वैष्णव खण्ड · अध्याय 173
वायुशापकथनम् — वायु को दिए गए शाप की कथा
श्लोक 1 (skanda.2.173.1)
व्याध उवाच । विष्णुमुद्दिश्य कर्तव्या धर्मा भागवताः शुभाः । तत्राऽपि माधवीयाश्च इत्युक्तं तु त्वया पुरा ॥
vyādha uvāca viṣṇumuddiśya kartavyā dharmā bhāgavatāḥ śubhāḥ tatrā'pi mādhavīyāśca ityuktaṁ tu tvayā purā
व्याध ने कहा — विष्णु को लक्ष्य कर शुभ भागवत धर्मों का पालन करना चाहिए, और उनमें भी माधव (वैशाख) मास के धर्म श्रेष्ठ हैं — ऐसा आपने पहले कहा था।
श्लोक 2 (skanda.2.173.2)
स विष्णुः कीदृशो ब्रह्मन्किं वा तस्य हि लक्षणम् । किं मानं तस्य सद्भावैः कैर्ज्ञेयो भगवान्विभुः ॥
sa viṣṇuḥ kīdṛśo brahmankiṁ vā tasya hi lakṣaṇam kiṁ mānaṁ tasya sadbhāvaiḥ kairjñeyo bhagavānvibhuḥ
हे ब्रह्मन्, वह विष्णु कैसे हैं, उनका क्या लक्षण है? उस सर्वव्यापी भगवान का मान क्या है, और सद्भावों में से किनके द्वारा वे जाने जाते हैं?
श्लोक 3 (skanda.2.173.3)
कीदृशा वैष्णवा धर्माः केनाऽसौ प्रीयते हरिः । एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन्किंकराय महामते ॥
kīdṛśā vaiṣṇavā dharmāḥ kenā'sau prīyate hariḥ etadācakṣva me brahmankiṅkarāya mahāmate
वैष्णव धर्म कैसे हैं, और किससे हरि प्रसन्न होते हैं? हे महामते ब्रह्मन्, यह सब मुझ सेवक को बताइए।
श्लोक 4 (skanda.2.173.4)
इति पृष्टस्तु व्याधेन पुनः प्राह स वै द्विजः । प्रणम्य जगतामीशं नारायणमनामयम् ॥
iti pṛṣṭastu vyādhena punaḥ prāha sa vai dvijaḥ praṇamya jagatāmīśaṁ nārāyaṇamanāmayam
इस प्रकार व्याध द्वारा पूछे जाने पर, जगत् के स्वामी, निर्दोष नारायण को प्रणाम करके, उस ब्राह्मण ने पुनः कहा —
श्लोक 5 (skanda.2.173.5)
शंख उवाच । शृणु व्याध प्रवक्ष्यामि विष्णुरूपमकल्मषम् । यदचिन्त्यं विरिंच्याद्यैर्मुनिभिर्भावितात्मभिः ॥
śaṅkha uvāca śṛṇu vyādha pravakṣyāmi viṣṇurūpamakalmaṣam yadacintyaṁ viriñcyādyairmunibhirbhāvitātmabhiḥ
शंख ने कहा — हे व्याध, सुन, मैं विष्णु के निर्मल स्वरूप का वर्णन करूँगा, जो ब्रह्मा आदि भावितात्मा मुनियों के लिए भी अचिंत्य है।
श्लोक 6 (skanda.2.173.6)
पूर्णशक्तिः पूर्णगुणो निर्दिष्टः सकलेश्वरः । निर्गुणो निष्कलोऽनंतः सच्चिदानन्दविग्रहः ॥
pūrṇaśaktiḥ pūrṇaguṇo nirdiṣṭaḥ sakaleśvaraḥ nirguṇo niṣkalo'nantaḥ saccidānandavigrahaḥ
वह पूर्णशक्ति, पूर्णगुण, समस्त जगत् के ईश्वर के रूप में निर्दिष्ट हैं; निर्गुण, निष्कल, अनंत और सच्चिदानंद-स्वरूप हैं।
श्लोक 7 (skanda.2.173.7)
यदेतदखिलं विश्वं चराचरमनीदृशम् । साधिशंसाऽऽश्रयं यच्च यद्वशे नियतं स्थितम् ॥
yadetadakhilaṁ viśvaṁ carācaramanīdṛśam sādhiśaṁsā'śrayaṁ yacca yadvaśe niyataṁ sthitam
यह जो संपूर्ण चर-अचर, अनुपम विश्व है, जो सत्ता का आश्रय है, और जो सदा उन्हीं के वश में स्थित है,
श्लोक 8 (skanda.2.173.8)
अथ ते लक्षणं वच्मि ब्रह्मणः परमात्मनः । उत्पत्तिस्थितिसंहारा ह्यावृत्तिर्नियमस्तथा ॥
atha te lakṣaṇaṁ vacmi brahmaṇaḥ paramātmanaḥ utpattisthitisaṁhārā hyāvṛttirniyamastathā
अब मैं तुझे परमात्मा ब्रह्म का लक्षण बताता हूँ — उत्पत्ति, स्थिति, संहार, आवृत्ति (पुनरावर्तन) और नियमन,
श्लोक 9 (skanda.2.173.9)
प्रकाशौ बन्धमोक्षौ च वृत्तिर्यस्माद्भवंत्यमी । स विष्णुर्ब्रह्मसंज्ञोऽसौ कवीनां संमतो विभुः ॥
prakāśau bandhamokṣau ca vṛttiryasmādbhavantyamī sa viṣṇurbrahmasaṁjño'sau kavīnāṁ saṁmato vibhuḥ
प्रकाश, बंधन, मोक्ष और वृत्ति — जिससे ये सब होते हैं, वही सर्वव्यापी विष्णु 'ब्रह्म' नाम से पंडितों द्वारा माने गए हैं।
श्लोक 10 (skanda.2.173.10)
साक्षाद्ब्रह्मेति तं प्राहुः पश्चाद्ब्रह्मादिकानपि । ब्रह्मशब्दं सोपपदं ब्रह्मादिषु विदो विदुः ॥
sākṣādbrahmeti taṁ prāhuḥ paścādbrahmādikānapi brahmaśabdaṁ sopapadaṁ brahmādiṣu vido viduḥ
उसे ही साक्षात् 'ब्रह्म' कहा जाता है; ब्रह्मा आदि के लिए भी विद्वान लोग 'ब्रह्म' शब्द का प्रयोग उपपद (विशेषण) सहित ही जानते हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.173.11)
