वैष्णव खण्ड · अध्याय 220
श्रीनरनारायण-स्तुति-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.220.1)
स्कन्द उवाच । श्रुत्वैतत्सकलं धर्म्यं यथावद्भगवद्वचः । निःसंशयो मुनिः प्राह तं प्रणम्य कृताञ्जलिः
skanda uvāca | śrutvaitatsakalaṁ dharmyaṁ yathāvadbhagavadvacaḥ | niḥsaṁśayo muniḥ prāha taṁ praṇamya kṛtāñjaliḥ
स्कन्द ने कहा - भगवान् द्वारा यथावत् कहे गए इस सम्पूर्ण धर्मयुक्त वचन को सुनकर, संशयरहित मुनि ने उन्हें प्रणाम करके हाथ जोड़कर कहा।
श्लोक 2 (skanda.2.220.2)
नारद उवाच । नष्टा मे संशयाः सर्वे प्रसादाद्भगवंस्तव । वासुदेवस्य माहात्म्यं मयाधिगतमञ्जसा
nārada uvāca | naṣṭā me saṁśayāḥ sarve prasādādbhagavaṁstava | vāsudevasya māhātmyaṁ mayādhigatamañjasā
नारद ने कहा - हे भगवन्! आपकी कृपा से मेरे सभी संशय नष्ट हो गए हैं; मैंने वासुदेव की महिमा को सम्यक् रूप से जान लिया है।
श्लोक 3 (skanda.2.220.3)
कंचित्कालमिहैवाहं तपः कुर्वंस्त्वया सह । शृण्वंश्च नित्यं ज्ञानादि करिष्ये पक्वमात्मनः
kaṁcitkālamihaivāhaṁ tapaḥ kurvaṁstvayā saha | śṛṇvaṁśca nityaṁ jñānādi kariṣye pakvamātmanaḥ
मैं कुछ काल तक यहीं आपके साथ तप करते हुए और नित्य ज्ञानादि सुनते हुए अपने आपको परिपक्व करूँगा।
श्लोक 4 (skanda.2.220.4)
स्कन्द उवाच । इत्युक्त्वा नारदस्तत्र तेन चाप्यनुमोदितः । उवास दिव्यवर्षाणां सहस्रं स तपश्चरन्
skanda uvāca | ityuktvā nāradastatra tena cāpyanumoditaḥ | uvāsa divyavarṣāṇāṁ sahasraṁ sa tapaścaran
स्कन्द ने कहा - ऐसा कहकर नारद, उनकी अनुमति पाकर, वहाँ तप करते हुए एक हजार दिव्य वर्षों तक निवास किए।
श्लोक 5 (skanda.2.220.5)
शुश्राव चानुदिवसं यथाकालं हरेर्मुखात् । धर्मज्ञानाद्यथ प्राप पक्वतां तत्र योगिराट्
śuśrāva cānudivasaṁ yathākālaṁ harermukhāt | dharmajñānādyatha prāpa pakvatāṁ tatra yogirāṭ
वे प्रतिदिन यथासमय हरि के मुख से सुनते रहे; और उस योगिराज ने वहाँ धर्म-ज्ञान आदि में परिपक्वता प्राप्त की।
श्लोक 6 (skanda.2.220.6)
स्नेहं च परमं प्राप स श्रीकृष्णेऽखिलात्मनि । गुणगानपरो नित्यमास भागवताग्रणीः
snehaṁ ca paramaṁ prāpa sa śrīkṛṣṇe'khilātmani | guṇagānaparo nityamāsa bhāgavatāgraṇīḥ
उन्होंने सर्वात्मा श्रीकृष्ण के प्रति परम स्नेह प्राप्त किया, और सदा उनके गुण-गान में तत्पर रहकर भागवतों में अग्रणी बन गए।
श्लोक 7 (skanda.2.220.7)
भक्तिनिष्ठां परां प्राप्तमथ तं सिद्धयोगिनम् । उवाच भगवत्प्रीतः श्रेयस्कृत्सर्वदेहिनाम्
bhaktiniṣṭhāṁ parāṁ prāptamatha taṁ siddhayoginam | uvāca bhagavatprītaḥ śreyaskṛtsarvadehinām
