वैष्णव खण्ड · अध्याय 171
दन्तिल-कोहल की मुक्तिप्राप्ति का वृत्तान्त
श्लोक 1 (skanda.2.171.1)
श्रुतकीर्तिरुवाच। वैशाखधर्मानखिलानिहामुत्र फलप्रदा। भूयोऽपि शृण्वतश्चासीत्तृप्तिर्नाऽद्यापि मानद
śrutakīrtiruvāca vaiśākhadharmānakhilānihāmutra phalapradā bhūyo’pi śṛṇvataścāsīttṛptirnā’dyāpi mānada
श्रुतकीर्ति ने कहा — इन सब वैशाख-धर्मों को, जो इस लोक और परलोक दोनों में फलदायी हैं, बार-बार सुनकर भी, हे मानद, मुझे अब तक तृप्ति नहीं हुई।
श्लोक 2 (skanda.2.171.2)
यत्र चाकैतवो धर्मो यत्र विष्णुकथा शुभाः। तच्छास्त्रं शृण्वतो नैव तृप्तिः कर्णरसायनम्
yatra cākaitavo dharmo yatra viṣṇukathā śubhāḥ tacchāstraṁ śṛṇvato naiva tṛptiḥ karṇarasāyanam
जहाँ छलरहित धर्म है, जहाँ विष्णु की शुभ कथाएँ हैं — उस शास्त्र को सुनते हुए, जो कानों के लिए अमृत-रसायन है, तृप्ति कभी नहीं होती।
श्लोक 3 (skanda.2.171.3)
पूर्वजन्मकृतं पुण्यं दिष्ट्या पारमुपागतम् । आतिथ्यव्यपदेशेन यद्भवान्गृहमागतः
pūrvajanmakṛtaṁ puṇyaṁ diṣṭyā pāramupāgatam ātithyavyapadeśena yadbhavāngṛhamāgataḥ
सौभाग्य से मेरा पूर्वजन्म का पुण्य अब फलित हुआ है, क्योंकि आतिथ्य के बहाने आप मेरे घर पधारे हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.171.4)
वचोऽमृतं मुखांभोजनिःसृतं परमाद्भुतम्। पीत्वा तृप्तः पारमेष्ठ्यं मोक्षं वा च न कामये
vaco’mṛtaṁ mukhāṁbhojaniḥsṛtaṁ paramādbhutam pītvā tṛptaḥ pārameṣṭhyaṁ mokṣaṁ vā ca na kāmaye
आपके मुखकमल से निकले अत्यंत अद्भुत अमृत-वचनों को पीकर मैं तृप्त हूँ — अब मुझे ब्रह्मपद या मोक्ष की भी इच्छा नहीं रही।
श्लोक 5 (skanda.2.171.5)
तस्मात्तानेव धर्मान्मे भुक्तिमुक्तिप्रदायकान्। विष्णुप्रीतिकरान्दिव्यान्भूयो विस्तरतो वद
tasmāttāneva dharmānme bhuktimuktipradāyakān viṣṇuprītikarāndivyānbhūyo vistarato vada
अतः भोग और मोक्ष देने वाले, विष्णु को प्रिय, उन्हीं दिव्य धर्मों को मुझे पुनः विस्तार से बताइये।
श्लोक 6 (skanda.2.171.6)
इत्युक्तस्तु पुरा राज्ञा श्रुतदेवो महायशाः। संहृष्टाऽऽत्मा शुभान्धर्मान्पुनर्व्याहर्तुमारभत्
ityuktastu purā rājñā śrutadevo mahāyaśāḥ saṁhṛṣṭā’’tmā śubhāndharmānpunarvyāhartumārabhat
पूर्वकाल में राजा द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, महायशस्वी श्रुतदेव, प्रसन्न हृदय होकर, पुनः उन शुभ धर्मों को कहने लगे।
श्लोक 7 (skanda.2.171.7)
श्रुतदेव उवाच। शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् । वैशाखधर्मविषयां भावितां मुनिभिर्मुहुः
śrutadeva uvāca śṛṇu rājanpravakṣyāmi kathāṁ pāpapraṇāśinīm vaiśākhadharmaviṣayāṁ bhāvitāṁ munibhirmuhuḥ
श्रुतदेव ने कहा — हे राजन्, सुनो, मैं पापनाशक कथा कहूँगा, जो वैशाख-धर्म से सम्बन्धित है और मुनियों द्वारा बार-बार चिन्तित है।
श्लोक 8 (skanda.2.171.8)
पम्पातीरे द्विजः कश्चिच्छंखोनाम महायशाः। गुरौ सिंहगते चागान्नदीं गोदावरीं शुभाम्
pampātīre dvijaḥ kaścicchaṁkhonāma mahāyaśāḥ gurau siṁhagate cāgānnadīṁ godāvarīṁ śubhām
पम्पा नदी के तट पर शंख नामक एक महायशस्वी ब्राह्मण था; बृहस्पति के सिंह राशि में आने पर वह शुभ गोदावरी नदी की ओर गया।
श्लोक 9 (skanda.2.171.9)