नान्येषां ब्रह्मता क्वाऽपि तच्छक्त्येकांशभागिनाम् । तदेतच्छास्त्रगम्यं हि जन्माद्यस्य महाविभोः ॥
nānyeṣāṁ brahmatā kvā'pi tacchaktyekāṁśabhāginām tadetacchāstragamyaṁ hi janmādyasya mahāvibhoḥ
जो केवल उसकी शक्ति के एक अंश के भागी हैं, उन अन्य किसी में भी ब्रह्मत्व कहीं नहीं है। उस महाविभु की उत्पत्ति आदि केवल शास्त्र से ही जानी जाती है।
श्लोक 12 (skanda.2.173.12)
शास्त्रं च वेदाः स्मृतयः पुराणं वै तदात्मकम् । इतिहासः पंचरात्रं भारतं च महामते ॥
śāstraṁ ca vedāḥ smṛtayaḥ purāṇaṁ vai tadātmakam itihāsaḥ pañcarātraṁ bhārataṁ ca mahāmate
हे महामते, शास्त्र का अर्थ है — वेद, स्मृतियाँ, वेदस्वरूप पुराण, इतिहास, पंचरात्र और महाभारत।
श्लोक 13 (skanda.2.173.13)
एतैरेव महाविष्णुर्ज्ञेयो नान्यैः कथंचन । नावेदविदमुं विष्णुं मनुते च नरः क्वचित् ॥
etaireva mahāviṣṇurjñeyo nānyaiḥ kathañcana nāvedavidamuṁ viṣṇuṁ manute ca naraḥ kvacit
इन्हीं के द्वारा महाविष्णु जानने योग्य हैं, अन्य किसी उपाय से कदापि नहीं। वेद को न जानने वाला मनुष्य इस विष्णु को कभी नहीं समझ सकता।
श्लोक 14 (skanda.2.173.14)
नेंद्रियैर्नानुमानैश्च न तर्कैः शक्यते विभुम् । ज्ञातुं नारायणं देवं वेदवेद्यं सनातनम् ॥
nendriyairnānumānaiśca na tarkaiḥ śakyate vibhum jñātuṁ nārāyaṇaṁ devaṁ vedavedyaṁ sanātanam
न इंद्रियों से, न अनुमान से, न तर्क से ही उस सर्वव्यापी, सनातन, वेद द्वारा ज्ञेय देव नारायण को जाना जा सकता है।
श्लोक 15 (skanda.2.173.15)
अस्यैव जन्मकर्माणि गुणाञ्ज्ञात्वा यथामति । मुच्यंते जीवसंघाश्च सदा तद्वशवर्तिनः ॥
asyaiva janmakarmāṇi guṇāñjñātvā yathāmati mucyante jīvasaṅghāśca sadā tadvaśavartinaḥ
उन्हीं के जन्म, कर्म और गुणों को अपनी बुद्धि के अनुसार जानकर, सदा उनके वश में रहने वाले जीव-समूह मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 16 (skanda.2.173.16)
क्रमाद्विष्णोश्च माहात्म्यं यथा सातिशयं भवेत् । एकैकस्मिन्स्थिता शक्तिर्देवर्षिपितृमातृके ॥
kramādviṣṇośca māhātmyaṁ yathā sātiśayaṁ bhavet ekaikasminsthitā śaktirdevarṣipitṛmātṛke
अब क्रमशः विष्णु का माहात्म्य कैसे उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है, यह बताता हूँ — देव, ऋषि, पितर आदि प्रत्येक में उनकी शक्ति भिन्न-भिन्न मात्रा में स्थित है।
श्लोक 17 (skanda.2.173.17)
प्रत्यक्षेणाऽऽगमेनापि तथैवाऽनुमयाऽपि च । आदौ नरोत्तमं विद्याद्बले ज्ञाने सुखे तथा ॥
pratyakṣeṇā'gamenāpi tathaivā'numayā'pi ca ādau narottamaṁ vidyādbale jñāne sukhe tathā
प्रत्यक्ष, आगम और अनुमान से भी यह जानना चाहिए कि सर्वप्रथम, बल, ज्ञान और सुख में श्रेष्ठ पुरुष ही सबसे बढ़कर है।
श्लोक 18 (skanda.2.173.18)
तस्माद्भूतं शतगुणं विद्याज्ज्ञानादिभिर्वृतम् । भूतान्मनुष्यगंधर्वान्विद्याच्छतगुणाधिकान् ॥
tasmādbhūtaṁ śataguṇaṁ vidyājjñānādibhirvṛtam bhūtānmanuṣyagandharvānvidyācchataguṇādhikān
उससे भी सौ गुणा अधिक ज्ञान आदि से युक्त भूत-योनि को जानना चाहिए, और उनसे भी सौ गुणा अधिक मनुष्य-गंधर्वों को जानना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.2.173.19)
तत्त्वाभिमानिनो देवास्तेभ्यो विद्याच्छताधिकान् । तत्त्वाभिमानिदेवेभ्यः सप्तैव ऋषयो वराः ॥
tattvābhimānino devāstebhyo vidyācchatādhikān tattvābhimānidevebhyaḥ saptaiva ṛṣayo varāḥ
उनसे भी सौ गुणा अधिक तत्त्वों के अधिष्ठाता देवता जानने चाहिए, और उन तत्त्वाभिमानी देवताओं से भी श्रेष्ठ केवल सात ऋषि हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.173.20)
सप्तर्षिभ्यो वरो ह्यग्निरग्नेः सूर्यादयस्तथा । सूर्याद्गुरुर्गुरोः प्राणः प्राणादिंद्रो महाबलः ॥
saptarṣibhyo varo hyagniragneḥ sūryādayastathā sūryādgururguroḥ prāṇaḥ prāṇādindro mahābalaḥ
सात ऋषियों से श्रेष्ठ अग्नि हैं, अग्नि से सूर्य आदि, सूर्य से गुरु (बृहस्पति), गुरु से प्राण, और प्राण से महाबली इंद्र श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.173.21)
इन्द्राच्च गिरिजा देवी देव्याः शंभुर्जगद्गुरुः । शंभोर्बुद्धिर्महादेवी बुद्धेः प्राणो बलाधिकः ॥
