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वैष्णव खण्ड · अध्याय 174

भागवतधर्मकथनम् — भागवत धर्मों की कथा

अध्याय 173अध्याय-सूचीअध्याय 175

श्लोक 1 (skanda.2.174.1)

व्याध उवाच । किं जीवा विभुना सृष्टाः कोटिशोऽथ सहस्रशः । दृश्यन्ते भिन्नकर्माणो नानामार्गाः सनातनाः ॥

vyādha uvāca kiṁ jīvā vibhunā sṛṣṭāḥ koṭiśo'tha sahasraśaḥ dṛśyante bhinnakarmāṇo nānāmārgāḥ sanātanāḥ

व्याध ने कहा — विभु द्वारा करोड़ों और हजारों की संख्या में सृजित जीव भिन्न-भिन्न कर्मों वाले, नाना सनातन मार्गों वाले क्यों दिखाई देते हैं?

श्लोक 2 (skanda.2.174.2)

नैकस्वभावा एते हि कुत एव महामते । सर्वं तत्पृच्छते मह्यं विस्तरात्तत्त्वतो वद ॥

naikasvabhāvā ete hi kuta eva mahāmate sarvaṁ tatpṛcchate mahyaṁ vistarāttattvato vada

हे महामते, ये सब एक स्वभाव वाले क्यों नहीं हैं? यह सब मुझ पूछने वाले को विस्तार से, तत्त्वतः बताइए।

श्लोक 3 (skanda.2.174.3)

शंख उवाच । त्रिविधा जीवसंघा हि रजःसत्त्वतमोगुणाः । राजसा राजसं कर्म तामसास्तामसं तथा ॥

śaṅkha uvāca trividhā jīvasaṅghā hi rajaḥsattvatamoguṇāḥ rājasā rājasaṁ karma tāmasāstāmasaṁ tathā

शंख ने कहा — जीव-समूह तीन प्रकार के हैं, रजो, सत्त्व और तमो गुण वाले। राजसी जीव राजसिक कर्म करते हैं, और तामसी तामसिक कर्म।

श्लोक 4 (skanda.2.174.4)

सात्त्विकाः सात्त्विकं कर्म कुर्वंत्येते यथाक्रमम् । क्वचिच्च गुणवैषम्यमेतेषां संसृतौ भवेत् ॥

sāttvikāḥ sāttvikaṁ karma kurvantyete yathākramam kvacicca guṇavaiṣamyameteṣāṁ saṁsṛtau bhavet

सात्त्विक जीव इसी क्रम से सात्त्विक कर्म करते हैं। कभी-कभी संसार-चक्र में इनके गुणों में विषमता भी हो जाती है।

श्लोक 5 (skanda.2.174.5)

तेनैवोच्चावचं कर्म कुर्वंतः फलभागिनः । क्वचित्सुखं क्वचिद्दुःखं क्वचिच्चोभयमेव च ॥

tenaivoccāvacaṁ karma kurvantaḥ phalabhāginaḥ kvacitsukhaṁ kvaciddukhaṁ kvaciccobhayameva ca

इसी कारण उच्च-नीच कर्मों को करते हुए वे फलभागी होते हैं — कभी सुख, कभी दुःख, और कभी दोनों ही प्राप्त करते हैं।

श्लोक 6 (skanda.2.174.6)

गुणानामेव वैषम्यात्प्राप्नुवन्ति नरा इमे । प्रकृतिस्था इमे जीवा बद्धा एतैर्गुणैस्त्रिभिः ॥

guṇānāmeva vaiṣamyātprāpnuvanti narā ime prakṛtisthā ime jīvā baddhā etairguṇaistribhiḥ

गुणों की विषमता से ही ये मनुष्य इन्हें प्राप्त करते हैं। ये जीव प्रकृति में स्थित होकर इन तीन गुणों से बंधे हुए हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.174.7)

गुणकर्माऽनुरूपेण कर्मणां व्यत्ययः फलम् । गुणानुगुण्यं भूयस्ते प्रकृतिं यान्त्यमी जनाः ॥

guṇakarmā'nurūpeṇa karmaṇāṁ vyatyayaḥ phalam guṇānuguṇyaṁ bhūyaste prakṛtiṁ yāntyamī janāḥ

गुण और कर्म के अनुरूप ही कर्मों का उलट-फेर फलदायी होता है। ये लोग बार-बार अपने-अपने गुण के अनुरूप ही प्रकृति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 8 (skanda.2.174.8)

प्रकृतिस्थाः प्राकृतिका गुणकर्माऽभिमूर्छिताः । गतिं प्राकृतिकीं यांति व्यत्ययः प्रकृतेर्न हि ॥

prakṛtisthāḥ prākṛtikā guṇakarmā'bhimūrchitāḥ gatiṁ prākṛtikīṁ yānti vyatyayaḥ prakṛterna hi

प्रकृति में स्थित, गुण-कर्म से मोहग्रस्त प्राकृत जन, प्राकृत गति को ही प्राप्त होते हैं — प्रकृति में विपर्यय नहीं होता।

श्लोक 9 (skanda.2.174.9)

तामसा दुःखबहुलाः सदा तामसवृत्तयः । निर्दया निष्ठुरा लोके सदा द्वेषैकजीविनः ॥

tāmasā duḥkhabahulāḥ sadā tāmasavṛttayaḥ nirdayā niṣṭhurā loke sadā dveṣaikajīvinaḥ

तामसिक जीव सदा अत्यधिक दुःखी, तामसिक वृत्ति वाले, निर्दय, कठोर तथा सदा केवल द्वेष पर जीवित रहने वाले होते हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.174.10)

राक्षसाद्याः पिशाचांतास्तामसीं यांति वै गतिम् । राजसा मिश्रमतयः कर्तारः पुण्यपापयोः ॥

rākṣasādyāḥ piśācāntāstāmasīṁ yānti vai gatim rājasā miśramatayaḥ kartāraḥ puṇyapāpayoḥ

राक्षस आदि से लेकर पिशाच तक सभी तामसिक गति को प्राप्त होते हैं। राजसिक जीव मिश्र बुद्धि वाले होते हैं, पुण्य और पाप दोनों के कर्ता।

श्लोक 11 (skanda.2.174.11)

पुण्यात्स्वर्गं प्राप्नुवन्ति क्वचित्पापाच्च यातनाम् । अत एते मन्दभाग्या आवर्तंते पुनः पुनः ॥

puṇyātsvargaṁ prāpnuvanti kvacitpāpācca yātanām ata ete mandabhāgyā āvartante punaḥ punaḥ

पुण्य से वे स्वर्ग पाते हैं, और कभी पाप से यातना। इसीलिए ये मंदभाग्य जीव बार-बार संसार-चक्र में लौटते रहते हैं।

श्लोक 12 (skanda.2.174.12)

धर्मशीला दयावन्तः श्रद्धावन्तोऽनसूयकाः । सात्त्विकाः सात्त्विकीं वृत्तिमनुतिष्ठंत आसते ॥

dharmaśīlā dayāvantaḥ śraddhāvanto'nasūyakāḥ sāttvikāḥ sāttvikīṁ vṛttimanutiṣṭhanta āsate

