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वैष्णव खण्ड · अध्याय 179

फलश्रुतिकथनम् — इस पुराण के श्रवण के फल की कथा

अध्याय 178अध्याय-सूचीअध्याय 180

श्लोक 1 (skanda.2.179.1)

श्रुतदेव उवाच । यास्तिस्रस्तिथयः पुण्या अंतिमाः शुक्लपक्षके । वैशाखमासि राजेंद्र पूर्णिमांताः शुभावहाः ॥

śrutadeva uvāca yāstisrastithayaḥ puṇyā antimāḥ śuklapakṣake vaiśākhamāsi rājendra pūrṇimāntāḥ śubhāvahāḥ

श्रुतदेव ने कहा — हे राजेंद्र, वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की जो अंतिम तीन तिथियाँ हैं, पूर्णिमा तक की वे तिथियाँ शुभदायी और पुण्यमयी हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.179.2)

अन्त्याः पुष्करिणीसंज्ञाः सर्वपापक्षयावहाः । माधवे मासि यः पूर्णं स्नानं कर्त्तुं न च क्षमः ॥

antyāḥ puṣkariṇīsaṁjñāḥ sarvapāpakṣayāvahāḥ mādhave māsi yaḥ pūrṇaṁ snānaṁ karttuṁ na ca kṣamaḥ

वे अंतिम तिथियाँ 'पुष्करिणी' नाम से जानी जाती हैं, जो सभी पापों का नाश करने वाली हैं। जो माधव मास में पूर्ण स्नान करने में समर्थ नहीं है,

श्लोक 3 (skanda.2.179.3)

तिथिष्वेतासु स स्नायात्पूर्णमेव फलं लभेत् । सर्वे देवास्त्रयोदश्यां स्थित्वा जंतून्पुनंति हि ॥

tithiṣvetāsu sa snāyātpūrṇameva phalaṁ labhet sarve devāstrayodaśyāṁ sthitvā jantūnpunanti hi

यदि वह केवल इन्हीं तिथियों में स्नान करे, तो भी उसे पूर्ण फल प्राप्त होता है। त्रयोदशी को सभी देवता स्थित होकर प्राणियों को पवित्र करते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.179.4)

पूर्णायाः पर्वतीर्थैश्च विष्णुना सह संस्थिताः । चतुर्दश्यां सयज्ञाश्च देवा एतान्पुनंति हि ॥

pūrṇāyāḥ parvatīrthaiśca viṣṇunā saha saṁsthitāḥ caturdaśyāṁ sayajñāśca devā etānpunanti hi

पूर्णिमा तक के पर्व-तीर्थों सहित, विष्णु के साथ स्थित होकर, चतुर्दशी को यज्ञ-सहित देवता इन तिथियों को पवित्र करते हैं।

श्लोक 5 (skanda.2.179.5)

ब्रह्मघ्नं वा सुरापं वा सर्वानेतान्पुनंति हि । एकादश्यां पुरा जज्ञे वैशाख्याममृतं शुभम् ॥

brahmaghnaṁ vā surāpaṁ vā sarvānetānpunanti hi ekādaśyāṁ purā jajñe vaiśākhyāmamṛtaṁ śubham

वे ब्रह्महत्यारे और मद्यपायी सहित इन सभी को पवित्र करते हैं। वैशाख की एकादशी को ही पूर्वकाल में शुभ अमृत उत्पन्न हुआ था,

श्लोक 6 (skanda.2.179.6)

द्वादश्यां पालितं तच्च विष्णुना प्रभविष्णुना । त्रयोदश्यां सुधां देवान्पाययामास वै हरिः ॥

dvādaśyāṁ pālitaṁ tacca viṣṇunā prabhaviṣṇunā trayodaśyāṁ sudhāṁ devānpāyayāmāsa vai hariḥ

द्वादशी को सर्वशक्तिमान विष्णु ने उसकी रक्षा की, और त्रयोदशी को हरि ने देवताओं को वह अमृत पिलाया।

श्लोक 7 (skanda.2.179.7)

जघान च चतुर्दश्यां दैत्यान्देवविरोधिनः । पूर्णायां सर्वदेवानां साम्राज्याऽऽप्तिर्बभूव ह ॥

jaghāna ca caturdaśyāṁ daityāndevavirodhinaḥ pūrṇāyāṁ sarvadevānāṁ sāmrājyā'ptirbabhūva ha

चतुर्दशी को उन्होंने देव-विरोधी दैत्यों का वध किया, और पूर्णिमा को सभी देवताओं को अपने साम्राज्य की प्राप्ति हुई।

श्लोक 8 (skanda.2.179.8)

ततो देवाः सुसंतुष्टा एतासां च वरं ददुः । तिसृणां च तिथीनां वै प्रीत्योत्फुल्लविलोचनाः ॥

tato devāḥ susaṁtuṣṭā etāsāṁ ca varaṁ daduḥ tisṛṇāṁ ca tithīnāṁ vai prītyotphullavilocanāḥ