indrācca girijā devī devyāḥ śambhurjagadguruḥ śambhorbuddhirmahādevī buddheḥ prāṇo balādhikaḥ
इंद्र से श्रेष्ठ देवी गिरिजा हैं, देवी से जगद्गुरु शंभु हैं, शंभु से महादेवी बुद्धि हैं, और बुद्धि से भी प्राण अधिक बलवान हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.173.22)
न प्राणात्परमं किंचित्प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् । प्राणाज्जातमिदं विश्वं प्राणात्मकमिदं जगत् ॥
na prāṇātparamaṁ kiñcitprāṇe sarvaṁ pratiṣṭhitam prāṇājjātamidaṁ viśvaṁ prāṇātmakamidaṁ jagat
प्राण से बढ़कर कुछ भी नहीं है, प्राण में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। यह संपूर्ण विश्व प्राण से ही उत्पन्न हुआ है, यह जगत् प्राणमय ही है।
श्लोक 23 (skanda.2.173.23)
प्राणे प्रोतमिदं सर्वं प्राणादेव हि चेष्टते । सर्वाधारमिमं प्राहुः सूत्रं नीलांबुदप्रभम् ॥
prāṇe protamidaṁ sarvaṁ prāṇādeva hi ceṣṭate sarvādhāramimaṁ prāhuḥ sūtraṁ nīlāmbudaprabham
यह सब कुछ प्राण में ही पिरोया हुआ है, प्राण से ही सब चेष्टा करता है। इसे ही सबका आधार, नीले मेघ के समान कांतिमान 'सूत्र' कहा गया है।
श्लोक 24 (skanda.2.173.24)
लक्ष्मीकटाक्षमात्रेण प्राणस्यास्य स्थितिर्भवेत् । सा लक्ष्मीर्देवदेवस्य कृपालेशैकभाजिनी । न विष्णोः परमं किंचिन्न समो वा कथंचन ॥
lakṣmīkaṭākṣamātreṇa prāṇasyāsya sthitirbhavet sā lakṣmīrdevadevasya kṛpāleśaikabhāginī na viṣṇoḥ paramaṁ kiñcinna samo vā kathañcana
लक्ष्मी की कटाक्ष-मात्र से ही इस प्राण की स्थिति होती है, और वह लक्ष्मी भी देवाधिदेव की कृपा के एक अंश की ही भागिनी हैं। विष्णु से बढ़कर या उनके समान कुछ भी कहीं नहीं है।
श्लोक 25 (skanda.2.173.25)
व्याध उवाच । कथं जीवेष्वयं प्राणः सूत्रनामाऽधिकोऽभवत् ॥
vyādha uvāca kathaṁ jīveṣvayaṁ prāṇaḥ sūtranāmā'dhiko'bhavat
व्याध ने कहा — यह प्राण, जिसे 'सूत्र' नाम से भी जाना जाता है, समस्त जीवों में सबसे बढ़कर कैसे हुआ?
श्लोक 26 (skanda.2.173.26)
निर्णयो वा कथं ह्यस्य प्राणाधिक्यं कथं विभो । एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन्कथं प्राणाद्विभुः परः ॥
nirṇayo vā kathaṁ hyasya prāṇādhikyaṁ kathaṁ vibho etadācakṣva me brahmankathaṁ prāṇādvibhuḥ paraḥ
हे विभो, इसका निर्णय कैसे हुआ, प्राण की यह श्रेष्ठता कैसे सिद्ध हुई? हे ब्रह्मन्, यह भी बताइए कि प्राण से बढ़कर वह विभु कैसे हैं?
श्लोक 27 (skanda.2.173.27)
शंख उवाच । शृणु व्याध प्रवक्ष्यामि यत्पृष्टो निर्णयस्तथा । प्राणाधिक्यं समुद्दिश्य जीवैश्च सकलैरपि ॥
śaṅkha uvāca śṛṇu vyādha pravakṣyāmi yatpṛṣṭo nirṇayastathā prāṇādhikyaṁ samuddiśya jīvaiśca sakalairapi
शंख ने कहा — हे व्याध, सुन, जो तूने पूछा है वह निर्णय मैं बताता हूँ — किस प्रकार समस्त जीवों के बीच प्राण की श्रेष्ठता निश्चित हुई।
श्लोक 28 (skanda.2.173.28)
पुरा नारायणो देवः पद्मसृष्टौ सनातनः । सृष्ट्वा ब्रह्मादिकान्देवानिदं प्राह जनार्दनः ॥
purā nārāyaṇo devaḥ padmasṛṣṭau sanātanaḥ sṛṣṭvā brahmādikāndevānidaṁ prāha janārdanaḥ
पूर्वकाल में, सृष्टि के समय, सनातन देव नारायण ने ब्रह्मा आदि देवताओं की रचना करके जनार्दन ने यह कहा —
श्लोक 29 (skanda.2.173.29)
साम्राज्येऽहं स्थापयेयं ब्रह्माणं वः पतिं प्रभुम् । यो युष्मास्वधिको देवो यौवराज्ये सुरेश्वराः ॥
sāmrājye'haṁ sthāpayeyaṁ brahmāṇaṁ vaḥ patiṁ prabhum yo yuṣmāsvadhiko devo yauvarāje sureśvarāḥ
मैं ब्रह्मा को तुम्हारा स्वामी और प्रभु बनाकर साम्राज्य में स्थापित करूँगा। हे सुरेश्वरो, तुममें से जो देव सबसे श्रेष्ठ हो, उसे युवराज-पद पर स्थापित करो।
श्लोक 30 (skanda.2.173.30)
तं स्थापयत शीलाढ्यं शौर्यौदार्यगुणान्वितम् । इत्युक्ता विभुना देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः ॥
taṁ sthāpayata śīlāḍhyaṁ śauryaudāryaguṇānvitam ityuktā vibhunā devāḥ sarve śakrapurogamāḥ
जो सुशील तथा शौर्य और उदारता के गुणों से युक्त हो, उसे ही स्थापित करो। प्रभु द्वारा ऐसा कहे जाने पर इंद्र आदि सभी देवगण,