धर्मशील, दयावान, श्रद्धावान और ईर्ष्यारहित सात्त्विक जीव सदा सात्त्विक वृत्ति का ही पालन करते रहते हैं।

श्लोक 13 (skanda.2.174.13)

ते चोर्ध्वं यांति विमला गुणापाये महौजसः । विभिन्नकर्मणां चातः पृथग्भावाः पृथग्विधाः ॥

te cordhvaṁ yānti vimalā guṇāpāye mahaujasaḥ vibhinnakarmaṇāṁ cātaḥ pṛthagbhāvāḥ pṛthagvidhāḥ

वे निर्मल, महातेजस्वी जीव गुणों के क्षीण होने पर ऊर्ध्वगति को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार भिन्न-भिन्न कर्मों के कारण उनके पृथक्-पृथक् भाव और रूप होते हैं।

श्लोक 14 (skanda.2.174.14)

गुणकर्मानुरूपेण तेषां विष्णुर्महाप्रभुः । कर्माणि कारयत्यद्धा स्वस्वरूपाप्तये विभुः ॥

guṇakarmānurūpeṇa teṣāṁ viṣṇurmahāprabhuḥ karmāṇi kārayatyaddhā svasvarūpāptaye vibhuḥ

महाप्रभु विष्णु उनके गुण और कर्म के अनुरूप ही, उन्हें उनके अपने स्वरूप की प्राप्ति के लिए, वास्तव में कर्मों में प्रवृत्त करते हैं।

श्लोक 15 (skanda.2.174.15)

विष्णोर्वैषम्यनैर्घृण्ये पूर्णकामस्य वै नहि । सृष्टिं स्थितिं हृतिं चैव समामेव करोत्ययम् ॥

viṣṇorvaiṣamyanairghṛṇye pūrṇakāmasya vai nahi sṛṣṭiṁ sthitiṁ hṛtiṁ caiva samāmeva karotyayam

पूर्णकाम विष्णु में पक्षपात या निर्दयता कहीं भी नहीं है। वे सृष्टि, स्थिति और संहार को समान भाव से ही करते हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.174.16)

स्वगुणादेव ते सर्वे कर्मणः फलभागिनः । आरामोप्तान्यथा सर्वान्समं वर्षयति द्रुमान् ॥

svaguṇādeva te sarve karmaṇaḥ phalabhāginaḥ ārāmoptānyathā sarvānsamaṁ varṣayati drumān

वे सब अपने ही गुण के कारण कर्म के फल-भागी होते हैं, जैसे बादल बगीचे में लगाए गए सभी वृक्षों पर समान रूप से वर्षा करता है।

श्लोक 17 (skanda.2.174.17)

एककुल्याजला ह्यंग द्रुमाश्च प्रकृतिं गताः । नारामोप्तरि वैषम्यं नैर्घृण्यं वा कथंचन ॥

ekakulyājalā hyaṅga drumāśca prakṛtiṁ gatāḥ nārāmoptari vaiṣamyaṁ nairghṛṇyaṁ vā kathañcana

हे प्रिय, एक ही नहर के जल से सींचे गए वे वृक्ष अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार ही फल देते हैं — बगीचा लगाने वाले में कोई पक्षपात या निर्दयता नहीं होती।

श्लोक 18 (skanda.2.174.18)

व्याध उवाच । जनानां पूर्णभोगानां कदा मुक्तिर्भवेन्मुने । सृष्टिकालेऽथवा ह्यंतकाले वा स्थापनस्य च ॥

vyādha uvāca janānāṁ pūrṇabhogānāṁ kadā muktirbhavenmune sṛṣṭikāle'thavā hyantakāle vā sthāpanasya ca

व्याध ने कहा — हे मुने, जिन जनों का भोग पूर्ण हो चुका हो, उनकी मुक्ति कब होती है — सृष्टिकाल में, अंतकाल में, या स्थिति-काल में?

श्लोक 19 (skanda.2.174.19)

क्वचिच्च सृष्टिकालस्य संहारस्याऽपि वै स्थितेः । एतद्विस्तार्य मे ब्रह्मन्भगवच्चेष्टितं वद ॥

kvacicca sṛṣṭikālasya saṁhārasyā'pi vai sthiteḥ etadvistārya me brahmanbhagavaccheṣṭitaṁ vada

और यह भी बताइए — सृष्टि, संहार और स्थिति के काल कैसे होते हैं। हे ब्रह्मन्, भगवान की इस लीला को विस्तार से मुझे बताइए।

श्लोक 20 (skanda.2.174.20)

शंख उवाच । चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिनमुच्यते । रात्रिश्च तावती तस्य ह्यहोरात्रं दिनं भवेत् ॥

śaṅkha uvāca caturyugasahasrāṇi brahmaṇo dinamucyate rātriśca tāvatī tasya hyahorātraṁ dinaṁ bhavet

शंख ने कहा — एक सहस्र चतुर्युग को ब्रह्मा का एक दिन कहा जाता है, और उतनी ही उसकी रात्रि होती है — इस प्रकार अहोरात्र उसका एक दिन होता है।

श्लोक 21 (skanda.2.174.21)

दशपञ्चदिनान्याहुः पक्षं मासो द्वयात्मकः । मासद्वयमृतुं प्राहुरयनं च ऋतुत्रयम् ॥

daśapañcadināni āhuḥ pakṣaṁ māso dvayātmakaḥ māsadvayamṛtuṁ prāhurayanaṁ ca ṛtutrayam

पंद्रह दिनों को पक्ष कहते हैं, माह दो पक्षों का बना होता है। दो महीनों को ऋतु कहा जाता है, और तीन ऋतुओं को अयन।

श्लोक 22 (skanda.2.174.22)

अयने द्वे वत्सरः स्यात्तादृक्च्छतसमा यदि । गच्छंति ब्रह्मणो ह्यस्य ब्रह्मकल्पं तदा विदुः ॥

ayane dve vatsaraḥ syāttādṛkchatasamā yadi gacchanti brahmaṇo hyasya brahmakalpaṁ tadā viduḥ

दो अयनों का एक वर्ष होता है; और जब ऐसे सौ वर्ष बीत जाते हैं, तब उसे ब्रह्मा का 'ब्रह्मकल्प' जानना चाहिए।

श्लोक 23 (skanda.2.174.23)

तावान्हि प्रलयः काल इति वेदविदां मतम् । प्रलयस्त्रिविधः प्रोक्तो मानवो मानवात्यये ॥

tāvānhi pralayaḥ kāla iti vedavidāṁ matam pralayastrividhaḥ prokto mānavo mānavātyaye

वेद के ज्ञाताओं का मत है कि उतना ही समय एक प्रलय-काल है। प्रलय तीन प्रकार का कहा गया है — मानव-प्रलय, जो एक मन्वंतर के अंत में होता है,

श्लोक 24 (skanda.2.174.24)

दैनंदिनो द्वितीयो हि ब्रह्मणो दिवसात्यये । ब्रह्मणोऽथ लये पश्चाद्ब्राह्मं च प्रलयं विदुः ॥

dainaṁdino dvitīyo hi brahmaṇo divasātyaye brahmaṇo'tha laye paścādbrāhmaṁ ca pralayaṁ viduḥ

