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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 1

सेतु-गमन के फल का वर्णन

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (skanda.3.1.1)

श्रीगणेशाय नमः । श्रीवेदव्यासायनमः । शुक्लांबरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशांतये

śrīgaṇeśāya namaḥ śrīvedavyāsāyanamaḥ śuklāṁbaradharaṁ viṣṇuṁ śaśivarṇaṁ caturbhujam prasannavadanaṁ dhyāyetsarvavighnopaśāṁtaye

गणेश को नमस्कार। श्री वेदव्यास को नमस्कार। शुभ्र वस्त्र धारण करने वाले, चंद्रमा के समान वर्ण वाले, चतुर्भुज विष्णु का ध्यान समस्त विघ्नों की शांति के लिए करना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.3.1.2)

नैमिषारण्यनिलया ऋषयः शौनकादयः । अष्टांगयोगनिरता ब्रह्मज्ञानैकतत्पराः

naimiṣāraṇyanilayā ṛṣayaḥ śaunakādayaḥ aṣṭāṁgayoganiratā brahmajñānaikatatparāḥ

नैमिषारण्य में निवास करने वाले, शौनक आदि ऋषि, अष्टांग योग में तत्पर, ब्रह्मज्ञान में एकाग्रचित्त —

श्लोक 3 (skanda.3.1.3)

मुमुक्षवो महात्मानो निर्ममा ब्रह्मवादिनः । धर्मज्ञा अनसूयाश्च सत्यवतपरायणाः

mumukṣavo mahātmāno nirmamā brahmavādinaḥ dharmajñā anasūyāśca satyavataparāyaṇāḥ

मोक्ष के इच्छुक, ममता-रहित, ब्रह्मवादी महात्मा, धर्मज्ञ, ईर्ष्यारहित तथा सत्य-व्रत में तत्पर —

श्लोक 4 (skanda.3.1.4)

जितेंद्रिया जितक्रोधाः सर्वभूतदयालवः । भक्त्या परमया विष्णुमर्चयंतः सनातनम्

jiteṁdriyā jitakrodhāḥ sarvabhūtadayālavaḥ bhaktyā paramayā viṣṇumarcayaṁtaḥ sanātanam

जितेन्द्रिय, क्रोध पर विजय पाने वाले, सभी प्राणियों पर दया करने वाले, परम भक्ति से सनातन विष्णु की अर्चना करते हुए —

श्लोक 5 (skanda.3.1.5)

तपस्तेपुर्महापुण्ये नैमिषे मुक्तिदायिनि । एकदा ते महात्मानः समाजं चक्रुरुत्तमम्

tapastepurmahāpuṇye naimiṣe muktidāyini ekadā te mahātmānaḥ samājaṁ cakruruttamam

उन्होंने मुक्तिदायिनी महापुण्य नैमिष में तपस्या की; एक बार उन महात्माओं ने एक उत्तम सभा की।

श्लोक 6 (skanda.3.1.6)

कथयंतो महापुण्याः कथाः पापप्रणाशिनी । भुक्तिमुक्त्योरुपायं च जिज्ञासंतः परस्परम्

kathayaṁto mahāpuṇyāḥ kathāḥ pāpapraṇāśinī bhuktimuktyorupāyaṁ ca jijñāsaṁtaḥ parasparam

वे महापुण्य, पाप का नाश करने वाली कथाएँ कहते हुए, भुक्ति और मुक्ति दोनों के उपाय के विषय में परस्पर जिज्ञासा करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.3.1.7)

षड्विंशतिसहस्राणामृषीणां भावितात्मनाम् । तेषां शिष्यप्रशिष्याणां संख्या कर्तुं न शक्यते

ṣaḍviṁśatisahasrāṇāmṛṣīṇāṁ bhāvitātmanām teṣāṁ śiṣyapraśiṣyāṇāṁ saṁkhyā kartuṁ na śakyate

छब्बीस हज़ार पवित्र-आत्मा ऋषियों की, तथा उनके शिष्यों और प्रशिष्यों की संख्या गिनी नहीं जा सकती थी।

श्लोक 8 (skanda.3.1.8)

