वैष्णव खण्ड · अध्याय 175
वाल्मीकेर्जन्मकथनम् — वाल्मीकि के जन्म की कथा
श्लोक 1 (skanda.2.175.1)
श्रुतदेव उवाच । ततस्तु विस्मितो भूत्वा शङ्खो व्याधसमन्वितः । को भवानिति तं प्राह दशैषा च कुतस्तव ॥
śrutadeva uvāca tatastu vismito bhūtvā śaṅkho vyādhasamanvitaḥ ko bhavāniti taṁ prāha daśaiṣā ca kutastava
श्रुतदेव ने कहा — इसके बाद व्याध सहित विस्मित हुए शंख ने उस सर्प से पूछा — तुम कौन हो, और तुम्हारी यह दशा कहाँ से हुई?
श्लोक 2 (skanda.2.175.2)
केन वा कर्मणा सौम्य मतिस्तव शुभावहा । अकस्मात्ते कथं मुक्तिरेतदाचक्ष्व विस्तरात् ॥
kena vā karmaṇā saumya matistava śubhāvahā akasmātte kathaṁ muktiretadācakṣva vistarāt
हे सौम्य, किस कर्म से तुझे यह शुभदायी बुद्धि मिली? और अचानक तुझे यह मुक्ति कैसे प्राप्त हुई? यह सब विस्तार से बता।
श्लोक 3 (skanda.2.175.3)
शङ्खेनैव तदा पृष्टो दण्डवत्पतितो भुवि । प्रश्रयाऽवनतो भूत्वा प्रांजलिर्वाक्यमब्रवीत् ॥
śaṅkhenaiva tadā pṛṣṭo daṇḍavatpatito bhuvi praśrayā'vanato bhūtvā prāñjalirvākyamabravīt
शंख द्वारा ऐसा पूछे जाने पर वह दंडवत भूमि पर गिर पड़ा, और विनम्रतापूर्वक झुककर हाथ जोड़े यह वचन बोला —
श्लोक 4 (skanda.2.175.4)
अहं पुरा द्विजः कश्चित्प्रयागे बहुभाषणः । रूपयौवनसंपन्नो विद्यामदसुगर्वितः ॥
ahaṁ purā dvijaḥ kaścitprayāge bahubhāṣaṇaḥ rūpayauvanasaṁpanno vidyāmadasugarvitaḥ
मैं पूर्वजन्म में प्रयाग में रहने वाला, बहुत बोलने वाला एक ब्राह्मण था — रूप और यौवन से संपन्न, विद्या के मद से अत्यंत घमंडी।
श्लोक 5 (skanda.2.175.5)
धनाढ्यो बहुपुत्राढ्यः सदाऽहंकारदूषितः । कुसीदस्य मुनेः पुत्रो नाम्ना रोचन इत्यहम् ॥
dhanāḍhyo bahuputrāḍhyaḥ sadā'haṁkāradūṣitaḥ kusīdasya muneḥ putro nāmnā rocana ityaham
धनवान, अनेक पुत्रों वाला, सदा अहंकार से दूषित — मैं कुसीद मुनि का पुत्र था, नाम से रोचन।
श्लोक 6 (skanda.2.175.6)
आसनं शयनं निद्रा व्यवायोऽक्षपरिक्रियाः । लोकवार्ता कुसीदं वा व्यापारास्ते ममाऽभवन् ॥
āsanaṁ śayanaṁ nidrā vyavāyo'kṣaparikriyāḥ lokavārtā kusīdaṁ vā vyāpārāste mamā'bhavan
बैठना, सोना, निद्रा, विषयभोग, जुआ खेलना, गपशप या ब्याज पर धन लगाना — यही मेरे व्यापार थे।
श्लोक 7 (skanda.2.175.7)
तन्तुमात्राणि कर्माणि लोकनिन्दाविशंकितः । सदम्भश्च सदा कुर्वे न श्रद्धा मे कदाचन ॥
tantumātrāṇi karmāṇi lokanindāviśaṅkitaḥ sadambhaśca sadā kurve na śraddhā me kadācana
लोकनिंदा से डरकर मैं केवल दिखावटी कर्म ही तंतुमात्र करता था, वह भी सदा आडंबरपूर्वक — मुझमें कभी श्रद्धा नहीं थी।
श्लोक 8 (skanda.2.175.8)
दुर्बुद्धेर्मम दुष्टस्य कियत्कालो गतोऽभवत् । तदा वैशाखमासेऽस्मिञ्जयंतोनाम वै द्विजः ॥
durbuddhermama duṣṭasya kiyatkālo gato'bhavat tadā vaiśākhamāse'smiñjayantonāma vai dvijaḥ
इस प्रकार मुझ दुर्बुद्धि, दुष्ट का बहुत समय बीत गया। उसी समय इस वैशाख मास में जयंत नामक एक ब्राह्मण,
श्लोक 9 (skanda.2.175.9)
श्रावयामास तन्मासधर्मान्भागवतप्रियान् । तत्क्षेत्रे वासिनां पुण्यकर्मणां च द्विजन्मनाम् ॥
śrāvayāmāsa tanmāsadharmānbhāgavatapriyān tatkṣetre vāsināṁ puṇyakarmaṇāṁ ca dvijanmanām
उस तीर्थ में रहने वाले पुण्यकर्मी ब्राह्मणों को उस मास के भागवत-प्रिय धर्मों को सुनाने लगा।
श्लोक 10 (skanda.2.175.10)
नारीनराः क्षत्रियाश्च वैश्याः शूद्राः सहस्रशः । प्रातः स्नात्वा समभ्यर्च्य मधुसूदनमव्ययम् ॥
nārīnarāḥ kṣatriyāśca vaiśyāḥ śūdrāḥ sahasraśaḥ prātaḥ snātvā samabhyarcya madhusūdanamavyayam
