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वैष्णव खण्ड · अध्याय 221

ग्रन्थसम्प्रदायप्रवृत्ति-निरूपण

अध्याय 220अध्याय-सूची

श्लोक 1 (skanda.2.221.1)

स्कन्द उवाच । इति स्तुत्वा तमीशानं नारदः स ययौ ततः । शम्याप्रासाभिधं ब्रह्मन्व्यासस्याश्रममादितः

skanda uvāca | iti stutvā tamīśānaṁ nāradaḥ sa yayau tataḥ | śamyāprāsābhidhaṁ brahmanvyāsasyāśramamāditaḥ

स्कन्द ने कहा - इस प्रकार उन ईशान की स्तुति करके नारद वहाँ से हे ब्रह्मन्! सबसे पहले शम्याप्रास नामक व्यास के आश्रम को गए।

श्लोक 2 (skanda.2.221.2)

सादरं मानितस्तेन प्रत्युत्थानासनादिभिः । तस्मा एकान्तिकं धर्म्मं प्राह जिज्ञासवे स च

sādaraṁ mānitastena pratyutthānāsanādibhiḥ | tasmā ekāntikaṁ dharmmaṁ prāha jijñāsave sa ca

उठकर स्वागत, आसन आदि से उनके द्वारा आदरपूर्वक सम्मानित होकर, उन्होंने जिज्ञासु व्यास को एकान्तिक धर्म कहा।

श्लोक 3 (skanda.2.221.3)

ततो ब्रह्मसभां गत्वा ब्रह्मणः शृण्वतो मुनिः । देवान्पितॄन्महर्षींश्च तत्रस्थांस्तमुपादिशत्

tato brahmasabhāṁ gatvā brahmaṇaḥ śṛṇvato muniḥ | devānpitṝnmaharṣīṁśca tatrasthāṁstamupādiśat

फिर ब्रह्मा की सभा में जाकर, ब्रह्मा के सुनते हुए, मुनि ने वहाँ उपस्थित देवताओं, पितरों और महर्षियों को भी उसका उपदेश दिया।

श्लोक 4 (skanda.2.221.4)

तत्रस्थितो भास्करश्च धर्म्ममेतं पुनर्म्मुने । शुश्राव नारदात्सर्वं श्रुतं नारायणात्पुरा

tatrasthito bhāskaraśca dharmmametaṁ punarmmune | śuśrāva nāradātsarvaṁ śrutaṁ nārāyaṇātpurā

हे मुने! वहाँ उपस्थित सूर्य ने भी नारद से यह धर्म पुनः पूरा सुना, जो पहले नारायण से सुना गया था।

श्लोक 5 (skanda.2.221.5)

स प्राहात्माग्रयायिभ्यो वालखिल्येभ्य आदरात् । मेरौ ते संगतान्देवानिन्द्रादींश्च न्यशामयन्

sa prāhātmāgrayāyibhyo vālakhilyebhya ādarāt | merau te saṁgatāndevānindrādīṁśca nyaśāmayan

उन्होंने आदरपूर्वक अपने अग्रगामी वालखिल्य ऋषियों से इसे कहा; उन्होंने मेरु पर्वत पर एकत्रित इन्द्रादि देवताओं को यह ज्ञान कराया।

श्लोक 6 (skanda.2.221.6)

तेभ्योऽसितो मुनिः श्रुत्वा धर्ममेतं द्विजोत्तम । पितृभ्यः कथयामास पितृलोकं गतः क्वचित्

tebhyo'sito muniḥ śrutvā dharmametaṁ dvijottama | pitṛbhyaḥ kathayāmāsa pitṛlokaṁ gataḥ kvacit

हे द्विजोत्तम! उनसे यह धर्म सुनकर मुनि असित ने एक बार पितृलोक जाकर पितरों को यह कहा।

श्लोक 7 (skanda.2.221.7)