तीर्त्वा भीमरथीं पुण्यां कान्तारे कण्टकाचले। निर्जले निर्जने घोरे वैशाखे तपकर्षितः
tīrtvā bhīmarathīṁ puṇyāṁ kāntāre kaṇṭakācale nirjale nirjane ghore vaiśākhe tapakarṣitaḥ
पुण्य भीमरथी नदी को पार करके, काँटों भरे उस भयंकर, जलरहित, जनरहित वन में, वैशाख की गर्मी से क्षीण होकर,
श्लोक 10 (skanda.2.171.10)
वृक्षे चोपविवेशाऽसौ मध्याह्नसमये द्विजः । तदा कश्चिद्दुराचारो व्याधश्चापधरः शठः
vṛkṣe copaviveśā’sau madhyāhnasamaye dvijaḥ tadā kaściddurācāro vyādhaścāpadharaḥ śaṭhaḥ
वह ब्राह्मण दोपहर के समय एक वृक्ष के नीचे बैठ गया। तभी कोई दुराचारी, धनुर्धारी, दुष्ट व्याध,
श्लोक 11 (skanda.2.171.11)
निर्घृणःसर्वभूतेषु कालान्तक इवाऽपरः। तं कुण्डलधरं विप्रं दीक्षितं भास्करोपमम्
nirghṛṇaḥsarvabhūteṣu kālāntaka ivā’paraḥ taṁ kuṇḍaladharaṁ vipraṁ dīkṣitaṁ bhāskaropamam
सब प्राणियों के प्रति निर्दय, मानो साक्षात् दूसरा यमराज — उस कुण्डलधारी, दीक्षित, सूर्य के समान तेजस्वी ब्राह्मण को —
श्लोक 12 (skanda.2.171.12)
दृष्ट्वा बद्ध्वा स जग्राह कुण्डलादिकमुग्रधीः। उपानहौ चच्छत्रं च अक्षमालां कमण्डलुम्
dṛṣṭvā baddhvā sa jagrāha kuṇḍalādikamugradhīḥ upānahau cacchatraṁ ca akṣamālāṁ kamaṇḍalum
देखकर उस उग्रबुद्धि ने उसे बाँधकर उसके कुण्डल आदि — जूते, छाता, जपमाला और कमण्डलु — छीन लिये,
श्लोक 13 (skanda.2.171.13)
पश्चाद्विसृज्य तं विप्रं गच्छेत्याह विमूढधीः
paścādvisṛjya taṁ vipraṁ gacchetyāha vimūḍhadhīḥ
और फिर उस मूढ़बुद्धि ने उस ब्राह्मण को छोड़कर कहा, 'जाओ।'
श्लोक 14 (skanda.2.171.14)
ततः स गच्छन्पथि शर्कराऽऽविले सूर्यांशुतप्ते जलवर्जिते खरे। सन्तप्तपादस्तृणछादिते स्थले क्वचिच्चचारोपवसन्नूर्ध्वरेताः
tataḥ sa gacchanpathi śarkarā’’vile sūryāṁśutapte jalavarjite khare santaptapādastṛṇachādite sthale kvaciccacāropavasannūrdhvaretāḥ
तब वह कंकरीली, सूर्य-किरणों से तपी, जलरहित कठोर भूमि के मार्ग पर, जलते पैरों से, कहीं घास से ढकी भूमि पर, उपवास करता हुआ, वह ऊर्ध्वरेता ब्राह्मण चलने लगा।
श्लोक 15 (skanda.2.171.15)
स वै द्रुतं सम्पतन्क्वापि तुष्यन्हाहेति वादी स जगाम तूर्णम्। दृष्ट्वा मुनिं खिद्यमानं पृथिव्यां मध्यं गते पूष्णि दया बभूव
sa vai drutaṁ sampatankvāpi tuṣyanhāheti vādī sa jagāma tūrṇam dṛṣṭvā muniṁ khidyamānaṁ pṛthivyāṁ madhyaṁ gate pūṣṇi dayā babhūva
वह शीघ्रता से बढ़ता, कहीं लड़खड़ाता, 'हाय-हाय' पुकारता हुआ तेजी से आगे बढ़ने लगा। मुनि को इस प्रकार पृथ्वी पर दुःखी देखकर, जब सूर्य ठीक मध्याह्न पर था, [व्याध के हृदय में] दया उत्पन्न हुई।
श्लोक 16 (skanda.2.171.16)
व्याधस्य धर्मविमुखस्य च पापबुद्धेस्तस्मै ददामि सुखदां खलु पादरक्षाम्
vyādhasya dharmavimukhasya ca pāpabuddhestasmai dadāmi sukhadāṁ khalu pādarakṣām
'धर्म से विमुख, पापबुद्धि व्याध होते हुए भी, मैं उसे उसके सुखदायी जूते वापस दे देता हूँ।'
श्लोक 17 (skanda.2.171.17)
चौर्येणैव स्वधर्मेण या गृहीता वनान्तरे। तदीयमेव तत्सर्वं व्याधानां धर्मनिर्णयः। तस्मादुपानहौ दास्ये मुहुर्दुःखापनुत्तये
cauryeṇaiva svadharmeṇa yā gṛhītā vanāntare tadīyameva tatsarvaṁ vyādhānāṁ dharmanirṇayaḥ tasmādupānahau dāsye muhurduḥkhāpanuttaye