श्लोक 31 (skanda.2.173.31)
एवं विवदिरेऽन्योन्यमहं भूयामहं त्विति । सर्वे विवदमानाश्च सूर्यं केचित्परं विदुः ॥
evaṁ vivadire'nyonyamahaṁ bhūyāmahaṁ tviti sarve vivadamānāśca sūryaṁ kecitparaṁ viduḥ
आपस में यह विवाद करने लगे — मैं बनूँगा, मैं बनूँगा। इस प्रकार विवाद करते हुए कुछ देवताओं ने सूर्य को श्रेष्ठ माना,
श्लोक 32 (skanda.2.173.32)
शक्रं केचित्परं कामं केचित्तूष्णीं तु तस्थिरे । ते निर्णयमपश्यंतः प्रष्टुं नारायणं ययुः ॥
śakraṁ kecitparaṁ kāmaṁ kecittūṣṇīṁ tu tasthire te nirṇayamapaśyantaḥ praṣṭuṁ nārāyaṇaṁ yayuḥ
कुछ ने इंद्र को श्रेष्ठ मान लिया, और कुछ चुपचाप रह गए। कोई निर्णय न मिलने पर वे सब नारायण से पूछने गए।
श्लोक 33 (skanda.2.173.33)
नमस्कृत्य पुनः प्राहुः सर्वे प्रांजलयोऽमराः । विचारितं महाविष्णो सर्वैरस्माभिरंजसा ॥
namaskṛtya punaḥ prāhuḥ sarve prāñjalayo'marāḥ vicāritaṁ mahāviṣṇo sarvairasmābhiraṁjasā
नमस्कार करके हाथ जोड़े हुए सभी देवताओं ने कहा — हे महाविष्णो, हम सबने भलीभाँति विचार कर लिया है।
श्लोक 34 (skanda.2.173.34)
अस्मासु देवमधिकं नैव विद्मः कथंचन । त्वमेव निर्णयं ब्रूहि देवाः संशयिनः खलु ॥
asmāsu devamadhikaṁ naiva vidmaḥ kathañcana tvameva nirṇayaṁ brūhi devāḥ saṁśayinaḥ khalu
हम किसी भी प्रकार यह नहीं जान पाते कि हममें कौन देव श्रेष्ठ है। हे देव, आप ही निर्णय बता दीजिए, हम सब संशय में हैं।
श्लोक 35 (skanda.2.173.35)
इति पृष्टोऽमरैः सर्वैः प्रहसन्निदमब्रवीत् । देहादस्माच्च वैराजाद्यस्मिन्निष्क्रामति ह्ययम् ॥
iti pṛṣṭo'maraiḥ sarvaiḥ prahasannidamabravīt dehādasmācca vairājādyasminniṣkrāmati hyayam
सभी देवताओं द्वारा ऐसा पूछे जाने पर, हँसते हुए भगवान ने यह कहा — इस विराट देह से जो निकलेगा और जिसके निकल जाने पर,
श्लोक 36 (skanda.2.173.36)
पतिष्यति प्रविष्टे तु यस्मिन्वै ह्युत्थितो भवेत् । स देवो ह्यधिको नूनं नापरस्तु कथंचन ॥
patiṣyati praviṣṭe tu yasminvai hyutthito bhavet sa devo hyadhiko nūnaṁ nāparastu kathañcana
यह शरीर गिर पड़ेगा, और जिसके पुनः प्रवेश करने पर यह उठ खड़ा हो, वही देव निश्चय ही श्रेष्ठ है, अन्य कोई नहीं।
श्लोक 37 (skanda.2.173.37)
इत्युक्तास्ते ततः सर्वे तथास्त्विति वचोऽब्रुवन् । निश्चक्राम जयंताह्वः पादात्पूर्वं सुरेश्वरः ॥
ityuktāste tataḥ sarve tathāstviti vaco'bruvan niścakrāma jayantāhvaḥ pādātpūrvaṁ sureśvaraḥ
ऐसा कहे जाने पर सब देवताओं ने 'तथास्तु' कहा। सबसे पहले जयंत नामक सुरेश्वर पैर से बाहर निकला।
श्लोक 38 (skanda.2.173.38)
तदा पंगुममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा । शृण्वन्पिबन्वदञ्जिघ्रन्पश्यन्नास्तेऽचलन्नपि ॥
tadā paṅgumamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā śṛṇvanpibanvadañjighrampaśyannāste'calannapi
तब उस शरीर को लंगड़ा कहा गया, परंतु वह गिरा नहीं। वह सुनता, पीता, बोलता, सूँघता, देखता हुआ भी बिना हिले-डुले बैठा रहा।
श्लोक 39 (skanda.2.173.39)
पश्चाद्गुह्याद्विनिष्क्रांतो दक्षोनाम प्रजापतिः । तदा षंढममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा ॥
paścādguhyādviniṣkrānto dakṣonāma prajāpatiḥ tadā ṣaṇḍhamamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā
फिर दक्ष नामक प्रजापति गुह्य अंग से बाहर निकले। तब उस शरीर को नपुंसक कहा गया, परंतु वह तब भी नहीं गिरा।
श्लोक 40 (skanda.2.173.40)
शृण्वन्पिबन्वदञ्जिघ्रन्पश्यन्नास्ते चलन्नपि । पश्चाद्धस्ताद्विनिष्क्रांत इन्द्रः सर्वामरेश्वरः ॥
śṛṇvanpibanvadañjighrampaśyannāste calannapi paścāddhastādviniṣkrānta indraḥ sarvāmareśvaraḥ
वह सुनता, पीता, बोलता, सूँघता, देखता हुआ चलता-फिरता रहा। फिर सब देवों के स्वामी इंद्र हाथों से बाहर निकले।
श्लोक 41 (skanda.2.173.41)
हस्तहीनममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा । शृण्वन्पिबन्वदञ्जिघ्रन्पश्यन्नास्ते चलन्नपि ॥
hastahīnamamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā śṛṇvanpibanvadañjighrampaśyannāste calannapi
