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वैष्णव खण्ड · अध्याय 168

पिशाचमुक्तिप्राप्ति — प्रेत की मुक्ति की प्राप्ति

अध्याय 167अध्याय-सूचीअध्याय 169

श्लोक 1 (skanda.2.168.1)

श्रुतदेव उवाच । यः प्रातः स्नाति वैशाखे मेषसंस्थे दिवाकरे । मधुसूदनमभ्यर्च्य कथां श्रुत्वा हरेरिमाम्

śrutadeva uvāca yaḥ prātaḥ snāti vaiśākhe meṣasaṁsthe divākare madhusūdanamabhyarcya kathāṁ śrutvā harerimām

श्रुतदेव ने कहा — जो वैशाख मास में, जब सूर्य मेष राशि में हो, प्रातःकाल स्नान करके मधुसूदन का पूजन करता है और हरि की यह कथा सुनता है,

श्लोक 2 (skanda.2.168.2)

स तु पापविनिर्मुक्तो याति विष्णोः परं पदम् । वाच्यमानां कथां हित्वा योऽन्यां सेवेत मूढधीः

sa tu pāpavinirmukto yāti viṣṇoḥ paraṁ padam vācyamānāṁ kathāṁ hitvā yo’nyāṁ seveta mūḍhadhīḥ

वह पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होता है। किन्तु जो मूढ़बुद्धि सुनाई जा रही कथा को छोड़कर किसी और कार्य में लग जाता है,

श्लोक 3 (skanda.2.168.3)

रौरवं नरकं प्राप्य पैशाचीं योनिमाप्नुयात् । अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्

rauravaṁ narakaṁ prāpya paiśācīṁ yonimāpnuyāt atraivodāharantīmamitihāsaṁ purātanam

वह रौरव नरक को प्राप्त होकर पिशाच-योनि पाता है। इसी विषय में यह प्राचीन इतिहास कहा जाता है —

श्लोक 4 (skanda.2.168.4)

पापघ्नं पावनं धर्म्यं सद्यो वंद्यं पुरातनम् । पुरा गोदावरीतीरे क्षेत्रे ब्रह्मेश्वरे शुभे

pāpaghnaṁ pāvanaṁ dharmyaṁ sadyo vaṁdyaṁ purātanam purā godāvarītīre kṣetre brahmeśvare śubhe

पापनाशक, पवित्र, धर्ममय, तत्काल वन्दनीय और प्राचीन — पूर्वकाल में गोदावरी के तट पर, ब्रह्मेश्वर नामक शुभ क्षेत्र में,

श्लोक 5 (skanda.2.168.5)

दुर्वासशिष्यौ परमहंसौ ब्रह्मैकनिष्ठितौ । सदैवोपनिषद्विद्यानिष्ठितौ निरपेक्षितौ

durvāsaśiṣyau paramahaṁsau brahmaikaniṣṭhitau sadaivopaniṣadvidyāniṣṭhitau nirapekṣitau

दुर्वासा मुनि के दो परमहंस शिष्य थे, दोनों ब्रह्म में एकनिष्ठ, सदैव उपनिषद्-विद्या में स्थित और निरपेक्ष,

श्लोक 6 (skanda.2.168.6)

भिक्षामात्राशिनौ पुण्यौ तौ गुहावासिनावुभौ । सत्यनिष्ठतपोनिष्ठाविति ख्यातौ जगत्त्रये

bhikṣāmātrāśinau puṇyau tau guhāvāsināvubhau satyaniṣṭhataponiṣṭhāviti khyātau jagattraye

केवल भिक्षा से जीवन-निर्वाह करने वाले, पुण्यात्मा, एक ही गुफा में रहने वाले दोनों — तीनों लोकों में वे 'सत्यनिष्ठ' और 'तपोनिष्ठ' नाम से विख्यात थे।

श्लोक 7 (skanda.2.168.7)

तयोर्मध्ये सत्यनिष्ठः सदा विष्णुकथापरः । श्रोतॄणामप्यभावे च व्याख्यातॄणां तथा नृप

tayormadhye satyaniṣṭhaḥ sadā viṣṇukathāparaḥ śrotṝṇāmapyabhāve ca vyākhyātṝṇāṁ tathā nṛpa

