Skip to main content

वैष्णव खण्ड · अध्याय 180

विष्णुहरिमाहात्म्यवर्णनम् — विष्णुहरि की महिमा का वर्णन

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181

श्लोक 1 (skanda.2.180.1)

जयति पराशरसूनुः सत्यवतीहृदयनंदनो व्यासः यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मयममृतं जगत्पिबति

jayati parāśarasūnuḥ satyavatīhṛdayanaṁdano vyāsaḥ yasyāsyakamalagalitaṁ vāṅmayamamṛtaṁ jagatpibati

पराशर के पुत्र और सत्यवती के हृदय को आनन्दित करने वाले व्यास की जय हो, जिनके मुखकमल से झरे हुए अमृतमय वाङ्मय का पान समस्त संसार करता है।

श्लोक 2 (skanda.2.180.2)

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्

nārāyaṇaṁ namaskṛtya naraṁ caiva narottamam devīṁ sarasvatīṁ caiva tato jayamudīrayet

नारायण को, नरश्रेष्ठ नर को तथा देवी सरस्वती को नमस्कार करके ही 'जय' शब्द का उच्चारण करना चाहिए।

श्लोक 3 (skanda.2.180.3)

व्यास उवाच हिमवद्वासिनः सर्वे मुनयो वेदपारगाः त्रिकालज्ञा महात्मानो नैमिषारण्यवासिनः

vyāsa uvāca himavadvāsinaḥ sarve munayo vedapāragāḥ trikālajñā mahātmāno naimiṣāraṇyavāsinaḥ

व्यास ने कहा — हिमालय पर निवास करने वाले, वेदों के पारगामी, त्रिकाल के ज्ञाता, महात्मा तथा नैमिषारण्य में रहने वाले समस्त मुनिजन,

श्लोक 4 (skanda.2.180.4)

येऽर्बुदारण्यनिरता दण्डकारण्यवासिनः महेन्द्राद्रिरता ये वै ये च विन्ध्यनिवासिनः

ye’rbudāraṇyaniratā daṇḍakāraṇyavāsinaḥ mahendrādriratā ye vai ye ca vindhyanivāsinaḥ

अर्बुद वन में रत, दण्डकारण्य में निवास करने वाले, महेन्द्र पर्वत में रत तथा विन्ध्य में निवास करने वाले जो मुनि,

श्लोक 5 (skanda.2.180.5)

जंबूवनरता ये च ये गोदावरिवासिनः वाराणसीश्रिता ये च मथुरावासिनस्तथा

jaṁbūvanaratā ye ca ye godāvarivāsinaḥ vārāṇasīśritā ye ca mathurāvāsinastathā

जम्बू वन में रत, गोदावरी के तटवासी, वाराणसी में आश्रित तथा मथुरा में निवास करने वाले जो मुनि,

श्लोक 6 (skanda.2.180.6)

उज्जयिन्यां रता ये च प्रथमाश्रमवासिनः द्वारावतीश्रिता ये च बदर्य्याश्रयिणस्तथा

ujjayinyāṁ ratā ye ca prathamāśramavāsinaḥ dvārāvatīśritā ye ca badaryyāśrayiṇastathā

उज्जयिनी में रत, प्रथमाश्रम में रहने वाले, द्वारावती में आश्रित तथा बदरी-आश्रम में स्थित जो मुनि,

श्लोक 7 (skanda.2.180.7)

मायापुरीश्रिता ये च ये च कान्तीनिवासिनः एते चान्ये च मुनयः सशिष्या बहवोऽमलाः

māyāpurīśritā ye ca ye ca kāntīnivāsinaḥ ete cānye ca munayaḥ saśiṣyā bahavo’malāḥ

मायापुरी में आश्रित तथा काञ्ची में निवास करने वाले — ये और अन्य भी बहुत-से निर्मल मुनि अपने शिष्यों सहित,

श्लोक 8 (skanda.2.180.8)

कुरुक्षेत्रे महाक्षेत्रे सत्रे द्वादशवार्षिके वर्तमाने च रामस्य क्षितीशस्य महात्मनः समागताः समाहूताः सर्वे ते मुनयोऽमलाः

kurukṣetre mahākṣetre satre dvādaśavārṣike vartamāne ca rāmasya kṣitīśasya mahātmanaḥ samāgatāḥ samāhūtāḥ sarve te munayo’malāḥ

कुरुक्षेत्र नामक महाक्षेत्र में, महात्मा राजा राम के चल रहे बारह वर्षीय सत्र में आमन्त्रित होकर, वे समस्त निर्मल मुनि वहाँ एकत्र हुए।

श्लोक 9 (skanda.2.180.9)

सर्वे ते शुद्धमनसो वेदवेदांगपारगाः तत्र स्नात्वा यथान्यायं कृत्वा कर्म जपादिकम्

sarve te śuddhamanaso vedavedāṁgapāragāḥ tatra snātvā yathānyāyaṁ kṛtvā karma japādikam

शुद्ध मन वाले, वेद-वेदांगों में पारंगत वे सभी मुनि वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके जप आदि कर्म करके,

श्लोक 10 (skanda.2.180.10)

भारद्वाजं पुरस्कृत्य वेदवेदांगपारगम् आसनेषु विचित्रेषु बृष्यादिषु ह्यनुक्रमात्

bhāradvājaṁ puraskṛtya vedavedāṁgapāragam āsaneṣu vicitreṣu bṛṣyādiṣu hyanukramāt

वेद-वेदांगों के पारगामी भरद्वाज को आगे करके, क्रमानुसार मृगचर्मादि विचित्र आसनों पर,

श्लोक 11 (skanda.2.180.11)

उपविष्टाः कथाश्चक्रुर्नानातीर्थाश्रितास्तदा कर्मांतरेषु सत्रस्य सुखासीनाः परस्परम्

upaviṣṭāḥ kathāścakrurnānātīrthāśritāstadā karmāṁtareṣu satrasya sukhāsīnāḥ parasparam

बैठकर, विभिन्न तीर्थों में रहने वाले वे मुनि सत्र के कर्मों के बीच सुखपूर्वक बैठकर परस्पर कथाएँ करने लगे।

श्लोक 12 (skanda.2.180.12)

कथांतेषु ततस्तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् आजगाम महातेजास्तत्र सूतो महामतिः

kathāṁteṣu tatasteṣāṁ munīnāṁ bhāvitātmanām ājagāma mahātejāstatra sūto mahāmatiḥ

उन भावितात्मा मुनियों की कथाओं के अन्त में महातेजस्वी, महामति सूत वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 13 (skanda.2.180.13)

व्यासशिष्यः पुराणज्ञो समः हर्षणसंज्ञकः तान्प्रणम्य यथान्यायं मुनीनुपविवेश सः उपविष्टो यथान्यायं मुनीनां वचनेन सः

vyāsaśiṣyaḥ purāṇajño samaḥ harṣaṇasaṁjñakaḥ tānpraṇamya yathānyāyaṁ munīnupaviveśa saḥ upaviṣṭo yathānyāyaṁ munīnāṁ vacanena saḥ

व्यास के शिष्य, पुराणज्ञ, समभाव वाले हर्षणसंज्ञक ने उन मुनियों को विधिपूर्वक प्रणाम करके आसन ग्रहण किया, और मुनियों के कहने पर विधिपूर्वक बैठे हुए,

श्लोक 14 (skanda.2.180.14)

व्यासशिष्यं मुनिवरं सूतं वै रोमहर्षणम् तं पप्रच्छुर्मुनिवरा भारद्वाजादयोऽमलाः

vyāsaśiṣyaṁ munivaraṁ sūtaṁ vai romaharṣaṇam taṁ papracchurmunivarā bhāradvājādayo’malāḥ

व्यास के शिष्य, श्रेष्ठ मुनि सूत रोमहर्षण से भरद्वाज आदि निर्मल श्रेष्ठ मुनियों ने प्रश्न पूछा।

