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वैष्णव खण्ड · अध्याय 178

शुनीमोक्षप्राप्तिः — कुतिया की मोक्ष-प्राप्ति की कथा

अध्याय 177अध्याय-सूचीअध्याय 179

श्लोक 1 (skanda.2.178.1)

श्रुतदेव उवाच । तिथिष्वेतासु पुण्यासु द्वादशी सितपक्षिणी । वैशाखमासे राजेंद्र सर्वाघौघविनाशिनी ॥

śrutadeva uvāca tithiṣvetāsu puṇyāsu dvādaśī sitapakṣiṇī vaiśākhamāse rājendra sarvāghaughavināśinī

श्रुतदेव ने कहा — इन पुण्य तिथियों में, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी, हे राजेंद्र, समस्त पापों के समूह का नाश करने वाली है।

श्लोक 2 (skanda.2.178.2)

किं दानैः किं तपोभिश्च किमुपोष्यैर्व्रतैश्च किम् । किमिष्टैश्चैव पूर्तैश्च द्वादशी यैर्न सेविता ॥

kiṁ dānaiḥ kiṁ tapobhiśca kimupoṣyairvrataiśca kim kimiṣṭaiścaiva pūrtaiśca dvādaśī yairna sevitā

जिनके द्वारा यह द्वादशी नहीं मनाई गई, उनके दानों से क्या लाभ, तपस्याओं से क्या, उपवास-व्रतों से क्या, तथा यज्ञों और सार्वजनिक पुण्यकार्यों से भी क्या लाभ?

श्लोक 3 (skanda.2.178.3)

गंगायामुपरागे तु यो दद्याद्गोसहस्रकम् । तत्फलं समवाप्नोति प्रातः स्नात्वा हरेर्दिने ॥

gaṅgāyāmuparāge tu yo dadyādgosahasrakam tatphalaṁ samavāpnoti prātaḥ snātvā harerdine

सूर्यग्रहण के समय गंगा में जो एक हजार गायों का दान करता है, उतना ही फल इस हरि-दिवस को प्रातः स्नान करके प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.2.178.4)

यद्दत्तं चाऽर्हते चाऽन्नं द्वादश्यां च सिते शुभे । सिक्थेसिक्थे भवेत्तस्य कोटिब्राह्मणभोजनम् ॥

yaddattaṁ cā'rhate cā'nnaṁ dvādaśyāṁ ca site śubhe siktheikthe bhavettasya koṭibrāhmaṇabhojanam

शुभ शुक्ल द्वादशी को जो अन्न किसी योग्य पात्र को दिया जाता है, उसके एक-एक कण में करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराने का फल निहित होता है।

श्लोक 5 (skanda.2.178.5)

यो दद्यात्तिलपात्रं तु द्वादश्यां मधुसंयुतम् । निर्धूताऽखिलबंधस्तु विष्णुलोके महीयते ॥

yo dadyāttilapātraṁ tu dvādaśyāṁ madhusaṁyutam nirdhūtā'khilabandhastu viṣṇuloke mahīyate

जो द्वादशी को मधु-मिश्रित तिल का पात्र दान करता है, वह समस्त बंधनों से मुक्त होकर विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 6 (skanda.2.178.6)

एकादश्यां सिते पक्षे कुर्य्याज्जागरणं हरेः । स जीवन्नेव मुक्तः स्यात्तुष्टाः स्युः सर्वदेवताः ॥

ekādaśyāṁ site pakṣe kuryyājjāgaraṇaṁ hareḥ sa jīvanneva muktaḥ syāttuṣṭāḥ syuḥ sarvadevatāḥ

जो शुक्ल पक्ष की एकादशी को हरि के लिए रात्रि-जागरण करता है, वह जीवित रहते हुए ही मुक्त हो जाता है, और सभी देवता उससे प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 7 (skanda.2.178.7)

कोटींदुसूर्यग्रहणे तीर्थान्युत्प्लाव्य यत्फलम् । तत्फलं समवाप्नोति प्रातः स्नात्वा हरेर्दिने ॥

koṭīndusūryagrahaṇe tīrthānyutplāvya yatphalam tatphalaṁ samavāpnoti prātaḥ snātvā harerdine

करोड़ों चंद्र और सूर्य ग्रहणों में सभी तीर्थों में स्नान करने से जो फल मिलता है, वही फल इस हरि-दिवस को प्रातः स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 8 (skanda.2.178.8)

तुलस्याः कोमलैः पत्रैर्द्वादश्यां विष्णुमर्चयेत् । समस्तकुलमुद्धृत्य विष्णुलोकाऽधिपो भवेत् ॥

tulasyāḥ komalaiḥ patrairdvādaśyāṁ viṣṇumarcayet samastakulamuddhṛtya viṣṇulokā'dhipo bhavet

द्वादशी को तुलसी के कोमल पत्तों से विष्णु का पूजन करने वाला अपने संपूर्ण कुल का उद्धार करके विष्णुलोक का स्वामी बनता है।

श्लोक 9 (skanda.2.178.9)

तुलसीपत्रपुष्पैश्च वैशाखेऽश्वत्थपूजनम् । पुष्पाद्यभावे धान्यैर्वा पूजयेन्मधुसूदनम् ॥

tulasīpatrapuṣpaiśca vaiśākhe'śvatthapūjanam puṣpādyabhāve dhānyairvā pūjayenmadhusūdanam

वैशाख में तुलसी के पत्तों और फूलों से अश्वत्थ (पीपल) की पूजा करनी चाहिए। फूल आदि न हों तो अन्न से ही मधुसूदन की पूजा करे। (टिप्पणी: मूल स्रोत-पाठ में इस श्लोक को 'क्षेपकः' अर्थात् एक प्रक्षिप्त/परवर्ती जोड़ा गया पाठ माना गया है।)

श्लोक 10 (skanda.2.178.10)

यमं पितॄन्गुरून्देवान्विष्णुमुद्दिश्य मानवः । माधवे शुक्लद्वादश्यां सोदकुंभं सदक्षिणम् ॥

yamaṁ pitṝngurūndevānviṣṇumuddiśya mānavaḥ mādhave śukladvādaśyāṁ sodakuṁbhaṁ sadakṣiṇam

यम, पितरों, गुरुओं, देवों और विष्णु को उद्देश्य कर मनुष्य माधव मास की शुक्ल द्वादशी को जल के कलश और दक्षिणा सहित,

श्लोक 11 (skanda.2.178.11)

दध्यन्नं चैव यो दद्यात्तस्य पुण्यफलं शृणु । प्रयागे प्रत्यहं चैव कुर्याद्यः कोटिभोजनम् ॥

dadhyannaṁ caiva yo dadyāttasya puṇyaphalaṁ śṛṇu prayāge pratyahaṁ caiva kuryādyaḥ koṭibhojanam

दही-भात का दान करता है, उसके पुण्य-फल को सुनो। जो प्रयाग में प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मणों को भोजन कराता हो,

श्लोक 12 (skanda.2.178.12)

यावत्संवत्सरं पुण्यं षड्रसान्नैर्मनोरमैः । तत्फलं समवाप्नोति मधुशासनशासनात् ॥

yāvatsaṁvatsaraṁ puṇyaṁ ṣaḍrasānnairmanoramaiḥ tatphalaṁ samavāpnoti madhuśāsanaśāsanāt

पूरे वर्ष भर, मनोहर छहों रसों वाले अन्न से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही फल मधु के शासक (विष्णु) के आदेश से इस एक दिन में मिल जाता है।

श्लोक 13 (skanda.2.178.13)

शालिग्रामशिलादानं यः कुर्याद्द्वादशीदिने । वैशाखे शुक्लपक्षे तु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

śāligrāmaśilādānaṁ yaḥ kuryāddvādaśīdine vaiśākhe śuklapakṣe tu sarvapāpaiḥ pramucyate

जो वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को शालिग्राम-शिला का दान करता है, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 14 (skanda.2.178.14)

