वैष्णव खण्ड · अध्याय 176
कलिधर्मनिरूपणे पितृमुक्तिः — कलियुग के धर्म का निरूपण और पितरों की मुक्ति
श्लोक 1 (skanda.2.176.1)
मैथिलेय उवाच । का ह्यस्मिंस्तिथयः पुण्या मासे वैशाखसंज्ञके । कानि दानानि शस्तानि तासु तासु विशेषतः ॥
maithileya uvāca kā hyasmiṁstithayaḥ puṇyā māse vaiśākhasaṁjñake kāni dānāni śastāni tāsu tāsu viśeṣataḥ
मैथिलेय ने कहा — इस वैशाख नामक मास में कौन-सी तिथियाँ पुण्यमय हैं? और उन-उन तिथियों में विशेष रूप से कौन-से दान प्रशस्त कहे गए हैं?
श्लोक 2 (skanda.2.176.2)
काः प्रख्याताश्च वै लोक एतदाचक्ष्व विस्तरात् ॥
kāḥ prakhyātāśca vai loka etadācakṣva vistarāt
तथा कौन-सी तिथियाँ लोक में प्रख्यात हैं — यह सब मुझे विस्तार से बताइए।
श्लोक 3 (skanda.2.176.3)
श्रुतदेव उवाच । त्रिंशच्च तिथयः पुण्या वैशाखे मेषगे रवौ ॥
śrutadeva uvāca triṁśacca tithayaḥ puṇyā vaiśākhe meṣage ravau
श्रुतदेव ने कहा — वैशाख मास में, जब सूर्य मेष राशि में हो, सभी तीस तिथियाँ पुण्यमय हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.176.4)
एकादश्यां कृतं पुण्यं कोटिकोटिगुणं भवेत् । सर्वदानेषु यत्पुण्यं सर्वतीर्थेषु यत्फलम् ॥
ekādaśyāṁ kṛtaṁ puṇyaṁ koṭikoṭiguṇaṁ bhavet sarvadāneṣu yatpuṇyaṁ sarvatīrtheṣu yatphalam
एकादशी को किया गया पुण्य करोड़ों गुना हो जाता है। सभी दानों में जो पुण्य है, सभी तीर्थों में जो फल है,
श्लोक 5 (skanda.2.176.5)
समवाप्नोति वैशाख एकादश्यां जलाप्लुतः । स्नानं दानं तपो होमो देवतार्चनसत्क्रियाः ॥
samavāpnoti vaiśākha ekādaśyāṁ jalāplutaḥ snānaṁ dānaṁ tapo homo devatārcanasatkriyāḥ
वह सब एक व्यक्ति वैशाख की एकादशी को जल में स्नान करके प्राप्त कर लेता है। स्नान, दान, तप, होम, देवता-पूजा और सत्कर्म —
श्लोक 6 (skanda.2.176.6)
कथायाः श्रवणं चैव सद्यो मुक्तिविधायकम् । रोगाद्युपहतो यस्तु दारिद्र्येणाऽपि पीडितः ॥
kathāyāḥ śravaṇaṁ caiva sadyo muktividhāyakam rogādyupahato yastu dāridryeṇā'pi pīḍitaḥ
तथा कथा का श्रवण — यह सब तत्काल मुक्ति प्रदान करने वाला है। जो रोग आदि से पीड़ित है अथवा दरिद्रता से भी दुःखी है,
श्लोक 7 (skanda.2.176.7)
श्रुत्वा कथामिमां पुण्यां कृतकृत्यो भवेन्नरः । अस्नात्वा चाप्यदत्त्वा च येन नीता इमाः शुभाः ॥
śrutvā kathāmimāṁ puṇyāṁ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ asnātvā cāpyadattvā ca yena nītā imāḥ śubhāḥ
इस पुण्यमय कथा को सुनकर कृतकृत्य हो जाता है। जो व्यक्ति इन शुभ तिथियों को बिना स्नान किए और बिना दान दिए यों ही बिता देता है,
श्लोक 8 (skanda.2.176.8)
स गोघ्नश्च कृतघ्नश्च पितृघ्नश्च महान्स्मृतः । जलाशयाश्च स्वाधीनाः स्वाधीनं च कलेवरम् ॥
sa goghnaśca kṛtaghnaśca pitṛghnaśca mahānsmṛtaḥ jalāśayāśca svādhīnāḥ svādhīnaṁ ca kalevaram
वह गोहत्यारा, कृतघ्न और पितृहत्यारे के समान महापापी माना गया है — जबकि जलाशय भी उसके अधीन हों और शरीर भी उसके वश में हो।
श्लोक 9 (skanda.2.176.9)
माधवो मनसा सेव्यः कालश्च सुगुणोत्तमः । साधवश्च दयावंतः को न सेवेत माधवम् ॥
mādhavo manasā sevyaḥ kālaśca suguṇottamaḥ sādhavaśca dayāvantaḥ ko na seveta mādhavam
माधव मन से सेवा करने योग्य हैं, यह काल भी सद्गुणों में उत्तम है, और साधुजन दयावान होते हैं — फिर कौन ऐसा है जो माधव की सेवा न करे?
श्लोक 10 (skanda.2.176.10)
दरिद्रैश्च धनाढ्यैश्च पंगुभिश्चांधकैस्तथा । षंढैश्च विधवाभिश्च नारीभिश्च नरैस्तथा ॥
daridraiśca dhanāḍhyaiśca paṅgubhiścāndhakaistathā ṣaṇḍhaiśca vidhavābhiśca nārībhiśca naraistathā
निर्धनों और धनवानों द्वारा, लंगड़ों और अंधों द्वारा, नपुंसकों और विधवाओं द्वारा, स्त्रियों और पुरुषों द्वारा भी,
श्लोक 11 (skanda.2.176.11)
कुमारयुववृद्धैश्च रोगार्तैरपि भूमिप । अतीवसुखसाध्यो हि धर्मो वैशाखगोचरः ॥
kumārayuvavṛddhaiśca rogārtairapi bhūmipa atīvasukhasādhyo hi dharmo vaiśākhagocaraḥ
हे राजन्, बालकों, युवाओं, वृद्धों और रोगियों द्वारा भी — वैशाख से संबंधित धर्म अत्यंत सुखपूर्वक साधा जा सकता है।
श्लोक 12 (skanda.2.176.12)
मासमेनमनुप्राप्य धर्मान्कुरु इमाञ्च्छुभान् । को न यत्नं च कुरुते तस्मात्को न्वपरः शुभः ॥
māsamenamanuprāpya dharmānkuru imāñcchubhān ko na yatnaṁ ca kurute tasmātko nvaparaḥ śubhaḥ
इस मास को पाकर इन शुभ धर्मों का पालन करना चाहिए। कौन ऐसा है जो इसके लिए प्रयत्न न करे? इससे बढ़कर और शुभ क्या हो सकता है?
