वैष्णव खण्ड · अध्याय 167
यमदुःखसान्त्वन-वर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.167.1)
ब्रह्मोवाच । किमाश्चर्यं त्वया दृष्टं किमर्थं खिद्यते भवान् । सद्गणेषु कृतस्तापः स तापो मरणांतिकः
brahmovāca kimāścaryaṁ tvayā dṛṣṭaṁ kimarthaṁ khidyate bhavān sadgaṇeṣu kṛtastāpaḥ sa tāpo maraṇāṁtikaḥ
ब्रह्मा ने कहा — तुमने ऐसा कौन-सा आश्चर्य देख लिया है, किस कारण से तुम इतने खिन्न हो? सत्पुरुषों के प्रति किया गया संताप तो मृत्यु के समान होता है।
श्लोक 2 (skanda.2.167.2)
तस्योच्चारणमात्रेण प्राप्यते परमं पदम् । न गच्छंति हरेर्लोकं कथं भूपस्य शासनात्
tasyoccāraṇamātreṇa prāpyate paramaṁ padam na gacchaṁti harerlokaṁ kathaṁ bhūpasya śāsanāt
उस (हरि-नाम) के उच्चारण मात्र से ही परम पद प्राप्त हो जाता है। भला भूपति के शासन से लोग हरि-लोक को क्यों नहीं जाएँगे?
श्लोक 3 (skanda.2.167.3)
एकोऽपि गोविन्दकृतः प्रणामः शताश्वमेधावभृथेन तुल्यः । यज्ञस्य कर्त्ता पुनरेति जन्म हरेः प्रणामो न पुनर्भवाय
eko'pi govindakṛtaḥ praṇāmaḥ śatāśvamedhāvabhṛthena tulyaḥ yajñasya karttā punareti janma hareḥ praṇāmo na punarbhavāya
गोविन्द को किया गया एक भी प्रणाम सौ अश्वमेध यज्ञों के अवभृथ-स्नान के समान है। यज्ञ करने वाला पुनः जन्म लेता है, किंतु हरि को किया गया प्रणाम पुनर्जन्म के लिए नहीं होता।
श्लोक 4 (skanda.2.167.4)
कुरुक्षेत्रेण किं तस्य सरस्वत्या च किं तथा । जिह्वाग्रे वर्तते यस्य हरिरित्यक्षरद्वयम्
kurukṣetreṇa kiṁ tasya sarasvatyā ca kiṁ tathā jihvāgre vartate yasya harirityakṣaradvayam
जिसकी जीभ की नोक पर 'हरि' — ये दो अक्षर सदैव विद्यमान रहते हैं, उसे कुरुक्षेत्र से क्या प्रयोजन, और सरस्वती नदी से भी क्या प्रयोजन?
श्लोक 5 (skanda.2.167.5)
ब्राह्मणः श्वपचीं भुंजन्विशेषेण रजस्वलाम् । यदि विष्णुं स मरणे स्मरेन्नाप्नोति तत्पदम्
brāhmaṇaḥ śvapacīṁ bhuṁjanviśeṣeṇa rajasvalām yadi viṣṇuṁ sa maraṇe smarennāpnoti tatpadam
यदि कोई ब्राह्मण चांडाल-स्त्री का, विशेषतः रजस्वला का, अन्न भी खाता रहे, फिर भी यदि वह मृत्यु के समय विष्णु का स्मरण करे, तो क्या वह उस पद को प्राप्त नहीं करेगा?
श्लोक 6 (skanda.2.167.6)
अभक्ष्यभक्षणाज्जातं विहायाघस्य संचयम् । प्रयाति विष्णुसायुज्यं यतो विष्णुप्रिया स्मृतिः
abhakṣyabhakṣaṇājjātaṁ vihāyāghasya saṁcayam prayāti viṣṇusāyujyaṁ yato viṣṇupriyā smṛtiḥ
अभक्ष्य भोजन से उत्पन्न पापों के समूह को त्यागकर वह विष्णु के सायुज्य को प्राप्त होता है, क्योंकि विष्णु का स्मरण ही उन्हें सबसे प्रिय है।
श्लोक 7 (skanda.2.167.7)
एवं विष्णुप्रियो मासो वैशाखो नाम वै यम । यद्धर्मश्रवणादेव मुच्यते सर्वकिल्बिषैः
evaṁ viṣṇupriyo māso vaiśākho nāma vai yama yaddharmaśravaṇādeva mucyate sarvakilbiṣaiḥ
हे यम! इसी प्रकार वैशाख नाम का मास विष्णु का प्रिय है, जिसके धर्म के श्रवण मात्र से ही मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.2.167.8)
यातीति किमु वक्तव्यं तस्यानुष्ठानतत्परः । यस्मिन्संगीयते यो हि प्रीयते पुरुषोत्तमः
yātīti kimu vaktavyaṁ tasyānuṣṭhānatatparaḥ yasminsaṁgīyate yo hi prīyate puruṣottamaḥ
जो इसके अनुष्ठान में तत्पर रहता है, उसके (उस लोक में) जाने की बात तो कहनी ही क्या — जिसमें पुरुषोत्तम की महिमा गाई जाती है, वे उससे ही प्रसन्न हो जाते हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.167.9)
कथं न याति च गतिं तस्याऽनुष्ठानत त्परः । अस्माकं जगतां नाथो जनिता पुरुषोत्तमः
kathaṁ na yāti ca gatiṁ tasyā'nuṣṭhānata tparaḥ asmākaṁ jagatāṁ nātho janitā puruṣottamaḥ
फिर उसके अनुष्ठान में तत्पर व्यक्ति उस गति को क्यों न प्राप्त करे? पुरुषोत्तम ही हम सबके तथा समस्त जगत् के जनक और स्वामी हैं।