दूसरा है दैनंदिन प्रलय, जो ब्रह्मा के एक दिन के अंत में होता है। और फिर ब्रह्मा के स्वयं लीन होने पर जो प्रलय होता है, उसे 'ब्राह्म प्रलय' जानना चाहिए।

श्लोक 25 (skanda.2.174.25)

ब्रह्मणस्तु मुहूर्ते तु मनोस्तु प्रलयं विदुः । प्रलयेषु व्यतीतेषु चतुर्दशसु वै क्रमात् ॥

brahmaṇastu muhūrte tu manostu pralayaṁ viduḥ pralayeṣu vyatīteṣu caturdaśasu vai kramāt

ब्रह्मा के एक मुहूर्त में ही एक मनु का प्रलय जानना चाहिए। इस प्रकार क्रम से चौदह मन्वंतर-प्रलय व्यतीत होने पर,

श्लोक 26 (skanda.2.174.26)

दैनंदिनलयं प्राहुः प्रलयानां स्थितिं पुनः । त्रयाणामेव लोकानां लयो मन्वंतरे भवेत् ॥

dainaṁdinalayaṁ prāhuḥ pralayānāṁ sthitiṁ punaḥ trayāṇāmeva lokānāṁ layo manvantare bhavet

तब उसे दैनंदिन प्रलय कहते हैं — प्रलयों की यही व्यवस्था है। एक मन्वंतर में केवल तीन लोकों का ही लय होता है।

श्लोक 27 (skanda.2.174.27)

चेतनानां तदा नाशो न लोकानां क्षयो भवेत् । उदकैरेव पूर्तिश्च यथा पूर्वं तथा पुनः ॥

cetanānāṁ tadā nāśo na lokānāṁ kṣayo bhavet udakaireva pūrtiśca yathā pūrvaṁ tathā punaḥ

उस समय चेतन प्राणियों का ही नाश होता है, लोकों का क्षय नहीं होता। जल से ही उनकी पूर्ति हो जाती है, जैसे पहले थी वैसे ही पुनः हो जाती है।

श्लोक 28 (skanda.2.174.28)

मन्वंतरांते भूयात्तु चेतनानां पुनर्भवः । दैनंदिनलये व्याध सर्वस्यापि क्षयो भवेत् ॥

manvantarānte bhūyāttu cetanānāṁ punarbhavaḥ dainaṁdinalaye vyādha sarvasyāpi kṣayo bhavet

मन्वंतर के अंत में चेतन प्राणियों का पुनर्जन्म होता है। परंतु हे व्याध, दैनंदिन प्रलय में सबका ही क्षय हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.2.174.29)

सत्यलोकं विना सर्वे लोका नश्यंति साधिपाः । सचेतनाः साधिभूताः प्रसुप्ते चतुरानने ॥

satyalokaṁ vinā sarve lokā naśyanti sādhipāḥ sacetanāḥ sādhibhūtāḥ prasupte caturānane

सत्यलोक को छोड़कर, चतुरानन ब्रह्मा के सो जाने पर, सभी लोक अपने अधिपतियों और चेतन-भूत प्राणियों सहित नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 30 (skanda.2.174.30)

तत्त्वाभिमानिनो देवाः केचिच्च मुनयस्तथा । शिष्यंति सुप्ताः सर्वेऽपि सत्यलोकव्यवस्थिताः ॥

tattvābhimānino devāḥ kecicca munayastathā śiṣyanti suptāḥ sarve'pi satyalokavyavasthitāḥ

तत्त्वों के अधिष्ठाता देवता और कुछ मुनि, सभी सत्यलोक में स्थित होकर सुप्तावस्था में शेष रह जाते हैं।

श्लोक 31 (skanda.2.174.31)

तिष्ठंति सुप्तिमापन्ना यावत्कल्पमतींद्रियाः । पुनर्निशात्यये ब्रह्मा यथापूर्वमकल्पयत् ॥

tiṣṭhanti suptimāpannā yāvatkalpamatīndriyāḥ punarniśātyaye brahmā yathāpūrvamakalpayat

वे इंद्रियातीत सत्तायें कल्प के अंत तक सुप्त रहती हैं। फिर रात्रि समाप्त होने पर ब्रह्मा पूर्ववत् सृष्टि की रचना करते हैं,

श्लोक 32 (skanda.2.174.32)

ऋषीन्देवान्पितॄँल्लोकान्धर्मान्वर्णान्पृथक्पृथक् । पुनर्दशावतारा हि विष्णोर्देवस्य चक्रिणः ॥

ṛṣīndevānpitṝnllokāndharmānvarṇānpṛthakpṛthak punardaśāvatārā hi viṣṇordevasya cakriṇaḥ

पृथक्-पृथक् ऋषियों, देवों, पितरों, लोकों, धर्मों और वर्णों की। और चक्रधारी विष्णु देव के दश अवतार भी पुनः,

श्लोक 33 (skanda.2.174.33)

नियमेन भवंत्येते तथान्येऽपि च भूरिशः । देवता ऋषयश्चैव आकल्पं च गिरां पतेः ॥

niyamena bhavantyete tathānye'pi ca bhūriśaḥ devatā ṛṣayaścaiva ākalpaṁ ca girāṁ pateḥ

नियमपूर्वक होते हैं, तथा अन्य बहुत से देवता और ऋषि भी, कल्प के अंत तक, वाणी के स्वामी (ब्रह्मा) के साथ,

श्लोक 34 (skanda.2.174.34)

पुनरेवाऽभिवर्तंते ब्रह्मणा सह मुक्तिगाः । भूपाश्च साधवो ये च सिद्धिं प्राप्ताः परंगताः ॥

punarevā'bhivartante brahmaṇā saha muktigāḥ bhūpāśca sādhavo ye ca siddhiṁ prāptāḥ paraṁgatāḥ

वे मुक्तिगामी सत्तायें ब्रह्मा के साथ पुनः लौट आती हैं। और जो राजा तथा साधुजन सिद्धि पाकर परमगति को प्राप्त हो चुके हैं,

श्लोक 35 (skanda.2.174.35)

तेनैव चाभिवर्तंते सत्यलोकव्यवस्थिताः । तद्राशिगाः पुनर्यांति तन्नाम्ना श्रुतिसंस्थिताः ॥

tenaiva cābhivartante satyalokavyavasthitāḥ tadrāśigāḥ punaryānti tannāmnā śrutisaṁsthitāḥ

वे भी सत्यलोक में स्थित होकर उसी क्रम से पुनः लौट आते हैं। जो लोग अपने-अपने वर्ग में स्थित हैं, वे भी अपने ही नाम से, श्रुति में स्थापित होकर पुनः जाते हैं,

श्लोक 36 (skanda.2.174.36)

तत्तद्गोत्रेषु जायंते तत्तत्कर्मरताः सदा । दैत्यानामपि सर्वेषां यदा कलियुगात्ययः ॥

tattadgotreṣu jāyante tattatkarmaratāḥ sadā daityānāmapi sarveṣāṁ yadā kaliyugātyayaḥ

अपने-अपने गोत्रों में जन्म लेते हैं, सदा अपने-अपने कर्मों में रत रहते हुए। और जब समस्त दैत्यों का भी कलियुग के अंत में विनाश होता है,