श्लोक 15 (skanda.2.180.15)

ऋषय ऊचुः त्वत्तः श्रुता महाभाग नानातीर्थाश्रिताः कथाः सरहस्यानि सर्वाणि पुराणानि महामते

ṛṣaya ūcuḥ tvattaḥ śrutā mahābhāga nānātīrthāśritāḥ kathāḥ sarahasyāni sarvāṇi purāṇāni mahāmate

ऋषियों ने कहा — हे महाभाग, हे महामते, हमने आपसे विभिन्न तीर्थों से सम्बन्धित कथाएँ तथा रहस्य सहित समस्त पुराण सुने हैं।

श्लोक 16 (skanda.2.180.16)

सांप्रतं श्रोतुमिच्छामः सरहस्यं सनातनम् अयोध्याया महापुर्या महिमानं गुणोज्ज्वलम्

sāṁprataṁ śrotumicchāmaḥ sarahasyaṁ sanātanam ayodhyāyā mahāpuryā mahimānaṁ guṇojjvalam

अब हम अयोध्या नामक महापुरी की गुणों से उज्ज्वल, रहस्य सहित, सनातन महिमा सुनना चाहते हैं।

श्लोक 17 (skanda.2.180.17)

कीदृशी सा सदा मेध्याऽयोध्या विष्णुप्रियापुरी आद्या सा गीयते वेदे पुरीणां मुक्तिदायिका

kīdṛśī sā sadā medhyā’yodhyā viṣṇupriyāpurī ādyā sā gīyate vede purīṇāṁ muktidāyikā

वह सदा पवित्र, विष्णु की प्रिय पुरी अयोध्या कैसी है? वह वेद में पुरियों में प्रथम तथा मुक्तिदायिनी के रूप में गाई जाती है।

श्लोक 18 (skanda.2.180.18)

संस्थानं कीदृशं तस्यास्तस्यां के च महीभुजः कानि तीर्थानि पुण्यानि माहात्म्यं तेषु कीदृशम्

saṁsthānaṁ kīdṛśaṁ tasyāstasyāṁ ke ca mahībhujaḥ kāni tīrthāni puṇyāni māhātmyaṁ teṣu kīdṛśam

उसकी संरचना कैसी है, उसमें कौन-कौन राजा हुए, कौन-से पुण्य तीर्थ हैं तथा उनकी महिमा कैसी है?

श्लोक 19 (skanda.2.180.19)

अयोध्यासेवनान्नृणां फलं स्यात्सूत कीदृशम् किं चरित्रं सूत तस्याः का नद्यः के च संगमाः

ayodhyāsevanānnṛṇāṁ phalaṁ syātsūta kīdṛśam kiṁ caritraṁ sūta tasyāḥ kā nadyaḥ ke ca saṁgamāḥ

हे सूत, अयोध्या के सेवन से मनुष्यों को कैसा फल मिलता है? उसका चरित्र क्या है, वहाँ कौन-सी नदियाँ और कौन-से संगम हैं?

श्लोक 20 (skanda.2.180.20)

तत्र स्नानेन किं पुण्यं दानेन च महामते तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामस्त्वत्तः सूत गुणाधिक

tatra snānena kiṁ puṇyaṁ dānena ca mahāmate tatsarvaṁ śrotumicchāmastvattaḥ sūta guṇādhika

हे महामते, वहाँ स्नान तथा दान से क्या पुण्य मिलता है? हे गुणाधिक सूत, हम यह सब आपसे सुनना चाहते हैं।

श्लोक 21 (skanda.2.180.21)

एतत्सर्वं क्रमेणैव तथ्यं त्वं वेत्थ सांप्रतम् अयोध्याया महापुर्य्या माहात्म्यं वक्तुमर्हसि

etatsarvaṁ krameṇaiva tathyaṁ tvaṁ vettha sāṁpratam ayodhyāyā mahāpuryyā māhātmyaṁ vaktumarhasi

यह सब क्रमशः, यथार्थ रूप में आप जानते हैं; अतः महापुरी अयोध्या की महिमा कहने के आप योग्य हैं।

श्लोक 22 (skanda.2.180.22)

सूत उवाच व्यासप्रसादाज्जानामि पुराणानि तपोधनाः सेतिहासानि सर्वाणि सरहस्यानि तत्त्वतः

sūta uvāca vyāsaprasādājjānāmi purāṇāni tapodhanāḥ setihāsāni sarvāṇi sarahasyāni tattvataḥ

सूत ने कहा — हे तपोधनो, व्यास की कृपा से मैं समस्त पुराणों को उनके इतिहासों तथा रहस्यों सहित यथार्थ रूप में जानता हूँ।

श्लोक 23 (skanda.2.180.23)

तं प्रणम्य प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं भवदग्रतः अयोध्याया महापुर्या यथावत्सरहस्यकम्

taṁ praṇamya pravakṣyāmi māhātmyaṁ bhavadagrataḥ ayodhyāyā mahāpuryā yathāvatsarahasyakam

उन्हें प्रणाम करके मैं आपके समक्ष महापुरी अयोध्या की महिमा उसके रहस्य सहित यथावत् कहूँगा।

श्लोक 24 (skanda.2.180.24)

विद्यावन्तं विपुलमतिदं वेदवेदांगवेद्यं श्रेष्ठं शान्तं शमितविषयं शुद्धतेजोविशालम् वेदव्यासं सततविनतं विश्ववेद्यैकयोनिं पाराशर्य्यं परमपुरुषं सर्वदाऽहं नमामि

vidyāvantaṁ vipulamatidaṁ vedavedāṁgavedyaṁ śreṣṭhaṁ śāntaṁ śamitaviṣayaṁ śuddhatejoviśālam vedavyāsaṁ satatavinataṁ viśvavedyaikayoniṁ pārāśaryyaṁ paramapuruṣaṁ sarvadā’haṁ namāmi

विद्यावान्, विपुल बुद्धि देने वाले, वेद-वेदांगों से जानने योग्य, श्रेष्ठ, शान्त, विषयों को शमित करने वाले, शुद्ध तेज से विशाल, सदा विनम्र, विश्व के लिए एकमात्र ज्ञातव्य उद्गम, पराशरपुत्र, परमपुरुष वेदव्यास को मैं सर्वदा नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 25 (skanda.2.180.25)

ॐ नमो भगवते तस्मै व्यासायामिततेजसे यस्य प्रसादाज्जानामि ह्ययोध्यामहिमामहम्

oṁ namo bhagavate tasmai vyāsāyāmitatejase yasya prasādājjānāmi hyayodhyāmahimāmaham

ॐ, अमित तेजस्वी उन भगवान् व्यास को नमस्कार, जिनकी कृपा से मैं अयोध्या की महिमा जानता हूँ।

श्लोक 26 (skanda.2.180.26)

शृण्वन्तु मुनयः सर्वे सावधानाः सशिष्यकाः माहात्म्यं कथयिष्यामि अयोध्याया महोदयम्

śṛṇvantu munayaḥ sarve sāvadhānāḥ saśiṣyakāḥ māhātmyaṁ kathayiṣyāmi ayodhyāyā mahodayam

समस्त मुनि अपने शिष्यों सहित सावधान होकर सुनें; मैं अयोध्या की उदय-महिमा का वर्णन करूँगा।

श्लोक 27 (skanda.2.180.27)

उदीरितमगस्त्याय स्कन्देनाश्रावि नारदात् अगस्त्येन पुरा प्रोक्तं कृष्णद्वैपायनाय तत्

udīritamagastyāya skandenāśrāvi nāradāt agastyena purā proktaṁ kṛṣṇadvaipāyanāya tat

यह कथा स्कन्द ने अगस्त्य को सुनाई, जो उन्होंने नारद से सुनी थी; और अगस्त्य ने पूर्वकाल में यही कृष्णद्वैपायन को कहा।

श्लोक 28 (skanda.2.180.28)