'चोरी ही मेरा स्वधर्म है, जो कुछ वन में छीना जाता है — वह सब वास्तव में उसी का है, यही व्याधों का धर्म-निर्णय है। इसलिए उसके दुःख को दूर करने के लिए मैं उसे जूते दूँगा —
श्लोक 18 (skanda.2.171.18)
तेन श्रेयो भवेद्यच्च तद्भवेन्मम पापिनः। जीर्णे चोपानहौ द्वे च वर्तेते पादयोर्मम। न ताभ्यामस्ति मे कृत्यं तस्मात्ते वै ददाम्यहम्
tena śreyo bhavedyacca tadbhavenmama pāpinaḥ jīrṇe copānahau dve ca vartete pādayormama na tābhyāmasti me kṛtyaṁ tasmātte vai dadāmyaham
'जो भी शुभ हो, वह मुझ पापी को प्राप्त हो। और मेरे पैरों में तो पहले से ही दो जीर्ण जूते हैं; इनसे मुझे कोई काम नहीं, इसलिए मैं इन्हें उसे देता हूँ।'
श्लोक 19 (skanda.2.171.19)
इति निश्चित्य मनसि तूर्णं गत्वा ददौ च ते। शर्करातप्तपादाय द्विजवर्याय सीदते
iti niścitya manasi tūrṇaṁ gatvā dadau ca te śarkarātaptapādāya dvijavaryāya sīdate
मन में ऐसा निश्चय करके वह शीघ्र गया और कंकरों से जलते पैरों वाले, दुःखी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को वे जूते दे दिये।
श्लोक 20 (skanda.2.171.20)
उपानहौ गृहीत्वा ते निर्वृतिं च परां ययौ। सुखी भवेति तं व्याधमाशीर्भिरभिनन्द्य च
upānahau gṛhītvā te nirvṛtiṁ ca parāṁ yayau sukhī bhaveti taṁ vyādhamāśīrbhirabhinandya ca
जूते पाकर वह ब्राह्मण परम सुख को प्राप्त हुआ, और 'सुखी रहो' कहकर आशीर्वाद देते हुए उस व्याध का अभिनन्दन किया।
श्लोक 21 (skanda.2.171.21)
नूनं सुपक्वपुण्योऽयं वैशाखे दत्तवानमू । व्याधस्यापि च दुर्बुद्धेः प्रायो विष्णुः प्रसीदति
nūnaṁ supakvapuṇyo’yaṁ vaiśākhe dattavānamū vyādhasyāpi ca durbuddheḥ prāyo viṣṇuḥ prasīdati
[सोचते हुए —] 'निश्चय ही इसका पुण्य अब पूर्ण रूप से पक चुका है, क्योंकि इसने वैशाख में यह दान दिया — दुर्बुद्धि व्याध होते हुए भी विष्णु प्रायः प्रसन्न हो जाते हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.171.22)
सर्वस्याऽऽप्त्या च भूयोऽपि यत्सुखं तदभून्मम। ततोऽभिश्रुत्य तद्वाक्यं किमेतदिति विस्मितः
sarvasyā’’ptyā ca bhūyo’pi yatsukhaṁ tadabhūnmama tato’bhiśrutya tadvākyaṁ kimetaditi vismitaḥ
सब कुछ पाने से जो सुख होता है, वही सुख आज मुझे प्राप्त हुआ है।' तब उन शब्दों को सुनकर व्याध विस्मित होकर सोचने लगा — 'यह क्या है?'
श्लोक 23 (skanda.2.171.23)
व्याजहार पुनर्विप्रं ब्रह्मिष्ठं ब्रह्मवादिनम् । त्वदीयं तु मया दत्तं कथं पुण्यं भवेन्मम
vyājahāra punarvipraṁ brahmiṣṭhaṁ brahmavādinam tvadīyaṁ tu mayā dattaṁ kathaṁ puṇyaṁ bhavenmama
उसने पुनः उस ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मवादी ब्राह्मण से पूछा — 'जो तुम्हारा ही था, वह मैंने तुम्हें लौटाया — इससे मुझे पुण्य कैसे प्राप्त होगा?
श्लोक 24 (skanda.2.171.24)
प्रशंससि च वैशाखं हरिस्तुष्टो भवेदिति। एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन्को वैशाखस्तु को हरिः
praśaṁsasi ca vaiśākhaṁ haristuṣṭo bhavediti etadācakṣva me brahmanko vaiśākhastu ko hariḥ
और आप वैशाख की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि हरि प्रसन्न हो जायेंगे — हे ब्राह्मण, मुझे यह बताइये कि वैशाख कौन है और हरि कौन हैं?