पितरस्ते त्वर्यमाद्या ऊचिरे शंतनुं नृपम् । स भीष्माय स्वपुत्राय कथयामास तत्त्वतः

pitaraste tvaryamādyā ūcire śaṁtanuṁ nṛpam | sa bhīṣmāya svaputrāya kathayāmāsa tattvataḥ

अर्यमा आदि उन पितरों ने राजा शन्तनु से यह कहा; और उन्होंने अपने पुत्र भीष्म को यथार्थ रूप से इसे बताया।

श्लोक 8 (skanda.2.221.8)

सोपि भारतयुद्धान्ते धर्म्मराजाय पृच्छते । शयानः शरशय्यायां प्राह संसदि भूयसि

sopi bhāratayuddhānte dharmmarājāya pṛcchate | śayānaḥ śaraśayyāyāṁ prāha saṁsadi bhūyasi

भारत-युद्ध की समाप्ति पर बाण-शय्या पर लेटे हुए उन्होंने भी पूछने वाले धर्मराज को विशाल सभा में यह कहा।

श्लोक 9 (skanda.2.221.9)

तत्र श्रुत्वा नारदोपि स्थितः सदसि सादरम् । कैलासे शंकरं प्राह स च मां मुनिसत्तम

tatra śrutvā nāradopi sthitaḥ sadasi sādaram | kailāse śaṁkaraṁ prāha sa ca māṁ munisattama

वहाँ उस सभा में आदरपूर्वक उपस्थित नारद ने भी इसे सुना; उन्होंने कैलास पर शंकर को यह कहा; और हे मुनिश्रेष्ठ! उन्होंने मुझे यह बताया।

श्लोक 10 (skanda.2.221.10)

मया ते कथितं ब्रह्मन्पृच्छते धर्म्मवर्त्तिने । पात्रायैतत्प्रदातव्यमिति मां हि पिताब्रवीत्

mayā te kathitaṁ brahmanpṛcchate dharmmavarttine | pātrāyaitatpradātavyamiti māṁ hi pitābravīt

हे ब्रह्मन्! धर्मपरायण होकर पूछने वाले तुमसे मैंने यह कहा है; क्योंकि मेरे पिता ने मुझसे कहा था कि यह केवल योग्य पात्र को ही देना चाहिए।

श्लोक 11 (skanda.2.221.11)

येनयेन श्रुतं ह्येतन्माहात्म्यं सात्वतांपतेः । स स तस्मिन्परां भक्तिं चकार स्वविमुक्तये

yenayena śrutaṁ hyetanmāhātmyaṁ sātvatāṁpateḥ | sa sa tasminparāṁ bhaktiṁ cakāra svavimuktaye

जिस-जिस ने भी सात्वतपति की इस महिमा को सुना, उस-उस ने अपनी मुक्ति के लिए उनमें परम भक्ति की।

श्लोक 12 (skanda.2.221.12)

युधिष्ठिरोपि राजर्षिः श्रुत्वा भीष्मेण कीर्त्तितम् । माहात्म्यं देवकीसूनोर्म्मुमुदे भ्रातृभिः सह

yudhiṣṭhiropi rājarṣiḥ śrutvā bhīṣmeṇa kīrttitam | māhātmyaṁ devakīsūnormmumude bhrātṛbhiḥ saha

राजर्षि युधिष्ठिर ने भी भीष्म द्वारा कही गई देवकीनन्दन की महिमा सुनकर अपने भाइयों सहित हर्षित हुए।

श्लोक 13 (skanda.2.221.13)

तमात्मनो मातुलेयं सर्वकारणकारणम् । निशम्याश्चर्य्यजलधौ निममज्ज महामतिः

tamātmano mātuleyaṁ sarvakāraṇakāraṇam | niśamyāścaryyajaladhau nimamajja mahāmatiḥ

अपने मामा के पुत्र को ही समस्त कारणों का कारण जानकर, वह महामति आश्चर्य के समुद्र में डूब गए।

श्लोक 14 (skanda.2.221.14)