उन दोनों में सत्यनिष्ठ सदा विष्णु की कथा में तत्पर रहता था। हे राजन्, श्रोताओं और वक्ताओं के अभाव में भी —

श्लोक 8 (skanda.2.168.8)

तदा कर्मकला नित्याः करोत्यद्धा मुनीश्वरः । श्रोता चेदस्ति यः कश्चित्तस्मै व्याख्या त्यहर्निशम्

tadā karmakalā nityāḥ karotyaddhā munīśvaraḥ śrotā cedasti yaḥ kaścittasmai vyākhyā tyaharniśam

तब वह मुनिश्रेष्ठ नित्य के अपने कर्म-कृत्य करता था; परन्तु यदि कोई भी श्रोता होता, तो उसे वह रात-दिन कथा सुनाता था।

श्लोक 9 (skanda.2.168.9)

यदि व्याख्याति कश्चिद्वा पुण्यां विष्णुकथां शुभाम् । तदा संकुच्य कर्माणि शृणोति श्रवणे रतः

yadi vyākhyāti kaścidvā puṇyāṁ viṣṇukathāṁ śubhām tadā saṁkucya karmāṇi śṛṇoti śravaṇe rataḥ

और यदि कोई विष्णु की पुण्य एवं शुभ कथा सुनाता, तो वह अपने कर्मों को संक्षिप्त करके श्रवण में रत होकर उसे सुनता था।

श्लोक 10 (skanda.2.168.10)

अतिदूरस्थतीर्थानि देवतायतनानि च । हित्वा कथाविरोधीनि तथा कर्माणि भूरिशः

atidūrasthatīrthāni devatāyatanāni ca hitvā kathāvirodhīni tathā karmāṇi bhūriśaḥ

वह दूर स्थित तीर्थों और देवालयों को, तथा कथा में बाधक अनेक कर्मों को भी त्याग देता था,

श्लोक 11 (skanda.2.168.11)

शृणोति च कथां दिव्यां श्रोतृभ्यो वक्ति वै स्वयम् । विना कथां न जानाति सेव्यमन्यन्नरेश्वर

śṛṇoti ca kathāṁ divyāṁ śrotṛbhyo vakti vai svayam vinā kathāṁ na jānāti sevyamanyannareśvara

और दिव्य कथा को सुनता, तथा स्वयं भी श्रोताओं को सुनाता था। हे नरेश्वर, कथा के अतिरिक्त वह किसी अन्य सेवनीय वस्तु को नहीं जानता था।

श्लोक 12 (skanda.2.168.12)

व्याख्याति च गृहे स्वस्य वक्ता रोगाद्युपद्रुतः । कूपस्नानपरो भूत्वा शृणोत्येव कथां मुनिः

vyākhyāti ca gṛhe svasya vaktā rogādyupadrutaḥ kūpasnānaparo bhūtvā śṛṇotyeva kathāṁ muniḥ

यदि वक्ता रोगादि से पीड़ित होकर अपने घर में ही कथा कहता, तो वह मुनि केवल कुएँ पर स्नान करके भी उस कथा को सुनता था।

श्लोक 13 (skanda.2.168.13)

कथायाश्च विरामे तु स्वकृत्यं साधयत्यलम् । कथां वै शृण्वतः पुंसो जन्ममबन्धो न विद्यते

kathāyāśca virāme tu svakṛtyaṁ sādhayatyalam kathāṁ vai śṛṇvataḥ puṁso janmamabandho na vidyate

कथा के विराम पर ही वह अपने कर्तव्यों को पूरा करता था। जो पुरुष कथा को सुनता है, उसके लिए जन्म-बन्धन नहीं रह जाता।

श्लोक 14 (skanda.2.168.14)

सत्त्वशुद्धिस्ततो विष्णावरतिश्चैव गच्छति । रतिश्च जायते विष्णौ सौहृदं चैव साधुषु

sattvaśuddhistato viṣṇāvaratiścaiva gacchati ratiśca jāyate viṣṇau sauhṛdaṁ caiva sādhuṣu

उससे सत्त्व की शुद्धि होती है, फिर वैराग्य उत्पन्न होता है; विष्णु में प्रीति जागृत होती है और साधुओं के प्रति सौहार्द भी।

श्लोक 15 (skanda.2.168.15)