अत्रांतरे महाविद्वान्व्यासशिष्यो महामुनिः । आगमन्नैमिषारण्यं सूतः पौराणिकोत्तमः

atrāṁtare mahāvidvānvyāsaśiṣyo mahāmuniḥ āgamannaimiṣāraṇyaṁ sūtaḥ paurāṇikottamaḥ

इसी बीच व्यास जी के महाविद्वान् शिष्य, महामुनि, पुराणों में श्रेष्ठ सूत जी नैमिषारण्य में पधारे।

श्लोक 9 (skanda.3.1.9)

तमागतं मुनिं दृष्ट्वा ज्वलंतमिव पावकम् । अर्घ्याद्यैः पूजयामासुर्मुनयः शौनकादयः

tamāgataṁ muniṁ dṛṣṭvā jvalaṁtamiva pāvakam arghyādyaiḥ pūjayāmāsurmunayaḥ śaunakādayaḥ

अग्नि के समान तेजस्वी उस मुनि को आया देखकर, शौनक आदि मुनियों ने अर्घ्य आदि से उनका पूजन किया।

श्लोक 10 (skanda.3.1.10)

सुखोपविष्टं तं सूतमासने परमे शुभे । पप्रच्छुः परमं गुह्यं लोकानुग्रहकांक्षया

sukhopaviṣṭaṁ taṁ sūtamāsane parame śubhe papracchuḥ paramaṁ guhyaṁ lokānugrahakāṁkṣayā

परम शुभ आसन पर सुखपूर्वक बैठे हुए सूत जी से उन्होंने लोक-कल्याण की कामना से परम गुह्य विषय पूछा।

श्लोक 11 (skanda.3.1.11)

सूत धर्मार्थतत्त्वज्ञ स्वागतं मुनिपुंगव । श्रुतवांस्त्वं पुराणानि व्यासात्सत्यवतीसुतात्

sūta dharmārthatattvajña svāgataṁ munipuṁgava śrutavāṁstvaṁ purāṇāni vyāsātsatyavatīsutāt

हे सूत जी, धर्म और अर्थ के तत्त्वज्ञ, हे मुनिश्रेष्ठ, आपका स्वागत है। आपने सत्यवती-पुत्र व्यास जी से पुराणों को सुना है।

श्लोक 12 (skanda.3.1.12)

अतः सर्वपुराणानामर्थज्ञोऽसि महामुने । कानि क्षेत्राणि पुण्यानि कानि तीर्थानि भूतले

ataḥ sarvapurāṇānāmarthajño'si mahāmune kāni kṣetrāṇi puṇyāni kāni tīrthāni bhūtale

अतः हे महामुने, आप समस्त पुराणों के अर्थ के ज्ञाता हैं। पृथ्वी पर कौन-से क्षेत्र पवित्र हैं और कौन-से तीर्थ हैं?

श्लोक 13 (skanda.3.1.13)

कथं वा लप्स्यते मुक्तिर्जीवानां भवसागरात् । कथं हरे हरौ वापि नृणां भक्तिः प्रजायते

kathaṁ vā lapsyate muktirjīvānāṁ bhavasāgarāt kathaṁ hare harau vāpi nṛṇāṁ bhaktiḥ prajāyate

जीवों को भवसागर से मुक्ति कैसे प्राप्त होती है? और मनुष्यों में हरि के प्रति भक्ति कैसे उत्पन्न होती है?

श्लोक 14 (skanda.3.1.14)

केन सिध्येत च फलं कर्मणास्त्रिविधा त्मनः । एतच्चान्यच्च तत्सर्वं कृपया वद सूतज

kena sidhyeta ca phalaṁ karmaṇāstrividhā tmanaḥ etaccānyacca tatsarvaṁ kṛpayā vada sūtaja

त्रिविध आत्मा के कर्म का फल किस उपाय से सिद्ध होता है? हे सूतपुत्र, कृपा करके यह सब और अन्य बातें भी हमें बताइए।

श्लोक 15 (skanda.3.1.15)

ब्रूयुः स्निग्धाय शिष्याय गुरवो गुह्यमप्युत । इति पृष्टस्तदा सूतो नैमिषारण्यवासिभिः

brūyuḥ snigdhāya śiṣyāya guravo guhyamapyuta iti pṛṣṭastadā sūto naimiṣāraṇyavāsibhiḥ

