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वैष्णव खण्ड · अध्याय 172

व्याधस्य पूर्वजन्मकथनम् — व्याध के पूर्वजन्म की कथा

अध्याय 171अध्याय-सूचीअध्याय 173

श्लोक 1 (skanda.2.172.1)

व्याध उवाच । भवताऽनुगृहीतोऽस्मि मुने पापोऽतिदुष्टधीः । दयालवो महांतो हि स्वभावादेव साधवः ॥

vyādha uvāca bhavatā'nugṛhīto'smi mune pāpo'tiduṣṭadhīḥ dayālavo mahānto hi svabhāvādeva sādhavaḥ

व्याध ने कहा — हे मुने, मैं पापी और अत्यंत दुष्टबुद्धि हूँ, फिर भी आपने मुझ पर अनुग्रह किया है। महापुरुष स्वभाव से ही दयालु और साधु होते हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.172.2)

क्व व्याधश्चाऽकुलीनोऽहं क्व च वा मतिरीदृशी । केवलं भवतामेव मन्येऽनुग्रहमुत्तमम् ॥

kva vyādhaścā'kulīno'haṁ kva ca vā matirīdṛśī kevalaṁ bhavatāmeva manye'nugrahamuttamam

कहाँ मैं कुलहीन व्याध, और कहाँ ऐसी बुद्धि — यह सब केवल आप जैसे महापुरुषों का ही उत्तम अनुग्रह है, ऐसा मैं मानता हूँ।

श्लोक 3 (skanda.2.172.3)

अथ साधो च शिष्योस्मि कृपापात्रोस्मि मानद । अनुग्राह्योऽस्मि पुत्रोऽस्मि कृपां कुरु दयानिधे ॥

atha sādho ca śiṣyosmi kṛpāpātrosmi mānada anugrāhyo'smi putro'smi kṛpāṁ kuru dayānidhe

हे साधु, हे मानद, अब मैं आपका शिष्य हूँ, कृपा का पात्र हूँ। मैं अनुग्रह के योग्य हूँ, आपका पुत्र हूँ — हे दयानिधे, मुझ पर कृपा कीजिए।

श्लोक 4 (skanda.2.172.4)

यथा मे न पुनर्भूयादसन्मतिरनर्थदा । सद्भिस्तु संगतेः क्वापि नभूयो दुःखमश्नुते ॥

yathā me na punarbhūyādasanmatiranarthadā sadbhistu saṅgateḥ kvāpi nabhūyo duḥkhamaśnute

जिससे मुझे फिर से अनर्थकारी दुर्बुद्धि प्राप्त न हो। सज्जनों की संगति पाकर मनुष्य फिर कभी दुःख नहीं भोगता।

श्लोक 5 (skanda.2.172.5)

तस्माद्बोधय मां विप्र सूक्तैस्तैर्वृजिनापहैः । येन चाद्धा तरिष्यंति संसाराब्धिं मुमुक्षवः ॥

tasmādbodhaya māṁ vipra sūktaistairvṛjināpahaiḥ yena cāddhā tariṣyanti saṁsārābdhiṁ mumukṣavaḥ

अतः हे विप्र, मुझे उन सूक्तियों से बोध कराइए जो पाप का नाश करती हैं, जिनके द्वारा मुमुक्षुजन संसार-सागर को निश्चय ही तर जाते हैं।

श्लोक 6 (skanda.2.172.6)

साधूनां समचित्तानां तथा भूतदयावताम् । न च हीनोत्तमः क्वापि नात्मीयो हि परस्तथा ॥

sādhūnāṁ samacittānāṁ tathā bhūtadayāvatām na ca hīnottamaḥ kvāpi nātmīyo hi parastathā

जो साधुजन समदर्शी और समस्त प्राणियों पर दयालु होते हैं, उनके लिए न कोई हीन-उत्तम होता है, न कोई अपना-पराया।

श्लोक 7 (skanda.2.172.7)

ऐकाग्र्येण विचिंत्याथ चित्तशुद्धिं च पृच्छति । सर्वदोषयुतो वापि सर्वधर्मोज्झितोऽपि वा ॥

aikāgryeṇa vicintyātha cittaśuddhiṁ ca pṛcchati sarvadoṣayuto vāpi sarvadharmojjhito'pi vā

चाहे कोई सब दोषों से युक्त हो अथवा सभी धर्मों से रहित ही क्यों न हो, यदि वह एकाग्रचित्त होकर विचारकर चित्तशुद्धि के विषय में पूछे,

श्लोक 8 (skanda.2.172.8)

कृतानुतापश्च यदा यदा पृच्छति वै गुरून् । तदैवोपदिशंत्यद्धा ज्ञानं संसारमोचकम् ॥

kṛtānutāpaśca yadā yadā pṛcchati vai gurūn tadaivopadiśantyaddhā jñānaṁ saṁsāramocakam

जब भी पश्चात्तापयुक्त होकर वह गुरुजनों से पूछता है, तभी वे संसार से मुक्त करने वाला ज्ञान निश्चय ही उपदेश करते हैं।

श्लोक 9 (skanda.2.172.9)

यथा गंगा मनुष्याणां पापनाशस्य भाविनी । तथा मन्दसमुद्धारस्वभावाः साधवः स्मृताः ॥

yathā gaṅgā manuṣyāṇāṁ pāpanāśasya bhāvinī tathā mandasamuddhārasvabhāvāḥ sādhavaḥ smṛtāḥ

जैसे गंगा मनुष्यों के पापों का नाश करने वाली मानी जाती है, वैसे ही साधुजन भी स्वभाव से अधम जनों के उद्धार करने वाले माने गए हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.172.10)

मा विचारय मां बोद्धुं दयालो भक्तवत्सल । शुश्रूषुत्वान्नतत्वाच्च शुद्धत्वात्तव संगतेः ॥

mā vicāraya māṁ boddhuṁ dayālo bhaktavatsala śuśrūṣutvānnatatvācca śuddhatvāttava saṅgateḥ

