वैष्णव खण्ड · अध्याय 170
पांचालाधिपति की सायुज्यप्राप्ति
श्लोक 1 (skanda.2.170.1)
श्रुतदेव उवाच । तद्दर्शनाह्लादपरिप्लुताशयः सद्यः समुत्थाय ननाम मूर्ध्ना । चिरं निरीक्ष्याऽऽकुललोचनो ह्यमुं विश्वात्मदेवं जगतामधीशम्
śrutadeva uvāca taddarśanāhlādapariplutāśayaḥ sadyaḥ samutthāya nanāma mūrdhnā ciraṁ nirīkṣyā’’kulalocano hyamuṁ viśvātmadevaṁ jagatāmadhīśam
श्रुतदेव ने कहा — उस दर्शन के आनन्द से हृदय आप्लावित होकर, राजा तत्काल उठकर सिर झुकाकर प्रणाम करने लगा; चिरकाल तक उस विश्वात्मा, जगदीश्वर को व्याकुल नेत्रों से निहारते हुए,
श्लोक 2 (skanda.2.170.2)
दधार पादाववनिज्य तज्जलं यत्पादजाऽऽब्रह्म जगत्पुनाति । समर्चयामास महाविभूतिभिर्महार्हवस्त्राभरणानुलेपनैः
dadhāra pādāvavanijya tajjalaṁ yatpādajā’’brahma jagatpunāti samarcayāmāsa mahāvibhūtibhirmahārhavastrābharaṇānulepanaiḥ
उसने उनके चरण धोकर वह जल धारण किया, जिससे उत्पन्न [गंगा] ब्रह्मलोक तक के सम्पूर्ण जगत् को पवित्र करती है; तत्पश्चात् उसने महान् ऐश्वर्यों, बहुमूल्य वस्त्रों, आभूषणों और अनुलेपनों से उनका पूजन किया,
श्लोक 3 (skanda.2.170.3)
स्रग्धूपदीपामृतभक्षणादिभिस्त्वग्गात्रवित्तात्मसमर्पणेन । तुष्टाव विष्णुं पुरुषं पुराणं नारायणं निर्गुणमद्वितीयम्
sragdhūpadīpāmṛtabhakṣaṇādibhistvaggātravittātmasamarpaṇena tuṣṭāva viṣṇuṁ puruṣaṁ purāṇaṁ nārāyaṇaṁ nirguṇamadvitīyam
माला, धूप, दीप, अमृत-तुल्य नैवेद्य आदि से, तथा अपनी त्वचा, शरीर, धन और आत्मा को अर्पित करके — उसने पुरातन पुरुष, निर्गुण, अद्वितीय नारायण विष्णु की स्तुति की —
श्लोक 4 (skanda.2.170.4)
निरंजनं विश्वसृजामधीशं वन्दे परं पद्मभवादिवंदितम् । यन्मायया तत्त्वविदुत्तमा जना विमोहिता विश्वसृजामधीश्वरम्
niraṁjanaṁ viśvasṛjāmadhīśaṁ vande paraṁ padmabhavādivaṁditam yanmāyayā tattvaviduttamā janā vimohitā viśvasṛjāmadhīśvaram
'मैं उस निष्कलंक, विश्व के स्रष्टाओं के भी अधीश्वर को नमन करता हूँ, जो कमल-जन्मा ब्रह्मा आदि द्वारा भी वन्दित हैं — जिनकी माया से बड़े-बड़े तत्त्वज्ञ भी मोहित हो जाते हैं — उन विश्व-स्रष्टाओं के स्वामी को।
श्लोक 5 (skanda.2.170.5)
मुह्यंति मायाचरितेषु मूढा गुणेषु चित्रं भगवद्विचेष्टितम् । अनीह एतद्बहुधैक आत्मना सृजत्यवत्यत्ति न सज्जतेऽप्यथ
muhyaṁti māyācariteṣu mūḍhā guṇeṣu citraṁ bhagavadviceṣṭitam anīha etadbahudhaika ātmanā sṛjatyavatyatti na sajjate’pyatha
मूढ़ जन माया के आचरण में, गुणों में मोहित होते हैं — भगवान की लीला कैसी विचित्र है! इच्छारहित होते हुए भी वे एक होकर अनेक रूप से इस जगत् को रचते, पालते, संहारते हैं, फिर भी उसमें आसक्त नहीं होते।
श्लोक 6 (skanda.2.170.6)
समस्तदेवासुरसौख्यदुःखप्राप्त्यै भवान्पूर्णमनोरथोऽपि । तत्राऽपि काले स्वजनाभिगुप्त्यै बिभर्षि सत्त्वं खलनिग्रहाय
samastadevāsurasaukhyaduḥkhaprāptyai bhavānpūrṇamanoratho’pi tatrā’pi kāle svajanābhiguptyai bibharṣi sattvaṁ khalanigrahāya