वासुदेवादिकं व्यूह वाराहादींश्च सर्व्वशः । अवतारानपि नृपो मेनेऽस्यैव रमापतेः

vāsudevādikaṁ vyūha vārāhādīṁśca sarvvaśaḥ | avatārānapi nṛpo mene'syaiva ramāpateḥ

राजा ने वासुदेव आदि व्यूह तथा वराह आदि सभी अवतारों को इसी लक्ष्मीपति का ही रूप माना।

श्लोक 15 (skanda.2.221.15)

ततः सहानुजो राजा दिव्यमानुषविग्रहे । अत्यन्तं भक्तिमान्कृष्णे बभूव द्विजसत्तम

tataḥ sahānujo rājā divyamānuṣavigrahe | atyantaṁ bhaktimānkṛṣṇe babhūva dvijasattama

हे द्विजसत्तम! फिर वह राजा अपने छोटे भाइयों सहित, दिव्य-मानव विग्रह वाले कृष्ण में अत्यन्त भक्तिमान हो गए।

श्लोक 16 (skanda.2.221.16)

श्रुत्वेमां च कथां सर्व्वे ब्रह्मराजसुरर्षयः । सभायां तत्र ये चासंस्तेप्यभूवन्सविस्मयाः

śrutvemāṁ ca kathāṁ sarvve brahmarājasurarṣayaḥ | sabhāyāṁ tatra ye cāsaṁstepyabhūvansavismayāḥ

इस कथा को सुनकर सभा में उपस्थित सभी ब्राह्मण, राजा, देवता और ऋषि भी आश्चर्यचकित हो गए।

श्लोक 17 (skanda.2.221.17)

कृष्णमेव परं ब्रह्म विदित्वा ते नराकृति । भक्तिं प्रपेदिरे तस्मिन्प्रणमन्तस्तमादरात्

kṛṣṇameva paraṁ brahma viditvā te narākṛti | bhaktiṁ prapedire tasminpraṇamantastamādarāt

मनुष्याकृति में स्थित कृष्ण को ही परब्रह्म जानकर, उन्होंने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम करते हुए उनमें भक्ति ग्रहण की।

श्लोक 18 (skanda.2.221.18)

इत्थं तस्यास्ति माहात्म्यमतस्त्वमपि सन्मते । सर्वात्मना वासुदेवं तमेव भज भक्तितः

itthaṁ tasyāsti māhātmyamatastvamapi sanmate | sarvātmanā vāsudevaṁ tameva bhaja bhaktitaḥ

इस प्रकार उनकी महिमा है; इसलिए हे सन्मते! तुम भी सर्वात्मना उन्हीं वासुदेव का भक्तिपूर्वक भजन करो।

श्लोक 19 (skanda.2.221.19)

श्रीवासुदेवमाहात्म्यमेतत्ते कथितं मया । दुर्वासनोपशमनं भगवद्भक्तिवर्द्धनम्

śrīvāsudevamāhātmyametatte kathitaṁ mayā | durvāsanopaśamanaṁ bhagavadbhaktivarddhanam

यह श्री वासुदेव की महिमा मैंने तुम्हें बताई है, जो दुर्वासनाओं को शान्त करने वाली और भगवद्भक्ति को बढ़ाने वाली है।

श्लोक 20 (skanda.2.221.20)

कथितानि पुराणेऽत्र मयाख्यानानि यानि ते । तेषां सार इदं ब्रह्मन्निर्म्मथ्यैव समुद्धृतः

kathitāni purāṇe'tra mayākhyānāni yāni te | teṣāṁ sāra idaṁ brahmannirmmathyaiva samuddhṛtaḥ

हे ब्रह्मन्! इस पुराण में मैंने जो आख्यान तुम्हें कहे हैं, उन सबका सार मन्थन करके ही यह निकाला गया है।

श्लोक 21 (skanda.2.221.21)