श्लोक 13 (skanda.2.176.13)
योऽतीव सुलभान्धर्मान्न करोति नराऽधमः । तस्यैव सुलभा लोका नारका नात्र संशयः ॥
yo'tīva sulabhāndharmānna karoti narā'dhamaḥ tasyaiva sulabhā lokā nārakā nātra saṁśayaḥ
जो अधम मनुष्य इन अत्यंत सुलभ धर्मों का भी पालन नहीं करता, उसे नारकीय लोक सुलभता से ही प्राप्त होते हैं — इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 14 (skanda.2.176.14)
अथातः संप्रवक्ष्यामि तस्मिन्मासे च कोत्तमा । तां तिथिं सर्वपापघ्नीं दध्नः सारमिवोद्धृताम् ॥
athātaḥ saṁpravakṣyāmi tasminmāse ca kottamā tāṁ tithiṁ sarvapāpaghnīṁ dadhnaḥ sāramivoddhṛtām
अब मैं बताता हूँ कि उस मास में कौन-सी तिथि श्रेष्ठतम है — वह सर्वपापनाशक तिथि, जो दही से निकाले गए सार (मक्खन) के समान है।
श्लोक 15 (skanda.2.176.15)
चैत्रे मासि महापुण्ये मेषसंस्थे दिवाकरे । पापघ्नी पितृदैवत्या गयाकोटिफलप्रदा ॥
caitre māsi mahāpuṇye meṣasaṁsthe divākare pāpaghnī pitṛdaivatyā gayākoṭiphalapradā
अत्यंत पुण्यमय चैत्र मास में, जब सूर्य मेष राशि में हो, वह पापनाशिनी, पितरों को समर्पित तिथि गया में किए गए करोड़ों श्राद्धों के फल के समान फलदायी है।
श्लोक 16 (skanda.2.176.16)
अत्रैव श्रूयते पुण्या पितृगाथा पुरातनी । शृणु तां सत्कथां राजन्सावर्णौ शासति क्षितिम् ॥
atraiva śrūyate puṇyā pitṛgāthā purātanī śṛṇu tāṁ satkathāṁ rājansāvarṇau śāsati kṣitim
इसी संदर्भ में एक पवित्र, प्राचीन पितृ-गाथा सुनी जाती है। हे राजन्, जब सावर्णि पृथ्वी पर शासन कर रहे थे, तब की वह सत्कथा सुनिए —
श्लोक 17 (skanda.2.176.17)
त्रिंशत्कलियुगस्यांते सर्वधर्मविवर्जिते । आनर्ते तु द्विजः कश्चिद्धर्मवर्ण इति श्रुतः ॥
triṁśatkaliyugasyānte sarvadharmavivarjite ānarte tu dvijaḥ kaściddharmavarṇa iti śrutaḥ
तीसवें कलियुग के अंत में, जब सर्वधर्म-विहीन काल था, आनर्त देश में धर्मवर्ण नामक एक ब्राह्मण था, ऐसा सुना जाता है।
श्लोक 18 (skanda.2.176.18)
दृष्ट्वा कलियुगे राजञ्जनान्पापरतान्मुनिः । तस्यैव प्रथमे पादे वर्णधर्मविवर्जिते ॥
dṛṣṭvā kaliyuge rājañjanānpāparatānmuniḥ tasyaiva prathame pāde varṇadharmavivarjite
हे राजन्, कलियुग के प्रथम चरण में ही, जब वर्ण-धर्म का त्याग हो चुका था, उस मुनि ने पापरत लोगों को देखा।
श्लोक 19 (skanda.2.176.19)
स कदाचित्सत्रयागं मुनीनां तु महात्मनाम् । अगमत्पुष्करे क्षेत्रे कुर्वतां मौनधारिणाम् ॥
sa kadācitsatrayāgaṁ munīnāṁ tu mahātmanām agamatpuṣkare kṣetre kurvatāṁ maunadhāriṇām
एक बार वह पुष्कर क्षेत्र में गया, जहाँ मौन धारण किए हुए महात्मा मुनिगण सत्र-यज्ञ कर रहे थे।
श्लोक 20 (skanda.2.176.20)
तत्र चासन्पुण्यकथा ऋषीणां शास्त्रगोचराः । तत्र केचित्कलियुगं प्रशशंसुर्धृतव्रताः ॥
tatra cāsanpuṇyakathā ṛṣīṇāṁ śāstragocarāḥ tatra kecitkaliyugaṁ praśaśaṁsurdhṛtavratāḥ
वहाँ ऋषियों की शास्त्र-विषयक पुण्यकथाएँ चल रही थीं। वहाँ व्रतधारी कुछ ऋषियों ने कलियुग की प्रशंसा की —
श्लोक 21 (skanda.2.176.21)
कृते यद्वत्सरात्साध्यं पुण्यं माधवतोषणम् । त्रेतायां मासतः साध्यं द्वापरे पक्षतो नृप ॥
kṛte yadvatsarātsādhyaṁ puṇyaṁ mādhavatoṣaṇam tretāyāṁ māsataḥ sādhyaṁ dvāpare pakṣato nṛpa
जो पुण्य कृतयुग में एक वर्ष के व्रत से, माधव को प्रसन्न करने के लिए, प्राप्त होता है, वही त्रेतायुग में एक मास से और द्वापर में एक पक्ष से प्राप्त हो जाता है, हे राजन्।
श्लोक 22 (skanda.2.176.22)
तस्माद्दशगुणं पुण्यं कलौ विष्णुस्मृतेर्भवेत् । अत्यल्पमपि वै पुण्यं कलौ कोटिगुणं भवेत् ॥
tasmāddaśaguṇaṁ puṇyaṁ kalau viṣṇusmṛterbhavet atyalpamapi vai puṇyaṁ kalau koṭiguṇaṁ bhavet
इससे भी दस गुना पुण्य कलियुग में केवल विष्णु के स्मरण मात्र से प्राप्त होता है। कलियुग में अत्यंत अल्प पुण्य भी करोड़ों गुना हो जाता है।
श्लोक 23 (skanda.2.176.23)
दया पुण्यविहीने तु दानधर्मविवर्जिते । दयादानं च कुरुते सकृदुच्चार्य वै हरिम् ॥
dayā puṇyavihīne tu dānadharmavivarjite dayādānaṁ ca kurute sakṛduccārya vai harim
पुण्यविहीन, दान-धर्म से रहित काल में भी, यदि कोई एक बार हरि का नाम उच्चारण करते हुए दया और दान करे,
श्लोक 24 (skanda.2.176.24)
स एव चोर्ध्वगो नूनं दुर्भिक्षे चान्नदस्तथा । एतत्प्रसंगावसरे नारदोऽभ्येत्य वै मुनिः ॥
sa eva cordhvago nūnaṁ durbhikṣe cānnadastathā etatprasaṅgāvasare nārado'bhyetya vai muniḥ
वही निश्चय ही ऊर्ध्वगति को प्राप्त होता है, जैसे दुर्भिक्ष के समय अन्नदाता होता है। इस प्रसंग के अवसर पर मुनि नारद वहाँ आ पहुँचे,
श्लोक 25 (skanda.2.176.25)
करेणैकेन शिश्नं च जिह्वां चैकेन वै हसन् । प्रगृह्योन्मत्तवत्तत्र ननर्त मुनिसत्तमः ॥
kareṇaikena śiśnaṁ ca jihvāṁ caikena vai hasan pragṛhyonmattavattatra nanarta munisattamaḥ
और हँसते हुए, एक हाथ से अपने जननांग को और दूसरे हाथ से अपनी जिह्वा को पकड़कर, वह श्रेष्ठ मुनि वहाँ उन्मत्त के समान नाचने लगे।
श्लोक 26 (skanda.2.176.26)
सभ्यास्तदा तमित्यूचुः किमेतदिति नारद । प्रत्युवाच स तान्सर्वान्नृत्यं कुर्वन्हसन्सुधीः ॥
sabhyāstadā tamityūcuḥ kimetaditi nārada pratyuvāca sa tānsarvānnṛtyaṁ kurvanhasansudhīḥ
सभा में बैठे लोगों ने तब उससे पूछा — हे नारद, यह क्या है? नाचते और हँसते हुए उस बुद्धिमान मुनि ने उन सबको उत्तर दिया —
श्लोक 27 (skanda.2.176.27)
संतोषाद्यदिह प्रोक्तं नृत्यद्भिर्भावितात्मभिः । सिद्धा वयं न संदेहः पुण्योऽयं कलिरागतः ॥
saṁtoṣādyadiha proktaṁ nṛtyadbhirbhāvitātmabhiḥ siddhā vayaṁ na saṁdehaḥ puṇyo'yaṁ kaliragataḥ
जो कुछ यहाँ प्रसन्नतापूर्वक भावितात्मा नर्तकों द्वारा कहा गया — 'हम सिद्ध हैं, इसमें संदेह नहीं, यह पुण्यमय कलियुग आ गया है' —
श्लोक 28 (skanda.2.176.28)
तत्सत्यं न च संदेहो बहु स्वल्पेन साध्यते । स्मरणात्तोषमायाति केशवः क्लेशनाशनः ॥
tatsatyaṁ na ca saṁdeho bahu svalpena sādhyate smaraṇāttoṣamāyāti keśavaḥ kleśanāśanaḥ
यह सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं है — बहुत कुछ थोड़े से ही प्राप्त हो जाता है। केवल स्मरण से ही क्लेशनाशक केशव प्रसन्न हो जाते हैं।
श्लोक 29 (skanda.2.176.29)
तथापि वः प्रवक्ष्यामि दुर्घटं च द्वयं धुवम् । शिश्नस्य निग्रहः पुत्रा जिह्वाया अपि नित्यशः ॥
tathāpi vaḥ pravakṣyāmi durghaṭaṁ ca dvayaṁ dhruvam śiśnasya nigrahaḥ putrā jihvāyā api nityaśaḥ
फिर भी मैं तुम्हें दो निश्चित दुष्कर बातें बताता हूँ, हे पुत्रो — जननेंद्रिय का नियंत्रण, और सदा जिह्वा का भी नियंत्रण।