फिर परम भक्ति-निष्ठा प्राप्त, सिद्ध योगी बने उन नारद से, भगवान् ने प्रसन्न होकर, सभी प्राणियों का कल्याण करने वाली बात कही।
श्लोक 8 (skanda.2.220.8)
श्रीनारायण उवाच । सिद्धोसि त्वं महर्षेऽद्य गच्छ लोकहितं कुरु । एकान्तधर्मं सर्वत्र प्रवर्त्तयितुमर्हसि
śrīnārāyaṇa uvāca | siddhosi tvaṁ maharṣe'dya gaccha lokahitaṁ kuru | ekāntadharmaṁ sarvatra pravarttayitumarhasi
श्री नारायण ने कहा - हे महर्षे! अब तुम सिद्ध हो गए हो; जाओ, लोक-कल्याण करो। तुम सर्वत्र एकान्तिक धर्म का प्रचार करने के योग्य हो।
श्लोक 9 (skanda.2.220.9)
स्कन्द उवाच । इत्याज्ञां शिरसा तस्य स आदाय जगद्गुरोः । गच्छंस्ततस्तमस्तौषीत्प्रणम्य प्राञ्जलिः स्थितः
skanda uvāca | ityājñāṁ śirasā tasya sa ādāya jagadguroḥ | gacchaṁstatastamastauṣītpraṇamya prāñjaliḥ sthitaḥ
स्कन्द ने कहा - जगद्गुरु की उस आज्ञा को सिर-माथे लेकर, जाते हुए नारद ने प्रणाम करके, हाथ जोड़े खड़े होकर उनकी स्तुति की।
श्लोक 10 (skanda.2.220.10)
नारद उवाच । नमोनमस्ते भगवञ्जगद्गुरो नारायणाऽप्राकृत दिव्यमूर्ते । अनन्तकल्याणगुणाकरस्त्वं दासे मयि प्रीततरः मदा स्याः
nārada uvāca | namonamaste bhagavañjagadguro nārāyaṇā'prākṛta divyamūrte | anantakalyāṇaguṇākarastvaṁ dāse mayi prītataraḥ madā syāḥ
नारद ने कहा - हे भगवन्, जगद्गुरु, अप्राकृत दिव्यमूर्ति नारायण! आपको बार-बार नमस्कार है; आप अनन्त कल्याणकारी गुणों की खान हैं; अपने इस दास पर आप अधिक प्रसन्न हों।
श्लोक 11 (skanda.2.220.11)
त्वं वासुदेवोसि जगन्निवासः क्षेमाय लोकस्य तपः करोषि । योगेश्वरेशोपशमस्थ आत्मारामाधिपस्त्वं परहंससद्गुरुः
tvaṁ vāsudevosi jagannivāsaḥ kṣemāya lokasya tapaḥ karoṣi | yogeśvareśopaśamastha ātmārāmādhipastvaṁ parahaṁsasadguruḥ
आप ही वासुदेव हैं, जगत् के निवासस्थान हैं; आप लोक-कल्याण के लिए तप करते हैं। आप योगेश्वरों के भी ईश्वर, उपशम में स्थित, आत्माराम के अधिपति, परमहंसों के सद्गुरु हैं।
श्लोक 12 (skanda.2.220.12)
विभुर्ऋषीणामृषभोऽक्षरात्मा जीवेश्वराणां च नियामकोसि । साक्षी महापूरुष आत्मतन्त्रः कालोऽभवद्यद्भ्रुकुटेर्महांश्च
vibhurṛṣīṇāmṛṣabho'kṣarātmā jīveśvarāṇāṁ ca niyāmakosi | sākṣī mahāpūruṣa ātmatantraḥ kālo'bhavadyadbhrukuṭermahāṁśca
आप ऋषियों में सर्वव्यापी श्रेष्ठ, अक्षरस्वरूप हैं, तथा जीवों और ईश्वरों के नियन्ता हैं; आप साक्षी, महापुरुष, स्वतन्त्र हैं, जिनकी भौंहों के संकेत मात्र से महान काल भी उत्पन्न हुआ।
श्लोक 13 (skanda.2.220.13)
सर्गादिलीला जगतां त्वमीश करोषि मायापुरुषात्मनैव । तथाप्यकर्त्ता ननु निर्गुणोसि भूमा परब्रह्म परात्परश्च