तब अत्यंत संतुष्ट हुए देवताओं ने, प्रसन्नता से खिले हुए नेत्रों से, इन तीनों तिथियों को वरदान दिया।

श्लोक 9 (skanda.2.179.9)

एता वैशाख मासस्य तिस्रश्च तिथयः शुभाः । पुत्रपौत्रादिफलदा नराणां पापहानिदाः ॥

etā vaiśākha māsasya tisraśca tithayaḥ śubhāḥ putrapautrādiphaladā narāṇāṁ pāpahānidāḥ

वैशाख मास की ये तीन शुभ तिथियाँ मनुष्यों को पुत्र-पौत्र आदि का फल देने वाली और पापों का नाश करने वाली हैं।

श्लोक 10 (skanda.2.179.10)

योऽस्मिन्मासे च संपूर्णे न स्नातो मनुजाधमः । तिथित्रये तु स स्नात्वा पूर्णमेव फलं लभेत् ॥

yo'sminmāse ca saṁpūrṇe na snāto manujādhamaḥ tithitraye tu sa snātvā pūrṇameva phalaṁ labhet

जो अधम मनुष्य इस संपूर्ण मास में स्नान नहीं कर सका, वह भी इन तीन तिथियों में स्नान करके पूर्ण फल ही प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 11 (skanda.2.179.11)

तिथित्रयेप्यकुर्वाणः स्नानदानादिकं नरः । चांडालीं योनिमासाद्य पश्चाद्रौरवमश्नुते ॥

tithitrayepyakurvāṇaḥ snānadānādikaṁ naraḥ cāṇḍālīṁ yonimāsādya paścādrauravamaśnute

जो मनुष्य इन तीनों तिथियों में भी स्नान-दान आदि नहीं करता, वह चांडाल-योनि पाकर, फिर रौरव नरक भोगता है।

श्लोक 12 (skanda.2.179.12)

उष्णोदकेन यः स्नाति माधवे च तिथित्रये । रौरवं नरकं याति यावदिंद्राश्चतुर्दश ॥

uṣṇodakena yaḥ snāti mādhave ca tithitraye rauravaṁ narakaṁ yāti yāvadindrāścaturdaśa

जो माधव मास की इन तीन तिथियों में गर्म जल से स्नान करता है, वह चौदह इंद्रों के काल तक रौरव नरक में जाता है।

श्लोक 13 (skanda.2.179.13)

पितृन्देवान्समुद्दिश्य दध्यन्नं न ददाति यः । पैशाचीं योनिमासाद्य तिष्ठत्याभूतसंप्लवम् ॥

pitṛndevānsamuddiśya dadhyannaṁ na dadāti yaḥ paiśācīṁ yonimāsādya tiṣṭhatyābhūtasaṁplavam

जो पितरों और देवताओं को उद्देश्य कर दही-भात का दान नहीं करता, वह पिशाच-योनि पाकर प्रलय-काल तक उसी में रहता है।

श्लोक 14 (skanda.2.179.14)

प्रवृत्तानां च कामानां माधवे नियमे कृते । अवश्यं विष्णुसायुज्यं युज्यते नाऽत्र संशयः ॥

pravṛttānāṁ ca kāmānāṁ mādhave niyame kṛte avaśyaṁ viṣṇusāyujyaṁ yujyate nā'tra saṁśayaḥ

माधव मास में नियम का पालन करने पर, प्रवृत्त हो चुकी कामनाओं का भी, निश्चय ही विष्णु का सायुज्य प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 15 (skanda.2.179.15)

आमासं नियमासक्तः कुर्याद्यदि दिनत्रये । तेन पूर्णफलं प्राप्य मोदते विष्णुमंदिरे ॥

āmāsaṁ niyamāsaktaḥ kuryādyadi dinatraye tena pūrṇaphalaṁ prāpya modate viṣṇumandire

यदि कोई नियम में तत्पर होकर इन तीनों दिनों में केवल कच्चे भोजन का ही सेवन करे, तो वह पूर्ण फल पाकर विष्णु के मंदिर में आनंदित होता है।

श्लोक 16 (skanda.2.179.16)

यो वै देवान्पितॄन्विष्णुं गुरुमुद्दिश्य मानवः । न स्नानादि करोत्यद्धाऽमुष्य शापप्रदा वयम् ॥

yo vai devānpitṝnviṣṇuṁ gurumuddiśya mānavaḥ na snānādi karotyaddhā'muṣya śāpapradā vayam

जो मनुष्य देवों, पितरों, विष्णु और गुरु को उद्देश्य कर सचमुच स्नान आदि नहीं करता, हम स्वयं उसे शाप देने वाले हैं —

श्लोक 17 (skanda.2.179.17)

निःसंतानो निरायुश्च निःश्रेयस्को भवेदिति । इति देवा वरं दत्त्वा स्वधामानि ययुः पुरा ॥

niḥsaṁtāno nirāyuśca niḥśreyasko bhavediti iti devā varaṁ dattvā svadhāmāni yayuḥ purā

कि वह संतानहीन, अल्पायु और कल्याणहीन हो जाए। इस प्रकार देवगण वरदान देकर पूर्वकाल में अपने-अपने धामों को चले गए।