श्लोक 30 (skanda.2.176.30)
द्वयं यद्धि भवेद्यस्य स एव स्याज्जनार्दनः । भवद्भिर्नात्र स्थातव्यं तस्मात्कलियुगागमे ॥
dvayaṁ yaddhi bhavedyasya sa eva syājjanārdanaḥ bhavadbhirnātra sthātavyaṁ tasmātkaliyugāgame
जिसमें ये दोनों हों, वही स्वयं जनार्दन के समान है। इसलिए तुम्हें कलियुग के इस आगमन में यहाँ नहीं रुकना चाहिए,
श्लोक 31 (skanda.2.176.31)
पाखंडं भारतं हित्वा संचरध्वं यथासुखम् । यत्र कुत्रापि देशेषु मनो यत्र प्रसीदति ॥
pākhaṇḍaṁ bhārataṁ hitvā saṁcaradhvaṁ yathāsukham yatra kutrāpi deśeṣu mano yatra prasīdati
पाखंड से भरे इस भारतवर्ष को त्यागकर सुखपूर्वक विचरण करो — जहाँ कहीं भी, जिस भी देश में मन को शांति मिले।
श्लोक 32 (skanda.2.176.32)
इति तद्वचनं श्रुत्वा मुनयः शंसितव्रताः । सत्रं समाप्य सहसा ययुस्ते च यथासुखम् ॥
iti tadvacanaṁ śrutvā munayaḥ śaṁsitavratāḥ satraṁ samāpya sahasā yayuste ca yathāsukham
नारद के इस वचन को सुनकर, अपने व्रतों को पूर्ण किए हुए वे मुनि तुरंत सत्र समाप्त कर सुखपूर्वक जहाँ-तहाँ चले गए।
श्लोक 33 (skanda.2.176.33)
धर्मवर्णोऽपि तच्छ्रुत्वा त्यक्तुं भूमिं मनो दधे । स व्रतं चोर्ध्वतेजस्कं धृत्वा दण्डकमंडलू ॥
dharmavarṇo'pi tacchrutvā tyaktuṁ bhūmiṁ mano dadhe sa vrataṁ cordhvatejaskaṁ dhṛtvā daṇḍakamaṇḍalū
धर्मवर्ण ने भी यह सुनकर पृथ्वी को त्यागने का मन बना लिया। उन्होंने ऊर्ध्वरेता व्रत धारण किया, तथा दंड और कमंडल लेकर,
श्लोक 34 (skanda.2.176.34)
जटावल्कलधारी च भूत्वा चैवं ययौ पुनः । कलौ युगे त्वनाचारान्द्रष्टुं विस्मितमानसः ॥
jaṭāvalkaladhārī ca bhūtvā caivaṁ yayau punaḥ kalau yuge tvanācārāndraṣṭuṁ vismitamānasaḥ
जटा और वल्कल धारण कर, इस प्रकार वे कलियुग के अनाचार को अपनी आँखों से देखने की उत्सुकता से भरे मन से पुनः चल पड़े।
श्लोक 35 (skanda.2.176.35)
तत्राऽपश्यज्जनान्घोरान्पापाचाररतान्खलान् । पाखण्डिनो द्विजाः सर्वे शूद्राः प्रव्राजिनस्तथा ॥
tatrā'paśyajjanānghorānpāpācāraratānkhalān pākhaṇḍino dvijāḥ sarve śūdrāḥ pravrājinastathā
वहाँ उन्होंने भयंकर, पापाचार में लगे दुष्ट लोगों को देखा — सभी ब्राह्मण पाखंडी हो गए थे, तथा शूद्र संन्यासी बने घूम रहे थे।
श्लोक 36 (skanda.2.176.36)
भर्तारं द्वेष्टि भार्या च शिष्यो द्वेष्टि गुरुं तथा । भृत्यश्च स्वामिहंता च पुत्रः पितृवधे रतः ॥
bhartāraṁ dveṣṭi bhāryā ca śiṣyo dveṣṭi guruṁ tathā bhṛtyaśca svāmihantā ca putraḥ pitṛvadhe rataḥ
पत्नी अपने पति से द्वेष करती है, शिष्य अपने गुरु से द्वेष करता है, नौकर स्वामी का घातक बन जाता है, और पुत्र अपने पिता की हत्या में लग जाता है।
श्लोक 37 (skanda.2.176.37)
शूद्रप्राया द्विजाः सर्वे बस्तप्रायाश्च धेनवः । गाथाप्रायास्तथा वेदाः क्रियासाम्याः शुभाः क्रियाः ॥
śūdraprāyā dvijāḥ sarve bastaprāyāśca dhenavaḥ gāthāprāyāstathā vedāḥ kriyāsāmyāḥ śubhāḥ kriyāḥ
सभी ब्राह्मण प्रायः शूद्र जैसे हो गए, गायें प्रायः बकरियों जैसी दुबली हो गईं, वेद प्रायः लोकगीत जैसे हो गए, और शुभ कर्म भी साधारण कर्मों के समान हो गए।
श्लोक 38 (skanda.2.176.38)
भूतप्रेतपिशाचाद्याः फलदास्तत्र देवताः । ता एव श्रद्धयाऽर्चंति जनाः पापरता शिताः ॥
bhūtapretapiśācādyāḥ phaladāstatra devatāḥ tā eva śraddhayā'rcanti janāḥ pāparatā śitāḥ
भूत, प्रेत, पिशाच आदि ही वहाँ फलदायी देवता माने जाते थे। पापरत तथा घृणित लोग श्रद्धापूर्वक उन्हीं की पूजा करते थे।
श्लोक 39 (skanda.2.176.39)
सर्वे व्यवायनिरतास्तदर्थे त्यक्तजीविताः । कूटसाक्ष्यप्रवक्तारः सदा कैतवमानसाः ॥
sarve vyavāyaniratāstadarthe tyaktajīvitāḥ kūṭasākṣyapravaktāraḥ sadā kaitavamānasāḥ
सभी लोग विषय-भोग में इतने रत थे कि उसके लिए अपना जीवन तक त्यागने को तैयार रहते थे। वे झूठी गवाही देने वाले और सदा कपटी मन वाले थे।
श्लोक 40 (skanda.2.176.40)
मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं सदा कलौ । सर्वेषां हैतुकी विद्या सा पूज्या नृपमंदिरे ॥
manasyekaṁ vacasyekaṁ karmaṇyekaṁ sadā kalau sarveṣāṁ haitukī vidyā sā pūjyā nṛpamandire
मन में कुछ और, वाणी में कुछ और, कर्म में कुछ और — यही सबका आचरण कलियुग में सदा रहता था। तर्कशास्त्र की विद्या ही सबकी पूज्य होकर राजभवन में मान्य होती थी।
श्लोक 41 (skanda.2.176.41)
गीताद्याश्च कला विद्या नृपाणां च प्रियावहाः । हीनाश्च पूज्यतां यांति नोत्तमाश्च कलौ युगे ॥
gītādyāśca kalā vidyā nṛpāṇāṁ ca priyāvahāḥ hīnāśca pūjyatāṁ yānti nottamāśca kalau yuge
संगीत आदि कलाएँ राजाओं को प्रिय विद्याएँ बन गईं। कलियुग में नीच पूज्यता को प्राप्त होते हैं, उत्तम पुरुष नहीं।
श्लोक 42 (skanda.2.176.42)
श्रोत्रियाश्च द्विजाः सर्वे दरिद्राः स्युः कलौ युगे । विष्णुभक्तिर्नराणां तु प्रायशो नैव वर्तते ॥
śrotriyāśca dvijāḥ sarve daridrāḥ syuḥ kalau yuge viṣṇubhaktirnarāṇāṁ tu prāyaśo naiva vartate
वेदपाठी ब्राह्मण सभी कलियुग में दरिद्र हो जाते हैं। मनुष्यों में विष्णु-भक्ति प्रायः बिल्कुल नहीं रहती।
श्लोक 43 (skanda.2.176.43)
प्रायः पाखंडभूयिष्ठं पुण्यक्षेत्रं भविष्यति । शूद्रा धर्मप्रवक्तारो जटिलास्तापसाः कलौ ॥
prāyaḥ pākhaṇḍabhūyiṣṭhaṁ puṇyakṣetraṁ bhaviṣyati śūdrā dharmapravaktāro jaṭilāstāpasāḥ kalau
पुण्यक्षेत्र भी प्रायः पाखंड से भर जाएँगे। कलियुग में शूद्र ही धर्मोपदेशक, जटाधारी और तपस्वी बन जाएँगे।
श्लोक 44 (skanda.2.176.44)
सर्वे चाल्पायुषो मर्त्या दयाहीना शठा जनाः । सर्वे धर्मप्रवक्तारः सर्वे च ग्रहणोत्सवाः ॥
sarve cālpāyuṣo martyā dayāhīnā śaṭhā janāḥ sarve dharmapravaktāraḥ sarve ca grahaṇotsavāḥ
सभी मनुष्य अल्पायु होंगे, दयाहीन, धूर्त। सभी धर्मोपदेशक बनने लगेंगे, और सभी उत्सवों में केवल ग्रहणकाल का सा उत्साह रहेगा।
श्लोक 45 (skanda.2.176.45)
स्वार्चनं चाऽपि हीच्छंति वृथा निन्दापरायणाः । असूयानिरताः सर्वे प्रभोः स्वगृहमागते ॥
svārcanaṁ cā'pi hīcchanti vṛthā nindāparāyaṇāḥ asūyāniratāḥ sarve prabhoḥ svagṛhamāgate
वे स्वयं की पूजा तो चाहते हैं, परंतु व्यर्थ की निंदा में लगे रहते हैं। जब स्वयं भगवान भी उनके घर आ जाएँ, तब भी वे सब ईर्ष्या में ही रत रहते हैं।
श्लोक 46 (skanda.2.176.46)
भ्राता च भगिनीगंता पिता पुत्रीं च वै कलौ । सर्वेऽपि शूद्रीनिरताः सर्वे वारांगनारताः ॥
bhrātā ca bhaginīgantā pitā putrīṁ ca vai kalau sarve'pi śūdrīniratāḥ sarve vārāṅganāratāḥ
