वैष्णव खण्ड · अध्याय 177
अक्षय्यतृतीयायाः श्रेष्ठत्वकथनम् — अक्षय तृतीया की श्रेष्ठता की कथा
श्लोक 1 (skanda.2.177.1)
श्रुतदेव उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि माहात्म्यं पापनाशनम् । अक्षय्यायास्तृतीयायाः सिते पक्षे च माधवे ॥
śrutadeva uvāca athātaḥ saṁpravakṣyāmi māhātmyaṁ pāpanāśanam akṣayyāyāstṛtīyāyāḥ site pakṣe ca mādhave
श्रुतदेव ने कहा — अब मैं माधव मास के शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया के पापनाशक माहात्म्य का वर्णन करता हूँ।
श्लोक 2 (skanda.2.177.2)
ये कुर्वंति च तस्यां वै प्रातः स्नानं भगोदये । ते सर्वे पापनिर्मुक्ता यांति विष्णोः परं पदम् ॥
ye kurvanti ca tasyāṁ vai prātaḥ snānaṁ bhagodaye te sarve pāpanirmuktā yānti viṣṇoḥ paraṁ padam
जो लोग उस दिन सूर्योदय से पहले प्रातः स्नान करते हैं, वे सब पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.177.3)
देवान्पितॄन्मुनीन्यस्तु कुर्यादुद्दिश्य तर्पणम् । तेनाऽधीतं च तेनेष्टं तेन श्राद्धशतं कृतम् ॥
devānpitṝnmunīnyastu kuryāduddiśya tarpaṇam tenā'dhītaṁ ca teneṣṭaṁ tena śrāddhaśataṁ kṛtam
जो इस दिन देवों, पितरों और मुनियों को उद्देश्य कर तर्पण करता है, उसने ही वेदाध्ययन किया, उसने ही यज्ञ किया, उसने ही सौ श्राद्ध किए — ऐसा जानो।
श्लोक 4 (skanda.2.177.4)
मधुसूदनमभ्यर्च्य कथां शृण्वंति ये नराः । अक्षय्यायां तृतीयायां ते नरा मुक्तिभागिनः ॥
madhusūdanamabhyarcya kathāṁ śṛṇvanti ye narāḥ akṣayyāyāṁ tṛtīyāyāṁ te narā muktibhāginaḥ
जो मनुष्य अक्षय तृतीया को मधुसूदन का पूजन कर यह कथा सुनते हैं, वे मनुष्य मुक्ति के भागी होते हैं।
श्लोक 5 (skanda.2.177.5)
ये दानं तत्र कुर्वंति मधुद्विट्प्रीतये शुभम् । तदक्षय्यं फलत्येव मधुशासनशासनात् ॥
ye dānaṁ tatra kurvanti madhudviṭprītaye śubham tadakṣayyaṁ phalatyeva madhuśāsanaśāsanāt
जो इस दिन मधु-दैत्य के शत्रु (विष्णु) की प्रसन्नता के लिए शुभ दान करते हैं, वह दान मधु के शासक (विष्णु) के आदेश से अक्षय फल देने वाला ही होता है।
श्लोक 6 (skanda.2.177.6)
देवर्षिपितृदैवत्या तिथिरेषा महाशुभा । त्रयाणां तृप्तिदात्री च कृते धर्मे सनातने ॥
devarṣipitṛdaivatyā tithireṣā mahāśubhā trayāṇāṁ tṛptidātrī ca kṛte dharme sanātane
यह अत्यंत शुभ तिथि देवों, ऋषियों और पितरों को समर्पित है, तथा सनातन कृतयुग-धर्म में इन तीनों को तृप्ति देने वाली है।
श्लोक 7 (skanda.2.177.7)
प्रख्यातिश्च तिथेरस्याः केन चास्ति तदप्यहम् । वक्ष्यामि नृपशार्दूल सावधानमनाः शृणु ॥
prakhyātiśca tithherasyāḥ kena cāsti tadapyaham vakṣyāmi nṛpaśārdūla sāvadhānamanāḥ śṛṇu