समस्त देवों और असुरों को सुख-दुःख प्रदान करने के लिए, हे पूर्णकाम प्रभु, आप उस अवसर पर भी अपने भक्तों की रक्षा के लिए, दुष्टों के दमन हेतु सत्त्वगुण धारण करते हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.170.7)
तमोगुणं राक्षस बन्धनाय रजोगुणं निर्गुण विश्वमूर्ते । दिष्ट्या त्वदंघ्रिः प्रणताघनाशनस्तीर्थास्पदं हृदि धृतः सुविपक्वयोगैः
tamoguṇaṁ rākṣasa bandhanāya rajoguṇaṁ nirguṇa viśvamūrte diṣṭyā tvadaṁghriḥ praṇatāghanāśanastīrthāspadaṁ hṛdi dhṛtaḥ suvipakvayogaiḥ
राक्षसों के बन्धन के लिए तमोगुण, [सृष्टि हेतु] रजोगुण धारण करते हैं, हे निर्गुण विश्वमूर्ते! सौभाग्य से आपका चरण, जो प्रणत जनों के पाप का नाश करने वाला और समस्त तीर्थों का आधार है, परिपक्व योगियों द्वारा हृदय में धारण किया जाता है।
श्लोक 8 (skanda.2.170.8)
उत्सिक्तभक्त्युपहृताशय जीवभावाः प्रापुर्गतिं तव पदस्मृतिमात्रतो ये । भवाख्यकालोरगपाशबन्धः पुनःपुनर्जन्मजरादिदुःखैः
utsiktabhaktyupahṛtāśaya jīvabhāvāḥ prāpurgatiṁ tava padasmṛtimātrato ye bhavākhyakāloragapāśabandhaḥ punaḥpunarjanmajarādiduḥkhaiḥ
जिन जीवों ने उमड़ती हुई भक्ति से अपना हृदय अर्पित करके केवल आपके चरणों का स्मरण मात्र करके परम गति पायी है — [अन्य तो] संसार नामक काल के सर्प-पाश में बँधे हुए बार-बार जन्म-जरा आदि दुःख भोगते हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.170.9)
भ्रमामि योनिष्वहमाखुभक्ष्यवत्प्रवृद्धतर्षस्तव पादविस्मृतेः । नूनं न दत्तं न च ते कथा श्रुता न साधवो जातु मयाऽपि सेविताः
bhramāmi yoniṣvahamākhubhakṣyavatpravṛddhatarṣastava pādavismṛteḥ nūnaṁ na dattaṁ na ca te kathā śrutā na sādhavo jātu mayā’pi sevitāḥ
मैं आपके चरणों को भूलकर, चूहे के समान चारे के लोभ में बढ़ती हुई तृष्णा के साथ योनियों में भटक रहा हूँ। निश्चय ही मैंने न कभी दान दिया, न आपकी कथा सुनी, न कभी साधुओं की सेवा की।
श्लोक 10 (skanda.2.170.10)
तेनारिभिर्ध्वस्तपरार्ध्यलक्ष्मीर्वनं प्रविष्टः स्वगुरुह्यघं स्मरन् । स्मृतौ च तौ मां समुपेत्य दुःखात्संबोधयांचक्रतुरार्तबंधू
tenāribhirdhvastaparārdhyalakṣmīrvanaṁ praviṣṭaḥ svaguruhyaghaṁ smaran smṛtau ca tau māṁ samupetya duḥkhātsaṁbodhayāṁcakraturārtabaṁdhū
इसीलिए शत्रुओं द्वारा मेरी महान् सम्पदा नष्ट हुई और मैं अपने पाप का स्मरण करते हुए वन में प्रविष्ट हुआ। तब उन दोनों [गुरुजनों] ने मुझ दुःखी के पास आकर मुझे बोध दिया — वे आर्तों के सच्चे बन्धु हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.170.11)
वैशाखधर्मैः श्रुतिचोदितैः शुभैः स्वर्गापवर्गादि पुमर्थहेतुभिः । तद्बोधतोऽहं कृतवान्समस्ताञ्च्छुभावहान्माधवमासधर्मान्
vaiśākhadharmaiḥ śruticoditaiḥ śubhaiḥ svargāpavargādi pumarthahetubhiḥ tadbodhato’haṁ kṛtavānsamastāñcchubhāvahānmādhavamāsadharmān
शास्त्र द्वारा उपदिष्ट शुभ वैशाख-धर्मों से, जो स्वर्ग-मोक्ष आदि पुरुषार्थों के हेतु हैं — उनके उस उपदेश से मैंने माधव मास के उन सब शुभदायी धर्मों का पालन किया।