श्लोक 18 (skanda.2.179.18)

तस्मात्तिथित्रयं पुण्यं सर्वाघौघविनाशनम् । अंत्यं पुष्करिणीसंज्ञं पुत्रपौत्रविवर्द्धनम् ॥

tasmāttithitrayaṁ puṇyaṁ sarvāghaughavināśanam antyaṁ puṣkariṇīsaṁjñaṁ putrapautravivarddhanam

इसलिए यह अंतिम, पुष्करिणी नामक तीन तिथियों का समूह पुण्यमय है, समस्त पापों के समूह का नाशक है, और पुत्र-पौत्रों की वृद्धि करने वाला है।

श्लोक 19 (skanda.2.179.19)

या नारी सुभगाऽऽपूपपायसं पूर्णिमादिने । ब्राह्मणाय सकृद्दद्यात्कीर्तिमंतं सुतं लभेत् ॥

yā nārī subhagā'pūpapāyasaṁ pūrṇimādine brāhmaṇāya sakṛddadyātkīrtimantaṁ sutaṁ labhet

जो सुभागी स्त्री पूर्णिमा के दिन एक बार भी किसी ब्राह्मण को पूए और खीर का दान करती है, वह कीर्तिवान पुत्र प्राप्त करती है।

श्लोक 20 (skanda.2.179.20)

गीतापाठं तु यः कुर्यादंतिमे च दिनत्रये । दिनेदिनेऽश्वमेधानां फलमेति न संशयः ॥

gītāpāṭhaṁ tu yaḥ kuryādantime ca dinatraye dinedine'śvamedhānāṁ phalameti na saṁśayaḥ

जो इन अंतिम तीन दिनों में गीता का पाठ करता है, उसे प्रतिदिन अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 21 (skanda.2.179.21)

सहस्रनामपठनं यः कुर्य्याच्च दिनत्रये । तस्य पुण्यफलं वक्तुं कः शक्तो दिवि वा भुवि ॥

sahasranāmapaṭhanaṁ yaḥ kuryyācca dinatraye tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ kaḥ śakto divi vā bhuvi

जो इन तीन दिनों में सहस्रनाम का पाठ करता है, उसके पुण्यफल का वर्णन करने में स्वर्ग या पृथ्वी में कौन समर्थ है?

श्लोक 22 (skanda.2.179.22)

सहस्रनामभिर्देवं पूर्णायां मधुसूदनम् । पयसा स्नाप्य वै याति विष्णुलोकमकल्मषम् ॥

sahasranāmabhirdevaṁ pūrṇāyāṁ madhusūdanam payasā snāpya vai yāti viṣṇulokamakalmaṣam

पूर्णिमा को सहस्रनामों के साथ दूध से मधुसूदन देव को स्नान कराकर, मनुष्य निष्पाप होकर विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 23 (skanda.2.179.23)

समस्तविभवैर्यस्तु पूजयेन्मधुसूदनम् । न तस्य लोकाः क्षीयन्ते युगकल्पादिव्यत्यये ॥

samastavibhavairyastu pūjayenmadhusūdanam na tasya lokāḥ kṣīyante yugakalpādivyatyaye

जो अपने समस्त वैभव से मधुसूदन की पूजा करता है, युगों और कल्पों के अंत हो जाने पर भी उसके प्राप्त लोक क्षीण नहीं होते।

श्लोक 24 (skanda.2.179.24)

अस्नात्वा चाप्यदत्त्वा च वैशाखश्च मतो यदि । स ब्रह्महा गुरुघ्नश्च पितॄणां घातकस्तथा ॥

asnātvā cāpyadattvā ca vaiśākhaśca mato yadi sa brahmahā gurughnaśca pitṝṇāṁ ghātakastathā

यदि कोई इस प्रकार बिना स्नान किए और बिना दान दिए वैशाख मास को बिता दे, तो वह ब्रह्महत्यारा, गुरुहत्यारा और पितृघातक के समान है।

श्लोक 25 (skanda.2.179.25)

श्लोकार्द्धं श्लोकपादं वा नित्यं भागवतोद्भवम् । वैशाखे च पठन्मर्त्यो ब्रह्मत्वं चोपपद्यते ॥

ślokārddhaṁ ślokapādaṁ vā nityaṁ bhāgavatodbhavam vaiśākhe ca paṭhanmartyo brahmatvaṁ copapadyate

जो मनुष्य वैशाख में नित्य भागवत-शास्त्र से उत्पन्न आधा श्लोक या श्लोक का एक पाद भी पढ़ता है, वह ब्रह्मत्व को प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 26 (skanda.2.179.26)

यो वै भागवतं शास्त्रं शृणोत्येतद्दिनत्रये । न पापैर्लिप्यते क्वाऽपि पद्मपत्रमिवांभसा ॥

yo vai bhāgavataṁ śāstraṁ śṛṇotyetaddinatraye na pāpairlipyate kvā'pi padmapatramivāmbhasā