श्लोक 25 (skanda.2.171.25)
को धर्मः किं फलं तस्य शुश्रूषोर्मे दयानिधे। इति व्याधवचः श्रुत्वा शंखस्तुष्टमना अभूत्
ko dharmaḥ kiṁ phalaṁ tasya śuśrūṣorme dayānidhe iti vyādhavacaḥ śrutvā śaṁkhastuṣṭamanā abhūt
धर्म क्या है, और हे दयानिधे, सुनने के इच्छुक मुझे उसका फल क्या है?' — व्याध के इन वचनों को सुनकर शंख का मन प्रसन्न हो गया,
श्लोक 26 (skanda.2.171.26)
प्रशंसन्स च वैशाखं पुनर्विस्मितमानसः । इदानीं दत्तवान्पादत्राणे मे लुब्धकः शठः
praśaṁsansa ca vaiśākhaṁ punarvismitamānasaḥ idānīṁ dattavānpādatrāṇe me lubdhakaḥ śaṭhaḥ
और वैशाख की प्रशंसा करते हुए, पुनः विस्मित मन से उसने सोचा — 'अभी-अभी इस दुष्ट लुब्धक ने मुझे मेरे जूते वापस दिये हैं —
श्लोक 27 (skanda.2.171.27)
यद्दुर्बुद्धेश्च वैषम्यं जातं चित्रमहो वत। सर्वेषामेव धर्माणां फलं जन्मांतरेषु वै
yaddurbuddheśca vaiṣamyaṁ jātaṁ citramaho vata sarveṣāmeva dharmāṇāṁ phalaṁ janmāṁtareṣu vai
— इस दुर्बुद्धि में जो यह परिवर्तन आया है, वह कैसा आश्चर्य है! अन्य सभी धर्मों का फल तो जन्मान्तरों में ही मिलता है,
श्लोक 28 (skanda.2.171.28)
वैशाखमासधर्माणां फलं सद्यः क्षणे नृणाम् । पापाचारस्य दु्र्बुद्धेर्व्याधस्यापि दुरात्मनः
vaiśākhamāsadharmāṇāṁ phalaṁ sadyaḥ kṣaṇe nṛṇām pāpācārasya durbuddhervyādhasyāpi durātmanaḥ
जबकि वैशाख मास के धर्मों का फल मनुष्यों को तत्काल, क्षणभर में ही मिल जाता है — चाहे वह पापाचारी, दुर्बुद्धि, दुरात्मा व्याध ही क्यों न हो!
श्लोक 29 (skanda.2.171.29)
दैवादुपानहोर्दानात्सत्त्वशुद्धिरभूदहो । यच्च विष्णोः प्रियं कर्म यत्तत्सन्तोषनिर्मलम्
daivādupānahordānātsattvaśuddhirabhūdaho yacca viṣṇoḥ priyaṁ karma yattatsantoṣanirmalam
दैवयोग से केवल जूतों के दान मात्र से इसकी सत्त्व-शुद्धि हो गई! जो कर्म विष्णु को प्रिय है, वही उनके संतोष का निर्मल कारण है —
श्लोक 30 (skanda.2.171.30)
तदेव धर्ममित्या हुर्मन्वाद्या धर्मवित्तमाः। धर्मा माधवमासीयाः प्रिया विष्णोरतीव ते
tadeva dharmamityā hurmanvādyā dharmavittamāḥ dharmā mādhavamāsīyāḥ priyā viṣṇoratīva te
मनु आदि श्रेष्ठ धर्मज्ञ उसी को धर्म कहते हैं। माधव मास के धर्म विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.171.31)
धर्मैर्माधवमासीयैर्यथा तुष्यति केशवः। न तथा सर्वदानैश्च तपोभिश्च महामखैः
dharmairmādhavamāsīyairyathā tuṣyati keśavaḥ na tathā sarvadānaiśca tapobhiśca mahāmakhaiḥ
जैसे केशव माधव मास के धर्मों से प्रसन्न होते हैं, वैसे वे सब दानों, तपस्याओं और महायज्ञों से भी प्रसन्न नहीं होते।
श्लोक 32 (skanda.2.171.32)
नानेन सदृशो धर्मः सर्वधर्मेषु विद्यते । मा गयां यांतु मा गंगां मा प्रयागं तु पुष्करम्
nānena sadṛśo dharmaḥ sarvadharmeṣu vidyate mā gayāṁ yāṁtu mā gaṁgāṁ mā prayāgaṁ tu puṣkaram
सम्पूर्ण धर्मों में इसके समान कोई धर्म नहीं है। लोग गया न जायें, गंगा न जायें, प्रयाग न जायें, पुष्कर न जायें,
श्लोक 33 (skanda.2.171.33)
मा केदारं कुरुक्षेत्रं मा प्रभासं स्यमन्तकम् । मा गोदा मा च कृष्णां च मा सेतुं मा मरुद्वृधम्
mā kedāraṁ kurukṣetraṁ mā prabhāsaṁ syamantakam mā godā mā ca kṛṣṇāṁ ca mā setuṁ mā marudvṛdham