द्वादश्यां पयसा यस्तु स्नापयेन्मधुसूदनम् । राजसूयाऽश्वमेधाभ्यां यत्फलं परिजायते ॥

dvādaśyāṁ payasā yastu snāpayenmadhusūdanam rājasūyā'śvamedhābhyāṁ yatphalaṁ parijāyate

जो द्वादशी को दूध से मधुसूदन को स्नान कराता है, उसे राजसूय और अश्वमेध यज्ञों के समान फल प्राप्त होता है।

श्लोक 15 (skanda.2.178.15)

त्रयोदश्यां यजेद्विष्णुं पयोदधिविमिश्रितैः । शर्करामधुभिर्द्रव्यैर्मधुसूदनप्रीतये ॥

trayodaśyāṁ yajedviṣṇuṁ payodadhivimiśritaiḥ śarkarāmadhubhirdravyairmadhusūdanaprītaye

त्रयोदशी को मधुसूदन की प्रसन्नता के लिए दूध, दही, शक्कर और मधु मिश्रित द्रव्यों से विष्णु का पूजन करना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.2.178.16)

तत्फलं समवाप्नोति गंगायां नाऽत्र संशयः । पंचामृतैश्च यो विष्णुं भक्त्या संस्नापयेद्विभुम् ॥

tatphalaṁ samavāpnoti gaṅgāyāṁ nā'tra saṁśayaḥ pañcāmṛtaiśca yo viṣṇuṁ bhaktyā saṁsnāpayedvibhum

इससे गंगा में स्नान के समान फल प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। और जो भक्तिपूर्वक पंचामृत से सर्वव्यापी विष्णु को स्नान कराता है,

श्लोक 17 (skanda.2.178.17)

स सर्वकुलमुद्धृत्य विष्णुलोके महीयते । यो दद्यात्पानकं ह्यस्यां सायाह्ने प्रीतये हरेः ॥

sa sarvakulamuddhṛtya viṣṇuloke mahīyate yo dadyātpānakaṁ hyasyāṁ sāyāhne prītaye hareḥ

वह अपने संपूर्ण कुल का उद्धार करके विष्णुलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस त्रयोदशी को संध्या के समय हरि की प्रसन्नता के लिए शर्बत का दान करता है,

श्लोक 18 (skanda.2.178.18)

जीर्णपापं जहात्याशु जीर्णां त्वचमिवोरगः । सायाह्ने चैव यो दद्यादुर्वारुकरसायनम् ॥

jīrṇapāpaṁ jahātyāśu jīrṇāṁ tvacamivoragaḥ sāyāhne caiva yo dadyādurvārukarasāyanam

अपने जीर्ण पापों को तुरंत त्याग देता है, जैसे सर्प अपनी पुरानी केंचुली त्याग देता है। और जो संध्या के समय ककड़ी के रस का दान करता है,

श्लोक 19 (skanda.2.178.19)

भवेन्मुक्तः कर्मबंधादुर्वारुकरसायनात् । इक्षुदण्डं चूतफलं दद्याद्द्राक्षाफलानि च ॥

bhavenmuktaḥ karmabandhādurvārukarasāyanāt ikṣudaṇḍaṁ cūtaphalaṁ dadyāddrākṣāphalāni ca

वह ककड़ी के रस के दान से कर्म-बंधन से मुक्त हो जाता है। जो गन्ने की डंडी, आम का फल और अंगूर का फल दान करे,

श्लोक 20 (skanda.2.178.20)

न विच्छित्तिः संततेः स्यात्तस्य वै शतपूरुषम् । यो दद्याद्गंधलेपं तु सायाह्ने द्वादशीदिने ॥

na vicchittiḥ saṁtateḥ syāttasya vai śatapūruṣam yo dadyādgandhalepaṁ tu sāyāhne dvādaśīdine

उसके वंश का सौ पीढ़ियों तक विच्छेद नहीं होता। जो द्वादशी के दिन संध्या समय सुगंधित लेप का दान करता है,

श्लोक 21 (skanda.2.178.21)

बाह्योपघातैः सकलैर्मुच्यते नाऽत्र संशयः । यत्किंचित्कुरुते पुण्यं द्वादश्यां राजसत्तम ॥

bāhyopaghātaiḥ sakalairmucyate nā'tra saṁśayaḥ yatkiñcitkurute puṇyaṁ dvādaśyāṁ rājasattama

वह सभी बाहरी आघातों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। हे राजसत्तम, द्वादशी को जो भी थोड़ा-सा पुण्य किया जाता है,

श्लोक 22 (skanda.2.178.22)

माधवे तु सिते पक्षे तदक्षय्यफलं भवेत् । प्रख्यातिमस्या वक्ष्यामि येन जातेति भूमिप ॥

mādhave tu site pakṣe tadakṣayyaphalaṁ bhavet prakhyātimasyā vakṣyāmi yena jāteti bhūmipa

वैशाख के शुक्ल पक्ष में वह अक्षय फल देने वाला हो जाता है। हे राजन्, अब मैं बताता हूँ कि इसकी प्रसिद्धि किस कारण से हुई,

श्लोक 23 (skanda.2.178.23)

सर्वेषां सर्वपापघ्नीं सर्वमंगलदायिनीम् । पुरा काश्मीरदेशे तु द्विजो देवव्रताऽऽह्वयः ॥

sarveṣāṁ sarvapāpaghnīṁ sarvamaṅgaladāyinīm purā kāśmīradeśe tu dvijo devavratā'hvayaḥ

वह सबके सर्वपाप-नाशक और सर्वमंगलदायी है। पूर्वकाल में काश्मीर देश में देवव्रत नामक एक ब्राह्मण था।

श्लोक 24 (skanda.2.178.24)

तस्याऽऽसीन्मालिनी नाम तनया चारुरूपिणी । ददौ तां सत्यशीलाय विप्रवर्याय धीमते ॥

tasyā'sīnmālinī nāma tanayā cārurūpiṇī dadau tāṁ satyaśīlāya vipravarāya dhīmate

उसकी मालिनी नामक एक सुंदर रूप वाली पुत्री थी। उसने उसे बुद्धिमान, सत्यशील नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण को दे दिया।

श्लोक 25 (skanda.2.178.25)

तामुद्वाह्य ययौ धीमान्स्वदेशं यवनाऽऽह्वयम् । रूपयौवनसंपन्ना तस्य नैव प्रियाऽभवत् ॥

tāmudvāhya yayau dhīmānsvadeśaṁ yavanā'hvayam rūpayauvanasaṁpannā tasya naiva priyā'bhavat

उससे विवाह करके वह बुद्धिमान अपने यवन नामक देश को चला गया। रूप और यौवन से संपन्न होते हुए भी वह उसकी प्रिय नहीं बनी।

श्लोक 26 (skanda.2.178.26)

सदा विद्वेषसंयुक्तस्तस्यां तिष्ठति निष्ठुरः । नाऽन्यस्य कस्यचिद्द्वेष्टि तां विना नृपते पतिः ॥

sadā vidveṣasaṁyuktastasyāṁ tiṣṭhati niṣṭhuraḥ nā'nyasya kasyacidveṣṭi tāṁ vinā nṛpate patiḥ

वह सदा उसके प्रति द्वेषभाव से रहता, कठोर व्यवहार करता। हे राजन्, उसका पति उसके अतिरिक्त और किसी से द्वेष नहीं करता था।

श्लोक 27 (skanda.2.178.27)

तस्मिन्सा क्रोधसंयुक्ता वशीकरणलंपटा । अपृच्छत्प्रमदा राजन्यास्त्यक्ताः पतिभिः पुरा ॥

tasminsā krodhasaṁyuktā vaśīkaraṇalampaṭā apṛcchatpramadā rājanyāstyaktāḥ patibhiḥ purā

उस पर क्रुद्ध होकर वह वशीकरण की लालसा से भर गई। हे राजन्, उसने उन स्त्रियों से पूछा जो पहले अपने पतियों द्वारा त्यागी जा चुकी थीं।

श्लोक 28 (skanda.2.178.28)