इस तिथि की प्रसिद्धि किस कारण से हुई, यह भी मैं बताता हूँ। हे राजशार्दूल, सावधानचित्त होकर सुनो।
श्लोक 8 (skanda.2.177.8)
पुरा पुरंदरस्याऽऽसीद्युद्धं च बलिना सह । देवानां चैव दैत्यानां द्वंद्वं युद्धमभूत्ततः ॥
purā puraṁdarasyā'sīdyuddhaṁ ca balinā saha devānāṁ caiva daityānāṁ dvandvaṁ yuddhamabhūttataḥ
पूर्वकाल में इंद्र का बलि के साथ युद्ध हुआ, तथा देवों और दैत्यों के बीच घमासान युद्ध हुआ।
श्लोक 9 (skanda.2.177.9)
स निर्जित्य बलिं दैत्यं पातालतलवासिनम् । पुनर्भुवं समासाद्य चोतथ्यस्याऽऽश्रमं ययौ ॥
sa nirjitya baliṁ daityaṁ pātālatalavāsinam punarbhuvaṁ samāsādya cotathyasyā'śramaṁ yayau
पाताल-निवासी दैत्य बलि को पराजित कर, इंद्र पुनः पृथ्वी पर आया और उतथ्य ऋषि के आश्रम में गया।
श्लोक 10 (skanda.2.177.10)
तत्रापश्यच्च तत्पत्नीं गुर्विणीं मंदगामिनीम् । चलच्छ्रोणितटाबद्धकांचीदाम्ना सुमंडिताम् ॥
tatrāpaśyacca tatpatnīṁ gurviṇīṁ mandagāminīm calacchroṇitaṭābaddhakāñcīdāmnā sumaṇḍitām
वहाँ उसने उतथ्य की गर्भवती, मंदगामिनी पत्नी को देखा, जो अपने हिलती हुई कमर पर बंधी करधनी से सुशोभित थी,
श्लोक 11 (skanda.2.177.11)
क्वणत्कंकणनिर्घोषजितमत्तालिकोकिलाम् । वल्गुचित्रांबरां रामां मंजुवाचं शुचिस्मिताम् ॥
kvaṇatkaṅkaṇanirghoṣajitamattālikokilām valgucitrāmbarāṁ rāmāṁ mañjuvācaṁ śucismitām
जिसकी झनझनाती चूड़ियों की ध्वनि मतवाली भौंरों और कोयलों को भी मात करती थी, जो सुंदर, चित्रित वस्त्रों वाली, मधुर वाणी वाली और निर्मल मुस्कान वाली सुंदरी थी,
श्लोक 12 (skanda.2.177.12)
लसत्कुंभस्थलाभ्यां च कुचाभ्यामुपशोभिताम् । हसत्पद्ममुखां दिव्यां नीलोत्पलसुलोचनाम् ॥
lasatkumbhasthalābhyāṁ ca kucābhyāmupaśobhitām hasatpadmamukhāṁ divyāṁ nīlotpalasulocanām
जो चमकते हुए घटों-सी स्तनों से सुशोभित थी, जिसका मुख हँसते हुए कमल के समान था, और जिसके नेत्र नीले कमल के समान सुंदर थे,
श्लोक 13 (skanda.2.177.13)
केतक्युदरपांडुभ्यां गंडाभ्यां च मनोरमाम् । श्रमोच्छ्वसंतीं दीनाक्षीं पर्णशालामुखे स्थिताम् ॥
ketakyudarapāṇḍubhyāṁ gaṇḍābhyāṁ ca manoramām śramocchvasantīṁ dīnākṣīṁ parṇaśālāmukhe sthitām
जिसके गाल केतकी के भीतरी भाग के समान गोरे और मनोहर थे, जो श्रम से हाँफती हुई, दुखी नेत्रों वाली, पर्णशाला के द्वार पर खड़ी थी,
श्लोक 14 (skanda.2.177.14)
स्वपतीं शयने क्वाऽपि तां दृष्ट्वा मोहमागतः । बलात्कारेण बुभुजे गुर्विणीं पाकशासनः ॥
svapatīṁ śayane kvā'pi tāṁ dṛṣṭvā mohamāgataḥ balātkāreṇa bubhuje gurviṇīṁ pākaśāsanaḥ
