वैष्णव खण्ड · अध्याय 169
पांचालाधिपति की जयप्राप्ति एवं दरिद्रनाशवर्णन
श्लोक 1 (skanda.2.169.1)
श्रुतदेव उवाच । भूयः शृणुष्व भूपाल माहात्म्यं पापनाशनम् । वैशाखस्य च मासस्य वल्लभस्य मधुद्विषः
śrutadeva uvāca bhūyaḥ śṛṇuṣva bhūpāla māhātmyaṁ pāpanāśanam vaiśākhasya ca māsasya vallabhasya madhudviṣaḥ
श्रुतदेव ने कहा — हे भूपाल, आगे भी मधुसूदन को प्रिय वैशाख मास के इस पापनाशक माहात्म्य को सुनो।
श्लोक 2 (skanda.2.169.2)
पुरा पांचालदेशे तु राजा पुरुयशोऽभवत् । तनयो भूरियशसः पुण्यशीलस्य धीमतः
purā pāṁcāladeśe tu rājā puruyaśo’bhavat tanayo bhūriyaśasaḥ puṇyaśīlasya dhīmataḥ
पूर्वकाल में पांचाल देश में पुरुयशस् नामक राजा था, जो बुद्धिमान एवं पुण्यशील भूरियशस् का पुत्र था।
श्लोक 3 (skanda.2.169.3)
पितर्युपरते भूप राज्यस्थो धर्मलालसः । शौर्यौदार्यगुणोपेतो धनुर्विद्याविशारदः
pitaryuparate bhūpa rājyastho dharmalālasaḥ śauryaudāryaguṇopeto dhanurvidyāviśāradaḥ
पिता के स्वर्गवास पर, हे राजन्, वह राज्य पर आसीन हुआ, धर्मपरायण, शौर्य-औदार्य गुणों से युक्त और धनुर्विद्या में निपुण।
श्लोक 4 (skanda.2.169.4)
शशास पृथिवीं सर्वां स्वधर्मेण महामतिः । पूर्वजन्मजलादानाद्दोषेण महता वृतः
śaśāsa pṛthivīṁ sarvāṁ svadharmeṇa mahāmatiḥ pūrvajanmajalādānāddoṣeṇa mahatā vṛtaḥ
वह महामति अपने धर्म से सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन करता था — किन्तु पूर्वजन्म में जलदान न करने के दोष से वह घिरा हुआ था।
श्लोक 5 (skanda.2.169.5)
संपद्धानिमवापाऽसौ कालेन कियताऽनघ । हया गजा मृतिं याता महद्रोगेण पीडिताः
saṁpaddhānimavāpā’sau kālena kiyatā’nagha hayā gajā mṛtiṁ yātā mahadrogeṇa pīḍitāḥ
हे निष्पाप, कुछ काल पश्चात् उसकी सम्पत्ति क्षीण हो गई; महारोग से पीड़ित होकर उसके घोड़े और हाथी मृत्यु को प्राप्त हुए।
श्लोक 6 (skanda.2.169.6)
दुर्भिक्षमतुलं चासीन्निर्मानुष्यविधायकम् । राज्यं कोशं तदा चाऽऽसीद्गजभुक्तकपित्थवत्
durbhikṣamatulaṁ cāsīnnirmānuṣyavidhāyakam rājyaṁ kośaṁ tadā cā’’sīdgajabhuktakapitthavat
अतुल दुर्भिक्ष पड़ा जिसने प्रजा को नष्ट कर दिया; राज्य और कोष तब हाथी द्वारा खाए गए कैथ के फल के समान हो गये।
श्लोक 7 (skanda.2.169.7)
बलहीनं नृपं ज्ञात्वा कोशराष्ट्रविवर्जितम् । तं जेतुमेष समय इति निश्चितमानसाः
balahīnaṁ nṛpaṁ jñātvā kośarāṣṭravivarjitam taṁ jetumeṣa samaya iti niścitamānasāḥ
राजा को बलहीन तथा कोष-राष्ट्र से रहित जानकर, उसके शत्रु राजा यह निश्चय करके कि 'अब उसे जीतने का समय है' —
श्लोक 8 (skanda.2.169.8)
आजग्मुः शतशो भूपा रिपवस्तस्य भूपतेः । जिग्युर्युद्धेन तं भूपं पांचालविषयाधिपम्
ājagmuḥ śataśo bhūpā ripavastasya bhūpateḥ jigyuryuddhena taṁ bhūpaṁ pāṁcālaviṣayādhipam
सैकड़ों की संख्या में आये और युद्ध में उस पांचाल-देशाधिपति राजा को पराजित कर दिया।
श्लोक 9 (skanda.2.169.9)
पराजितस्ततो राजा विवेश गिरिगह्वरे । शिखिन्या भार्यया साकं धात्र्यादिगणसंयुतः
parājitastato rājā viveśa girigahvare śikhinyā bhāryayā sākaṁ dhātryādigaṇasaṁyutaḥ
पराजित होकर राजा अपनी पत्नी शिखिनी तथा धाय आदि परिजनों सहित पर्वत की गुफा में जा बसा।
श्लोक 10 (skanda.2.169.10)
अज्ञातपद्धतिश्चान्यैर्बहुदुःखसमाकुलः । त्रिपंचाशत्समाश्चैव नीतास्तेन विलीयता
ajñātapaddhatiścānyairbahuduḥkhasamākulaḥ tripaṁcāśatsamāścaiva nītāstena vilīyatā
अन्यों से अज्ञात मार्ग में रहते हुए, अत्यंत दुःख से व्याकुल, उसने तिरपन वर्ष वहीं क्षीण होते हुए बिताए।
श्लोक 11 (skanda.2.169.11)
चिन्तयामास भूपालः किमेतदिति भूरिशः । कर्मणा जन्मशुद्धोऽहं मातृपितृहिते रतः
cintayāmāsa bhūpālaḥ kimetaditi bhūriśaḥ karmaṇā janmaśuddho’haṁ mātṛpitṛhite rataḥ
राजा बार-बार सोचता — 'यह क्या हुआ? मैं तो कर्मों से जन्म से ही शुद्ध हूँ, माता-पिता के हित में रत रहा हूँ,
श्लोक 12 (skanda.2.169.12)
गुरुभक्तः सदाक्षिण्यो ब्रह्मण्यो धर्मतत्परः । दयावान्सर्वभूतेषु देवभक्तो जितेन्द्रियः
gurubhaktaḥ sadākṣiṇyo brahmaṇyo dharmatatparaḥ dayāvānsarvabhūteṣu devabhakto jitendriyaḥ
गुरुभक्त, सदा उदार, ब्राह्मणों का आश्रयदाता, धर्मपरायण, सब भूतों पर दयावान, देवभक्त और जितेन्द्रिय हूँ;
श्लोक 13 (skanda.2.169.13)
न भ्राता मे न पुत्रो मे न च मे सुहृदो हिताः । दयापौरुषविख्याताः कुलीनस्याऽपि मे कुतः
na bhrātā me na putro me na ca me suhṛdo hitāḥ dayāpauruṣavikhyātāḥ kulīnasyā’pi me kutaḥ
फिर भी न मेरा कोई भाई है, न पुत्र, न दया और पौरुष से विख्यात कोई सुहृद — मेरे जैसे कुलीन के लिए यह कैसे सम्भव है?