स्त्री-पुरुष, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र, हजारों की संख्या में, प्रातःकाल स्नान करके अविनाशी मधुसूदन की पूजा करके,
श्लोक 11 (skanda.2.175.11)
कथां शृण्वंति सततं जयन्तेन समीरिताम् । शुचिभूत्वा मौनधरा वासुदेवकथारताः ॥
kathāṁ śṛṇvanti satataṁ jayantena samīritām śucibhūtvā maunadharā vāsudevakathāratāḥ
जयंत द्वारा कही जाने वाली कथा को सतत सुनते थे — पवित्र होकर, मौन धारण किए हुए, वासुदेव-कथा में रत रहते हुए।
श्लोक 12 (skanda.2.175.12)
वैशाखधर्मनिरता दंभालस्यविवर्जिताः । तां सभां च प्रविष्टोऽहं कौतुकाच्च दिदृक्षया ॥
vaiśākhadharmaniratā daṁbhālasyavivarjitāḥ tāṁ sabhāṁ ca praviṣṭo'haṁ kautukācca didṛkṣayā
वे वैशाख-धर्म में निरत, आडंबर और आलस्य से रहित थे। मैं भी उस सभा में कौतूहलवश, देखने की इच्छा से प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 13 (skanda.2.175.13)
सोष्णीषेण मया मूर्ध्ना नमस्कारोऽपि न कृतः । तांबूलं च मुखे कृत्वा कञ्चुकं च मया धृतम् ॥
soṣṇīṣeṇa mayā mūrdhnā namaskāro'pi na kṛtaḥ tāṁbūlaṁ ca mukhe kṛtvā kañcukaṁ ca mayā dhṛtam
मैंने पगड़ी पहने सिर से नमस्कार भी नहीं किया। मुँह में पान रखे हुए और अंगरखा पहने हुए मैं वहाँ बैठा रहा।
श्लोक 14 (skanda.2.175.14)
कथाविक्षेपमचरं लोकवार्ताभिरंजनात् । सर्वेषां चित्तचांचल्यमभूद्वै लोकवार्तया ॥
kathāvikṣepamacaraṁ lokavārtābhiraṁjanāt sarveṣāṁ cittacāñcalyamabhūdvai lokavārtayā
मैं लगातार लौकिक बातों से कथा को बाधित करता रहा, और मेरी लौकिक वार्ता से सबका चित्त चंचल हो उठा।
श्लोक 15 (skanda.2.175.15)
क्वचिद्वासः प्रसार्याहं क्वचिन्निंदन्क्वचिद्धसन् । एवं कालो मयानीतः कथा यावत्समाप्यते ॥
kvacidvāsaḥ prasāryāhaṁ kvacinnindankvaciddhasan evaṁ kālo mayānītaḥ kathā yāvatsamāpyate
कभी अपने वस्त्र फैलाकर, कभी निंदा करते हुए, कभी हँसते हुए — इस प्रकार जब तक कथा समाप्त नहीं हुई, मैंने समय व्यर्थ गँवाया।
श्लोक 16 (skanda.2.175.16)
पश्चात्तेनैव दोषेण सद्योऽल्पायुर्विनष्टधीः । सन्निपातेन पञ्चत्वं प्राप्तोऽहं च परे दिने ॥
paścāttenaiva doṣeṇa sadyo'lpāyurvinaṣṭadhīḥ sannipātena pañcatvaṁ prāpto'haṁ ca pare dine
फिर उसी दोष के कारण मेरी आयु घट गई, मेरी बुद्धि नष्ट हो गई, और अगले ही दिन सन्निपात रोग से मेरी मृत्यु हो गई।
श्लोक 17 (skanda.2.175.17)
तप्तसीसजलैः पूर्णं निरयं च हलाहलम् । प्राप्य भुक्त्वा यातनां च मन्वन्तानि चतुर्दश ॥
taptasīsajalaiḥ pūrṇaṁ nirayaṁ ca halāhalam prāpya bhuktvā yātanāṁ ca manvantāni caturdaśa
मैं पिघले हुए सीसे के जल से भरे हलाहल नामक नरक को प्राप्त हुआ, और वहाँ चौदह मन्वंतरों तक यातना भोगी,
श्लोक 18 (skanda.2.175.18)
युक्तेष्वथ च लक्षेषु तथा चतुरशीतिभिः । क्रमाद्योनिषु जातोऽहमिदानीं चावसन्द्रुमे ॥
yukteṣvatha ca lakṣeṣu tathā caturaśītibhiḥ kramādyoniṣu jāto'hamidānīṁ cāvasandrume
फिर चौरासी लाख योनियों में क्रमशः जन्म लिया, और अंत में इस वृक्ष में निवास करने वाला बना।
श्लोक 19 (skanda.2.175.19)
दशयोजनविस्तीर्णे शतयोजनमुन्नते । व्यालोऽहं तामसः क्रूरः सप्तयोजनकोटरे ॥
daśayojanavistīrṇe śatayojanamunnate vyālo'haṁ tāmasaḥ krūraḥ saptayojanakoṭare
दस योजन विस्तृत, सौ योजन ऊँचे उस वृक्ष के सात योजन गहरे कोटर में, मैं एक तामसिक, क्रूर सर्प बनकर,
श्लोक 20 (skanda.2.175.20)
भूत्वा वसामि विप्रर्षे कर्मणा बाधितः पुरा । अयुतं च समा याता निराहारस्य कोटरे ॥