कलियुग में भाई अपनी बहन के साथ, और पिता अपनी पुत्री के साथ भी अनुचित संबंध बनाता है। सभी शूद्र स्त्रियों में रत रहते हैं, सभी वेश्याओं में लिप्त रहते हैं।
श्लोक 47 (skanda.2.176.47)
साधून्नैव विजानंति बहुपापांश्च मन्यते । व्यक्तीकुर्वंति साधूनां दोषमेकं दुराग्रहाः ॥
sādhūnnaiva vijānanti bahupāpāṁśca manyate vyaktīkurvanti sādhūnāṁ doṣamekaṁ durāgrahāḥ
वे साधुओं को साधु नहीं जानते और उन्हें ही महापापी मान लेते हैं। दुराग्रही लोग साधुओं के एक ही दोष को उछालकर प्रकट करते हैं।
श्लोक 48 (skanda.2.176.48)
पापानां दोषजातानि गुणत्वेन वदन्ति हि । दोषमेव प्रगृह्णंति कलौ तु विगुणा जनाः ॥
pāpānāṁ doṣajātāni guṇatvena vadanti hi doṣameva pragṛhṇanti kalau tu viguṇā janāḥ
पापियों के दोषों की उपज को वे गुण मानकर कहते हैं। कलियुग में गुणहीन लोग केवल दोष को ही ग्रहण करते हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.176.49)
जलौका धर्मसंयुक्ता रक्तं पिवति नो पयः । औषध्यः सत्त्वहीना हि ऋतून् व्यत्ययास्तथा ॥
jalaukā dharmasaṁyuktā raktaṁ pivati no payaḥ auṣadhyaḥ sattvahīnā hi ṛtūn vyatyayāstathā
धर्मयुक्त लीच भी रक्त ही पीती है, दूध नहीं। औषधियाँ सत्त्वहीन हो जाती हैं, और ऋतुएँ भी अपने क्रम से भ्रष्ट हो जाती हैं।
श्लोक 50 (skanda.2.176.50)
दुर्भिक्षं सर्वराष्ट्रेषु कन्या काले न सूयते । नटनर्तकविद्यासु प्रीतिमन्तो नराः कलौ ॥
durbhikṣaṁ sarvarāṣṭreṣu kanyā kāle na sūyate naṭanartakavidyāsu prītimanto narāḥ kalau
सभी राष्ट्रों में दुर्भिक्ष होगा, कन्याएँ समय से पहले ही रजस्वला हो जाएँगी। कलियुग में मनुष्य अभिनेताओं और नर्तकों की कलाओं में ही आसक्त होंगे।
श्लोक 51 (skanda.2.176.51)
वेदवेदांतविद्यासु निरता ये गुणाधिकाः । भृत्यान्पश्यंति तान्मूढास्ते भ्रष्टाश्चाखिला नृप ॥
vedavedāntavidyāsu niratā ye guṇādhikāḥ bhṛtyānpaśyanti tānmūḍhāste bhraṣṭāścākhilā nṛpa
हे राजन्, जो लोग वेद-वेदांत विद्या में लगे हुए, गुणों में श्रेष्ठ हैं, मूर्ख लोग उन्हें भी सेवक जैसा समझते हैं — वे सब भ्रष्ट हो चुके होते हैं।
श्लोक 52 (skanda.2.176.52)
त्यक्तश्राद्धक्रियाः सर्वे त्यक्तवेदोदितक्रियाः । जिह्वायां विष्णुनामानि न वर्तंते कदाचन । शृंगाररसनिर्वाणास्तद्गीतान्येव ते जगुः ॥
tyaktaśrāddhakriyāḥ sarve tyaktavedoditakriyāḥ jihvāyāṁ viṣṇunāmāni na vartante kadācana śṛṅgārarasanirvāṇāstadgītānyeva te jaguḥ
सभी ने श्राद्ध-कर्म त्याग दिए हैं, वेदोक्त क्रियाएँ त्याग दी हैं। उनकी जिह्वा पर विष्णु के नाम कभी नहीं रहते, केवल शृंगार-रस में डूबे गीत ही वे गाते हैं।
श्लोक 53 (skanda.2.176.53)
न विष्णुसेवा न च शास्त्रवार्ता न यागदीक्षा न विचारलेशः । न तीर्थयात्रा न च दानधर्माः कलौ जने क्वाऽपि बभूव चित्रम् ॥
na viṣṇusevā na ca śāstravārtā na yāgadīkṣā na vicāraleśaḥ na tīrthayātrā na ca dānadharmāḥ kalau jane kvā'pi babhūva citram
न विष्णु की सेवा, न शास्त्र-चर्चा, न यज्ञ-दीक्षा, न विचार का लेशमात्र, न तीर्थयात्रा, न दान-धर्म — कलियुग में लोगों में इनमें से किसी का भी होना आश्चर्य की बात है।
श्लोक 54 (skanda.2.176.54)
तान्दृष्ट्वा धर्मवर्णोऽपि सुभीतोऽत्यन्तविस्मितः । वंशं पापात्क्षयं यांतं दृष्ट्वा द्वीपांतरं ययौ ॥
tāndṛṣṭvā dharmavarṇo'pi subhīto'tyantavismitaḥ vaṁśaṁ pāpātkṣayaṁ yāntaṁ dṛṣṭvā dvīpāntaraṁ yayau
यह सब देखकर धर्मवर्ण भी अत्यंत भयभीत और विस्मित हो गए। अपने ही वंश को पाप के कारण क्षीण होते देखकर, वे किसी अन्य द्वीप को चले गए।
श्लोक 55 (skanda.2.176.55)
स चरन्सर्वद्वीपेषु लोकेष्वेव तु सर्वशः । पितृलोकं ययौ धीमान्कदाचित्कौतुकान्वितः ॥
sa caransarvadvīpeṣu lokeṣveva tu sarvaśaḥ pitṛlokaṁ yayau dhīmānkadācitkautukānvitaḥ
वे सभी द्वीपों में तथा सभी लोकों में सर्वत्र विचरण करते रहे। एक बार कुतूहलवश वह बुद्धिमान मुनि पितृलोक को गया।
श्लोक 56 (skanda.2.176.56)
तत्राऽपश्यन्महाघोराञ्च्छ्राम्यमाणांश्च कर्मभिः ॥
tatrā'paśyanmahāghorāñcchrāmyamāṇāṁśca karmabhiḥ
वहाँ उसने अत्यंत भयंकर, अपने कर्मों से क्लांत हुए प्राणियों को देखा।
श्लोक 57 (skanda.2.176.57)
धावतो रुदमानांश्च पततः पतितानपि । तत्रापश्यच्चान्धकूपे पतितान्स्वान्पितॄनधः ॥
dhāvato rudamānāṁśca patataḥ patitānapi tatrāpaśyaccāndhakūpe patitānsvānpitṝnadhaḥ
वे दौड़ते-भागते, रोते हुए, गिरते हुए और गिरे हुए दिखे। वहाँ उसने अपने ही पितरों को नीचे स्थित अंधकूप में गिरा हुआ देखा,
श्लोक 58 (skanda.2.176.58)
दूर्वाग्रलंबिनो दीनान्दूर्वाच्छेदे हि शंकितान् । तदा प्राप्तः कोऽपि चाखुर्दूर्वामूलं तदाश्रयम् ॥
dūrvāgralambino dīnāndūrvācchede hi śaṅkitān tadā prāptaḥ ko'pi cākhurdūrvāmūlaṁ tadāśrayam
दीन दशा में, दूब घास के अग्रभाग पर लटके हुए, तथा उस दूब के कट जाने की आशंका से भयभीत। उसी समय एक चूहा वहाँ आया, जो उस दूब की जड़ को, जिस पर वे आश्रित थे,
श्लोक 59 (skanda.2.176.59)
तेन भागत्रयं चात्तमेको भागोवशेषितः । तं दृष्ट्वा ते क्षीयमाणं मूलं दुःखेन कर्षिणः ॥
tena bhāgatrayaṁ cāttameko bhāgo'vaśeṣitaḥ taṁ dṛṣṭvā te kṣīyamāṇaṁ mūlaṁ duḥkhena karṣiṇaḥ
उसने तीन-चौथाई भाग कुतर दिया था, केवल एक भाग शेष रह गया था। उस क्षीण होती हुई जड़ को देखकर वे दुःखपूर्वक कातर हो उठे,
श्लोक 60 (skanda.2.176.60)
अधो दृष्ट्वा चांधकूपं तटपातादिभीषणम् । दुरुत्तारं महाघोरं कर्मणाप्तं सुदुःखिताः ॥
adho dṛṣṭvā cāndhakūpaṁ taṭapātādibhīṣaṇam duruttāraṁ mahāghoraṁ karmaṇāptaṁ sudukhitāḥ
नीचे उस अंधकूप को देखकर, जो किनारे से गिरने के भय से भयावह था, अपने ही कर्मों से प्राप्त उस दुस्तर, महाघोर कूप को देखकर वे अत्यंत दुःखी थे,
श्लोक 61 (skanda.2.176.61)
अग्रे चाऽपि दुरुत्तारमवलंबविवर्जितम् । तान्द्रष्ट्वा विस्मितो भूत्वा दयालुर्वाक्यमब्रवीत् ॥
agre cā'pi duruttāramavalambavivarjitam tāndraṣṭvā vismito bhūtvā dayāluravākyamabravīt
आगे भी दुस्तर और सहारे से रहित। उन्हें देखकर विस्मित हुए, दयालु धर्मवर्ण ने यह वचन कहा —
श्लोक 62 (skanda.2.176.62)
के यूयं पतिता ह्यस्मिन्केन दुस्तरकर्मणा । कस्य गोत्रे समुत्पन्नाः कथं वो मुक्तिरूर्जिता ॥
ke yūyaṁ patitā hyasminkena dustarakarmaṇā kasya gotre samutpannāḥ kathaṁ vo muktirūrjitā
तुम कौन हो, जो इसमें गिरे हुए हो? किस दुस्तर कर्म से? किस गोत्र में उत्पन्न हुए हो? और तुम्हारी मुक्ति किस प्रकार संभव है?