कृष्णद्वैपायनाच्चैतन्मया प्राप्तं तपोधनाः तदहं वच्मि युष्मभ्यं श्रोतुकामेभ्य आदरात्

kṛṣṇadvaipāyanāccaitanmayā prāptaṁ tapodhanāḥ tadahaṁ vacmi yuṣmabhyaṁ śrotukāmebhya ādarāt

हे तपोधनो, वही मुझे कृष्णद्वैपायन से प्राप्त हुआ; सुनने के इच्छुक आप लोगों को मैं आदरपूर्वक वही कहता हूँ।

श्लोक 29 (skanda.2.180.29)

नमामि परमात्मानं रामं राजीवलोचनम् अतसीकुसुमश्यामं रावणांतकमव्ययम्

namāmi paramātmānaṁ rāmaṁ rājīvalocanam atasīkusumaśyāmaṁ rāvaṇāṁtakamavyayam

राजीवलोचन, अतसी-पुष्प के समान श्याम, रावण के अन्तक, अव्यय परमात्मा राम को मैं नमस्कार करता हूँ।

श्लोक 30 (skanda.2.180.30)

अयोध्या सा परा मेध्या पुरी दुष्कृतिदुर्ल्लभा कस्य सेव्या च नाऽयोध्या यस्यां साक्षाद्धरिः स्वयम्

ayodhyā sā parā medhyā purī duṣkṛtidurllabhā kasya sevyā ca nā’yodhyā yasyāṁ sākṣāddhariḥ svayam

वह अयोध्या परम पवित्र है, दुष्कर्मी के लिए दुर्लभ पुरी है; जहाँ स्वयं साक्षात् हरि विराजमान हैं, उसका सेवन किसे न करना चाहिए?

श्लोक 31 (skanda.2.180.31)

सरयूतीरमासाद्य दिव्या परमशोभना अमरावतीनिभा प्रायः श्रिता बहुतपोधनैः

sarayūtīramāsādya divyā paramaśobhanā amarāvatīnibhā prāyaḥ śritā bahutapodhanaiḥ

सरयू के तट पर स्थित, दिव्य, परम शोभायमान, प्रायः अमरावती के समान, अनेक तपोधनों द्वारा आश्रित,

श्लोक 32 (skanda.2.180.32)

हस्त्यश्वरथपत्त्याढ्या संपदुच्चा च संस्थिता प्राकाराढ्यप्रतोलीभिस्तोरणैः कांचनप्रभैः

hastyaśvarathapattyāḍhyā saṁpaduccā ca saṁsthitā prākārāḍhyapratolībhistoraṇaiḥ kāṁcanaprabhaiḥ

हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सेना से समृद्ध, उच्च सम्पदा से युक्त, प्राकारों तथा विशाल मार्गों से युक्त, स्वर्णप्रभा वाले तोरणों से सुशोभित,

श्लोक 33 (skanda.2.180.33)

सानूपवेषैः सर्वत्र सुविभक्तचतुष्टया अनेकभूमिप्रासादा बहुभित्तिसुविक्रिया

sānūpaveṣaiḥ sarvatra suvibhaktacatuṣṭayā anekabhūmiprāsādā bahubhittisuvikriyā

सर्वत्र समतल स्थानों से युक्त, चार भागों में सुविभक्त, अनेक तल वाले प्रासादों से युक्त, अनेक भित्तियों से सुनिर्मित,

श्लोक 34 (skanda.2.180.34)

पद्मोत्फुल्लशुभोदाभिर्वापीभिरुपशोभिता देवतायतनैर्दिव्यैर्वेदघोषैश्च मण्डिता

padmotphullaśubhodābhirvāpībhirupaśobhitā devatāyatanairdivyairvedaghoṣaiśca maṇḍitā

खिले हुए कमलों से शोभित पवित्र जल वाली बावड़ियों से सुशोभित, दिव्य देवालयों तथा वेदघोष से मण्डित,

श्लोक 35 (skanda.2.180.35)

वीणावेणुमृदंगादिशब्दैरुत्कृष्टतां गता शालैस्तालैर्नालिकेरैः पनसामलकैस्तथा

vīṇāveṇumṛdaṁgādiśabdairutkṛṣṭatāṁ gatā śālaistālairnālikeraiḥ panasāmalakaistathā

वीणा, वेणु, मृदंग आदि की ध्वनि से उत्कृष्टता को प्राप्त, ताड़, नारियल, कटहल तथा आँवले के वृक्षों से युक्त,

श्लोक 36 (skanda.2.180.36)

तथैवाम्रकपित्थाद्यैरशोकैरुपशोभिता आरामैर्विविधैर्युक्ता सर्वर्तुफलपादपैः

tathaivāmrakapitthādyairaśokairupaśobhitā ārāmairvividhairyuktā sarvartuphalapādapaiḥ

तथैव आम्र, कैथ आदि तथा अशोक वृक्षों से सुशोभित, सभी ऋतुओं में फल देने वाले वृक्षों के विविध उद्यानों से युक्त,

श्लोक 37 (skanda.2.180.37)

मालतीजातिबकुलपाटलीनागचंपकैः करवीरैः कर्णिकारैः केतकीभिरलंकृता

mālatījātibakulapāṭalīnāgacaṁpakaiḥ karavīraiḥ karṇikāraiḥ ketakībhiralaṁkṛtā

मालती, जाति, बकुल, पाटली, नाग तथा चम्पक के वृक्षों से, कनेर, कर्णिकार तथा केतकी से अलंकृत,

श्लोक 38 (skanda.2.180.38)

निम्बजंवीरकदलीमातुलिंगमहाफलैः लसच्चंदनगंधाढ्यैर्नागरैरुपशोभिता

nimbajaṁvīrakadalīmātuliṁgamahāphalaiḥ lasaccaṁdanagaṁdhāḍhyairnāgarairupaśobhitā

नीम, जामुन, कदली, बिजौरा आदि महाफलों से, दमकते चन्दन की सुगन्ध से समृद्ध नागरिकों से सुशोभित,

श्लोक 39 (skanda.2.180.39)

देवतुल्यप्रभायुक्तैर्नृपपुत्रैश्च संयुता सुरूपाभिर्वरस्त्रीभिर्देवस्त्रीभिरिवावृता

devatulyaprabhāyuktairnṛpaputraiśca saṁyutā surūpābhirvarastrībhirdevastrībhirivāvṛtā

देवतुल्य कान्ति वाले राजपुत्रों से युक्त, देवांगनाओं के समान सुन्दर उत्तम स्त्रियों से घिरी हुई,

श्लोक 40 (skanda.2.180.40)

श्रेष्ठैः सत्कविभिर्युक्ता बृहस्पतिसमैर्द्विजैः वणिग्जनैस्तथा पौरैः कल्पवृक्षैरिवावृता

śreṣṭhaiḥ satkavibhiryuktā bṛhaspatisamairdvijaiḥ vaṇigjanaistathā pauraiḥ kalpavṛkṣairivāvṛtā

श्रेष्ठ सत्कवियों से युक्त, बृहस्पति समान द्विजों से, तथा वणिकों और नागरिकों से मानो कल्पवृक्षों से घिरी हुई,

श्लोक 41 (skanda.2.180.41)

अश्वैरुच्चैःश्रवस्तुल्यैर्दंतिभिर्दिग्गजैरिव इति नानाविधैर्भावैरुपेतेन्द्रपुरी समा

aśvairuccaiḥśravastulyairdaṁtibhirdiggajairiva iti nānāvidhairbhāvairupetendrapurī samā

उच्चैःश्रवा के समान अश्वों से, दिग्गजों के समान हाथियों से — इस प्रकार नाना भावों से युक्त वह इन्द्रपुरी के समान थी।

श्लोक 42 (skanda.2.180.42)