ताभिरुक्ता तु सा भूप वश्यो भर्त्ता भविष्यति । अस्माकं प्रत्ययो जातो भर्तृत्यागावमानिनाम् ॥

tābhiruktā tu sā bhūpa vaśyo bharttā bhaviṣyati asmākaṁ pratyayo jāto bhartṛtyāgāvamāninām

हे राजन्, उन्होंने उससे कहा — तेरा पति वश में आ जाएगा। हम स्वयं, जो पतियों द्वारा त्यागी और अपमानित थीं, इस पर विश्वास कर चुकी हैं।

श्लोक 29 (skanda.2.178.29)

प्रयुज्य भेषजं वश्यं नीता हि पतयः पुरा । योगिनीं त्वं तु गच्छाऽद्य दास्यते भेषजं शुभम् ॥

prayujya bheṣajaṁ vaśyaṁ nītā hi patayaḥ purā yoginīṁ tvaṁ tu gacchā'dya dāsyate bheṣajaṁ śubham

पूर्वकाल में एक वशीकरण औषधि का प्रयोग कर पतियों को वश में लाया गया था। तू आज ही किसी योगिनी के पास जा, वह तुझे शुभ औषधि देगी।

श्लोक 30 (skanda.2.178.30)

न विकल्पस्त्वया कार्यो भविता दासवत्पतिः । योगिनीमंदिरे गत्वा तासां वाक्येन भूपते ॥

na vikalpastvayā kāryo bhavitā dāsavatpatiḥ yoginīmandire gatvā tāsāṁ vākyena bhūpate

तुझे कोई संदेह नहीं करना चाहिए — तेरा पति दास के समान हो जाएगा। हे राजन्, उनके वचन से वह योगिनी के मंदिर में जाकर,

श्लोक 31 (skanda.2.178.31)

प्रसादमतुलं तस्या लेभे दुश्चारिणी सती । शतस्तंभसमायुक्तां कुटीं भेजे त्वरान्विता ॥

prasādamatulaṁ tasyā lebhe duścāriṇī satī śatastambhasamāyuktāṁ kuṭīṁ bheje tvarānvitā

और वह दुश्चारिणी स्त्री उसकी अतुलनीय कृपा को प्राप्त हुई। शीघ्रतापूर्वक वह सौ खंभों वाली कुटिया में पहुँची,

श्लोक 32 (skanda.2.178.32)

सुविस्तृतां सुवर्चस्कां तथैवाऽयातयामिकाम् । प्रावृता दीर्घवस्त्रेण सन्निधिं तेन योगिनी ॥

suvistṛtāṁ suvarcaskāṁ tathaivā'yātayāmikām prāvṛtā dīrghavastreṇa sannidhiṁ tena yoginī

जो अत्यंत विस्तृत, तेजस्वी और सदा ताजी लगती थी। लंबे वस्त्र से ढकी हुई वह योगिनी वहाँ उपस्थित थी,

श्लोक 33 (skanda.2.178.33)

दीर्घाभिश्च सटाभिस्तु प्रावृता दीप्तिसंयुता । परिचारसमोपेता वीक्षमाणा शनैःशनैः ॥

dīrghābhiśca saṭābhistu prāvṛtā dīptisaṁyutā paricārasamopetā vīkṣamāṇā śanaiḥśanaiḥ

जो अपनी लंबी जटाओं से ढकी हुई, कांतिमान, परिचारिकाओं से युक्त थी, और धीरे-धीरे चारों ओर देख रही थी,

श्लोक 34 (skanda.2.178.34)

अक्षसूत्रकरा सा तु जपंती प्रार्थिता तया । ददौ वश्यकरं मंत्रं क्षोभकं प्रत्ययात्मकम् ॥

akṣasūtrakarā sā tu japantī prārthitā tayā dadau vaśyakaraṁ mantraṁ kṣobhakaṁ pratyayātmakam

जपमाला हाथ में लिए हुए, जप करते हुए। उससे प्रार्थना किए जाने पर, उसने वश में करने वाला, विचलित करने वाला, विश्वासकारी मंत्र प्रदान किया।

श्लोक 35 (skanda.2.178.35)

ततः सा प्रणता भूत्वा दद्याद्द्रव्यांऽगुलीयकम् । वज्रमाणिक्यसंयुक्तमतिरक्तप्रभान्वितम् ॥

tataḥ sā praṇatā bhūtvā dadyāddravyāṅgulīyakam vajramāṇikyasaṁyuktamatiraktaprabhānvitam

तब उसने नतमस्तक होकर एक बहुमूल्य अँगूठी भेंट की, जो हीरे और माणिक्य से जड़ी हुई, अत्यंत लाल प्रभा वाली थी,

श्लोक 36 (skanda.2.178.36)

मृदुकांचनसंयुक्तं भानुरश्मिसमद्युति । ततो दृष्ट्वा तु संतुष्टा पादस्थं चांगुलीयकम् ॥

mṛdukāñcanasaṁyuktaṁ bhānuraśmisamadyuti tato dṛṣṭvā tu saṁtuṣṭā pādasthaṁ cāṅgulīyakam

मुलायम सोने से जड़ित, सूर्य-किरणों के समान चमकीली। यह अँगूठी उसके पैरों में रखी देखकर वह प्रसन्न हुई,

श्लोक 37 (skanda.2.178.37)

हृदयं च तया ज्ञातं तत्पतेरवमानजम् । तदोक्ता हि तया भूप तापस्याहितयुक्तया ॥

hṛdayaṁ ca tayā jñātaṁ tatpaterāvamānajam tadoktā hi tayā bhūpa tāpasyāhitayuktayā

और उसने उसके हृदय की, अपने पति द्वारा किए गए अपमान से उत्पन्न पीड़ा को समझ लिया। हे राजन्, तब उस अहितकारी तापसी ने उससे कहा —

श्लोक 38 (skanda.2.178.38)

चूर्णो रक्षान्वितो ह्येष सर्वभूतवशंकरः । चूर्णं भर्तरि संयुज्य रक्षां ग्रीवाश्रयां कुरु ॥

cūrṇo rakṣānvito hyeṣa sarvabhūtavaśaṁkaraḥ cūrṇaṁ bhartari saṁyujya rakṣāṁ grīvāśrayāṁ kuru

यह चूर्ण रक्षा-कवच से युक्त है, सभी प्राणियों को वश में करने वाला है। इस चूर्ण को अपने पति को दे, और एक कवच अपने गले में धारण कर।

श्लोक 39 (skanda.2.178.39)

भविष्यति पतिर्वश्यो नाऽन्यां यास्यति सुन्दरीम् । नाऽप्रियं वदति क्वाऽपि दुश्चारिण्यास्तवाऽपि च ॥

bhaviṣyati patirvaśyo nā'nyāṁ yāsyati sundarīm nā'priyaṁ vadati kvā'pi duścāriṇyāstavā'pi ca

तेरा पति वश में हो जाएगा, वह किसी अन्य सुंदरी के पास नहीं जाएगा। वह हे दुश्चारिणी, तुझसे भी कभी अप्रिय वचन नहीं कहेगा।

श्लोक 40 (skanda.2.178.40)

चूर्णरक्षां गृहीत्वा सा प्राप भर्तृगृहं पुनः । प्रदोषे पयसा युक्तश्चूर्णो भर्तरि योजितः ॥

cūrṇarakṣāṁ gṛhītvā sā prāpa bhartṛgṛhaṁ punaḥ pradoṣe payasā yuktaścūrṇo bhartari yojitaḥ

वह चूर्ण और रक्षा-कवच लेकर पुनः अपने पति के घर पहुँची। संध्या के समय दूध में मिलाकर वह चूर्ण अपने पति को दिया गया।

श्लोक 41 (skanda.2.178.41)

ग्रीवायां हि कृता रक्षा न विचारः कृतस्तया । तदा स पीतचूर्णस्तु भर्त्ता नृपवरोत्तम ॥

grīvāyāṁ hi kṛtā rakṣā na vicāraḥ kṛtastayā tadā sa pītacūrṇastu bharttā nṛpavarottama

गले में कवच धारण कर, उसने कोई विचार नहीं किया। हे नृपश्रेष्ठ, उस चूर्ण को पीने वाले उसके पति की तब,