श्लोक 10 (skanda.2.167.10)
तस्येष्टान्माधवे मासि धर्मानेतान्करोत्वयम् । तस्य विष्णुः प्रसन्नात्मा सहाये सर्वदा स्थितः
tasyeṣṭānmādhave māsi dharmānetānkarotvayam tasya viṣṇuḥ prasannātmā sahāye sarvadā sthitaḥ
यह राजा माधव मास में उन्हीं को प्रिय ये धर्म कर रहा है; उसके लिए प्रसन्नचित्त विष्णु सदा ही सहायक बनकर स्थित हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.167.11)
न तस्य भूपतेः सौरे समर्थस्त्वं च शिक्षणे । न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् । जन्ममृत्युजराव्याधि भयं नैवोपजायते
na tasya bhūpateḥ saure samarthastvaṁ ca śikṣaṇe na vāsudevabhaktānāmaśubhaṁ vidyate kvacit janmamṛtyujarāvyādhi bhayaṁ naivopajāyate
हे सूर्यपुत्र! तुम उस भूपति को दंड देने में समर्थ नहीं हो। वासुदेव के भक्तों के लिए कहीं भी कोई अशुभ नहीं होता; उन्हें जन्म, मृत्यु, जरा, रोग और भय कभी उत्पन्न नहीं होते।
श्लोक 12 (skanda.2.167.12)
नियोगी स्वामिकार्येषु यावच्छक्ति समीहते । तावता स कृतार्थः स्यान्नरकान्नैव गच्छति
niyogī svāmikāryeṣu yāvacchakti samīhate tāvatā sa kṛtārthaḥ syānnarakānnaiva gacchati
नियुक्त सेवक अपने स्वामी के कार्यों में जितनी शक्ति से प्रयत्न करता है, उतने मात्र से ही वह कृतार्थ हो जाता है, और नरक को नहीं जाता।
श्लोक 13 (skanda.2.167.13)
कार्ये शक्ति विनिष्क्रान्ते स्वामिने च निवेदयेत् । अनृणस्तावता भृत्यो नियोगी सुखमश्नुते
kārye śakti viniṣkrānte svāmine ca nivedayet anṛṇastāvatā bhṛtyo niyogī sukhamaśnute
जब कार्य में उसकी शक्ति समाप्त हो जाए, तो वह अपने स्वामी को यह निवेदन कर दे; इतने मात्र से ही वह नियुक्त सेवक ऋणमुक्त होकर सुख भोगता है।
श्लोक 14 (skanda.2.167.14)
तस्मान्निवेदितार्थस्य न ऋणं न च पातकम् । यत्ने कृते स्वकर्तव्ये नापराधोस्ति देहिनः
tasmānniveditārthasya na ṛṇaṁ na ca pātakam yatne kṛte svakartavye nāparādhosti dehinaḥ
अतः जिसने अपनी बात निवेदित कर दी है, उस पर न ऋण रहता है, न पाप। अपने कर्तव्य में प्रयत्न कर लेने पर देहधारी का कोई अपराध नहीं रहता।
श्लोक 15 (skanda.2.167.15)
तस्मादशक्यकार्येऽस्मिन्न विशोचितुमर्हसि
tasmādaśakyakārye'sminna viśocitumarhasi
अतः इस असंभव कार्य के विषय में तुम्हें शोक करना उचित नहीं है।
श्लोक 16 (skanda.2.167.16)
इत्युक्तो ब्रह्मणा सौरिः पुनरत्यंतखिन्नधीः । उवाच दीनया वाचा गलद्वाष्पाऽऽकुलेक्षणः
ityukto brahmaṇā sauriḥ punaratyaṁtakhinnadhīḥ uvāca dīnayā vācā galadvāṣpā''kulekṣaṇaḥ
ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर भी अत्यंत खिन्नचित्त सूर्यपुत्र यम ने, बहते हुए अश्रुओं से व्याकुल नेत्रों के साथ, दीन वाणी में यह कहा।
श्लोक 17 (skanda.2.167.17)
प्राप्तं तात मया सर्वं त्वदंघ्रिभजनेन वै । नाऽहं यास्ये पुनः कर्तुं नियोगं पद्मसंभव
prāptaṁ tāta mayā sarvaṁ tvadaṁghribhajanena vai nā'haṁ yāsye punaḥ kartuṁ niyogaṁ padmasaṁbhava
'हे तात! आपके चरणों की भक्ति से मैंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है। हे पद्मसंभव! अब मैं पुनः नियोग करने के लिए नहीं जाऊँगा,
श्लोक 18 (skanda.2.167.18)
प्रशासति महावीर्ये भूपेऽस्मिन्भूमिमण्डले । चालयित्वा स्वधर्मांश्च तमेकं भूपतिं विभो
praśāsati mahāvīrye bhūpe'sminbhūmimaṇḍale cālayitvā svadharmāṁśca tamekaṁ bhūpatiṁ vibho
जब तक यह महावीर्यशाली भूपति भूमण्डल पर शासन करता रहेगा। हे विभो! अपने ही धर्मों को चलाकर, उस एक भूपति को —
श्लोक 19 (skanda.2.167.19)
कृतकृत्योऽस्मि तनयो गयायां पिण्डदो यथा। कृपालो तदिदं कार्यं साधयस्व ममाव्ययम्