क्योंकि गुरुजन स्नेही शिष्य को गुह्य बात भी कह देते हैं। इस प्रकार नैमिषारण्यवासियों द्वारा पूछे जाने पर सूत जी —

श्लोक 16 (skanda.3.1.16)

वक्तुं प्रचक्रमे नत्वा व्यासं स्वगुरुमादितः । श्रीसूत उवाच । सम्यक्पृष्टमिदं विप्रा युष्माभिर्जगतो हितम्

vaktuṁ pracakrame natvā vyāsaṁ svagurumāditaḥ śrīsūta uvāca samyakpṛṣṭamidaṁ viprā yuṣmābhirjagato hitam

— पहले अपने गुरु व्यास जी को नमन कर बोलने लगे। श्री सूत जी बोले — हे विप्रो, आपने यह प्रश्न भली-भाँति पूछा है, जो जगत के हित के लिए है।

श्लोक 17 (skanda.3.1.17)

रहस्यमे तद्युष्माकं वक्ष्यामि शृणुतादरात् । मया नोक्तमिदं पूर्वं कस्यापि मुनिपुंगवाः

rahasyame tadyuṣmākaṁ vakṣyāmi śṛṇutādarāt mayā noktamidaṁ pūrvaṁ kasyāpi munipuṁgavāḥ

वह रहस्य मैं आपको बताऊँगा, आदरपूर्वक सुनिए। हे मुनिश्रेष्ठो, यह बात मैंने पहले कभी किसी से नहीं कही।

श्लोक 18 (skanda.3.1.18)

मनो नियम्य विप्रेंद्राः शृणुध्वं भक्तिपूर्वकम् । अस्ति रामेश्वरं नाम रामसेतौ पवित्रितम्

mano niyamya vipreṁdrāḥ śṛṇudhvaṁ bhaktipūrvakam asti rāmeśvaraṁ nāma rāmasetau pavitritam

हे विप्रेन्द्रो, मन को संयत करके भक्तिपूर्वक सुनिए। रामसेतु में एक पवित्र स्थान है जिसे रामेश्वर कहते हैं।

श्लोक 19 (skanda.3.1.19)

क्षेत्राणामपि सर्वेषां तीर्थानामपि चोत्तमम् । दृष्टमात्रे रामसेतौ मुक्तिः संसारसागरात्

kṣetrāṇāmapi sarveṣāṁ tīrthānāmapi cottamam dṛṣṭamātre rāmasetau muktiḥ saṁsārasāgarāt

यह समस्त क्षेत्रों में तथा समस्त तीर्थों में भी उत्तम है। रामसेतु का केवल दर्शन करने मात्र से संसार-सागर से मुक्ति मिल जाती है।

श्लोक 20 (skanda.3.1.20)

हरे हरौ च भक्तिः स्यात्तथा पुण्यसमृद्धिता । कर्मणस्त्रिविधस्यापि सिद्धिः स्यान्नात्र संशयः

hare harau ca bhaktiḥ syāttathā puṇyasamṛddhitā karmaṇastrividhasyāpi siddhiḥ syānnātra saṁśayaḥ

हरि के प्रति भक्ति उत्पन्न होती है तथा पुण्य की वृद्धि होती है; त्रिविध कर्म की सिद्धि भी होती है, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 21 (skanda.3.1.21)

यो नरो जन्ममध्ये तु सेतुं भक्त्यावलोकयेत् । तस्य पुण्यफलं वक्ष्ये शृणुध्वं मुनिपुंगवाः

yo naro janmamadhye tu setuṁ bhaktyāvalokayet tasya puṇyaphalaṁ vakṣye śṛṇudhvaṁ munipuṁgavāḥ

जो मनुष्य अपने जीवनकाल में भक्तिपूर्वक सेतु का अवलोकन करता है, उसके पुण्यफल को मैं बताऊँगा, हे मुनिश्रेष्ठो, सुनिए।

श्लोक 22 (skanda.3.1.22)