श्लोक 14 (skanda.2.169.14)
केन वा कर्मणा चाप्तं दारिद्र्यं भूरिदुःखदम् । केन वाऽपजयो मेऽद्य केन वा वनवासिता
kena vā karmaṇā cāptaṁ dāridryaṁ bhūriduḥkhadam kena vā’pajayo me’dya kena vā vanavāsitā
किस कर्म से मुझे यह अत्यंत दुःखदायी दरिद्रता मिली? किस कारण आज मेरी यह पराजय हुई? किस कारण यह वनवास?'
श्लोक 15 (skanda.2.169.15)
इति चिन्ताकुलो राजा गुरुं सस्मार खिन्नधीः। याजोपयाजकौ नाम सर्वज्ञौ मुनिसत्तमौ
iti cintākulo rājā guruṁ sasmāra khinnadhīḥ yājopayājakau nāma sarvajñau munisattamau
इस प्रकार चिन्ता से व्याकुल, खिन्नबुद्धि राजा ने अपने गुरु — सर्वज्ञ मुनिश्रेष्ठ याज और उपयाज — का स्मरण किया।
श्लोक 16 (skanda.2.169.16)
आजग्मतुर्मुनीद्रौ तौ राज्ञाहूतौ महामती । तौ दृष्ट्वा सहसोत्थाय राजा पांचालवल्लभः
ājagmaturmunīdrau tau rājñāhūtau mahāmatī tau dṛṣṭvā sahasotthāya rājā pāṁcālavallabhaḥ
राजा द्वारा बुलाये गये वे दोनों महामति मुनीन्द्र वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर पांचालनरेश तुरन्त उठ खड़ा हुआ,
श्लोक 17 (skanda.2.169.17)
ननाम शिरसा भक्त्या प्रवासेनाऽतिपीडितः । राजचिह्नविहीनश्च केनाप्यज्ञातपद्धतिः
nanāma śirasā bhaktyā pravāsenā’tipīḍitaḥ rājacihnavihīnaśca kenāpyajñātapaddhatiḥ
और वनवास से अत्यंत पीड़ित, राजचिह्नों से रहित तथा जिसका मार्ग किसी को ज्ञात नहीं था, वह भक्तिपूर्वक सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम करने लगा।
श्लोक 18 (skanda.2.169.18)
तूष्णीं तस्थौ मुहूर्तं हि पतित्वा भुवि पादयोः । दोर्भ्यामुत्थापितस्ताभ्यां परिमृष्टाऽश्रुलोचनः
tūṣṇīṁ tasthau muhūrtaṁ hi patitvā bhuvi pādayoḥ dorbhyāmutthāpitastābhyāṁ parimṛṣṭā’śrulocanaḥ
भूमि पर उनके चरणों में गिरकर वह क्षणभर मौन रहा; उन दोनों ने अपनी भुजाओं से उसे उठाया, और उसके अश्रुपूर्ण नेत्र पोंछे गये।
श्लोक 19 (skanda.2.169.19)
विधिवत्पूजयामास वन्यैरेवाऽर्हणैः शुभैः । सूपविष्टौ तु तौ विप्रौ पप्रच्छाऽऽनतकन्धरः
vidhivatpūjayāmāsa vanyairevā’rhaṇaiḥ śubhaiḥ sūpaviṣṭau tu tau viprau papracchā’’natakandharaḥ
उसने वन में उपलब्ध शुभ वस्तुओं से विधिपूर्वक उनका पूजन किया; और जब वे दोनों विप्र आसन पर बैठ गये, तब उसने सिर झुकाकर पूछा —
श्लोक 20 (skanda.2.169.20)
ब्राह्मणौ वदतं दुःखकारणं च क्षितीशितुः । कर्मणा जन्मशुद्धस्य पितृदेवप्रियस्य च
brāhmaṇau vadataṁ duḥkhakāraṇaṁ ca kṣitīśituḥ karmaṇā janmaśuddhasya pitṛdevapriyasya ca
'हे ब्राह्मणो, बताइये इस राजा के दुःख का कारण, जो कर्म से जन्म-शुद्ध और पितरों-देवों को प्रिय है,
श्लोक 21 (skanda.2.169.21)
पापभीरोः कृपालोश्च गुरुभक्तस्य मे कुतः । दारिद्र्यं कोशहानिश्च रिपुभिश्च पराभवः
pāpabhīroḥ kṛpālośca gurubhaktasya me kutaḥ dāridryaṁ kośahāniśca ripubhiśca parābhavaḥ
जो पापभीरु, दयालु और गुरुभक्त है — मुझे यह दरिद्रता, कोष-हानि और शत्रुओं से पराजय कहाँ से प्राप्त हुई?