श्लोक 63 (skanda.2.176.63)
एतद्यूयं वदध्वं मे शर्म वोऽथ भविष्यति । इत्येवमुदितास्तेन पितरोऽथ सुदुःखिताः ॥
etadyūyaṁ vadadhvaṁ me śarma vo'tha bhaviṣyati ityevamuditāstena pitaro'tha sudukhitāḥ
यह मुझे बताओ, तुम्हारा कल्याण होगा। उसके ऐसा कहने पर, उन अत्यंत दुःखी पितरों ने,
श्लोक 64 (skanda.2.176.64)
तमूचुः करुणां वाचं धर्मश्रुतिपुरःसराः । पितर ऊचुः । वयं श्रीवत्सगोत्रीया भुवि सन्तानवर्जिताः ॥
tamūcuḥ karuṇāṁ vācaṁ dharmaśrutipuraḥsarāḥ pitara ūcuḥ vayaṁ śrīvatsagotrīyā bhuvi santānavarjitāḥ
धर्म-श्रुति के जानकार उन पितरों ने उससे करुण वाणी में कहा। पितरों ने कहा — हम श्रीवत्स गोत्र के हैं, जो पृथ्वी पर अब संतानहीन हो चुके हैं।
श्लोक 65 (skanda.2.176.65)
पिंडश्राद्धविहीनाश्च तेन पच्यामहे वयम् । निःसन्तानोऽपि नो वंशो जातः पापैः कलौ युगे ॥
piṇḍaśrāddhavihīnāśca tena pacyāmahe vayam niḥsantāno'pi no vaṁśo jātaḥ pāpaiḥ kalau yuge
पिंडदान और श्राद्ध से वंचित होकर हम इस प्रकार भुगत रहे हैं। कलियुग में हमारा वंश पापों के कारण संतानहीन हो गया है।
श्लोक 66 (skanda.2.176.66)
नाऽस्माकं पिंडदश्चास्ति वंशे पापात्क्षयं गते । तेनांधकूपे पतनं निस्तंतूनां दुरात्मनाम् ॥
nā'smākaṁ piṇḍadaścāsti vaṁśe pāpātkṣayaṁ gate tenāndhakūpe patanaṁ nistantūnāṁ durātmanām
हमारे वंश के पाप से क्षीण हो जाने के कारण अब कोई हमें पिंड देने वाला नहीं है। इसीलिए, वंश-धागा टूट जाने से, हम दुरात्माओं का इस अंधकूप में गिरना निश्चित है।
श्लोक 67 (skanda.2.176.67)
एको हि वर्तते वंशे धर्मवर्णो महायशाः । स विरक्तश्चरन्नेको न गार्हस्थमुपेयिवान् ॥
eko hi vartate vaṁśe dharmavarṇo mahāyaśāḥ sa viraktaścarannneko na gārhasthamupeyivān
हमारे वंश में केवल एक ही जीवित है, महायशस्वी धर्मवर्ण। वह विरक्त होकर अकेला विचरण करता है, उसने गृहस्थाश्रम को स्वीकार नहीं किया है।
श्लोक 68 (skanda.2.176.68)
तंतुना तेन बिभ्रामो दूर्वानालावलंबिताः । निस्तंतुत्वाच्च तन्मूलमाखुः खादति प्रत्यहम् ॥
tantunā tena bibhrāmo dūrvānālāvalambitāḥ nistantutvācca tanmūlamākhuḥ khādati pratyaham
उसी एक धागे के सहारे हम इस दूब की डंडी पर लटके हुए हैं। और चूँकि हमारा वंश-सूत्र अब क्षीण हो चुका है, इसलिए एक चूहा उसकी जड़ को प्रतिदिन कुतर रहा है।
श्लोक 69 (skanda.2.176.69)
एकस्यैवाऽवशिष्टत्वात्किंचिन्नलोऽवशेषितः । आखुना खाद्यमानश्च वर्तते सौम्य पश्यताम् ॥
ekasyaivā'vaśiṣṭatvātkiñcinnalo'vaśeṣitaḥ ākhunā khādyamānaśca vartate saumya paśyatām
हे सौम्य, चूँकि केवल एक ही जीवित है, इसलिए वह डंठल केवल थोड़ा-सा शेष रह गया है, और वह भी हमारे देखते-देखते ही चूहे द्वारा कुतरा जा रहा है।
श्लोक 70 (skanda.2.176.70)
तस्य चाऽऽयुःक्षये तात शेषमाखुर्हरिष्यति । पश्चात्कूपे पतिष्यामो दुरुत्तारेंऽधतामसे ॥
tasya cā'yuḥkṣaye tāta śeṣamākhurhariṣyati paścātkūpe patiṣyāmo duruttāre'ndhatāmase
हे तात, जब उसकी आयु समाप्त होगी, तब चूहा शेष भाग को भी काट डालेगा, और फिर हम उस दुस्तर, अंधकारमय तमस्वरूप कूप में गिर जाएँगे।
श्लोक 71 (skanda.2.176.71)
तस्मात्त्वं च भुवं गत्वा धर्मवर्णं प्रबोधय । अस्मद्वाक्यैर्दयापात्रैर्गार्हस्थ्यं विमुखं मुनिम् ॥
tasmāttvaṁ ca bhuvaṁ gatvā dharmavarṇaṁ prabodhaya asmadvākyairdayāpātrairgārhasthyaṁ vimukhaṁ munim
अतः तुम पृथ्वी पर जाकर, दया के योग्य हमारे इन वचनों द्वारा, गृहस्थ जीवन से विमुख उस मुनि धर्मवर्ण को समझाओ।
श्लोक 72 (skanda.2.176.72)
पितरस्ते भृशाऽर्ता हि नरके पतिता मया । अन्धकूपे दुरुत्तारे दृष्टा दूर्वावलंबिताः ॥
pitaraste bhṛśā'rtā hi narake patitā mayā andhakūpe duruttāre dṛṣṭā dūrvāvalambitāḥ
'तेरे पितर अत्यंत पीड़ित हैं — मैंने उन्हें नरक में गिरा हुआ, दुस्तर अंधकूप में दूब के सहारे लटका हुआ देखा है।'
श्लोक 73 (skanda.2.176.73)
सा दूर्वा वंशरूपा हि तन्मूलं सततं मुने । कालाख्यो मूषकस्तस्य मूलं खादति प्रत्यहम् ॥
sā dūrvā vaṁśarūpā hi tanmūlaṁ satataṁ mune kālākhyo mūṣakastasya mūlaṁ khādati pratyaham
वह दूब वंश का ही रूप है, और उसकी जड़ को, हे मुने, समय-नामक चूहा प्रतिदिन कुतरता रहता है।
श्लोक 74 (skanda.2.176.74)
वंशनाशोऽनुक्रमत एकस्त्वं त्ववशेषितः । तेन मूलस्य दूर्वाया नष्टं भागत्रयं मुने ॥
vaṁśanāśo'nukramata ekastvaṁ tvavaśeṣitaḥ tena mūlasya dūrvāyā naṣṭaṁ bhāgatrayaṁ mune
हमारा वंश क्रमशः नष्ट होता गया है, और अब हे मुने, केवल तू ही शेष बचा है। इसीलिए उस दूब की जड़ का तीन-चौथाई भाग नष्ट हो चुका है।
श्लोक 75 (skanda.2.176.75)
एको भागोऽवशिष्टोऽत्र यतस्त्वं वर्तसे भुवि । किंचित्खादति वै त्वाऽऽखुस्तव चाऽऽयुःक्षयक्रमात् ॥
eko bhāgo'vaśiṣṭo'tra yatastvaṁ vartase bhuvi kiñcitkhādati vai tvā'khustava cā'yuḥkṣayakramāt
केवल एक भाग शेष है, क्योंकि तू पृथ्वी पर जीवित है। वह चूहा उसे भी थोड़ा-थोड़ा तेरी आयु के क्षीण होने के क्रम से कुतर रहा है।
श्लोक 76 (skanda.2.176.76)
परेते त्वयि चाऽस्माकं तवाऽपि पतनं भवेत् । कूप एवान्धतामिस्रे संतानेऽपि क्षयं गते ॥
parete tvayi cā'smākaṁ tavā'pi patanaṁ bhavet kūpa evāndhatāmisre saṁtāne'pi kṣayaṁ gate
तेरे परलोक गमन कर जाने पर, संतान भी पूरी तरह क्षीण हो जाने से, तेरा भी और हमारा भी उसी अंधकारमय कूप में पतन हो जाएगा।
श्लोक 77 (skanda.2.176.77)
तस्माद्गार्हस्थ्यमासाद्य कुरु संततिवर्धनम् । तेनाऽस्माकं तवाऽपि स्याद्गतिरूर्ध्वा न संशयः ॥
tasmādgārhasthyamāsādya kuru saṁtativardhanam tenā'smākaṁ tavā'pi syādgatirūrdhvā na saṁśayaḥ