श्लोक 12 (skanda.2.170.12)
तस्मादभून्मे परमः प्रसादस्तेनाखिलाः संपद ऊर्जिता इमाः । नाग्निर्न सूर्यो न च चन्द्रतारका न भूर्जलं खं श्वसनोऽथ वाङ्मनः
tasmādabhūnme paramaḥ prasādastenākhilāḥ saṁpada ūrjitā imāḥ nāgnirna sūryo na ca candratārakā na bhūrjalaṁ khaṁ śvasano’tha vāṅmanaḥ
उसी से मुझ पर आपकी परम कृपा हुई, और उसी से ये सब समृद्ध सम्पदाएँ प्राप्त हुईं। न अग्नि, न सूर्य, न चन्द्र-तारे, न पृथ्वी, जल, आकाश, वायु और न वाणी-मन ही —
श्लोक 13 (skanda.2.170.13)
उपासितास्तेऽपि हरत्यघं चिराद्विपश्चितो घ्नन्ति मुहूर्तसेवया । यान्मन्यसे त्वं भविनोऽपि भूरिशस्त्यक्तेषणांस्त्वत्पदन्यस्तचित्तान्
upāsitāste’pi haratyaghaṁ cirādvipaścito ghnanti muhūrtasevayā yānmanyase tvaṁ bhavino’pi bhūriśastyakteṣaṇāṁstvatpadanyastacittān
— इनकी उपासना करने पर भी वे पाप को चिरकाल में हरते हैं, जबकि विद्वान् जन क्षणभर की सेवा से ही उसे नष्ट कर देते हैं — वे जिन्हें आप कृपापात्र मानते हैं, संसारी होते हुए भी, इच्छाओं का त्याग करके जिन्होंने अपना चित्त आपके चरणों में लगा दिया है।
श्लोक 14 (skanda.2.170.14)
नमः स्वतंत्राय विचित्रकर्मणे नमः परस्मै सदनुग्रहाय । त्वन्मायया मोहितोऽहं गुणेषु दारार्थरूपेषु भ्रमाम्यनर्थदृक्
namaḥ svataṁtrāya vicitrakarmaṇe namaḥ parasmai sadanugrahāya tvanmāyayā mohito’haṁ guṇeṣu dārārtharūpeṣu bhramāmyanarthadṛk
स्वतंत्र, विचित्र कर्मों वाले आपको नमस्कार है; सदा अनुग्रह करने वाले परम पुरुष को नमस्कार है। आपकी माया से मोहित होकर मैं स्त्री, धन, रूप आदि गुणों में अनर्थदर्शी होकर भटकता हूँ।
श्लोक 15 (skanda.2.170.15)
त्वत्पादपद्मे सति मूलनाशने समस्तपापापहरं सुनिर्मलम् । सुखेच्छयानर्थनिदानभूतैः सुतात्मदारैर्ममताभियुक्तः
tvatpādapadme sati mūlanāśane samastapāpāpaharaṁ sunirmalam sukhecchayānarthanidānabhūtaiḥ sutātmadārairmamatābhiyuktaḥ
आपके चरण-कमल के रहते हुए, जो समस्त पापों को हरने वाला, अत्यंत निर्मल और मूल-नाशक है, फिर भी सुख की इच्छा से पुत्र, शरीर और स्त्री में — जो अनर्थ के ही मूल कारण हैं — ममता से बँधा रहता है,
श्लोक 16 (skanda.2.170.16)
न क्वापि निद्रां लभते न शर्म प्रवृद्धतर्षः पुनरेव तस्मिन् । लब्ध्वा दुरापं नरदेवजन्म त्वं यत्नतः सर्वपुमर्थहेतुः
na kvāpi nidrāṁ labhate na śarma pravṛddhatarṣaḥ punareva tasmin labdhvā durāpaṁ naradevajanma tvaṁ yatnataḥ sarvapumarthahetuḥ
वह कहीं भी न नींद पाता है, न सुख — उसी में उसकी तृष्णा बार-बार बढ़ती रहती है। मनुष्य-जन्म जैसा दुर्लभ जन्म पाकर भी, आप ही यत्नपूर्वक सब पुरुषार्थों के कारण हैं, [फिर भी वह आपकी ओर नहीं जाता]।
श्लोक 17 (skanda.2.170.17)
पदारविन्दं न भजामि देव संमूढचेता विषयेषु लालसः । करोमि कर्माणि सुनिष्ठितः सन्प्रवृद्धतर्षस्तदपेक्षया ददत्
padāravindaṁ na bhajāmi deva saṁmūḍhacetā viṣayeṣu lālasaḥ karomi karmāṇi suniṣṭhitaḥ sanpravṛddhatarṣastadapekṣayā dadat