वेदोपनिषदां चैतद्रसो वै सांख्ययोगयोः । पञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य धर्मशास्त्रस्य चानघ

vedopaniṣadāṁ caitadraso vai sāṁkhyayogayoḥ | pañcarātrasya kṛtsnasya dharmaśāstrasya cānagha

हे निष्पाप! यह वेद-उपनिषदों का, सांख्य-योग का, सम्पूर्ण पंचरात्र का और धर्मशास्त्र का भी सार है।

श्लोक 22 (skanda.2.221.22)

धन्यं यशस्यं चायुष्यमेतत्परममङ्गलम् । साक्षाद्भगवता गीतं सर्वाभद्रविनाशनम्

dhanyaṁ yaśasyaṁ cāyuṣyametatparamamaṅgalam | sākṣādbhagavatā gītaṁ sarvābhadravināśanam

यह धन्य, यशस्वी और आयुष्यकारक, परम मंगलमय है, साक्षात् भगवान् द्वारा गाया गया और सभी अमंगलों का नाशक है।

श्लोक 23 (skanda.2.221.23)

य एतच्छृणुयात्पुण्यं कीर्त्तयेदथ यः पठेत् । वासुदेवे भवेत्तेषामचला निर्मला मतिः

ya etacchṛṇuyātpuṇyaṁ kīrttayedatha yaḥ paṭhet | vāsudeve bhavetteṣāmacalā nirmalā matiḥ

जो कोई इस पवित्र कथा को सुनता है, कीर्तन करता है अथवा पढ़ता है, उनकी बुद्धि वासुदेव में अचल और निर्मल हो जाती है।

श्लोक 24 (skanda.2.221.24)

भक्ता एकान्तिकास्ते च भवेयुस्तस्य मानवाः । ब्रह्मरूपा व्रजन्त्यन्ते ब्रह्मधाम तमःपरम्

bhaktā ekāntikāste ca bhaveyustasya mānavāḥ | brahmarūpā vrajantyante brahmadhāma tamaḥparam

वे मनुष्य उनके एकान्तिक भक्त बन जाते हैं, और ब्रह्मरूप होकर अन्त में अन्धकार से परे ब्रह्मधाम को जाते हैं।

श्लोक 25 (skanda.2.221.25)

धर्मार्थी लभतेऽनेन धर्मं कामं च कामुकः । धनार्थी धनमाप्नोति मोक्षार्थी मोक्षमुत्तमम्

dharmārthī labhate'nena dharmaṁ kāmaṁ ca kāmukaḥ | dhanārthī dhanamāpnoti mokṣārthī mokṣamuttamam

इससे धर्मार्थी धर्म को, कामी काम को, धनार्थी धन को, और मोक्षार्थी उत्तम मोक्ष को प्राप्त करता है।

श्लोक 26 (skanda.2.221.26)

लभेत विद्यां विद्यार्थी मुच्येद्रुग्णश्च रोगतः । एतच्छ्रवणमात्रेण सर्वपापक्षयो भवेत्

labheta vidyāṁ vidyārthī mucyedrugṇaśca rogataḥ | etacchravaṇamātreṇa sarvapāpakṣayo bhavet

विद्यार्थी विद्या प्राप्त करता है, और रोगी रोग से मुक्त हो जाता है; इसके श्रवण मात्र से समस्त पापों का क्षय हो जाता है।

श्लोक 27 (skanda.2.221.27)

ब्राह्मं तेजो लभेद्विप्रः क्षत्रियश्च नरेशताम् । धनं वैश्यः सुखं शूद्रः श्रवणादस्य चाप्नुयात्

brāhmaṁ tejo labhedvipraḥ kṣatriyaśca nareśatām | dhanaṁ vaiśyaḥ sukhaṁ śūdraḥ śravaṇādasya cāpnuyāt

इसके श्रवण से ब्राह्मण ब्रह्मतेज प्राप्त करता है, क्षत्रिय राजपद, वैश्य धन, और शूद्र सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 28 (skanda.2.221.28)