अतः गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर, संतान की वृद्धि कर। इससे हम सबकी और तेरी भी ऊर्ध्वगति निश्चित रूप से होगी।
श्लोक 78 (skanda.2.176.78)
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् । यजेत वाऽश्वमेधं च नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥
eṣṭavyā bahavaḥ putrā yadyeko'pi gayāṁ vrajet yajeta vā'śvamedhaṁ ca nīlaṁ vā vṛṣamutsṛjet
बहुत पुत्र चाहने योग्य हैं, ताकि उनमें से एक भी गया जाए, अथवा अश्वमेध यज्ञ करे, या नीला बैल छोड़े,
श्लोक 79 (skanda.2.176.79)
यद्येकोऽपि च वैशाखे माघे वा कार्तिकेऽपि च । अस्मानुद्दिश्य वै स्नानं श्राद्धं दानं करिष्यति ॥
yadyeko'pi ca vaiśākhe māghe vā kārtike'pi ca asmānuddiśya vai snānaṁ śrāddhaṁ dānaṁ kariṣyati
अथवा यदि एक भी पुत्र वैशाख में, माघ में या कार्तिक में हमारे उद्देश्य से स्नान, श्राद्ध और दान करे,
श्लोक 80 (skanda.2.176.80)
तेन चोर्ध्वगतिर्भूयान्नरकादुद्धृतिश्च नः । एको वा विष्णुभक्तः स्यादेको वा हरिवासरी ॥
tena cordhvagatirbhūyānnarakāduddhṛtiśca naḥ eko vā viṣṇubhaktaḥ syādeko vā harivāsarī
तो उसी से हमें ऊर्ध्वगति और नरक से उद्धार प्राप्त होगा। यदि एक भी पुत्र विष्णुभक्त हो, या एक भी एकादशी-व्रती हो,
श्लोक 81 (skanda.2.176.81)
एको वा शृणुयाद्विष्णोः कथां पापविनाशनीम् । तस्यातीतं कुलशतं भावि चाऽपि कुलं शतम् ॥
eko vā śṛṇuyādviṣṇoḥ kathāṁ pāpavināśanīm tasyātītaṁ kulaśataṁ bhāvi cā'pi kulaṁ śatam
अथवा यदि एक भी विष्णु की पापनाशक कथा सुने, तो उसके सौ पूर्व और सौ भावी कुल भी,
श्लोक 82 (skanda.2.176.82)
अपि पापवृतं क्वाऽपि नरकं नैव पश्यति । किमन्यैर्बहुभिः पुत्रैर्दयाधर्मविवर्जितैः ॥
api pāpavṛtaṁ kvā'pi narakaṁ naiva paśyati kimanyairbahubhiḥ putrairdayādharmavivarjitaiḥ
चाहे वे कहीं भी पापों में लिप्त रहे हों, कभी नरक नहीं देखते। ऐसे अन्य बहुत से पुत्रों से क्या लाभ, जो दया और धर्म से रहित हों?
श्लोक 83 (skanda.2.176.83)
ये जाता नार्चयंत्यद्धा विष्णुं नारायणं कुले । नाऽपुत्रस्य हि लोकोऽस्ति सर्वमेतज्जना विदुः ॥
ye jātā nārcayantyaddhā viṣṇuṁ nārāyaṇaṁ kule nā'putrasya hi loko'sti sarvametajjanā viduḥ
जो कुल में जन्म लेकर भी विष्णु नारायण की पूजा नहीं करते। यह तो सभी जानते हैं कि पुत्रहीन को कोई लोक प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 84 (skanda.2.176.84)
तत्राऽपि च दयायुक्तं तत्संतानं च दुर्लभम् । इति तं बोधयित्वा तु वाक्यैरेतैश्च सूनृतैः ॥
tatrā'pi ca dayāyuktaṁ tatsaṁtānaṁ ca durlabham iti taṁ bodhayitvā tu vākyairetaiśca sūnṛtaiḥ
और उसमें भी दया से युक्त संतान का मिलना दुर्लभ है। इस प्रकार इन सत्य वचनों से उसे समझाकर,
श्लोक 85 (skanda.2.176.85)
विरक्तस्योर्ध्वरेतस्य गार्हस्थ्ये त्वं मतिं कुरु । पितॄणां वचनं श्रुत्वा धर्मवर्णोऽतिविस्मितः ॥
viraktasyordhvaretasya gārhasthye tvaṁ matiṁ kuru pitṝṇāṁ vacanaṁ śrutvā dharmavarṇo'tivismitaḥ
वैराग्यशील, ऊर्ध्वरेता होते हुए भी, तुम गृहस्थाश्रम में मन लगाओ। पितरों के इस वचन को सुनकर धर्मवर्ण अत्यंत विस्मित हो गए,
श्लोक 86 (skanda.2.176.86)
प्रणम्य प्रांजलिः प्राह रुदन्वै जातवेपथुः । नाम्नाहं धर्मवर्णश्च युष्मद्वंश्यो दुराग्रही ॥
praṇamya prāñjaliḥ prāha rudanvai jātavepathuḥ nāmnāhaṁ dharmavarṇaśca yuṣmadvaṁśyo durāgrahī
प्रणाम कर, हाथ जोड़े, रोते हुए, काँपते हुए बोले — मैं धर्मवर्ण नाम वाला, आपका ही वंशज, दुराग्रही व्यक्ति हूँ।
श्लोक 87 (skanda.2.176.87)
सत्रे श्रुत्वा तु वचनं नारदस्य महात्मनः । जिह्वादार्ढ्यं गुह्यदार्ढ्यं न कस्याऽपि कलौ युगे ॥
satre śrutvā tu vacanaṁ nāradasya mahātmanaḥ jihvādārḍhyaṁ guhyadārḍhyaṁ na kasyā'pi kalau yuge
उस सत्र-यज्ञ में महात्मा नारद का वचन सुनकर — कि कलियुग में किसी की भी जिह्वा और गुह्येंद्रिय पर संयम नहीं रहता —
श्लोक 88 (skanda.2.176.88)
दृष्ट्वा भुवि च पापिष्ठांस्ताञ्जनानपि शंकितः । भीतो दुर्जनसंगत्या चरन्द्वीपांतरे वसन् ॥
dṛṣṭvā bhuvi ca pāpiṣṭhāṁstāñjanānapi śaṅkitaḥ bhīto durjanasaṅgatyā carandvīpāntare vasan
और पृथ्वी पर उन अत्यंत पापी लोगों को देखकर भी आशंकित होकर, दुर्जनों की संगति से भयभीत होकर, मैं अन्य द्वीप में विचरण करते हुए वहीं बसा रहा।
श्लोक 89 (skanda.2.176.89)
पादास्त्रयो गता ह्यस्य कलेः पादेंऽत्यकेऽपि च । गताः सार्द्धत्रयो भागा इदानीं जनका इमे ॥
pādāstrayo gatā hyasya kaleḥ pāde'ntyake'pi ca gatāḥ sārddhatrayo bhāgā idānīṁ janakā ime
इस कलियुग के तीन चरण बीत चुके हैं, और अंतिम चरण में भी साढ़े तीन भाग बीत चुके हैं — हे पितरो, यह अभी की स्थिति है।
श्लोक 90 (skanda.2.176.90)
नाऽहं वेद्मि भवद्दुःखं वृथा जन्म गतं मम । यस्मिन्कुले त्वहं जात ऋणं पित्रोर्न वै हृतम् ॥
nā'haṁ vedmi bhavadduḥkhaṁ vṛthā janma gataṁ mama yasminkule tvahaṁ jāta ṛṇaṁ pitrorna vai hṛtam
मुझे आपके दुःख का ज्ञान नहीं था, मेरा जन्म व्यर्थ गया। जिस कुल में मैंने जन्म लिया, उसमें मैंने माता-पिता का ऋण नहीं चुकाया।
श्लोक 91 (skanda.2.176.91)
किं तेन जातमात्रेण भूभारेणाऽत्र शत्रुणा । यो जातो नार्चयेद्विष्णुं पितॄन्देवानृषींस्तथा ॥
kiṁ tena jātamātreṇa bhūbhāreṇā'tra śatruṇā yo jāto nārcayedviṣṇuṁ pitṝndevānṛṣīṁstathā
उस केवल जन्म लेने मात्र से, इस भार-स्वरूप शत्रु से क्या लाभ, जो जन्म लेकर भी विष्णु, पितरों, देवताओं और ऋषियों की पूजा नहीं करता?