श्लोक 22 (skanda.2.169.22)
कस्मादरण्यवासश्च कुत एकाकिता मम । न पुत्रो न च मे भ्राता न हिताः सुहृदश्च मे
kasmādaraṇyavāsaśca kuta ekākitā mama na putro na ca me bhrātā na hitāḥ suhṛdaśca me
वनवास किसलिए? यह एकाकीपन किस कारण? न पुत्र, न भाई, न कोई हितैषी सुहृद —
श्लोक 23 (skanda.2.169.23)
दुर्भिक्षं वा कुतश्चासीद्देशे मत्पालितेऽनघे । एतद्विस्तार्य मे ब्रूतं कारणं मुनिपुंगवौ
durbhikṣaṁ vā kutaścāsīddeśe matpālite’naghe etadvistārya me brūtaṁ kāraṇaṁ munipuṁgavau
मेरे द्वारा निष्पाप रूप से पालित इस देश में दुर्भिक्ष भी क्यों पड़ा? हे मुनिश्रेष्ठो, यह कारण मुझे विस्तार से बताइये।'
श्लोक 24 (skanda.2.169.24)
इत्युक्तौ तौ मुनिश्रेष्ठौ भूतेनात्यन्तदुःखिना । प्रत्यूचतुर्महात्मानौ किंचिद्ध्यानपरायणौ
ityuktau tau muniśreṣṭhau bhūtenātyantaduḥkhinā pratyūcaturmahātmānau kiṁciddhyānaparāyaṇau
अत्यंत दुःखी उस राजा द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ महात्मा, कुछ क्षण ध्यानस्थ होकर, उत्तर देने लगे —
श्लोक 25 (skanda.2.169.25)
याजोपयाजकावूचतुः । शृणु भूप प्रवक्ष्यावस्तव दुःखस्य कारणम् । पुरा भूप महापापी व्याधस्त्वं दशजन्मसु
yājopayājakāvūcatuḥ śṛṇu bhūpa pravakṣyāvastava duḥkhasya kāraṇam purā bhūpa mahāpāpī vyādhastvaṁ daśajanmasu
याज और उपयाज ने कहा — 'हे राजन्, सुनो, हम तुम्हारे दुःख का कारण कहते हैं। पूर्वकाल में, हे भूप, तुम दस जन्मों तक महापापी व्याध रहे थे,
श्लोक 26 (skanda.2.169.26)
निष्ठुरः सर्वलोकानां सदा हिंसापरायणः । धर्मलेशाकरः क्वापि न दमो न च वै शमः
niṣṭhuraḥ sarvalokānāṁ sadā hiṁsāparāyaṇaḥ dharmaleśākaraḥ kvāpi na damo na ca vai śamaḥ
सब प्राणियों के प्रति निष्ठुर, सदा हिंसा में तत्पर, धर्म के लेशमात्र से भी रहित — न कहीं संयम, न शान्ति।
श्लोक 27 (skanda.2.169.27)
न जिह्वा वक्ति नामानि विष्णोर्वापि कथंचन । चेतः स्मरति गोविन्दचरणांबुरुहद्वयम्
na jihvā vakti nāmāni viṣṇorvāpi kathaṁcana cetaḥ smarati govindacaraṇāṁburuhadvayam
तुम्हारी जिह्वा ने कभी विष्णु के नाम का उच्चारण नहीं किया, न ही तुम्हारे चित्त ने कभी गोविन्द के चरण-कमलों का स्मरण किया।
श्लोक 28 (skanda.2.169.28)
न प्रणामः कृतः क्वापि शिरसा परमात्मने । नवजन्मानि ते भूप गतान्येवं दुरात्मनः
na praṇāmaḥ kṛtaḥ kvāpi śirasā paramātmane navajanmāni te bhūpa gatānyevaṁ durātmanaḥ
तुमने कभी परमात्मा को सिर झुकाकर प्रणाम भी नहीं किया। इस प्रकार, हे राजन्, तुम्हारे नौ जन्म व्यतीत हो गये, दुरात्मा बने रहते हुए।
श्लोक 29 (skanda.2.169.29)
दशमे जन्मनि प्राप्ते व्याधस्त्वं सह्य भूधरे । निष्ठुरः सर्वलोकानां नराणां त्वं नरांतकः
daśame janmani prāpte vyādhastvaṁ sahya bhūdhare niṣṭhuraḥ sarvalokānāṁ narāṇāṁ tvaṁ narāṁtakaḥ
दसवें जन्म में तुम सह्य पर्वत पर व्याध बने, सब प्राणियों के प्रति निष्ठुर, मनुष्यों के लिए मनुष्यों का ही अन्तक,
श्लोक 30 (skanda.2.169.30)
दयाहीनः शस्त्रजीवी सदा हिंसापरायणः । निर्गुणः सकलत्रस्त्वं मार्गपीडाकरः शठः
dayāhīnaḥ śastrajīvī sadā hiṁsāparāyaṇaḥ nirguṇaḥ sakalatrastvaṁ mārgapīḍākaraḥ śaṭhaḥ
दयाहीन, शस्त्र से जीविका चलाने वाला, सदा हिंसापरायण, निर्गुण, विवाहित, मार्ग में यात्रियों को पीड़ा देने वाला दुष्ट,
श्लोक 31 (skanda.2.169.31)
प्रजानां गौडदेश्यानां राक्षसो मानुषाशनः । एवं चाब्दान्यतीतानि नैजं हितमजानतः
prajānāṁ gauḍadeśyānāṁ rākṣaso mānuṣāśanaḥ evaṁ cābdānyatītāni naijaṁ hitamajānataḥ
गौड़देश की प्रजा के लिए मनुष्य-भक्षी राक्षस समान। इस प्रकार अपने ही हित से अनजान, तुम्हारे वर्ष व्यतीत होते गये।
श्लोक 32 (skanda.2.169.32)
बालापत्यमृगाणां च पक्षिणां च वधात्तव। दयाहीनस्य दुर्बुद्धेर्जन्मन्यस्मिन्नपुत्रता
bālāpatyamṛgāṇāṁ ca pakṣiṇāṁ ca vadhāttava dayāhīnasya durbuddherjanmanyasminnaputratā
मृगों के बच्चों और पक्षियों के वध के कारण, हे दयाहीन दुर्बुद्धि, इस जन्म में तुम्हें पुत्र-हीनता प्राप्त हुई है;
श्लोक 33 (skanda.2.169.33)
विश्वासघातकत्वेन भ्रातरो नैव सोदराः । मार्गपीडाकरत्वेन सुहृज्जनविवर्जितः
viśvāsaghātakatvena bhrātaro naiva sodarāḥ mārgapīḍākaratvena suhṛjjanavivarjitaḥ
विश्वासघात के कारण तुम्हारे सहोदर भाई नहीं हैं; मार्ग में लोगों को पीड़ा देने के कारण तुम सुहृदजनों से रहित हुए हो;