नीरजं निर्गुणं ब्रह्म सद्यो हृद्यवरुध्यते । ज्ञानहीनस्य वै पुंसः कर्म वै निष्फलं भवेत्

nīrajaṁ nirguṇaṁ brahma sadyo hṛdyavarudhyate jñānahīnasya vai puṁsaḥ karma vai niṣphalaṁ bhavet

निर्मल, निर्गुण ब्रह्म तत्काल हृदय में स्थिर हो जाता है। किन्तु ज्ञानरहित पुरुष का कर्म सर्वथा निष्फल होता है।

श्लोक 16 (skanda.2.168.16)

बहुधा चरितं चाऽपि यथैवांधकदर्पणम् । कर्माणि क्रियमाणानि बहुधा शोचितात्मभिः

bahudhā caritaṁ cā’pi yathaivāṁdhakadarpaṇam karmāṇi kriyamāṇāni bahudhā śocitātmabhiḥ

नाना प्रकार से किया गया आचरण भी अंधे के समक्ष रखे दर्पण के समान है; शोकाकुल आत्माओं द्वारा विविध रूप से किये गये कर्म —

श्लोक 17 (skanda.2.168.17)

सत्त्वशुद्ध्यै भवंत्येव सत्त्वशुद्ध्या श्रुतिं व्रजेत् । श्रुतेस्तु ज्ञानमासाद्य ज्ञात्वा ध्यानाय कल्पते

sattvaśuddhyai bhavaṁtyeva sattvaśuddhyā śrutiṁ vrajet śrutestu jñānamāsādya jñātvā dhyānāya kalpate

वे केवल सत्त्व-शुद्धि के लिए ही होते हैं; सत्त्व-शुद्धि से मनुष्य श्रुति (शास्त्र-श्रवण) को प्राप्त होता है। श्रुति से ज्ञान पाकर, जानकर वह ध्यान के योग्य बनता है।

श्लोक 18 (skanda.2.168.18)

बहुधा श्रवणं ध्यानं मननं श्रुतिचोदितम् । यत्र विष्णुकथा नास्ति यत्र साधुजना नहि

bahudhā śravaṇaṁ dhyānaṁ mananaṁ śruticoditam yatra viṣṇukathā nāsti yatra sādhujanā nahi

श्रुति द्वारा प्रेरित श्रवण, ध्यान और मनन अनेक प्रकार के होते हैं — किन्तु जहाँ विष्णु की कथा नहीं है, जहाँ साधुजन नहीं हैं,

श्लोक 19 (skanda.2.168.19)

साक्षाद्गंगातटं वाऽपि त्याज्यमेव न संशयः । यद्देशे तुलसी नास्ति वैष्णवं धाम वा शुभम्

sākṣādgaṁgātaṭaṁ vā’pi tyājyameva na saṁśayaḥ yaddeśe tulasī nāsti vaiṣṇavaṁ dhāma vā śubham

वहाँ साक्षात् गंगा-तट भी त्याज्य है, इसमें संशय नहीं। जिस देश में तुलसी नहीं, अथवा कोई शुभ वैष्णव धाम नहीं,

श्लोक 20 (skanda.2.168.20)

यत्र विष्णुकथा नास्ति मृतस्तत्र तमो व्रजेत् । यद्ग्रामे वैष्णवं धाम नास्ति कृष्णमृगोऽपि वा

yatra viṣṇukathā nāsti mṛtastatra tamo vrajet yadgrāme vaiṣṇavaṁ dhāma nāsti kṛṣṇamṛgo’pi vā

जहाँ विष्णु-कथा नहीं है, वहाँ मरने वाला अंधकार को प्राप्त होता है। जिस ग्राम में वैष्णव धाम नहीं और कृष्णमृग (काला मृग) भी नहीं,

श्लोक 21 (skanda.2.168.21)

यत्र विष्णुकथा नास्ति साधवो वा तदाश्रयाः । मृतस्तत्र पुमान्क्षिप्रं श्वानयोनिशतं व्रजेत्

yatra viṣṇukathā nāsti sādhavo vā tadāśrayāḥ mṛtastatra pumānkṣipraṁ śvānayoniśataṁ vrajet

जहाँ विष्णु-कथा नहीं और न ही साधु या उनका आश्रय है — वहाँ मरने वाला मनुष्य शीघ्र ही सौ बार श्वान-योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 22 (skanda.2.168.22)