हे दयालु, हे भक्तवत्सल, मुझे जानने-परखने के लिए विचार मत कीजिए। मेरी सेवाभावना, विनम्रता और आपकी संगति की पवित्रता से ही मैं शुद्ध हो जाऊँगा।

श्लोक 11 (skanda.2.172.11)

इति व्याधवचः श्रुत्वा पुनर्विस्मितमानसः । साधुसाध्विति संभाष्य धर्मानेतानुवाच ह ॥

iti vyādhavacaḥ śrutvā punarvismitamānasaḥ sādhusādhviti saṁbhāṣya dharmānetānuvāca ha

व्याध के इन वचनों को सुनकर मुनि पुनः विस्मित हो गए। 'साधु साधु' कहकर उन्होंने ये धर्म कहने आरम्भ किए।

श्लोक 12 (skanda.2.172.12)

शंख उवाच । विष्णुप्रीतिकरान्दिव्यान्संसाराब्धिविमोचकान् । कुरु धर्मांश्च वैशाखे यदि व्याध शमिच्छसि ॥

śaṅkha uvāca viṣṇuprītikarāndivyānsaṁsārābdhivimocakān kuru dharmāṁśca vaiśākhe yadi vyādha śamicchasi

शंख ने कहा — हे व्याध, यदि तू शांति चाहता है, तो वैशाख मास में विष्णु को प्रसन्न करने वाले, दिव्य और संसार-सागर से मुक्त करने वाले धर्मों का आचरण कर।

श्लोक 13 (skanda.2.172.13)

आतपो बाधते घोरो न च्छाया नांबु चात्र च । तस्मात्स्थलांतरं यावो यत्र च्छाया तु वर्तते ॥

ātapo bādhate ghoro na cchāyā nāmbu cātra ca tasmātsthalāntaraṁ yāvo yatra cchāyā tu vartate

यहाँ भीषण धूप सता रही है, न छाया है न जल। अतः चलो किसी और स्थान पर चलें जहाँ छाया हो।

श्लोक 14 (skanda.2.172.14)

तत्र गत्वा जलं पीत्वा सुच्छायां च समाश्रितः । तत्र ते वर्णयिष्यामि माहात्म्यं पापनाशनम् ॥

tatra gatvā jalaṁ pītvā succhāyāṁ ca samāśritaḥ tatra te varṇayiṣyāmi māhātmyaṁ pāpanāśanam

वहाँ जाकर, जल पीकर और अच्छी छाया का आश्रय लेकर, वहीं मैं तुझे पापनाशक माहात्म्य का वर्णन करूँगा।

श्लोक 15 (skanda.2.172.15)

विष्णोर्माधवमासस्य यथादृष्टं यथाश्रुतम् । इत्युक्तो मुनिना तेन व्याधः प्राह कृताञ्जलिः ॥

viṣṇormādhavamāsasya yathādṛṣṭaṁ yathāśrutam ityukto muninā tena vyādhaḥ prāha kṛtāñjaliḥ

विष्णु के माधव मास का माहात्म्य जैसा मैंने देखा और सुना है। मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर व्याध ने हाथ जोड़कर कहा —

श्लोक 16 (skanda.2.172.16)

इतो विदूरे सलिलं वर्तते च सरोवरे । कपित्थास्तत्र वै सन्ति फलभारेण पीडिताः ॥

ito vidūre salilaṁ vartate ca sarovare kapitthāstatra vai santi phalabhāreṇa pīḍitāḥ

यहाँ से थोड़ी दूर पर एक सरोवर में जल है, और वहाँ फलों के भार से लदे हुए कैथ के वृक्ष भी हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.172.17)

गच्छावस्तत्र संतुष्टिर्भविता नात्र संशयः । व्याधेनैवं समादिष्टस्तेन साकं ययौ मुनिः ॥

gacchāvastatra santuṣṭirbhavitā nātra saṁśayaḥ vyādhenaivaṁ samādiṣṭastena sākaṁ yayau muniḥ

चलिए वहीं चलें, वहाँ निश्चय ही संतोष मिलेगा। व्याध के इस प्रकार निर्देश देने पर मुनि उसके साथ चल दिए।

श्लोक 18 (skanda.2.172.18)

कियद्दूरं ततो गत्वा ददर्शाग्रे सरोवरम् । बककारण्डवाकीर्णं चक्रवाकोपशोभितम् ॥

kiyaddūraṁ tato gatvā dadarśāgre sarovaram bakakāraṇḍavākīrṇaṁ cakravākopaśobhitam

कुछ दूर चलकर उन्होंने आगे एक सरोवर देखा, जो बगुलों और करंडवों से भरा हुआ और चक्रवाक पक्षियों से सुशोभित था।

श्लोक 19 (skanda.2.172.19)

हंससारसक्रौंचाद्यैः समंतात्परिशोभितम् । कीचकैश्च सुघोषैश्च कूजितं भ्रमरैरपि ॥

haṁsasārasakraunycādyaiḥ samantātpariśobhitam kīcakaiśca sughoṣaiśca kūjitaṁ bhramarairapi

वह चारों ओर हंस, सारस, क्रौंच आदि पक्षियों से सुशोभित था, तथा मधुर स्वर वाले बाँसों और गुंजार करते भ्रमरों से गुंजित था।

श्लोक 20 (skanda.2.172.20)

नक्रकच्छपमीनाद्यैर्वगाह्यं सुमनोहरम् । कुमुदोत्पलकह्लारपुंडरीकादिभिर्महत् ॥

nakrakacchapamīnādyairavagāhyaṁ sumanoharam kumudotpalakahlārapuṇḍarīkādibhirmahat

वह मगर, कछुए, मछली आदि से युक्त, अवगाहन योग्य, अति मनोहर तथा कुमुद, उत्पल, कह्लार, पुंडरीक आदि से महान सुशोभित था।

श्लोक 21 (skanda.2.172.21)