जो शय्या पर विश्राम कर रही थी। उसे देखकर मोहग्रस्त हुए इंद्र ने उस गर्भवती स्त्री के साथ बलपूर्वक दुराचार किया।
श्लोक 15 (skanda.2.177.15)
गर्भस्थस्तु तदा पिंडः स्वस्य पातविशंकया । छादयामास वै योनिं द्वारे पादेन दुःखितः ॥
garbhasthastu tadā piṇḍaḥ svasya pātaviśaṅkayā chādayāmāsa vai yoniṁ dvāre pādena duḥkhitaḥ
उस समय गर्भस्थ शिशु ने, अपने गिर जाने की आशंका से दुखी होकर, अपने पैर से गर्भ-द्वार को ढक दिया।
श्लोक 16 (skanda.2.177.16)
ततश्चस्कन्द वीर्यं तद्भूमावेव बलिद्विषः । गर्भस्थाय चुकोपासौ भगवान्पाकशासनः ॥
tataścaskanda vīryaṁ tadbhūmāveva balidviṣaḥ garbhasthāya cukopāsau bhagavānpākaśāsanaḥ
तब बलि के शत्रु इंद्र का वीर्य भूमि पर ही गिर गया, और भगवान इंद्र उस गर्भस्थ शिशु पर क्रुद्ध हो उठे।
श्लोक 17 (skanda.2.177.17)
तं शशाप च गर्भस्थं रुषा ताम्रांतलोचनः । जात्यन्धो भव दुर्बुद्धे माऽवमंस्था यतः पदा ॥
taṁ śaśāpa ca garbhasthaṁ ruṣā tāmrāntalocanaḥ jātyandho bhava durbuddhe mā'vamaṁsthā yataḥ padā
क्रोध से नेत्रों के कोने ताम्रवर्ण हो जाने पर, उसने उस गर्भस्थ शिशु को शाप दिया — हे दुर्बुद्धे, तू जन्म से अंधा हो जा, क्योंकि तूने पैर से मेरा तिरस्कार किया है।
श्लोक 18 (skanda.2.177.18)
प्रच्छाद्य योनिद्वारं च ततो दीर्घतपाह्वयः । पदा प्रस्कंदिताद्वीर्याज्जालतः समजायत ॥
pracchādya yonidvāraṁ ca tato dīrghatapāhvayaḥ padā praskanditādvīryājjālataḥ samajāyata
गर्भद्वार को अपने पैर से ढककर, फिर वह शिशु, जो 'दीर्घतमा' नाम से जाना गया, गिरे हुए वीर्य से जन्मे जाल के मार्ग से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 19 (skanda.2.177.19)
पश्चादिंद्रो ययौ शीघ्रमृषेः शापविशंकितः । पलायंतं हरिं दृष्ट्वा जहसुर्बटवोऽखिलाः ॥
paścādindro yayau śīghramṛṣeḥ śāpaviśaṅkitaḥ palāyantaṁ hariṁ dṛṣṭvā jahasurbaṭavo'khilāḥ
तत्पश्चात् इंद्र, ऋषि के शाप की आशंका से भयभीत होकर शीघ्र वहाँ से भाग गया। भागते हुए हरि (इंद्र) को देखकर सभी विद्यार्थी हँस पड़े।
श्लोक 20 (skanda.2.177.20)
ततस्तु व्रीडितो भूत्वा ययौ मेरोर्गुहां शुभाम् । तत्र लीनश्चचाराऽसौ दुस्तरं वै तपो महत् ॥
tatastu vrīḍito bhūtvā yayau meror guhāṁ śubhām tatra līnaścacārā'sau dustaraṁ vai tapo mahat
तत्पश्चात् लज्जित होकर वह मेरु पर्वत की एक शुभ गुफा में गया। वहाँ छिपकर उसने दुस्तर और महान तप करना आरंभ किया।
श्लोक 21 (skanda.2.177.21)
मेरौ विलीय वसति देवेन्द्रे लज्जयाऽन्विते । गूढैर्विज्ञाय तां वार्तां दैतेया बलिपूर्वकाः ॥
merau vilīya vasati devendre lajjayā'nvite gūḍhairvijñāya tāṁ vārtāṁ daiteyā balipūrvakāḥ