मातृतः पितृतश्चैव द्विकोटिकुलसंयुतः । निर्विश्य शंभुना कल्पं ततो मोक्षं समश्नुते

mātṛtaḥ pitṛtaścaiva dvikoṭikulasaṁyutaḥ nirviśya śaṁbhunā kalpaṁ tato mokṣaṁ samaśnute

वह अपनी माता और पिता दोनों ओर के दो करोड़ कुल-बंधुओं सहित, शंभु के साथ एक कल्प तक निवास करके, तत्पश्चात् मोक्ष प्राप्त करता है।

श्लोक 23 (skanda.3.1.23)

गण्यंते पांसवो भूमेर्गण्यंते दिवि तारकाः । सेतुदर्शनजं पुण्यं शेषेणापि न गण्यते

gaṇyaṁte pāṁsavo bhūmergaṇyaṁte divi tārakāḥ setudarśanajaṁ puṇyaṁ śeṣeṇāpi na gaṇyate

पृथ्वी के कणों को गिना जा सकता है, आकाश के तारों को गिना जा सकता है, किंतु सेतु-दर्शन से उत्पन्न पुण्य को शेषनाग भी नहीं गिन सकते।

श्लोक 24 (skanda.3.1.24)

समस्तदेवतारूपः सेतुवंधः प्रकीर्तितः । तद्दर्शनवतः पुंसः कः पुण्यं गणितुं क्षमः

samastadevatārūpaḥ setuvaṁdhaḥ prakīrtitaḥ taddarśanavataḥ puṁsaḥ kaḥ puṇyaṁ gaṇituṁ kṣamaḥ

सेतु-बंध को समस्त देवताओं का स्वरूप कहा गया है; उसके दर्शन करने वाले मनुष्य के पुण्य को गिनने में कौन समर्थ है?

श्लोक 25 (skanda.3.1.25)

सेतुं दृष्ट्वा नरो विप्राः सर्वयागकरः स्मृतः । स्नातश्च सर्वतीर्थेषु तपोऽतप्यत चाखिलम्

setuṁ dṛṣṭvā naro viprāḥ sarvayāgakaraḥ smṛtaḥ snātaśca sarvatīrtheṣu tapo'tapyata cākhilam

हे विप्रो, सेतु को देखने वाला मनुष्य समस्त यज्ञ करने वाला माना जाता है और समस्त तीर्थों में स्नान करने वाला तथा समस्त तप करने वाला माना जाता है।

श्लोक 26 (skanda.3.1.26)

सेतुं गच्छेति यो ब्रूयाद्यं कं वापि नरं द्विजाः । सोऽपि तत्फलमाप्नोति किमन्यैर्बहुभाषणः

setuṁ gaccheti yo brūyādyaṁ kaṁ vāpi naraṁ dvijāḥ so'pi tatphalamāpnoti kimanyairbahubhāṣaṇaḥ

हे द्विजो, जो कोई भी किसी मनुष्य से कहे, "सेतु जाओ," वह भी वही फल प्राप्त करता है; अधिक कहने से क्या लाभ?

श्लोक 27 (skanda.3.1.27)

सेतुस्नानकरो मर्त्यः सप्तकोटिकुलान्वितः । संप्राप्य विष्णुभवनं तत्रैव परिमुच्यते

setusnānakaro martyaḥ saptakoṭikulānvitaḥ saṁprāpya viṣṇubhavanaṁ tatraiva parimucyate

सेतु में स्नान करने वाला मर्त्य, अपने सात करोड़ कुल-बंधुओं सहित, विष्णु के भवन को प्राप्त कर वहीं मुक्त हो जाता है।

श्लोक 28 (skanda.3.1.28)

सेतुं रामेश्वरं लिंगं गंधमादनपर्वतम् । चिंतयन्मनुजः सत्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते

setuṁ rāmeśvaraṁ liṁgaṁ gaṁdhamādanaparvatam ciṁtayanmanujaḥ satyaṁ sarvapāpaiḥ pramucyate

जो मनुष्य सेतु, रामेश्वर लिंग तथा गंधमादन पर्वत का सच्चे मन से चिंतन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 29 (skanda.3.1.29)