जो इन तीनों दिनों में भागवत शास्त्र को सुनता है, वह किसी भी पाप से कहीं भी लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से नहीं भीगता।

श्लोक 27 (skanda.2.179.27)

देवत्वं मनुजैः प्राप्तं कैश्चित्सिद्धत्वमेव च । कैश्चित्प्राप्तो ब्रह्मभावो दिनत्रयनिषेवणात् ॥

devatvaṁ manujaiḥ prāptaṁ kaiścitsiddhatvameva ca kaiścitprāpto brahmabhāvo dinatrayaniṣevaṇāt

मनुष्यों में से किन्हीं ने देवत्व प्राप्त किया, किन्हीं ने सिद्धत्व, और किन्हीं ने ब्रह्मभाव भी — केवल इन तीन दिनों के सेवन से।

श्लोक 28 (skanda.2.179.28)

ब्रह्मज्ञानेन वै मुक्तिः प्रयागमरणेन वा । अथवा मासि वैशाखे नियमेन जलाप्लुतेः ॥

brahmajñānena vai muktiḥ prayāgamaraṇena vā athavā māsi vaiśākhe niyamena jalāplute

ब्रह्मज्ञान से मुक्ति मिलती है, अथवा प्रयाग में मरण से, या फिर वैशाख मास में नियमपूर्वक जल में स्नान करने से।

श्लोक 29 (skanda.2.179.29)

नीलवृषं समुत्सृज्य वैशाख्यां च जलाप्लुतेः । समस्तबंधनिर्मुक्तः पुमान्याति परं पदम् ॥

nīlavṛṣaṁ samutsṛjya vaiśākhyāṁ ca jalāplūteḥ samastabandhanirmuktaḥ pumānyāti paraṁ padam

वैशाख में एक नीला बैल दान कर और जल में स्नान करके, मनुष्य समस्त बंधनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है।

श्लोक 30 (skanda.2.179.30)

गां सवत्सां द्विजेंद्राय सीदते च कुटुम्बिने । इहापमृत्युनिर्मुक्तः परत्र च परं व्रजेत् ॥

gāṁ savatsāṁ dvijendrāya sīdate ca kuṭumbine ihāpamṛtyunirmuktaḥ paratra ca paraṁ vrajet

एक बछड़े सहित गाय संकट में पड़े किसी गृहस्थ ब्राह्मण को दान करने वाला, इस लोक में अकाल मृत्यु से मुक्त होकर, परलोक में परम पद को जाता है।

श्लोक 31 (skanda.2.179.31)

स्नानदानविहीनस्तु वैशाखी चैव यो नयेत् । श्वानयोनिशतं प्राप्य विष्ठायां जायते कृमिः ॥

snānadānavihīnastu vaiśākhī caiva yo nayet śvānayoniśataṁ prāpya viṣṭhāyāṁ jāyate kṛmiḥ

जो वैशाख को स्नान और दान से रहित होकर बिता देता है, वह सौ बार कुत्ते की योनि पाकर, विष्ठा में कीड़ा बनकर जन्म लेता है।

श्लोक 32 (skanda.2.179.32)

तिस्रः कोट्योऽर्धकोटिश्च तीर्थानि भुवनत्रये । संभूय मंत्रयांचक्रुः पापसंघातशंकिताः ॥

tisraḥ koṭyo'rdhakoṭiśca tīrthāni bhuvanatraye saṁbhūya mantrayāṁcakruḥ pāpasaṅghātaśaṅkitāḥ

तीनों लोकों में साढ़े तीन करोड़ तीर्थ, पापों के समूह से आशंकित होकर, एकत्र होकर विचार करने लगे —

श्लोक 33 (skanda.2.179.33)

जना अस्मासु पापिष्ठा विसृजन्ति स्वकं मलम् । तदस्माकं कथं गच्छेदिति चिंतासमन्विताः ॥

janā asmāsu pāpiṣṭhā visṛjanti svakaṁ malam tadasmākaṁ kathaṁ gacchediti cintāsamanvitāḥ

पापी लोग हम में अपना ही मैल उतार देते हैं। हमारा यह पाप कहाँ जाए — इस चिंता में डूबकर वे,

श्लोक 34 (skanda.2.179.34)

तीर्थपादं हरिं जग्मुः शरण्यं शरणं विभुम् । स्तुत्वा च बहुभिः स्तोत्रैः प्रार्थयामासुरंजसा ॥

tīrthapādaṁ hariṁ jagmuḥ śaraṇyaṁ śaraṇaṁ vibhum stutvā ca bahubhiḥ stotraiḥ prārthayāmāsuraṁjasā

शरण देने योग्य, आश्रयदाता, सर्वव्यापी हरि — जिनके चरणों में सभी तीर्थ बसते हैं — उनके पास गए, और अनेक स्तोत्रों से स्तुति कर, सच्चे हृदय से प्रार्थना करने लगे।

श्लोक 35 (skanda.2.179.35)

देवदेव जगन्नाथ सर्वाघौघविनाशन । जना अस्मासु पापिष्ठाः स्नात्वा पापानि सर्वशः ॥

devadeva jagannātha sarvāghaughavināśana janā asmāsu pāpiṣṭhāḥ snātvā pāpāni sarvaśaḥ