श्लोक 34 (skanda.2.169.34)
साधूनां च तिरस्काराच्छत्रुभिस्ते पराजयः । कदाप्यदत्तदोषेण दारिद्यं पतितं गृहे
sādhūnāṁ ca tiraskārācchatrubhiste parājayaḥ kadāpyadattadoṣeṇa dāridyaṁ patitaṁ gṛhe
साधुओं के तिरस्कार से शत्रुओं द्वारा तुम्हारी पराजय हुई; कभी कुछ न देने के दोष से तुम्हारे घर में दरिद्रता आ गिरी;
श्लोक 35 (skanda.2.169.35)
सदैवोद्वेगकारित्वात्प्रवासस्ते दुरासदः । सर्वेषामप्रियत्वाच्च दुःखमत्यंतदुःसहम्
sadaivodvegakāritvātpravāsaste durāsadaḥ sarveṣāmapriyatvācca duḥkhamatyaṁtaduḥsaham
सदा भय उत्पन्न करने के कारण तुम्हारा यह दुःसह वनवास आया है; सबके लिए अप्रिय होने के कारण यह असह्य दुःख भोगना पड़ा है;
श्लोक 36 (skanda.2.169.36)
निराहारोप्यतः पूर्वं सदा क्रूरेण कर्मणा । तस्माद्राज्यापहारस्ते जन्मन्यस्मिन्महामते
nirāhāropyataḥ pūrvaṁ sadā krūreṇa karmaṇā tasmādrājyāpahāraste janmanyasminmahāmate
तथा क्रूर कर्मों के कारण सदा दूसरों को आहार से वंचित रखने के फलस्वरूप, हे महामते, इस जन्म में तुमसे राज्य छीन लिया गया।
श्लोक 37 (skanda.2.169.37)
अथ ते सत्कुलीनत्वे हेतूंश्चापि ब्रवीम्यहम् । यदाऽभूर्गौडदेशीयो ह्यंतिमे व्याधजन्मनि
atha te satkulīnatve hetūṁścāpi bravīmyaham yadā’bhūrgauḍadeśīyo hyaṁtime vyādhajanmani
अब मैं तुम्हारी सत्कुलीनता के भी कारण बताता हूँ। जब तुम अन्तिम व्याध-जन्म में गौड़देशीय थे,
श्लोक 38 (skanda.2.169.38)
स्वकर्मनिरते क्रूरे विपिने कण्टकाविले । तिष्ठत्येवं दयाहीने सर्वभूतांतके पथि
svakarmanirate krūre vipine kaṇṭakāvile tiṣṭhatyevaṁ dayāhīne sarvabhūtāṁtake pathi
अपने ही क्रूर कर्म में लगे हुए, काँटों से भरे उस वन में, दयारहित, सब भूतों के लिए यमराज-सम, मार्ग पर खड़े रहते हुए —
श्लोक 39 (skanda.2.169.39)
वैश्यावाजग्मतुर्दिव्यौ धनाढ्यौ घर्मपीडितौ । मुनिश्च कर्षणोनाम वेदवेदांगपारगः
vaiśyāvājagmaturdivyau dhanāḍhyau gharmapīḍitau muniśca karṣaṇonāma vedavedāṁgapāragaḥ
वहाँ धनाढ्य, तेजस्वी, गर्मी से पीड़ित दो वैश्य आये; और वेद-वेदांगों में पारंगत, जटा-चीर धारण करने वाले, पुण्यात्मा, कमण्डलुधारी कर्षण नामक मुनि भी आये।
श्लोक 40 (skanda.2.169.40)
जटाचीरधरः पुण्यः कमण्डलुपरिग्रहः । तान्दृष्ट्वा धनुरादाय मार्गं रुद्ध्वा व्यवस्थितः
jaṭācīradharaḥ puṇyaḥ kamaṇḍaluparigrahaḥ tāndṛṣṭvā dhanurādāya mārgaṁ ruddhvā vyavasthitaḥ
उन्हें देखकर तुमने धनुष उठाकर मार्ग रोक दिया,
श्लोक 41 (skanda.2.169.41)
अनुद्रुत्य शरी वैश्यौ कृत्वा छिन्नशरीरकौ । तयोरेकं च त्वं हत्वा गृहीत्वाऽखिल तत्पणम्
anudrutya śarī vaiśyau kṛtvā chinnaśarīrakau tayorekaṁ ca tvaṁ hatvā gṛhītvā’khila tatpaṇam
बाणों से पीछा करके दोनों वैश्यों के शरीर को घायल किया, उनमें से एक को मारकर उसका सारा धन ले लिया।
श्लोक 42 (skanda.2.169.42)
अपरं हन्तुमुद्युक्ते स दुद्राव भयाद्द्रुतम् । पणं गुल्मे विनिक्षिप्य भीतः प्राणपरीप्सकः
aparaṁ hantumudyukte sa dudrāva bhayāddrutam paṇaṁ gulme vinikṣipya bhītaḥ prāṇaparīpsakaḥ
जब तुम दूसरे को मारने को उद्यत हुए, तो वह भय से तेज़ी से भाग गया, प्राण बचाने की इच्छा से भयभीत होकर अपना धन एक झाड़ी में फेंककर।
श्लोक 43 (skanda.2.169.43)
कर्षणोऽपि मुनिः शीघ्रं व्याधान्मृतिविशंकया । आतपे धावमानः संस्तृषाघर्मप्रपीडितः
karṣaṇo’pi muniḥ śīghraṁ vyādhānmṛtiviśaṁkayā ātape dhāvamānaḥ saṁstṛṣāgharmaprapīḍitaḥ
कर्षण मुनि भी व्याध से मृत्यु की आशंका से शीघ्र भागे, धूप में दौड़ते हुए, प्यास और गर्मी से अत्यंत पीड़ित,
श्लोक 44 (skanda.2.169.44)
मूर्च्छामाप गलत्स्वेदः संज्ञामात्रावशेषितः । विहायैनं दुद्रुवे च वैश्यो जीवनतत्परः
mūrcchāmāpa galatsvedaḥ saṁjñāmātrāvaśeṣitaḥ vihāyainaṁ dudruve ca vaiśyo jīvanatatparaḥ
पसीने से तरबतर होकर मूर्च्छित हो गये, केवल चेतना-मात्र शेष रह गई; और जीवन-रक्षा में तत्पर वह वैश्य उन्हें छोड़कर भाग गया।
श्लोक 45 (skanda.2.169.45)
त्वं तावनुद्रुतौ दृष्ट्वा मूर्छितं पथि भूसुरम् । पणं कुत्र विनिक्षिप्तं कियद्दूरं गतो वणिक्
tvaṁ tāvanudrutau dṛṣṭvā mūrchitaṁ pathi bhūsuram paṇaṁ kutra vinikṣiptaṁ kiyaddūraṁ gato vaṇik
तुमने उन दोनों का पीछा करते हुए मार्ग में मूर्च्छित उस ब्राह्मण को देखा और पूछा — 'धन कहाँ फेंका गया? वणिक् कितनी दूर गया है?'