kṛtakṛtyo'smi tanayo gayāyāṁ piṇḍado yathā kṛpālo tadidaṁ kāryaṁ sādhayasva mamāvyayam
मैं कृतकृत्य हो चुका हूँ, जैसे गया में पिण्डदान करने वाला पुत्र होता है। हे कृपालु! यह मेरा अविनाशी कार्य आप ही संपन्न कीजिए।
श्लोक 20 (skanda.2.167.20)
विज्वरस्तु ततो भूयः शासनं ते करोम्यहम् । श्रुत्वा ब्रह्मा यमेनोक्तं पुनश्चिंतापरायणः
vijvarastu tato bhūyaḥ śāsanaṁ te karomyaham śrutvā brahmā yamenoktaṁ punaściṁtāparāyaṇaḥ
तत्पश्चात्, ज्वर-रहित होकर, मैं फिर से आपके शासन का पालन करूँगा।' यम के इस वचन को सुनकर ब्रह्मा भी फिर से चिंतामग्न हो गए।
श्लोक 21 (skanda.2.167.21)
तमुवाच पुनर्ब्रह्मा सांत्वयन्बहुधाप्यमुम् । ब्रह्मोवाच । न निर्ग्राह्यस्त्वया राजा विष्णुधर्मपरायणः
tamuvāca punarbrahmā sāṁtvayanbahudhāpyamum brahmovāca na nirgrāhyastvayā rājā viṣṇudharmaparāyaṇaḥ
ब्रह्मा ने पुनः उसे अनेक प्रकार से सांत्वना देते हुए कहा — ब्रह्मा ने कहा — 'तुम्हें उस विष्णु-धर्म-परायण राजा को दंडित नहीं करना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.167.22)
यदि च्छलयसे कोपाद्गच्छामो ह्यंतिकं हरेः । निवेद्य सकलं तस्मै कर्म पश्चात्तदीरितम्
yadi cchalayase kopādgacchāmo hyaṁtikaṁ hareḥ nivedya sakalaṁ tasmai karma paścāttadīritam
यदि क्रोधवश तुम इस पर छल करोगे, तो हम हरि के पास ही जाएँगे और उन्हें यह सारा वृत्तांत निवेदन करके ही उसके बाद कोई कार्य करेंगे,
श्लोक 23 (skanda.2.167.23)
स एव कर्त्ता लोकस्य धर्मस्य परिपालकः । स च दण्डधरोऽस्माकं शास्ता कर्त्ता नियामकः
sa eva karttā lokasya dharmasya paripālakaḥ sa ca daṇḍadharo'smākaṁ śāstā karttā niyāmakaḥ
क्योंकि वे ही संसार के कर्ता हैं, धर्म के परिपालक हैं; वे ही हमारे दंडधर, शासक, कर्ता और नियामक हैं।
श्लोक 24 (skanda.2.167.24)
न तदुक्तेऽस्ति प्रत्युक्तिरस्माकं विहिता वृष । न राजोक्तेस्तु प्रत्युक्तिर्दृश्यते क्वाऽपि भूतले
na tadukte'sti pratyuktirasmākaṁ vihitā vṛṣa na rājoktestu pratyuktirdṛśyate kvā'pi bhūtale
हे वृष (हे धर्मराज)! उनके कहे हुए का हमें प्रत्युत्तर देना विहित नहीं है — जैसे इस पृथ्वी पर राजा की आज्ञा का भी कहीं प्रत्युत्तर देखा नहीं जाता।'
श्लोक 25 (skanda.2.167.25)
इत्याश्वास्य यमं तेन साकं क्षीरांबुधिं ययौ । ब्रह्मा तुष्टाव चिन्मात्रं निर्गुणं परमेश्वरम्
ityāśvāsya yamaṁ tena sākaṁ kṣīrāṁbudhiṁ yayau brahmā tuṣṭāva cinmātraṁ nirguṇaṁ parameśvaram
इस प्रकार यम को आश्वासन देकर ब्रह्मा उसके साथ ही क्षीरसागर को गए। वहाँ ब्रह्मा ने विशुद्ध चैतन्य-स्वरूप, निर्गुण परमेश्वर की स्तुति की,
श्लोक 26 (skanda.2.167.26)
सांख्ययोगैरद्वितीयमेकं तं पुरुषोत्तमम् । आविरासीत्तदा विष्णुर्ब्रह्मणा संस्तुतो हरिः
sāṁkhyayogairadvitīyamekaṁ taṁ puruṣottamam āvirāsīttadā viṣṇurbrahmaṇā saṁstuto hariḥ
जो सांख्य और योग दोनों के लिए अद्वितीय, एक पुरुषोत्तम हैं। ब्रह्मा द्वारा इस प्रकार स्तुति किए जाने पर विष्णु, हरि, प्रकट हो गए।
श्लोक 27 (skanda.2.167.27)
प्रणामं चक्रतुस्तस्मै यमो ब्रह्मा च सत्वरम् । तावुवाच महाविष्णुर्मेघगंभीरया गिरा
praṇāmaṁ cakratustasmai yamo brahmā ca satvaram tāvuvāca mahāviṣṇurmeghagaṁbhīrayā girā
यम और ब्रह्मा दोनों ने शीघ्र ही उन्हें प्रणाम किया। महाविष्णु ने मेघ के समान गंभीर वाणी में उन दोनों से कहा।
श्लोक 28 (skanda.2.167.28)
कस्माद्युवामिहाऽऽयातौ किं दुःखं दनुजैरभूत् । म्लानं यममुखं कस्मात्केन वा नतकंधरः
kasmādyuvāmihā''yātau kiṁ duḥkhaṁ danujairabhūt mlānaṁ yamamukhaṁ kasmātkena vā natakaṁdharaḥ
'तुम दोनों यहाँ किसलिए आए हो? क्या दानवों से कोई कष्ट हुआ है? यम का मुख इतना म्लान क्यों है, और इसकी गर्दन किसके कारण झुकी हुई है?