हे देवाधिदेव, हे जगन्नाथ, हे समस्त पापों के समूह के नाशक! पापी लोग हम में स्नान कर अपने सभी पापों को,

श्लोक 36 (skanda.2.179.36)

विसृज्य त्वत्पदं यांति त्वदाज्ञाधारिणो भुवि । अस्माकं चैव तत्पापं कथं गच्छेज्जनार्दन ॥

visṛjya tvatpadaṁ yānti tvadājñādhāriṇo bhuvi asmākaṁ caiva tatpāpaṁ kathaṁ gacchejjanārdana

और उतारकर, आपकी ही आज्ञा का पालन करते हुए, आपके पद को चले जाते हैं। हे जनार्दन, फिर हमारा वह पाप कहाँ जाए?

श्लोक 37 (skanda.2.179.37)

तदुपायं वदास्माकं त्वत्पादशरणैषिणाम् । इति तीर्थैः प्रार्थितस्तु भगवान्भूतभावनः ॥

tadupāyaṁ vadāsmākaṁ tvatpādaśaraṇaiṣiṇām iti tīrthaiḥ prārthitastu bhagavānbhūtabhāvanaḥ

हमें, जो आपके चरणों की शरण चाहते हैं, इसका उपाय बताइए। तीर्थों द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किए जाने पर, समस्त प्राणियों के हितकारी भगवान ने,

श्लोक 38 (skanda.2.179.38)

प्रहसन्प्राह तीर्थानि मेघगम्भीरया गिरा । श्रीभगवानुवाच । सिते पक्षे मेषसूर्ये वैशाखान्तेदिनत्रये ॥

prahasanprāha tīrthāni meghagambhīrayā girā śrībhagavānuvāca site pakṣe meṣasūrye vaiśākhāntedinatraye

मुस्कुराते हुए, मेघ के समान गंभीर वाणी से तीर्थों को उत्तर दिया। श्रीभगवान ने कहा — शुक्ल पक्ष में, जब सूर्य मेष राशि में हो, वैशाख के अंत के तीन दिनों में,

श्लोक 39 (skanda.2.179.39)

सर्वतीर्थमये पुण्ये ममाऽपि प्राणवल्लभे । यूयं भगोदयात्पूर्वं बहिःसंस्थजलाप्लुताः ॥

sarvatīrthamaye puṇye mamā'pi prāṇavallabhe yūyaṁ bhagodayātpūrvaṁ bahiḥsaṁsthajalāplutāḥ

जो सभी तीर्थों से युक्त, पुण्यमय और मुझे भी प्राणों के समान प्रिय हैं — उन दिनों में सूर्योदय से पहले, बाहर स्थित जल में स्नान करके,

श्लोक 40 (skanda.2.179.40)

विमुक्ताघाः पुण्यरूपा भवंत्वाशु सुनिर्मलाः । भवद्भिश्च विमुक्ताघैर्ये न स्नाता दिनत्रये ॥

vimuktāghāḥ puṇyarūpā bhavantvāśu sunirmalāḥ bhavadbhiśca vimuktāghairye na snātā dinatraye

तुम सब भी शीघ्र ही पापमुक्त, पुण्यरूप और अत्यंत निर्मल हो जाओ। तथा तुमसे मुक्त हुआ वह पाप, जो लोग इन तीनों दिनों में स्नान नहीं करते,

श्लोक 41 (skanda.2.179.41)

तेषु तिष्ठंतु तत्पापं जनैर्युष्मद्विरेचितम् । इति तीर्थपदो विष्णुस्तीर्थानां च वरं ददौ ॥

teṣu tiṣṭhantu tatpāpaṁ janairyuṣmadviracitam iti tīrthapado viṣṇustīrthānāṁ ca varaṁ dadau

वह उन्हीं में जाकर स्थिर हो जाए। इस प्रकार तीर्थ-चरणों वाले विष्णु ने तीर्थों को यह वरदान दिया।

श्लोक 42 (skanda.2.179.42)

अनुज्ञाप्य च तान्योगात्तत्रैवांतरधीयत । स्वधामानि पुनः प्राप्य तानि तीर्थानि नित्यशः ॥

anujñāpya ca tānyogāttatraivāntaradhīyata svadhāmāni punaḥ prāpya tāni tīrthāni nityaśaḥ

उन्हें आज्ञा देकर वे योगबल से वहीं अंतर्ध्यान हो गए। वे तीर्थ पुनः अपने-अपने धामों को प्राप्त होकर, सदा के लिए,

श्लोक 43 (skanda.2.179.43)

प्रतिवर्षं तु वैशाखे तथैवांत्यदिनत्रये । तेनाघौघं विमुच्यैव यांति निर्मलता महो ॥

prativarṣaṁ tu vaiśākhe tathaivāntyadinatraye tenāghaughaṁ vimucyaiva yānti nirmalatā maho