श्लोक 37 (skanda.2.174.37)

कलिना सह गच्छंति स्वां गतिं निरयालयाः । तेषां च राशिसंस्था ये तन्नामानोऽपरेऽपि च ॥

kalinā saha gacchanti svāṁ gatiṁ nirayālayāḥ teṣāṁ ca rāśisaṁsthā ye tannāmāno'pare'pi ca

वे नरक-निवासी दैत्य कलि के साथ अपनी गति को चले जाते हैं। और जो उनके ही वर्ग में स्थित हैं, तथा अन्य भी उन्हीं के नाम वाले जीव,

श्लोक 38 (skanda.2.174.38)

जायन्ते कर्मणा स्वेन तत्तत्कर्मविधायकाः । सृष्टिकालं प्रवक्ष्यामि मुक्तिकालं तथैव च ॥

jāyante karmaṇā svena tattatkarmavidhāyakāḥ sṛṣṭikālaṁ pravakṣyāmi muktikālaṁ tathaiva ca

अपने-अपने कर्मों के अनुसार ही, उन्हीं कर्मों को करने वाले बनकर जन्म लेते हैं। अब मैं सृष्टिकाल और मुक्तिकाल का वर्णन करूँगा।

श्लोक 39 (skanda.2.174.39)

ब्रह्मादीनां च देवानां समाहितमना भव । निमेषो देवदेवस्य ब्रह्मकल्पसमो मतः ॥

brahmādīnāṁ ca devānāṁ samāhitamanā bhava nimeṣo devadevasya brahmakalpasamo mataḥ

ब्रह्मा आदि देवों के विषय में एकाग्रचित्त हो। देवाधिदेव की एक पलक झपकने की अवधि ब्रह्मा के एक कल्प के समान मानी गई है।

श्लोक 40 (skanda.2.174.40)

तस्यावसाने चोन्मेषो देवदेवशिखामणेः । निमेषांऽते भवेदिच्छा स्रष्टुं लोकांश्च कुक्षिगान् ॥

tasyāvasāne conmeṣo devadevaśikhāmaṇeḥ nimeṣānte bhavedicchā sraṣṭuṁ lokāṁśca kukṣigān

उसकी समाप्ति पर, देवशिरोमणि की आँख फिर से खुल जाती है। पलक बंद होने के अंत में, अपने उदर में स्थित लोकों की पुनः रचना करने की इच्छा उत्पन्न होती है,

श्लोक 41 (skanda.2.174.41)

सोऽपश्यत्स्वोदरे सर्वाञ्जीवसंघाननेकशः । सृज्यान्मुक्तानमृन्सर्वाँल्लिंगभंगमुपागतान् ॥

so'paśyatsvodare sarvāñjīvasaṅghānanekaśaḥ sṛjyānmuktānamṛnsarvāṁllliṅgabhaṅgamupāgatān

वे अपने उदर में समस्त जीव-समूहों को अनेक रूपों में देखते हैं — जिन्हें फिर से रचा जाना है, जो मुक्त हैं, जो अमर हैं, और जो सब अपने सूक्ष्म शरीर के विनाश को प्राप्त हो चुके हैं,

श्लोक 42 (skanda.2.174.42)

सुप्ताः सृतिस्थाः सर्वेऽपि तमोगा अपि सर्वशः । पूर्वकल्पे लिंगभंगमापन्ना विधिपूर्वकाः ॥

suptāḥ sṛtisthāḥ sarve'pi tamogā api sarvaśaḥ pūrvakalpe liṅgabhaṅgamāpannā vidhipūrvakāḥ

सोए हुए, संसार-मार्ग में स्थित, और सब प्रकार से तमोगति को प्राप्त — वे सभी जो पूर्वकल्प में विधिवत् अपने सूक्ष्म शरीर के विनाश को प्राप्त हो चुके हैं,

श्लोक 43 (skanda.2.174.43)

मानवांता जीवकोशा जीवन्मुक्ताश्च मुक्तिगाः । पूर्वकल्पे विमुक्ताश्च ब्रह्माद्या मानवांतकाः ॥

mānavāntā jīvakośā jīvanmuktāśca muktigāḥ pūrvakalpe vimuktāśca brahmādyā mānavāntakāḥ

मनुष्यपर्यंत सभी जीव-समूह, जीवन्मुक्त और मुक्तिगामी जन, तथा पूर्वकल्प में विमुक्त हो चुके ब्रह्मा आदि से लेकर मनुष्य तक के सभी जीव —

श्लोक 44 (skanda.2.174.44)

ध्यानसंस्था हि तिष्ठंति विष्णुकुक्षिगता अपि । उन्मेषस्यादिमे भागे चतुर्व्यूहात्मको विभुः ॥

dhyānasaṁsthā hi tiṣṭhanti viṣṇukukṣigatā api unmeṣasyādime bhāge caturvyūhātmako vibhuḥ

वे सब विष्णु के उदर में स्थित होकर ध्यानावस्था में ही टिके रहते हैं। नेत्र खुलने के प्रारंभिक भाग में, चतुर्व्यूहस्वरूप विभु,

श्लोक 45 (skanda.2.174.45)

भूत्वा तु पूर्वसाद्गुण्याद्वासुदेवाच्च व्यूहगात् । दत्त्वा तु ब्रह्मणो मुक्तिं सायुज्याख्यां महाविभुः ॥

bhūtvā tu pūrvasādguṇyādvāsudevācca vyūhagāt dattvā tu brahmaṇo muktiṁ sāyujyākhyāṁ mahāvibhuḥ

पूर्व के सादृश्य से वासुदेव नामक व्यूह से प्रकट होकर, वह महाविभु ब्रह्मा को सायुज्य नामक मुक्ति प्रदान करते हैं,

श्लोक 46 (skanda.2.174.46)

दत्त्वा तदनु सायुज्यं तत्त्वज्ञानं महात्मनाम् । सारूप्यं चैव केषांचित्सामीप्यं च तथा विभुः ॥

dattvā tadanu sāyujyaṁ tattvajñānaṁ mahātmanām sārūpyaṁ caiva keṣāñcitsāmīpyaṁ ca tathā vibhuḥ

फिर महात्माओं को तत्त्वज्ञान सहित सायुज्य प्रदान करके, कुछ को सारूप्य और कुछ को सामीप्य भी वह विभु प्रदान करते हैं,

श्लोक 47 (skanda.2.174.47)

सालोक्यं च तथाऽन्येषां दत्त्वा देवो जनार्दनः । अनिरुद्धवशे सर्वान्स्थिताँल्लोकानलोकयत् ॥

sālokyaṁ ca tathā'nyeṣāṁ dattvā devo janārdanaḥ aniruddhavaśe sarvānsthitāṁllokānalokayat

और अन्य कुछ को सालोक्य (उसी लोक में निवास) प्रदान करके, देव जनार्दन सब लोकों को अनिरुद्ध के वश में स्थित देखते हैं,

श्लोक 48 (skanda.2.174.48)