श्लोक 42 (skanda.2.178.42)

तच्चूर्णात्क्षयरोगोऽभूत्पतिः क्षीणो दिनेदिने । गुह्ये तु कृमयो जाता घोरा दुष्टव्रणोद्भवाः ॥

taccūrṇātkṣayarogo'bhūtpatiḥ kṣīṇo dinedine guhye tu kṛmayo jātā ghorā duṣṭavraṇodbhavāḥ

उस चूर्ण से उसके पति को क्षयरोग हो गया, वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होता गया। उसके गुह्य अंग में भयंकर, दुष्ट व्रणों से उत्पन्न कीड़े पड़ गए।

श्लोक 43 (skanda.2.178.43)

दिनैः कतिपयै राजन्पत्युर्नैव व्यवस्थितिः । उवास स्वेच्छया साऽपि पुंश्चली दुष्टचारिणी ॥

dinaiḥ katipayai rājanpatyurnaiva vyavasthitiḥ uvāsa svecchayā sā'pi puṁścalī duṣṭacāriṇī

हे राजन्, कुछ ही दिनों में पति की स्थिति असामान्य हो गई। और वह दुराचारिणी, वेश्यावृत्ति में लीन स्त्री स्वेच्छाचार से रहने लगी।

श्लोक 44 (skanda.2.178.44)

हततेजास्ततो भर्ता तामुवाचाऽऽकुलेन्द्रियः । क्रन्दमानो दिवारात्रौ दासोऽस्मि तव शोभने ॥

hatatejāstato bharttā tāmuvācā'kulendriyaḥ krandamāno divārātrau dāso'smi tava śobhane

तेजोहीन हुए उसके पति ने, इंद्रियों में व्याकुल होकर उससे कहा, दिन-रात रोते हुए — हे शोभने, मैं तेरा दास हूँ।

श्लोक 45 (skanda.2.178.45)

त्राहि मां शरणं प्राप्तं नेच्छेऽहमपरां स्त्रियम् । तत्तस्य विदितं ज्ञात्वा भीता सा मेदिनीपते ॥

trāhi māṁ śaraṇaṁ prāptaṁ nechhe'hamaparāṁ striyam tattasya viditaṁ jñātvā bhītā sā medinīpate

मैं तेरी शरण में आया हूँ, मुझे बचा। मैं किसी अन्य स्त्री की इच्छा नहीं रखता। हे राजन्, यह जानकर कि यह बात उसे ज्ञात हो गई है, वह भयभीत हो गई,

श्लोक 46 (skanda.2.178.46)

अलंकारकृते पत्युर्जीवनेच्छुर्न वै हिता । योगिनीं च ययौ शीघ्रं तस्यै सर्वं न्यवेदयत् ॥

alaṁkārakṛte patyurjīvanecchurna vai hitā yoginīṁ ca yayau śīghraṁ tasyai sarvaṁ nyavedayat

अपने आभूषणों के लिए, अपने पति के जीवित रहने की इच्छा से — यद्यपि वह वास्तव में हितकारी नहीं थी — वह शीघ्र ही योगिनी के पास गई और उसे सब कुछ बताया।

श्लोक 47 (skanda.2.178.47)

तया च भेषजं दत्तं द्वितीयं दाहशांतये । दत्ते च भेषजे तस्मिन्स्वस्थोऽभूत्तत्क्षणात्पतिः ॥

tayā ca bheṣajaṁ dattaṁ dvitīyaṁ dāhaśāntaye datte ca bheṣaje tasminsvastho'bhūttatkṣaṇātpatiḥ

उसने दाह को शांत करने के लिए दूसरी औषधि दी। वह औषधि दिए जाने पर पति तत्क्षण ही स्वस्थ हो गया।

श्लोक 48 (skanda.2.178.48)

तिष्ठत्युपपतिर्गेहे गृहकृत्याऽपदेशतः । सर्ववर्णसमुद्भूता जारास्तिष्ठंति वै गृहे ॥

tiṣṭhatyupapatirgehe gṛhakṛtyā'padeśataḥ sarvavarṇasamudbhūtā jārāstiṣṭhanti vai gṛhe

फिर भी, गृह-कार्य के बहाने से एक उपपति उसके घर में ही रहने लगा। सभी वर्णों में उत्पन्न व्यभिचारी उसके घर में आते-जाते रहते थे।

श्लोक 49 (skanda.2.178.49)

न किंचिद्वचने शक्तिर्भर्तुर्जाता कथंचन । ततस्तेनैव दोषेण सर्वांगेषु च जज्ञिरे ॥

na kiñcidvacane śaktirbharturjātā kathañcana tatastenaiva doṣeṇa sarvāṅgeṣu ca jajñire

पति की वाणी में कोई भी शक्ति नहीं रह गई थी। फिर उसी दोष के कारण उसके संपूर्ण अंगों में,

श्लोक 50 (skanda.2.178.50)

कृमयश्चास्थिभेत्तारः कालांतकयमोपमाः । तैर्नासाजिह्वयोश्चाऽऽसीच्छेदः कर्णद्वयस्य च ॥

kṛmayaścāsthibhettāraḥ kālāntakayamopamāḥ tairnāsājihvayoścā'sīcchedaḥ karṇadvayasya ca

बोन-भेदी कीड़े उत्पन्न हो गए, जो काल, अंतक और यम के समान भयंकर थे। उनके द्वारा उसकी नाक, जीभ और दोनों कान कट गए,

श्लोक 51 (skanda.2.178.51)

स्तनयोश्चांगुलीनां च पंगुत्वं चाऽपि चाऽऽगतम् । तेन पंचत्वमापन्ना गता नरकयातनाः ॥

stanayoścāṅgulīnāṁ ca paṅgutvaṁ cā'pi cā'gatam tena pañcatvamāpannā gatā narakayātanāḥ

तथा उसकी छाती और उँगलियों में भी लंगड़ापन आ गया। इस प्रकार उसकी मृत्यु हो गई, और वह नरक-यातना को प्राप्त हुआ।

श्लोक 52 (skanda.2.178.52)

ताम्रभांडे च सा दग्धाऽयुतानि दश पंच च । श्वानयोनिषु संजाता शतवारं पुनःपुनः ॥

tāmrabhāṇḍe ca sā dagdhā'yutāni daśa pañca ca śvānayoniṣu saṁjātā śatavāraṁ punaḥpunaḥ

और वह स्त्री ताम्रपात्र में पंद्रह हजार वर्षों तक जलाई गई। फिर वह बार-बार, सौ बार कुतिया की योनि में उत्पन्न हुई,

श्लोक 53 (skanda.2.178.53)

छिन्ननासा छिन्नकर्णा कृमिमूर्द्धा निरंतरम् । छिन्नपुच्छा भग्नपादा ताडिता च गृहेगृहे ॥

chinnanāsā chinnakarṇā kṛmimūrddhā nirantaram chinnapucchā bhagnapādā tāḍitā ca gṛhegṛhe

बिना नाक, बिना कान, सिर सदा कीड़ों से भरा हुआ, बिना पूँछ, टूटे पैरों वाली, और घर-घर में मार खाती हुई।

श्लोक 54 (skanda.2.178.54)

पश्चात्सौवीरदेशेषु पद्मबन्धोर्द्विजस्य च । दास्या गृहे शुनी जाता बहुदुःखसमाकुला ॥

paścātsauvīradeśeṣu padmabandhordvijasya ca dāsyā gṛhe śunī jātā bahuduḥkhasamākulā

फिर सौवीर देश में, ब्राह्मण पद्मबंधु की दासी के घर में, वह अत्यंत दुःखाकुल कुतिया बनकर पैदा हुई।

श्लोक 55 (skanda.2.178.55)

छिन्नकर्णा छिन्ननासा छिन्नपुच्छांघ्रिरातुरा । कृमिपूर्णशिरा नित्यं कृमियोनिश्च तिष्ठति ॥

chinnakarṇā chinnanāsā chinnapucchāṅghrirāturā kṛmipūrṇaśirā nityaṁ kṛmiyoniśca tiṣṭhati