तब उस शरीर को हाथहीन कहा गया, परंतु वह तब भी नहीं गिरा। वह सुनता, पीता, बोलता, सूँघता, देखता हुआ चलता ही रहा।
श्लोक 42 (skanda.2.173.42)
लोचनाभ्यां विनिष्क्रांतः सूर्यस्तेजस्विनां वरः । तदा काणममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा ॥
locanābhyāṁ viniṣkrāntaḥ sūryastejasvināṁ varaḥ tadā kāṇamamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā
फिर तेजस्वियों में श्रेष्ठ सूर्य दोनों नेत्रों से बाहर निकले। तब उस शरीर को काना कहा गया, परंतु वह तब भी नहीं गिरा।
श्लोक 43 (skanda.2.173.43)
शृण्वन्पिबन्वदञ्जिघ्रन्पश्यन्नास्ते चलन्नपि । प्राणात्पश्चाद्विनिष्क्रांतौ नासत्यौ विश्वभेषजौ । अजिघ्राणममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा ॥
śṛṇvanpibanvadañjighrampaśyannāste calannapi prāṇātpaścādviniṣkrāntau nāsatyau viśvabheṣajau ajighrāṇamamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā
वह सुनता, पीता, बोलता, सूँघता, देखता हुआ चलता ही रहा। फिर विश्व के वैद्य दोनों नासत्य (अश्विनी कुमार) नासिका से बाहर निकले। तब उस शरीर को गंधहीन कहा गया, परंतु वह तब भी नहीं गिरा।
श्लोक 44 (skanda.2.173.44)
शृण्वन्पिबन्वदन्नैव जिघ्रन्नास्तेऽचलन्नपि । श्रोत्राद्दिशो विनिष्क्रांता न देहः पतितस्तदा । तदामुं बधिरं प्राहुर्मृतं नैव कथंचन ॥
śṛṇvanpibanvadannaiva jighrannāste'calannapi śrotrāddiśo viniṣkrāntā na dehaḥ patitastadā tadāmuṁ badhiraṁ prāhurmṛtaṁ naiva kathañcana
वह पीता, बोलता, सूँघता हुआ, परंतु न सुनता हुआ, बिना हिले-डुले बैठा रहा। फिर दिशाएँ श्रोत्र से बाहर निकलीं, परंतु तब भी शरीर नहीं गिरा। तब उसे बहरा कहा गया, मृत किसी भी प्रकार नहीं।
श्लोक 45 (skanda.2.173.45)
पिबन्वदन्नपि तदा ह्यशृण्वन्नचलन्नपि । वरुणो रसनायास्तु विनिष्क्रांतस्ततः परम् । तदाऽरसज्ञमेवाहुर्न देहः पतितस्तदा ॥
pibanvadannapi tadā hyaśṛṇvannacalannapi varuṇo rasanāyāstu viniṣkrāntastataḥ param tadā'rasajñamevāhurna dehaḥ patitastadā
वह तब भी पीता, बोलता हुआ, परंतु न सुनता हुआ, बिना हिले-डुले रहा। फिर वरुण जिह्वा से बाहर निकले। तब उसे रसहीन कहा गया, परंतु शरीर तब भी नहीं गिरा।
श्लोक 46 (skanda.2.173.46)
जीवंश्चलन्नदन्नास्ते तथा जानञ्च्छ्वसन्नपि । ततो वाचो विनिष्क्रांतो वह्निर्वागीश्वरो विभुः ॥
jīvaṁścalannadannāste tathā jānañcchvasannapi tato vāco viniṣkrānto vahnirvāgīśvaro vibhuḥ
वह जीवित, चलता, खाता, समझता, साँस लेता हुआ बना रहा। फिर वाणी के स्वामी, सर्वव्यापी अग्नि वाणी से बाहर निकले।
श्लोक 47 (skanda.2.173.47)
तदा मूकममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा । जीवंश्चलन्नदन्नास्ते तथा जानञ्छ्वसन्नपि ॥
tadā mūkamamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā jīvaṁścalannadannāste tathā jānañchvasannapi
तब उसे गूँगा कहा गया, परंतु शरीर तब भी नहीं गिरा। वह जीवित, चलता, खाता, समझता, साँस लेता हुआ बना रहा।
श्लोक 48 (skanda.2.173.48)
पश्चाद्रुद्रो विनिष्क्रांतो मनसो बोधनात्मकः । तदा जडममुं प्राहुर्न देहः पतितस्तदा ॥
paścādrudro viniṣkrānto manaso bodhanātmakaḥ tadā jaḍamamuṁ prāhurna dehaḥ patitastadā
फिर बोधस्वरूप रुद्र मन से बाहर निकले। तब उसे जड़ कहा गया, परंतु शरीर तब भी नहीं गिरा।
श्लोक 49 (skanda.2.173.49)
जीवंश्चलन्नदन्नास्ते तथा जानञ्छ्वसन्नपि । पश्चात्प्राणो विनिष्क्रांतो मृतमेनं तदा विदुः । पुनरेवं तदा प्राहुर्देवा विस्मितमानसाः ॥
jīvaṁścalannadannāste tathā jānañchvasannapi paścātprāṇo viniṣkrānto mṛtamenaṁ tadā viduḥ punarevaṁ tadā prāhurdevā vismitamānasāḥ
वह जीवित, चलता, खाता, समझता, साँस लेता हुआ बना रहा। किंतु फिर जब प्राण बाहर निकले, तभी उसे मृत जाना गया। तब विस्मित मन वाले देवताओं ने पुनः यह कहा —
श्लोक 50 (skanda.2.173.50)
देहमुत्थापयेद्यस्तु पुनरेवं व्यवस्थितः । स एव ह्यधिकोऽस्मासु युवराजा भविष्यति ॥
dehamutthāpayedyastu punarevaṁ vyavasthitaḥ sa eva hyadhiko'smāsu yuvarājā bhaviṣyati
