वैष्णव खण्ड · अध्याय 219
अष्टांगयोग-निरूपण
श्लोक 1 (skanda.2.219.1)
स्कन्द उवाच । वासुदेवार्चनविधिं निशम्येत्थं स नारदः । प्रसन्नः पुनरप्राक्षीत्तं मुनीनां परं गुरुम्
skanda uvāca | vāsudevārcanavidhiṁ niśamyetthaṁ sa nāradaḥ | prasannaḥ punaraprākṣīttaṁ munīnāṁ paraṁ gurum
स्कन्द ने कहा - इस प्रकार वासुदेव की अर्चना-विधि सुनकर, प्रसन्न हुए नारद ने पुनः मुनियों के परम गुरु से प्रश्न किया।
श्लोक 2 (skanda.2.219.2)
नारद उवाच । सम्यगुक्तो भगवता क्रियायोगो महाफलः । एकेन मनसा योऽसौ कार्यः सिद्धिमभीप्सुभिः
nārada uvāca | samyagukto bhagavatā kriyāyogo mahāphalaḥ | ekena manasā yo'sau kāryaḥ siddhimabhīpsubhiḥ
नारद ने कहा - भगवान् ने महान् फल देने वाला क्रियायोग भलीभाँति कहा, जिसे सिद्धि की इच्छा रखने वाले एकाग्र मन से करते हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.219.3)
मनसो निग्रहस्तत्र ज्ञानिनामपि सद्गुरो । दुष्करः किं पुनस्तर्हि नृणां कर्मात्मनां भुवि
manaso nigrahastatra jñānināmapi sadguro | duṣkaraḥ kiṁ punastarhi nṛṇāṁ karmātmanāṁ bhuvi
हे सद्गुरो! उसमें मन का निग्रह ज्ञानियों के लिए भी कठिन है, फिर कर्मपरायण मनुष्यों के लिए तो और भी कठिन क्यों न हो?
श्लोक 4 (skanda.2.219.4)
तमृते तु हरेरर्चा नाभीष्टफलदायिनी । अतस्तन्निग्रहोपायमपि मे वक्तुमर्हसि
tamṛte tu harerarcā nābhīṣṭaphaladāyinī | atastannigrahopāyamapi me vaktumarhasi
किन्तु उसके बिना हरि की पूजा अभीष्ट फल देने वाली नहीं होती; इसलिए आप मुझे उसके निग्रह का उपाय भी बताइए।
श्लोक 5 (skanda.2.219.5)
स्कन्द उवाच । इत्यापृष्टः स मुनिना मुनीन्द्रः सर्वदर्शनः । नारायणो नरसखो नारदं तमभाषत
skanda uvāca | ityāpṛṣṭaḥ sa muninā munīndraḥ sarvadarśanaḥ | nārāyaṇo narasakho nāradaṁ tamabhāṣata
स्कन्द ने कहा - इस प्रकार मुनि द्वारा पूछे जाने पर, सर्वदर्शी, नर के सखा, मुनीन्द्र नारायण ने उस नारद से कहा।
श्लोक 6 (skanda.2.219.6)
श्रीनारायण उवाच । सत्यमेव मुने वक्षि मनसोस्ति बलं महत् । जितेपि यस्मिन्विश्वासः शत्रुवन्न विवेकिनाम्
śrīnārāyaṇa uvāca | satyameva mune vakṣi manasosti balaṁ mahat | jitepi yasminviśvāsaḥ śatruvanna vivekinām
श्री नारायण ने कहा - हे मुने! तुम सत्य ही कहते हो, मन में महान् बल है; विवेकी पुरुष उसके जीत लिए जाने पर भी उस पर शत्रु के समान विश्वास नहीं करते।
श्लोक 7 (skanda.2.219.7)
मनसा सदृशोन्यस्तु शत्रुर्न्नास्त्येव देहिनाम् । विष्णुध्यानाभ्यासयोगान्निर्दोषं तद्धि शाम्यति
manasā sadṛśonyastu śatrurnnāstyeva dehinām | viṣṇudhyānābhyāsayogānnirdoṣaṁ taddhi śāmyati
देहधारियों के लिए मन के समान अन्य कोई शत्रु नहीं है; परन्तु विष्णु के ध्यान के अभ्यास-योग से वह निर्दोष होकर शान्त हो जाता है।
श्लोक 8 (skanda.2.219.8)
अदान्ताश्ववदेवैतद्यतोस्ति दुरवग्रहम् । अतो वैराग्ययुक्पुम्भिः सदुपायैर्निगृह्यते
adāntāśvavadevaitadyatosti duravagraham | ato vairāgyayukpumbhiḥ sadupāyairnigṛhyate