बिना कान, बिना नाक, बिना पूँछ, पैरों से रोगग्रस्त, सिर सदा कीड़ों से भरा हुआ, और उसकी योनि भी सदा कीड़ों से भरी रहती थी।

श्लोक 56 (skanda.2.178.56)

एवं त्रिंशद्गता वर्षा अस्मिञ्जन्मनि भूमिप । दैवात्कर्मविपाकेन वैशाखे मेषगे रवौ ॥

evaṁ triṁśadgatā varṣā asmiñjanmani bhūmipa daivātkarmavipākena vaiśākhe meṣage ravau

हे राजन्, इस प्रकार इस जन्म में तीस वर्ष बीत गए। तब दैवयोग से, कर्म के फलस्वरूप, वैशाख में, जब सूर्य मेष राशि में था,

श्लोक 57 (skanda.2.178.57)

शुक्लपक्षे तु द्वादश्यां पद्मबंधोस्तनूद्भवः । नद्यां स्नात्वा शुचिर्भूत्वा सार्द्रवस्त्रो गृहं ययौ ॥

śuklapakṣe tu dvādaśyāṁ padmabaṁdhostanūdbhavaḥ nadyāṁ snātvā śucirbhūtvā sārdravastro gṛhaṁ yayau

शुक्ल पक्ष की द्वादशी को, पद्मबंधु का पुत्र, नदी में स्नान कर, पवित्र होकर, भीगे वस्त्रों सहित घर आया।

श्लोक 58 (skanda.2.178.58)

तुलसीवेदिकां प्राप्य पादाववनिजे निजौ । वेदिकायामधो देशे सा शुनी स्वापमागता ॥

tulasīvedikāṁ prāpya pādāvavanije nijau vedikāyāmadho deśe sā śunī svāpamāgatā

तुलसी की वेदिका पर पहुँचकर उसने अपने दोनों पैर धोए। उस वेदिका के नीचे वाले स्थान में वह कुतिया सोई हुई थी।

श्लोक 59 (skanda.2.178.59)

प्राक्सूर्योदयवेलायां पादोदकपरिप्लुता । सद्यो ध्वस्ताऽशुभा जाता जातिस्मृतिरभूत्क्षणात् ॥

prāksūryodayavelāyāṁ pādodakapariplutā sadyo dhvastā'śubhā jātā jātismṛtirabhūtkṣaṇāt

सूर्योदय से पहले उस समय, उसके चरण-प्रक्षालन के जल से भीगकर, वह तुरंत ही समस्त अशुभ से मुक्त हो गई, और उसी क्षण उसे पूर्वजन्म की स्मृति हो आई।

श्लोक 60 (skanda.2.178.60)

स्मृत्वा कर्म कृतं पूर्वं सा शुनी तापसं सदा । चुक्रोश करुणा दीना मुने त्राहीति वै पुनः ॥

smṛtvā karma kṛtaṁ pūrvaṁ sā śunī tāpasaṁ sadā cukrośa karuṇā dīnā mune trāhīti vai punaḥ

अपने पूर्वकर्म का स्मरण कर वह कुतिया करुणापूर्वक, दीन होकर उस तपस्वी को बार-बार पुकारने लगी — हे मुने, मेरी रक्षा करो!

श्लोक 61 (skanda.2.178.61)

स्वकर्म च मुनींद्राय स्मृत्वाचख्यौ भयाऽऽकुला । भर्तुर्विषप्रयोगं तु स्वस्य दुश्चरितं तथा ॥

svakarma ca munīndrāya smṛtvācakhyau bhayā'kulā bharturviṣaprayogaṁ tu svasya duścaritaṁ tathā

भय से व्याकुल होकर उसने अपने कर्म का स्मरण करते हुए उस मुनिश्रेष्ठ के पुत्र से सब कुछ कह सुनाया — अपने पति पर किए गए विष-प्रयोग को, और अपने स्वयं के दुराचार को भी।

श्लोक 62 (skanda.2.178.62)

याऽन्यापि युवती ब्रह्मन्भर्तुर्वश्यं समाचरेत् । वृथाधर्मा दुराचारा पच्यते ताम्रभाजने ॥

yā'nyāpi yuvatī brahmanbharturvaśyaṁ samācaret vṛthādharmā durācārā pacyate tāmrabhājane

हे ब्रह्मन्, जो भी अन्य युवती अपने पति को वश में करने का प्रयत्न करे, वह व्यर्थ धर्म वाली, दुराचारिणी स्त्री ताम्रपात्र में पकाई जाती है।

श्लोक 63 (skanda.2.178.63)

भर्ता नाथो गुरुर्भर्ता भर्ता दैवतमुत्तमम् । विक्रियां कृत्य साध्वी सा कथं सुखमवाप्नुयात् ॥

bhartā nātho gururbhartā bhartā daivatamuttamam vikriyāṁ kṛtya sādhvī sā kathaṁ sukhamavāpnuyāt

पति ही स्वामी है, पति ही गुरु है, पति ही सर्वोच्च देवता है। ऐसे पति के प्रति विकार करने पर एक सती स्त्री सुख कैसे प्राप्त कर सकती है?

श्लोक 64 (skanda.2.178.64)

तिर्यग्योनिशतं याति कृमिकोटिशतानि च । तस्माद्भूसुर कर्तव्यं स्त्रीभिर्भर्तुर्वचः सदा ॥

tiryagyoniśataṁ yāti kṛmikoṭiśatāni ca tasmādbhūsura kartavyaṁ strībhirbharturvacaḥ sadā

वह सौ पशु-योनियों और सैकड़ों करोड़ कीट-योनियों को प्राप्त होती है। इसलिए हे भूसुर, स्त्रियों को सदा अपने पति की आज्ञा का पालन करना चाहिए।

श्लोक 65 (skanda.2.178.65)

साऽहं पश्ये पुनर्योनिं कुत्सितां यातनान्विताम् । यदि नोद्धरसे ब्रह्मन्नद्य त्वद्दृष्टिसंमुखाम् ॥

sā'haṁ paśye punaryoniṁ kutsitāṁ yātanānvitām yadi noddharase brahmannadya tvaddṛṣṭisaṁmukhām

हे ब्रह्मन्, यदि आज आप मुझे अपनी दृष्टि के सामने से नहीं उबारते, तो मैं फिर से एक नीच, यातनामय योनि को देखूँगी।

श्लोक 66 (skanda.2.178.66)

तस्मादुद्धर मां ब्रह्मन्दुष्कृतां पापचारिणीम् । सुकृतस्य प्रदानेन वैशाखे शुक्लपक्षके ॥

tasmāduddhara māṁ brahmanduṣkṛtāṁ pāpacāriṇīm sukṛtasya pradānena vaiśākhe śuklapakṣake

अतः हे ब्रह्मन्, मुझ दुष्कर्मिणी, पापाचारिणी को उद्धार करें — वैशाख के शुक्ल पक्ष में अर्जित अपने सुकृत को दान करके।

श्लोक 67 (skanda.2.178.67)

या कृता तु त्वया ब्रह्मन्द्वादशी पुण्यवर्द्धिनी । तस्यां त्वया कृतं पुण्यं स्नानदानान्नभोजनैः ॥

yā kṛtā tu tvayā brahmandvādaśī puṇyavarddhinī tasyāṁ tvayā kṛtaṁ puṇyaṁ snānadānānnabhojanaiḥ

हे ब्रह्मन्, जो पुण्यवर्धिनी द्वादशी आपने आज मनाई है, उसमें आपने स्नान, दान और अन्न-भोजन से जो पुण्य अर्जित किया है,

श्लोक 68 (skanda.2.178.68)

दुश्चारिण्या अपि ब्रह्मंस्तेन मुक्तिर्भविष्यति । यस्यां तु भूसुरः स्नातः स्वगृहे मनुजः किल ॥

duścāriṇyā api brahmaṁstena muktirbhaviṣyati yasyāṁ tu bhūsuraḥ snātaḥ svagṛhe manujaḥ kila