केदार न जायें, कुरुक्षेत्र न जायें, प्रभास और स्यमन्तक न जायें, गोदावरी न जायें, कृष्णा नदी न जायें, सेतु न जायें, मरुद्वृध न जायें —
श्लोक 34 (skanda.2.171.34)
वैशाखधर्ममाहात्म्यं शंसंती च कथाऽऽपगा। तत्र स्नातस्य वै विष्णुः सद्यो हृद्यवरुध्यते
vaiśākhadharmamāhātmyaṁ śaṁsaṁtī ca kathā’’pagā tatra snātasya vai viṣṇuḥ sadyo hṛdyavarudhyate
[बल्कि] वैशाख-धर्म के माहात्म्य का वर्णन करने वाली इस कथा-रूपी नदी में [स्नान करें] — उसमें स्नान करने वाले के हृदय में विष्णु तत्काल स्थिर हो जाते हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.171.35)
मासे माधवसंज्ञेऽस्मिन्यस्त्वल्पेनैव साध्यते । न तद्बहुव्ययैर्दानैर्न धर्मैर्वाऽपि वै मखैः
māse mādhavasaṁjñe’sminyastvalpenaiva sādhyate na tadbahuvyayairdānairna dharmairvā’pi vai makhaiḥ
माधव नामक इस मास में जो अल्प प्रयास से ही सिद्ध हो जाता है, वह बड़े व्यय वाले दानों से, न धर्मों से, न यज्ञों से भी सिद्ध नहीं होता।
श्लोक 36 (skanda.2.171.36)
मासोऽयं माधवोनाम व्याध पुण्यविवर्द्धनः । तस्मिन्मह्यं त्वया दत्ते पादुके तापनाशने
māso’yaṁ mādhavonāma vyādha puṇyavivarddhanaḥ tasminmahyaṁ tvayā datte pāduke tāpanāśane
हे व्याध, यह माधव नामक मास पुण्य को बढ़ाने वाला है; इसी में तुमने मुझे कष्ट-नाशक ये पादुकाएँ दी हैं,
श्लोक 37 (skanda.2.171.37)
तेन ते पूर्वकालीनं पुण्यं पाकमुपागतम्। तुष्टस्तु भगवान्प्रायः श्रेयो व्याधविधास्यति
tena te pūrvakālīnaṁ puṇyaṁ pākamupāgatam tuṣṭastu bhagavānprāyaḥ śreyo vyādhavidhāsyati
इससे तुम्हारा पूर्वकालीन पुण्य फलित हो गया है। भगवान् प्रसन्न होकर, हे व्याध, तुम्हारा कल्याण अवश्य करेंगे।
श्लोक 38 (skanda.2.171.38)
अन्यथा ते कथं भूयाद्बुद्धिरेतादृशी शुभा । मुनावेवं ब्रुवाणे च मृत्युना प्रेरितो बली
anyathā te kathaṁ bhūyādbuddhiretādṛśī śubhā munāvevaṁ bruvāṇe ca mṛtyunā prerito balī
अन्यथा तुम्हारे मन में ऐसा शुभ विचार कैसे आता?' — मुनि के ऐसा कहते ही, मृत्यु से प्रेरित एक बलवान् —
श्लोक 39 (skanda.2.171.39)
सिंहो व्याघ्रवधार्थाय प्राद्रवत्क्रोधविह्वलः । मध्ये दृष्ट्वा च मातङ्गं दैवाद्देवेन कल्पितम्
siṁho vyāghravadhārthāya prādravatkrodhavihvalaḥ madhye dṛṣṭvā ca mātaṅgaṁ daivāddevena kalpitam
क्रोध से व्याकुल सिंह किसी हिंसक पशु को मारने के लिए दौड़ा, और मार्ग में दैवयोग से देव-निर्मित एक हाथी को देखकर,
श्लोक 40 (skanda.2.171.40)
तं हंतुमुद्यतोऽगच्छत्पदाक्रांतं व्यवस्थितम्। तयोर्युद्धमभूद्राजन्सिंहमातंगयोर्वने
taṁ haṁtumudyato’gacchatpadākrāṁtaṁ vyavasthitam tayoryuddhamabhūdrājansiṁhamātaṁgayorvane
उसे मारने को उद्यत होकर उसके पास गया, जो स्थिर होकर खड़ा था। हे राजन्, उस वन में सिंह और हाथी के बीच युद्ध हुआ।
श्लोक 41 (skanda.2.171.41)
श्रान्तौ युद्धाच्च विरतौ निरीक्षन्तौ च तस्थतुः । व्याधमुद्दिश्य यच्चोक्तं मुनिना च महात्मना
śrāntau yuddhācca viratau nirīkṣantau ca tasthatuḥ vyādhamuddiśya yaccoktaṁ muninā ca mahātmanā
युद्ध से थककर दोनों विश्राम को प्राप्त हुए और एक-दूसरे को देखते हुए खड़े रहे। तभी उस महात्मा मुनि ने व्याध को उद्देश्य करके जो कहा था —
श्लोक 42 (skanda.2.171.42)