मातृतः पितृतश्चैव लक्षकोटिकुलान्वितः । संप्राप्य विष्णुभवनं तत्रैव परिमुच्यते । कल्पत्रयं शंभुपदे स्थित्वा तत्रैव मुच्यते

mātṛtaḥ pitṛtaścaiva lakṣakoṭikulānvitaḥ saṁprāpya viṣṇubhavanaṁ tatraiva parimucyate kalpatrayaṁ śaṁbhupade sthitvā tatraiva mucyate

वह अपनी माता और पिता दोनों ओर के एक लाख करोड़ कुल-बंधुओं सहित विष्णु के भवन को प्राप्त कर वहीं मुक्त हो जाता है, और शंभु के पद में तीन कल्प तक स्थित रहकर वहीं मुक्त हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.3.1.30)

मूषावस्थां वसाकूपं तथा वैतरणी नदीम् । श्वभक्षं मूत्रपानं च सेतुस्नायी न पश्यति

mūṣāvasthāṁ vasākūpaṁ tathā vaitaraṇī nadīm śvabhakṣaṁ mūtrapānaṁ ca setusnāyī na paśyati

सेतु में स्नान करने वाला व्यक्ति चूहे की योनि, वसा के कुण्ड, वैतरणी नदी, कुत्तों द्वारा खाया जाना और मूत्र-पान — इन्हें कभी नहीं देखता।

श्लोक 31 (skanda.3.1.31)

तप्तशूलं तप्तशिलां पुरी षह्रदमेव च । तथा शोणितकूपं च सेतुस्नायी न पश्यति

taptaśūlaṁ taptaśilāṁ purī ṣahradameva ca tathā śoṇitakūpaṁ ca setusnāyī na paśyati

सेतु में स्नान करने वाला तपाई हुई शूल, तपाई हुई शिला, नगरी, ह्रद तथा रक्त के कुण्ड को कभी नहीं देखता।

श्लोक 32 (skanda.3.1.32)

शाल्मल्यारोहणं रक्तभोजनं कृमिभोजनम् । स्वमांसभोजनं चैव वह्निज्वालाप्रवेशनम्

śālmalyārohaṇaṁ raktabhojanaṁ kṛmibhojanam svamāṁsabhojanaṁ caiva vahnijvālāpraveśanam

शाल्मली वृक्ष पर चढ़ाया जाना, रक्त-भोजन, कृमि-भोजन, अपने ही मांस का भोजन, तथा अग्नि-ज्वाला में प्रवेश —

श्लोक 33 (skanda.3.1.33)

शिलावृष्टिं वह्निवृष्टिं नरकं कालसूत्रकम् । क्षारोदकं चोष्णतोयं नेयात्सेत्ववलोककः

śilāvṛṣṭiṁ vahnivṛṣṭiṁ narakaṁ kālasūtrakam kṣārodakaṁ coṣṇatoyaṁ neyātsetvavalokakaḥ

पत्थरों की वर्षा, अग्नि की वर्षा, कालसूत्रक नामक नरक, तथा क्षार अथवा उष्ण जल — इन्हें सेतु-दर्शी कभी नहीं पाता।

श्लोक 34 (skanda.3.1.34)

सेतुस्नायी नरो विप्राः पंचपातकवानपि । मातृतः पितृतश्चैव शतकोटिकुलान्वितः

setusnāyī naro viprāḥ paṁcapātakavānapi mātṛtaḥ pitṛtaścaiva śatakoṭikulānvitaḥ

हे विप्रो, सेतु में स्नान करने वाला मनुष्य, चाहे वह पाँच महापातकों से युक्त हो, अपनी माता और पिता दोनों ओर के सौ करोड़ कुल-बंधुओं सहित —

श्लोक 35 (skanda.3.1.35)

कल्पत्रयं विष्णुपदे स्थित्वा तत्रैव मुच्यते । अधःशिरःशोषणं च नरकं क्षारसेवनम्

kalpatrayaṁ viṣṇupade sthitvā tatraiva mucyate adhaḥśiraḥśoṣaṇaṁ ca narakaṁ kṣārasevanam

— विष्णु-पद में तीन कल्प तक स्थित रहकर वहीं मुक्त हो जाता है। सिर के बल लटकाकर सुखाया जाना तथा क्षार-सेवन का नरक —