श्लोक 92 (skanda.2.176.92)
युष्मदाज्ञां करिष्यामि मामाऽऽज्ञापयत क्षितौ । यथा न कलिबाधा स्यात्तत्र संसारतोऽपि वा ॥
yuṣmadājñāṁ kariṣyāmi māmā'jñāpayata kṣitau yathā na kalibādhā syāttatra saṁsārato'pi vā
मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। मुझे इस पृथ्वी पर भेजिए, ऐसा आदेश दीजिए, ताकि वहाँ न तो कलि की बाधा हो और न संसार-चक्र की।
श्लोक 93 (skanda.2.176.93)
कर्तव्यान्यपि कृत्यानि मया पुत्रेण भूतले । इत्युक्तास्तेन वंश्येन धर्मवर्णेन धीमता ॥
kartavyānyapi kṛtyāni mayā putreṇa bhūtale ityuktāstena vaṁśyena dharmavarṇena dhīmatā
अपने पुत्र-कर्तव्यों को भी मैं पृथ्वी पर पूरा करूँगा। बुद्धिमान वंशज धर्मवर्ण द्वारा ऐसा कहे जाने पर,
श्लोक 94 (skanda.2.176.94)
किंचिदाश्वस्तमनस इदमूचुर्महीपते । पुत्र पश्य दशामेतां पितॄणां ते महात्मनाम् ॥
kiñcidāśvastamanasa idamūcurmahīpate putra paśya daśāmetāṁ pitṝṇāṁ te mahātmanām
हे राजन्, थोड़ा आश्वस्त होकर उन्होंने यह कहा — हे पुत्र, अपने महात्मा पितरों की इस दशा को देख,
श्लोक 95 (skanda.2.176.95)
संतत्यभावात्पततां दूर्वामात्रावलंबिनाम् । त्वं गार्हस्थ्यमुपालभ्य संतत्यास्मान्समुद्धर ॥
saṁtatyabhāvātpatatāṁ dūrvāmātrāvalambinām tvaṁ gārhasthyamupālabhya saṁtatyāsmānsamuddhara
संतान के अभाव से गिरते हुए, केवल एक दूब के सहारे टिके हुए — तू गृहस्थाश्रम को प्राप्त करके, संतान द्वारा हमारा उद्धार कर।
श्लोक 96 (skanda.2.176.96)
ये च विष्णुकथारक्ता ये स्मरंत्यनिशं हरिम् । ये सदाचारनिरता न तान्वै बाधते कलिः ॥
ye ca viṣṇukathāraktā ye smarantyaniśaṁ harim ye sadācāraniratā na tānvai bādhate kaliḥ
जो विष्णु-कथा में अनुरक्त हैं, जो निरंतर हरि का स्मरण करते हैं, और जो सदाचार में लगे रहते हैं, उन्हें कलि कभी नहीं बाधता।
श्लोक 97 (skanda.2.176.97)
शालिग्रामशिला यस्य गृहे तिष्ठति मानद । अथवा भारतं गेहे न तं वै बाधते कलिः ॥
śāligrāmaśilā yasya gṛhe tiṣṭhati mānada athavā bhārataṁ gehe na taṁ vai bādhate kaliḥ
हे मानद, जिसके घर में शालिग्राम-शिला स्थापित है, अथवा जिसके घर में महाभारत है, उसे कलि कभी नहीं बाधता।
श्लोक 98 (skanda.2.176.98)
यश्च वैशाखनिरतो माघस्नानपरश्च यः । कार्तिके दीपदाता यो न तं वै बाधते कलिः ॥
yaśca vaiśākhanirato māghasnānaparaśca yaḥ kārtike dīpadātā yo na taṁ vai bādhate kaliḥ
जो वैशाख के धर्मों में निरत है, जो माघ में स्नानरत है, और जो कार्तिक में दीपदान करता है, उसे कलि कभी नहीं बाधता।
श्लोक 99 (skanda.2.176.99)
प्रत्यहं शृणुयाद्यस्तु कथां विष्णोर्महात्मनः । पापघ्नीं मोक्षदां दिव्यां न तं वै बाधते कलिः ॥
pratyahaṁ śṛṇuyādyastu kathāṁ viṣṇormahātmanaḥ pāpaghnīṁ mokṣadāṁ divyāṁ na taṁ vai bādhate kaliḥ
जो प्रतिदिन महात्मा विष्णु की पापनाशक, मोक्षदायी, दिव्य कथा को सुनता है, उसे कलि कभी नहीं बाधता।
श्लोक 100 (skanda.2.176.100)
यद्गृहे वैश्वदेवश्च यद्गृहे तुलसी शुभा । यदंगणे शुभा गौश्च न तं वै बाधते कलिः ॥
yadgṛhe vaiśvadevaśca yadgṛhe tulasī śubhā yadaṅgaṇe śubhā gauśca na taṁ vai bādhate kaliḥ
जिसके घर में वैश्वदेव यज्ञ होता है, जिसके घर में पवित्र तुलसी है, और जिसके आँगन में शुभ गाय है, उसे कलि कभी नहीं बाधता।
श्लोक 101 (skanda.2.176.101)
तस्मान्नो भीतिरस्तीह युगे पापात्मकेऽपि च । शीघ्रं गच्छ भुवं पुत्र मासोऽयं माधवाह्वयः ॥
tasmānno bhītirastīha yuge pāpātmake'pi ca śīghraṁ gaccha bhuvaṁ putra māso'yaṁ mādhavāhvayaḥ
इसलिए इस पापमय युग में भी हमें कोई भय नहीं है। हे पुत्र, शीघ्र पृथ्वी पर जा — यह माधव नामक मास चल रहा है,
श्लोक 102 (skanda.2.176.102)
सर्वेषामुपकाराय मेषसंस्थे दिवाकरे । त्रिंशच्च तिथयः पुण्या मेषसंस्थे दिवाकरे ॥
sarveṣāmupakārāya meṣasaṁsthe divākare triṁśacca tithayaḥ puṇyā meṣasaṁsthe divākare
जो सबके उपकार के लिए है, जब सूर्य मेष राशि में हो। सूर्य के मेष राशि में रहने पर सभी तीस तिथियाँ पुण्यमय होती हैं।
श्लोक 103 (skanda.2.176.103)
एकैकस्यां कृतं पुण्यं कोटिकोटिगुणं भवेत् । तत्राऽपि चैत्रबहुलो दर्शो नृणां च मुक्तिदः ॥
ekaikasyāṁ kṛtaṁ puṇyaṁ koṭikoṭiguṇaṁ bhavet tatrā'pi caitrabahulo darśo nṛṇāṁ ca muktidaḥ
प्रत्येक तिथि में किया गया पुण्य करोड़ों गुना हो जाता है। उनमें भी चैत्र के कृष्ण पक्ष की अमावस्या मनुष्यों के लिए मुक्तिदायिनी है।
श्लोक 104 (skanda.2.176.104)
प्रियश्च पितृदेवानां सद्यो मुक्तिविधायकः । ये वै पितॄन्समुद्दिश्य श्राद्धं कुर्वंति तद्दिने ॥
priyaśca pitṛdevānāṁ sadyo muktividhāyakaḥ ye vai pitṝnsamuddiśya śrāddhaṁ kurvanti taddine
यह पितर-देवताओं को प्रिय है, तत्काल मुक्तिदायक है। जो लोग इस दिन पितरों के उद्देश्य से श्राद्ध करते हैं,
श्लोक 105 (skanda.2.176.105)
सोदकुंभं पिंडदानं तदक्षय्यफलं लभेत् । ये च कुर्वंति वै श्राद्धममायां च मधौ सुत ॥
sodakuṁbhaṁ piṇḍadānaṁ tadakṣayyaphalaṁ labhet ye ca kurvanti vai śrāddhamamāyāṁ ca madhau suta