हे ब्रह्मन्, उसी से मुझ दुश्चारिणी की भी मुक्ति हो सकती है। जिस तिथि पर कोई ब्राह्मण अपने ही घर में स्नान करता है,

श्लोक 69 (skanda.2.178.69)

सर्वतीर्थफलावाप्तिं लभते नाऽत्र संशयः । तप्तं दत्तं हुतं यत्र कृतं देवार्चनादि यत् ॥

sarvatīrthaphalāvāptiṁ labhate nā'tra saṁśayaḥ taptaṁ dattaṁ hutaṁ yatra kṛtaṁ devārcanādi yat

वह सभी तीर्थों के फल की प्राप्ति करता है, इसमें कोई संदेह नहीं। द्वादशी के दिन जो भी तप, दान, हवन और देवपूजा आदि किया जाता है,

श्लोक 70 (skanda.2.178.70)

तदक्षय्यफलं ज्ञेयं यत्कृतं द्वादशीदिने । एवंविधफलं यत्स्यात्तद्देहि सकलं मम ॥

tadakṣayyaphalaṁ jñeyaṁ yatkṛtaṁ dvādaśīdine evaṁvidhaphalaṁ yatsyāttaddehi sakalaṁ mama

वह सब अक्षय फल देने वाला जानना चाहिए। इस प्रकार का जो भी फल हो, वह सारा मुझे दे दीजिए।

श्लोक 71 (skanda.2.178.71)

द्वादश्यामुपवासेन त्रयोदश्यां तु पारणात् । यत्फलं स्यात्तदप्यद्धा तेन मुक्तिर्भविष्यति ॥

dvādaśyāmupavāsena trayodaśyāṁ tu pāraṇāt yatphalaṁ syāttadapyaddhā tena muktirbhaviṣyati

द्वादशी को उपवास करके और त्रयोदशी को पारणा करके जो फल प्राप्त होता है, उसी से मेरी मुक्ति हो सकती है।

श्लोक 72 (skanda.2.178.72)

दयां कुरु महाभाग दीनायां दीनवत्सल । दीननाथो जगन्नाथो युष्मन्नाथो जनार्दनः ॥

dayāṁ kuru mahābhāga dīnāyāṁ dīnavatsala dīnanātho jagannātho yuṣmannātho janārdanaḥ

हे महाभाग, हे दीनवत्सल, इस दीन पर दया कीजिए। दीनों के नाथ, जगत् के नाथ, आप सभी के नाथ जनार्दन ही हैं।

श्लोक 73 (skanda.2.178.73)

तदीयास्तादृशा एव यथा राजा तथा प्रजाः । वैवस्वतपदध्वंसिन्परित्राहि सुदुःखिताम् ॥

tadīyāstādṛśā eva yathā rājā tathā prajāḥ vaivasvatapadadhvaṁsinparitrāhi sudukhitām

उनकी प्रजा भी वैसी ही होनी चाहिए, जैसा राजा वैसी प्रजा। हे यम-पद के नाशक, इस अत्यंत दुःखी को उबारो।

श्लोक 74 (skanda.2.178.74)

त्वद्वारवासिनीं दीनां शुनीं मां दीनवत्सल । ब्रह्महत्यासहस्रं वा गोहत्यानां सहस्रकम् ॥

tvadvāravāsinīṁ dīnāṁ śunīṁ māṁ dīnavatsala brahmahatyāsahasraṁ vā gohatyānāṁ sahasrakam

हे दीनवत्सल, मैं आपके ही द्वार पर रहने वाली दीन कुतिया हूँ। यह शुभ तिथि एक हजार ब्रह्महत्याओं या एक हजार गोहत्याओं को भी,

श्लोक 75 (skanda.2.178.75)

अगम्यानां च कोटीश्च दहत्येव शुभा तिथिः । तस्यां कृतं महापुण्यं मह्यं दत्त्वा महामुने ॥

agamyānāṁ ca koṭīśca dahatyeva śubhā tithiḥ tasyāṁ kṛtaṁ mahāpuṇyaṁ mahyaṁ dattvā mahāmune

तथा करोड़ों अगम्यागमन (निषिद्ध संबंधों) के पापों को भी जला डालती है। हे महामुने, उस तिथि में अर्जित महापुण्य को मुझे देकर,

श्लोक 76 (skanda.2.178.76)

मामुद्धर समुद्विग्नां दीनां नाथ समुद्धर । अन्ते तुभ्यं द्विजेद्राय नमउक्तिं वदाम्यहम् ॥

māmuddhara samudvignāṁ dīnāṁ nātha samuddhara ante tubhyaṁ dvijedrāya namauktiṁ vadāmyaham

मुझे उबार लीजिए, मैं अत्यंत व्याकुल और दीन हूँ, हे नाथ, मुझे उबारिए। अंत में, हे द्विजेंद्र, मैं आपको प्रणाम निवेदन करती हूँ।

श्लोक 77 (skanda.2.178.77)

इति तस्या वचः श्रुत्वा शुनीमाह मुनेः सुतः । स्वकृतं जंतवोश्नंति सुखदुःखात्मकं शुनि ॥

iti tasyā vacaḥ śrutvā śunīmāha muneḥ sutaḥ svakṛtaṁ jantavo'śnanti sukhaduḥkhātmakaṁ śuni

उसके इन वचनों को सुनकर मुनि के पुत्र ने कुतिया से कहा — हे कुतिया, प्राणी अपने ही किए हुए सुख-दुःखमय कर्म को भोगते हैं।

श्लोक 78 (skanda.2.178.78)

तस्मात्किमु त्वया कार्यं क्षुद्रया पापशीलया । यया भर्ता वशं नीतो रक्षाचूर्णादिभिर्द्विजः ॥

tasmātkimu tvayā kāryaṁ kṣudrayā pāpaśīlayā yayā bhartā vaśaṁ nīto rakṣācūrṇādibhirdvijaḥ

अतः तुझ क्षुद्र, पापी स्वभाव वाली से क्या लेना-देना, जिसने रक्षा-कवच और चूर्ण आदि से अपने ब्राह्मण पति को वश में किया?

श्लोक 79 (skanda.2.178.79)

साधुभ्यो यत्कृतं पापं स्वस्य दुःखकरं भवेत् । साधुभ्यो यत्कृतं पुण्यं स्वस्य दुःखहरं भवेत् ॥

sādhubhyo yatkṛtaṁ pāpaṁ svasya duḥkhakaraṁ bhavet sādhubhyo yatkṛtaṁ puṇyaṁ svasya duḥkhaharaṁ bhavet

साधुओं के प्रति जो पाप किया जाता है, वह स्वयं के लिए दुःखकारी होता है। साधुओं के प्रति जो पुण्य किया जाता है, वह स्वयं के दुःख का हरण करता है।

श्लोक 80 (skanda.2.178.80)

उभयं भ्रंशतामेति पापेभ्यो यत्कृतं भवेत् । शर्करामिश्रितं क्षीरं काद्रवेयनिवेदितम् ॥

ubhayaṁ bhraṁśatāmeti pāpebhyo yatkṛtaṁ bhavet śarkarāmiśritaṁ kṣīraṁ kādraveyaniveditam

किंतु जो कुछ पापियों के प्रति किया जाता है, वह दोनों ही रूपों (पाप और पुण्य) में विफल हो जाता है — जैसे शक्कर मिली हुई दूध भी नाग को अर्पित करने पर,

श्लोक 81 (skanda.2.178.81)

विषवृद्धिकरं दृष्टं एवं पापकरं भवेत । वदत्येवं मुनिसुते शुनी दुःखैकरूपिणी ॥

viṣavṛddhikaraṁ dṛṣṭaṁ evaṁ pāpakaraṁ bhaveta vadatyevaṁ munisute śunī duḥkhaikarūpiṇī

वह देखा गया है कि विष को ही बढ़ाता है — इसी प्रकार पापी को दिया गया पुण्य भी पापकारी ही होता है। मुनि-पुत्र के ऐसा कहने पर, केवल दुःखस्वरूप बनी वह कुतिया,