प्रद्युम्नस्य वशे दत्त्वा सृष्टिं कर्तुं मनो दधे । मायां जयां कृतिं शांतिमुपयेमे स्वयं हरिः ॥

pradyumnasya vaśe dattvā sṛṣṭiṁ kartuṁ mano dadhe māyāṁ jayāṁ kṛtiṁ śāntimupayeme svayaṁ hariḥ

और सृष्टि करने के लिए प्रद्युम्न के अधीन करके अपना मन लगाते हैं। हरि स्वयं माया, जया, कृति और शांति को अपनी शक्ति के रूप में ग्रहण करते हैं,

श्लोक 49 (skanda.2.174.49)

चतुर्व्यूहैः पूर्णगुणैर्वासुदेवादिकैः क्रमात् । ताभिर्युक्तो महाविष्णुश्चतुर्व्यूहात्मको विभुः ॥

caturvyūhaiḥ pūrṇaguṇairvāsudevādikaiḥ kramāt tābhiryukto mahāviṣṇuścaturvyūhātmako vibhuḥ

क्रमशः वासुदेव आदि पूर्णगुण चार व्यूहों के रूप में। उन शक्तियों से युक्त, चतुर्व्यूहस्वरूप महाविष्णु,

श्लोक 50 (skanda.2.174.50)

भिन्नकर्माशयं लोकं पूर्णकामो व्यजीजनत् । उन्मेषांते पुनर्विष्णुर्योगमायां समाश्रितः ॥

bhinnakarmāśayaṁ lokaṁ pūrṇakāmo vyajījanat unmeṣānte punarviṣṇuryogamāyāṁ samāśritaḥ

पूर्णकाम होते हुए भी भिन्न-भिन्न कर्म-आशय वाले संसार की रचना करते हैं। फिर पलक झपकने के अंत में, विष्णु योगमाया का आश्रय लेकर,

श्लोक 51 (skanda.2.174.51)

संकर्षणाद्व्यूहगाच्च हरत्येतच्चराचरम् । तदेतत्सर्वमाख्यातं कार्यं चिंत्यं महात्मनः । यदचिंत्यं दुर्विभाव्यं ब्रह्माद्यैरपि योगिभिः ॥

saṁkarṣaṇādvyūhagācca haratyetaccarācaram tadetatsarvamākhyātaṁ kāryaṁ cintyaṁ mahātmanaḥ yadacintyaṁ durvibhāvyaṁ brahmādyairapi yogibhiḥ

संकर्षण नामक व्यूह के द्वारा इस समस्त चराचर जगत् का संहार करते हैं। इस प्रकार महात्मा विष्णु का यह चिंतनीय कार्य पूर्णतः बताया गया — जो ब्रह्मा आदि योगियों के लिए भी अचिंत्य और दुर्विभाव्य है।

श्लोक 52 (skanda.2.174.52)

व्याध उवाच । के वा भागवता धर्माः कैर्विष्णुश्च प्रसीदति । तानहं श्रोतुमिच्छामि सांप्रतं वद नो मुने ॥

vyādha uvāca ke vā bhāgavatā dharmāḥ kairviṣṇuśca prasīdati tānahaṁ śrotumicchāmi sāṁprataṁ vada no mune

व्याध ने कहा — भागवत धर्म कौन-कौन से हैं, और किनसे विष्णु प्रसन्न होते हैं? मैं अब उन्हें सुनना चाहता हूँ, हे मुने, मुझे बताइए।

श्लोक 53 (skanda.2.174.53)

शंख उवाच । येन चित्तविशुद्धिः स्याद्यः सतामुपकारकः । तं विद्धि सात्त्विकं धर्मं यश्च केनाप्य निंदितः ॥

śaṅkha uvāca yena cittaviśuddhiḥ syādyaḥ satāmupakārakaḥ taṁ viddhi sāttvikaṁ dharmaṁ yaśca kenāpya nindtitaḥ

शंख ने कहा — जिससे चित्त-शुद्धि होती है, जो सज्जनों के लिए उपकारी है, और जिसकी किसी के द्वारा भी निंदा नहीं की गई है, उसे सात्त्विक धर्म जानो।

श्लोक 54 (skanda.2.174.54)

श्रुतिस्मृत्युदितो यस्तु यदि निष्कामिको भवेत् । यस्तु लोकाऽविरुद्धोऽपि तं धर्मं सात्त्विकंविदुः ॥

śrutismṛtyudito yastu yadi niṣkāmiko bhavet yastu lokā'viruddho'pi taṁ dharmaṁ sāttvikaṁ viduḥ

जो श्रुति-स्मृति में कहा गया हो और यदि निष्काम भाव से किया जाए, तथा जो लोक-विरुद्ध भी न हो, उस धर्म को सात्त्विक जाना जाता है।

श्लोक 55 (skanda.2.174.55)

चतुर्विधा हि ते धर्मा वर्णाश्रमविभागतः । नित्यनैमित्तिकाः काम्या इति ते च त्रिधा मताः ॥

caturvidhā hi te dharmā varṇāśramavibhāgataḥ nityanaimittikāḥ kāmyā iti te ca tridhā matāḥ

धर्म वर्ण और आश्रम के विभाग से चार प्रकार का है, और वह नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य — इस प्रकार तीन प्रकार का भी माना गया है।

श्लोक 56 (skanda.2.174.56)

ते सर्वे स्वस्वधर्माश्च यदा विष्णोः समर्पिताः । तदा वै सात्त्विका ज्ञेया धर्मा भागवताः शुभाः ॥

te sarve svasvadharmāśca yadā viṣṇoḥ samarpitāḥ tadā vai sāttvikā jñeyā dharmā bhāgavatāḥ śubhāḥ

जब ये सभी अपने-अपने धर्म विष्णु को समर्पित कर दिए जाते हैं, तभी उन्हें सात्त्विक, शुभ भागवत धर्म जानना चाहिए।

श्लोक 57 (skanda.2.174.57)

देवतांतरदैवत्याः सकामा राजसा मताः । यक्षरक्षःपिशाचादिदैवत्या लोकनिष्ठुराः ॥

devatāntaradaivatyāḥ sakāmā rājasā matāḥ yakṣarakṣaḥpiśācādidaivatyā lokaniṣṭhurāḥ

अन्य देवताओं को उद्देश्य कर, कामना सहित किए गए धर्म राजसिक माने जाते हैं। यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि को उद्देश्य कर किए गए, संसार में क्रूर,

श्लोक 58 (skanda.2.174.58)

हिंसात्मका निंदिताश्च धर्मास्ते तामसाः स्मृताः । सत्त्वस्थाः सात्त्विकान्धर्मान्विष्णुप्रीतिकराञ्च्छुभान् ॥

hiṁsātmakā ninditāśca dharmāste tāmasāḥ smṛtāḥ sattvasthāḥ sāttvikāndharmānviṣṇuprītikarāñcchubhān

हिंसापूर्ण और निंदित धर्म तामसिक कहे गए हैं। जो सत्त्वस्थ जन विष्णु को प्रसन्न करने वाले शुभ सात्त्विक धर्मों को,

श्लोक 59 (skanda.2.174.59)