bhūtvā vasāmi viprarṣe karmaṇā bādhitaḥ purā ayutaṁ ca samā yātā nirāhārasya koṭare
हे विप्रर्षे, अपने ही पूर्वकर्म से पीड़ित होकर वास कर रहा हूँ। बिना किसी आहार के उस कोटर में दस हजार वर्ष बीत चुके हैं।
श्लोक 21 (skanda.2.175.21)
दैवात्तव मुखांभोजसमीरितकथामृतम् । श्रुत्वा चक्षुर्द्वयेनाहं सद्यो ध्वस्ताशुभो मुने ॥
daivāttava mukhāmbhojasamīritakathāmṛtam śrutvā cakṣurdvayenāhaṁ sadyo dhvastāśubho mune
हे मुने, दैव से आपके मुखकमल से बहती हुई कथामृत को अपने दोनों कानों से सुनकर, मैं तुरंत ही सारे अशुभ से मुक्त हो गया।
श्लोक 22 (skanda.2.175.22)
व्यालयोनिं विसृज्याऽहं दिव्यरूपधरः पुमान् । प्रांजलिः प्रणतो भूत्वा पादौ ते शरणं गतः ॥
vyālayoniṁ visṛjyā'haṁ divyarūpadharaḥ pumān prāñjaliḥ praṇato bhūtvā pādau te śaraṇaṁ gataḥ
अपनी सर्प-योनि त्यागकर, दिव्य रूप धारण किए हुए, मैं हाथ जोड़े, नतमस्तक होकर आपके चरणों की शरण में आया हूँ।
श्लोक 23 (skanda.2.175.23)
कस्मिञ्जन्मनि त्वं बधुर्न जाने मुनिसत्तम । न मयोपकृतं क्वाऽपि सानुकम्पः कुतः सताम् ॥
kasmiñjanmani tvaṁ bandhurna jāne munisattama na mayopakṛtaṁ kvā'pi sānukampaḥ kutaḥ satām
हे मुनिश्रेष्ठ, मुझे नहीं पता कि किस जन्म में आप मेरे संबंधी रहे हैं। मैंने आपका कोई उपकार नहीं किया, फिर भी आप सज्जनों में यह अनुकंपा कहाँ से आती है?
श्लोक 24 (skanda.2.175.24)
साधूनां समचित्तानां सदा भूतदयावताम् । परोपकारप्रकृतिर्न चैषामन्यथा मतिः ॥
sādhūnāṁ samacittānāṁ sadā bhūtadayāvatām paropakāraprakṛtirna caiṣāmanyathā matiḥ
साधुजन सदा समचित्त और सब प्राणियों पर दयालु होते हैं; परोपकार ही उनकी प्रकृति है, उनकी बुद्धि इससे भिन्न कभी नहीं होती।
श्लोक 25 (skanda.2.175.25)
मामद्यानुगृहाण त्वं यथा धर्मे मतिर्भवेत् । न भूयाद्विस्मृतिः क्वाऽपि विष्णोर्देवस्य चक्रिणः ॥
māmadyānugṛhāṇa tvaṁ yathā dharme matirbhavet na bhūyādvismṛtiḥ kvā'pi viṣṇordevasya cakriṇaḥ
आज आप मुझ पर ऐसी कृपा करें कि मेरी बुद्धि धर्म में लगे, और चक्रधारी विष्णु देव की स्मृति कभी विस्मृत न हो।
श्लोक 26 (skanda.2.175.26)
महतां साधुवृत्तानां संगतिश्च सदा भवेत् । दारिद्यमेकमेव स्यान्मदांधपरमांजनम् ॥
mahatāṁ sādhuvṛttānāṁ saṁgatiśca sadā bhavet dāridryamekameva syānmadāndhaparamāñjanam
महात्माओं और साधु-आचरण वालों की संगति सदा प्राप्त हो। दरिद्रता ही एकमात्र वह उत्तम अंजन है जो मद-अंधता को दूर करती है।
श्लोक 27 (skanda.2.175.27)
इति तं बहुधा स्तुत्वा प्रणम्य च पुनः पुनः । प्रांजलिः प्रणतस्तस्थौ तूष्णीमेव तदग्रतः ॥
iti taṁ bahudhā stutvā praṇamya ca punaḥ punaḥ prāñjaliḥ praṇatastasthau tūṣṇīmeva tadagrataḥ
इस प्रकार उसकी बहुत प्रकार से स्तुति करके और बार-बार प्रणाम करके, वह हाथ जोड़े, नतमस्तक होकर मौन ही उसके सामने खड़ा रहा।
श्लोक 28 (skanda.2.175.28)
शंखो दोर्भ्यां समुत्थाप्य पूर्णप्रेमपरिप्लुतः । पस्पर्श पाणिना चांगं शंतमेन गताध्वसः ॥
śaṅkho dorbhyāṁ samutthāpya pūrṇapremapariplutaḥ pasparśa pāṇinā cāṅgaṁ śaṁtamena gatādhvasaḥ
शंख ने पूर्ण प्रेम से आप्लावित होकर उसे अपनी दोनों भुजाओं से उठाया, और भय-रहित होकर अपने शांतिदायक हाथ से उसके शरीर का स्पर्श किया।
श्लोक 29 (skanda.2.175.29)
चक्रे सोऽनुग्रहं तस्मिन्दिव्यरूपधरे द्विजे । प्राह तं कृपयाऽऽविष्टो भाविवृत्तान्तमञ्जसा ॥
cakre so'nugrahaṁ tasmindivyarūpadhare dvije prāha taṁ kṛpayā'viṣṭo bhāvivṛttāntamañjasā