जब लज्जायुक्त देवेंद्र मेरु में छिपकर रह रहा था, तब गुप्तचरों से यह समाचार जानकर बलि आदि दैत्यों ने,
श्लोक 22 (skanda.2.177.22)
सुरानाक्रम्य बुभुजुर्बलींद्रश्चामरावतीम् । दिक्पालानां विभूतीश्च शंबराद्या बलीयसः ॥
surānākramya bubhujurbalīndraścāmarāvatīm dikpālānāṁ vibhūtīśca śaṁbarādyā balīyasaḥ
देवताओं पर आक्रमण कर, बलि के नेतृत्व में उन्होंने अमरावती पर अधिकार जमा लिया। शंबर आदि बलशाली दैत्यों ने दिक्पालों की संपत्तियों पर भी,
श्लोक 23 (skanda.2.177.23)
बलाद्बुभुजिरे हीननाथे राष्ट्रे दिवौकसाम् । रक्षितारमजानंतो देवाश्चाग्निपुरोगमाः ॥
balādbubhujire hīnanāthe rāṣṭre divaukasām rakṣitāramajānanto devāścāgnipurogamāḥ
स्वामीरहित हुए देवताओं के राज्य पर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया। अपने रक्षक को न जानते हुए, अग्नि आदि देवगण,
श्लोक 24 (skanda.2.177.24)
पप्रच्छुर्धिषणं देवं देवाचार्यमकल्मषम् । पप्रच्छुरिंद्रवृत्तांतं क्व स्वित्तिष्ठति नः प्रभुः ॥
papracchurdhiṣaṇaṁ devaṁ devācāryamakalmaṣam papracchurindravṛttāntaṁ kva svittiṣṭhati naḥ prabhuḥ
निर्दोष देवाचार्य धिषण (बृहस्पति) देव से पूछने लगे — इंद्र का समाचार क्या है, हमारा स्वामी कहाँ है?
श्लोक 25 (skanda.2.177.25)
दैत्याक्रांतमिदं राष्ट्रं हीननाथं दिवौकसाम् । कुतो नाऽऽयाति देवोऽसौ भूयान्कालो गतो विभो ॥
daityākrāntamidaṁ rāṣṭraṁ hīnanāthaṁ divaukasām kuto nā'yāti devo'sau bhūyānkālo gato vibho
देवताओं का यह राज्य दैत्यों से आक्रांत हो चुका है, स्वामीहीन हो चुका है। हे विभो, वह देव क्यों नहीं आ रहा? बहुत समय बीत चुका है।
श्लोक 26 (skanda.2.177.26)
तं यामो यत्र धिषण प्रार्थयामश्च तं विभुम् । इति पृष्टस्तदा देवैर्धिषणस्तानुवाच ह ॥
taṁ yāmo yatra dhiṣaṇa prārthayāmaśca taṁ vibhum iti pṛṣṭastadā devairdhiṣaṇastānuvāca ha
हे धिषण, हमें बताइए वह कहाँ है, हम वहीं जाकर उस प्रभु से प्रार्थना करें। देवों द्वारा ऐसा पूछे जाने पर धिषण ने उन्हें बताया —
श्लोक 27 (skanda.2.177.27)
रसातले बलिं जित्वा चोतथ्यस्याऽऽश्रमं ययौ । भुक्त्वा पत्नीं च दार्ढ्येन तच्छिष्यैरेव निन्दितः ॥
rasātale baliṁ jitvā cotathyasyā'śramaṁ yayau bhuktvā patnīṁ ca dārḍhyena tacchiṣyaireva ninditaḥ
पाताल में बलि को जीतकर वह उतथ्य के आश्रम गया। वहाँ बलपूर्वक उसकी पत्नी से दुराचार करने पर, उसके ही शिष्यों द्वारा वह निंदित हुआ।
श्लोक 28 (skanda.2.177.28)
व्रीडितस्तु दिवं यातुं गुहां मेरोर्विवेश ह । तत्रैवाऽऽस्ते शचीयुक्तः स्वकृतं चिन्तयन्विभुः ॥
vrīḍitastu divaṁ yātuṁ guhāṁ meror viveśa ha tatraivā'ste śacīyuktaḥ svakṛtaṁ cintayanvibhuḥ