यस्यां जाता महीपालाः सूर्यवंशसमुद्भवाः इक्ष्वाकुप्रमुखाः सर्वे प्रजापालनतत्पराः

yasyāṁ jātā mahīpālāḥ sūryavaṁśasamudbhavāḥ ikṣvākupramukhāḥ sarve prajāpālanatatparāḥ

जिसमें सूर्यवंश से उत्पन्न, इक्ष्वाकु आदि प्रजापालनतत्पर सभी राजा उत्पन्न हुए,

श्लोक 43 (skanda.2.180.43)

यस्यास्तीरे पुण्यतोया कूजद्भृंगविहंगमा सरयूर्नाम तटिनी मानसप्रभवोल्लसा

yasyāstīre puṇyatoyā kūjadbhṛṁgavihaṁgamā sarayūrnāma taṭinī mānasaprabhavollasā

जिसके तट पर पवित्र जल वाली, गुंजार करते भ्रमरों तथा पक्षियों वाली, मानसरोवर से उत्पन्न, उल्लासपूर्ण सरयू नामक नदी है,

श्लोक 44 (skanda.2.180.44)

धर्मद्रवपरीता सा घर्घरोत्तमसंगमा मुनीश्वराश्रिततटा जागर्ति जगदुच्छ्रिता

dharmadravaparītā sā ghargharottamasaṁgamā munīśvarāśritataṭā jāgarti jagaducchritā

जो धर्मरस से परिपूर्ण है, घर्घरा से उत्तम संगम रखती है, मुनीश्वरों द्वारा आश्रित तट वाली, जगत् को उन्नत करती सदा जाग्रत रहती है।

श्लोक 45 (skanda.2.180.45)

दक्षिणाच्चरणांगुष्ठान्निःसृता जाह्नवी हरेः वामांगुष्ठान्मुनिवराः सरयूर्निर्गता शुभा

dakṣiṇāccaraṇāṁguṣṭhānniḥsṛtā jāhnavī hareḥ vāmāṁguṣṭhānmunivarāḥ sarayūrnirgatā śubhā

हरि के दाहिने चरण के अंगूठे से जाह्नवी निकली, और बाएँ अंगूठे से, हे श्रेष्ठ मुनि, पवित्र सरयू निकली।

श्लोक 46 (skanda.2.180.46)

तस्मादिमे पुण्यतमे नद्यौ देवनमस्कृते एतयोः स्नानमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति

tasmādime puṇyatame nadyau devanamaskṛte etayoḥ snānamātreṇa brahmahatyāṁ vyapohati

इसलिए ये देवताओं द्वारा नमस्कृत दोनों परम पवित्र नदियाँ हैं; इनमें स्नान मात्र से ब्रह्महत्या भी दूर हो जाती है।

श्लोक 47 (skanda.2.180.47)

तामयोध्यामथ प्राप्तोऽगस्त्यः कुम्भोद्भवो मुनिः यात्रार्थं तीर्थमाहात्म्यं ज्ञात्वा स्कन्दप्रसादतः

tāmayodhyāmatha prāpto’gastyaḥ kumbhodbhavo muniḥ yātrārthaṁ tīrthamāhātmyaṁ jñātvā skandaprasādataḥ

फिर कुम्भयोनि मुनि अगस्त्य, स्कन्द की कृपा से तीर्थ-माहात्म्य जानकर, यात्रा हेतु उस अयोध्या को प्राप्त हुए।

श्लोक 48 (skanda.2.180.48)

आगत्य तु इतः सोऽपि कृत्वा यात्रां क्रमेण च यथोक्तेन विधानेन स्नात्वा संतर्प्य तान्पितॄन्

āgatya tu itaḥ so’pi kṛtvā yātrāṁ krameṇa ca yathoktena vidhānena snātvā saṁtarpya tānpitṝn

यहाँ आकर उन्होंने भी क्रमशः यात्रा करके, यथोक्त विधि से स्नान करके, पितरों का तर्पण करके,

श्लोक 49 (skanda.2.180.49)

पूजयित्वा यथान्यायं देवताः सकला अपि सर्वाण्यपि च तीर्थानि नमस्कृत्य यथाविधि

pūjayitvā yathānyāyaṁ devatāḥ sakalā api sarvāṇyapi ca tīrthāni namaskṛtya yathāvidhi

विधिपूर्वक समस्त देवताओं की पूजा करके तथा विधिवत् सभी तीर्थों को नमस्कार करके,

श्लोक 50 (skanda.2.180.50)

कृतकृत्योर्ज्जितानन्दस्तीर्थमाहात्म्यदर्शनात् अभूदगस्त्यो रूपेण पुलकां चितविग्रहः

kṛtakṛtyorjjitānandastīrthamāhātmyadarśanāt abhūdagastyo rūpeṇa pulakāṁ citavigrahaḥ

तीर्थों की महिमा देखने से कृतकृत्य होकर आनन्द से उल्लसित अगस्त्य का शरीर रोमांच से पुलकित हो उठा।

श्लोक 51 (skanda.2.180.51)

स त्रिरात्रं स्थितस्तत्र यात्रां कृत्वा यथाविधि स्तुवन्नयोध्यामाहात्म्यं प्रतस्थे मुनिसत्तमः

sa trirātraṁ sthitastatra yātrāṁ kṛtvā yathāvidhi stuvannayodhyāmāhātmyaṁ pratasthe munisattamaḥ

वे मुनिश्रेष्ठ वहाँ तीन रात्रि रहकर, विधिवत् यात्रा करके, अयोध्या की महिमा का स्तवन करते हुए वहाँ से प्रस्थान कर गए।

श्लोक 52 (skanda.2.180.52)

तमायांतं विलोक्याशु बहुलानन्दसुन्दरम् कृष्णद्वैपायनो व्यासः पप्रच्छानंदकारणम्

tamāyāṁtaṁ vilokyāśu bahulānandasundaram kṛṣṇadvaipāyano vyāsaḥ papracchānaṁdakāraṇam

अत्यधिक आनन्द से सुन्दर उन्हें आते देखकर कृष्णद्वैपायन व्यास ने तुरन्त उनके आनन्द का कारण पूछा।

श्लोक 53 (skanda.2.180.53)

व्यास उवाच कुतः समागतो ब्रह्मन्सांप्रतं मुनिसत्तमः परमानंदसंदोहः समभूत्सांप्रतं तव

vyāsa uvāca kutaḥ samāgato brahmansāṁprataṁ munisattamaḥ paramānaṁdasaṁdohaḥ samabhūtsāṁprataṁ tava

व्यास ने कहा — हे ब्रह्मन्, हे श्रेष्ठ मुनि, अभी आप कहाँ से आए हैं? आपमें अभी परम आनन्द की अधिकता उत्पन्न हुई है।

श्लोक 54 (skanda.2.180.54)

कस्मादानंदपोषोऽभूत्तव ब्रह्मन्वदस्व मे ममापि भवदानंदात्प्रमोदो हृदि जायते

kasmādānaṁdapoṣo’bhūttava brahmanvadasva me mamāpi bhavadānaṁdātpramodo hṛdi jāyate

हे ब्रह्मन्, यह आनन्द की वृद्धि आपको किस कारण से हुई, मुझसे कहिए; आपके आनन्द से मेरे हृदय में भी हर्ष उत्पन्न होता है।

श्लोक 55 (skanda.2.180.55)

अगस्त्य उवाच अहो महदथाश्चर्य्यं विस्मयो मुनिसत्तम दृष्ट्वा प्रभावं मेऽद्याभूदयोध्यायास्तपोधन

agastya uvāca aho mahadathāścaryyaṁ vismayo munisattama dṛṣṭvā prabhāvaṁ me’dyābhūdayodhyāyāstapodhana

अगस्त्य ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ, आश्चर्य और विस्मय की बात है; हे तपोधन, आज मुझे अयोध्या का प्रभाव देखकर यह हुआ है।

श्लोक 56 (skanda.2.180.56)