श्लोक 46 (skanda.2.169.46)
इति पृष्टं द्विजं श्रांतमुज्जीवयितुमुद्यतः । फूत्कृत्वा कर्णयोस्तस्य नागरं स्मृतिकारणम्
iti pṛṣṭaṁ dvijaṁ śrāṁtamujjīvayitumudyataḥ phūtkṛtvā karṇayostasya nāgaraṁ smṛtikāraṇam
इस प्रकार पूछे गये उस थके हुए ब्राह्मण को पुनर्जीवित करने के लिए तुमने उसके कानों में फूँक मारी, स्मृति लौटाने हेतु नागर (सोंठ) आदि का प्रयोग किया,
श्लोक 47 (skanda.2.169.47)
पल्वलस्थोदकेनैव कृमिकर्दमसंयुजा । नेत्रे संमृज्य श्रांतस्य पर्णैः संवीज्य तन्मुखे
palvalasthodakenaiva kṛmikardamasaṁyujā netre saṁmṛjya śrāṁtasya parṇaiḥ saṁvījya tanmukhe
और गड्ढे के कीड़े-मिट्टी मिले जल से ही उस थके हुए के नेत्र पोंछे, तथा पत्तों से उसके मुख पर हवा की।
श्लोक 48 (skanda.2.169.48)
ससंज्ञं च मुनिं कृत्वा त्वमात्थ स्वस्थमानसः । मा शंका ते मुने कार्या मत्तः शस्त्रभृतो वने
sasaṁjñaṁ ca muniṁ kṛtvā tvamāttha svasthamānasaḥ mā śaṁkā te mune kāryā mattaḥ śastrabhṛto vane
मुनि को पुनः सचेत करके, स्वस्थचित्त होकर तुमने कहा — 'हे मुने, तुम्हें मुझसे भय नहीं करना चाहिए, यद्यपि मैं वन में शस्त्रधारी हूँ।
श्लोक 49 (skanda.2.169.49)
निष्किंचनः सुखी लोके कुतस्ते भयमुल्बणम् । भिन्नपात्रेण जीर्णेन न मे किंचिद्भविष्यति
niṣkiṁcanaḥ sukhī loke kutaste bhayamulbaṇam bhinnapātreṇa jīrṇena na me kiṁcidbhaviṣyati
निष्किंचन व्यक्ति संसार में सुखी रहता है — तुम्हें इतना अधिक भय क्यों? टूटे-फूटे बर्तन से मुझे कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।
श्लोक 50 (skanda.2.169.50)
एतावद्वद मे विद्वन्वणिक्कुत्र पलायितः । कुत्र गुल्मे धनं क्षिप्तं तेन शीघ्रं पलायता
etāvadvada me vidvanvaṇikkutra palāyitaḥ kutra gulme dhanaṁ kṣiptaṁ tena śīghraṁ palāyatā
केवल इतना बताओ हे विद्वान् — वणिक् कहाँ भागा? झाड़ी में उसने धन कहाँ फेंका, वह जल्दी में भागते हुए?