लज्जित होकर वह स्वर्ग जाने के बजाय मेरु की गुफा में प्रविष्ट हो गया। वहीं वह प्रभु शची सहित बैठा, अपने ही किए हुए कर्म का चिंतन करता हुआ।
श्लोक 29 (skanda.2.177.29)
इति तस्य वचः श्रुत्वा देवा अग्निपुरोगमाः । गुहां मेरोर्ययुः शीघ्रं दृष्ट्वा प्रार्थयितुं विभुम् ॥
iti tasya vacaḥ śrutvā devā agnipurogamāḥ guhāṁ meror yayuḥ śīghraṁ dṛṣṭvā prārthayituṁ vibhum
उसके ये वचन सुनकर, अग्नि आदि देवगण उस प्रभु को देखकर उससे प्रार्थना करने के लिए शीघ्र ही मेरु की गुफा में गए।
श्लोक 30 (skanda.2.177.30)
तत्र दृष्ट्वा गुहालीनं देवेन्द्रं पाकशासनम् । तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैस्तद्वीर्यैर्लोकविश्रुतैः ॥
tatra dṛṣṭvā guhālīnaṁ devendraṁ pākaśāsanam tuṣṭuvurvividhaiḥ stotraistadvīryairlokaviśrutaiḥ
वहाँ गुफा में छिपे हुए देवराज इंद्र को देखकर, उन्होंने उनके लोकविख्यात पराक्रमों की विविध स्तुतियों से उनकी वंदना की —
श्लोक 31 (skanda.2.177.31)
इंद्र तुभ्यं नमस्तेऽस्तु सर्वदेवाऽधिपाय ते । वयं दैत्यैरर्दिताश्च त्वया हीना भृशार्दिताः ॥
indra tubhyaṁ namaste'stu sarvadevā'dhipāya te vayaṁ daityairarditāśca tvayā hīnā bhṛśārditāḥ
हे इंद्र, सर्वदेवों के अधिपति तुम्हें नमस्कार हो। हम दैत्यों से पीड़ित हैं, और तुम्हारे बिना अत्यंत संतप्त हैं।
श्लोक 32 (skanda.2.177.32)
स्थानभ्रष्टाश्चरामोंऽग नानादेशेषु दुःखिताः । तस्मादागत्य देवेन्द्र जहि शत्रूनरिंदम ॥
sthānabhraṣṭāścarāmoṅga nānādeśeṣu duḥkhitāḥ tasmādāgatya devendra jahi śatrūnarindama
हे प्रिय, अपने-अपने स्थानों से भ्रष्ट होकर हम विविध देशों में दुःखी होकर भटक रहे हैं। इसलिए हे देवेंद्र, हे शत्रुदमन, आइए और शत्रुओं का नाश कीजिए।
श्लोक 33 (skanda.2.177.33)
इति स्तुतस्तदा देवैर्निश्चक्राम गुहामुखात् । लज्जयाऽवनतो भूत्वा पश्यन्भूमिं च चक्षुषा ॥
iti stutastadā devairniścakrāma guhāmukhāt lajjayā'vanato bhūtvā paśyanbhūmiṁ ca cakṣuṣā
इस प्रकार देवों द्वारा स्तुति किए जाने पर, वह लज्जा से झुककर, अपनी आँखों से भूमि को देखते हुए, गुफा के द्वार से बाहर निकला।
श्लोक 34 (skanda.2.177.34)
न किंचिदपि चोवाच दुःखाद्गद्गदभाषणः । तं ज्ञात्वा धिषणः प्राह तं सुरेन्द्रं भयानकम् ॥
na kiñcidapi covāca duḥkhādgadgadabhāṣaṇaḥ taṁ jñātvā dhiṣaṇaḥ prāha taṁ surendraṁ bhayānakam
दुःख से गद्गद होकर वह कुछ भी नहीं बोल सका। उसकी दशा जानकर धिषण ने उस भयभीत सुरेंद्र से कहा —
श्लोक 35 (skanda.2.177.35)
मा शंका ते सुरपते कर्माधीनमिदं जगत् । मानामानौ सुखं दुःखं लाभालाभौ जयाजयौ ॥