हे देव, मोहग्रस्त चित्त और विषयों में लालायित होकर मैं आपके चरण-कमल का भजन नहीं करता; निष्ठापूर्वक कर्म करता हुआ, तृष्णा से बढ़ता हुआ, मैं उसी की अपेक्षा से दान भी करता हूँ।
श्लोक 18 (skanda.2.170.18)
पुनश्च भूयामहमद्य भूयामित्येव चिन्ताशतलोलमानसः। तदैव जीवस्य भवेत्कृपा विभो दुरंतशक्तेस्तव विश्वमूर्ते
punaśca bhūyāmahamadya bhūyāmityeva cintāśatalolamānasaḥ tadaiva jīvasya bhavetkṛpā vibho duraṁtaśaktestava viśvamūrte
'मैं फिर यह बनूँ, आज वह बनूँ' — इस प्रकार सैकड़ों चिन्ताओं से चंचल मन वाला मैं रहता हूँ। हे विभो, विश्वमूर्ते, अनन्त शक्तिमान्, तभी जीव पर कृपा हो सकती है,
श्लोक 19 (skanda.2.170.19)
समागमः स्यान्महतां हि पुंसां भवांबुधिर्येन हि गोष्पदायते । सत्संगमो देव यदैव भूयात्तर्हीश देवे त्वयि जायते मतिः
samāgamaḥ syānmahatāṁ hi puṁsāṁ bhavāṁbudhiryena hi goṣpadāyate satsaṁgamo deva yadaiva bhūyāttarhīśa deve tvayi jāyate matiḥ
जब महापुरुषों का संग प्राप्त हो, जिससे यह संसार-सागर गाय के खुर के गड्ढे जितना छोटा हो जाता है; हे देव, जब भी सत्संग प्राप्त होता है, तभी हे ईश, आपमें बुद्धि उत्पन्न होती है।
श्लोक 20 (skanda.2.170.20)
समस्तराज्यापगमं हि मन्ये ह्यनुग्रहं ते मयि जातमञ्जसा । यथार्य ते ब्रह्मसुरासुराद्यैर्निवृत्ततर्षैरपि हंसयूथैः
samastarājyāpagamaṁ hi manye hyanugrahaṁ te mayi jātamañjasā yathārya te brahmasurāsurādyairnivṛttatarṣairapi haṁsayūthaiḥ
मैं अपने सम्पूर्ण राज्य के नाश को ही अपने ऊपर आपकी सहज कृपा मानता हूँ — जैसे कि हे आर्य, तृष्णारहित ब्रह्मा, देव-दानव आदि हंसतुल्य समूहों द्वारा भी आप ही [खोजे जाते हैं]।
श्लोक 21 (skanda.2.170.21)
इतः स्मराम्यच्युतमेव सादरं भवापहं पादसरोरुहं विभो । अकिंचनप्रार्थ्यममन्दभाग्यदं न कामयेऽन्यत्तव पादपद्मात्
itaḥ smarāmyacyutameva sādaraṁ bhavāpahaṁ pādasaroruhaṁ vibho akiṁcanaprārthyamamandabhāgyadaṁ na kāmaye’nyattava pādapadmāt
अब से मैं आदरपूर्वक केवल अच्युत का, संसार को दूर करने वाले उन चरण-कमलों का स्मरण करूँगा, हे विभो, जो निष्किंचनों द्वारा प्रार्थनीय और महान् भाग्य देने वाले हैं — आपके चरण-कमल के अतिरिक्त मुझे और कुछ नहीं चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.170.22)
अतो न राज्यं न सुतादिकोशं देहेन शश्वत्पतता रजोभुवा । भजामि नित्यं तदुपासितव्यं पादारविंदं मुनिभिर्विचिन्त्यम्
ato na rājyaṁ na sutādikośaṁ dehena śaśvatpatatā rajobhuvā bhajāmi nityaṁ tadupāsitavyaṁ pādāraviṁdaṁ munibhirvicintyam
इसलिए न राज्य, न पुत्र आदि कोष, न सदा नष्ट होने वाले इस मिट्टी के शरीर की — मैं तो सदा उन्हीं उपासनीय चरण-कमलों का भजन करूँगा, जिनका मुनिजन ध्यान करते हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.170.23)
प्रसीद देवेश जगन्निवास स्मृतिर्यथा स्यात्तव पादपद्मे । सक्तिः सदा गच्छतु दारकोशपुत्रात्मचिह्नेषु गणेषु मे प्रभो
prasīda deveśa jagannivāsa smṛtiryathā syāttava pādapadme saktiḥ sadā gacchatu dārakośaputrātmacihneṣu gaṇeṣu me prabho
