों के कुल का उद्धार करके, पापों से मुक्त, अत्यंत शोभायमान होकर,

श्लोक 21 (skanda.2.166.21)

स त्यक्त्वा मम मार्गं हि प्रयाति हरिमंदिरम् । न यज्ञैस्तादृशैर्देव गतिं प्राप्नोति मानवः

sa tyaktvā mama mārgaṁ hi prayāti harimaṁdiram na yajñaistādṛśairdeva gatiṁ prāpnoti mānavaḥ

वह मेरा मार्ग छोड़कर हरि-धाम को चला जाता है। हे देव! मनुष्य वैसे यज्ञों से भी वह गति नहीं पाता,

श्लोक 22 (skanda.2.166.22)

सर्वतीर्थैर्न दानाद्यैर्न तपोभिश्च न व्रतैः । अपि वा सकलैर्धर्मैर्युक्तो नाऽप्नोति तां गतिम्

sarvatīrthairna dānādyairna tapobhiśca na vrataiḥ api vā sakalairdharmairyukto nā'pnoti tāṁ gatim

न सभी तीर्थों से, न दान आदि से, न तपों से, न व्रतों से — अपितु समस्त धर्मों से युक्त होकर भी वह गति प्राप्त नहीं होती,

श्लोक 23 (skanda.2.166.23)

प्रयागपाताद्रणमध्यपाताद्भृगोश्च पातान्मरणाच्च काश्याम् । न तां गतिं यांति जनाश्च सर्वे वैशाखनिष्ठेन च या प्रपद्यते

prayāgapātādraṇamadhyapātādbhṛgośca pātānmaraṇācca kāśyām na tāṁ gatiṁ yāṁti janāśca sarve vaiśākhaniṣṭhena ca yā prapadyate

न प्रयाग में देहत्याग से, न युद्ध के मध्य गिरने से, न भृगु-पतन (गिरि से गिरकर मरने) से, न काशी में मरने से — सभी लोग उस गति को नहीं पाते, जो वैशाख-निष्ठा से प्राप्त होती है।

श्लोक 24 (skanda.2.166.24)

प्रातः स्नात्वा देवपूजां च कृत्वा श्रुत्वा कथां मासमाहात्म्यसंज्ञाम् । धर्मान्कृत्वा चोचितान्वैष्णवांश्च स वै भवेद्विष्णुलोकैकनाथः

prātaḥ snātvā devapūjāṁ ca kṛtvā śrutvā kathāṁ māsamāhātmyasaṁjñām dharmānkṛtvā cocitānvaiṣṇavāṁśca sa vai bhavedviṣṇulokaikanāthaḥ

प्रातःकाल स्नान करके, देव-पूजन करके, मास-माहात्म्य नामक कथा सुनकर, तथा उचित वैष्णव धर्मों का पालन करके, वह मनुष्य निश्चय ही विष्णु-लोक का एकमात्र स्वामी बन जाता है।

श्लोक 25 (skanda.2.166.25)

अप्रमाणमहं मन्ये लोकं विष्णोर्जगत्पतेः । यो न पूर्येत कोट्योघैः सर्वतः कमलासन

apramāṇamahaṁ manye lokaṁ viṣṇorjagatpateḥ yo na pūryeta koṭyoghaiḥ sarvataḥ kamalāsana

हे कमलासन! मैं जगत्पति विष्णु के उस लोक को अप्रमेय (असीम) मानता हूँ, जो करोड़ों-करोड़ों प्राणियों से भी सब ओर से भर नहीं पाता,

श्लोक 26 (skanda.2.166.26)

माधवावसथेनेह समस्तेन पितामहम् । विकर्मस्थाऽविकर्मस्थाः शुचयोऽशुचयस्तथा

mādhavāvasatheneha samastena pitāmaham vikarmasthā'vikarmasthāḥ śucayo'śucayastathā

हे पितामह! यहाँ माधव (वैशाख) के व्रत के पालन से, चाहे विकर्म में स्थित हों या अविकर्म में, शुद्ध हों या अशुद्ध,

श्लोक 27 (skanda.2.166.27)

कृत्वा वैशाखकृत्यानि लोका यान्ति नृपाऽऽज्ञया । योऽस्माकं हि महच्छत्रुर्भवतां च विशेषतः

kṛtvā vaiśākhakṛtyāni lokā yānti nṛpā''jñayā yo'smākaṁ hi mahacchatrurbhavatāṁ ca viśeṣataḥ

वैशाख के कृत्यों को करके, राजा की आज्ञा से, लोग वहाँ चले जाते हैं। जो हमारा और विशेष रूप से आप सबका भी महान् शत्रु है,

श्लोक 28 (skanda.2.166.28)

निग्राह्यो जगतां नाथ भवताऽसौ महीपतिः । हित्वा हि सकलान्धर्मान्सकृद्वैशाखस्नानतः

nigrāhyo jagatāṁ nātha bhavatā'sau mahīpatiḥ hitvā hi sakalāndharmānsakṛdvaiśākhasnānataḥ

हे जगन्नाथ! उस भूपति को आपके द्वारा दंडित किया जाना चाहिए। समस्त अन्य धर्मों को छोड़कर, केवल एक बार वैशाख-स्नान करने से,

श्लोक 29 (skanda.2.166.29)

असंस्कृतजना यांति वैकुण्ठं हरिमंदिरम् । अस्माभिस्तु कृतोपेक्षो लिणुपादैकसंश्रयः

asaṁskṛtajanā yāṁti vaikuṇṭhaṁ harimaṁdiram asmābhistu kṛtopekṣo liṇupādaikasaṁśrayaḥ