श्लोक 51 (skanda.2.169.51)
अन्यथा त्वां हनिष्यामि यदि मिथ्या वदिष्यसि । कर्षण उवाच । धनं गुल्मे विनिक्षिप्तं मार्गादस्मात्पलायितः
anyathā tvāṁ haniṣyāmi yadi mithyā vadiṣyasi karṣaṇa uvāca dhanaṁ gulme vinikṣiptaṁ mārgādasmātpalāyitaḥ
अन्यथा, यदि तुम झूठ बोलोगे तो मैं तुम्हें मार डालूँगा।' कर्षण ने कहा — 'धन झाड़ी में फेंका गया है; वह इस मार्ग से भाग गया है —
श्लोक 52 (skanda.2.169.52)
इति प्राह भयात्सोपि पृष्टः प्राणपरीप्सया। गच्छ विप्र सुखं मार्गं मत्तो भीतिं विहाय व
iti prāha bhayātsopi pṛṣṭaḥ prāṇaparīpsayā gaccha vipra sukhaṁ mārgaṁ matto bhītiṁ vihāya va
इस प्रकार भय के कारण प्राण बचाने की इच्छा से पूछे जाने पर उसने कहा। [व्याध ने कहा:] 'हे विप्र, मुझसे भय त्यागकर सुखपूर्वक अपने मार्ग जाओ।
श्लोक 53 (skanda.2.169.53)
इतो विदूरे सलिलं तडागे वर्तते शुभम् । तत्पीत्वा सलिलं पुण्यं गच्छ ग्रामं गतश्रमः
ito vidūre salilaṁ taḍāge vartate śubham tatpītvā salilaṁ puṇyaṁ gaccha grāmaṁ gataśramaḥ
यहाँ से थोड़ी दूर एक तालाब में शुभ जल है; वह पुण्य जल पीकर, थकान मिटाकर गाँव को जाओ।
श्लोक 54 (skanda.2.169.54)
अधुनैवागमिष्यंति राजकीयाः पथा जनाः । मत्पदान्वेषणे सक्ताः श्रुत्वा रावं वणिक्पतेः
adhunaivāgamiṣyaṁti rājakīyāḥ pathā janāḥ matpadānveṣaṇe saktāḥ śrutvā rāvaṁ vaṇikpateḥ
अभी ही राजा के लोग इस मार्ग पर आ जायेंगे, वणिक्पति की पुकार सुनकर मेरा पीछा करने में लगे हुए।
श्लोक 55 (skanda.2.169.55)
तृषार्तमनुगंतुं मे न शक्यं त्वां ततो द्विज । वीजयानेन पर्णेन घर्मः किंचिद्गमिष्यति
tṛṣārtamanugaṁtuṁ me na śakyaṁ tvāṁ tato dvija vījayānena parṇena gharmaḥ kiṁcidgamiṣyati
हे द्विज, प्यास से पीड़ित मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकता; परन्तु इस पत्ते से हवा करने से तुम्हारी गर्मी कुछ कम हो जायेगी।'
श्लोक 56 (skanda.2.169.56)
तस्मै दत्त्वा पलाशं च त्वमागा विपिनं पुनः । तेन पुण्यप्रभावेन वैशाखे घर्मघर्घरे
tasmai dattvā palāśaṁ ca tvamāgā vipinaṁ punaḥ tena puṇyaprabhāvena vaiśākhe gharmagharghare
उसे ताड़-पत्र देकर तुम पुनः वन में चले गये। उसी पुण्य के प्रभाव से, वैशाख की उस भीषण गर्मी में —
श्लोक 57 (skanda.2.169.57)
स्वकार्यार्थं कृतेनापि मुनेस्त्राणाय पद्धतौ । जन्मासीत्ते महापुण्ये राजवंशेऽतिविस्तृते
svakāryārthaṁ kṛtenāpi munestrāṇāya paddhatau janmāsītte mahāpuṇye rājavaṁśe’tivistṛte
अपने ही स्वार्थ से किये गये कार्य से भी मुनि की रक्षा हो गई — इसी से, हे महामते, तुम्हें इस अत्यंत विस्तृत, महापुण्य राजवंश में जन्म प्राप्त हुआ।
श्लोक 58 (skanda.2.169.58)
यदीच्छसि सुखं राज्यं धनधान्यादिसंपदः । स्वर्गापवर्गौ यदि वा सायुज्यं वा हरेः पदम्
yadīcchasi sukhaṁ rājyaṁ dhanadhānyādisaṁpadaḥ svargāpavargau yadi vā sāyujyaṁ vā hareḥ padam
यदि तुम सुखी राज्य, धन-धान्यादि सम्पदा, अथवा स्वर्ग-मोक्ष, या हरि का सायुज्य अथवा उनका परमपद चाहते हो,
श्लोक 59 (skanda.2.169.59)
कुरु वैशाखधर्मांस्त्वं सर्वसौख्यमवाप्स्यसि । मासोऽयं माधवो नाम तृतीया चाक्षयाह्वया
kuru vaiśākhadharmāṁstvaṁ sarvasaukhyamavāpsyasi māso’yaṁ mādhavo nāma tṛtīyā cākṣayāhvayā
तो वैशाख के व्रत करो, तुम्हें सम्पूर्ण सुख प्राप्त होगा। यह मास 'माधव' कहलाता है, इसकी तृतीया 'अक्षय' नाम से प्रसिद्ध है।
श्लोक 60 (skanda.2.169.60)
गां च सकृत्प्रसूताख्यां देहि विप्राय सीदते । तेन ते कोशपूर्तिः स्याच्छय्यां देहि सुखं भवेत्
gāṁ ca sakṛtprasūtākhyāṁ dehi viprāya sīdate tena te kośapūrtiḥ syācchayyāṁ dehi sukhaṁ bhavet
नई ब्याई गाय दीन ब्राह्मण को दो; उससे तुम्हारा कोष भर जायेगा। शय्या दान करो, सुख प्राप्त होगा।
श्लोक 61 (skanda.2.169.61)
कुरु च्छत्रप्रदानं च साम्राज्यं ते भविष्यति । स्नानं कुरु यथान्यायं तथैवार्चय माधवम्
kuru cchatrapradānaṁ ca sāmrājyaṁ te bhaviṣyati snānaṁ kuru yathānyāyaṁ tathaivārcaya mādhavam
छत्र-दान करो, तुम्हें साम्राज्य प्राप्त होगा। विधिपूर्वक स्नान करो और उसी प्रकार माधव का पूजन करो।
श्लोक 62 (skanda.2.169.62)