sargādilīlā jagatāṁ tvamīśa karoṣi māyāpuruṣātmanaiva | tathāpyakarttā nanu nirguṇosi bhūmā parabrahma parātparaśca
हे ईश! आप माया-पुरुष के स्वरूप से ही जगतों की सृष्टि आदि लीला करते हैं; फिर भी आप अकर्ता, निर्गुण, अनन्त, परब्रह्म और परात्पर हैं।
श्लोक 14 (skanda.2.220.14)
सत्यः स्वयंज्योतिरतर्क्यशक्तिस्त्वं ब्रह्मभूतात्मविचिन्त्यमूर्त्तिः । बृहद्व्रताचार्य महामुनीन्द्र कन्दर्पदर्पापहरप्रताप
satyaḥ svayaṁjyotiratarkyaśaktistvaṁ brahmabhūtātmavicintyamūrttiḥ | bṛhadvratācārya mahāmunīndra kandarpadarpāpaharapratāpa
आप सत्य, स्वयंज्योति, अतर्क्य शक्तिशाली, ब्रह्मस्वरूप, अचिन्त्य विग्रह वाले हैं; हे बृहद्व्रताचार्य, महामुनीन्द्र, कामदेव के दर्प का हरण करने वाले प्रतापी!
श्लोक 15 (skanda.2.220.15)
तपस्विनां ये रिपवः प्रसिद्धाः क्रोधो रसो मत्सरलोभमुख्याः । अप्याश्रमं तेपि कदापि वेष्टुं नेमं क्षमा ह्येष तव प्रतापः
tapasvināṁ ye ripavaḥ prasiddhāḥ krodho raso matsaralobhamukhyāḥ | apyāśramaṁ tepi kadāpi veṣṭuṁ nemaṁ kṣamā hyeṣa tava pratāpaḥ
तपस्वियों के प्रसिद्ध शत्रु - क्रोध, रसास्वाद, तथा ईर्ष्या-लोभ आदि - वे भी कभी इस आश्रम में प्रवेश नहीं कर सकते; यही आपका प्रताप है।
श्लोक 16 (skanda.2.220.16)
छन्दोमयो ज्ञानमयोऽमृताध्वा धर्मात्मको धर्मसर्गाभिपोष्टा । उन्मूलिताधर्मसर्गो महात्मा त्वमव्ययश्चाक्षयोऽव्यक्तबन्धुः
chandomayo jñānamayo'mṛtādhvā dharmātmako dharmasargābhipoṣṭā | unmūlitādharmasargo mahātmā tvamavyayaścākṣayo'vyaktabandhuḥ
आप छन्दोमय, ज्ञानमय, अमृतमार्ग, धर्मस्वरूप, धर्म की सृष्टि के पोषक हैं; आप अधर्म की सृष्टि को उखाड़ फेंकने वाले महात्मा, अव्यय, अक्षय, अव्यक्त के बन्धु हैं।
श्लोक 17 (skanda.2.220.17)
निर्दोषरूपस्य तवाऽखिलाः क्रिया भवन्ति वै निर्गुणा निर्गुणस्य । धर्मार्थकामेप्सुभिरर्चनीयस्त्वमीश्वरो नाथ मुमुक्षुभिश्च
nirdoṣarūpasya tavā'khilāḥ kriyā bhavanti vai nirguṇā nirguṇasya | dharmārthakāmepsubhirarcanīyastvamīśvaro nātha mumukṣubhiśca
निर्दोष स्वरूप वाले आपकी समस्त क्रियाएँ निर्गुण ही होती हैं, क्योंकि आप स्वयं निर्गुण हैं; हे ईश्वर, हे नाथ! आप धर्म-अर्थ-काम की इच्छा रखने वालों तथा मुमुक्षुओं दोनों के द्वारा पूजनीय हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.220.18)
त्वं कालमायायमसंसृतिभ्यो महाभयात्पातुमेकः समर्थः । भक्तापराधाननवेक्षमाणो महादयालुः किल भक्तवत्सलः
tvaṁ kālamāyāyamasaṁsṛtibhyo mahābhayātpātumekaḥ samarthaḥ | bhaktāparādhānanavekṣamāṇo mahādayāluḥ kila bhaktavatsalaḥ