विचार्योपनिषद्विद्यामिति निश्चित्य वै मुनिः । सदा विष्णुकथाऽऽसक्तो विष्णुस्मृतिपरायणः

vicāryopaniṣadvidyāmiti niścitya vai muniḥ sadā viṣṇukathā’’sakto viṣṇusmṛtiparāyaṇaḥ

उपनिषद्-विद्या का विचार करके, ऐसा निश्चय करके, वह मुनि सदा विष्णु-कथा में आसक्त और विष्णु के स्मरण में तत्पर रहा,

श्लोक 23 (skanda.2.168.23)

न किंचिदधिकं जातु मन्यते श्रवणात्परम् । इतरस्तु तपोनिष्ठः कर्मनिष्ठो दुराग्रही

na kiṁcidadhikaṁ jātu manyate śravaṇātparam itarastu taponiṣṭhaḥ karmaniṣṭho durāgrahī

और श्रवण से बढ़कर उसने कभी कुछ भी नहीं माना। किन्तु दूसरा, जो तपोनिष्ठ था, कर्मनिष्ठ और दुराग्रही था,

श्लोक 24 (skanda.2.168.24)

न व्याख्याति स्वयं वाऽपि न शृणोति च सत्कथाम् । वाच्यमानां कथां हित्वा तीर्थस्नानाय गच्छति

na vyākhyāti svayaṁ vā’pi na śṛṇoti ca satkathām vācyamānāṁ kathāṁ hitvā tīrthasnānāya gacchati

न स्वयं कथा कहता था, न सत्कथा सुनता था; सुनाई जा रही कथा को छोड़कर वह तीर्थ-स्नान के लिए चला जाता था।

श्लोक 25 (skanda.2.168.25)

तीर्थेऽपि च प्रवृत्तायां कथायां भूमिपालक । कर्मलोपभयाद्दूरं याति चांचल्यशक्तितः

tīrthe’pi ca pravṛttāyāṁ kathāyāṁ bhūmipālaka karmalopabhayāddūraṁ yāti cāṁcalyaśaktitaḥ

हे भूमिपाल, तीर्थ में भी जब कथा चल रही होती, तब वह कर्म-लोप के भय से, अपने चंचल स्वभाव के कारण दूर चला जाता था।

श्लोक 26 (skanda.2.168.26)

व्रजंति गृहकृत्यार्थं संगमात्परतो जनाः । न श्रोतारो न वक्तारस्तस्य पार्श्वे तु कर्मिणः

vrajaṁti gṛhakṛtyārthaṁ saṁgamātparato janāḥ na śrotāro na vaktārastasya pārśve tu karmiṇaḥ

संगम के पश्चात् लोग गृहस्थ-कार्यों के लिए चले जाते हैं; उस कर्मी के पास न कोई श्रोता था, न कोई वक्ता।

श्लोक 27 (skanda.2.168.27)

दुरात्मनस्तु दुर्बुद्धेः काल एवं क्षयं गते । जिह्वां श्रुतिं च न क्वापि संप्राप्ता हि कथा विभोः

durātmanastu durbuddheḥ kāla evaṁ kṣayaṁ gate jihvāṁ śrutiṁ ca na kvāpi saṁprāptā hi kathā vibhoḥ

इस प्रकार उस दुरात्मा दुर्बुद्धि का समय बीतता गया, और प्रभु की कथा कभी भी उसकी जिह्वा या कान तक नहीं पहुँची।

श्लोक 28 (skanda.2.168.28)

अश्रोतृत्वादवक्तृत्वाद्दुर्बुद्धित्वाद्दुराग्रहात् । पश्चात्पंचत्वमासाद्य सद्यो धर्मेण वै मुनिः

aśrotṛtvādavaktṛtvāddurbuddhitvāddurāgrahāt paścātpaṁcatvamāsādya sadyo dharmeṇa vai muniḥ

श्रोता न होने से, वक्ता न होने से, दुर्बुद्धि और दुराग्रह के कारण — बाद में मृत्यु को प्राप्त होकर, उस मुनि को तत्काल अपने ही कर्म के अनुसार —

श्लोक 29 (skanda.2.168.29)