उस दिव्यरूपधारी ब्राह्मण पर उन्होंने अनुग्रह किया, और कृपा से आविष्ट होकर उसे उसका भावी वृत्तांत सत्य रूप से बताया —
श्लोक 30 (skanda.2.175.30)
द्विज त्वं मासमाहात्म्यश्रवणाच्च हरेरपि । माहात्म्यश्रवणात्सद्यो विध्वस्ताऽखिलबंधनः ॥
dvija tvaṁ māsamāhātmyaśravaṇācca harerapi māhātmyaśravaṇātsadyo vidhvastā'khilabandhanaḥ
हे द्विज, मास-माहात्म्य को सुनने से, और हरि के माहात्म्य को सुनने से भी, तेरे समस्त बंधन तत्क्षण नष्ट हो गए हैं।
श्लोक 31 (skanda.2.175.31)
अतिहाय कलंकं च क्रमाद्गत्वा पुनर्भुवि । दशार्णे विषमे पुण्ये भविता त्वं द्विजोत्तमः ॥
atihāya kalaṅkaṁ ca kramādgatvā punarbhuvi daśārṇe viṣame puṇye bhavitā tvaṁ dvijottamaḥ
अपने कलंक को पार करके, फिर से भूमि पर लौटकर, विषम और पुण्यमय दशार्ण देश में तू एक श्रेष्ठ ब्राह्मण होगा,
श्लोक 32 (skanda.2.175.32)
वेदशर्मेति विख्यातः सर्ववेदविशारदः । तत्र ते भविता जातिस्मृतिरात्यंतिकी शुभा ॥
vedaśarmeti vikhyātaḥ sarvavedaviśāradaḥ tatra te bhavitā jātismṛtirātyantikī śubhā
वेदशर्मा नाम से विख्यात, सभी वेदों में निपुण। वहाँ तुझे पूर्वजन्म की परम शुभ स्मृति भी प्राप्त होगी।
श्लोक 33 (skanda.2.175.33)
तथा स्मृतानुबन्धस्त्वं त्यक्तसर्वेषणः शुभः । करोषि सकलान्धर्मान्वैशाखोक्तान्हरिप्रियान् ॥
tathā smṛtānubandhastvaṁ tyaktasarveṣaṇaḥ śubhaḥ karoṣi sakalāndharmānvaiśākhoktānharipriyān
उस स्मृति से युक्त होकर, समस्त कामनाओं का त्याग किए हुए, तू शुभ होकर वैशाख में कहे गए, हरि को प्रिय, सभी धर्मों का पालन करेगा।
श्लोक 34 (skanda.2.175.34)
निर्द्वन्द्वो निःस्पृहोऽसंगो गुरुभक्तो जितेन्द्रियः । सदा विष्णुकथालापो भविता तत्र जन्मनि ॥
nirdvandvo niḥspṛho'saṅgo gurubhakto jitendriyaḥ sadā viṣṇukathālāpo bhavitā tatra janmani
द्वंद्वरहित, इच्छारहित, असंग, गुरुभक्त, जितेंद्रिय — तेरा उस जन्म में सदा विष्णु-कथा में ही वार्तालाप होगा।
श्लोक 35 (skanda.2.175.35)
ततः सिद्धिं समाप्याथ विध्वस्ताऽखिलबन्धनः । प्राप्नोषि परमं धाम योगैरपि दुरासदम् ॥
tataḥ siddhiṁ samāpyātha vidhvastā'khilabandhanaḥ prāpnoṣi paramaṁ dhāma yogairapi durāsadam
फिर सिद्धि को प्राप्त कर, समस्त बंधनों से मुक्त होकर, तू उस परमधाम को पाएगा जो योगों से भी दुर्लभ है।
श्लोक 36 (skanda.2.175.36)
मा भैषीः पुत्र भद्रं ते भविता मत्प्रसादतः । हास्याद्भयात्तथा क्रोधाद्द्वेषात्कामादथाऽपि वा ॥
mā bhaiṣīḥ putra bhadraṁ te bhavitā matprasādataḥ hāsyādbhayāttathā krodhāddveṣātkāmādathā'pi vā
हे पुत्र, भयभीत मत हो, मेरी कृपा से तेरा कल्याण होगा। चाहे हास्य से, भय से, क्रोध से, द्वेष से, अथवा कामना से भी,
श्लोक 37 (skanda.2.175.37)
स्नेहाद्वा सकृदुच्चार्य विष्णोर्नामाऽघहारि च । पापिष्ठा अपि गच्छन्ति विष्णोर्धाम निरामयम् ॥
snehādvā sakṛduccārya viṣṇornāmā'ghahāri ca pāpiṣṭhā api gacchanti viṣṇordhāma nirāmayam
या स्नेहवश ही, यदि कोई एक बार भी विष्णु का पापहारी नाम उच्चारण कर ले, तो घोर पापी भी विष्णु के निरामय धाम को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 38 (skanda.2.175.38)
किमु तच्छ्रद्धया युक्ता जितक्रोधा जितेन्द्रियाः । दयावन्तः कथां श्रुत्वा गच्छंतीति द्विजोत्तम ॥
kimu tacchraddhayā yuktā jitakrodhā jitendriyāḥ dayāvantaḥ kathāṁ śrutvā gacchantīti dvijottama
तो फिर हे द्विजोत्तम, जो श्रद्धायुक्त, क्रोधविजयी, जितेंद्रिय और दयावान हैं, वे कथा सुनकर क्यों न वहाँ पहुँचेंगे?