अतः यह निश्चित हुआ कि जो इस शरीर को पुनः उठाकर खड़ा करे, वही हम सबमें श्रेष्ठ होकर युवराज बनेगा।
श्लोक 51 (skanda.2.173.51)
इत्येवं तु प्रतिश्रुत्य विविशुश्च यथाक्रमम् । जयंतः प्राविशत्पादौ नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् ॥
ityevaṁ tu pratiśrutya viviśuśca yathākramam jayantaḥ prāviśatpādau nottasthau tatkalevaram
इस प्रकार वचन देकर वे सब क्रमशः शरीर में पुनः प्रविष्ट हुए। जयंत ने पैरों में प्रवेश किया, परंतु वह शरीर नहीं उठा।
श्लोक 52 (skanda.2.173.52)
गुह्यं च प्राविशद्दक्षो नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् । इन्द्रो हस्तौ विवेशाऽथ नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् ॥
guhyaṁ ca prāviśaddakṣo nottasthau tatkalevaram indro hastau viveśā'tha nottasthau tatkalevaram
दक्ष ने गुह्य अंग में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा। फिर इंद्र ने दोनों हाथों में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा।
श्लोक 53 (skanda.2.173.53)
चक्षुः सूर्यः प्रविष्टोऽभून्नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् । दिशः श्रोत्रे प्रविविशुर्नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् ॥
cakṣuḥ sūryaḥ praviṣṭo'bhūnnottasthau tatkalevaram diśaḥ śrotre praviviśurnottasthau tatkalevaram
सूर्य ने नेत्रों में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा। दिशाओं ने कानों में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा।
श्लोक 54 (skanda.2.173.54)
वरुणः प्राविशज्जिह्वां नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् । नासां विविशतुर्दस्रौ नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् ॥
varuṇaḥ prāviśajjihvāṁ nottasthau tatkalevaram nāsāṁ viviśaturdasrau nottasthau tatkalevaram
वरुण ने जिह्वा में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा। दोनों अश्विनीकुमारों ने नासिका में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा।
श्लोक 55 (skanda.2.173.55)
वह्निश्च प्राविशद्वाचं नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् । मनश्च प्राविशद्रुद्रो नोत्तस्थौ तत्कलेवरम् ॥
vahniśca prāviśadvācaṁ nottasthau tatkalevaram manaśca prāviśadrudro nottasthau tatkalevaram
अग्नि ने वाणी में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा। रुद्र ने मन में प्रवेश किया, तब भी शरीर नहीं उठा।
श्लोक 56 (skanda.2.173.56)
पश्चात्प्राणो विवेशासौ तदोत्तस्थौ कलेवरम् । तदा देवा विनिश्चित्य प्राणं देवाधिकं विभुम् ॥
paścātprāṇo viveśāsau tadottasthau kalevaram tadā devā viniścitya prāṇaṁ devādhikaṁ vibhum
अंत में जब प्राण ने प्रवेश किया, तभी वह शरीर उठ खड़ा हुआ। तब देवताओं ने निश्चय किया कि प्राण ही सब देवों से श्रेष्ठ सर्वव्यापी हैं,
श्लोक 57 (skanda.2.173.57)
बले ज्ञाने च धैर्ये च वैराग्ये प्राणनेऽपि च । ततोऽभिषेचयांचक्रुर्यौवराज्ये महाप्रभुम् ॥
bale jñāne ca dhairye ca vairāgye prāṇane'pi ca tato'bhiṣecayāṁcakruryauvarāje mahāprabhum
बल, ज्ञान, धैर्य, वैराग्य और प्राण-शक्ति में भी श्रेष्ठ, उस महाप्रभु का उन्होंने युवराज-पद पर अभिषेक किया।
श्लोक 58 (skanda.2.173.58)
उत्कृष्टस्थितिहेतुत्वादुक्थमेकं तदा जगुः । तस्मात्प्राणात्मकं विश्वं सर्वं स्थावरजंगमम् ॥
utkṛṣṭasthitihetutvādukthamekaṁ tadā jaguḥ tasmātprāṇātmakaṁ viśvaṁ sarvaṁ sthāvarajaṅgamam
उसकी सर्वोत्कृष्ट स्थिति का कारण होने से उन्होंने तब एक स्तुति-वाक्य गाया — इसीलिए यह संपूर्ण स्थावर-जंगम विश्व प्राणस्वरूप है।
श्लोक 59 (skanda.2.173.59)
अंशैः पूर्णैर्बलाढ्यैश्च पूर्णोऽयं जगतां पतिः ॥
aṁśaiḥ pūrṇairbalāḍhyaiśca pūrṇo'yaṁ jagatāṁ patiḥ
अपने पूर्ण और बलसम्पन्न अंशों से ही यह जगत् का स्वामी पूर्ण है।
श्लोक 60 (skanda.2.173.60)
न प्राणहीनं जगदस्ति किंचित्प्राणेन हीनं न च वै समेधते । न प्राणहीनं स्थितमत्र किंचित्प्राणेन हीनं न च किंचिदस्ति । तस्मात्प्राणः सर्वजीवाधिकोऽभूद्बलाधिकः सर्वजीवांतरात्मा ॥