श्लोक 29 (skanda.2.167.29)
एतद्वदस्व मे ब्रह्मन्नित्युक्तश्चाह कंजजः । त्वद्दासवर्ये भूपाले भूमिं शासति वै नराः
etadvadasva me brahmannityuktaścāha kaṁjajaḥ tvaddāsavarye bhūpāle bhūmiṁ śāsati vai narāḥ
हे ब्रह्मन्! यह मुझे बताओ।' इस प्रकार पूछे जाने पर उन कमल-जन्मे (ब्रह्मा) ने कहा — 'आपके श्रेष्ठ सेवक भूपति द्वारा पृथ्वी का शासन किए जाने पर, मनुष्य
श्लोक 30 (skanda.2.167.30)
वैशाखधर्मनिरता यांति ते परमव्ययम् । ततो यमपुरी शून्या तेन चाऽतीवदुःखितः
vaiśākhadharmaniratā yāṁti te paramavyayam tato yamapurī śūnyā tena cā'tīvaduḥkhitaḥ
वैशाख-धर्म में तत्पर रहकर उस परम अविनाशी पद को जाते हैं। इससे यमपुरी शून्य हो गई है, और यह उससे अत्यंत दुःखी है।
श्लोक 31 (skanda.2.167.31)
तेन युद्धं चकाराऽसौ हंतुं दंडमथाऽददे । त्वच्चक्रेण पराभूतो ययावद्य ममान्तिकम्
tena yuddhaṁ cakārā'sau haṁtuṁ daṁḍamathā'dade tvaccakreṇa parābhūto yayāvadya mamāntikam
उसने उस राजा से युद्ध किया, उसे मारने के लिए दंड उठाया, किंतु आपके चक्र से पराजित होकर आज मेरे पास आ गया है।
श्लोक 32 (skanda.2.167.32)
न च शक्तो वयं दंडं त्वद्भक्तानां महात्मनाम् । तस्मात्त्वामेव शरणं वयं प्राप्ता महाविभो
na ca śakto vayaṁ daṁḍaṁ tvadbhaktānāṁ mahātmanām tasmāttvāmeva śaraṇaṁ vayaṁ prāptā mahāvibho
हे महाविभो! आपके भक्त उन महात्माओं को दंड देने में हम समर्थ नहीं हैं; इसलिए हम आप की ही शरण में आए हैं।
श्लोक 33 (skanda.2.167.33)
तस्माद्भूपं दंडयित्वा पालयैनं यमं स्वकम् । इत्युक्तः प्रहसन्प्राह ब्रह्माणं यममेव च
tasmādbhūpaṁ daṁḍayitvā pālayainaṁ yamaṁ svakam ityuktaḥ prahasanprāha brahmāṇaṁ yamameva ca
अतः उस राजा को दंडित करके अपने इस यम की रक्षा कीजिए।' इस प्रकार कहे जाने पर विष्णु ने हँसते हुए ब्रह्मा और यम दोनों से कहा।
श्लोक 34 (skanda.2.167.34)
लक्ष्मीं वाऽपि परित्यक्ष्ये प्राणान्देहमथाऽपि वा । श्रीवत्सं कौस्तुभं मालां वैजयंतीमथाऽपि वा
lakṣmīṁ vā'pi parityakṣye prāṇāndehamathā'pi vā śrīvatsaṁ kaustubhaṁ mālāṁ vaijayaṁtīmathā'pi vā
'मैं चाहे लक्ष्मी को त्याग दूँ, या अपने प्राणों और देह को भी त्याग दूँ, या श्रीवत्स, कौस्तुभ-मणि, माला अथवा वैजयंती-माला को भी त्याग दूँ,
श्लोक 35 (skanda.2.167.35)
श्वेतद्वीपं च वैकुंठं क्षीरसागरमेव च। शेषं च गरुडं चैव न भक्तं त्यक्तुमुत्सहे
śvetadvīpaṁ ca vaikuṁṭhaṁ kṣīrasāgarameva ca śeṣaṁ ca garuḍaṁ caiva na bhaktaṁ tyaktumutsahe
या श्वेतद्वीप, वैकुण्ठ और क्षीरसागर को भी त्याग दूँ, या शेषनाग और गरुड़ को भी — किन्तु अपने भक्त को त्यागने का साहस मुझमें नहीं है।
श्लोक 36 (skanda.2.167.36)
विस्सृज्य सकलान्भोगान्मदर्थे त्यक्तजीवितान् । मदात्मकान्महाभागान्कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे
vissṛjya sakalānbhogānmadarthe tyaktajīvitān madātmakānmahābhāgānkathaṁ tāṁstyaktumutsahe
समस्त भोगों का परित्याग करके, मेरे लिए ही अपना जीवन त्याग देने वाले, मुझमें ही तल्लीन उन महाभाग भक्तों को मैं भला कैसे त्याग सकता हूँ?