शतपत्रैः कोकनदैः समन्तात्परिशोभितम् । पक्षिणां च कलारावैर्मुखरनयनोत्सवम् ॥

śatapatraiḥ kokanadaiḥ samantātpariśobhitam pakṣiṇāṁ ca kalārāvairmukharanayanotsavam

वह शतपत्र और कोकनद कमलों से चारों ओर सुशोभित था, पक्षियों की मधुर बोली से मुखरित होकर नेत्रों के लिए उत्सवरूप था।

श्लोक 22 (skanda.2.172.22)

तटे कीचकगुल्मैश्च तथा वृक्षैश्च शोभितम् । वटैः करंजैर्नीपैश्च चिंचिणीभिस्तथैव च ॥

taṭe kīcakagulmaiśca tathā vṛkṣaiśca śobhitam vaṭaiḥ karañjairnīpaiśca ciñciṇībhistathaiva ca

उसके तट पर बाँस की झाड़ियाँ और वृक्ष सुशोभित थे — बरगद, करंज, कदंब तथा इमली के वृक्ष भी थे।

श्लोक 23 (skanda.2.172.23)

निम्बप्लक्षप्रियालैश्च चम्पकैर्बकुलैः शुभैः । पुन्नागैस्तुम्बरैश्चैव कपित्थामलकैरपि ॥

nimbaplakṣapriyālaiśca campakairbakulaiḥ śubhaiḥ punnāgaistumbaraiścaiva kapitthāmalakairapi

नीम, पाकड़, चिरौंजी, चंपा, सुंदर मौलसिरी, पुन्नाग, तुम्बरु, कैथ और आँवले के वृक्षों से भी वह सुशोभित था।

श्लोक 24 (skanda.2.172.24)

निष्पेषणैश्च जम्बूभिः समंतात्परिशोभितम् । वन्यमातंगसारंगवराहमहिषादिभिः ॥

niṣpeṣaṇaiśca jambūbhiḥ samantātpariśobhitam vanyamātaṅgasāraṅgavarāhamahiṣādibhiḥ

वह चारों ओर जामुन के फलों से भरे वृक्षों से सुशोभित था तथा वन्य हाथियों, मृगों, वराहों, भैंसों आदि से युक्त था।

श्लोक 25 (skanda.2.172.25)

शशैश्च शल्लकैश्चैव गवयैरुपशोभितम् । खङ्गनाभिमृगाद्यैश्च व्याघ्रैः सिंहैर्वृकैरपि ॥

śaśaiśca śallakaiścaiva gavayairupaśobhitam khaṅganābhimṛgādyaiśca vyāghraiḥ siṁhairvṛkairapi

वह खरगोश, साही, गवय, गैंडे, कस्तूरी मृग आदि से, तथा बाघ, सिंह और भेड़ियों से भी सुशोभित था।

श्लोक 26 (skanda.2.172.26)

खरांतकैश्च शरभैश्च मरीभिः सुमण्डितम् । शाखाशाखांतरं शीघ्रं प्लवमानैः प्लवंगमैः ॥

kharāntakaiśca śarabhaiśca marībhiḥ sumaṇḍitam śākhāśākhāntaraṁ śīghraṁ plavamānaiḥ plavaṅgamaiḥ

वह श्वापद-नाशक शरभों तथा मृगों से सुसज्जित था, और डाल-डाल पर वेग से कूदते हुए वानरों से भी युक्त था।

श्लोक 27 (skanda.2.172.27)

मार्जारैश्चैव भल्लूकैर्भीषणं रुरुभिस्तथा । झिल्लीशब्दैश्च क्रेंकारैः कीचकानां रवैस्तथा ॥

mārjāraiścaiva bhallūkairbhīṣaṇaṁ rurubhistathā jhillīśabdaiśca kreṅkāraiḥ kīcakānāṁ ravaistathā

जंगली बिलावों, भालुओं और रुरु मृगों से वह भयावह भी लगता था, तथा झींगुरों की झंकार, कर्कश ध्वनि और बाँसों की सरसराहट से गूँजता था।

श्लोक 28 (skanda.2.172.28)

घोरवायुविनिर्घातदारुभारैः समन्वितम् । एतादृशं सरो दिव्यं व्याधेनैव प्रदर्शितम् ॥

ghoravāyuvinirghātadārubhāraiḥ samanvitam etādṛśaṁ saro divyaṁ vyādhenaiva pradarśitam

भीषण वायु के झोंकों से टूटती डालियों के भार से युक्त — ऐसा वह दिव्य सरोवर व्याध ने ही मुनि को दिखाया।

श्लोक 29 (skanda.2.172.29)

ददर्श मुनिशार्दूलस्तृषया बाधितो भृशम् । स्नात्वा मध्याह्नवेलायां सरस्यस्मिन्मनोरमे ॥

dadarśa muniśārdūlastṛṣayā bādhito bhṛśam snātvā madhyāhnavelāyāṁ sarasyasminmanorame

प्यास से अत्यंत व्याकुल उस श्रेष्ठ मुनि ने इसे देखा, और मध्याह्न के समय इस मनोरम सरोवर में स्नान किया।

श्लोक 30 (skanda.2.172.30)

वाससी परिधायाऽथ कृत्वा माध्याह्निकीः क्रियाः । देवपूजां ततः कृत्वा भुक्त्वा फलमतन्द्रितः ॥

vāsasī paridhāyā'tha kṛtvā mādhyāhnikīḥ kriyāḥ devapūjāṁ tataḥ kṛtvā bhuktvā phalamatandritaḥ

वस्त्र धारण करके उन्होंने मध्याह्न की क्रियाएँ कीं, फिर देवपूजा करके, अनथक भाव से फल का भोजन किया।

श्लोक 31 (skanda.2.172.31)

व्याधोपनीतं सुस्वादु कपित्थं श्रमहारि च । सुखोपविष्टः पप्रच्छ व्याधं धर्मरतं पुनः ॥

vyādhopanītaṁ susvādu kapitthaṁ śramahāri ca sukhopaviṣṭaḥ papraccha vyādhaṁ dharmarataṁ punaḥ