हे देवेश, जगन्निवास, प्रसन्न होइए, जिससे मेरा स्मरण सदा आपके चरण-कमल में रहे; हे प्रभो, मेरी आसक्ति कभी भी स्त्री, कोष, पुत्र और अहंकार के चिह्नों में न जाए।
श्लोक 24 (skanda.2.170.24)
भूयान्मनः कृष्णपदारविन्दयोर्वचांसि ते दिव्यकथानुवर्णने । नेत्रे ममेमे तव विग्रहेक्षणे श्रोत्रे कथायां रसना तदर्पिते
bhūyānmanaḥ kṛṣṇapadāravindayorvacāṁsi te divyakathānuvarṇane netre mameme tava vigrahekṣaṇe śrotre kathāyāṁ rasanā tadarpite
मेरा मन सदा कृष्ण के चरण-कमलों में रहे, मेरी वाणी आपकी दिव्य कथा के वर्णन में लगी रहे; मेरे ये नेत्र आपके विग्रह के दर्शन में, कान कथा-श्रवण में, जिह्वा उसी कथा-कथन में समर्पित रहें।
श्लोक 25 (skanda.2.170.25)
घ्राणं च त्वपादसरोजसौरभे त्वद्भक्तगन्धादिविलेपने सकृत् । स्यातां च हस्तौ तव मन्दिरे विभो संमार्ज्जनादौ मम नित्यदैव
ghrāṇaṁ ca tvapādasarojasaurabhe tvadbhaktagandhādivilepane sakṛt syātāṁ ca hastau tava mandire vibho saṁmārjjanādau mama nityadaiva
मेरी घ्राण-शक्ति आपके चरण-कमलों की सुगंध में और आपके भक्तों के चन्दनादि लेपन की सुगंध में सदा लगी रहे; हे विभो, मेरे दोनों हाथ सदैव आपके मन्दिर की सफाई आदि में लगे रहें।
श्लोक 26 (skanda.2.170.26)
पादौ विभो क्षेत्रकथाऽनुसर्पणे मूर्धा च मे स्यात्तव वन्दनेऽनिशम् । कामश्च मे स्यात्तव सत्कथायां बुद्धिश्च मे स्यात्तव चिंतनेऽनिशम्
pādau vibho kṣetrakathā’nusarpaṇe mūrdhā ca me syāttava vandane’niśam kāmaśca me syāttava satkathāyāṁ buddhiśca me syāttava ciṁtane’niśam
हे विभो, मेरे पैर आपके तीर्थ-क्षेत्रों की कथा-यात्रा में चलें, मेरा सिर सदा आपकी वन्दना में झुका रहे; मेरी कामना आपकी सत्कथा में लगी रहे, मेरी बुद्धि सदा आपके चिन्तन में स्थिर रहे।
श्लोक 27 (skanda.2.170.27)
दिनानि मे स्युस्तव सत्कथोदयैरुद्गीयमानैर्मुनिभिर्गृहागतैः । हीनः प्रसंगस्तव मे न भूयात्क्षणं निमेषार्द्धमथाऽपि विष्णो
dināni me syustava satkathodayairudgīyamānairmunibhirgṛhāgataiḥ hīnaḥ prasaṁgastava me na bhūyātkṣaṇaṁ nimeṣārddhamathā’pi viṣṇo
मेरे दिन घर आये मुनियों द्वारा गाई जाने वाली आपकी सत्कथाओं के उदय से भरे रहें; हे विष्णु, क्षणभर के लिए, आधी पलक झपकने भर के लिए भी मैं आपके सम्बन्ध से रहित न होऊँ।
श्लोक 28 (skanda.2.170.28)
न पारमेष्ठ्यं न च सार्वभौमं न चापवर्गं स्पृहयामि विष्णो । त्वत्पादसेवां च सदैव कामये प्रार्थ्यां श्रिया ब्रह्मभवादिभिः सुरैः
na pārameṣṭhyaṁ na ca sārvabhaumaṁ na cāpavargaṁ spṛhayāmi viṣṇo tvatpādasevāṁ ca sadaiva kāmaye prārthyāṁ śriyā brahmabhavādibhiḥ suraiḥ
हे विष्णु, मैं न ब्रह्मपद, न सार्वभौम राज्य, न मोक्ष की भी अभिलाषा करता हूँ; मैं तो सदैव आपके चरणों की सेवा ही चाहता हूँ, जो लक्ष्मी, ब्रह्मा, शिव आदि देवों द्वारा भी प्रार्थनीय है।'
श्लोक 29 (skanda.2.170.29)
इति राज्ञा स्तुतो विष्णुः प्रसन्नः कमलेक्षणः । मेघगम्भीरया वाचा तमुवाच क्षितीश्वरम्