प्रतिवर्ष वैशाख के अंतिम तीन दिनों में, उसी वरदान से पापों के समूह से मुक्त होकर, अत्यंत निर्मलता को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.179.44)

ये तु स्नानं न कुर्वंति वैशाखांतदिनत्रये । ते भवन्तु समस्तानां जनानां पातकाऽऽश्रयाः ॥

ye tu snānaṁ na kurvanti vaiśākhāntadinatraye te bhavantu samastānāṁ janānāṁ pātakā'śrayāḥ

किंतु जो वैशाख के अंतिम तीन दिनों में स्नान नहीं करते, वे सभी लोगों के पापों के आश्रयस्थान बन जाएँ —

श्लोक 45 (skanda.2.179.45)

इति शापं च तीर्थानि ह्यस्नातानां वदन्ति च । न तेन सदृशः पापो यो न स्नातो दिनत्रये ॥

iti śāpaṁ ca tīrthāni hyasnātānāṁ vadanti ca na tena sadṛśaḥ pāpo yo na snāto dinatraye

इस प्रकार तीर्थ उन स्नान न करने वालों को शाप देते हैं। जो इन तीनों दिनों में स्नान नहीं करता, उसके समान पापी कोई नहीं है।

श्लोक 46 (skanda.2.179.46)

विचारितेषु शास्त्रेषु न दृष्टो न च वै श्रुतः । तस्माद्दिनत्रये कार्यं स्नानदानार्चनादिकम् ॥

vicāriteṣu śāstreṣu na dṛṣṭo na ca vai śrutaḥ tasmāddinatraye kāryaṁ snānadānārcanādikam

शास्त्रों में विचार करने पर भी ऐसा कोई कहीं न देखा गया है, न सुना गया है। अतः इन तीन दिनों में स्नान, दान और पूजा आदि अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.2.179.47)

अन्यथा नरकं याति यावदिंद्राश्चतुर्दश । इत्येतत्सर्वमाख्यातं श्रुतकीर्ते महामते ॥

anyathā narakaṁ yāti yāvadindrāścaturdaśa ityetatsarvamākhyātaṁ śrutakīrte mahāmate

अन्यथा वह चौदह इंद्रों के काल तक नरक में जाता है। हे श्रुतकीर्ति, हे महामते, इस प्रकार यह सब कुछ बताया गया है,

श्लोक 48 (skanda.2.179.48)

पृष्टं वैशाखमाहात्म्यं यथा दृष्टं यथाश्रुतम् । माहात्म्यस्य च लेखोऽयं माधवस्य च वर्णितः ॥

pṛṣṭaṁ vaiśākhamāhātmyaṁ yathā dṛṣṭaṁ yathāśrutam māhātmyasya ca lekho'yaṁ mādhavasya ca varṇitaḥ

जो कुछ पूछा गया था, वैशाख का माहात्म्य, जैसा मैंने देखा और सुना है, वैसा ही बताया गया है। यह माधव के माहात्म्य का वर्णन-रूप लेख है।

श्लोक 49 (skanda.2.179.49)

कार्त्स्न्याद्वक्तुं च ब्रह्माऽपि नालं वर्षशतैरपि । पुरा कैलासशिखरे पार्वत्यै शंकरः स्वयम् ॥

kārtsnyādvaktuṁ ca brahmā'pi nālaṁ varṣaśatairapi purā kailāsaśikhare pārvatyai śaṅkaraḥ svayam

इसे पूर्णतः वर्णन करने में स्वयं ब्रह्मा भी सौ वर्षों में भी समर्थ नहीं हैं। पूर्वकाल में कैलास शिखर पर स्वयं शंकर ने पार्वती को,

श्लोक 50 (skanda.2.179.50)

आह माधवमाहात्म्यं पृच्छंत्यै शतवत्सरम् । तथापि नांतमगमदशक्तो विरराम ह ॥

āha mādhavamāhātmyaṁ pṛcchantyai śatavatsaram tathāpi nāntamagamadaśakto virarāma ha

जो पूछ रही थी, उसे सौ वर्षों तक माधव के माहात्म्य का वर्णन किया। फिर भी वह उसके अंत तक नहीं पहुँच सके, और असमर्थ होकर रुक गए।

श्लोक 51 (skanda.2.179.51)

को नु वर्णयितुं शक्तः कार्त्स्न्यान्माहात्म्यमुत्तमम् । विना विष्णुं जगन्नाथं नारायणमनामयम् ॥

ko nu varṇayituṁ śaktaḥ kārtsnyānmāhātmyamuttamam vinā viṣṇuṁ jagannāthaṁ nārāyaṇamanāmayam

जगन्नाथ, निर्दोष नारायण विष्णु के अतिरिक्त, इस उत्तम माहात्म्य को पूर्णतः वर्णन करने में और कौन समर्थ हो सकता है?