देहि त्वं प्रतिमां दिव्यां कृत्वा तेन जयो भवेत् । आत्मतुल्यगुणान्पुत्रान्यदि कामयसे नृप
dehi tvaṁ pratimāṁ divyāṁ kṛtvā tena jayo bhavet ātmatulyaguṇānputrānyadi kāmayase nṛpa
दिव्य प्रतिमा बनवाकर दान करो, उससे विजय प्राप्त होगी। हे राजन्, यदि अपने समान गुणवान पुत्र चाहते हो,
श्लोक 63 (skanda.2.169.63)
सर्वभूतहितार्थाय प्रपादानं च त्वं कुरु । वैशाखोक्तानिमान्धर्मान्सम्यगाचर भूमिप
sarvabhūtahitārthāya prapādānaṁ ca tvaṁ kuru vaiśākhoktānimāndharmānsamyagācara bhūmipa
तो सब प्राणियों के हित के लिए जलशाला (प्रपा) स्थापित करो। हे भूमिप, वैशाख में कहे गये इन धर्मों का भलीभाँति आचरण करो।
श्लोक 64 (skanda.2.169.64)
तेन ते सकला लोका वशं यांति न संशयः । निष्कामकेन चित्तेन यदि धर्मान्करिष्यसि
tena te sakalā lokā vaśaṁ yāṁti na saṁśayaḥ niṣkāmakena cittena yadi dharmānkariṣyasi
इससे सम्पूर्ण जगत् तुम्हारे वश में आ जायेगा, इसमें संशय नहीं — यदि तुम निष्काम चित्त से इन धर्मों का पालन करोगे।
श्लोक 65 (skanda.2.169.65)
वैशाखे पुण्यमासेऽस्मिन्प्रीतये मधुघातिनः । प्रत्यक्षो भविता विष्णुस्तवनिर्मलचेतसः
vaiśākhe puṇyamāse’sminprītaye madhughātinaḥ pratyakṣo bhavitā viṣṇustavanirmalacetasaḥ
इस पुण्यमय वैशाख मास में, मधु के नाशक की प्रसन्नता के लिए, विशुद्ध चित्त वाले तुम्हें विष्णु स्वयं साक्षात् दर्शन देंगे।
श्लोक 66 (skanda.2.169.66)
येन चाचरिताः पुंसा धर्माह्येते शुभावहाः । तेषां च ह्यक्षया लोकाः पुराणे कवयो विदुः
yena cācaritāḥ puṁsā dharmāhyete śubhāvahāḥ teṣāṁ ca hyakṣayā lokāḥ purāṇe kavayo viduḥ
जिस पुरुष ने ये शुभदायी धर्म आचरित किये, पुराण में कवियों ने कहा है कि उसके लिए अक्षय लोक प्राप्त होते हैं।
श्लोक 67 (skanda.2.169.67)
एतत्सर्वं तव प्रोक्तं यथादृष्टं यथाश्रुतम् । इति राजानमामंत्र्य ब्राह्मणौ च पुरोधसौ
etatsarvaṁ tava proktaṁ yathādṛṣṭaṁ yathāśrutam iti rājānamāmaṁtrya brāhmaṇau ca purodhasau
यह सब तुम्हें यथा-दृष्ट और यथा-श्रुत बताया गया।' — इस प्रकार राजा से विदा लेकर वे दोनों पुरोहित ब्राह्मण,
श्लोक 68 (skanda.2.169.68)
याजोपयाजकौनाम जग्मतुस्तौ यथागतौ । ततो राजा महावीर्यः पुरोधोभ्यां च बोधितः
yājopayājakaunāma jagmatustau yathāgatau tato rājā mahāvīryaḥ purodhobhyāṁ ca bodhitaḥ
याज और उपयाज नामक, जिस प्रकार आये थे उसी प्रकार चले गये। तब महापराक्रमी राजा, दोनों पुरोहितों द्वारा बोध प्राप्त करके,
श्लोक 69 (skanda.2.169.69)
वैशाखधर्मात्सकलांश्चकार श्रद्धयाऽन्वितः । यथोपदिष्टं च तथा मधुसूदनमर्चयत्
vaiśākhadharmātsakalāṁścakāra śraddhayā’nvitaḥ yathopadiṣṭaṁ ca tathā madhusūdanamarcayat
श्रद्धापूर्वक वैशाख के सभी धर्मों का पालन करने लगा, और यथा-उपदिष्ट विधि से मधुसूदन का पूजन किया।
श्लोक 70 (skanda.2.169.70)
ततो लब्धप्रभावः सन्बंधुभिः सकलैर्वृतः । पांचालनगरीं प्राप हतशेषबलान्वितः
tato labdhaprabhāvaḥ sanbaṁdhubhiḥ sakalairvṛtaḥ pāṁcālanagarīṁ prāpa hataśeṣabalānvitaḥ
तब प्रभाव प्राप्त करके, सभी बन्धुजनों से घिरा हुआ, अपनी बची हुई सेना सहित वह पांचाल नगरी में पहुँचा।
श्लोक 71 (skanda.2.169.71)
ततस्तु शत्रवो भूपा उपश्रुत्य च भूपतेः । प्रवेशं च पुरस्याऽथ पुनराजग्मुरुद्धताः
tatastu śatravo bhūpā upaśrutya ca bhūpateḥ praveśaṁ ca purasyā’tha punarājagmuruddhatāḥ
तब शत्रु राजाओं ने राजा के नगर-प्रवेश की बात सुनकर पुनः उद्दंडतापूर्वक आक्रमण किया।
श्लोक 72 (skanda.2.169.72)
तदा पांचालभूपेन नृपाणामभवद्रणम्। जिग्ये सर्वान्महाबाहूनेक एव महारथः
tadā pāṁcālabhūpena nṛpāṇāmabhavadraṇam jigye sarvānmahābāhūneka eva mahārathaḥ
तब पांचाल-नरेश और उन राजाओं के बीच युद्ध हुआ। उस महारथी ने अकेले ही सब महाबाहु राजाओं को जीत लिया।
श्लोक 73 (skanda.2.169.73)
पलायितेषु भूपेषु नानादेशपथिष्वपि । राज्ञां कोशगजानश्वान्स्वयं जग्राह वीर्यवान्
palāyiteṣu bhūpeṣu nānādeśapathiṣvapi rājñāṁ kośagajānaśvānsvayaṁ jagrāha vīryavān
राजाओं के नाना देशों के मार्गों से भाग जाने पर, उस पराक्रमी ने स्वयं ही उनके कोष, हाथी और घोड़े ले लिये।