क्योंकि यह अनियन्त्रित घोड़े के समान दुर्दम्य है, इसलिए वैराग्ययुक्त पुरुषों द्वारा सत् उपायों से वश में किया जाता है।
श्लोक 9 (skanda.2.219.9)
उपायास्तत्र बहवः सन्ति तेष्वपि सन्मते । अष्टांगयोगस्याभ्यासः श्रेष्ठः सद्यः फलप्रदः
upāyāstatra bahavaḥ santi teṣvapi sanmate | aṣṭāṁgayogasyābhyāsaḥ śreṣṭhaḥ sadyaḥ phalapradaḥ
उसके लिए बहुत से उपाय हैं, किन्तु उनमें भी सज्जनों के मत से अष्टांगयोग का अभ्यास श्रेष्ठ है, जो शीघ्र फल देने वाला है।
श्लोक 10 (skanda.2.219.10)
यमाश्च नियमा ब्रह्मन्नासनान्यसुसंयमः । प्रत्याहारो धारणा च ध्यानमंगं तु सप्तमम् । समाधिश्चाष्टमं प्रोक्तं योगस्यानुक्रमेण वै
yamāśca niyamā brahmannāsanānyasusaṁyamaḥ | pratyāhāro dhāraṇā ca dhyānamaṁgaṁ tu saptamam | samādhiścāṣṭamaṁ proktaṁ yogasyānukrameṇa vai
हे ब्रह्मन्! यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान - जो सातवाँ अंग है, और समाधि - जो आठवाँ कहा गया है, ये क्रमशः योग के अंग हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.219.11)
तत्राऽहिंसाब्रह्मचर्य सत्यास्तेयापरिग्रहाः । एते पञ्च यमाः प्रोक्ताः साधनीयाः प्रयत्नतः
tatrā'hiṁsābrahmacarya satyāsteyāparigrahāḥ | ete pañca yamāḥ proktāḥ sādhanīyāḥ prayatnataḥ
उनमें अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, अस्तेय और अपरिग्रह - ये पाँच यम कहे गए हैं, जिन्हें प्रयत्नपूर्वक साधना चाहिए।
श्लोक 12 (skanda.2.219.12)
शौचं तपश्च संतोषः स्वाध्यायो विष्णुपूजनम् । एते च नियमाः पञ्च द्वितीयांगतया मताः
śaucaṁ tapaśca saṁtoṣaḥ svādhyāyo viṣṇupūjanam | ete ca niyamāḥ pañca dvitīyāṁgatayā matāḥ
शौच, तप, सन्तोष, स्वाध्याय और विष्णु-पूजन - ये पाँच नियम माने गए हैं, जो दूसरा अंग हैं।
श्लोक 13 (skanda.2.219.13)
परिहायांगचाञ्चल्यं यथासुखतया स्थितिः । तदासनं स्वस्तिकादिप्रोक्तं द्वन्द्वार्त्तिजिन्मुने
parihāyāṁgacāñcalyaṁ yathāsukhatayā sthitiḥ | tadāsanaṁ svastikādiproktaṁ dvandvārttijinmune
हे मुने! अंगों की चंचलता त्यागकर सुखपूर्वक स्थिर रहना ही स्वस्तिक आदि आसन कहा गया है, जो द्वन्द्वों की पीड़ा को जीतने वाला है।
श्लोक 14 (skanda.2.219.14)
चरतां सर्वतोऽसूनामेकदेशे तु धारणम् । गुरूपदिष्टरीत्यैव प्राणायामः स उच्यते
caratāṁ sarvato'sūnāmekadeśe tu dhāraṇam | gurūpadiṣṭarītyaiva prāṇāyāmaḥ sa ucyate
सर्वत्र चलने वाले प्राणों को एक स्थान में, गुरु द्वारा उपदिष्ट विधि से ही रोकना, प्राणायाम कहलाता है।
श्लोक 15 (skanda.2.219.15)
चले वायौ चलं चित्तं स्थिरे तस्मिन्स्थिरं ततः । सुदेशेऽयं सदाऽभ्यस्यः पूरकुम्भकरेचकैः
cale vāyau calaṁ cittaṁ sthire tasminsthiraṁ tataḥ | sudeśe'yaṁ sadā'bhyasyaḥ pūrakumbhakarecakaiḥ
वायु के चंचल होने पर चित्त चंचल होता है, वायु के स्थिर होने पर चित्त स्थिर होता है; इसलिए इसका अभ्यास उचित स्थान में पूरक, कुम्भक और रेचक द्वारा सदा करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.2.219.16)
मनसेन्द्रियवृत्तीनां तत्तद्विषयतश्च यत् । आकर्षणं प्रतीचीनं प्रत्याहारः स ईरितः