श्लोक 52 (skanda.2.179.52)

पुरा सर्वेऽपि ऋषयो माहात्म्यं पापनाशनम् । लेशस्य लेशं व्याचख्युर्जनानां हितकाम्यया ॥

purā sarve'pi ṛṣayo māhātmyaṁ pāpanāśanam leśasya leśaṁ vyācakhyurjanānāṁ hitakāmyayā

पूर्वकाल में सभी ऋषियों ने इस पापनाशक माहात्म्य के अंश का भी केवल एक अंश ही, लोगों के हित की कामना से, व्याख्यायित किया।

श्लोक 53 (skanda.2.179.53)

नांतः केनापि व्याख्यातो ह्यशक्तत्वान्महीपते । त्वं च मासे तु वैशाखे कुरु दानादिसत्क्रियाः ॥

nāntaḥ kenāpi vyākhyāto hyaśaktatvānmahīpate tvaṁ ca māse tu vaiśākhe kuru dānādisatkriyāḥ

हे राजन्, असमर्थता के कारण किसी के द्वारा भी इसका अंत नहीं बताया गया। तू भी वैशाख मास में दान आदि सत्कर्मों का पालन कर,

श्लोक 54 (skanda.2.179.54)

तेन भुक्तिं च मुक्तिं च संप्राप्नोषि न संशयः । इति तं बोधयित्वा च मैथिलं जनकाह्वयम् ॥

tena bhuktiṁ ca muktiṁ ca saṁprāpnoṣi na saṁśayaḥ iti taṁ bodhayitvā ca maithilaṁ janakāhvayam

जिससे तुझे भोग और मोक्ष दोनों निश्चय ही प्राप्त होंगे। इस प्रकार जनक नाम वाले उस मैथिल राजा को समझाकर,

श्लोक 55 (skanda.2.179.55)

श्रुतदेवस्तमामंत्र्य गन्तुं चक्रे मनस्ततः । जाताह्लादः स राजर्षिर्गलद्वाष्पाकुलेक्षणः ॥

śrutadevastamāmantrya gantuṁ cakre manastataḥ jātāhlādaḥ sa rājarṣirgaladbāṣpākulekṣaṇaḥ

श्रुतदेव ने उससे विदा लेकर वहाँ से जाने का मन बनाया। वह राजर्षि अत्यंत आनंदित हो उठा, उसके नेत्रों से हर्षाश्रु बहने लगे,

श्लोक 56 (skanda.2.179.56)

उत्सवं कारयामास स्वाभिवृद्ध्यै मनोरमम् । ग्रामं प्रदक्षिणीकृत्य शिबिकामधिरोप्य तम् ॥

utsavaṁ kārayāmāsa svābhivṛddhyai manoramam grāmaṁ pradakṣiṇīkṛtya śibikāmadhiropya tam

अपने ही कल्याण के लिए एक मनोरम उत्सव मनाया। उसने श्रुतदेव को पालकी पर बिठाकर गाँव की परिक्रमा कराई,

श्लोक 57 (skanda.2.179.57)

चतुरंगबलैर्युक्तः स्वयं पृष्ठमथाऽन्वगात् । पुनश्चांतःपुरं प्राप्य सकलैर्विभवैरपि ॥

caturaṅgabalairyuktaḥ svayaṁ pṛṣṭhamathā'nvagāt punaścāntaḥpuraṁ prāpya sakalairvibhavairapi

चतुरंग सेना सहित स्वयं उसके पीछे-पीछे चला। फिर अपने अंतःपुर में पहुँचकर, अपने समस्त वैभव के साथ,

श्लोक 58 (skanda.2.179.58)

वस्त्रैराभरणैश्चैव गोभूतिलहिरण्यकैः । प्रणम्य च परिक्रम्य तस्थौ प्रांजलिरग्रतः ॥

vastrairābharaṇaiścaiva gobhūtilahiraṇyakaiḥ praṇamya ca parikramya tasthau prāñjaliragrataḥ

वस्त्रों, आभूषणों, गायों, भूमि, तिल और स्वर्ण से उसने श्रुतदेव को पूजा, फिर प्रणाम कर, परिक्रमा कर, हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा रहा।

श्लोक 59 (skanda.2.179.59)

ततः स तु महातेजाः श्रुतदेवो महायशाः । सन्तुष्टः परमप्रीतो ययौ धाम स्वकं मुनिः ॥

tataḥ sa tu mahātejāḥ śrutadevo mahāyaśāḥ santuṣṭaḥ paramaprīto yayau dhāma svakaṁ muniḥ

तब वह महातेजस्वी, महायशस्वी मुनि श्रुतदेव, अत्यंत संतुष्ट और प्रसन्न होकर अपने ही धाम को चले गए।

श्लोक 60 (skanda.2.179.60)

त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां पौर्णमास्यां च माधवे । स्नानं दानं पूजनं च कथाश्रवणमेव च ॥

trayodaśyāṁ caturdaśyāṁ paurṇamāsyāṁ ca mādhave snānaṁ dānaṁ pūjanaṁ ca kathāśravaṇameva ca

माधव मास की त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को स्नान, दान, पूजन और कथा-श्रवण करते हुए,

श्लोक 61 (skanda.2.179.61)