iti rājñā stuto viṣṇuḥ prasannaḥ kamalekṣaṇaḥ meghagambhīrayā vācā tamuvāca kṣitīśvaram
इस प्रकार राजा द्वारा स्तुति किये जाने पर कमल-नेत्र विष्णु प्रसन्न हुए, और मेघ के समान गम्भीर वाणी में उस पृथ्वीपति से बोले —
श्लोक 30 (skanda.2.170.30)
श्रीभगवानुवाच । जाने त्वां दासवर्यं मे निष्कामुकमकल्मषम् । अथाऽपि ते प्रदास्यामि वरं दैवतदुर्लभम्
śrībhagavānuvāca jāne tvāṁ dāsavaryaṁ me niṣkāmukamakalmaṣam athā’pi te pradāsyāmi varaṁ daivatadurlabham
श्रीभगवान् ने कहा — 'मैं तुझे अपना उत्तम, निष्काम और निष्पाप दास जानता हूँ; अतः मैं तुझे देवताओं के लिए भी दुर्लभ वर दूँगा —
श्लोक 31 (skanda.2.170.31)
आयुष्यं चायुतं दिव्यं संपदश्च नरेश्वर । भक्तिर्मयि दृढा भूयादन्ते सायुज्यमेव च
āyuṣyaṁ cāyutaṁ divyaṁ saṁpadaśca nareśvara bhaktirmayi dṛḍhā bhūyādante sāyujyameva ca
हे नरेश्वर, दस हजार दिव्य वर्षों की आयु और सम्पदाएँ, मुझमें दृढ़ भक्ति, और अन्त में सायुज्य ही तुझे प्राप्त हो।
श्लोक 32 (skanda.2.170.32)
त्वया कृतेन स्तोत्रेण मां स्तुवन्ति च ये भुवि । तेषां तुष्टः प्रदास्यामि भुक्तिं मुक्तिं न संशयः
tvayā kṛtena stotreṇa māṁ stuvanti ca ye bhuvi teṣāṁ tuṣṭaḥ pradāsyāmi bhuktiṁ muktiṁ na saṁśayaḥ
जो लोग भूतल पर तुम्हारे रचे इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करेंगे, उन पर संतुष्ट होकर मैं उन्हें भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करूँगा, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 33 (skanda.2.170.33)
तृतीयैषाऽक्षयानाम भुवि ख्याता भविष्यति । यस्यां तव प्रसन्नोऽहं भुक्तिमुक्तिफलप्रदः
tṛtīyaiṣā’kṣayānāma bhuvi khyātā bhaviṣyati yasyāṁ tava prasanno’haṁ bhuktimuktiphalapradaḥ
यह तृतीया भूतल पर 'अक्षय' नाम से विख्यात होगी, जिस पर मैं तुझ पर प्रसन्न होकर भोग और मोक्ष का फल प्रदान करने वाला बना।
श्लोक 34 (skanda.2.170.34)
ये कुर्वंति नरा मूढाः स्नानदानादिकाः क्रिया । व्याजेनाऽपि स्वभावाद्वा यांति मत्पदमव्ययम्
ye kurvaṁti narā mūḍhāḥ snānadānādikāḥ kriyā vyājenā’pi svabhāvādvā yāṁti matpadamavyayam
जो मूढ़ मनुष्य भी छल से या स्वभाववश स्नान-दान आदि क्रियाएँ इस दिन करते हैं, वे भी मेरे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.170.35)
ये चाऽक्षयतृतीयायां पितॄनुद्दिश्य मानवाः । श्राद्धं कुर्वंति तेषां वै तदानंत्याय कल्पते
ye cā’kṣayatṛtīyāyāṁ pitṝnuddiśya mānavāḥ śrāddhaṁ kurvaṁti teṣāṁ vai tadānaṁtyāya kalpate
और जो मनुष्य अक्षय तृतीया पर पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करते हैं, उनका वह श्राद्ध अनन्त फलदायी हो जाता है।
श्लोक 36 (skanda.2.170.36)
न चानया तिथिर्लोके समा वा नाधिका भुवि। अस्यां कृतं स्वल्पमपि तदक्षय्यफलं भवेत्
na cānayā tithirloke samā vā nādhikā bhuvi asyāṁ kṛtaṁ svalpamapi tadakṣayyaphalaṁ bhavet
इस तिथि के समान अथवा इससे बढ़कर संसार में कोई तिथि नहीं है; इस दिन किया गया अल्प कर्म भी अक्षय फलदायी होता है।