mā śaṅkā te surapate karmādhīnamidaṁ jagat mānāmānau sukhaṁ duḥkhaṁ lābhālābhau jayājayau
हे सुरपते, तुम्हें कोई शंका नहीं करनी चाहिए — यह जगत् कर्म के ही अधीन है। मान-अपमान, सुख-दुःख, लाभ-हानि, जय-पराजय —
श्लोक 36 (skanda.2.177.36)
पूर्वकर्मानुरोधेन भवंत्येते न संशयः । जीवः कर्मानुगो दुःखं दिष्टं दैवेन कालतः ॥
pūrvakarmānurodhena bhavantyete na saṁśayaḥ jīvaḥ karmānugo duḥkhaṁ diṣṭaṁ daivena kālataḥ
ये सब पूर्वकर्म के अनुसार ही होते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। जीव कर्म का ही अनुगामी है, और उसका दुःख दैव तथा काल द्वारा निर्धारित है।
श्लोक 37 (skanda.2.177.37)
प्राज्ञाः प्रायो न शोचंति न प्रहृष्यंति वै सुखात् । तस्मात्प्रारब्धतः प्राप्तं दुःखं चेदं तव प्रभो ॥
prājñāḥ prāyo na śocanti na prahṛṣyanti vai sukhāt tasmātprārabdhataḥ prāptaṁ duḥkhaṁ cedaṁ tava prabho
बुद्धिमान पुरुष प्रायः न तो शोक करते हैं, न सुख से हर्षित होते हैं। अतः हे प्रभो, यह दुःख भी तुम्हें प्रारब्ध से ही प्राप्त हुआ है।
श्लोक 38 (skanda.2.177.38)
तत्प्राप्य मघवन्दुःखं नैव शोचितुमर्हसि । इत्युक्तो गुरुणा चाह मघवानमराधिपान् ॥
tatprāpya maghavanduḥkhaṁ naiva śocitumarhasi ityukto guruṇā cāha maghavānamarādhipān
हे मघवन्, इस दुःख को पाकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए। गुरु द्वारा ऐसा कहे जाने पर मघवा (इंद्र) ने देवाधिपतियों से कहा —
श्लोक 39 (skanda.2.177.39)
इन्द्र उवाच । परस्त्रीसंगदोषेण बलं वीर्यं यशोऽमलम् । मंत्रशक्तिः शास्त्रशक्तिर्विद्याशक्तिश्च मानद ॥
indra uvāca parastrīsaṅgadoṣeṇa balaṁ vīryaṁ yaśo'malam mantraśaktiḥ śāstraśaktirvidyāśaktiśca mānada
इंद्र ने कहा — हे मानद, दूसरे की स्त्री के संग के दोष से मेरा बल, वीर्य, निर्मल यश, मंत्रशक्ति, शास्त्रशक्ति और विद्याशक्ति —
श्लोक 40 (skanda.2.177.40)
अभवन्नष्टवीर्यं मे तूष्णीं तेन वसाम्यहम् । पाकशासनवाक्यं तु श्रुत्वा स्वाचार्यसंयुताः ॥
abhavannaṣṭavīryaṁ me tūṣṇīṁ tena vasāmyaham pākaśāsanavākyaṁ tu śrutvā svācāryasaṁyutāḥ
सब कुछ नष्ट हो गया है। इसीलिए मैं चुपचाप रह रहा हूँ। इंद्र के इस वचन को सुनकर, अपने आचार्य सहित देवगण,
श्लोक 41 (skanda.2.177.41)
मंत्रयामासुरेकान्ते पुनस्तस्य बलाप्तये । तदा गुरुश्च तान्प्राह करुणं च विदुत्तमः ॥
mantrayāmāsurekānte punastasya balāptaye tadā guruśca tānprāha karuṇaṁ ca viduttamaḥ
एकांत में इंद्र के बल को पुनः प्राप्त करने के उपाय पर विचार करने लगे। तब उन विद्वानों में श्रेष्ठ गुरु ने करुणापूर्वक उन्हें कहा —