जल के कलश सहित पिंडदान करके अक्षय फल प्राप्त करते हैं। हे पुत्र, जो लोग वैशाख (माधव) मास की अमावस्या को श्राद्ध करते हैं,
श्लोक 106 (skanda.2.176.106)
तैः कृतं तु गयाक्षेत्रे श्राद्धं कोटिगुणं भवेत् । यदि श्राद्धं मधौ दर्शे शाकेनाऽपि करोति च ॥
taiḥ kṛtaṁ tu gayākṣetre śrāddhaṁ koṭiguṇaṁ bhavet yadi śrāddhaṁ madhau darśe śākenā'pi karoti ca
उनके द्वारा किया गया श्राद्ध गया क्षेत्र में किए गए श्राद्ध से करोड़ों गुना अधिक फल देता है। यदि माधव-अमावस्या को केवल शाक से भी श्राद्ध किया जाए,
श्लोक 107 (skanda.2.176.107)
कोटिश्राद्धं गयायां तु कृतं तेन न संशयः । कुंभं च पानकैः पूर्णं कर्पूरागुरुवासितम् ॥
koṭiśrāddhaṁ gayāyāṁ tu kṛtaṁ tena na saṁśayaḥ kuṁbhaṁ ca pānakaiḥ pūrṇaṁ karpūrāguruvāsitam
तब उससे यह निश्चित है कि गया में करोड़ों श्राद्ध किए गए फल के समान फल मिलता है। कपूर और अगर से सुवासित, शर्बत से भरा हुआ कलश,
श्लोक 108 (skanda.2.176.108)
यो न दद्यान्मधौ दर्शे स पितृघ्नो न संशयः । यो दद्याच्च मधौ दर्शे सपानीयं करीरकम् ॥
yo na dadyānmadhau darśe sa pitṛghno na saṁśayaḥ yo dadyācca madhau darśe sapānīyaṁ karīrakam
जो इसे माधव-अमावस्या को दान न करे, वह निश्चय ही पितृ-हत्यारा है। और जो माधव-अमावस्या को जल सहित करीर फल का भी दान करता है,
श्लोक 109 (skanda.2.176.109)
श्राद्धं च भक्तिसंयुक्तः कुरुते च कुलोद्धतिम् । पितॄणां च तथा लोके नदी चाऽमृतवर्षिणी ॥
śrāddhaṁ ca bhaktisaṁyuktaḥ kurute ca kulodyatim pitṝṇāṁ ca tathā loke nadī cā'mṛtavarṣiṇī
और भक्तिपूर्वक श्राद्ध करता है, वह अपने कुल का उद्धार करता है। और पितरों के लोक में वह अमृत वर्षा करने वाली नदी के समान हो जाता है,
श्लोक 110 (skanda.2.176.110)
कुंभदानात्प्रसरति श्राद्धदानादिदायिनाम् । अन्नसूपघृतापूपलेह्यपायसकर्दमान् ॥
kuṁbhadānātprasarati śrāddhadānādidāyinām annasūpaghṛtāpūpalehyapāyasakardamān
जो कलश-दान से शुरू होकर श्राद्ध, दान आदि करने वालों की ओर से बहती है — अन्न, दाल, घी, पूए, चटनी और खीर की धारा से युक्त होकर।
श्लोक 111 (skanda.2.176.111)
तस्माज्झटिति त्वं गच्छ यदा वाऽमा भविष्यति । कुरु श्राद्धं पिंडदानं सोदकुम्भं महामते ॥
tasmājjhaṭiti tvaṁ gaccha yadā vā'mā bhaviṣyati kuru śrāddhaṁ piṇḍadānaṁ sodakumbhaṁ mahāmate
इसलिए हे महामते, तू शीघ्र जा, और जब अमावस्या हो, तब श्राद्ध, पिंडदान और जलकुंभ का दान कर।
श्लोक 112 (skanda.2.176.112)
सर्वेषामुपकाराय गार्हस्थ्यं च समाश्रय । धर्मार्थकामैः संतुष्टः प्राप्य संतानमुत्तमम् ॥
sarveṣāmupakārāya gārhasthyaṁ ca samāśraya dharmārthakāmaiḥ saṁtuṣṭaḥ prāpya saṁtānamuttamam
सबके उपकार के लिए गृहस्थाश्रम को अपना। धर्म, अर्थ और काम से संतुष्ट होकर उत्तम संतान प्राप्त कर,
श्लोक 113 (skanda.2.176.113)
पुनश्च मुनिवृत्तिस्त्वं सुखं द्वीपे सुसंचर । इत्यादिष्टः पितृभिश्च तूर्णं भूमिं ययौ मुनिः ॥
punaśca munivṛttistvaṁ sukhaṁ dvīpe susaṁcara ityādiṣṭaḥ pitṛbhiśca tūrṇaṁ bhūmiṁ yayau muniḥ
फिर तू पुनः मुनि-वृत्ति में लौटकर सुखपूर्वक द्वीप में विचरण करना। पितरों द्वारा ऐसा आदेश दिए जाने पर वह मुनि शीघ्र ही पृथ्वी पर गया,
श्लोक 114 (skanda.2.176.114)
चैत्रे मासे मेषसंस्थे पुण्ये मासि दिवाकरे । प्रातः स्नात्वा च संतर्ज्य पितॄन्देवानृषींस्तथा ॥
caitre māse meṣasaṁsthe puṇye māsi divākare prātaḥ snātvā ca saṁtarjya pitṝndevānṛṣīṁstathā
और चैत्र मास में, जब सूर्य मेष राशि में हो, उस पुण्य मास में प्रातः स्नान करके, पितरों, देवों और ऋषियों को तर्पण देकर,
श्लोक 115 (skanda.2.176.115)
सोदकुंभं तथा श्राद्धं कृत्वा पापविनाशनम् । तेन दत्त्वा पितॄणां च मुक्तिमावृत्तिवर्जिताम् ॥
sodakuṁbhaṁ tathā śrāddhaṁ kṛtvā pāpavināśanam tena dattvā pitṝṇāṁ ca muktimāvṛttivarjitām
जलकुंभ सहित पापनाशक श्राद्ध करके, उसके द्वारा पितरों को पुनरावृत्ति-रहित मुक्ति प्रदान की,
श्लोक 116 (skanda.2.176.116)
स्वयं विवाहमकरोत्संततिं प्राप्य वै सतीम् । लोके प्रख्यापयामास तां तिथिं पापनाशनीम् ॥
svayaṁ vivāhamakarotsaṁtatiṁ prāpya vai satīm loke prakhyāpayāmāsa tāṁ tithiṁ pāpanāśanīm
स्वयं विवाह किया, तथा सती संतान प्राप्त कर, उस पापनाशक तिथि को लोक में प्रसिद्ध कर दिया।
श्लोक 117 (skanda.2.176.117)
स्वयं पुनर्मुदा भक्त्या गन्धमादनमाययौ ॥
svayaṁ punarmudā bhaktyā gandhamādanamāyayau
फिर स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक, भक्तिभाव से गंधमादन पर्वत को चला गया।
श्लोक 118 (skanda.2.176.118)
तस्मात्पुण्यतमा चैषा मधोर्दर्शाह्वया तिथिः । नानया सदृशी लोके तिथिर्दृष्टा श्रुताऽपि वा ॥
tasmātpuṇyatamā caiṣā madhordarśāhvayā tithiḥ nānayā sadṛśī loke tithirdṛṣṭā śrutā'pi vā
इसलिए यह मधु-मास की अमावस्या नामक तिथि सबसे अधिक पुण्यमय है। लोक में इसके समान कोई अन्य तिथि न कभी देखी गई है और न सुनी गई है।