समस्तपातकध्वंसि दैवाच्छुश्रुवतुश्च तौ । तेनैव मासमाहात्म्यश्रवणेनामलाशयौ
samastapātakadhvaṁsi daivācchuśruvatuśca tau tenaiva māsamāhātmyaśravaṇenāmalāśayau
सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला वह वचन, दैवयोग से उन दोनों ने भी सुन लिया। उसी मासमाहात्म्य-श्रवण से उनके हृदय निर्मल हो गये,
श्लोक 43 (skanda.2.171.43)
शापान्मुक्तौ च तौ देहात्सद्यो मुक्तौ दिवं गतौ । दिव्यरूपधरौ दिव्यौ दिव्यगन्धानुलेपनौ
śāpānmuktau ca tau dehātsadyo muktau divaṁ gatau divyarūpadharau divyau divyagandhānulepanau
और वे दोनों शाप से मुक्त होकर, तत्काल अपने शरीर से मुक्त होकर स्वर्ग को चले गये — दिव्य रूप धारण किये, दिव्य सुगंधित लेप से युक्त,
श्लोक 44 (skanda.2.171.44)
दिव्यं विमानमारूढौ दिव्यनारीनिषेवितौ। सद्योऽवनतमूर्द्धानौ प्राञ्जली चोपतस्थतुः
divyaṁ vimānamārūḍhau divyanārīniṣevitau sadyo’vanatamūrddhānau prāñjalī copatasthatuḥ
दिव्य विमान पर आरूढ़, दिव्य नारियों से सेवित — वे तत्काल सिर झुकाकर हाथ जोड़कर [मुनि के समक्ष] उपस्थित हुए।
श्लोक 45 (skanda.2.171.45)
मुनींद्रो धर्मवक्ता च व्याधमुद्दिश्य वै पथि । तौ दृष्ट्वा विस्मितः प्राह कौ युवामिति निश्चलः
munīṁdro dharmavaktā ca vyādhamuddiśya vai pathi tau dṛṣṭvā vismitaḥ prāha kau yuvāmiti niścalaḥ
मार्ग में व्याध को धर्मोपदेश दे रहे उन मुनिश्रेष्ठ ने उन्हें देखकर विस्मित होकर, स्थिर होकर पूछा — 'तुम दोनों कौन हो?
श्लोक 46 (skanda.2.171.46)
दुर्योनौ तु कुतो जन्म युवयोर्वा कथं मृतिः । अहेतोर्विपिने चाऽस्न्मिपरस्परवधोद्यतौ
duryonau tu kuto janma yuvayorvā kathaṁ mṛtiḥ ahetorvipine cā’snmiparasparavadhodyatau
तुम्हारा जन्म ऐसी नीच योनि में क्यों हुआ, और तुम्हारी मृत्यु कैसे हुई? तथा वन में तुम दोनों बिना किसी कारण के एक-दूसरे को मारने पर क्यों तत्पर थे?
श्लोक 47 (skanda.2.171.47)
एतत्सर्वं सुविस्तार्य सम्यग्वदत मेऽनघौ। इत्युक्तौ मुनिना तेन वचः प्रत्यूचतुः पुनः
etatsarvaṁ suvistārya samyagvadata me’naghau ityuktau muninā tena vacaḥ pratyūcatuḥ punaḥ
यह सब मुझे विस्तार से, भलीभाँति बताओ, हे निष्पापो।' — मुनि द्वारा ऐसा पूछे जाने पर उन्होंने पुनः इस प्रकार उत्तर दिया —
श्लोक 48 (skanda.2.171.48)
मतंगस्य मुनेः पुत्रौ दन्तिलः कोहलोऽपरः । शापदोषेण तौ जातौ नाम्ना दन्तिलकोहलौ
mataṁgasya muneḥ putrau dantilaḥ kohalo’paraḥ śāpadoṣeṇa tau jātau nāmnā dantilakohalau
'हम मतंग मुनि के दो पुत्र हैं — दन्तिल और दूसरा कोहल; शाप के दोष से हम इस रूप में उत्पन्न हुए, परन्तु हमारे नाम दन्तिल और कोहल ही हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.171.49)
रूपयौवनसंपन्नौ सर्वविद्याविशारदौ। आवामुद्दिश्य प्रोवाच पिता धर्मार्थकोविदः
rūpayauvanasaṁpannau sarvavidyāviśāradau āvāmuddiśya provāca pitā dharmārthakovidaḥ
रूप और यौवन से सम्पन्न, सर्वविद्याओं में निपुण हम दोनों को धर्म-अर्थ में निपुण हमारे पिता ने संबोधित करके कहा था —
श्लोक 50 (skanda.2.171.50)
मतंगोनाम ब्रह्मर्षिः सर्वधर्मविदुत्तमः । वैशाखे मासि तनयौ मधुसूदनवल्लभे
mataṁgonāma brahmarṣiḥ sarvadharmaviduttamaḥ vaiśākhe māsi tanayau madhusūdanavallabhe