कुर्वंत्यनीहया नित्यं ते वै भागवताः स्मृताः । येषां चित्तं सदा विष्णौ जिह्वायां नाम वै विभोः ॥

kurvantyanīhayā nityaṁ te vai bhāgavatāḥ smṛtāḥ yeṣāṁ cittaṁ sadā viṣṇau jihvāyāṁ nāma vai vibhoḥ

बिना किसी कामना के सदा करते रहते हैं, वे ही भागवत कहलाते हैं। जिनका चित्त सदा विष्णु में रहता है, जिनकी जिह्वा पर सदा प्रभु का नाम रहता है,

श्लोक 60 (skanda.2.174.60)

पादौ च हृदये येषां ते वै भागवताः स्मृताः ॥

pādau ca hṛdaye yeṣāṁ te vai bhāgavatāḥ smṛtāḥ

और जिनके हृदय में सदा उनके चरण बसे रहते हैं, वे ही भागवत कहे जाते हैं।

श्लोक 61 (skanda.2.174.61)

सदाचाररता ये च सर्वेषामुपकारकाः । सदैव ममताहीनास्ते वै भागवताः स्मृताः ॥

sadācāraratā ye ca sarveṣāmupakārakāḥ sadaiva mamatāhīnāste vai bhāgavatāḥ smṛtāḥ

जो सदाचार में रत हैं, सबके उपकारी हैं, और सदा ममता से रहित हैं, वे ही भागवत कहे जाते हैं।

श्लोक 62 (skanda.2.174.62)

येषां च शास्त्रे विश्वासो गुरौ साधुषु कर्मसु । ये विष्णुभक्ताः सततं ते वै भागवताः स्मृताः ॥

yeṣāṁ ca śāstre viśvāso gurau sādhuṣu karmasu ye viṣṇubhaktāḥ satataṁ te vai bhāgavatāḥ smṛtāḥ

जिनका विश्वास शास्त्र में, गुरु में, साधुओं में और सत्कर्मों में है, तथा जो सदा विष्णुभक्त हैं, वे ही भागवत कहे जाते हैं।

श्लोक 63 (skanda.2.174.63)

येषां हि संमता धर्माः शाश्वता विष्णुवल्लभाः । श्रुतिस्मृत्युदिता ये च ते धर्माः शाश्वता मताः ॥

yeṣāṁ hi saṁmatā dharmāḥ śāśvatā viṣṇuvallabhāḥ śrutismṛtyuditā ye ca te dharmāḥ śāśvatā matāḥ

जिनके द्वारा शाश्वत, विष्णु को प्रिय धर्म स्वीकार किए जाते हैं, तथा जो धर्म श्रुति-स्मृति में कहे गए हैं, वे ही शाश्वत धर्म माने जाते हैं।

श्लोक 64 (skanda.2.174.64)

अटनं सर्वदेशेषु वीक्षणं सर्वकर्मणाम् । श्रवणं सर्वधर्माणां विषयाऽऽसक्तचेतसाम् ॥

aṭanaṁ sarvadeśeṣu vīkṣaṇaṁ sarvakarmaṇām śravaṇaṁ sarvadharmāṇāṁ viṣayā'saktacetasām

विषयों में आसक्त चित्त वालों के लिए, सभी देशों में भटकना, सभी कर्मों को देखना, और सभी धर्मों को सुनना —

श्लोक 65 (skanda.2.174.65)

अकिंचित्करमेतेषां षंढस्येव वरस्त्रियः । साधूनां दर्शनेनैव मनो द्रवति वै सताम् ॥

akiñcitkarametaṣāṁ ṣaṇḍhasyeva varastriyaḥ sādhūnāṁ darśanenaiva mano dravati vai satām

यह सब उनके लिए वैसे ही निष्फल है जैसे नपुंसक के लिए सुंदर स्त्रियाँ। किंतु सज्जनों का चित्त तो साधुओं के दर्शनमात्र से ही द्रवित हो जाता है,

श्लोक 66 (skanda.2.174.66)

चंद्रस्य कौमुदीसंगाच्चंद्रकांतशिला यथा । क्वचित्सच्छास्त्रश्रवणाद्विषयैरहितं मनः ॥

candrasya kaumudīsaṅgāccandrakāntaśilā yathā kvacitsacchāstraśravaṇādviṣayairahitaṁ manaḥ

जैसे चंद्रकांत मणि चंद्रमा की चांदनी के स्पर्श से पिघल उठती है। और कभी सत्शास्त्र-श्रवण से मन विषयों से रहित हो जाता है,

श्लोक 67 (skanda.2.174.67)

तिष्ठत्येव सतां पुंसां तेजोरूपं ह्यकल्मषम् । पद्मबन्धोः प्रभासंगात्सूर्यकांतशिला यथा ॥

tiṣṭhatyeva satāṁ puṁsāṁ tejorūpaṁ hyakalmaṣam padmabandhoḥ prabhāsaṅgātsūryakāntaśilā yathā

और सज्जन पुरुषों में एक निर्मल तेजस्वरूप स्थिर रहता है, जैसे सूर्यकांत मणि सूर्य की किरणों के स्पर्श से (अग्नि की भाँति) प्रज्वलित होती है।

श्लोक 68 (skanda.2.174.68)

निष्कामैर्हि जनैर्यैस्तु श्रद्धया समुपाश्रितः । यो विष्णुवल्लभो नित्यं धर्मो भागवतो मतः ॥

niṣkāmairhi janairyaistu śraddhayā samupāśritaḥ yo viṣṇuvallabho nityaṁ dharmo bhāgavato mataḥ

जो निष्काम जन श्रद्धापूर्वक उस धर्म का आश्रय लेते हैं जो सदा विष्णु को प्रिय है और भागवत माना गया है,

श्लोक 69 (skanda.2.174.69)

तैर्दृष्टा वहवो धर्मा इहाऽमुत्र फलप्रदाः । विष्णुप्रीतिकराः सूक्ष्माः सर्वदुःखविमोचकाः ॥

tairdṛṣṭā vahavo dharmā ihā'mutra phalapradāḥ viṣṇuprītikarāḥ sūkṣmāḥ sarvaduḥkhavimocakāḥ

उन्होंने ऐसे अनेक धर्मों को देखा है जो इस लोक और परलोक में फलदायी हैं, विष्णु को प्रसन्न करने वाले, सूक्ष्म और सब दुःखों से मुक्त करने वाले हैं।

श्लोक 70 (skanda.2.174.70)

दध्नः सारमिवोद्धृत्य धर्मं वैशाखसंभवम् । रमायै भगवानाह क्षीराब्धौ हितकाम्यया ॥

dadhnaḥ sāramivoddhṛtya dharmaṁ vaiśākhasaṁbhavam ramāyai bhagavānāha kṣīrābdhau hitakāmyayā

जैसे दही से मक्खन निकाला जाता है, वैसे ही वैशाख मास से उत्पन्न धर्म का सार निकालकर, भगवान ने क्षीरसागर में रमा (लक्ष्मी) के हित की कामना से कहा —

श्लोक 71 (skanda.2.174.71)

मार्गच्छायाविनिर्माणं प्रपादानं च वै तथा । व्यजनैर्व्यजनं चैव प्रश्रयाणां समर्पणम् ॥

mārgacchāyāvinirmāṇaṁ prapādānaṁ ca vai tathā vyajanairvyajanaṁ caiva praśrayāṇāṁ samarpaṇam