श्लोक 82 (skanda.2.178.82)

पुनश्चुकोशोर्ध्वस्वरं तत्पित्रे बहुभाषिणी । पद्मबन्धो परित्राहि शुनी तद्द्वारवासिनीम् ॥

punaścukośordhvasvaraṁ tatpitre bahubhāṣiṇī padmabandho paritrāhi śunī taddvāravāsinīm

फिर से ऊँचे स्वर में, बहुत बोलते हुए, उसके पिता को पुकारने लगी — हे पद्मबंधु, अपने ही द्वार पर रहने वाली इस कुतिया की रक्षा कीजिए।

श्लोक 83 (skanda.2.178.83)

त्वदुच्छिष्टाशिनी नित्यं त्वं पाहीति पुनःपुनः । स्त्रपोष्या ये हि वर्तंते गृहस्थस्य महात्मनः ॥

tvaducchiṣṭāśinī nityaṁ tvaṁ pāhīti punaḥpunaḥ strapoṣyā ye hi vartante gṛhasthasya mahātmanaḥ

मैं सदा आपका ही झूठा भोजन खाती हूँ, आप ही मेरी रक्षा करें — इस प्रकार वह बार-बार पुकारती रही। जो प्राणी किसी गृहस्थ महात्मा के अधीन पाले जाते हैं,

श्लोक 84 (skanda.2.178.84)

तेषामुद्धरणं कार्यमिति वेदविदां मतम् । चण्डाला वायसाश्चैव सारमेयाश्च नित्यशः ॥

teṣāmuddharaṇaṁ kāryamiti vedavidāṁ matam caṇḍālā vāyasāścaiva sārameyāśca nityaśaḥ

उनका उद्धार करना कर्तव्य है, ऐसा वेद के जानकारों का मत है। चांडाल, कौवे और कुत्ते — ये सब सदा,

श्लोक 85 (skanda.2.178.85)

गृहस्थानां दयापात्रं प्रत्यहं बलिभोजिनः । अशक्तं नोद्धरेत्पोष्यं रोगाद्युपहतं यदि ॥

gṛhasthānāṁ dayāpātraṁ pratyahaṁ balibhojinaḥ aśaktaṁ noddharetpoṣyaṁ rogādyupahataṁ yadi

गृहस्थों की दया के पात्र हैं, जो प्रतिदिन बलि (भोजन-अंश) के भोजी होते हैं। यदि कोई अपने आश्रित को, चाहे वह असमर्थ हो या रोग से पीड़ित, नहीं उबारता,

श्लोक 86 (skanda.2.178.86)

सोऽधः पतेन्न संदेह इति वेदविदां मतम् ॥

so'dhaḥ patenna saṁdeha iti vedavidāṁ matam

वह अवश्य नरक में गिरता है, इसमें कोई संदेह नहीं — ऐसा वेद के जानकारों का मत है।

श्लोक 87 (skanda.2.178.87)

कर्तारमेकं जगतां हि कर्ता कृत्वात्मना पाति समस्तजंतून् । दारादिरूपव्यपदेशतो हरिस्तस्मात्तदाज्ञा खलु पोष्यरक्षा ॥

kartāramekaṁ jagatāṁ hi kartā kṛtvātmanā pāti samastajantūn dārādirūpavyapadeśato haristasmāttadājñā khalu poṣyarakṣā

संसार का एक ही कर्ता हरि, स्वयं ही कर्ता बनकर, पत्नी आदि रूपों के बहाने से समस्त प्राणियों की रक्षा करता है। इसलिए अपने आश्रितों की रक्षा करना उसी की आज्ञा है।

श्लोक 88 (skanda.2.178.88)

स्वपोष्यरक्षां परिहृत्य जंतुर्देवेन क्लृप्त्या यदि वर्ततेऽन्यधीः । स देवद्रोग्धा सकलस्य हंता कीनाशलोकाननु संप्रयाति ॥

svapoṣyarakṣāṁ parihṛtya janturdevena kḷptyā yadi vartate'nyadhīḥ sa devadrogdhā sakalasya hantā kīnāśalokānanu saṁprayāti

यदि कोई प्राणी अपने आश्रितों की रक्षा को त्यागकर, ईश्वर द्वारा नियत इस व्यवस्था के विरुद्ध अन्य विचार रखता है, तो वह देव-द्रोही, सबका घातक, यमलोक को ही प्राप्त होता है।

श्लोक 89 (skanda.2.178.89)

कर्तव्यत्वाद्दयालुत्वादेतामुद्धर दुर्मतिम् । इति तस्या वचः श्रुत्वा दुःखार्ताया गृहे सुतः । निश्चक्राम गृहात्तूर्णं पद्मबंधुर्दयानिधिः ॥

kartavyatvāddayālutvādetāmuddhara durmatim iti tasyā vacaḥ śrutvā duḥkhārtāyā gṛhe sutaḥ niścakrāma gṛhāttūrṇaṁ padmabandhurdayānidhiḥ

अतः कर्तव्य और दया के कारण इस दुर्बुद्धि का उद्धार कीजिए। घर में पुत्र से उस दुःखार्त कुतिया के ये वचन सुनकर, दयासागर पद्मबंधु शीघ्र ही घर से बाहर निकले।

श्लोक 90 (skanda.2.178.90)

किमेतदिति तां प्राह पुत्रः सर्वं न्यवेदयत् । स तु पुत्रवचः श्रुत्वा तमेवं प्राह विस्मितः ॥

kimetaditi tāṁ prāha putraḥ sarvaṁ nyavedayat sa tu putravacaḥ śrutvā tamevaṁ prāha vismitaḥ

उसने पूछा — यह क्या है? पुत्र ने सब कुछ बता दिया। पुत्र के वचन सुनकर उसने विस्मित होकर उससे यह कहा —

श्लोक 91 (skanda.2.178.91)

पद्मबन्धुरुवाच । ममात्मज कथं वाक्यमीदृशं व्याहृतं त्वया । न साधूनामिदं वाक्यं भवतीह वरानन ॥

padmabandhuruvāca mamātmaja kathaṁ vākyamīdṛśaṁ vyāhṛtaṁ tvayā na sādhūnāmidaṁ vākyaṁ bhavatīha varānana

पद्मबंधु ने कहा — हे मेरे पुत्र, तूने ऐसा वचन कैसे कहा? हे वरानन, यह साधुजनों के योग्य वचन नहीं है।

श्लोक 92 (skanda.2.178.92)

आत्मसौख्यकराः पापा भवंति परिभाविता । पश्य पुत्र जनाः सर्वे परोपकरणाय वै ॥

ātmasaukhyakarāḥ pāpā bhavanti paribhāvitā paśya putra janāḥ sarve paropakaraṇāya vai

जो केवल अपने ही सुख को महत्व देते हैं, वे विचार करने पर पापी सिद्ध होते हैं। हे पुत्र, देख — संसार के सभी उत्तम तत्त्व दूसरों के उपकार के लिए ही हैं,

श्लोक 93 (skanda.2.178.93)

शशी सूर्योऽथ पवनो रजनी हुतभुग्जलम् । चंदनं पादपाः संतः परोपकरणे स्थिताः ॥

śaśī sūryo'tha pavano rajanī hutabhugjalam candanaṁ pādapāḥ santaḥ paropakaraṇe sthitāḥ

चंद्रमा, सूर्य, वायु, रात्रि, अग्नि, जल, चंदन, वृक्ष और संतजन — सब दूसरों के उपकार में ही स्थित हैं।

श्लोक 94 (skanda.2.178.94)

अस्थिदानं कृतं पुत्र कृपया हि दधीचिना । देवानामुपकाराय ज्ञात्वा दैत्यान्महाबलान् ॥

asthidānaṁ kṛtaṁ putra kṛpayā hi dadhīcinā devānāmupakārāya jñātvā daityānmahābalān

हे पुत्र, दधीचि ऋषि ने कृपापूर्वक अपनी हड्डियों का दान किया था, जब उन्होंने महाबली दैत्यों को जानकर देवों के उपकार के लिए यह किया।