वैशाखधर्मनिरतः स वै मोक्षमवाप्नुयात् । धनशर्मा ब्राह्मणश्च प्रेताश्चैव यथा पुरा ॥

vaiśākhadharmaniratah sa vai mokṣamavāpnuyāt dhanaśarmā brāhmaṇaśca pretāścaiva yathā purā

वैशाख के धर्मों में लगा रहने वाला मनुष्य मोक्ष प्राप्त करता है — जैसे पूर्वकाल में धनशर्मा ब्राह्मण और प्रेतगणों ने प्राप्त किया था।

श्लोक 62 (skanda.2.179.62)

नारद उवाच । इत्येतत्परमाख्यानमंबरीष तवोदितम् । श्रवणात्सर्वपापघ्नं सर्वसंपद्विधायकम् ॥

nārada uvāca ityetatparamākhyānamambarīṣa tavoditam śravaṇātsarvapāpaghnaṁ sarvasaṁpadvidhāyakam

नारद ने कहा — हे अंबरीष, यह परम आख्यान तुझसे इस प्रकार कहा गया है। इसके श्रवण से समस्त पाप नष्ट होते हैं और समस्त संपत्ति की प्राप्ति होती है।

श्लोक 63 (skanda.2.179.63)

तेन भुक्तिं च मुक्तिं च ज्ञानं मोक्षं च विंदति । इति तस्य वचः श्रुत्वा अंवरीषो महायशाः ॥

tena bhuktiṁ ca muktiṁ ca jñānaṁ mokṣaṁ ca vindati iti tasya vacaḥ śrutvā ambarīṣo mahāyaśāḥ

इससे मनुष्य भोग, मुक्ति, ज्ञान और मोक्ष को प्राप्त करता है। नारद के इस वचन को सुनकर, महायशस्वी अंबरीष,

श्लोक 64 (skanda.2.179.64)

प्रहृष्टांतरवृत्तिश्च बाह्यव्यापारवर्जितः । प्रणनाम तथा मूर्ध्ना दण्डवत्पतितो भुवि ॥

prahṛṣṭāntaravṛttiśca bāhyavyāpāravarjitaḥ praṇanāma tathā mūrdhnā daṇḍavatpatito bhuvi

अंतःकरण से अत्यंत हर्षित होकर, बाह्य व्यापारों से रहित होकर, उसने अपने मस्तक से प्रणाम किया और दंडवत भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 65 (skanda.2.179.65)

विभवैरखिलैश्चाऽपि पूजयामास तं पुनः । संपूजितस्तमामंत्र्य नारदो भगवान्मुनिः ॥

vibhavairakhilaiścā'pi pūjayāmāsa taṁ punaḥ saṁpūjitastamāmantrya nārado bhagavānmuniḥ

अपने संपूर्ण वैभव से भी उसने नारद की पुनः पूजा की। इस प्रकार पूजित होकर, भगवान मुनि नारद ने उससे विदा लेकर,

श्लोक 66 (skanda.2.179.66)

लोकांतरं ययौ धीमाञ्च्छापान्नैकत्र संस्थितिः । अम्बरीषोऽपि राजर्षिर्नारदोक्तानिमाञ्च्छुभान् ॥

lokāntaraṁ yayau dhīmāñcchāpānnaikatra saṁsthitiḥ ambarīṣo'pi rājarṣirnāradoktānimāñcchubhān

बुद्धिमान नारद अन्य लोक को चले गए — शाप के कारण उनका कहीं एक स्थान पर स्थिर निवास नहीं है। राजर्षि अंबरीष ने भी नारद द्वारा कहे गए इन शुभ,

श्लोक 67 (skanda.2.179.67)

धर्मान्कृत्वा विलीनोऽभूत्परे ब्रह्मणि निर्गुणे । सूत उवाच । य इदं परमाख्यानं पापघ्नं पुण्यवर्धनम् ॥

dharmānkṛtvā vilīno'bhūtpare brahmaṇi nirguṇe sūta uvāca ya idaṁ paramākhyānaṁ pāpaghnaṁ puṇyavardhanam

धर्मों को अपनाकर, निर्गुण परब्रह्म में लीन हो गए। सूत ने कहा — जो इस पापनाशक, पुण्यवर्धक परम आख्यान को,

श्लोक 68 (skanda.2.179.68)

शृणुयाद्वा पठेद्वाऽपि स याति परमां गतिम् । लिखितं पुस्तकं येषां गृहे तिष्ठति मानदाः ॥

śṛṇuyādvā paṭhedvā'pi sa yāti paramāṁ gatim likhitaṁ pustakaṁ yeṣāṁ gṛhe tiṣṭhati mānadāḥ

सुनता है अथवा पढ़ता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। हे मानदो, जिनके घर में इसकी लिखित पुस्तक रखी हो,

श्लोक 69 (skanda.2.179.69)

तेषां मुक्तिः करस्था हि किमु तच्छ्रवणात्मनाम् ॥

teṣāṁ muktiḥ karasthā hi kimu tacchravaṇātmanām

उनकी मुक्ति तो हाथों में ही स्थित है — फिर उसे सुनने वालों के विषय में क्या कहना?

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