श्लोक 39 (skanda.2.175.39)
केचित्केवलया भक्त्या कथालापैकतत्पराः । सर्वधर्म्मोज्झिता वाऽपि यांति विष्णोः परं पदम् ॥
kecitkevalayā bhaktyā kathālāpaikatatparāḥ sarvadharmmojjhitā vā'pi yānti viṣṇoḥ paraṁ padam
कुछ लोग केवल भक्ति से ही, केवल कथा-श्रवण में तत्पर होकर, चाहे वे सभी धर्मों से रहित ही क्यों न हों, विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 40 (skanda.2.175.40)
द्वेषादिना च भक्त्या वा केचिद्विष्णुमुपासते । तेऽपि यांति परं धाम पूतनेवासुहारिणी ॥
dveṣādinā ca bhaktyā vā kecidviṣṇumupāsate te'pi yānti paraṁ dhāma pūtanevāsuhāriṇī
कुछ लोग द्वेष से भी और कुछ भक्ति से विष्णु की उपासना करते हैं — वे भी उस परमधाम को प्राप्त होते हैं, जैसे प्राणहारिणी पूतना भी उसे प्राप्त हुई।
श्लोक 41 (skanda.2.175.41)
महद्भिः संगतो नित्यं वाग्विसर्गस्तदाश्रयः । मुमुक्षूणां च कर्तव्यः स विधिः श्रुतिचोदितः ॥
mahadbhiḥ saṅgato nityaṁ vāgvisargastadāśrayaḥ mumukṣūṇāṁ ca kartavyaḥ sa vidhiḥ śruticoditaḥ
महापुरुषों की सतत संगति में उत्पन्न वाणी का उच्चारण, जो उन्हीं के आश्रित है — यही वह विधि है जो श्रुति द्वारा मुमुक्षुओं के लिए कर्तव्य कही गई है।
श्लोक 42 (skanda.2.175.42)
स वाग्विसर्गो जनताऽघविप्लवो यस्मिन्प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि । नामान्यनंतस्य यशोंकितानि यच्छृण्वन्ति गायन्ति गृणंति साधवः ॥
sa vāgvisargo janatā'ghaviplavo yasminpratiślokamabaddhavatyapi nāmānyanantasya yaśoṅkitāni yacchṛṇvanti gāyanti gṛṇanti sādhavaḥ
वह वाणी का उच्चारण ही मानवजाति के पाप का उन्मूलन करने वाला है, जिसमें भले ही प्रत्येक श्लोक अनगढ़ भी क्यों न हो, अनंत के नामों से अंकित यश को साधुजन सुनते, गाते और उच्चारते हैं।
श्लोक 43 (skanda.2.175.43)
यः कष्टसेवां न च कांक्षते विभुर्न वासनं भूरि न रूपयौवने । स्मृतः सकृद्गच्छति धाम भास्वरं कं वा दयालुं शरणं व्रजेत ॥
yaḥ kaṣṭasevāṁ na ca kāṅkṣate vibhurna vāsanaṁ bhūri na rūpayauvane smṛtaḥ sakṛdgacchati dhāma bhāsvaraṁ kaṁ vā dayāluṁ śaraṇaṁ vrajeta
जो सर्वव्यापी प्रभु कठिन सेवा नहीं चाहते, न प्रचुर भोग, न रूप-यौवन चाहते हैं — केवल एक बार स्मरण किए जाने पर ही वे भास्वर धाम प्रदान कर देते हैं। ऐसे दयालु के अतिरिक्त और किसकी शरण में जाया जाए?