तस्मादानंदसंदोहः समभून्मम सांप्रतम् तच्छ्रुत्वागस्त्यवचनं व्यासः प्रोवाच तं मुनिम्

tasmādānaṁdasaṁdohaḥ samabhūnmama sāṁpratam tacchrutvāgastyavacanaṁ vyāsaḥ provāca taṁ munim

इसलिए मुझे अभी आनन्द की अधिकता हुई है — यह सुनकर व्यास ने अगस्त्य के वचन सुनकर उस मुनि से पुनः कहा।

श्लोक 57 (skanda.2.180.57)

व्यास उवाच भगवन्ब्रूहि तत्त्वेन विस्तरात्सरहस्यकम् अयोध्याया महापुर्या महिमानं गुणाधिकम्

vyāsa uvāca bhagavanbrūhi tattvena vistarātsarahasyakam ayodhyāyā mahāpuryā mahimānaṁ guṇādhikam

व्यास ने कहा — हे भगवन्, महापुरी अयोध्या की अधिक गुणों वाली महिमा को यथार्थ रूप से, रहस्य सहित, विस्तार से कहिए।

श्लोक 58 (skanda.2.180.58)

कः क्रमस्तीर्थयात्रायाः कानि तीर्थानि को विधिः कि फलं स्नानतस्तत्र दानस्य च महामुने एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तराद्वदतां वर

kaḥ kramastīrthayātrāyāḥ kāni tīrthāni ko vidhiḥ ki phalaṁ snānatastatra dānasya ca mahāmune etatsarvaṁ samācakṣva vistarādvadatāṁ vara

तीर्थयात्रा का क्रम क्या है, कौन-से तीर्थ हैं, विधि क्या है? हे महामुने, वहाँ स्नान तथा दान का क्या फल है? यह सब, हे उत्तम वक्ता, विस्तार से बताइए।

श्लोक 59 (skanda.2.180.59)

अगस्त्य उवाच अहो धन्यतमा बुद्धिस्तव जाता तपोधन दृश्यते येन पृच्छा ते ह्ययोध्यामहिमाश्रिता

agastya uvāca aho dhanyatamā buddhistava jātā tapodhana dṛśyate yena pṛcchā te hyayodhyāmahimāśritā

अगस्त्य ने कहा — हे तपोधन, आपकी बुद्धि अत्यन्त धन्य हो गई है, क्योंकि आपका यह प्रश्न अयोध्या की महिमा पर आश्रित दिखता है।

श्लोक 60 (skanda.2.180.60)

अकारो ब्रह्म च प्रोक्तं यकारो विष्णुरुच्यते धकारो रुद्ररूपश्च अयोध्यानाम राजते

akāro brahma ca proktaṁ yakāro viṣṇurucyate dhakāro rudrarūpaśca ayodhyānāma rājate

अकार को ब्रह्मा कहा गया है, यकार को विष्णु कहा जाता है, और धकार रुद्र का रूप है — इस प्रकार अयोध्या नाम सुशोभित होता है।

श्लोक 61 (skanda.2.180.61)

सर्वोपपातकैर्युक्तैर्ब्रह्महत्यादिपातकैः नायोध्या शक्यते यस्मात्तामयोध्यां ततो विदुः

sarvopapātakairyuktairbrahmahatyādipātakaiḥ nāyodhyā śakyate yasmāttāmayodhyāṁ tato viduḥ

चूँकि ब्रह्महत्या आदि सभी उपपातकों और महापातकों से युक्त व्यक्ति द्वारा भी अयोध्या पर विजय नहीं पाई जा सकती, इसलिए उसे 'अयोध्या' (अजेय) जाना जाता है।

श्लोक 62 (skanda.2.180.62)

विष्णोराद्या पुरी येयं क्षितिं न स्पृशति द्विज विष्णोः सुदर्शने चक्रे स्थिता पुण्यकरी क्षितौ

viṣṇorādyā purī yeyaṁ kṣitiṁ na spṛśati dvija viṣṇoḥ sudarśane cakre sthitā puṇyakarī kṣitau

यह विष्णु की आदि पुरी है, यह पृथ्वी को स्पर्श नहीं करती, हे द्विज; यह विष्णु के सुदर्शन चक्र पर स्थित है तथा पृथ्वी पर पुण्यकारी है।

श्लोक 63 (skanda.2.180.63)

केन वर्णयितुं शक्यो महिमाऽस्यास्तपोधन यत्र साक्षात्स्वयं देवो विष्णुर्वसति सादरः

kena varṇayituṁ śakyo mahimā’syāstapodhana yatra sākṣātsvayaṁ devo viṣṇurvasati sādaraḥ

हे तपोधन, इसकी महिमा किससे वर्णन की जा सकती है, जहाँ साक्षात् स्वयं भगवान् विष्णु आदरपूर्वक निवास करते हैं?

श्लोक 64 (skanda.2.180.64)

सहस्रधारामारभ्य योजनं पूर्वतो दिशि प्रतीचि दिशि तथैव योजनं समतोवधिः

sahasradhārāmārabhya yojanaṁ pūrvato diśi pratīci diśi tathaiva yojanaṁ samatovadhiḥ

सहस्रधारा से आरम्भ करके पूर्व दिशा में एक योजन तक, तथा पश्चिम दिशा में भी उसी प्रकार समतल एक योजन तक इसकी सीमा है।

श्लोक 65 (skanda.2.180.65)

दक्षिणोत्तरभागे तु सरयूतमसावधिः एतत्क्षेत्रस्य संस्थानं हरेरन्तर्गृहं स्थितम् मत्स्याकृतिरियं विप्र पुरी विष्णोरुदीरिता

dakṣiṇottarabhāge tu sarayūtamasāvadhiḥ etatkṣetrasya saṁsthānaṁ harerantargṛhaṁ sthitam matsyākṛtiriyaṁ vipra purī viṣṇorudīritā

किन्तु दक्षिण-उत्तर भाग में सरयू और तमसा इसकी सीमा हैं। इस क्षेत्र की यह संरचना हरि के अन्तर्गृह के रूप में स्थित है; हे विप्र, यह पुरी मत्स्य के आकार की कही गई है।

श्लोक 66 (skanda.2.180.66)

पश्चिमे तस्य मूर्द्धा तु गोप्रतारासिता द्विज

paścime tasya mūrddhā tu gopratārāsitā dvija

हे द्विज, इसका मस्तक पश्चिम में गोप्रतार पर स्थित है।

श्लोक 67 (skanda.2.180.67)

पूर्वतः पृष्ठभागो हि दक्षिणोत्तरमध्यमः तस्यां पुर्य्यां महाभाग नाम्ना विष्णुर्हरिः स्वयम् पूर्वंदृष्टप्रभावोऽसौ प्राधान्येन वसत्यपि

pūrvataḥ pṛṣṭhabhāgo hi dakṣiṇottaramadhyamaḥ tasyāṁ puryyāṁ mahābhāga nāmnā viṣṇurhariḥ svayam pūrvaṁdṛṣṭaprabhāvo’sau prādhānyena vasatyapi

पूर्व में इसका पृष्ठभाग है, जो दक्षिण-उत्तर के मध्य में है। हे महाभाग, उस पुरी में स्वयं विष्णु हरि नाम से, जिनका प्रभाव पूर्वकाल में देखा गया, प्रमुख रूप से निवास भी करते हैं।

श्लोक 68 (skanda.2.180.68)

व्यास उवाच भगवन्किं प्रभावोऽसौ योऽयं विष्णुहरिस्त्वया कीर्तितो मुनिशार्दूल प्रसिद्धिं गतवान्कथम् एतत्सर्वं समाचक्ष्व विस्तरेण ममाग्रतः

vyāsa uvāca bhagavankiṁ prabhāvo’sau yo’yaṁ viṣṇuharistvayā kīrtito muniśārdūla prasiddhiṁ gatavānkatham etatsarvaṁ samācakṣva vistareṇa mamāgrataḥ