आप ही अकेले काल, माया, यम और संसार के महाभय से रक्षा करने में समर्थ हैं; भक्तों के अपराधों की उपेक्षा करते हुए आप निश्चय ही महादयालु और भक्तवत्सल हैं।
श्लोक 19 (skanda.2.220.19)
धृतावतारस्य हि नाममात्रं रूपं च वा यः स्मरेदन्तकाले । सोपि प्रभो घोरमहाघसंघात्सद्यो विमुक्तो दिवमाशु याति
dhṛtāvatārasya hi nāmamātraṁ rūpaṁ ca vā yaḥ smaredantakāle | sopi prabho ghoramahāghasaṁghātsadyo vimukto divamāśu yāti
हे प्रभो! जो कोई अन्तकाल में आपके धारण किए अवतार के नाम मात्र का या रूप का भी स्मरण करता है, वह भी घोर महापापों के समूह से तुरन्त मुक्त होकर शीघ्र स्वर्ग को जाता है।
श्लोक 20 (skanda.2.220.20)
तं त्वां विहायाऽत्र तु यो मनुष्यो देहे त्रिधातावपि देहिकेषु । जायात्मजज्ञातिधनेषु सज्जते स मायया वञ्चित एव मूढः
taṁ tvāṁ vihāyā'tra tu yo manuṣyo dehe tridhātāvapi dehikeṣu | jāyātmajajñātidhaneṣu sajjate sa māyayā vañcita eva mūḍhaḥ
किन्तु जो मनुष्य आपको छोड़कर त्रिधातुमय शरीर में, या अन्य देहधारियों में, अथवा पत्नी-पुत्र-ज्ञाति-धन में आसक्त होता है, वह मूर्ख माया से ठगा हुआ ही है।
श्लोक 21 (skanda.2.220.21)
त्वद्भक्तियोग्यो नरदेह एव यं कामयन्तेऽपि च नाकसंस्थाः । त्वद्भक्तिहीनं हि दिवोपि सौख्यमहं तु जाने नरकेण तुल्यम्
tvadbhaktiyogyo naradeha eva yaṁ kāmayante'pi ca nākasaṁsthāḥ | tvadbhaktihīnaṁ hi divopi saukhyamahaṁ tu jāne narakeṇa tulyam
मनुष्य-देह ही आपकी भक्ति के योग्य है, जिसकी स्वर्गवासी भी कामना करते हैं; क्योंकि मैं तो आपकी भक्ति से रहित स्वर्ग के सुख को भी नरक के समान मानता हूँ।
श्लोक 22 (skanda.2.220.22)
तपस्त्रिलोक्याः कुरुषे सुखाय तत्रापि ते भारतवासिपुंसु । अनुग्रहो भूरितरो यदत्र कृतावतारो विचरन्विराजसे
tapastrilokyāḥ kuruṣe sukhāya tatrāpi te bhāratavāsipuṁsu | anugraho bhūritaro yadatra kṛtāvatāro vicaranvirājase
आप त्रिलोकी के सुख के लिए तप करते हैं; फिर भी उनमें भारतवासी मनुष्यों पर आपकी कृपा और भी अधिक है, कि आप यहाँ अवतार लेकर विचरण करते हुए विराजमान हैं।
श्लोक 23 (skanda.2.220.23)
तस्याश्रयं ये तव नात्र कुर्वते त एव शास्त्रेषु मताः कृतघ्नाः । अतस्तवैकाश्रयमेव बाढं कुर्वत्यजस्रं मयि तेऽस्तु तुष्टिः
tasyāśrayaṁ ye tava nātra kurvate ta eva śāstreṣu matāḥ kṛtaghnāḥ | atastavaikāśrayameva bāḍhaṁ kurvatyajasraṁ mayi te'stu tuṣṭiḥ
जो यहाँ आपकी शरण नहीं लेते, वे ही शास्त्रों में कृतघ्न माने गए हैं; इसलिए आप ही की शरण लेने वाले मुझ पर सदा दृढ़ता से प्रसन्न रहें।