मार्गों पर छायादार स्थान बनवाना, जलशालाओं का दान, पंखों से हवा करना, तथा प्याऊ स्थापित करना,

श्लोक 72 (skanda.2.174.72)

छत्रस्योपानहोर्दानं दानं कर्पूरगन्धयोः । वापीकूपतडागानां निर्माणं विभवे सति ॥

chatrasyopānahordānaṁ dānaṁ karpūragandhayoḥ vāpīkūpataḍāgānāṁ nirmāṇaṁ vibhave sati

छाता और जूतों का दान, कपूर और सुगंधित द्रव्यों का दान, तथा साधन-संपन्न होने पर बावड़ी, कुएँ और तालाबों का निर्माण करना,

श्लोक 73 (skanda.2.174.73)

सायाह्ने पानकस्यापि दानं तु कुसुमस्य च । तांबूलदानं पापघ्नं गोरसानां विशेषतः ॥

sāyāhne pānakasyāpi dānaṁ tu kusumasya ca tāmbūladānaṁ pāpaghnaṁ gorasānāṁ viśeṣataḥ

संध्या के समय शर्बत और फूलों का दान, पान का दान जो पापनाशक है, तथा विशेष रूप से गोरस (दूध-दही) का दान,

श्लोक 74 (skanda.2.174.74)

लवणान्वितत्तक्रस्य दानं श्रांताय वै पथि । अभ्यंगकरणं चैव द्विजपादावनेजनम् ॥

lavaṇānvitattakrasya dānaṁ śrāntāya vai pathi abhyaṅgakaraṇaṁ caiva dvijapādāvanejanam

मार्ग में थके हुए राही को नमक-मिश्रित छाछ देना, तेल-मालिश करना, तथा ब्राह्मणों के चरण धोना,

श्लोक 75 (skanda.2.174.75)

कटकम्बलपर्यंकदानं गोदानमेव च । मधुयुक्ततिलानां च दानं पापविनाशनम् ॥

kaṭakambalaparyaṅkadānaṁ godānameva ca madhuyuktatilānāṁ ca dānaṁ pāpavināśanam

चटाई, कंबल और शय्या का दान, गोदान, तथा मधु-मिश्रित तिलों का दान — ये सब पापों का नाश करने वाले हैं,

श्लोक 76 (skanda.2.174.76)

सायाह्ने चेक्षुदण्डानां दानमुर्वारुकस्य च । रसायनप्रदानं च पितृनिर्वापणं तथा ॥

sāyāhne cekṣudaṇḍānāṁ dānamurvārukasya ca rasāyanapradānaṁ ca pitṛnirvāpaṇaṁ tathā

संध्या के समय गन्ने और ककड़ी का दान, फलों के रस का दान, तथा पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण करना,

श्लोक 77 (skanda.2.174.77)

एते धर्मापि शिष्योक्ता मासेऽस्मिन्माधवप्रिये । प्रातः सूर्योदये स्नात्वा शृण्वन्द्विजकुलेरितम् ॥

ete dharmāpi śiṣyoktā māse'sminmādhavapriye prātaḥ sūryodaye snātvā śṛṇvandvijakuleritam

ये सभी धर्म माधवप्रिय इस मास में शिष्य के लिए कहे गए हैं। प्रातः सूर्योदय के समय स्नान करके, ब्राह्मणकुल द्वारा कहे गए वचन को सुनकर,

श्लोक 78 (skanda.2.174.78)

नित्यकर्माणि कृत्वैवं मधुसूदनमर्चयेत् । कथां माधवमासीयां शृणुयाच्च समाहितः ॥

nityakarmāṇi kṛtvaivaṁ madhusūdanamarcayet kathāṁ mādhavamāsīyāṁ śṛṇuyācca samāhitaḥ

नित्यकर्म करके इस प्रकार मधुसूदन का पूजन करे, और एकाग्रचित्त होकर माधव-मास की कथा सुने।

श्लोक 79 (skanda.2.174.79)

तैलाभ्यंगं वर्जयेच्च कांस्यपात्रे तु भोजनम् । निषिद्धभक्षणं चैव वृथाऽऽलापं तु वर्जयेत् ॥

tailābhyaṅgaṁ varjayecca kāṁsyapātre tu bhojanam niṣiddhabhakṣaṇaṁ caiva vṛthā'lāpaṁ tu varjayet

तेल की मालिश तथा कांसे के पात्र में भोजन का त्याग करे, निषिद्ध भोजन तथा व्यर्थ की बकवास का भी त्याग करे।

श्लोक 80 (skanda.2.174.80)

अलाबुं गृंजनं चैव लशुनं तिलपिष्टकम् । आरनालं भिस्सटं च घृतकोशातकीं तथा ॥

alābuṁ gṛñjanaṁ caiva laśunaṁ tilapiṣṭakam āranālaṁ bhissaṭaṁ ca ghṛtakośātakīṁ tathā

लौकी, गाजर, लहसुन, तिल का पिट्ठी, कांजी, भिस्सट (एक प्रकार का शाक), तथा घी में पकी तुरई का त्याग करे,

श्लोक 81 (skanda.2.174.81)

उपोदकीं कलिंगं च शिग्रुशाकं च वर्जयेत् । निष्पावानि कुलित्थानि मसूराणि च वर्जयेत् ॥

upodakīṁ kaliṅgaṁ ca śigruśākaṁ ca varjayet niṣpāvāni kulitthāni masūrāṇi ca varjayet

पोई का साग, तरबूज, तथा सहजन का साग त्याग दे। सेम, कुलथी और मसूर की दाल का भी त्याग करे।

श्लोक 82 (skanda.2.174.82)

वृंताकानि कलिंगानि कोद्रवाणि च वर्जयेत् । तंदुलीयकशाकं च कौसुम्भं मूलकं तथा ॥

vṛntākāni kaliṅgāni kodravāṇi ca varjayet tandulīyakaśākaṁ ca kausumbhaṁ mūlakaṁ tathā

बैंगन, तरबूज तथा कोदो का त्याग करे। चौलाई का साग, कुसुम्भ तथा मूली का भी त्याग करे,

श्लोक 83 (skanda.2.174.83)

औदुंबरं बिल्वफलं तथा श्लेष्मातकीफलम् । सर्वथा वर्जयेद्विद्वान्मासेऽस्मिन्माधवप्रिये ॥

audumbaraṁ bilvaphalaṁ tathā śleṣmātakīphalam sarvathā varjayedvidvānmāse'sminmādhavapriye

गूलर का फल, बेल का फल तथा लसौड़े का फल — इन सबका विद्वान पुरुष इस माधवप्रिय मास में सर्वथा त्याग करे।

श्लोक 84 (skanda.2.174.84)

एतेष्वन्यतमं भुक्त्वा स चंडालो भवेद्ध्रुवम् । तिर्यग्योनिशतं याति नात्र कार्या विचारणा ॥

eteṣvanyatamaṁ bhuktvā sa caṇḍālo bhaveddhruvam tiryagyoniśataṁ yāti nātra kāryā vicāraṇā