व्यास ने कहा — हे भगवन्, हे मुनिशार्दूल, आपके द्वारा कीर्तित यह विष्णुहरि किस प्रभाव से इतनी प्रसिद्धि को प्राप्त हुए? यह सब मुझे विस्तार से बताइए।

श्लोक 69 (skanda.2.180.69)

अगस्त्य उवाच विष्णुशर्मेति विख्यातः पुराभूद्ब्राह्मणोत्तमः वेदवेदांगतत्त्वज्ञो धर्मकर्मसमाश्रितः

agastya uvāca viṣṇuśarmeti vikhyātaḥ purābhūdbrāhmaṇottamaḥ vedavedāṁgatattvajño dharmakarmasamāśritaḥ

अगस्त्य ने कहा — पूर्वकाल में विष्णुशर्मा नामक विख्यात एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, वेद-वेदांगों के तत्त्व का ज्ञाता, धर्म-कर्म में समाश्रित,

श्लोक 70 (skanda.2.180.70)

योगध्यानरतो नित्यं विष्णुभक्तिपरायणः स कदाचित्तीर्थयात्रां कुर्वन्वैष्णवसत्तमः अयोध्यामागतो विष्णुर्विष्णुःसाक्षाद्वसेदिति

yogadhyānarato nityaṁ viṣṇubhaktiparāyaṇaḥ sa kadācittīrthayātrāṁ kurvanvaiṣṇavasattamaḥ ayodhyāmāgato viṣṇurviṣṇuḥsākṣādvasediti

सदा योग-ध्यान में रत, विष्णुभक्ति में परायण। वह श्रेष्ठ वैष्णव कभी तीर्थयात्रा करते हुए अयोध्या आया, यह सोचते हुए कि साक्षात् विष्णु यहाँ निवास करते हैं।

श्लोक 71 (skanda.2.180.71)

चिंतयन्मनसा वीरस्तपः कर्तुं समुद्यतः स वै तत्र तपस्तेपे शाकमूलफलाशनः

ciṁtayanmanasā vīrastapaḥ kartuṁ samudyataḥ sa vai tatra tapastepe śākamūlaphalāśanaḥ

यह मन में विचार करके वह वीर तपस्या करने के लिए उद्यत हुआ; उसने वहाँ शाक, मूल तथा फल खाकर तपस्या की।

श्लोक 72 (skanda.2.180.72)

ग्रीष्मे पंचाग्निमध्यस्थो ह्यतपत्स महातपाः वार्षिके च निरालम्बो हेमन्ते च सरोवरे

grīṣme paṁcāgnimadhyastho hyatapatsa mahātapāḥ vārṣike ca nirālambo hemante ca sarovare

ग्रीष्म में वह महातपस्वी पंचाग्नि के मध्य तपा, वर्षा ऋतु में बिना किसी आश्रय के तथा हेमन्त में सरोवर में,

श्लोक 73 (skanda.2.180.73)

स्नात्वा यथोक्तविधिना कृत्वा विष्णोस्तथार्चनम् वशीकृत्येन्द्रियग्रामं विशुद्धेनांतरात्मना

snātvā yathoktavidhinā kṛtvā viṣṇostathārcanam vaśīkṛtyendriyagrāmaṁ viśuddhenāṁtarātmanā

यथोक्त विधि से स्नान करके, विष्णु का अर्चन करके, इन्द्रियों के समूह को वश में करके, शुद्ध अन्तरात्मा से,

श्लोक 74 (skanda.2.180.74)

मनो विष्णौ समावेश्य विधाय प्राणसंयमम् ॐकारोच्चारणाद्धीमान्हृदि पद्मं विकासयन्

mano viṣṇau samāveśya vidhāya prāṇasaṁyamam oṁkāroccāraṇāddhīmānhṛdi padmaṁ vikāsayan

मन को विष्णु में लीन करके, प्राणायाम करके, ॐकार के उच्चारण से बुद्धिमान् उस विप्र ने हृदय-कमल को विकसित करते हुए,

श्लोक 75 (skanda.2.180.75)

तन्मध्ये रविसोमाग्निमण्डलानि यथाविधि कल्पयित्वा हरिं मूर्तं यस्मिन्देशे सनातनम्

tanmadhye ravisomāgnimaṇḍalāni yathāvidhi kalpayitvā hariṁ mūrtaṁ yasmindeśe sanātanam

उसके मध्य में सूर्य, सोम तथा अग्नि के मण्डलों की यथाविधि कल्पना करके, जिस स्थान में सनातन हरि की मूर्ति की भावना की,

श्लोक 76 (skanda.2.180.76)

पीतांबरधरं विष्णुं शंखचक्रगदाधरम् तं च पुष्पैः समभ्यर्च्य मनस्तस्मिन्निवेश्य च

pītāṁbaradharaṁ viṣṇuṁ śaṁkhacakragadādharam taṁ ca puṣpaiḥ samabhyarcya manastasminniveśya ca

पीताम्बरधारी, शंख-चक्र-गदाधारी विष्णु की उस मूर्ति की पुष्पों से पूजा करके तथा मन को उसमें लगाकर,

श्लोक 77 (skanda.2.180.77)

ब्रह्मरूपं हरिं ध्यायञ्जपन्वै द्वादशाक्षरम् वायुभक्षः स्थितस्तत्र विप्रस्त्रीन्वत्सरान्वसन्

brahmarūpaṁ hariṁ dhyāyañjapanvai dvādaśākṣaram vāyubhakṣaḥ sthitastatra viprastrīnvatsarānvasan

ब्रह्मरूप हरि का ध्यान करते हुए द्वादशाक्षर मन्त्र का जप करते हुए, वह विप्र वायु का आहार करते हुए वहाँ तीन वर्ष तक रहा।

श्लोक 78 (skanda.2.180.78)

ततो द्विजवरो ध्यात्वा स्तुतिं चक्रे हरेरिमाम् प्रणिपत्य जगन्नाथं चराचरगुरुं हरिम् विष्णुशर्माथ तुष्टाव नारायणमतंद्रितः

tato dvijavaro dhyātvā stutiṁ cakre harerimām praṇipatya jagannāthaṁ carācaraguruṁ harim viṣṇuśarmātha tuṣṭāva nārāyaṇamataṁdritaḥ

तब उस श्रेष्ठ द्विज ने ध्यान करके हरि की यह स्तुति की; चराचर के गुरु जगन्नाथ हरि को प्रणाम करके विष्णुशर्मा ने अथक भाव से नारायण को प्रसन्न किया।

श्लोक 79 (skanda.2.180.79)

विष्णुशर्म्मोवाच प्रसीद भगवन्विष्णो प्रसीद पुरुषोत्तम प्रसीद देवदेवेश प्रसीद कमलेक्षण

viṣṇuśarmmovāca prasīda bhagavanviṣṇo prasīda puruṣottama prasīda devadeveśa prasīda kamalekṣaṇa

विष्णुशर्मा ने कहा — हे भगवन् विष्णु, प्रसन्न हों! हे पुरुषोत्तम, प्रसन्न हों! हे देवदेवेश, प्रसन्न हों! हे कमलनयन, प्रसन्न हों!

श्लोक 80 (skanda.2.180.80)

जय कृष्ण जयाचिंत्य जय विष्णो जयाव्यय जय यज्ञपते नाथ जय विष्णो पते विभो

jaya kṛṣṇa jayāciṁtya jaya viṣṇo jayāvyaya jaya yajñapate nātha jaya viṣṇo pate vibho

जय हो कृष्ण! जय हो अचिन्त्य! जय हो विष्णु! जय हो अव्यय! जय हो यज्ञपते नाथ! जय हो विष्णु, प्रभु, विभो!

श्लोक 81 (skanda.2.180.81)

जय पापहरानंत जय जन्मज्वरापह नमः कमलनाभाय नमः कमलमालिने

jaya pāpaharānaṁta jaya janmajvarāpaha namaḥ kamalanābhāya namaḥ kamalamāline

जय हो पापहर, अनन्त! जय हो जन्म-ज्वर को दूर करने वाले! कमलनाभ को नमस्कार, कमलमाली को नमस्कार!