व्याध द्वारा लाया गया वह स्वादिष्ट, श्रमहारी कैथ फल खाकर, सुखपूर्वक बैठे हुए मुनि ने धर्मरत व्याध से पुनः पूछा —

श्लोक 32 (skanda.2.172.32)

किं वक्तव्यं मया ह्यद्य तवादौ धर्मतत्पर । धर्माश्च बहवः संति नानामार्गाः पृथग्विधाः ॥

kiṁ vaktavyaṁ mayā hyadya tavādau dharmatatpara dharmāśca bahavaḥ santi nānāmārgāḥ pṛthagvidhāḥ

हे धर्मतत्पर, आज मुझे तुझसे सबसे पहले क्या कहना चाहिए? धर्म तो अनेक हैं और विविध मार्गों से भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं।

श्लोक 33 (skanda.2.172.33)

तत्र वैशाखमासोक्ताः सूक्ष्मा अपि महार्थदाः । सर्वेषामेव जन्तूनामिहाऽमुत्र फलप्रदाः ॥

tatra vaiśākhamāsoktāḥ sūkṣmā api mahārthadāḥ sarveṣāmeva jantūnāmihā'mutra phalapradāḥ

उनमें भी वैशाख मास में कहे गए धर्म, यद्यपि सूक्ष्म हैं, महान फल देने वाले हैं और सभी प्राणियों को इस लोक तथा परलोक में फल देते हैं।

श्लोक 34 (skanda.2.172.34)

यत्प्रष्टव्यं मनसि ते यच्चादौ तच्च पृच्छताम् । इत्युक्तो मुनिना तेन व्याधः प्रांजलिरब्रवीत् ॥

yatpraṣṭavyaṁ manasi te yaccādau tacca pṛcchatām ityukto muninā tena vyādhaḥ prāñjalirabravīt

जो तेरे मन में पूछने योग्य हो और जो पहले पूछना चाहे, वह पूछ ले। मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर व्याध ने हाथ जोड़कर कहा —

श्लोक 35 (skanda.2.172.35)

व्याध उवाच । केन वा कर्मणा चाऽऽसीद्व्याधजन्म तमोमयम् । केन वा चेदृशी बुद्धिः संगतिर्वा महात्मनः ॥

vyādha uvāca kena vā karmaṇā cā'sīdvyādhajanma tamomayam kena vā cedṛśī buddhiḥ saṅgatirvā mahātmanaḥ

व्याध ने कहा — किस कर्म के कारण मुझे यह तमोमय व्याध-जन्म मिला, और किस कारण मुझे ऐसी बुद्धि तथा एक महात्मा की संगति प्राप्त हुई?

श्लोक 36 (skanda.2.172.36)

एतच्चान्यत्समाचक्ष्व यदि मां मन्यसे प्रभो । इत्युक्तः पुनरप्याह शंखो नाम महामुनिः ॥

etaccānyatsamācakṣva yadi māṁ manyase prabho ityuktaḥ punarapyāha śaṅkho nāma mahāmuniḥ

हे प्रभो, यदि आप मुझे योग्य समझें तो यह और अन्य बातें भी बताइए। ऐसा कहे जाने पर शंख नामक महामुनि ने पुनः कहा —

श्लोक 37 (skanda.2.172.37)

मेघगंभीरया वाचा स्मयमानमुखांबुजः । शंख उवाच । शाकले नगरे पूर्वं द्विजस्त्वं वेदपारगः ॥

meghagambhīrayā vācā smayamānamukhāmbujaḥ śaṅkha uvāca śākale nagare pūrvaṁ dvijastvaṁ vedapāragaḥ

मेघ के समान गंभीर वाणी से, मुखकमल पर स्मित लिए हुए। शंख ने कहा — पूर्वजन्म में तू शाकल नगर में वेद के पारगामी एक ब्राह्मण था।

श्लोक 38 (skanda.2.172.38)

स्तम्बो नाम महातेजास्तथा श्रीवत्सगोत्रजः । तवेष्टा गणिका काचिदासीत्तत्संगदोषतः ॥

stambo nāma mahātejāstathā śrīvatsagotrajaḥ taveṣṭā gaṇikā kācidāsīttatsaṅgadoṣataḥ

तू स्तम्ब नामक महातेजस्वी और श्रीवत्स गोत्र में उत्पन्न था। तेरी एक वेश्या से प्रीति थी, और उसी संग के दोष से,

श्लोक 39 (skanda.2.172.39)

त्यक्त्वा नित्यक्रिया नित्यं शूद्रवद्गृहमागतः । शून्याचारस्य दुष्टस्य परित्यक्तक्रियस्य च ॥

tyaktvā nityakriyā nityaṁ śūdravadgṛhamāgataḥ śūnyācārasya duṣṭasya parityaktakriyasya ca

तू नित्य कर्म त्यागकर शूद्र के समान घर आता था, आचार-हीन, दुष्ट, और सभी कर्मों को त्याग चुका था।

श्लोक 40 (skanda.2.172.40)

ब्राह्मणी च तदा चाऽऽसीद्भार्या कांतिमती तव । सा त्वां पर्यचरत्सुभ्रूः सवेश्यं ब्राह्मणाधमम् ॥

brāhmaṇī ca tadā cā'sīdbhāryā kāntimatī tava sā tvāṁ paryacaratsubhrūḥ savevyaṁ brāhmaṇādhamam

उस समय तेरी पत्नी एक ब्राह्मणी थी, जिसका नाम कांतिमती था। वह सुंदर भौंहों वाली स्त्री तेरी, वेश्यासक्त और अधम ब्राह्मण की, सेवा करती थी।

श्लोक 41 (skanda.2.172.41)

उभयोः क्षालयंती च पादांस्त्वत्प्रियकारिणी । उभयोरप्यधः शेते उभयोर्वचने रता ॥

ubhayoḥ kṣālayantī ca pādāṁstvatpriyakāriṇī ubhayorapyadhaḥ śete ubhayorvacane ratā