na prāṇahīnaṁ jagadasti kiñcitprāṇena hīnaṁ na ca vai samedhate na prāṇahīnaṁ sthitamatra kiñcitprāṇena hīnaṁ na ca kiñcidasti tasmātprāṇaḥ sarvajīvādhiko'bhūdbalādhikaḥ sarvajīvāntarātmā
इस जगत् में प्राणरहित कुछ भी नहीं है, प्राण के बिना कुछ भी नहीं फलता-फूलता। यहाँ प्राणरहित कुछ भी स्थित नहीं है, प्राण के बिना कुछ भी नहीं है। इसीलिए प्राण समस्त जीवों से श्रेष्ठ, अधिक बलवान और सब जीवों की अंतरात्मा हुआ।
श्लोक 61 (skanda.2.173.61)
प्राणात्कोऽपि ह्यधिको वा समो वा शास्त्रे दृष्टः श्रुतपूर्वो न चाऽऽस्ते ॥
prāṇātko'pi hyadhiko vā samo vā śāstre dṛṣṭaḥ śrutapūrvo na cā'ste
शास्त्र में प्राण से बढ़कर या समान कोई भी न देखा गया है, न पहले कभी सुना गया है।
श्लोक 62 (skanda.2.173.62)
तत्तत्कार्यानुगः प्राणो ह्येको देवो ह्यनेकधा । तस्मात्प्राणं वरं प्राहुः प्राणोपासनतत्पराः । लीलयैव जगत्स्रष्टुं हन्तुं पालयितुं प्रभुः ॥
tattatkāryānugaḥ prāṇo hyeko devo hyanekadhā tasmātprāṇaṁ varaṁ prāhuḥ prāṇopāsanatatparāḥ līlayaiva jagatsraṣṭuṁ hantuṁ pālayituṁ prabhuḥ
वह एक ही प्राण-देव उन-उन कार्यों के अनुसार अनेक रूपों में प्रकट होता है। इसीलिए प्राण-उपासना में तत्पर लोग प्राण को श्रेष्ठ कहते हैं — वे प्रभु लीलामात्र से ही जगत् की रचना, संहार और पालन करते हैं।
श्लोक 63 (skanda.2.173.63)
शेषाऽहिशिवशक्राद्याश्चेतनाश्च जडा अपि । वासुदेवादृते कोऽपि नैनं परिभविष्यति ॥
śeṣā'hiśivaśakrādyāścetanāśca jaḍā api vāsudevādṛte ko'pi nainaṁ paribhaviṣyati
शेष, अहि, शिव, शक्र आदि, चाहे चेतन हों या जड़, वासुदेव के अतिरिक्त कोई भी इन्हें (प्राण को) पराजित नहीं कर सकेगा।
श्लोक 64 (skanda.2.173.64)
सर्वदेवात्मकः प्राणः सर्वदेवमयो विभुः । वासुदेवाऽनुगो नित्यं तथा विष्णुवशस्थितः ॥
sarvadevātmakaḥ prāṇaḥ sarvadevamayo vibhuḥ vāsudevā'nugo nityaṁ tathā viṣṇuvaśasthitaḥ
प्राण सब देवों का आत्मा, सर्वदेवमय और सर्वव्यापी है, फिर भी वह सदा वासुदेव का अनुगामी है और विष्णु के वश में स्थित है।
श्लोक 65 (skanda.2.173.65)
वासुदेवप्रतीपं तु न शृणोति न पश्यति । देवाः प्रतीपं कुर्वंति रुद्राद्याः सुरेश्वराः ॥
vāsudevapratīpaṁ tu na śṛṇoti na paśyati devāḥ pratīpaṁ kurvanti rudrādyāḥ sureśvarāḥ
वह वासुदेव के विरुद्ध कुछ भी न सुनता है, न देखता है, जबकि रुद्र आदि अन्य सुरेश्वर देवगण कभी-कभी विरुद्ध आचरण भी कर बैठते हैं।
श्लोक 66 (skanda.2.173.66)
प्रतीपं क्वाऽपि कुरुते न प्राणः सर्वगोचरः । तस्मात्प्राणो महाविष्णोर्बलमाहुर्मनीषिणः ॥
pratīpaṁ kvā'pi kurute na prāṇaḥ sarvagocaraḥ tasmātprāṇo mahāviṣṇorbalamāhurmanīṣiṇaḥ
सर्वव्यापी प्राण कभी भी उनके विरुद्ध आचरण नहीं करता। इसीलिए विद्वान लोग प्राण को महाविष्णु का बल कहते हैं।
श्लोक 67 (skanda.2.173.67)
एवं ज्ञात्वा महाविष्णोर्माहात्म्यं लक्षणं तथा । पूर्वबन्धानुगं लिंगं जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥
evaṁ jñātvā mahāviṣṇormāhātmyaṁ lakṣaṇaṁ tathā pūrvabandhānugaṁ liṅgaṁ jīrṇāṁ tvacamivoragaḥ
इस प्रकार महाविष्णु के माहात्म्य और स्वरूप को जानकर, जैसे सर्प अपनी पुरानी केंचुली त्याग देता है, वैसे ही मनुष्य पूर्वबंधन का अनुगमन करने वाले सूक्ष्म शरीर को त्यागकर,
श्लोक 68 (skanda.2.173.68)
विसृज्य परमं याति नारायणमनामयम् । श्रुत्वा शंखोदितं वाक्यं पुनर्व्याधः प्रसन्नधीः ॥
visṛjya paramaṁ yāti nārāyaṇamanāmayam śrutvā śaṅkhoditaṁ vākyaṁ punarvyādhaḥ prasannadhīḥ
और परम, निर्दोष नारायण को प्राप्त हो जाता है। शंख के इस वचन को सुनकर व्याध का चित्त पुनः प्रसन्न हो गया।
श्लोक 69 (skanda.2.173.69)
प्रश्रयाऽवनतो भूत्वा पुनः पप्रच्छ तं मुनिम् । ब्रह्मन्महानुभावस्य प्राणस्याऽस्य जगद्गुरोः ॥
praśrayā'vanato bhūtvā punaḥ papraccha taṁ munim brahmanmahānubhāvasya prāṇasyā'sya jagadguroḥ
विनम्रतापूर्वक झुककर उसने पुनः मुनि से पूछा — हे ब्रह्मन्, जगद्गुरु महानुभाव इस प्राण की,
श्लोक 70 (skanda.2.173.70)