श्लोक 82 (skanda.2.180.82)

नमः सर्वेश भूतेश नमः कैटभसूदन नमस्त्रैलोक्यनाथाय जगन्मूल जगत्पते

namaḥ sarveśa bhūteśa namaḥ kaiṭabhasūdana namastrailokyanāthāya jaganmūla jagatpate

हे सर्वेश, भूतेश, नमस्कार! हे कैटभसूदन, नमस्कार! त्रैलोक्यनाथ, जगन्मूल, जगत्पति को नमस्कार!

श्लोक 83 (skanda.2.180.83)

नमो देवाधिदेवाय नमो नारायणाय वै नमः कृष्णाय रामाय नमश्चक्रायुधाय च

namo devādhidevāya namo nārāyaṇāya vai namaḥ kṛṣṇāya rāmāya namaścakrāyudhāya ca

देवाधिदेव को नमस्कार, नारायण को नमस्कार; कृष्ण को, राम को नमस्कार, तथा चक्रायुध को नमस्कार।

श्लोक 84 (skanda.2.180.84)

त्वं माता सर्वलोकानां त्वमेव जगतः पिता भयार्त्तानां सुहृन्मित्रं त्वं पिता त्वं पितामहः

tvaṁ mātā sarvalokānāṁ tvameva jagataḥ pitā bhayārttānāṁ suhṛnmitraṁ tvaṁ pitā tvaṁ pitāmahaḥ

आप ही सब लोकों की माता हैं, आप ही जगत् के पिता हैं; भय से पीड़ितों के सुहृद् मित्र आप हैं, आप पिता हैं, आप पितामह हैं।

श्लोक 85 (skanda.2.180.85)

त्वं हविस्त्वं वषट्कारस्त्वं प्रभुस्त्वं हुताशनः करणं कारणं कर्त्ता त्वमेव परमेश्वरः

tvaṁ havistvaṁ vaṣaṭkārastvaṁ prabhustvaṁ hutāśanaḥ karaṇaṁ kāraṇaṁ karttā tvameva parameśvaraḥ

आप ही हवि हैं, आप ही वषट्कार हैं, आप ही प्रभु हैं, आप ही हुताशन हैं; करण, कारण और कर्ता आप ही परमेश्वर हैं।

श्लोक 86 (skanda.2.180.86)

शंखचक्रगदापाणे मां समुद्धर माधव

śaṁkhacakragadāpāṇe māṁ samuddhara mādhava

हे शंख-चक्र-गदापाणि माधव, मेरा उद्धार कीजिए।

श्लोक 87 (skanda.2.180.87)

प्रसीद मंदरधर प्रसीद मधुसूदन प्रसीद कमलाकान्त प्रसीद भुवनाधिप

prasīda maṁdaradhara prasīda madhusūdana prasīda kamalākānta prasīda bhuvanādhipa

हे मन्दरधर, प्रसन्न हों! हे मधुसूदन, प्रसन्न हों! हे कमलाकान्त, प्रसन्न हों! हे भुवनाधिप, प्रसन्न हों!

श्लोक 88 (skanda.2.180.88)

अगस्त्य उवाच इत्येवं स्तुवतस्तस्य मनोभक्त्या महात्मनः आविर्बभूव विश्वात्मा विष्णुर्गरुडवाहनः

agastya uvāca ityevaṁ stuvatastasya manobhaktyā mahātmanaḥ āvirbabhūva viśvātmā viṣṇurgaruḍavāhanaḥ

अगस्त्य ने कहा — इस प्रकार मन की भक्ति से स्तुति करते हुए उस महात्मा के समक्ष विश्वात्मा गरुड़वाहन विष्णु प्रकट हुए।

श्लोक 89 (skanda.2.180.89)

शंखचक्रगदापाणिः पीतांबरधरोऽच्युतः उवाच स प्रसन्नात्मा विष्णुशर्माणमव्ययः

śaṁkhacakragadāpāṇiḥ pītāṁbaradharo’cyutaḥ uvāca sa prasannātmā viṣṇuśarmāṇamavyayaḥ

शंख-चक्र-गदा हाथ में लिए, पीताम्बरधारी अच्युत ने प्रसन्न होकर विष्णुशर्मा से कहा।

श्लोक 90 (skanda.2.180.90)

श्रीभगवानुवाच तुष्टोऽस्मि भवतो वत्स महता तपसाऽधुना स्तोत्रेणानेन सुमते नष्टपापोऽसि सांप्रतम्

śrībhagavānuvāca tuṣṭo’smi bhavato vatsa mahatā tapasā’dhunā stotreṇānena sumate naṣṭapāpo’si sāṁpratam

श्रीभगवान् ने कहा — हे वत्स, मैं तुम्हारी इस महान् तपस्या और स्तोत्र से प्रसन्न हूँ, हे सुमते; अब तुम पापरहित हो गए हो।

श्लोक 91 (skanda.2.180.91)

वरं वरय विप्रेन्द्र वरदोऽहं तवाग्रतः नाऽतप्ततपसा द्रष्टुं शक्यः केनाप्यहं द्विज

varaṁ varaya viprendra varado’haṁ tavāgrataḥ nā’taptatapasā draṣṭuṁ śakyaḥ kenāpyahaṁ dvija

हे विप्रेन्द्र, वर माँगो, मैं तुम्हारे समक्ष वरदाता हूँ; हे द्विज, बिना तप किए मैं किसी के द्वारा भी देखा नहीं जा सकता।

श्लोक 92 (skanda.2.180.92)

विष्णुशर्म्मोवाच कृतकृत्योऽस्मि देवेश सांप्रतं तव दर्शनात् त्वद्भक्तिमचलामेकां मम देहि जगत्पते

viṣṇuśarmmovāca kṛtakṛtyo’smi deveśa sāṁprataṁ tava darśanāt tvadbhaktimacalāmekāṁ mama dehi jagatpate

विष्णुशर्मा ने कहा — हे देवेश, अब आपके दर्शन से मैं कृतकृत्य हो गया हूँ; हे जगत्पते, मुझे आपकी अचल भक्ति ही प्रदान कीजिए।

श्लोक 93 (skanda.2.180.93)

श्रीभगवानुवाच भक्तिरस्त्वचला मे वै वैष्णवी मुक्तिदायिनी अत्रैवास्त्वचला मे वै जाह्नवी मुक्तिदायिनी

śrībhagavānuvāca bhaktirastvacalā me vai vaiṣṇavī muktidāyinī atraivāstvacalā me vai jāhnavī muktidāyinī

श्रीभगवान् ने कहा — मेरी मुक्तिदायिनी वैष्णवी भक्ति तुम्हें अचल प्राप्त हो; और यहीं मेरी मुक्तिदायिनी जाह्नवी भी अचल रूप से रहे।

श्लोक 94 (skanda.2.180.94)

इदं स्थानं महाभाग त्वन्नाम्ना ख्यातिमेष्यति

idaṁ sthānaṁ mahābhāga tvannāmnā khyātimeṣyati

हे महाभाग, यह स्थान तुम्हारे नाम से प्रसिद्धि पाएगा।

श्लोक 95 (skanda.2.180.95)

अगस्त्य उवाच इत्युक्त्वा देवदेवेशश्चक्रेणोत्खाय तत्स्थलम् जलं प्रकटयामास गांगं पातालमंडलात्

agastya uvāca ityuktvā devadeveśaścakreṇotkhāya tatsthalam jalaṁ prakaṭayāmāsa gāṁgaṁ pātālamaṁḍalāt

अगस्त्य ने कहा — ऐसा कहकर देवदेवेश ने चक्र से उस स्थान को खोदकर पाताल-मण्डल से गंगाजल प्रकट किया।