श्लोक 44 (skanda.2.175.44)
तमेव शरणं याहि नारायणमनामयम् । भक्तवत्सलमव्यक्तं चेतोगम्यं दयानिधिम् ॥
tameva śaraṇaṁ yāhi nārāyaṇamanāmayam bhaktavatsalamavyaktaṁ cetogamyaṁ dayānidhim
उसी निर्दोष नारायण की शरण में जा, जो भक्तवत्सल, अव्यक्त, चित्त से ही प्राप्य और दया के सागर हैं।
श्लोक 45 (skanda.2.175.45)
कुरु सर्वानिमान्धमान्वैशाखोक्तान्महामते । तेन तुष्टो जगन्नाथः शर्म ते च विधास्यति ॥
kuru sarvānimāndhamānvaiśākhoktānmahāmate tena tuṣṭo jagannāthaḥ śarma te ca vidhāsyati
हे महामते, वैशाख में कहे गए इन सभी धर्मों का पालन कर। उससे प्रसन्न होकर जगन्नाथ तेरा कल्याण करेंगे।
श्लोक 46 (skanda.2.175.46)
इत्युक्त्वा विररामाथ व्याधं दृष्ट्वा सुविस्मितः । स दिव्यः पुरुषः प्राह पुनस्तं मुनिपुंगवम् ॥
ityuktvā virarāmātha vyādhaṁ dṛṣṭvā suvismitaḥ sa divyaḥ puruṣaḥ prāha punastaṁ munipuṅgavam
ऐसा कहकर वे मौन हो गए। तब व्याध को देखकर अत्यंत विस्मित हुए उस दिव्य पुरुष ने उस श्रेष्ठ मुनि से पुनः कहा —
श्लोक 47 (skanda.2.175.47)
दिव्यपुरुष उवाच । धन्योस्म्यनुगृहीतोऽस्मि त्वया शंख दयालुना । दिष्ट्या गता मे दुर्योनिर्यामि चैव परां गतिम् ॥
divyapuruṣa uvāca dhanyosmyanugṛhīto'smi tvayā śaṅkha dayālunā diṣṭyā gatā me duryonir yāmi caiva parāṁ gatim
दिव्य पुरुष ने कहा — हे शंख, मैं धन्य हूँ, दयालु आपके द्वारा अनुगृहीत हुआ हूँ। सौभाग्य से मेरी दुर्योनि नष्ट हो गई है, और अब मैं परम गति को जा रहा हूँ।
श्लोक 48 (skanda.2.175.48)
इति तं च परिक्रम्य ह्यनुज्ञातो दिवं ययौ । ततः सायमभूद्राजञ्च्छंखो व्याधेन तोषितः ॥
iti taṁ ca parikramya hyanujñāto divaṁ yayau tataḥ sāyamabhūdrājañcchaṅkho vyādhena toṣitaḥ
ऐसा कहकर, उसकी परिक्रमा करके, अनुमति लेकर वह स्वर्गलोक को चला गया। हे राजन्, फिर संध्या हो गई, और शंख व्याध से संतुष्ट हुए।
श्लोक 49 (skanda.2.175.49)
संध्यां सायन्तनीं कृत्वा रात्रिशेषं निनाय च । नानाख्यानेश्च भूपानां देवानां च महात्मनाम् ॥
saṁdhyāṁ sāyantanīṁ kṛtvā rātriśeṣaṁ nināya ca nānākhyāneśca bhūpānāṁ devānāṁ ca mahātmanām
संध्या की सायंकालीन क्रिया करके, राजाओं, देवों और महात्माओं की अनेक कथाओं से रात्रि का शेष भाग बिताया,
श्लोक 50 (skanda.2.175.50)
लीलाभिरवताराणां दृष्टगोष्ठिभिरेव च । ब्राह्मे मुहूर्ते चोत्थाय पादौ प्रक्षाल्य वाग्यतः ॥
līlābhiravatārāṇāṁ dṛṣṭagoṣṭhibhireva ca brāhme muhūrte cotthāya pādau prakṣālya vāgyataḥ
अवतारों की लीलाओं तथा प्रत्यक्ष अनुभवों की चर्चाओं से भी। फिर ब्रह्ममुहूर्त में उठकर, पैर धोकर, मौन धारण करके,
श्लोक 51 (skanda.2.175.51)
ध्यायंश्च तारकं ब्रह्म कृत्वा शौचादिसत्क्रियाम् । वैशाखे मेषगे सूर्ये स्नात्वा प्राक्च भगोदयात् ॥
dhyāyaṁśca tārakaṁ brahma kṛtvā śaucādisatkriyām vaiśākhe meṣage sūrye snātvā prākca bhagodayāt
तारक ब्रह्म का ध्यान करते हुए, शौच आदि पवित्र क्रियाएँ कीं, और वैशाख मास में, जब सूर्य मेष राशि में हो, सूर्योदय से पहले स्नान किया।
श्लोक 52 (skanda.2.175.52)
कृत्वा संध्यादिकं कर्म तथा संतर्प्य चाऽखिलान् । व्याधमाहूय हृष्टात्मा मूर्ध्नि प्रोक्ष्य निरीक्ष्य च ॥
kṛtvā saṁdhyādikaṁ karma tathā saṁtarpya cā'khilān vyādhamāhūya hṛṣṭātmā mūrdhni prokṣya nirīkṣya ca
संध्या आदि कर्म करके, तथा सबका तर्पण करके, प्रसन्न मन से व्याध को बुलाकर, उसके सिर पर जल छिड़ककर और उसे देखकर,