यहाँ तक कि बिना संस्कार वाले लोग भी वैकुण्ठ, हरि-मंदिर को चले जाते हैं। हमारे द्वारा उपेक्षित होकर भी, विष्णु के चरणों का ही एकमात्र आश्रय लेकर,

श्लोक 30 (skanda.2.166.30)

समस्तं नेष्यते लोकं पार्थिवो नात्र संशयः । एष दण्डपटो ह्यद्य तव पद्भ्यां निवेदितः

samastaṁ neṣyate lokaṁ pārthivo nātra saṁśayaḥ eṣa daṇḍapaṭo hyadya tava padbhyāṁ niveditaḥ

वह राजा समस्त प्रजा को (उस लोक में) ले जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। यह मेरा दंड-पट्ट आज आपके चरणों में समर्पित है।

श्लोक 31 (skanda.2.166.31)

लोकपालत्वमतुलमर्जितं तेन भूभुजा। किमपत्येन जातेन मातुः क्लेशंकरेण वै

lokapālatvamatulamarjitaṁ tena bhūbhujā kimapatyena jātena mātuḥ kleśaṁkareṇa vai

उस भूपति ने अतुलनीय लोकपालत्व अर्जित कर लिया है। ऐसे पुत्र के जन्म से क्या लाभ, जो केवल माता को कष्ट देने वाला हो,

श्लोक 32 (skanda.2.166.32)

यो न पातयते शत्रुं ज्येष्ठमासीव भास्करः । वृथासुता हि युवतिर्जाता चेद्धि कुपुत्रिणी

yo na pātayate śatruṁ jyeṣṭhamāsīva bhāskaraḥ vṛthāsutā hi yuvatirjātā ceddhi kuputriṇī

और अपने शत्रु को, ज्येष्ठ मास के सूर्य के समान, धराशायी नहीं करता? यदि युवती के कुपुत्र ही उत्पन्न होता है, तो उसका पुत्रवती होना व्यर्थ ही है।

श्लोक 33 (skanda.2.166.33)

न तस्याः स्फुरते कीर्तिर्घनस्येव शतह्रदा । यत्पितुर्नोद्धरेत्पापाद्विद्यया वा बलेन वा

na tasyāḥ sphurate kīrtirghanasyeva śatahradā yatpiturnoddharetpāpādvidyayā vā balena vā

उसकी कीर्ति बादल की बिजली के समान भी नहीं चमकती, यदि वह विद्या या बल से अपने पिता का पाप से उद्धार नहीं करता,

श्लोक 34 (skanda.2.166.34)

मातुर्जठरजो रोगः स प्रसूतो धरातले । धर्मे चाऽर्थे च कामे च यत्प्रतीपो भवेत्सुतः

māturjaṭharajo rogaḥ sa prasūto dharātale dharme cā'rthe ca kāme ca yatpratīpo bhavetsutaḥ

वह पुत्र माता के गर्भ से उत्पन्न होने वाला रोग-मात्र है, इस पृथ्वी पर जन्म लेकर भी। जो पुत्र धर्म, अर्थ और काम — तीनों में ही विपरीत हो,

श्लोक 35 (skanda.2.166.35)

मातृहा ह्युच्यते सद्भिः स पुत्रः पुरुषाधमः । तन्माता नृपपत्नी च लोकविख्यातसत्क्रिया

mātṛhā hyucyate sadbhiḥ sa putraḥ puruṣādhamaḥ tanmātā nṛpapatnī ca lokavikhyātasatkriyā

सत्पुरुषों द्वारा वह नराधम पुत्र मातृहन्ता ही कहा जाता है। परंतु राजा की वह पत्नी, जिसकी सत्क्रियाएँ संसार में विख्यात हैं, वह माता,

श्लोक 36 (skanda.2.166.36)

एकैव वीरसूर्लोके वीरः स नात्र संशयः । यथा वै कीर्तिमाञ्जातो मल्लिपेर्मार्जनाय वै

ekaiva vīrasūrloke vīraḥ sa nātra saṁśayaḥ yathā vai kīrtimāñjāto mallipermārjanāya vai

संसार में अकेली वीर-प्रसू (वीर-जननी) है, इसमें कोई संशय नहीं — क्योंकि उसी से वह कीर्तिमान् उत्पन्न हुआ, जो मुझ (यम-)रूपी मल की सफाई करने के लिए ही जन्मा है।

श्लोक 37 (skanda.2.166.37)

नेदं व्यवसितं देव केनचित्क्षत्रियेण हि । पुराणेषु जगन्नाथ न श्रुतं पटमार्जनम्

nedaṁ vyavasitaṁ deva kenacitkṣatriyeṇa hi purāṇeṣu jagannātha na śrutaṁ paṭamārjanam

हे देव! ऐसा साहस किसी भी क्षत्रिय ने पहले नहीं किया है; हे जगन्नाथ! पुराणों में भी इस प्रकार पट्टिका को मिटा देने की बात कभी सुनी नहीं गई है।

श्लोक 38 (skanda.2.166.38)

सोऽहं न जानामि जगत्पतीश ऋते क्षितीशं हरितत्परं तम् । प्रचोदयन्तं पटहं सुघोषाद्विलोपयानं मम वेश्ममार्गम्

so'haṁ na jānāmi jagatpatīśa ṛte kṣitīśaṁ haritatparaṁ tam pracodayantaṁ paṭahaṁ sughoṣādvilopayānaṁ mama veśmamārgam

हे जगत्पते! इस हरि-परायण राजा के अतिरिक्त, जो सुघोष पटह बजाकर आदेश देता है और मेरे धाम के मार्ग को ही मिटा देता है, मैं और कुछ जानता नहीं हूँ।

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