तुझे प्रसन्न रखने के लिए वह तुम दोनों के, तुम्हारे और उस वेश्या के, पैर धोती थी, दोनों के चरणों में सोती थी, और दोनों की आज्ञा में रत रहती थी।

श्लोक 42 (skanda.2.172.42)

वेश्यया वार्यमाणाऽपि पातिव्रत्यव्रतस्थिता । एवं शुश्रूषयंत्या हि भर्तारं वेश्यया सह ॥

veśyayā vāryamāṇā'pi pātivratyavratasthitā evaṁ śuśrūṣayantyā hi bhartāraṁ veśyayā saha

वेश्या द्वारा रोके जाने पर भी वह पातिव्रत्य-व्रत में स्थिर रही। इस प्रकार वह वेश्या के साथ भी अपने पति की सेवा में लगी रही,

श्लोक 43 (skanda.2.172.43)

जगाम सुमहान्कालो दुःखिताया महीतले । अपरस्मिन्दिने भर्ता माषं च मूलकान्वितम् ॥

jagāma sumahānkālo duḥkhitāyā mahītale aparasmindine bhartā māṣaṁ ca mūlakānvitam

दुःखी होते हुए उस स्त्री का बहुत बड़ा समय बीत गया। फिर एक दिन तेरे पति-शरीर ने उड़द को मूली के साथ मिलाकर,

श्लोक 44 (skanda.2.172.44)

अभक्षयच्छूद्रधर्मान्निष्पावांस्तिलमिश्रितान् । तदपथ्यमशित्वा तु वमंश्चैव विरेचयन् ॥

abhakṣayacchūdradharmānniṣpāvāṁstilamiśritān tadapathyamaśitvā tu vamaṁścaiva virecayan

शूद्र-योग्य आचरण करते हुए तिल से मिली फलियाँ भी खाईं। वह अपथ्य खाकर उल्टी और दस्त से पीड़ित हो गया।

श्लोक 45 (skanda.2.172.45)

अपथ्याद्दारुणो रोगो व्यजायत भगंदरः । स दह्यमानो रोगेण दिवारात्रं तु भूरिशः ॥

apathyāddāruṇo rogo vyajāyata bhagandaraḥ sa dahyamāno rogeṇa divārātraṁ tu bhūriśaḥ

उस कुभोजन से भगन्दर नामक भयंकर रोग उत्पन्न हो गया। वह दिन-रात उस रोग से अत्यधिक जलता रहा।

श्लोक 46 (skanda.2.172.46)

यावदास्ते गृहे वित्तं तावद्वेश्या च संस्थिता । गृहीत्वा तस्य सा वित्तं पश्चान्नोवास मंदिरे ॥

yāvadāste gṛhe vittaṁ tāvadveśyā ca saṁsthitā gṛhītvā tasya sā vittaṁ paścānnovāsa mandire

जब तक घर में धन रहा, तब तक वह वेश्या भी टिकी रही। उसका धन लेकर, बाद में वह उसके घर में नहीं रही।

श्लोक 47 (skanda.2.172.47)

अन्यस्य पार्श्वमासाद्य गता घोरा सुनिर्घृणा । ततः स दीनवचनो व्याधिबाधासुपीडितः ॥

anyasya pārśvamāsādya gatā ghorā sunirghṛṇā tataḥ sa dīnavacano vyādhibādhāsupīḍitaḥ

वह भयंकर और अत्यंत निर्दय स्त्री किसी अन्य के पास चली गई। तब वह रोग की पीड़ा से अत्यंत सताया हुआ, दीन वचन बोलता हुआ,

श्लोक 48 (skanda.2.172.48)

उक्तवान्स रुदन्भार्यां रुजा व्याकुलमानसः । परिपालय मां देवि वेश्याऽऽसक्तं सुनिष्ठुरम् ॥

uktavānsa rudanbhāryāṁ rujā vyākulamānasaḥ paripālaya māṁ devi veśyā'saktaṁ suniṣṭhuram

रोग से व्याकुल मन वाला वह रोता हुआ अपनी पत्नी से बोला — हे देवि, मुझ वेश्यासक्त और अत्यंत निष्ठुर की रक्षा करो।

श्लोक 49 (skanda.2.172.49)

न मयोपकृतं किंचित्त्वयि सुंदरि पावनि । को भार्यां प्रणतां पापो नानुमन्येत गर्हितः ॥

na mayopakṛtaṁ kiñcittvayi sundari pāvani ko bhāryāṁ praṇatāṁ pāpo nānumanyeta garhitaḥ

हे सुंदरी, हे पवित्रे, मैंने तेरे लिए कुछ भी भला नहीं किया। ऐसा कौन-सा निंदित पापी होगा जो विनम्र पत्नी को स्वीकार न करे?

श्लोक 50 (skanda.2.172.50)

स षंढो भविता भद्रे दश जन्मसु पंचसु । दिवारात्रं महाभागे निमदितः साधुभिर्जनैः ॥

sa ṣaṇḍho bhavitā bhadre daśa janmasu pañcasu divārātraṁ mahābhāge nimaditaḥ sādhubhirjanaiḥ

हे भद्रे, हे महाभागे, जो तुझे अपमानित करे, वह पन्द्रह जन्मों तक नपुंसक होगा और दिन-रात साधु जनों द्वारा तिरस्कृत रहेगा,

श्लोक 51 (skanda.2.172.51)

पापयोनिमवाप्स्यामि त्वां साध्वीमवमन्य वै । अहं क्रोधेन दग्धोऽस्मि तवापमानजेन वै ॥

pāpayonimavāpsyāmi tvāṁ sādhvīmavamanya vai ahaṁ krodhena dagdho'smi tavāpamānajena vai

तुझ सती को अपमानित करके मैं पापयोनि प्राप्त करूँगा। मैं तेरे अपमान से उत्पन्न क्रोध से ही जल रहा हूँ।

श्लोक 52 (skanda.2.172.52)