न ख्यातो महिमा लोके कथं सर्वेश्वरस्य वै । देवानां च मुनीनां च भूपानां च महात्मनाम् ॥
na khyāto mahimā loke kathaṁ sarveśvarasya vai devānāṁ ca munīnāṁ ca bhūpānāṁ ca mahātmanām
इस सर्वेश्वर की महिमा लोक में प्रसिद्ध क्यों नहीं है? जबकि देवों, मुनियों और महात्मा राजाओं की,
श्लोक 71 (skanda.2.173.71)
महिमा श्रूयते लोके पुराणेषु सहस्रशः । एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मञ्छ्रोतुं कौतूहलं हि मे ॥
mahimā śrūyate loke purāṇeṣu sahasraśaḥ etadācakṣva me brahmañchrotuṁ kautūhalaṁ hi me
पुराणों में हजारों बार सुनी जाती है। हे ब्रह्मन्, यह मुझे बताइए — मुझे यह सुनने का कौतूहल है।
श्लोक 72 (skanda.2.173.72)
शंख उवाच । पुरा प्राणो हरिं देवं नारायणमनामयम् । अश्वमेधैर्यष्टुकामो गङ्गातीरं ययौ मुदा ॥
śaṅkha uvāca purā prāṇo hariṁ devaṁ nārāyaṇamanāmayam aśvamedhairyaṣṭukāmo gaṅgātīraṁ yayau mudā
शंख ने कहा — पूर्वकाल में प्राण अश्वमेध यज्ञों द्वारा निर्दोष देव हरि नारायण की पूजा करने की इच्छा से हर्षपूर्वक गंगा तट पर गया।
श्लोक 73 (skanda.2.173.73)
हलैश्चकार भूशुद्धिं नानामुनिगणैर्युतः । अन्तर्वल्मीकलीनस्तु कण्वो नाम समाधिगः ॥
halaiścakāra bhūśuddhiṁ nānāmunigaṇairyutaḥ antarvalmīkalīnastu kaṇvo nāma samādhigaḥ
अनेक मुनिगणों सहित उसने हलों द्वारा भूमि की शुद्धि की। उसी समय वहाँ एक बाँबी के भीतर छिपे हुए, समाधिस्थ कण्व नामक मुनि थे।
श्लोक 74 (skanda.2.173.74)
हलोत्कृष्टो विनिष्क्रांतः क्रोधादिदमुवाच ह । दृष्ट्वा पुरः स्थितं प्राणं शशाप ह महाविभुम् ॥
halotkṛṣṭo viniṣkrāntaḥ krodhādidamuvāca ha dṛṣṭvā puraḥ sthitaṁ prāṇaṁ śaśāpa ha mahāvibhum
हल से खोदे जाने पर वह बाहर निकला और क्रोध में यह बोला। सामने खड़े महाविभु प्राण को देखकर उसने शाप दे दिया —
श्लोक 75 (skanda.2.173.75)
अद्यप्रभृति न ख्यातिं महिमा भुवनत्रये । तव प्राप्नोति देवेश भूलोके तु विशेषतः ॥
adyaprabhṛti na khyātiṁ mahimā bhuvanatraye tava prāpnoti deveśa bhūloke tu viśeṣataḥ
हे देवेश, आज से लेकर तीनों लोकों में, और विशेषकर भूलोक में, तेरी महिमा प्रसिद्धि को प्राप्त नहीं होगी।
श्लोक 76 (skanda.2.173.76)
प्रख्यातास्ते भविष्यंति ह्यवतारा जगत्त्रये । इत्युक्तो मुनिना तेन वायुः क्रोधात्तमब्रवीत् ॥
prakhyātāste bhaviṣyanti hyavatārā jagattraye ityukto muninā tena vāyuḥ krodhāttamabravīt
तेरे अवतार ही तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे। उस मुनि द्वारा ऐसा कहे जाने पर, वायु ने क्रोधित होकर उससे कहा —
श्लोक 77 (skanda.2.173.77)
विनापराधं शप्तोऽस्मि तितिक्षुं मां निरागसम् । तस्मात्कण्व महाबाहो गुरुद्रोही भवाऽऽशु च ॥
vinā'parādhaṁ śapto'smi titikṣuṁ māṁ nirāgasam tasmātkaṇva mahābāho gurudrohī bhavā'śu ca
मुझ निरपराध, सहनशील को बिना किसी अपराध के शाप दिया गया है। इसलिए हे महाबाहु कण्व, तू शीघ्र ही गुरुद्रोही हो जा,
श्लोक 78 (skanda.2.173.78)
लोके निन्दितवृत्तिश्च भवेत्याह सदागतिः । ततः प्रभृति लोकेऽस्मिन्प्राणस्याऽस्य महाप्रभो ॥
loke ninditavṛttiśca bhavetyāha sadāgatiḥ tataḥ prabhṛti loke'sminprāṇasyā'sya mahāprabho
और लोक में निंदित आचरण वाला हो जा — ऐसा सदागति (वायु) ने कहा। हे महाप्रभु, तभी से इस लोक में इस प्राण की,
श्लोक 79 (skanda.2.173.79)
न ख्यातो महिमा लोके भूलोके तु विशेषतः । शापात्कण्वो गुरुं जग्ध्वा सूर्यशिष्योऽभवत्तदा ॥
na khyāto mahimā loke bhūloke tu viśeṣataḥ śāpātkaṇvo guruṁ jagdhvā sūryaśiṣyo'bhavattadā
महिमा प्रसिद्ध नहीं है, विशेषकर भूलोक में। और उस शाप के कारण कण्व ने अपने गुरु को खा डाला और तब सूर्य का शिष्य बन गया।
श्लोक 80 (skanda.2.173.80)
इत्येतत्कथितं सर्वं यत्पृष्टं तु त्वयाऽधुना । यच्छ्रोतव्यमितो व्याध पृच्छ मां मा विचारय ॥
ityetatkathitaṁ sarvaṁ yatpṛṣṭaṁ tu tvayā'dhunā yacchrotavyamito vyādha pṛccha māṁ mā vicāraya
इस प्रकार तूने अभी जो कुछ पूछा, वह सब कह दिया गया। हे व्याध, अब जो कुछ और सुनना हो, मुझसे पूछ, संकोच मत कर।