श्लोक 37 (skanda.2.167.37)
तस्मात्त्वद्दुःखशमने ह्युपायं कल्पयाम्यहम् । तस्य चायुर्मया दत्तमयुतं भूपतेर्भुवि
tasmāttvadduḥkhaśamane hyupāyaṁ kalpayāmyaham tasya cāyurmayā dattamayutaṁ bhūpaterbhuvi
अतः हे यम! तुम्हारे दुःख को शांत करने के लिए मैं एक उपाय करता हूँ। मैंने पृथ्वी पर उस भूपति को दस हजार वर्षों की आयु दी थी;
श्लोक 38 (skanda.2.167.38)
गतान्यष्टौ सहस्राणि तत्रेदानीं नरांतक । आयुःशेषे तेन नीते मत्सायुज्यं गतेऽपि च
gatānyaṣṭau sahasrāṇi tatredānīṁ narāṁtaka āyuḥśeṣe tena nīte matsāyujyaṁ gate'pi ca
हे नरांतक (यम)! उसमें से आठ हजार वर्ष बीत चुके हैं। शेष आयु के व्यतीत होने पर, और उसके मेरे सायुज्य को प्राप्त होने पर भी,
श्लोक 39 (skanda.2.167.39)
भविष्यति ततो राजा वेनो नाम दुरात्मवान्। स लुंपति महाधर्मान्सर्वानेताञ्छ्रुतीरितान्
bhaviṣyati tato rājā veno nāma durātmavān sa luṁpati mahādharmānsarvānetāñchrutīritān
तत्पश्चात् वेन नामक दुरात्मा राजा उत्पन्न होगा, जो श्रुति द्वारा कहे गए इन समस्त महान् धर्मों का लोप कर देगा।
श्लोक 40 (skanda.2.167.40)
तदा वैशाखधर्माश्च विच्छिन्ना स्युर्न संशयः । स्वकृतेनैव पापेन वेनो दग्धो भविष्यति
tadā vaiśākhadharmāśca vicchinnā syurna saṁśayaḥ svakṛtenaiva pāpena veno dagdho bhaviṣyati
उस समय वैशाख के धर्म भी निश्चय ही विच्छिन्न हो जाएँगे। किंतु वेन अपने ही किए हुए पाप से भस्म हो जाएगा,
श्लोक 41 (skanda.2.167.41)
पश्चादहं पृथुर्भूत्वा पुनर्धर्मान्प्रवर्तये । तदा जनेषु प्रख्यातान्वैशाखोक्तान्करोम्यहम्
paścādahaṁ pṛthurbhūtvā punardharmānpravartaye tadā janeṣu prakhyātānvaiśākhoktānkaromyaham
और उसके बाद मैं ही पृथु के रूप में जन्म लेकर उन धर्मों को पुनः प्रवर्तित करूँगा। तब मैं वैशाख में कहे गए इन धर्मों को लोगों में पुनः प्रसिद्ध कर दूँगा।
श्लोक 42 (skanda.2.167.42)
मद्भक्तो मद्गतप्राणो यस्तु विन्यस्तसंग्रहः । एकः सहस्रे भविता तस्य प्रख्यापयेद्धि तान्
madbhakto madgataprāṇo yastu vinyastasaṁgrahaḥ ekaḥ sahasre bhavitā tasya prakhyāpayeddhi tān
मेरा भक्त, जिसके प्राण मुझमें ही समर्पित हों और जिसने संग्रह (आसक्ति) को त्याग दिया हो, ऐसा कोई एक व्यक्ति ही हजारों में मिलेगा; उसी के द्वारा वे धर्म प्रसिद्ध किए जाएँगे।
श्लोक 43 (skanda.2.167.43)
कश्चिदेव हि जानातु धर्मानेतान्क्षितौ मम । ततस्ते भविता कार्यं मा विषीद नरांतक
kaścideva hi jānātu dharmānetānkṣitau mama tataste bhavitā kāryaṁ mā viṣīda narāṁtaka
पृथ्वी पर मेरे इन धर्मों को कोई विरला ही जानेगा। हे नरांतक! तब भी तुम्हारा कार्य पूर्ण होगा ही; तुम शोक मत करो।
श्लोक 44 (skanda.2.167.44)
दापयिष्यामि ते भागं मासेऽस्मिन्माधवेऽपि च । नरैः सर्वैश्च वैशाखधर्मनिष्ठैर्महात्मभिः
dāpayiṣyāmi te bhāgaṁ māse'sminmādhave'pi ca naraiḥ sarvaiśca vaiśākhadharmaniṣṭhairmahātmabhiḥ
इस माधव मास में भी मैं तुम्हें तुम्हारा हिस्सा दिलवाऊँगा, उन सभी महात्मा मनुष्यों से जो वैशाख-धर्म में निष्ठावान हैं,
श्लोक 45 (skanda.2.167.45)
भूपेनाऽपि च कालेन खेदं शमय तेन च । वीर्यशुल्कं तु ते भागं शत्रोर्भुंक्ते बलाधिकात्
bhūpenā'pi ca kālena khedaṁ śamaya tena ca vīryaśulkaṁ tu te bhāgaṁ śatrorbhuṁkte balādhikāt
और उस राजा से भी, समय आने पर। इस प्रकार अपना खेद शांत करो। तुम्हें अपने पराक्रम के मूल्य-स्वरूप जो भाग प्राप्त होता है, वह शत्रु से बलपूर्वक ही भोगा जाता है;