श्लोक 53 (skanda.2.175.53)
रामेति द्व्यक्षरं नाम ददौ वेदाधिकं शुभम् । विष्णोरेकैकनामाऽपि सर्ववेदाधिकं मतम् ॥
rāmeti dvyakṣaraṁ nāma dadau vedādhikaṁ śubham viṣṇorekaikanāmā'pi sarvavedādhikaṁ matam
'राम' नामक दो अक्षरों वाला, वेद से भी अधिक शुभ नाम प्रदान किया। विष्णु का एक-एक नाम भी संपूर्ण वेदों से अधिक श्रेष्ठ माना गया है।
श्लोक 54 (skanda.2.175.54)
तेभ्यश्चाऽनंतनामभ्योऽधिकं नाम्नां सहस्रकम् । तादृङ्नामसहस्रेण रामनाम समं मतम् ॥
tebhyaścā'nantanāmabhyo'dhikaṁ nāmnāṁ sahasrakam tādṛṅnāmasahasreṇa rāmanāma samaṁ matam
और उन अनंत नामों से भी बढ़कर उसका सहस्र नाम है। और उस सहस्र-नाम के समान ही राम नाम माना गया है।
श्लोक 55 (skanda.2.175.55)
तस्माद्रामेति तन्नाम जप व्याध निरंतरम् । धर्मानेतान्कुरु व्याध यावदामरणांतिकम् ॥
tasmādrāmeti tannāma japa vyādha nirantaram dharmānetānkuru vyādha yāvadāmaraṇāntikam
अतः हे व्याध, 'राम' नाम का निरंतर जप कर। हे व्याध, मृत्युपर्यंत इन धर्मों का पालन करता रह।
श्लोक 56 (skanda.2.175.56)
ततस्ते भविता जन्म वल्मीकस्य ऋषेः कुले । वाल्मीकिरिति नाम्ना च भूमौ ख्यातिमवाप्स्यसि ॥
tataste bhavitā janma valmīkasya ṛṣeḥ kule vālmīkiriti nāmnā ca bhūmau khyātimavāpsyasi
तब तेरा जन्म वल्मीक नामक ऋषि के कुल में होगा, और तू वाल्मीकि नाम से भूमि पर ख्याति प्राप्त करेगा।
श्लोक 57 (skanda.2.175.57)
इति व्याधं समादिश्य प्रतस्थे दक्षिणां दिशम् । व्याधोऽपि तं परिक्रम्य प्रणम्य च पुनःपुनः ॥
iti vyādhaṁ samādiśya pratasthe dakṣiṇāṁ diśam vyādho'pi taṁ parikramya praṇamya ca punaḥpunaḥ
इस प्रकार व्याध को उपदेश देकर वे दक्षिण दिशा को चल दिए। व्याध ने भी उनकी परिक्रमा करके और बार-बार प्रणाम करके,
श्लोक 58 (skanda.2.175.58)
किंचिद्दूरानुगो भूत्वा स रुदन्विरहातुरः । यावद्दृष्टिपथं तावत्पश्यंस्तस्य गतिं पुनः ॥
kiñciddūrānugo bhūtvā sa rudanvirahāturaḥ yāvaddṛṣṭipathaṁ tāvatpaśyaṁstasya gatiṁ punaḥ
कुछ दूर तक उसके पीछे-पीछे चला, वियोग से व्याकुल होकर रोता रहा। जब तक वह दृष्टि-पथ में रहा, तब तक उसकी गति को देखता रहा।
श्लोक 59 (skanda.2.175.59)
पुनर्निववृते कृच्छ्रात्तमेव हृदि चिंतयन् । वनं निर्माय तन्मार्गे प्रपां कृत्वा सुनिर्मलाम् ॥
punarnivavṛte kṛcchrāttameva hṛdi cintayan vanaṁ nirmāya tanmārge prapāṁ kṛtvā sunirmalām
फिर बड़ी कठिनाई से लौटा, हृदय में उसी का चिंतन करते हुए। उसने उस मार्ग में एक वन बनवाया, तथा एक अत्यंत निर्मल जलशाला भी स्थापित की,
श्लोक 60 (skanda.2.175.60)
अतियोग्यानिमान्धर्मान्वैशाखोक्तांश्चकार ह । वन्यैः कपित्थपनसैर्जंबूचूतादिभिः फलैः ॥
atiyogyānimāndharmānvaiśākhoktāṁścakāra ha vanyaiḥ kapitthapanasairjambūcūtādibhiḥ phalaiḥ
और वैशाख में कहे गए इन अत्यंत योग्य धर्मों का पालन किया। जंगली कैथ, कटहल, जामुन, आम आदि फलों से,
श्लोक 61 (skanda.2.175.61)
मार्गानां श्रमार्तानामाहारं परिकल्पयन् । उपानद्भिश्चंदनैश्च छत्रैश्च व्यजनैरपि ॥
mārgāṇāṁ śramārtānāmāhāraṁ parikalpayan upānadbhiścandanaiśca chatraiśca vyajanairapi
उसने थके हुए राहगीरों के लिए भोजन की व्यवस्था की, तथा जूतों, चंदन, छाते और पंखों से भी,
श्लोक 62 (skanda.2.175.62)
वालुकास्तरणोपेतच्छायाभिश्च क्वचित्क्वचित् । आजहाराथ पांथानां श्रमं स्वेदोद्भवं तथा ॥