पिशाचोऽभूच्छमीवृक्षे च्छिन्नकर्णाह्वयोऽबलः । निराश्रयो निराहारः शुष्ककण्ठोष्ठतालुकः

piśāco’bhūcchamīvṛkṣe cchinnakarṇāhvayo’balaḥ nirāśrayo nirāhāraḥ śuṣkakaṇṭhoṣṭhatālukaḥ

शमी वृक्ष पर 'छिन्नकर्ण' नामक निर्बल पिशाच होना पड़ा — आश्रयहीन, आहारहीन, जिसका कण्ठ, ओष्ठ और तालु सूख गये थे।

श्लोक 30 (skanda.2.168.30)

एवं वै खिद्यमानस्य समा दिव्यायुता गताः । नापश्यत्स्वस्य त्रातारं निराहारोऽतिदुःखितः

evaṁ vai khidyamānasya samā divyāyutā gatāḥ nāpaśyatsvasya trātāraṁ nirāhāro’tiduḥkhitaḥ

इस प्रकार दुःखी होते हुए उसके दस हजार दिव्य वर्ष बीत गये; भूखा और अत्यंत दुःखी, उसे अपना कोई रक्षक दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 31 (skanda.2.168.31)

स्वकृतं चिंतयानश्च मत्तोन्मत्त इवाभ्रमत् । क्षुधया पर्यटन्वाऽपि निर्वृतिं नाप मूढधीः

svakṛtaṁ ciṁtayānaśca mattonmatta ivābhramat kṣudhayā paryaṭanvā’pi nirvṛtiṁ nāpa mūḍhadhīḥ

अपने ही किये कर्मों का चिन्तन करता हुआ वह उन्मत्त-सा भटकता रहा; भूख से इधर-उधर भटकते हुए भी उस मूढ़बुद्धि को शान्ति नहीं मिली।

श्लोक 32 (skanda.2.168.32)

कृशानुसदृशो वायुरंगं स्पृष्ट्वा कृतात्मनः । कालाग्नितुल्या आपश्च फलपुष्पादिकं विषम्

kṛśānusadṛśo vāyuraṁgaṁ spṛṣṭvā kṛtātmanaḥ kālāgnitulyā āpaśca phalapuṣpādikaṁ viṣam

उस कृतकर्मा के शरीर को छूती हुई वायु अग्नि के समान लगती थी, जल कालाग्नि के समान और फल-पुष्पादि विष के समान प्रतीत होते थे।

श्लोक 33 (skanda.2.168.33)

न क्वापि सुखमापेदे कर्मठो दीनधीरयम् । एवं व्यवसिते तस्मिन्नरण्ये जनवर्जिते

na kvāpi sukhamāpede karmaṭho dīnadhīrayam evaṁ vyavasite tasminnaraṇye janavarjite

वह दीनबुद्धि कर्मठ कहीं भी सुख नहीं पा सका। इस प्रकार वह उस जनरहित वन में स्थित रहा,

श्लोक 34 (skanda.2.168.34)

कथया रहिते क्षेत्रे स्वाश्रये साधुवर्जिते । दैवादायात्सत्यनिष्ठस्तदा पैठिनसीं पुरीम्

kathayā rahite kṣetre svāśraye sādhuvarjite daivādāyātsatyaniṣṭhastadā paiṭhinasīṁ purīm

जो कथा से रहित और साधुओं से रहित उसी क्षेत्र में था — तभी दैवयोग से सत्यनिष्ठ उधर से पैठिनसी नगरी की ओर जा रहा था।

श्लोक 35 (skanda.2.168.35)

गच्छन्मार्गे ददर्शाऽसौ छिन्नकर्णं वहुव्यथम् । दृष्ट्वाऽऽत्मानं द्रावयन्तं रुदंतं क्षुधयाऽऽतुरम्

gacchanmārge dadarśā’sau chinnakarṇaṁ vahuvyatham dṛṣṭvā’’tmānaṁ drāvayantaṁ rudaṁtaṁ kṣudhayā’’turam

मार्ग में जाते हुए उसने अत्यंत व्यथित छिन्नकर्ण को देखा — रोता हुआ, भूख से पीड़ित, स्वयं को ही सन्तप्त करते हुए,

श्लोक 36 (skanda.2.168.36)