श्लोक 46 (skanda.2.167.46)
गृह्णन्गृह्णन्स्वकं भागं न भागी दुःखमर्हति । त्वामुद्दिश्य न कुर्वंति प्रत्यहं ये नरा भुवि
gṛhṇangṛhṇansvakaṁ bhāgaṁ na bhāgī duḥkhamarhati tvāmuddiśya na kurvaṁti pratyahaṁ ye narā bhuvi
अपने-अपने हिस्से को ग्रहण करते हुए वह हिस्सेदार दुःख का पात्र नहीं होता। पृथ्वी पर जो मनुष्य तुम्हारे लिए प्रतिदिन —
श्लोक 47 (skanda.2.167.47)
स्नानं चार्घ्यं सोदकुंभं दध्यन्नं चांतिमे दिने । वैशाखे सकलं कर्म तेषां च विफलं भवेत्
snānaṁ cārghyaṁ sodakuṁbhaṁ dadhyannaṁ cāṁtime dine vaiśākhe sakalaṁ karma teṣāṁ ca viphalaṁ bhavet
स्नान, अर्घ्य, जल-कुंभ का दान, तथा वैशाख के अंतिम दिन दधि-अन्न का दान नहीं करते, उनका वैशाख में किया गया समस्त कर्म ही निष्फल हो जाता है।
श्लोक 48 (skanda.2.167.48)
तस्मात्क्रोधं त्यज नृपे भागदे मत्परायणे । ये के चाऽपि च कुर्वंति लोके ते भागदा नराः
tasmātkrodhaṁ tyaja nṛpe bhāgade matparāyaṇe ye ke cā'pi ca kurvaṁti loke te bhāgadā narāḥ
अतः तुम भाग देने वाले, मेरे परायण उस राजा पर से अपना क्रोध त्याग दो। संसार में जो भी लोग तुम्हें भाग देते हैं, वे मनुष्य ही तुम्हारे भागदाता हैं;
श्लोक 49 (skanda.2.167.49)
वैशाखोक्ते महाधर्मे तेषां विघ्नं च मा कुरु । मामेव ये यजंत्यद्धा त्वां हित्वा धर्मपालकम्
vaiśākhokte mahādharme teṣāṁ vighnaṁ ca mā kuru māmeva ye yajaṁtyaddhā tvāṁ hitvā dharmapālakam
उस महाधर्म वैशाख में, जो कहा गया है, उनमें विघ्न मत डालो। हे धर्मपालक! जो लोग तुम्हें छोड़कर सीधे केवल मेरा ही यजन करते हैं,
श्लोक 50 (skanda.2.167.50)
मदाज्ञया महाभाग तदा दंडं च त्वं कुरु । नृपाद्भागं दापयितुं सुनंदं प्रेषयामि च
madājñayā mahābhāga tadā daṁḍaṁ ca tvaṁ kuru nṛpādbhāgaṁ dāpayituṁ sunaṁdaṁ preṣayāmi ca
हे महाभाग! उन्हें मेरी आज्ञा से ही तुम दंड दे सकते हो। उस राजा से तुम्हारा भाग दिलाने के लिए मैं सुनंद को भेजता हूँ,
श्लोक 51 (skanda.2.167.51)
मच्छासनात्स वै गत्वा भागं ते दापयिष्यति । तिष्ठत्येवं यमे स्वस्य सन्निधौ गरुडासनः
macchāsanātsa vai gatvā bhāgaṁ te dāpayiṣyati tiṣṭhatyevaṁ yame svasya sannidhau garuḍāsanaḥ
जो मेरे आदेश से जाकर तुम्हें तुम्हारा भाग दिलाएगा।' गरुड़ पर आरूढ़ भगवान् इस प्रकार यम को अपने पास ही ठहराए रखते हैं,
श्लोक 52 (skanda.2.167.52)
सुनन्दं प्रेषयामास नृपं बोधयितुं विभुः । सोऽपि गत्वा बोधयित्वा पार्श्वं च पुनरागमत्
sunandaṁ preṣayāmāsa nṛpaṁ bodhayituṁ vibhuḥ so'pi gatvā bodhayitvā pārśvaṁ ca punarāgamat
और प्रभु ने राजा को समझाने के लिए सुनंद को भेजा। सुनंद ने भी जाकर राजा को समझाया, और फिर विष्णु के पास लौट आया।
श्लोक 53 (skanda.2.167.53)
इत्याश्वास्य यमं विष्णुस्तत्रैवान्तरधीयत । यमं स्वयं सांत्वयित्वा समनुज्ञाप्य वेगतः
ityāśvāsya yamaṁ viṣṇustatraivāntaradhīyata yamaṁ svayaṁ sāṁtvayitvā samanujñāpya vegataḥ
इस प्रकार यम को आश्वासन देकर विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए। यम को स्वयं सांत्वना देकर, उन्हें विदा देकर, वे शीघ्रता से,
श्लोक 54 (skanda.2.167.54)
अतिविस्मयमापन्नो ययौ धाम सहानुगैः । यमोऽपि स्वपुरीं प्रायात्किंचित्संहृष्टमानसः
ativismayamāpanno yayau dhāma sahānugaiḥ yamo'pi svapurīṁ prāyātkiṁcitsaṁhṛṣṭamānasaḥ
अत्यंत विस्मित होकर अपने अनुचरों सहित अपने धाम को चले गए। यम भी कुछ प्रसन्नचित्त होकर अपनी नगरी को लौट गए।
श्लोक 55 (skanda.2.167.55)