श्लोक 37 (skanda.2.170.37)
यो गां दद्यान्नृपश्रेष्ठ ब्राह्मणाय कुटुंबिने । सर्वसंपत्प्रवर्षाख्या भुक्तिमुक्तिः करे स्थिता
yo gāṁ dadyānnṛpaśreṣṭha brāhmaṇāya kuṭuṁbine sarvasaṁpatpravarṣākhyā bhuktimuktiḥ kare sthitā
हे नृपश्रेष्ठ, जो कुटुम्बी ब्राह्मण को गाय दान करता है, उसके हाथ में 'सर्वसम्पत्प्रवर्षा' नामक भोग-मोक्ष सदा स्थित रहता है।
श्लोक 38 (skanda.2.170.38)
यो हि दद्यादनड्वाहं सर्वपापविनाशनम् । कालमृत्युविमुक्तः सन्दीर्घायुष्यमवाप्नुयात्
yo hi dadyādanaḍvāhaṁ sarvapāpavināśanam kālamṛtyuvimuktaḥ sandīrghāyuṣyamavāpnuyāt
जो सर्वपापनाशक बैल का दान करता है, वह कालमृत्यु से मुक्त होकर दीर्घायु प्राप्त करता है।
श्लोक 39 (skanda.2.170.39)
वैशाखमासे यो धर्मान्कुरुते मत्प्रियावहान् । तेषां मृत्युजराजन्मभयं पापं हराम्यहम्
vaiśākhamāse yo dharmānkurute matpriyāvahān teṣāṁ mṛtyujarājanmabhayaṁ pāpaṁ harāmyaham
वैशाख मास में जो मुझे प्रिय धर्मों का आचरण करते हैं, उनका मृत्यु, जरा, जन्म का भय और पाप — मैं स्वयं हर लेता हूँ।
श्लोक 40 (skanda.2.170.40)
यथा वैशाखधर्मैस्तु तुष्टः स्यां सकलैरपि । मासधर्मैर्न तुष्टः स्यां मासो मे माधवः प्रियः
yathā vaiśākhadharmaistu tuṣṭaḥ syāṁ sakalairapi māsadharmairna tuṣṭaḥ syāṁ māso me mādhavaḥ priyaḥ
अन्य सब मासों के धर्मों से मैं जितना संतुष्ट होता हूँ, उतना ही वैशाख के धर्मों से भी होता हूँ — [वास्तव में] अन्य मास-धर्मों से मैं उतना संतुष्ट नहीं होता; माधव मास मुझे विशेष प्रिय है।
श्लोक 41 (skanda.2.170.41)
सर्वधमोज्झिता वापि ब्रह्मचर्यविवर्जिताः। वैशाखमासनिरता यांति मत्पदमव्ययम्
sarvadhamojjhitā vāpi brahmacaryavivarjitāḥ vaiśākhamāsaniratā yāṁti matpadamavyayam
सभी धर्मों से रहित और ब्रह्मचर्य से भी वंचित मनुष्य भी, यदि वैशाख मास में तत्पर रहें, तो मेरे अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 42 (skanda.2.170.42)
यद्दुरापं तपोभिश्च सांख्ययोगैर्मखैरपि । तद्धाम परमं यांति वैशाखनिरता नराः
yaddurāpaṁ tapobhiśca sāṁkhyayogairmakhairapi taddhāma paramaṁ yāṁti vaiśākhaniratā narāḥ
जो तप, सांख्य-योग और यज्ञों से भी दुर्लभ है, उस परम धाम को वैशाख में तत्पर मनुष्य प्राप्त करते हैं।
श्लोक 43 (skanda.2.170.43)
अपि पापसहस्रं वा मासोऽयं हरतेऽनघ । प्रायश्चित्तविहीनं वा मत्पादस्मरणं यथा
api pāpasahasraṁ vā māso’yaṁ harate’nagha prāyaścittavihīnaṁ vā matpādasmaraṇaṁ yathā
हे निष्पाप, यह मास सहस्र पापों को भी हर लेता है, चाहे उनका कोई प्रायश्चित्त न हो — जैसे मेरे चरणों का स्मरण करता है।
श्लोक 44 (skanda.2.170.44)
गुरूपदिष्टः कांतारे वैशाखे निरतो भवान् । समाराध्य जगन्नाथं तेनाप्तमखिलं नृप
gurūpadiṣṭaḥ kāṁtāre vaiśākhe nirato bhavān samārādhya jagannāthaṁ tenāptamakhilaṁ nṛpa
गुरु के उपदेश से वन में रहते हुए तुम वैशाख में तत्पर हुए और जगन्नाथ की आराधना करके तुमने यह सब कुछ प्राप्त किया, हे राजन्।