मा भैषीरिति चाभाष्य कोऽसीत्याह मुनीश्वरः । दशेदृशी च कस्मात्ते न ते दुःखमतः परम्

mā bhaiṣīriti cābhāṣya ko’sītyāha munīśvaraḥ daśedṛśī ca kasmātte na te duḥkhamataḥ param

'भयभीत मत हो' — ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ ने पूछा — 'तुम कौन हो? तुम्हारी यह दशा किस कारण है? तुमसे बढ़कर दुःख किसी को नहीं होगा।'

श्लोक 37 (skanda.2.168.37)

इत्याश्वस्तोऽमुना च्छिन्नकर्णः प्राहातिविह्वलः । तपोनिष्ठो यतिरहं शिष्यो दुर्वाससः परम्

ityāśvasto’munā cchinnakarṇaḥ prāhātivihvalaḥ taponiṣṭho yatirahaṁ śiṣyo durvāsasaḥ param

इस प्रकार उसके द्वारा आश्वस्त किया गया छिन्नकर्ण अत्यन्त विह्वल होकर बोला — 'मैं तपोनिष्ठ नामक यति हूँ, दुर्वासा मुनि का ही शिष्य,

श्लोक 38 (skanda.2.168.38)

ब्रह्मेश्वरक्षेत्रवासी कर्मनिष्ठो दुराग्रही । कर्मलोपभयान्मौढ्यान्मया दुर्बुद्धिना मुने

brahmeśvarakṣetravāsī karmaniṣṭho durāgrahī karmalopabhayānmauḍhyānmayā durbuddhinā mune

ब्रह्मेश्वर-क्षेत्र में रहने वाला, कर्मनिष्ठ और दुराग्रही। हे मुने, कर्म-लोप के भय से मोहवश, दुर्बुद्धि मैंने —

श्लोक 39 (skanda.2.168.39)

साधुभिर्वाच्यमानाऽपि नादृता विष्णुसत्कथा । न व्याख्याता च श्रोतृभ्यः कथा कर्मनिकृतंनी

sādhubhirvācyamānā’pi nādṛtā viṣṇusatkathā na vyākhyātā ca śrotṛbhyaḥ kathā karmanikṛtaṁnī

साधुओं द्वारा सुनाई जाती हुई विष्णु की सत्कथा का भी आदर नहीं किया, न ही उसे श्रोताओं को सुनाया — और इस प्रकार अपने कर्तव्य से ही छला गया।

श्लोक 40 (skanda.2.168.40)

तेन कर्मविपाकेन महताऽहं मृतिं गतः । छिन्नकर्णोऽभवं नाम्ना पिशाचो दुःखविह्वलः

tena karmavipākena mahatā’haṁ mṛtiṁ gataḥ chinnakarṇo’bhavaṁ nāmnā piśāco duḥkhavihvalaḥ

उसी महान कर्म-फल के कारण मैं मृत्यु को प्राप्त हुआ और छिन्नकर्ण नामक दुःखी पिशाच बन गया।

श्लोक 41 (skanda.2.168.41)

न पश्यामि च त्रातारं दुःखादस्मात्कथंचन । तव दृष्टिपथं यातो दिष्टयाऽहं गतकल्मषः

na paśyāmi ca trātāraṁ duḥkhādasmātkathaṁcana tava dṛṣṭipathaṁ yāto diṣṭayā’haṁ gatakalmaṣaḥ

मुझे इस दुःख से किसी भी प्रकार कोई रक्षक नहीं दिखता। अब जब मैं आपकी दृष्टि के मार्ग में आ गया हूँ, सौभाग्य से मेरे पाप नष्ट हो गये हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.168.42)

अद्य मे देवतास्तुष्टा गुरवः साधवश्च ये । हरिश्च मे प्रसन्नोऽभूद्यतस्ते दर्शनं मम

adya me devatāstuṣṭā guravaḥ sādhavaśca ye hariśca me prasanno’bhūdyataste darśanaṁ mama

आज मेरे देवता प्रसन्न हैं, मेरे गुरुजन और साधुजन भी; हरि भी मुझ पर प्रसन्न हुए, क्योंकि मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ है।'

श्लोक 43 (skanda.2.168.43)

पपात पादयोर्भूमौ त्राहित्राहीति वै रुदन् । ततस्तु कृपयाऽऽविष्टः सत्यनिष्ठो महायशाः

papāta pādayorbhūmau trāhitrāhīti vai rudan tatastu kṛpayā’’viṣṭaḥ satyaniṣṭho mahāyaśāḥ