एवं ब्रुवाणं भर्तारं कृताञ्जलिपुटाऽब्रवीत् । न दैन्यं भवता कार्यं न व्रीडा कांत मां प्रति ॥

evaṁ bruvāṇaṁ bhartāraṁ kṛtāñjaliputā'bravīt na dainyaṁ bhavatā kāryaṁ na vrīḍā kānta māṁ prati

इस प्रकार बोलते हुए पति से हाथ जोड़े हुए वह बोली — हे प्रिय, न आपको दीनता करनी चाहिए, न मेरे प्रति लज्जा करनी चाहिए।

श्लोक 53 (skanda.2.172.53)

न चाऽपि त्वयि मे क्रोधो येन दग्धो वदस्यथ । पुरा कृतानि पापानि दुःखानीह भवंति हि ॥

na cā'pi tvayi me krodho yena dagdho vadasyatha purā kṛtāni pāpāni duḥkhānīha bhavanti hi

मुझे आप पर कोई क्रोध नहीं है, जिससे आप कहते हैं कि मैं जल रहा हूँ। पूर्वकाल में किए गए पाप ही यहाँ दुःख के रूप में फलते हैं।

श्लोक 54 (skanda.2.172.54)

तानि या क्षमते साध्वी पुरुषो वा स उत्तमः । यन्मया पापया पापं कृतं वै पूर्वजन्मनि ॥

tāni yā kṣamate sādhvī puruṣo vā sa uttamaḥ yanmayā pāpayā pāpaṁ kṛtaṁ vai pūrvajanmani

जो सती स्त्री या पुरुष उन्हें क्षमापूर्वक सह लेता है, वही उत्तम है। मुझ पापिन ने ही पूर्वजन्म में जो पाप किया था,

श्लोक 55 (skanda.2.172.55)

तद्भुंजत्या न मे दुःखं न विषादः कथंचन । इत्येवमुक्त्वा भर्तारं सा सुभ्रूस्तमपालयत् ॥

tadbhuñjatyā na me duḥkhaṁ na viṣādaḥ kathañcana ityevamuktvā bhartāraṁ sā subhrūstamapālayat

उसे भोगती हुई मुझे न दुःख है, न किसी प्रकार विषाद। इस प्रकार पति से कहकर, वह सुंदर भौंहों वाली उसकी सेवा करती रही।

श्लोक 56 (skanda.2.172.56)

आनीय जनकाद्वित्तं बन्धुभ्यो वरवर्णिनी । क्षीरोदवासिनं देवं भर्त्तारं सा त्वचिंतयत् ॥

ānīya janakādvittaṁ bandhubhyo varavarṇinī kṣīrodavāsinaṁ devaṁ bharttāraṁ sā tvacintayat

वह सुंदर स्त्री अपने पिता और बंधुओं से धन लाकर, क्षीरसागर-निवासी देव को अपना पति मानकर उनका चिंतन करने लगी।

श्लोक 57 (skanda.2.172.57)

शोधयन्ती दिवारात्रौ पुरीषं मूत्रमेव च । नखेन कर्षती भर्त्तुः कृमीन्कष्टाच्छनैःशनैः ॥

śodhayantī divārātrau purīṣaṁ mūtrameva ca nakhena karṣatī bharttuḥ kṛmīnkaṣṭācchanaiḥśanaiḥ

वह दिन-रात उसके मल-मूत्र को साफ करती रहती, और अपने नाखूनों से बड़ी कठिनाई से, धीरे-धीरे पति के घाव से कीड़े निकालती रहती।

श्लोक 58 (skanda.2.172.58)

न सा स्वपिति रात्रौ तु न दिवा वरवर्णिनी । भर्त्तुर्दुःखेन संतप्ता दुःखितेदमवोचत ॥

na sā svapiti rātrau tu na divā varavarṇinī bhartturduḥkhena saṁtaptā duḥkhitedamavocat

वह सुंदर स्त्री न रात में सोती, न दिन में। पति के दुःख से संतप्त होकर, दुखी होकर वह ऐसा कहने लगी —

श्लोक 59 (skanda.2.172.59)

देवाश्च पातु भर्तारं पितरो ये च विश्रुताः । कुर्वंतु रोगहीनं मे भर्त्तारं गतकल्मषम् ॥

devāśca pātu bhartāraṁ pitaro ye ca viśrutāḥ kurvantu rogahīnaṁ me bharttāraṁ gatakalmaṣam

देवगण मेरे पति की रक्षा करें, और जो विख्यात पितृगण हैं वे भी मेरे पति को रोगमुक्त और निष्पाप बनाएँ।

श्लोक 60 (skanda.2.172.60)

चण्डिकायै प्रदास्यामि रक्तमांससमुद्भवम् । सुष्ठवन्नं माहिषोपेतं भर्त्तुरारोग्यहेतवे ॥

caṇḍikāyai pradāsyāmi raktamāṁsasamudbhavam suṣṭhavannaṁ māhiṣopetaṁ bharttorārogyahetave

पति के आरोग्य के लिए मैं देवी चण्डिका को रक्त-मांस से बना बलि, तथा भैंसे के साथ उत्तम अन्न अर्पित करूँगी।

श्लोक 61 (skanda.2.172.61)

मोदकान्कारयिष्यामि विघ्नेशाय महात्मने । मन्दवारे करिष्यामि चोपवासान्दशैव तु ॥

modakānkārayiṣyāmi vighneśāya mahātmane mandavāre kariṣyāmi copavāsāndaśaiva tu

मैं महात्मा विघ्नेश (गणेश) के लिए मोदक बनवाऊँगी, तथा शनिवार को दस उपवास करूँगी।

श्लोक 62 (skanda.2.172.62)

नोपभुंजामि मधुरं नोपभुंजामि वै घृतम् । तैलाभ्यंगविहीनाहं स्थास्ये नैवात्र संशयः ॥

nopabhuñjāmi madhuraṁ nopabhuñjāmi vai ghṛtam tailābhyaṅgavihīnāhaṁ sthāsye naivātra saṁśayaḥ