श्लोक 45 (skanda.2.170.45)
धर्मेणानेन संप्रीतः प्रत्यक्षोऽहं भवामि ते । भुक्त्वा भोगान्यथाकामान्देवैरपिसुदुर्लभान्
dharmeṇānena saṁprītaḥ pratyakṣo’haṁ bhavāmi te bhuktvā bhogānyathākāmāndevairapisudurlabhān
इस धर्माचरण से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें साक्षात् दर्शन देता हूँ; देवताओं के लिए भी दुर्लभ भोगों को यथेच्छ भोगकर —
श्लोक 46 (skanda.2.170.46)
इति तस्मै वरं दत्त्वा देवदेवो जनार्दनः । पश्यतामेव सर्वेषां तत्रैवांतरधीयत
iti tasmai varaṁ dattvā devadevo janārdanaḥ paśyatāmeva sarveṣāṁ tatraivāṁtaradhīyata
इस प्रकार उसे वर देकर देवाधिदेव जनार्दन सबके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये।
श्लोक 47 (skanda.2.170.47)
ततो भूपालवर्योऽसौ बभूवात्यंतविस्मितः । हृष्टपुष्टतनुर्भूप लब्धनष्टधनो यथा
tato bhūpālavaryo’sau babhūvātyaṁtavismitaḥ hṛṣṭapuṣṭatanurbhūpa labdhanaṣṭadhano yathā
तब वह श्रेष्ठ राजा अत्यंत विस्मित हो गया, हे भूप, उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट हो गया मानो उसे खोया हुआ धन पुनः मिल गया हो।
श्लोक 48 (skanda.2.170.48)
ततः शशास पृथिवीं तच्चित्तस्तत्परायणः । महद्भिर्बोधितो नित्यं गुरुभिश्च निरंतरम्
tataḥ śaśāsa pṛthivīṁ taccittastatparāyaṇaḥ mahadbhirbodhito nityaṁ gurubhiśca niraṁtaram
तत्पश्चात् उस भगवद्भक्त-चित्त राजा ने, महापुरुषों तथा गुरुजनों से निरंतर बोध प्राप्त करते हुए, पृथ्वी का शासन किया।
श्लोक 49 (skanda.2.170.49)
नान्यं प्रियतमं मेने वासुदेवमृते नृपः । यत्संपर्कात्प्रिया आसन्दारामात्यसुतादयः
nānyaṁ priyatamaṁ mene vāsudevamṛte nṛpaḥ yatsaṁparkātpriyā āsandārāmātyasutādayaḥ
वासुदेव के अतिरिक्त राजा किसी को भी अपना प्रियतम नहीं मानता था — उन्हीं के सम्बन्ध से उसकी पत्नी, मंत्री, पुत्र आदि भी प्रिय हो गये थे।
श्लोक 50 (skanda.2.170.50)
सर्वान्धर्मांश्चकाराऽसौ वैशाखोक्तान्पुनःपुनः । तेन पुण्यप्रभावेन पुत्रपौत्रादिभिर्वृतः
sarvāndharmāṁścakārā’sau vaiśākhoktānpunaḥpunaḥ tena puṇyaprabhāvena putrapautrādibhirvṛtaḥ
उसने वैशाख में कहे गये सभी धर्मों का बार-बार पालन किया। उस पुण्य के प्रभाव से पुत्र-पौत्रादि से घिरा हुआ,
श्लोक 51 (skanda.2.170.51)
भुक्त्वा मनोरथान्सर्वान्देवानामपि दुर्लभान् । अंते जगाम सायुज्यं विष्णोर्देवस्य चक्रिणः
bhuktvā manorathānsarvāndevānāmapi durlabhān aṁte jagāma sāyujyaṁ viṣṇordevasya cakriṇaḥ
देवताओं के लिए भी दुर्लभ सभी मनोरथों को भोगकर, अन्त में वह चक्रधारी विष्णु देव के सायुज्य को प्राप्त हुआ।
श्लोक 52 (skanda.2.170.52)
य इदं परमाख्यानं शृण्वन्ति श्रावयंति च । ते सर्वे पापनिर्मुक्ता यांति विष्णोः परं पदम्
ya idaṁ paramākhyānaṁ śṛṇvanti śrāvayaṁti ca te sarve pāpanirmuktā yāṁti viṣṇoḥ paraṁ padam
जो इस परम आख्यान को सुनते हैं और दूसरों को सुनाते हैं, वे सब पाप से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।