श्लोक 74 (skanda.2.169.74)
अश्वानां निर्बुदं चैव गजानां च त्रिकोटिकम् । रथानामर्बुदं चैव दीर्घग्रीवायुतं तथा
aśvānāṁ nirbudaṁ caiva gajānāṁ ca trikoṭikam rathānāmarbudaṁ caiva dīrghagrīvāyutaṁ tathā
दस अरब घोड़े, तीन करोड़ हाथी, एक अरब रथ, तथा दस हजार लम्बी-गर्दन वाले (ऊँट),
श्लोक 75 (skanda.2.169.75)
रासभाणां त्रिलक्षाणि प्रापयामास तां पुरीम् । वैशाखधर्ममाहात्म्यात्क्षणात्सर्वे च भूभृतः
rāsabhāṇāṁ trilakṣāṇi prāpayāmāsa tāṁ purīm vaiśākhadharmamāhātmyātkṣaṇātsarve ca bhūbhṛtaḥ
और तीन लाख गधे उस नगरी में मंगवाये। वैशाख-धर्म के माहात्म्य से क्षणभर में ही सभी वे राजा —
श्लोक 76 (skanda.2.169.76)
करदा भग्नसंकल्पाः पादाक्रांता बभूविरे । सुभिक्षमतुलं चासीत्पांचालविषयेषु च
karadā bhagnasaṁkalpāḥ pādākrāṁtā babhūvire subhikṣamatulaṁ cāsītpāṁcālaviṣayeṣu ca
कर देने वाले बन गये, उनका संकल्प टूट गया, वे उसके चरणों में झुक गये। पांचाल देश में अतुल सुभिक्ष हो गया।
श्लोक 77 (skanda.2.169.77)
एकच्छत्रमभूद्राज्यं प्रसादान्मधुघातिनः । पुत्राः पंचाऽपि तस्यासञ्च्छौर्य्यौदार्यगुणान्विताः
ekacchatramabhūdrājyaṁ prasādānmadhughātinaḥ putrāḥ paṁcā’pi tasyāsañcchauryyaudāryaguṇānvitāḥ
मधु के नाशक की कृपा से उसका राज्य एकच्छत्र हो गया; उसके पाँचों पुत्र भी शौर्य और औदार्य गुणों से युक्त हुए —
श्लोक 78 (skanda.2.169.78)
धृष्टकीर्तिर्धृष्टकेतुर्धृष्टद्युम्नस्तथाऽपरे । विजयश्चित्रकेतुश्च मयूरध्वजसन्निभाः
dhṛṣṭakīrtirdhṛṣṭaketurdhṛṣṭadyumnastathā’pare vijayaścitraketuśca mayūradhvajasannibhāḥ
धृष्टकीर्ति, धृष्टकेतु, धृष्टद्युम्न, तथा अन्य विजय और चित्रकेतु — मयूरध्वज के समान तेजस्वी।
श्लोक 79 (skanda.2.169.79)
अनुरक्ताः प्रजाश्चासन्धर्मेण प्रतिपालिताः । वैशाखस्य प्रतापेन प्रत्ययस्तत्क्षणादभूत्
anuraktāḥ prajāścāsandharmeṇa pratipālitāḥ vaiśākhasya pratāpena pratyayastatkṣaṇādabhūt
प्रजाएँ उसमें अनुरक्त होकर धर्मपूर्वक पालित हुईं। वैशाख के प्रताप से यह उसी क्षण प्रत्यक्ष सिद्ध हो गया।
श्लोक 80 (skanda.2.169.80)
पुनश्चकार तान्धर्मान्पांचालनगरीश्वरः । अकामुकेन चित्तेन प्रीतये मधुघातिनः
punaścakāra tāndharmānpāṁcālanagarīśvaraḥ akāmukena cittena prītaye madhughātinaḥ
पांचाल-नगरी के उस स्वामी ने पुनः निष्काम चित्त से मधु के नाशक की प्रसन्नता के लिए वे ही धर्म किये।
श्लोक 81 (skanda.2.169.81)
धर्मेणानेन संतुष्टो भगवान्मधुसूदनः । अक्षयायां तृतीयायां प्रत्यक्षः समजायत
dharmeṇānena saṁtuṣṭo bhagavānmadhusūdanaḥ akṣayāyāṁ tṛtīyāyāṁ pratyakṣaḥ samajāyata
इस धर्माचरण से संतुष्ट होकर भगवान् मधुसूदन अक्षय तृतीया के दिन साक्षात् प्रकट हुए।
श्लोक 82 (skanda.2.169.82)
तं दृष्ट्वा विस्मितो भूत्वा परमात्मानमच्युतम् । नारायणं चतुर्बाहुं शंखचकगदाधरम्
taṁ dṛṣṭvā vismito bhūtvā paramātmānamacyutam nārāyaṇaṁ caturbāhuṁ śaṁkhacakagadādharam
उन्हें देखकर विस्मित होकर — अच्युत, चतुर्भुज, शंख-चक्र-गदाधारी नारायण को,
श्लोक 83 (skanda.2.169.83)
पीतांबरधरं देवं वनमालाविभूषितम् । सलक्ष्मीकं सानुगं च गरुडोपरि संस्थितम्
pītāṁbaradharaṁ devaṁ vanamālāvibhūṣitam salakṣmīkaṁ sānugaṁ ca garuḍopari saṁsthitam
पीताम्बरधारी, वनमाला से विभूषित, लक्ष्मी तथा अनुचरों सहित गरुड़ पर आरूढ़ उस देवता को —
श्लोक 84 (skanda.2.169.84)
निरीक्ष्य दुःसहं तेजः सद्यो मीलितलोचनः । उत्पतन्संपतन्हर्षान्मत्तोन्मत्त इव भ्रमन्
nirīkṣya duḥsahaṁ tejaḥ sadyo mīlitalocanaḥ utpatansaṁpatanharṣānmattonmatta iva bhraman
उस असहनीय तेज को देखकर वह तुरन्त नेत्र मूँद बैठा; हर्ष से उछलता-गिरता, वह उन्मत्त-सा भटकने लगा,
श्लोक 85 (skanda.2.169.85)
पुलकांकितसर्वांगो गलद्वाष्पाकुलेक्षणः । तुष्टाव परया भक्त्या प्रांजलिः प्रणतो भुवि
pulakāṁkitasarvāṁgo galadvāṣpākulekṣaṇaḥ tuṣṭāva parayā bhaktyā prāṁjaliḥ praṇato bhuvi
उसका सारा शरीर रोमांचित हो उठा, नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी; हाथ जोड़कर, भूमि पर प्रणत होकर उसने परम भक्ति से उनकी स्तुति की।