श्लोक 42 (skanda.2.177.42)
बृहस्पतिरुवाच । मासो वैशाखनामाऽयं प्रियो वै मधुघातिनः । सर्वाश्च तिथयः पुण्या मासेऽस्मिन्माधवप्रिये ॥
bṛhaspatiruvāca māso vaiśākhanāmā'yaṁ priyo vai madhughātinaḥ sarvāśca tithayaḥ puṇyā māse'sminmādhavapriye
बृहस्पति ने कहा — यह वैशाख नाम का मास मधु-असुर के संहारक (विष्णु) को अत्यंत प्रिय है, और इस माधवप्रिय मास की सभी तिथियाँ पुण्यमय हैं।
श्लोक 43 (skanda.2.177.43)
तत्राऽपि च सिते पक्षे मासेऽस्मिन्नक्षयाह्वया । या तस्यां स्नानदानादि श्रद्धया च करोति वै ॥
tatrā'pi ca site pakṣe māse'sminnakṣayāhvayā yā tasyāṁ snānadānādi śraddhayā ca karoti vai
उनमें भी इस मास के शुक्ल पक्ष में 'अक्षया' नामक तिथि है। जो इस तिथि में स्नान-दान आदि श्रद्धापूर्वक करता है,
श्लोक 44 (skanda.2.177.44)
तस्य पापसहस्राणि नश्यंत्येव न संशयः । अनवद्यं तथैश्वर्यं बलं धैर्यं भवंति च ॥
tasya pāpasahasrāṇi naśyantyeva na saṁśayaḥ anavadyaṁ tathaiśvaryaṁ balaṁ dhairyaṁ bhavanti ca
उसके हजारों पाप निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं। तथा उसे निर्दोष ऐश्वर्य, बल और धैर्य भी प्राप्त होता है।
श्लोक 45 (skanda.2.177.45)
तस्मात्तस्यां तृतीयायां हरिणा बलविद्विषा । स्नानदानादिसद्धर्मान्कारयामो हिताऽऽप्तये ॥
tasmāttasyāṁ tṛtīyāyāṁ hariṇā balavidviṣā snānadānādisaddharmānkārayāmo hitā'ptaye
अतः बल के शत्रु हरि की उस तृतीया तिथि पर, हित की प्राप्ति के लिए, हम इस स्नान-दान आदि सद्धर्म का पालन कराते हैं।
श्लोक 46 (skanda.2.177.46)
भविष्यति च सा शक्तिर्विद्याया मन्त्रशास्त्रयोः । बलं धैर्यं यशश्चैव यथापूर्वं भविष्यति ॥
bhaviṣyati ca sā śaktirvidyāyā mantraśāstrayoḥ balaṁ dhairyaṁ yaśaścaiva yathāpūrvaṁ bhaviṣyati
इससे विद्या, मंत्र और शास्त्र की वह शक्ति पुनः प्राप्त होगी, और बल, धैर्य तथा यश भी पूर्ववत् प्राप्त हो जाएँगे।
श्लोक 47 (skanda.2.177.47)
इत्येवं तु विचार्याथ गुरुर्देवैः समाहितः । इन्द्रेण कारयामास धर्मानेतान्हरिप्रियान् ॥
ityevaṁ tu vicāryātha gururdevaiḥ samāhitaḥ indreṇa kārayāmāsa dharmānetānharipriyān
इस प्रकार विचार कर, देवों सहित गुरु ने इंद्र से हरि को प्रिय इन धर्मों का पालन कराया —
श्लोक 48 (skanda.2.177.48)
अक्षय्यायां तृतीयायां भुक्तिमुक्तिफलप्रदान् । तेन पूर्ववदेवाऽऽसीद्बलं धैर्यादिकं विभोः ॥
akṣayyāyāṁ tṛtīyāyāṁ bhuktimuktiphalapradān tena pūrvavadevā'sīdbalaṁ dhairyādikaṁ vibhoḥ
अक्षय तृतीया के दिन, जो भोग और मोक्ष दोनों का फल देने वाले धर्म हैं। इससे उस प्रभु का बल, धैर्य आदि पूर्ववत् हो गया,