एतच्छ्रुत्वा रणं गच्छन्विजयं चाप्नुयान्नृपः । प्राप्नुयात्स्त्री च सौभाग्यं कन्या च स्वेप्सितं वरम्

etacchrutvā raṇaṁ gacchanvijayaṁ cāpnuyānnṛpaḥ | prāpnuyātstrī ca saubhāgyaṁ kanyā ca svepsitaṁ varam

इसे सुनकर युद्ध में जाने वाला राजा विजय प्राप्त करता है; स्त्री सौभाग्य और कन्या अपने इच्छित वर को प्राप्त करती है।

श्लोक 29 (skanda.2.221.29)

एतस्य श्रुतिकीर्त्तिभ्यः शास्त्रजातशिरोमणेः । यं यं यः कामयेत्कामं तंतं प्राप्नोति मानवः

etasya śrutikīrttibhyaḥ śāstrajātaśiromaṇeḥ | yaṁ yaṁ yaḥ kāmayetkāmaṁ taṁtaṁ prāpnoti mānavaḥ

समस्त शास्त्रों के शिरोमणि इसके श्रवण-कीर्तन से मनुष्य जिस-जिस कामना को चाहता है, उस-उसे प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 30 (skanda.2.221.30)

तस्मात्त्वं सर्वदा भक्त्या पठन्नेतद्द्विजोत्तम । कायवाणीमनोभिस्तं भजेथा भक्तवत्सलम्

tasmāttvaṁ sarvadā bhaktyā paṭhannetaddvijottama | kāyavāṇīmanobhistaṁ bhajethā bhaktavatsalam

इसलिए हे द्विजोत्तम! सदा भक्तिपूर्वक इसे पढ़ते हुए, तुम काया, वाणी और मन से भक्तवत्सल उन प्रभु का भजन करो।

श्लोक 31 (skanda.2.221.31)

सौतिरुवाच । एतन्महासेनमुखाब्जनिःसृतं सावर्णिरापीय वचोमृतं सः । चकार भक्तिं वसुदेवनन्दने नराकृतिब्रह्मणि सर्वमङ्गले

sautiruvāca | etanmahāsenamukhābjaniḥsṛtaṁ sāvarṇirāpīya vacomṛtaṁ saḥ | cakāra bhaktiṁ vasudevanandane narākṛtibrahmaṇi sarvamaṅgale

सूत ने कहा - महासेन के मुख-कमल से निकले इस वचनामृत को पीकर, उन सावर्णि ने वसुदेव-नन्दन, नराकृति सर्वमंगल ब्रह्म में भक्ति की।

श्लोक 32 (skanda.2.221.32)

यूयं च सर्वे निगमागमज्ञा ब्रह्मण्यदेवं भजनीयमीशम् । भजध्वमेकं तमुदारकीर्त्तिं श्रीवासुदेवं निजधर्मसंस्थाः

yūyaṁ ca sarve nigamāgamajñā brahmaṇyadevaṁ bhajanīyamīśam | bhajadhvamekaṁ tamudārakīrttiṁ śrīvāsudevaṁ nijadharmasaṁsthāḥ

और तुम सब, जो वेद और आगमों के ज्ञाता हो, अपने-अपने धर्म में स्थित रहते हुए, उदार कीर्ति वाले उस एक ब्राह्मण्यदेव, पूजनीय ईश्वर श्री वासुदेव का भजन करो।

श्लोक 33 (skanda.2.221.33)

गोलोकधामपतये प्रकाशचयमूर्त्तये । नमोस्तु वासुदेवाय भक्त्यानन्दविवृद्धये

golokadhāmapataye prakāśacayamūrttaye | namostu vāsudevāya bhaktyānandavivṛddhaye

गोलोक धाम के स्वामी, प्रकाश-पुंज स्वरूप वासुदेव को नमस्कार हो, जो भक्ति के आनन्द की वृद्धि करने वाले हैं।

अध्याय 220अध्याय-सूची