वह रोता हुआ 'रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए भूमि पर उसके चरणों में गिर पड़ा। तब कृपा से आविष्ट होकर वह महायशस्वी सत्यनिष्ठ,

श्लोक 44 (skanda.2.168.44)

दोर्भ्यामुत्थापयामास शंतमाभ्यां मुनीश्वरः । ततस्त्वप उपस्पृश्य ददौ पुण्यमनुत्तमम्

dorbhyāmutthāpayāmāsa śaṁtamābhyāṁ munīśvaraḥ tatastvapa upaspṛśya dadau puṇyamanuttamam

उस मुनिश्रेष्ठ ने अपनी कोमल भुजाओं से उसे उठाया; फिर जल का स्पर्श करके उसने उसे वह सर्वोत्तम पुण्य प्रदान किया —

श्लोक 45 (skanda.2.168.45)

वैशाखमासमाहात्म्यश्रवणस्य मुहूर्तजम् । तेन पुण्यप्रभावेन सद्यो ध्वस्ताखिलाशुभः

vaiśākhamāsamāhātmyaśravaṇasya muhūrtajam tena puṇyaprabhāvena sadyo dhvastākhilāśubhaḥ

वैशाख मास के माहात्म्य को क्षणभर सुनने से प्राप्त पुण्य। उस पुण्य के प्रभाव से उसके सारे अशुभ तत्काल नष्ट हो गये,

श्लोक 46 (skanda.2.168.46)

पिशाचदेहनिर्मुक्तो दिव्यदेहधरोऽभवत् । दिव्यं विमानमारुह्य तं प्रणम्य महामुनिम्

piśācadehanirmukto divyadehadharo’bhavat divyaṁ vimānamāruhya taṁ praṇamya mahāmunim

वह पिशाच-देह से मुक्त होकर दिव्य देह धारण करने लगा। दिव्य विमान पर आरूढ़ होकर, उस महामुनि को प्रणाम करके,

श्लोक 47 (skanda.2.168.47)

आमंत्र्य च परिक्रम्य ययौ विष्णोः परं पदम् । सत्यनिष्ठस्ततो धीमान्ययौ पैठिनसीं पुरीम्

āmaṁtrya ca parikramya yayau viṣṇoḥ paraṁ padam satyaniṣṭhastato dhīmānyayau paiṭhinasīṁ purīm

उससे विदा लेकर और परिक्रमा करके वह विष्णु के परम पद को चला गया। तत्पश्चात् बुद्धिमान सत्यनिष्ठ भी पैठिनसी नगरी की ओर चला गया।

श्लोक 48 (skanda.2.168.48)

माहात्म्यश्रवणस्यैवं चिंतयानः पुनःपुनः । श्रुतदेव उवाच । यत्र विष्णुकथा पुण्या शुभा लोकमलाऽपहा

māhātmyaśravaṇasyaivaṁ ciṁtayānaḥ punaḥpunaḥ śrutadeva uvāca yatra viṣṇukathā puṇyā śubhā lokamalā’pahā

इस माहात्म्य-श्रवण के विषय में बार-बार चिन्तन करते हुए — [श्रुतदेव ने कहा:] जहाँ विष्णु की पुण्य, शुभ, लोक-मल का नाश करने वाली कथा है,

श्लोक 49 (skanda.2.168.49)

तत्र सर्वाणि तीर्थानि क्षेत्राणि विविधानि च । यत्र प्रवहते पुण्या शुभा विष्णुकथाऽऽपगा

tatra sarvāṇi tīrthāni kṣetrāṇi vividhāni ca yatra pravahate puṇyā śubhā viṣṇukathā’’pagā

वहाँ सभी तीर्थ और नाना प्रकार के क्षेत्र विद्यमान हैं। जहाँ विष्णु की वह पुण्य, शुभ कथा-रूपी नदी प्रवाहित होती है,

श्लोक 50 (skanda.2.168.50)

तद्देशवासिनां मुक्तिः करसंस्था न संशयः

taddeśavāsināṁ muktiḥ karasaṁsthā na saṁśayaḥ

उस देश के निवासियों की मुक्ति उनकी हथेली में ही स्थित है, इसमें कोई संशय नहीं है।

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