श्लोक 49 (skanda.2.177.49)
परस्त्रीसंगदोषोऽपि सद्य एव व्यलीयत । पश्चाद्धताशुभः शक्रो राहोर्मुक्त इवोडुपः ॥
parastrīsaṅgadoṣo'pi sadya eva vyalīyata paścāddhatāśubhaḥ śakro rāhormukta ivoḍupaḥ
और दूसरे की स्त्री के संग का दोष भी तत्काल ही विलीन हो गया। तत्पश्चात्, अशुभ को नष्ट कर, इंद्र राहु से मुक्त हुए चंद्रमा के समान चमक उठे,
श्लोक 50 (skanda.2.177.50)
देवतानां तथा मध्ये शुशुभे च हरिर्यथा । पश्चाद्देवैः समायुक्तो विनिर्जित्य तथाऽसुरान् ॥
devatānāṁ tathā madhye śuśubhe ca harir yathā paścāddevaiḥ samāyukto vinirjitya tathā'surān
तथा देवताओं के बीच हरि (इंद्र) की भाँति शोभित होने लगे। फिर देवों के साथ मिलकर, असुरों को पूरी तरह पराजित करके,
श्लोक 51 (skanda.2.177.51)
तृतीयायाश्च माहात्म्याद्भाग्ययुक्तोऽमरावतीम् । विवेश विभवैः सार्द्धं शंखतूर्यादिनिःस्वनैः ॥
tṛtīyāyāśca māhātmyādbhāgyayukto'marāvatīm viveśa vibhavaiḥ sārddhaṁ śaṅkhatūryādiniḥsvanaiḥ
तृतीया के माहात्म्य से भाग्यशाली होकर, शंख और तुरही आदि की ध्वनियों के साथ, समस्त वैभव सहित इंद्र ने अमरावती में प्रवेश किया।
श्लोक 52 (skanda.2.177.52)
अनुज्ञाताश्च शक्रेण स्वधामानि ययुः सुराः । ततस्ते यज्ञभागांश्च लेभिरे च यथा पुरा ॥
anujñātāśca śakreṇa svadhāmāni yayuḥ surāḥ tataste yajñabhāgāṁśca lebhire ca yathā purā
शक्र (इंद्र) से अनुमति पाकर देवगण अपने-अपने धामों को चले गए। फिर उन्होंने पूर्ववत् यज्ञ-भाग प्राप्त किए,
श्लोक 53 (skanda.2.177.53)
पिंडभागांश्च पितरो यथापूर्वं प्रपेदिरे । स्वाध्याये मुनयस्तुष्टा दैत्यानां च पराजयः ॥
piṇḍabhāgāṁśca pitaro yathāpūrvaṁ prapedire svādhyāye munayastuṣṭā daityānāṁ ca parājayaḥ
पितरों ने भी पूर्ववत् अपने पिंड-भाग प्राप्त किए, मुनि लोग स्वाध्याय में संतुष्ट हो गए, और दैत्यों की पराजय हुई।
श्लोक 54 (skanda.2.177.54)
तदा प्रभृति लोकेऽस्मिंस्तृतीया चाऽक्षयाऽऽह्वया । प्रख्याता सर्वलोकेषु देवर्षिपितृतुष्टिदा ॥
tadā prabhṛti loke'sminstṛtīyā cā'kṣayā'hvayā prakhyātā sarvalokeṣu devarṣipitṛtuṣṭidā
तभी से इस लोक में यह अक्षया नामक तृतीया, देवों, ऋषियों और पितरों को संतोष देने वाली, सभी लोकों में प्रसिद्ध हो गई।
श्लोक 55 (skanda.2.177.55)
तस्मात्पुण्यतमा चैषा सर्वकर्मनिकृंतनी । भुक्तिमुक्तिप्रदा नृणां तृतीया चाऽक्षयाऽऽह्वया ॥
tasmātpuṇyatamā caiṣā sarvakarmanikṛntanī bhuktimuktipradā nṛṇāṁ tṛtīyā cā'kṣayā'hvayā
इसीलिए यह अक्षया तृतीया अत्यंत पुण्यमय, सभी कर्म-बंधनों को काटने वाली, तथा मनुष्यों को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाली है।