vālukāstaraṇopetacchāyābhiśca kvacitkvacit ājahārātha pānthānāṁ śramaṁ svedodbhavaṁ tathā
और यहाँ-वहाँ बालू बिछी हुई छायादार स्थानों से, राहगीरों की थकान और पसीने से उत्पन्न कष्ट को दूर किया।
श्लोक 63 (skanda.2.175.63)
प्रातः स्नात्वा दिवारात्रं जपन्रामेति वै मनुम् । व्याधजन्मनि नामाऽसौ वल्मीकस्य सुतोऽभवत् ॥
prātaḥ snātvā divārātraṁ japanrāmeti vai manum vyādhajanmani nāmā'sau valmīkasya suto'bhavat
प्रातः स्नान करके दिन-रात 'राम' मंत्र का जप करते हुए, वह व्याध-जन्म के बाद, उस नाम से वल्मीक ऋषि का पुत्र बना।
श्लोक 64 (skanda.2.175.64)
कृणुर्नाम मुनिः कश्चित्तस्मिन्नेव सरोवरे । तपो वै दुस्तरं तेपे बाह्यव्यापारवर्जितः ॥
kṛṇurnāma muniḥ kaścittasminneva sarovare tapo vai dustaraṁ tepe bāhyavyāpāravarjitaḥ
उसी सरोवर में कृणु नामक कोई मुनि, बाह्य व्यवहारों से रहित होकर, दुस्तर तपस्या करता रहा।
श्लोक 65 (skanda.2.175.65)
वल्मीकमभवद्देहे तस्य कालेन भूयसा । वल्मीक इति तं प्राहुरतो वै मुनिपुंगवम् ॥
valmīkamabhavaddehe tasya kālena bhūyasā valmīka iti taṁ prāhurato vai munipuṅgavam
दीर्घकाल बीतने पर उसके शरीर पर एक बाँबी बन गई। इसीलिए उस श्रेष्ठ मुनि को 'वल्मीक' कहा जाने लगा।
श्लोक 66 (skanda.2.175.66)
पश्चात्तपोविरामांते कृणौ स्मृतिपथं गते । स्त्रियोऽनुस्मरतो राजन्स्खलितं चेंद्रियं मुनेः ॥
paścāttapovirāmānte kṛṇau smṛtipathaṁ gate striyo'nusmarato rājansakhalitaṁ cendriyaṁ muneḥ
बाद में, जब तपस्या समाप्त होने पर कृणु का ध्यान भंग हुआ और उसके मन में स्त्री का स्मरण आया, हे राजन्, तब उस मुनि की इंद्रिय स्खलित हो गई।
श्लोक 67 (skanda.2.175.67)
जग्राह शैलुषी काचित्तस्यां जज्ञे वनेचरः । वाल्मीकिरिति विख्यातो भुवनेषु महायशाः ॥
jagrāha śailuṣī kācittasyāṁ jajñe vanecaraḥ vālmīkiriti vikhyāto bhuvaneṣu mahāyaśāḥ
किसी वनवासी स्त्री ने उसे ग्रहण किया, और उसमें एक वनचारी शिशु उत्पन्न हुआ, जो 'वाल्मीकि' नाम से लोकों में महायशस्वी होकर विख्यात हुआ,
श्लोक 68 (skanda.2.175.68)
यो वै रामकथां दिव्यां स्वैः प्रबंधैर्मनोहरैः । लोके प्रख्यापयामास कर्मबन्धनिकृंतनीम् ॥
yo vai rāmakathāṁ divyāṁ svaiḥ prabandhairmanoharaiḥ loke prakhyāpayāmāsa karmabandhanikṛntanīm
जिसने अपनी मनोहर काव्य-रचनाओं द्वारा राम की दिव्य, कर्मबंधन को काटने वाली कथा को लोक में प्रसिद्ध किया।
श्लोक 69 (skanda.2.175.69)
श्रुतदेव उवाच । पश्य वैशाखमाहात्म्यं भूपालाद्याऽपि भूतिदम् । व्याधोप्युपानहौ दत्त्वा ऋषित्वं प्राप दुर्लभम् ॥
śrutadeva uvāca paśya vaiśākhamāhātmyaṁ bhūpālādyā'pi bhūtidam vyādhopyupānahau dattvā ṛṣitvaṁ prāpa durlabham
श्रुतदेव ने कहा — हे राजन्, वैशाख के माहात्म्य को देखो, जो राजाओं आदि को भी ऐश्वर्य देता है। एक जूता दान करके भी व्याध ने दुर्लभ ऋषित्व प्राप्त कर लिया।
श्लोक 70 (skanda.2.175.70)
य इदं परमाख्यानं पापघ्नं रोमहर्षणम् । शृणुयाच्छ्रावयेद्वाऽपि न भूयः स्तनपो भवेत् ॥
ya idaṁ paramākhyānaṁ pāpaghnaṁ romaharṣaṇam śṛṇuyācchrāvayedvā'pi na bhūyaḥ stanapo bhavet
जो इस परम, पापनाशक, रोमांचकारी आख्यान को सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वह फिर कभी शिशु के रूप में स्तनपान नहीं करता (अर्थात् जन्म-मृत्यु के चक्र में नहीं पड़ता)।