पश्चाद्विष्णोर्निदेशेन सुनन्दपरिबोधितः । भागदाः सकला लोका ये वैशाखपरायणाः
paścādviṣṇornideśena sunandaparibodhitaḥ bhāgadāḥ sakalā lokā ye vaiśākhaparāyaṇāḥ
तत्पश्चात्, विष्णु के निर्देश से सुनंद द्वारा समझाए जाने पर, वैशाख-परायण समस्त लोग यम के लिए भाग देने वाले बन गए।
श्लोक 56 (skanda.2.167.56)
धर्मराजं पुरस्कृत्य ये न कुर्वंति मानवाः । तेषां हि स्वयमादत्ते पुण्यं वैशाखसंभवम्
dharmarājaṁ puraskṛtya ye na kurvaṁti mānavāḥ teṣāṁ hi svayamādatte puṇyaṁ vaiśākhasaṁbhavam
जो मनुष्य धर्मराज को आगे रखे बिना (वैशाख के कृत्य) नहीं करते, उनके वैशाख से उत्पन्न पुण्य को यम स्वयं ही ले लेते हैं।
श्लोक 57 (skanda.2.167.57)
कुर्याच्च प्रत्यहं स्नानं दद्यादर्घ्यं यमाय वै । वैशाखे सकलं पुण्यमन्यथा विफलं भवेत्
kuryācca pratyahaṁ snānaṁ dadyādarghyaṁ yamāya vai vaiśākhe sakalaṁ puṇyamanyathā viphalaṁ bhavet
अतः प्रतिदिन स्नान करना चाहिए और यम को अर्घ्य देना चाहिए; अन्यथा वैशाख में किया गया समस्त पुण्य निष्फल हो जाएगा।
श्लोक 58 (skanda.2.167.58)
सोदकुम्भं च दध्यन्नं पौर्णमास्यां च माधवे । धर्मराजं समुद्दिश्य दातव्यं प्रथमं जनैः
sodakumbhaṁ ca dadhyannaṁ paurṇamāsyāṁ ca mādhave dharmarājaṁ samuddiśya dātavyaṁ prathamaṁ janaiḥ
माधव मास की पूर्णिमा को जल से भरा कुंभ और दधि-अन्न, धर्मराज (यम) के उद्देश्य से लोगों को सबसे पहले दान करना चाहिए,
श्लोक 59 (skanda.2.167.59)
पश्चात्पितॄन्समुद्दिश्य गुरुमुद्दिश्य वै नरः । मधुसूदनमुद्दिश्य पश्चाद्देवं जनार्दनम्
paścātpitṝnsamuddiśya gurumuddiśya vai naraḥ madhusūdanamuddiśya paścāddevaṁ janārdanam
तत्पश्चात् पितरों के उद्देश्य से, फिर गुरु के उद्देश्य से, फिर मधुसूदन के उद्देश्य से, और अंत में जनार्दन देव के उद्देश्य से,
श्लोक 60 (skanda.2.167.60)
शीतलोदकदध्यन्नं तांबूलं च सदक्षिणम् । सफलं कांस्यपात्रस्थं ब्राह्मणाय निवेदयेत्
śītalodakadadhyannaṁ tāṁbūlaṁ ca sadakṣiṇam saphalaṁ kāṁsyapātrasthaṁ brāhmaṇāya nivedayet
शीतल जल, दधि-अन्न, ताम्बूल, दक्षिणा सहित, फल सहित, कांस्य-पात्र में रखकर, ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए।
श्लोक 61 (skanda.2.167.61)
दद्याच्च प्रतिमां दिव्यां मधुसूदनदेवताम् । मासधर्मप्रवक्त्रे च दद्याद्विप्राय सीदते
dadyācca pratimāṁ divyāṁ madhusūdanadevatām māsadharmapravaktre ca dadyādviprāya sīdate
मधुसूदन देव की एक दिव्य प्रतिमा भी दान करनी चाहिए, तथा मास-धर्म के उपदेशक, दीन ब्राह्मण को भी वह दान देना चाहिए।
श्लोक 62 (skanda.2.167.62)
तमेव धर्मवक्तारं पूजयेद्विभवैः स्वकैः । इत्यादिष्टः सुनन्देन तथा राजा चकार ह
tameva dharmavaktāraṁ pūjayedvibhavaiḥ svakaiḥ ityādiṣṭaḥ sunandena tathā rājā cakāra ha
उसी धर्मोपदेशक की अपने वैभव के अनुसार पूजा करनी चाहिए। सुनंद द्वारा इस प्रकार आदेश दिए जाने पर उस राजा ने वैसा ही किया।
श्लोक 63 (skanda.2.167.63)
स नीत्वा चायुषः शेषं भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् । पुत्रपौत्रादिभिर्युक्तो जगाम हरिमंदिरम्
sa nītvā cāyuṣaḥ śeṣaṁ bhuktvā bhogānyathepsitān putrapautrādibhiryukto jagāma harimaṁdiram
अपनी शेष आयु व्यतीत करके, अपनी इच्छानुसार समस्त भोगों को भोगकर, पुत्र-पौत्रों सहित वह राजा अंत में हरि-धाम को गया।
श्लोक 64 (skanda.2.167.64)
वैकुण्ठस्थे नृपे तस्मिन्वेनो राजाऽधमोऽभवत् । सर्वे धर्माश्च वैशाखधर्मा अपि विशेषतः