श्लोक 96 (skanda.2.180.96)

जलेन तेन भगवान्पवित्रेण दयांबुधिः नीरजस्तु भूमितलं क्षणाच्चक्रे कृपावशात्

jalena tena bhagavānpavitreṇa dayāṁbudhiḥ nīrajastu bhūmitalaṁ kṣaṇāccakre kṛpāvaśāt

उस पवित्र जल से दयासागर भगवान् ने कृपावश क्षणभर में भूतल को निर्मल कर दिया।

श्लोक 97 (skanda.2.180.97)

चक्रतीर्थमिति ख्यातं ततः प्रभृति तद्द्विज जातं त्रैलोक्यविख्यातमघौघध्वंसकृच्छुभम्

cakratīrthamiti khyātaṁ tataḥ prabhṛti taddvija jātaṁ trailokyavikhyātamaghaughadhvaṁsakṛcchubham

तभी से, हे द्विज, वह चक्रतीर्थ के नाम से विख्यात हुआ, त्रैलोक्य में प्रसिद्ध, पापसमूह का नाशक, शुभ।

श्लोक 98 (skanda.2.180.98)

तत्र स्नानेन दानेन विष्णुलोकं व्रजेन्नरः

tatra snānena dānena viṣṇulokaṁ vrajennaraḥ

वहाँ स्नान और दान से मनुष्य विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 99 (skanda.2.180.99)

ततः स भगवान्भूयो विष्णुशर्माणमच्युतः कृपया परया युक्त उवाच द्विजवत्सलः

tataḥ sa bhagavānbhūyo viṣṇuśarmāṇamacyutaḥ kṛpayā parayā yukta uvāca dvijavatsalaḥ

तब वह भगवान् अच्युत, द्विजवत्सल, परम कृपा से युक्त होकर पुनः विष्णुशर्मा से बोले।

श्लोक 100 (skanda.2.180.100)

श्रीभगवानुवाच त्वन्नामपूर्विका विप्र मन्मूर्तिरिह तिष्ठतु विष्णुहरीति विख्याता भक्तानां मुक्तिदायिनी

śrībhagavānuvāca tvannāmapūrvikā vipra manmūrtiriha tiṣṭhatu viṣṇuharīti vikhyātā bhaktānāṁ muktidāyinī

श्रीभगवान् ने कहा — हे विप्र, यहाँ मेरी मूर्ति तुम्हारे नाम को आगे लेकर स्थित रहे, भक्तों को मुक्ति देने वाली 'विष्णुहरि' के नाम से विख्यात।

श्लोक 101 (skanda.2.180.101)

अगस्त्य उवाच इति श्रुत्वा वचो विप्रो वासुदेवस्य बुद्धिमान् स्वनामपूर्विकां मूर्तिं स्थापयामास चक्रिणः

agastya uvāca iti śrutvā vaco vipro vāsudevasya buddhimān svanāmapūrvikāṁ mūrtiṁ sthāpayāmāsa cakriṇaḥ

अगस्त्य ने कहा — वासुदेव के यह वचन सुनकर उस बुद्धिमान् विप्र ने चक्रधारी की मूर्ति को अपने नाम को आगे रखकर स्थापित किया।

श्लोक 102 (skanda.2.180.102)

ततः प्रभति विप्रेश शंखचक्रगदाधरः पीतवासाश्चतुर्बाहुर्नाम्ना विष्णुहरिः स्थितः

tataḥ prabhati vipreśa śaṁkhacakragadādharaḥ pītavāsāścaturbāhurnāmnā viṣṇuhariḥ sthitaḥ

तभी से, हे विप्रेश, शंख-चक्र-गदाधारी, पीताम्बरधारी, चतुर्भुज वह मूर्ति विष्णुहरि नाम से स्थित है।

श्लोक 103 (skanda.2.180.103)

कार्तिके शुक्लपक्षस्य प्रारभ्य दशमी तिथिम् पूर्णिमामवधिं कृत्वा यात्रा सांवत्सरी भवेत्

kārtike śuklapakṣasya prārabhya daśamī tithim pūrṇimāmavadhiṁ kṛtvā yātrā sāṁvatsarī bhavet

कार्तिक शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से आरम्भ करके पूर्णिमा तक की अवधि में वार्षिक यात्रा होती है।

श्लोक 104 (skanda.2.180.104)

चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते बहुवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते

cakratīrthe naraḥ snātvā sarvapāpaiḥ pramucyate bahuvarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

चक्रतीर्थ में स्नान करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है तथा बहुत हजार वर्षों तक स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित रहता है।

श्लोक 105 (skanda.2.180.105)

पितॄनुद्दिश्य यस्तत्र पिंडान्निर्वापयिष्यति तृप्तास्तु पितरो यान्ति विष्णुलोकं न संशयः

pitṝnuddiśya yastatra piṁḍānnirvāpayiṣyati tṛptāstu pitaro yānti viṣṇulokaṁ na saṁśayaḥ

जो वहाँ पितरों के उद्देश्य से पिण्डदान करता है, उसके पितर तृप्त होकर निःसंदेह विष्णुलोक को जाते हैं।

श्लोक 106 (skanda.2.180.106)

चक्रतीर्थे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा विष्णुहरिं विभुम् सर्वपापक्षयं प्राप्य नाकपृष्ठे महीयते

cakratīrthe naraḥ snātvā dṛṣṭvā viṣṇuhariṁ vibhum sarvapāpakṣayaṁ prāpya nākapṛṣṭhe mahīyate

चक्रतीर्थ में स्नान करके तथा विभु विष्णुहरि का दर्शन करके मनुष्य समस्त पापों का क्षय पाकर स्वर्ग के शिखर पर प्रतिष्ठित होता है।

श्लोक 107 (skanda.2.180.107)

स्वशक्त्या तत्र दानानि दत्त्वा निष्कल्मषो नरः विष्णुलोके वसेद्धीमान्यावदिन्द्राश्चतुर्दश

svaśaktyā tatra dānāni dattvā niṣkalmaṣo naraḥ viṣṇuloke vaseddhīmānyāvadindrāścaturdaśa

अपनी शक्ति के अनुसार वहाँ दान देकर निष्पाप हुआ बुद्धिमान् मनुष्य चौदह इन्द्रों के काल तक विष्णुलोक में निवास करता है।

श्लोक 108 (skanda.2.180.108)

अन्यदापि नरस्तत्र चक्रतीथे जितेंद्रियः दृष्ट्वा सकृद्धरिं देवं सर्वपापैः प्रमुच्यते

anyadāpi narastatra cakratīthe jiteṁdriyaḥ dṛṣṭvā sakṛddhariṁ devaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

किसी अन्य समय भी जितेन्द्रिय मनुष्य चक्रतीर्थ में एक बार भी देव हरि का दर्शन करके समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 109 (skanda.2.180.109)

इति सकलगुणाब्धिर्ध्येयमूर्तिश्चिदात्मा हरिरिह परमूर्त्या तस्थिवान्मुक्तिहेतोः तमिह बहुलभक्त्या चक्रतीर्थाभिषेकी वसति सुकृतिमूर्त्तिर्योऽर्चयेद्विष्णुलोके

iti sakalaguṇābdhirdhyeyamūrtiścidātmā haririha paramūrtyā tasthivānmuktihetoḥ tamiha bahulabhaktyā cakratīrthābhiṣekī vasati sukṛtimūrttiryo’rcayedviṣṇuloke

इस प्रकार सम्पूर्ण गुणों के सागर, ध्यान करने योग्य मूर्ति वाले, चिदात्मा हरि यहाँ मुक्ति के हेतु परम मूर्ति में स्थित रहे हैं; जो चक्रतीर्थ में स्नान करके प्रचुर भक्ति से यहाँ उनकी अर्चना करता है, वह पुण्यात्मा विष्णुलोक में निवास करता है।

अध्याय 179अध्याय-सूचीअध्याय 181