श्लोक 95 (skanda.2.178.95)

कपोताऽर्थे स्वमांसानि शिबिना भूभुजा पुरा । प्रदत्तानि महाभाग श्येनाय क्षुधितानि वै ॥

kapotā'rthe svamāṁsāni śibinā bhūbhujā purā pradattāni mahābhāga śyenāya kṣudhitāni vai

हे महाभाग, पूर्वकाल में राजा शिबि ने एक कबूतर की रक्षा के लिए, भूखे बाज को अपना ही मांस काटकर दे दिया था।

श्लोक 96 (skanda.2.178.96)

जीमूतवाहनो राजा पुराऽऽसीत्क्षितिमंडले । तेनाऽपि जीवितं दत्तं गरुडाय महात्मने ॥

jīmūtavāhano rājā purā'sītkṣitimaṇḍale tenā'pi jīvitaṁ dattaṁ garuḍāya mahātmane

पूर्वकाल में इस पृथ्वीमंडल में जीमूतवाहन नामक राजा थे, उन्होंने भी महात्मा गरुड़ को अपना जीवन तक दे दिया था।

श्लोक 97 (skanda.2.178.97)

तस्माद्दयालुना भाव्यं भूसुरेण विपश्चिता । शुद्धे वर्षति देवस्तु किमशुद्धे न वर्षति ॥

tasmāddayālunā bhāvyaṁ bhūsureṇa vipaścitā śuddhe varṣati devastu kimaśuddhe na varṣati

अतः विद्वान ब्राह्मण को दयालु होना चाहिए। क्या देवता केवल शुद्ध भूमि पर ही वर्षा करते हैं, अशुद्ध भूमि पर नहीं?

श्लोक 98 (skanda.2.178.98)

किन्न दीपयते चन्द्रश्चंडालानां गृहे सदा । तस्मादहं शुनीमेतां याचंतीं च पुनः पुनः ॥

kinna dīpayate candraścaṇḍālānāṁ gṛhe sadā tasmādahaṁ śunīmetāṁ yācantīṁ ca punaḥ punaḥ

क्या चंद्रमा चांडालों के घर में सदा प्रकाश नहीं देता? इसलिए मैं इस कुतिया को, जो बार-बार याचना कर रही है,

श्लोक 99 (skanda.2.178.99)

उद्धरिष्ये निजैः पुण्यैः पंकमग्नां च गां यथा । इति पुत्रं निराकृत्य प्रतिजज्ञे महामतिः ॥

uddhariṣye nijaiḥ puṇyaiḥ paṅkamagnāṁ ca gāṁ yathā iti putraṁ nirākṛtya pratijajñe mahāmatiḥ

मैं अपने ही पुण्यों से उबारूँगा, जैसे कीचड़ में फँसी गाय को उबारा जाता है। इस प्रकार पुत्र की बात को अस्वीकार कर, उस महाबुद्धिमान ने प्रतिज्ञा की —

श्लोक 100 (skanda.2.178.100)

दत्तं दत्तं महापुण्यं द्वादशीदिनसंभवम् । शुनि गच्छ हरेर्धाम निर्धूताऽखिलकल्मषा ॥

dattaṁ dattaṁ mahāpuṇyaṁ dvādaśīdinasaṁbhavam śuni gaccha harerdhāma nirdhūtā'khilakalmaṣā

द्वादशी के दिन अर्जित महापुण्य दिया, अवश्य दिया। हे कुतिया, अब समस्त पापों से मुक्त होकर हरि के धाम को जा।

श्लोक 101 (skanda.2.178.101)

तद्वाक्यात्सहसा भूप दिव्याऽऽभरणभूषिता । विमुच्य देहं जीर्णं तु दिव्यरूपधरा शुभा ॥

tadvākyātsahasā bhūpa divyā'bharaṇabhūṣitā vimucya dehaṁ jīrṇaṁ tu divyarūpadharā śubhā

हे राजन्, उसके इस वचन से वह तुरंत ही दिव्य आभूषणों से भूषित हो गई, अपनी जीर्ण देह त्यागकर दिव्य, शुभ रूप धारण कर लिया।

श्लोक 102 (skanda.2.178.102)

शताऽऽदित्यप्रभा जाता सावित्रीप्रतिमा यथा । जगामाऽऽमंत्र्य तं विप्रं द्योतयन्ती दिशो दश ॥

śatā'dityaprabhā jātā sāvitrīpratimā yathā jagāmā'maṁtrya taṁ vipraṁ dyotayantī diśo daśa

वह सौ सूर्यों के समान कांतिमती हो गई, मानो सावित्री की ही प्रतिमूर्ति हो। उस ब्राह्मण से आज्ञा लेकर, सभी दस दिशाओं को प्रकाशित करती हुई वह चली गई।

श्लोक 103 (skanda.2.178.103)

भुक्त्वा दिवि महाभोगान्पश्चाजाता महीतले । नरनारायणाद्देवादुर्वशीनाम नामतः ॥

bhuktvā divi mahābhogānpaścājātā mahītale naranārāyaṇāddevādurvaśīnāma nāmataḥ

स्वर्ग में महान भोग भोगकर, फिर वह पृथ्वी पर उर्वशी नाम की अप्सरा के रूप में, देव नर-नारायण से उत्पन्न हुई।

श्लोक 104 (skanda.2.178.104)

वैशाखशुद्धद्वादश्याः प्रभावेण वरांगना । देवानां च प्रिया जाता अप्सरस्त्वं च सा ययौ ॥

vaiśākhaśuddhadvādaśyāḥ prabhāveṇa varāṅganā devānāṁ ca priyā jātā apsarastvaṁ ca sā yayau

वैशाख की शुक्ल द्वादशी के प्रभाव से वह सुंदरी देवताओं की प्रिय बनी, और अप्सरा-पद को प्राप्त हुई।

श्लोक 105 (skanda.2.178.105)

यद्योगिगम्यं हुतभुक्प्रकाशं वरं वरेण्यं परमार्थरूपम् । यत्प्राप्य सन्तोऽपि हि यांति मोहं तत्प्राप रूपं च शुनी हि देवी ॥

yadyogigamyaṁ hutabhukprakāśaṁ varaṁ vareṇyaṁ paramārtharūpam yatprāpya santo'pi hi yānti mohaṁ tatprāpa rūpaṁ ca śunī hi devī

जो केवल योगियों को ही प्राप्य है, अग्नि के समान प्रकाशमान, सर्वश्रेष्ठ वर, परमार्थ-स्वरूप है — जिसे पाकर संत भी मोहित हो जाते हैं, वही रूप उस कुतिया ने, अब देवी बनकर, प्राप्त कर लिया।

श्लोक 106 (skanda.2.178.106)

पश्चात्स पद्मबंधुर्हि तां तिथिं पुण्यवर्द्धिनीम् । लोवेटीं ख्यापयामास मधुद्विट्प्राणवल्लभाम् ॥

paścātsa padmabandhurhi tāṁ tithiṁ puṇyavarddhinīm loveṭīṁ khyāpayāmāsa madhudviṭprāṇavallabhām

तत्पश्चात् पद्मबंधु ने उस पुण्यवर्धिनी तिथि को, जो मधु-शत्रु (विष्णु) को प्राणों के समान प्रिय है, 'लवेटी' के नाम से प्रसिद्ध किया।

श्लोक 107 (skanda.2.178.107)

कोटींदुसूर्यग्रहणाधिका सा समस्तरूपाधिकपुण्यरूपा । यज्ञैः समस्तैरतिरिच्यमाना द्विजेन ख्याता भुवनत्रये च ॥

koṭīndusūryagrahaṇādhikā sā samastarūpādhikapuṇyarūpā yajñaiḥ samastairatiricyamānā dvijena khyātā bhuvanatraye ca

वह करोड़ों चंद्र-सूर्य ग्रहणों से भी अधिक, सभी रूपों से अधिक पुण्यरूपा, समस्त यज्ञों से भी बढ़कर है — उस ब्राह्मण द्वारा वह तीनों लोकों में प्रसिद्ध की गई।

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