श्लोक 36 (skanda.3.1.36)

पाषाणयन्त्रपीडां च मरुत्प्रपतनं तथा । पुरीषलेपनं चैव तथा क्रकचदारणम्

pāṣāṇayantrapīḍāṁ ca marutprapatanaṁ tathā purīṣalepanaṁ caiva tathā krakacadāraṇam

— पत्थर के यंत्र में पीड़ित होना, तथा वायु द्वारा गिराया जाना, मल से लीपा जाना, तथा आरी से चीरा जाना —

श्लोक 37 (skanda.3.1.37)

पुरीषभोजनं रेतःपानं संधिषु दाहनम् । अंगारशय्याभ्रमणं तथा मुसलमर्द्दनम्

purīṣabhojanaṁ retaḥpānaṁ saṁdhiṣu dāhanam aṁgāraśayyābhramaṇaṁ tathā musalamarddanam

— मल का भोजन, वीर्य-पान, जोड़ों में जलाया जाना, अंगारों की शय्या पर घुमाया जाना, तथा मूसल से कूटा जाना —

श्लोक 38 (skanda.3.1.38)

एतानि नरकाण्यद्धा सेतुस्नायी न पश्यति । सेतु स्नानं करिष्येऽहमिति बुद्ध्या विचिंतयन्

etāni narakāṇyaddhā setusnāyī na paśyati setu snānaṁ kariṣye'hamiti buddhyā viciṁtayan

— इन नरकों को सेतु में स्नान करने वाला निश्चय ही कभी नहीं देखता — यहाँ तक कि जो केवल "मैं सेतु में स्नान करूँगा" ऐसा संकल्प भी करता है।

श्लोक 39 (skanda.3.1.39)

गच्छेच्छतपदं यस्तु स महापातकोऽपि सन् । बहूनां काष्ठयंत्राणां कर्षणं शस्त्रभेदनम्

gacchecchatapadaṁ yastu sa mahāpātako'pi san bahūnāṁ kāṣṭhayaṁtrāṇāṁ karṣaṇaṁ śastrabhedanam

जो महापातकी होते हुए भी सौ कदम भी उसकी ओर चले — बहुत-से काष्ठ-यंत्रों में खींचा जाना, शस्त्रों से बींधा जाना —

श्लोक 40 (skanda.3.1.40)

पतनोत्पतनं चैव गदादण्डनिपीडनम् । गजदन्तैश्च हननं नानाभुजगदंशनम्

patanotpatanaṁ caiva gadādaṇḍanipīḍanam gajadantaiśca hananaṁ nānābhujagadaṁśanam

— ऊपर-नीचे फेंका जाना, गदा-दण्ड से पीड़ित किया जाना, हाथी के दाँतों से मारा जाना, तथा विविध सर्पों द्वारा डँसा जाना —

श्लोक 41 (skanda.3.1.41)

धूमपानं पाशबन्धं नानाशूलनिपीडनम् । मुखे च नासिकायां च क्षारोदकनिषेचनम्

dhūmapānaṁ pāśabandhaṁ nānāśūlanipīḍanam mukhe ca nāsikāyāṁ ca kṣārodakaniṣecanam

— धुआँ पीना, पाश में बाँधा जाना, विविध शूलों से पीड़ित किया जाना, तथा मुख और नासिका में क्षार-जल डाला जाना —

श्लोक 42 (skanda.3.1.42)

क्षारांबुपानं नरकं तप्तायः सूचिभक्षणम् । एतानि नरकान्यद्धा न याति गतपातकः

kṣārāṁbupānaṁ narakaṁ taptāyaḥ sūcibhakṣaṇam etāni narakānyaddhā na yāti gatapātakaḥ

— क्षार-जल पीना, तथा तपे हुए लोहे की सुइयाँ खाना — इन नरकों में जिसका पाप नष्ट हो चुका है, वह कभी नहीं जाता।

श्लोक 43 (skanda.3.1.43)