इनमें से किसी एक को भी खाकर मनुष्य निश्चय ही चांडाल हो जाता है, और सौ बार पशु-योनि को प्राप्त होता है — इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 85 (skanda.2.174.85)

एवं मासव्रतं कुर्यात्प्रीतये मधुघातिनः । एवं व्रते समाप्ते तु प्रतिमां कारयेद्विभोः ॥

evaṁ māsavrataṁ kuryātprītaye madhughātinaḥ evaṁ vrate samāpte tu pratimāṁ kārayedvibhoḥ

इस प्रकार मधु-दैत्य के नाशक (विष्णु) की प्रसन्नता के लिए यह मासव्रत करे। इस व्रत के समाप्त होने पर विभु की एक प्रतिमा बनवाए,

श्लोक 86 (skanda.2.174.86)

मधुसूदनदैवत्यां सवस्त्रां च सदक्षिणाम् । स्वर्चितां विभवैः सर्वैर्ब्राह्मणाय निवेदयेत् ॥

madhusūdanadaivatyāṁ savastrāṁ ca sadakṣiṇām svarcitāṁ vibhavaiḥ sarvairbrāhmaṇāya nivedayet

मधुसूदन देवता की उस प्रतिमा को वस्त्र और दक्षिणा सहित, अपनी सामर्थ्य भर सब वैभव से पूजित करके ब्राह्मण को अर्पित करे।

श्लोक 87 (skanda.2.174.87)

वैशाखसितद्वादश्यां दद्याद्दध्यन्नमंजसा । सोदकुम्भं सतांबूलं सफलं च सदक्षिणम् ॥

vaiśākhasitadvādaśyāṁ dadyāddadhyannamañjasā sodakumbhaṁ satāmbūlaṁ saphalaṁ ca sadakṣiṇam

वैशाख शुक्ल द्वादशी को विधिपूर्वक दही-भात का दान करे, जल के कलश, पान, फल और दक्षिणा सहित —

श्लोक 88 (skanda.2.174.88)

ददामि धर्मराजाय तेन प्रीणातु वै यमः । अपसव्यात्समुच्चार्य नामगोत्रे पितुस्ततः ॥

dadāmi dharmarājāya tena prīṇātu vai yamaḥ apasavyātsamuccārya nāmagotre pitustataḥ

यह कहते हुए — 'मैं यह धर्मराज को देता हूँ, इससे यम प्रसन्न हों' — अपसव्य होकर पिता का नाम और गोत्र उच्चारण करके,

श्लोक 89 (skanda.2.174.89)

दद्याद्दध्यन्नमक्षय्यं पितॄणां तृप्तिहेतवे । गुरुभ्यश्च तथा दद्यात्पश्चाद्दद्याच्च विष्णवे ॥

dadyāddadhyannamakṣayyaṁ pitṝṇāṁ tṛptihetave gurubhyaśca tathā dadyātpaścāddadyācca viṣṇave

पितरों की तृप्ति के लिए अक्षय दही-भात का दान करे, फिर गुरुजनों को भी दान दे, और अंत में विष्णु के लिए भी अर्पित करे।

श्लोक 90 (skanda.2.174.90)

शीतलोदकदध्यन्नं कांस्यपात्रस्थमुत्तमम् । सदक्षिणं सतांबूलं सभक्ष्यं च फलान्वितम् ॥

śītalodakadadhyannaṁ kāṁsyapātrasthamuttamam sadakṣiṇaṁ satāmbūlaṁ sabhakṣyaṁ ca phalānvitam

शीतल जल-मिश्रित उत्तम दही-भात कांसे के पात्र में रखकर, दक्षिणा, पान, भक्ष्य और फल सहित —

श्लोक 91 (skanda.2.174.91)

ददामि विष्णवे तुभ्यं विष्णुलोकजिगीषया । इति दत्त्वा यथाशक्त्या गां च दद्यात्कुटुंबिने ॥

dadāmi viṣṇave tubhyaṁ viṣṇulokajigīṣayā iti dattvā yathāśaktyā gāṁ ca dadyātkuṭumbine

'हे विष्णु, विष्णुलोक की प्राप्ति की इच्छा से मैं यह आपको देता हूँ' — ऐसा कहकर अर्पित करे, और अपनी सामर्थ्य के अनुसार एक गृहस्थ को गाय भी दान करे।

श्लोक 92 (skanda.2.174.92)

एवं मासव्रतं कुर्याद्यो दंभेन विवर्जितः । स सर्वैः पातकैर्हीनः कुलमुद्धृत्य वै शतम् ॥

evaṁ māsavrataṁ kuryādyo daṁbhena vivarjitaḥ sa sarvaiḥ pātakairhīnaḥ kulamuddhṛtya vai śatam

जो इस प्रकार आडंबर रहित होकर इस मासव्रत का पालन करे, वह सब पापों से मुक्त होकर सौ पीढ़ियों का उद्धार करके,

श्लोक 93 (skanda.2.174.93)

पश्यतामेव भूतानां भित्त्वा वै सूर्यमंडलम् । याति विष्णोः परं धाम योगिनामपि दुर्लभम् ॥

paśyatāmeva bhūtānāṁ bhittvā vai sūryamaṇḍalam yāti viṣṇoḥ paraṁ dhāma yogināmapi durlabham

सब प्राणियों के देखते-देखते ही सूर्यमंडल को भेदकर विष्णु के उस परमधाम को प्राप्त होता है, जो योगियों के लिए भी दुर्लभ है।

श्लोक 94 (skanda.2.174.94)

व्याख्यात्येवं द्विजकुलवरे माधवीयांश्च । धर्मान्विष्ण्वादीष्टानतिमहितरान्व्याधपृष्टान्समस्तान् ॥

vyākhyātyevaṁ dvijakulavare mādhavīyāṁśca dharmānviṣṇvādīṣṭānatimahitarānvyādhapṛṣṭānsamastān

इस प्रकार उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने माधव मास के, विष्णु आदि को अत्यंत प्रिय, अति महिमावान, व्याध द्वारा पूछे गए सभी धर्मों का व्याख्यान किया।

श्लोक 95 (skanda.2.174.95)

वटः सद्यः पश्यतामेव भूमौ पपाताहो पञ्चशाखी द्रुमोऽयम् । वृक्षात्तस्मात्कोटरे संस्थितो हि व्यालः कश्चिद्दीर्घदेही करालः । हित्वा देहं पापयोनिं च सद्यः स वै तस्थौ प्रांजलिर्नम्रमूर्धा ॥

vaṭaḥ sadyaḥ paśyatāmeva bhūmau papātāho pañcaśākhī drumo'yam vṛkṣāttasmātkoṭare saṁsthito hi vyālaḥ kaściddīrghadehī karālaḥ hitvā dehaṁ pāpayoniṁ ca sadyaḥ sa vai tasthau prāñjalirnamramūrdhā

तभी, सबके देखते-देखते, वह पाँच शाखाओं वाला बरगद का वृक्ष एकाएक भूमि पर गिर पड़ा। उस वृक्ष के कोटर में रहने वाला, लंबे शरीर वाला एक भयंकर सर्प तुरंत ही उस पापयोनि-देह को त्यागकर, हाथ जोड़े, मस्तक झुकाए वहीं खड़ा हो गया।

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