मैं न मिठाई खाऊँगी, न घी का सेवन करूँगी। मैं तेल के अभ्यंगन से रहित होकर रहूँगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 63 (skanda.2.172.63)

जीवताद्रोगहीनोऽयं भर्त्ता मे शरदां शतम् । एवं सा व्याहरद्देवी वासरे वासरे गते ॥

jīvatādrogahīno'yaṁ bharttā me śaradāṁ śatam evaṁ sā vyāharaddevī vāsare vāsare gate

मेरा यह पति रोगरहित होकर सौ शरदों तक जीवित रहे। इस प्रकार वह देवी हर बीतते दिन ऐसा कहती रहती थी।

श्लोक 64 (skanda.2.172.64)

तदा चाऽऽगान्मुनिः कश्चिन्महात्मा देवलाह्वयः । वैशाखे मासि घर्मार्तः सायाह्ने तस्य वै गृहम् ॥

tadā cā'gānmuniḥ kaścinmahātmā devalāhvayaḥ vaiśākhe māsi gharmārtaḥ sāyāhne tasya vai gṛham

उसी समय वैशाख मास में, गर्मी से पीड़ित होकर, देवल नामक कोई महात्मा मुनि सायंकाल के समय उसके घर आए।

श्लोक 65 (skanda.2.172.65)

तदा वै भार्यया चोक्तं भिषग्वै गृहमागतः । तेन वै रोगहानिः स्यात्तस्याऽऽतिथ्यं करोम्यहम् ॥

tadā vai bhāryayā coktaṁ bhiṣagvai gṛhamāgataḥ tena vai rogahāniḥ syāttasyā'tithyaṁ karomyaham

तब पत्नी ने सोचा — कोई वैद्य घर आया है, इससे रोग का नाश होगा; मैं इनका आतिथ्य करूँगी।

श्लोक 66 (skanda.2.172.66)

ज्ञात्वा त्वां धर्मविमुखं भिषग्व्याजेन वंचितः । पादावनेजनं कृत्वा तज्जलं मूर्ध्नि साक्षिपत् ॥

jñātvā tvāṁ dharmavimukhaṁ bhiṣagvyājena vañcitaḥ pādāvanejanaṁ kṛtvā tajjalaṁ mūrdhni sākṣipat

यह जानकर कि तू धर्म से विमुख है, वह वैद्य के बहाने से भ्रमित होकर आया था। उसने मुनि के पैर धोए और वह जल अपने मस्तक पर छिड़का।

श्लोक 67 (skanda.2.172.67)

पानकं च ददौ तस्मै घर्मार्ताय महात्मने । त्वयाऽनुमोदिता सायं घर्मतापनिवारकम् ॥

pānakaṁ ca dadau tasmai gharmārtāya mahātmane tvayā'numoditā sāyaṁ gharmatāpanivārakam

गर्मी से पीड़ित उस महात्मा को उसने संध्या समय गर्मी की तपन को दूर करने वाला मीठा शर्बत दिया — तूने भी उसे इसका अनुमोदन दिया।

श्लोक 68 (skanda.2.172.68)

स प्रातरुदिते सूर्ये मुनिः प्रायाद्यथाऽऽगतः । अथ चाल्पेन कालेन सन्निपातोऽभवत्तव ॥

sa prātarudite sūrye muniḥ prāyādyathā'gataḥ atha cālpena kālena sannipāto'bhavattava

प्रातःकाल सूर्योदय होने पर वह मुनि जैसे आया था वैसे ही चला गया। फिर थोड़े ही समय में तुझे सन्निपात रोग हो गया।

श्लोक 69 (skanda.2.172.69)

त्रिकट्व्यां नीयमानायां भर्त्तांगुलिमखंडयत् । उभयोर्दंतयोः श्लेषः सहसा समपद्यत ॥

trikaṭvyāṁ nīyamānāyāṁ bharttāṅgulimakhaṇḍayat ubhayordantayoḥ śleṣaḥ sahasā samapadyata

जब उसे त्रिकटु (औषधि) दी जा रही थी, तब पति ने अपनी उँगली काट ली, क्योंकि उसके दोनों जबड़े अचानक भिंच गए थे।

श्लोक 70 (skanda.2.172.70)

तत्खंडमंगुलेर्वक्त्रे स्थितं भर्तुः सुकोमलम् । खण्डयित्वागुलिं भर्ता पञ्चत्वमगमत्तदा ॥

tatkhaṇḍamaṅgulervaktre sthitaṁ bhartuḥ sukomalam khaṇḍayitvāguliṁ bhartā pañcatvamagamattadā

उस पति के उस कोमल टूटे हुए उँगली के टुकड़े को मुँह में लिए हुए, उँगली काटते हुए ही तेरा पति उस समय मृत्यु को प्राप्त हो गया।

श्लोक 71 (skanda.2.172.71)

शय्यायां सुमनोज्ञायां स्मरंस्तां पुंश्चली शुभाम् । मृतं विज्ञाय भर्त्तारं भार्या कांतिमती तव ॥

śayyāyāṁ sumanojñāyāṁ smaraṁstāṁ puṁścalī śubhām mṛtaṁ vijñāya bharttāraṁ bhāryā kāntimatī tava

अपनी सुंदर शय्या पर उस सुंदरी वेश्या का स्मरण करते हुए, तेरे पति की मृत्यु हो गई — यह जानकर तेरी पत्नी कांतिमती ने,

श्लोक 72 (skanda.2.172.72)

विक्रीय चाऽपि वलयं गृहीत्वा चेन्धनं बहु । चक्रे चितिं तेन साध्वी मध्ये कृत्वा पतिं तदा ॥

vikrīya cā'pi valayaṁ gṛhītvā cendhanaṁ bahu cakre citiṁ tena sādhvī madhye kṛtvā patiṁ tadā

अपनी चूड़ी बेचकर बहुत सारी लकड़ियाँ लेकर, उस सती स्त्री ने पति को बीच में रखकर चिता तैयार की।

श्लोक 73 (skanda.2.172.73)