मतंग नामक ब्रह्मर्षि, सब धर्मों के परम ज्ञाता, ने कहा — 'हे पुत्रो, मधुसूदन को प्रिय वैशाख मास में,
श्लोक 51 (skanda.2.171.51)
प्रपां कुरुत मार्गे च जनान्वीजयतं क्षणम्। मार्गे छाया विधत्तां च भूर्यन्नं शीतलांबु च
prapāṁ kuruta mārge ca janānvījayataṁ kṣaṇam mārge chāyā vidhattāṁ ca bhūryannaṁ śītalāṁbu ca
मार्ग में जलशाला (प्रपा) स्थापित करो और क्षणभर के लिए यात्रियों को हवा करो; मार्ग में छाया की व्यवस्था करो, प्रचुर अन्न और शीतल जल दो।
श्लोक 52 (skanda.2.171.52)
कुरुतं स्नानमुषसि तथैवार्चयतं विभुम् । कथां च शृणुतं नित्यं यया बन्धो निवर्तते
kurutaṁ snānamuṣasi tathaivārcayataṁ vibhum kathāṁ ca śṛṇutaṁ nityaṁ yayā bandho nivartate
प्रातः स्नान करो और उसी प्रकार प्रभु का पूजन करो; तथा नित्य वह कथा सुनो जिससे बन्धन दूर होता है।'
श्लोक 53 (skanda.2.171.53)
एवं च बहुभिर्वाक्यैर्बोधितावपि दुर्मती । कुद्धोऽभवं दन्तिलोऽहं मत्तोऽहं कोहलाह्वयः
evaṁ ca bahubhirvākyairbodhitāvapi durmatī kuddho’bhavaṁ dantilo’haṁ matto’haṁ kohalāhvayaḥ
इस प्रकार अनेक वचनों से समझाये जाने पर भी, दुर्बुद्धि हम दोनों — मैं दन्तिल क्रुद्ध हो गया, और मैं कोहल नामधारी उन्मत्त हो गया।
श्लोक 54 (skanda.2.171.54)
क्रुद्धः शशाप तौ सद्यः पिता धर्मेषु लालसः
kruddhaḥ śaśāpa tau sadyaḥ pitā dharmeṣu lālasaḥ
क्रुद्ध होकर धर्मपरायण हमारे पिता ने तत्काल हम दोनों को शाप दे दिया —
श्लोक 55 (skanda.2.171.55)
पुत्रं च धर्मविमुखं भार्यां चाऽप्रियवादिनीम् । अब्रह्मण्यं च राजानंत्यजेत्सद्यो न चेत्पतेत्
putraṁ ca dharmavimukhaṁ bhāryāṁ cā’priyavādinīm abrahmaṇyaṁ ca rājānaṁtyajetsadyo na cetpatet
'धर्म से विमुख पुत्र, अप्रिय बोलने वाली पत्नी, और ब्राह्मणद्वेषी राजा — इन्हें तत्काल त्याग देना चाहिए, अन्यथा [स्वयं भी पतन को प्राप्त होता है]।
श्लोक 56 (skanda.2.171.56)
दाक्षिण्यादर्थलोभाद्वा संसर्गं ये प्रकुर्वते। ते सर्वे नरकं यांति यावदिंद्राश्चतुर्दश। इति ज्ञात्वा शशापावां मदक्रोधपरिप्लुतौ
dākṣiṇyādarthalobhādvā saṁsargaṁ ye prakurvate te sarve narakaṁ yāṁti yāvadiṁdrāścaturdaśa iti jñātvā śaśāpāvāṁ madakrodhapariplutau
जो लोग शिष्टाचारवश या धन-लोभवश ऐसों की संगति करते हैं, वे सब चौदह इन्द्रों के काल तक नरक में जाते हैं।' — यह जानते हुए, मद और क्रोध में डूबे हम दोनों को उन्होंने शाप दिया —
श्लोक 57 (skanda.2.171.57)
कुद्धोऽयं दंतिलो भूयात्सिंहः क्रोधपरिप्लुतः। मत्तस्तु कोहलो भूयान्मत्तो मातंगयूथपः
kuddho’yaṁ daṁtilo bhūyātsiṁhaḥ krodhapariplutaḥ mattastu kohalo bhūyānmatto mātaṁgayūthapaḥ
'क्रुद्ध यह दन्तिल क्रोध से व्याप्त सिंह बने; और उन्मत्त यह कोहल उन्मत्त गजयूथपति हाथी बने।'
श्लोक 58 (skanda.2.171.58)
कृतानुतापौ पश्चात्तु प्रार्थयावो विमोचनम्। आवाभ्यां प्रार्थितो भूयो विशापं च ददौपिता
kṛtānutāpau paścāttu prārthayāvo vimocanam āvābhyāṁ prārthito bhūyo viśāpaṁ ca dadaupitā
पश्चात्ताप करते हुए हमने मुक्ति की प्रार्थना की। हम दोनों द्वारा पुनः प्रार्थना किये जाने पर पिता ने शाप में संशोधन कर दिया —
श्लोक 59 (skanda.2.171.59)
युवां प्राप्य च दुर्योनिं कियत्कालान्तरेऽपि च । संगमो भविता तत्र परस्परवधेषिणोः