vaikuṇṭhasthe nṛpe tasminveno rājā'dhamo'bhavat sarve dharmāśca vaiśākhadharmā api viśeṣataḥ
उस राजा के वैकुण्ठ को चले जाने पर, राजा वेन उत्पन्न हुआ, जो अधम था। समस्त धर्म, और विशेष रूप से वैशाख के धर्म,
श्लोक 65 (skanda.2.167.65)
दुरात्मना च तेनैव लुप्ता एव बभूविरे । न प्रख्याताः पुनर्भूमौ भूरिशो मोक्षहेतवः
durātmanā ca tenaiva luptā eva babhūvire na prakhyātāḥ punarbhūmau bhūriśo mokṣahetavaḥ
उस दुरात्मा के द्वारा ही सर्वथा लुप्त हो गए। मोक्ष के वे अनेकानेक कारणभूत धर्म फिर से पृथ्वी पर प्रसिद्ध नहीं हुए,
श्लोक 66 (skanda.2.167.66)
यः कश्चिन्नैव जानाति वैशाखोक्तानिमाञ्च्छुभान् । बहुजन्मार्जिते पुण्यपरिपाक उपागते
yaḥ kaścinnaiva jānāti vaiśākhoktānimāñcchubhān bahujanmārjite puṇyaparipāka upāgate
जिससे कोई भी वैशाख में कहे गए इन शुभ धर्मों को नहीं जानता है — केवल तभी, जब अनेक जन्मों में अर्जित पुण्य का परिपाक निकट आ जाता है,
श्लोक 67 (skanda.2.167.67)
वैशाखोक्तेषु धर्मेषु मतिरात्यन्तिकी भवेत् । मैथिल उवाच । पूर्वमन्वंतरस्थो हि वेनो राजा दुरात्मवान्
vaiśākhokteṣu dharmeṣu matirātyantikī bhavet maithila uvāca pūrvamanvaṁtarastho hi veno rājā durātmavān
तभी उसकी बुद्धि वैशाख में कहे गए इन धर्मों की ओर अत्यंत दृढ़ता से जाती है। मैथिल ने कहा — पहले जो वेन राजा था, वह दुरात्मा तो पूर्व मन्वंतर में हुआ था,
श्लोक 68 (skanda.2.167.68)
अयं वैवस्वतस्थो हि राजा चेक्ष्वाकुनंदनः । इति श्रुतं मया पूर्वमिदानीं चोच्यते त्वया
ayaṁ vaivasvatastho hi rājā cekṣvākunaṁdanaḥ iti śrutaṁ mayā pūrvamidānīṁ cocyate tvayā
और यह राजा (कीर्तिमान्) तो इक्ष्वाकु-नंदन, वर्तमान वैवस्वत मन्वंतर में हुआ है — ऐसा मैंने पहले सुना था; परंतु अब आप जो कह रहे हैं,
श्लोक 69 (skanda.2.167.69)
अयं वैकुण्ठगः पश्चाद्वेनो राजा भविष्यति । इत्येतं संशयं छिंधि श्रुतदेव महामते
ayaṁ vaikuṇṭhagaḥ paścādveno rājā bhaviṣyati ityetaṁ saṁśayaṁ chiṁdhi śrutadeva mahāmate
यह प्रतीत होता है कि इस राजा के वैकुण्ठ चले जाने के बाद ही वेन राजा उत्पन्न होगा। हे महामते श्रुतदेव! इस संशय को दूर कीजिए।
श्लोक 70 (skanda.2.167.70)
श्रुतदेव उवाच । पुराणेषु च वैषम्यं युगकल्पव्यवस्थया । न चाप्रामाण्यशंका ते कथाया व्यत्यये क्वचित्
śrutadeva uvāca purāṇeṣu ca vaiṣamyaṁ yugakalpavyavasthayā na cāprāmāṇyaśaṁkā te kathāyā vyatyaye kvacit
श्रुतदेव ने कहा — पुराणों में युग और कल्प की व्यवस्था के कारण कहीं-कहीं भिन्नता पाई जाती है; परंतु कथा के इस अंतर से तुम्हें उसकी प्रामाणिकता पर कहीं भी संदेह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 71 (skanda.2.167.71)
गते दैनंदिने कल्पे यथैषा शाश्वती शुभा । मार्कण्डेयेन मे प्रोक्ता सा चोक्ता तव भूपते
gate dainaṁdine kalpe yathaiṣā śāśvatī śubhā mārkaṇḍeyena me proktā sā coktā tava bhūpate
एक दैनंदिन कल्प के बीत जाने पर, जैसी यह सनातन, शुभ कथा मार्कण्डेय जी ने मुझे बताई थी, वही, हे राजन्, मैंने तुम्हें कह दी है।
श्लोक 72 (skanda.2.167.72)
तस्मान्न ख्यातिमायान्ति धर्मा वैशाखसंभवाः । कश्चिदेव हि जानाति विरक्तो विष्णुतत्परः
tasmānna khyātimāyānti dharmā vaiśākhasaṁbhavāḥ kaścideva hi jānāti virakto viṣṇutatparaḥ
इसीलिए वैशाख से उत्पन्न होने वाले ये धर्म प्रसिद्धि को प्राप्त नहीं होते; केवल कोई विरक्त, विष्णु-परायण व्यक्ति ही इन्हें जानता है।