manasendriyavṛttīnāṁ tattadviṣayataśca yat | ākarṣaṇaṁ pratīcīnaṁ pratyāhāraḥ sa īritaḥ
मन और इन्द्रियों की वृत्तियों को उनके-उनके विषयों से खींचकर पीछे लाना ही प्रत्याहार कहा गया है।
श्लोक 17 (skanda.2.219.17)
नाभ्याद्यन्यतमे स्थाने प्राणेन सह चेतसः । वासुदेवस्वरूपे यद्धारणं धारणोदिता
nābhyādyanyatame sthāne prāṇena saha cetasaḥ | vāsudevasvarūpe yaddhāraṇaṁ dhāraṇoditā
नाभि आदि किसी एक स्थान में प्राण के साथ चित्त को वासुदेव के स्वरूप में स्थिर करना ही धारणा कही गई है।
श्लोक 18 (skanda.2.219.18)
एकैकावयवस्यैव चिन्तनं यत्पृथक्पृथक् । पदाब्जादेर्भगवतस्तद्ध्यानमिति कीर्तितम्
ekaikāvayavasyaiva cintanaṁ yatpṛthakpṛthak | padābjāderbhagavatastaddhyānamiti kīrtitam
भगवान् के चरण-कमल आदि प्रत्येक अंग का पृथक्-पृथक् चिन्तन करना ही ध्यान कहा गया है।
श्लोक 19 (skanda.2.219.19)
निरोधः प्राणमनसोरतिप्रेम्णा हरौ तु यः । स समाधिरिति प्रोक्तो योगिनामभिवाञ्छितः
nirodhaḥ prāṇamanasoratipremṇā harau tu yaḥ | sa samādhiriti prokto yogināmabhivāñchitaḥ
हरि के प्रति अत्यन्त प्रेम के कारण प्राण और मन का जो निरोध होता है, वही समाधि कही गई है, जो योगियों की अभीष्ट है।
श्लोक 20 (skanda.2.219.20)
अंगैरष्टभिरेतैर्हि शिक्षितैः सिद्धसद्गुरोः । योगः सिद्ध्यति वै पुंसां समाधेः पक्वतात्मकः
aṁgairaṣṭabhiretairhi śikṣitaiḥ siddhasadguroḥ | yogaḥ siddhyati vai puṁsāṁ samādheḥ pakvatātmakaḥ
सिद्ध सद्गुरु से सीखे गए इन्हीं आठों अंगों से मनुष्यों का योग सिद्ध होता है, जिसका सार समाधि की परिपक्वता है।
श्लोक 21 (skanda.2.219.21)
नैतादृशं परं सम्यङ् मनोनिग्रहसाधनम् । पुरुषाणां मुमुक्षूणामिति जानीहि नारद
naitādṛśaṁ paraṁ samyaṅ manonigrahasādhanam | puruṣāṇāṁ mumukṣūṇāmiti jānīhi nārada
हे नारद! जान लो कि मुमुक्षु पुरुषों के लिए मन के निग्रह का इससे बढ़कर कोई अन्य समुचित साधन नहीं है।
श्लोक 22 (skanda.2.219.22)
तपस्विनां महाशत्रोर्ब्रह्माण्डक्षोभकादपि । मदनान्नाभयं किञ्चिद्योगिनस्त्वस्ति कर्हिचित्
tapasvināṁ mahāśatrorbrahmāṇḍakṣobhakādapi | madanānnābhayaṁ kiñcidyoginastvasti karhicit
ब्रह्माण्ड को भी क्षुब्ध करने वाले तपस्वियों के महान् शत्रु काम से योगी को कभी कोई भय नहीं होता।
श्लोक 23 (skanda.2.219.23)
आयास्यन्तं विहित्वैव सोन्तकालं च योगवित् । स्वातन्त्र्येणैव देहं स्वं त्यजतीत्थं समाधिना
āyāsyantaṁ vihitvaiva sontakālaṁ ca yogavit | svātantryeṇaiva dehaṁ svaṁ tyajatītthaṁ samādhinā
अपनी अन्तिम घड़ी आने वाली जानकर, योगवेत्ता स्वतन्त्रतापूर्वक ही समाधि द्वारा इस प्रकार अपने शरीर का त्याग करता है।
श्लोक 24 (skanda.2.219.24)
पार्ष्णिभ्यां गुदमापीड्य वायुं पादद्वयस्थितम् । शनैःशनैः समाकृष्य मृत्युस्थानं नयत्यमुम्
pārṣṇibhyāṁ gudamāpīḍya vāyuṁ pādadvayasthitam | śanaiḥśanaiḥ samākṛṣya mṛtyusthānaṁ nayatyamum
दोनों एड़ियों से गुदा को दबाकर, दोनों पैरों में स्थित वायु को धीरे-धीरे खींचकर मृत्यु-स्थान (मूलाधार) तक ले जाता है।
श्लोक 25 (skanda.2.219.25)