yuvāṁ prāpya ca duryoniṁ kiyatkālāntare’pi ca saṁgamo bhavitā tatra parasparavadheṣiṇoḥ
'नीच योनि पाकर, कुछ काल बीतने पर, तुम दोनों एक-दूसरे को मारने की इच्छा से वहीं मिलोगे —
श्लोक 60 (skanda.2.171.60)
तस्मिन्नेव हि समये संवादो व्याधशंखयोः । वैशाखधर्मविषयो दैवाद्वां श्रवणेऽपि च
tasminneva hi samaye saṁvādo vyādhaśaṁkhayoḥ vaiśākhadharmaviṣayo daivādvāṁ śravaṇe’pi ca
— और उसी समय, व्याध और शंख के बीच वैशाख-धर्म विषयक संवाद दैवयोग से तुम दोनों को सुनने को मिलेगा;
श्लोक 61 (skanda.2.171.61)
गमिष्यति क्षणादेव तस्मान्मुक्तिर्भविष्यति । शापान्मुक्तौ पूर्वमेव रूपमास्थाय पुत्रकौ
gamiṣyati kṣaṇādeva tasmānmuktirbhaviṣyati śāpānmuktau pūrvameva rūpamāsthāya putrakau
वह क्षणभर में ही तुम तक पहुँच जायेगा, और उसी से तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी। शाप से मुक्त होकर, पूर्व रूप को पुनः धारण करके, हे पुत्रो,
श्लोक 62 (skanda.2.171.62)
मामेव प्राप्य वसतं नान्यथा मे वचो भवेत्। इति शप्तौ च गुरुणा दुर्योनिं प्राप्य दुर्मती
māmeva prāpya vasataṁ nānyathā me vaco bhavet iti śaptau ca guruṇā duryoniṁ prāpya durmatī
तुम मुझ तक ही आकर निवास करोगे — मेरी यह वाणी अन्यथा नहीं होगी।' इस प्रकार गुरु (पिता) द्वारा शापित होकर, नीच योनि पाकर, दुर्बुद्धि हम दोनों ने —
श्लोक 63 (skanda.2.171.63)
प्राप्य दैवात्संगतिं च परस्परवधैषिणौ । संवादं युवयोर्दिव्यं शुभं तं शुश्रुवावहे
prāpya daivātsaṁgatiṁ ca parasparavadhaiṣiṇau saṁvādaṁ yuvayordivyaṁ śubhaṁ taṁ śuśruvāvahe
दैवयोग से एक-दूसरे को मारने की इच्छा रखते हुए भेंट पाई, और तुम दोनों का वह दिव्य, शुभ संवाद हमने सुना।
श्लोक 64 (skanda.2.171.64)
तेन सद्यो विमुक्तिश्च क्षणादेवाऽऽवयोरभूत्। इति सर्वं समाख्याय प्रणम्य च मुनीश्वरम्
tena sadyo vimuktiśca kṣaṇādevā’’vayorabhūt iti sarvaṁ samākhyāya praṇamya ca munīśvaram
उसी से हम दोनों को क्षणभर में ही तत्काल मुक्ति प्राप्त हुई।' — यह सब कहकर और उस मुनीश्वर को प्रणाम करके,
श्लोक 65 (skanda.2.171.65)
समामंत्र्याभ्यनुज्ञातौ जग्मतुः पितुरंतिकम्। तदेवं संप्रदृश्याह मुनिर्व्याधं दयानिधिः
samāmaṁtryābhyanujñātau jagmatuḥ pituraṁtikam tadevaṁ saṁpradṛśyāha munirvyādhaṁ dayānidhiḥ
विदा लेकर, आज्ञा पाकर वे दोनों अपने पिता के पास चले गये। तब उस दृश्य को देखकर दयानिधि मुनि ने व्याध से कहा —
श्लोक 66 (skanda.2.171.66)
पश्य वैशाखमाहात्म्यश्रवणस्य फलं महत् । मुहूर्तश्रवणादेव तयोर्मुक्तिः करे स्थिता
paśya vaiśākhamāhātmyaśravaṇasya phalaṁ mahat muhūrtaśravaṇādeva tayormuktiḥ kare sthitā
'देखो, वैशाख-माहात्म्य के श्रवण का यह कितना महान् फल है! एक क्षण के श्रवण मात्र से उन दोनों की मुक्ति उनकी हथेली में आ गई।'
श्लोक 67 (skanda.2.171.67)
इति ब्रुवाणं मुनिपुंगवं तं दयानिधिं निःस्पृहमग्र्यबुद्धिम्। विशुद्धसत्त्वं सुकृतैकपात्रं स न्यस्तशस्त्रः पुनराह व्याधः
iti bruvāṇaṁ munipuṁgavaṁ taṁ dayānidhiṁ niḥspṛhamagryabuddhim viśuddhasattvaṁ sukṛtaikapātraṁ sa nyastaśastraḥ punarāha vyādhaḥ
इस प्रकार कहते हुए उस दयानिधि, निःस्पृह, अग्रबुद्धि, विशुद्धसत्त्व, पुण्य के एकमात्र पात्र मुनिश्रेष्ठ से, अपना शस्त्र त्यागकर व्याध ने पुनः कहा —