अवगुह्य भुजाभ्यां च पादौ चाश्लिष्य पादयोः । मुखे मुखं विनिक्षिप्य हृदयं हृदये तथा ॥

avaguhya bhujābhyāṁ ca pādau cāśliṣya pādayoḥ mukhe mukhaṁ vinikṣipya hṛdayaṁ hṛdaye tathā

अपनी दोनों भुजाओं से उसे आलिंगन कर, अपने पैरों से उसके पैरों को सटाकर, मुख को मुख पर और हृदय को हृदय पर रखकर,

श्लोक 74 (skanda.2.172.74)

जघने जघनं देवी ह्यात्मानं सन्निवेश्य च । दाहयामास कल्याणी भर्तृदेहं रुजान्वितम् । आत्मना सह कल्याणी ज्वलिते जातवेदसि ॥

jaghane jaghanaṁ devī hyātmānaṁ sanniveśya ca dāhayāmāsa kalyāṇī bhartṛdehaṁ rujānvitam ātmanā saha kalyāṇī jvalite jātavedasi

हिप को हिप पर रखकर उस देवी ने अपने को स्थापित किया, और अग्नि के प्रज्वलित होने पर उस कल्याणी स्त्री ने रोगग्रस्त पति के शरीर को अपने ही साथ जलाकर भस्म कर दिया।

श्लोक 75 (skanda.2.172.75)

विमुच्य देहं सहसा जगाम पतिं समालिंग्य मुरारिलोकम् । पानीयदानेन च माधवेऽस्मिन्पादावनेजादपि योगिगम्यम् ॥

vimucya dehaṁ sahasā jagāma patiṁ samāliṅgya murārilokam pānīyadānena ca mādhave'sminpādāvanejādapi yogigamyam

देह त्यागकर वह पति को आलिंगन किए हुए तत्क्षण मुरारि (विष्णु) के लोक को प्राप्त हो गई — इस वैशाख मास में जल-दान और चरण-प्रक्षालन के पुण्य से भी वह वही लोक पाई, जो योगियों को भी दुर्लभ है।

श्लोक 76 (skanda.2.172.76)

त्वमंतकाले गणिकाविचिंतया देहं त्यक्त्वा मुक्तसमस्तकिल्बिषः । जन्म व्याध्यं प्राप्यसे घोररूपं हिंसासक्तः सर्वदोद्वेगकारी ॥

tvamantakāle gaṇikāvicintayā dehaṁ tyaktvā muktasamastakilbiṣaḥ janma vyādhyaṁ prāpyase ghorarūpaṁ hiṁsāsaktaḥ sarvadodvegakārī

किंतु तूने अंतकाल में वेश्या का ही चिंतन करते हुए देह त्यागी थी, इसलिए यद्यपि (उसी जलदान के पुण्य से) समस्त पापों से मुक्त होकर भी, तूने यह घोर रूप वाला, हिंसा में रत, सबको सदा उद्वेग देने वाला व्याध-जन्म पाया।

श्लोक 77 (skanda.2.172.77)

दत्ता त्वया पानकस्याऽपि दाने मासेऽनुज्ञा माधवे साधुजाने । व्याधो जातस्तेन जाता सुबुद्धिर्धर्मान्प्रष्टुं सर्वसौख्यैकहेतून् ॥

dattā tvayā pānakasyā'pi dāne māse'nujñā mādhave sādhujāne vyādho jātastena jātā subuddhirdharmānpraṣṭuṁ sarvasaukhyaikahetūn

फिर भी तूने माधव मास में उस साधुजन को शर्बत के दान की अनुमति दी थी — उसी के फलस्वरूप, यद्यपि तू व्याध हुआ, तुझे धर्म पूछने की, सभी सुखों के एकमात्र हेतुभूत धर्मों के विषय में जानने की, सुबुद्धि प्राप्त हुई।

श्लोक 78 (skanda.2.172.78)

धृतं मूर्ध्ना पादशौचावशिष्टं जलं मुनेः सर्वपापापहारि । तेनेयं ते संगतिर्मे वनेऽस्मिन्यया भूयः संपदः सन्ततिश्च ॥

dhṛtaṁ mūrdhnā pādaśaucāvaśiṣṭaṁ jalaṁ muneḥ sarvapāpāpahāri tenaiyaṁ te saṅgatirme vane'sminyayā bhūyaḥ saṁpadaḥ santatiśca

मुनि के चरण-प्रक्षालन का शेष जल, जो सभी पापों का हरण करने वाला है, तेरी पत्नी ने अपने मस्तक पर धारण किया था — उसी के प्रभाव से इस वन में तुझे मेरी यह संगति प्राप्त हुई, जिससे आगे तुझे संपत्ति और सुसंतति भी प्राप्त होगी।

श्लोक 79 (skanda.2.172.79)

इत्येतत्सर्वमाख्यातं पूर्वजन्मनि यत्कृतम् । कर्म पुण्यं पापकं च दृष्टं दिव्येन चक्षुषा ॥

ityetatsarvamākhyātaṁ pūrvajanmani yatkṛtam karma puṇyaṁ pāpakaṁ ca dṛṣṭaṁ divyena cakṣuṣā

इस प्रकार यह सब कहा गया, जो कुछ भी तूने पूर्वजन्म में किया था — दिव्य दृष्टि से देखा गया वह पुण्य और पाप दोनों प्रकार का कर्म।

श्लोक 80 (skanda.2.172.80)

गोप्यं वा ते प्रवक्ष्यामि यद्भवाञ्छ्रोतुमिच्छति । जाता ते चित्तशुद्धिर्वै स्वस्ति भूयान्महामते ॥

gopyaṁ vā te pravakṣyāmi yadbhavāñchrotumicchati jātā te cittaśuddhirvai svasti bhūyānmahāmate

जो कुछ भी तू सुनना चाहे, चाहे वह गोपनीय ही क्यों न हो, मैं तुझसे कहूँगा। तेरी चित्तशुद्धि हो चुकी है — हे महामते, तेरा कल्याण हो।

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