मनसा केशवं ध्यायंस्तन्मनुं च षडक्षरम् । जपस्ततोऽमुं नयति वायुं स्थानं प्रजापतेः
manasā keśavaṁ dhyāyaṁstanmanuṁ ca ṣaḍakṣaram | japastato'muṁ nayati vāyuṁ sthānaṁ prajāpateḥ
मन से केशव का ध्यान करते हुए और उनके षडक्षर मन्त्र का जप करते हुए, फिर उस वायु को प्रजापति के स्थान (नाभि) तक ले जाता है।
श्लोक 26 (skanda.2.219.26)
ततो नाभिं च हदयमुरः कण्ठं च योगवित् । नयति भ्रुकुटिवायुं वासुदेवपरायणः
tato nābhiṁ ca hadayamuraḥ kaṇṭhaṁ ca yogavit | nayati bhrukuṭivāyuṁ vāsudevaparāyaṇaḥ
फिर वासुदेव-परायण योगवेत्ता उस वायु को नाभि, हृदय, वक्ष, कण्ठ और भ्रूमध्य तक ले जाता है।
श्लोक 27 (skanda.2.219.27)
एतेषु षट्सु स्थानेषु त्वेकैकस्मिन्पृथक्पृथक् । योगी प्राणमनोक्षाणां निरोधं च विसर्जनम् । तावदभ्यसति स्वस्य यावत्स्यात्तत्स्वतन्त्रता
eteṣu ṣaṭsu sthāneṣu tvekaikasminpṛthakpṛthak | yogī prāṇamanokṣāṇāṁ nirodhaṁ ca visarjanam | tāvadabhyasati svasya yāvatsyāttatsvatantratā
इन छहों स्थानों में से प्रत्येक पर पृथक्-पृथक्, योगी प्राण, मन और इन्द्रियों के निरोध और विसर्जन का तब तक अभ्यास करता है, जब तक उस पर उसकी पूर्ण स्वतन्त्रता न हो जाए।
श्लोक 28 (skanda.2.219.28)
जितंजितं विहायैव स्थानं याति परं परम् । प्राप्तस्य स्थानकं षष्ठं तदभ्यासे श्रमो न हि
jitaṁjitaṁ vihāyaiva sthānaṁ yāti paraṁ param | prāptasya sthānakaṁ ṣaṣṭhaṁ tadabhyāse śramo na hi
एक-एक जीते हुए स्थान को छोड़कर वह अगले श्रेष्ठ स्थान को जाता है; छठे स्थान को प्राप्त हो जाने पर उस अभ्यास में फिर कोई श्रम नहीं रहता।
श्लोक 29 (skanda.2.219.29)
सप्तच्छिद्राणि रुद्ध्वाऽथ प्राणमक्षमनोयुतम् । प्रापय्य तालु व्रजति ब्रह्मरन्ध्रं स योगवित्
saptacchidrāṇi ruddhvā'tha prāṇamakṣamanoyutam | prāpayya tālu vrajati brahmarandhraṁ sa yogavit
फिर सातों छिद्रों को रोककर, इन्द्रियों और मन सहित प्राण को तालु तक पहुँचाकर, वह योगवेत्ता ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करता है।
श्लोक 30 (skanda.2.219.30)
मायामयपदार्थानां ततो हित्वैव वासनाः । स वासुदेवैकमनास्त्यजति स्वकलेवरम्
māyāmayapadārthānāṁ tato hitvaiva vāsanāḥ | sa vāsudevaikamanāstyajati svakalevaram
फिर मायामय पदार्थों की समस्त वासनाओं को त्यागकर, वासुदेव में एकमात्र मन लगाए हुए वह अपने शरीर को त्याग देता है।
श्लोक 31 (skanda.2.219.31)
ततो भगवतो धाम श्रीकृष्णस्य तमःपरम् । उपेत्य सेवमानस्तं नन्दते दिव्यविग्रहः
tato bhagavato dhāma śrīkṛṣṇasya tamaḥparam | upetya sevamānastaṁ nandate divyavigrahaḥ
फिर अन्धकार से परे भगवान् श्रीकृष्ण के धाम को प्राप्त होकर, उनकी सेवा करते हुए, दिव्य विग्रहधारी वह आनन्दित होता है।
श्लोक 32 (skanda.2.219.32)
इति ते कथितो ब्रह्मन्योगशास्त्रस्य संग्रहः । जित्वा तेन मनः स्वीयं तमाराधय सर्वदा
iti te kathito brahmanyogaśāstrasya saṁgrahaḥ | jitvā tena manaḥ svīyaṁ tamārādhaya sarvadā
हे ब्रह्मन्! इस प्रकार तुम्हें योगशास्त्र का सार बताया गया; इसके द्वारा अपने मन को जीतकर सदा उन्हीं की आराधना करो।