क्षारांबुपूर्णरंध्राणां प्रवेशं मलभोजनम् । स्नायुच्छेदं स्नायुदाहमस्थिभेदनमेव च

kṣārāṁbupūrṇaraṁdhrāṇāṁ praveśaṁ malabhojanam snāyucchedaṁ snāyudāhamasthibhedanameva ca

क्षार-जल से भरे गड्ढों में प्रवेश, मल का भोजन, स्नायुओं का काटा जाना, स्नायुओं का जलाया जाना, तथा हड्डियों का तोड़ा जाना —

श्लोक 44 (skanda.3.1.44)

श्लेष्मादनं पित्तपानं महातिक्तनिषेवणम् । अत्युष्ण तैलपानं च पानं क्षारोदकस्य च

śleṣmādanaṁ pittapānaṁ mahātiktaniṣevaṇam atyuṣṇa tailapānaṁ ca pānaṁ kṣārodakasya ca

— कफ का भक्षण, पित्त का पान, अत्यंत कड़वे पदार्थों का सेवन, अत्यंत गरम तेल पीना, तथा क्षार-जल पीना —

श्लोक 45 (skanda.3.1.45)

कषायोदकपानं च तप्तपाषाणभोजनम् । अत्युष्णसिकतास्नानं तथा दशनमर्दनम्

kaṣāyodakapānaṁ ca taptapāṣāṇabhojanam atyuṣṇasikatāsnānaṁ tathā daśanamardanam

— कषाय जल पीना, तपे हुए पत्थर खाना, अत्यंत गरम बालू में स्नान, तथा दाँतों का पीसा जाना —

श्लोक 46 (skanda.3.1.46)

तप्तायःशयनं चैव संतप्तांबुनिषेचनम् । सूचिप्रक्षेपणं चैव नेत्रयोर्मुखसंधिषु

taptāyaḥśayanaṁ caiva saṁtaptāṁbuniṣecanam sūciprakṣepaṇaṁ caiva netrayormukhasaṁdhiṣu

— तपे हुए लोहे पर लेटना, तप्त जल से सींचा जाना, तथा आँखों और मुख के जोड़ों में सुइयाँ चुभोया जाना —

श्लोक 47 (skanda.3.1.47)

शिश्ने सवृषणे चैव ह्ययोभारस्य बन्धनम् । वृक्षाग्रात्पतनं चैव दुर्गंधपरिपूरिते

śiśne savṛṣaṇe caiva hyayobhārasya bandhanam vṛkṣāgrātpatanaṁ caiva durgaṁdhaparipūrite

— लिंग और वृषण में लोहे का भार बाँधना, तथा वृक्ष के शिखर से दुर्गंधयुक्त स्थान में गिराया जाना —

श्लोक 48 (skanda.3.1.48)

तीक्ष्णधारास्त्रशय्यां च रेतःपानादिकं तथा । इत्यादि नरकान्घोरासेतुस्नायी न पश्यति

tīkṣṇadhārāstraśayyāṁ ca retaḥpānādikaṁ tathā ityādi narakānghorāsetusnāyī na paśyati

— तीक्ष्ण धार वाले शस्त्रों की शय्या, तथा वीर्य-पान आदि — ऐसे भयंकर नरकों को सेतु में स्नान करने वाला नहीं देखता।

श्लोक 49 (skanda.3.1.49)

सेतुसैकतमध्ये यः शेते तत्पांसुकुंठितः । यावन्तः पांसवो लग्नास्तस्यांगे विप्रसत्तमाः

setusaikatamadhye yaḥ śete tatpāṁsukuṁṭhitaḥ yāvantaḥ pāṁsavo lagnāstasyāṁge viprasattamāḥ

जो सेतु की बालू के मध्य उसकी धूल से लिपटा हुआ लेटता है — हे विप्रश्रेष्ठो, उसके शरीर में जितने कण चिपकते हैं —

श्लोक 50 (skanda.3.1.50)

तावतां ब्रह्महत्यानां नाशः स्यान्नात्र संशयः । सेतुमध्यस्थ वातेन यस्यांगं स्पृश्यतेऽखिलम्

tāvatāṁ brahmahatyānāṁ nāśaḥ syānnātra saṁśayaḥ setumadhyastha vātena yasyāṁgaṁ spṛśyate'khilam

— उतनी ही ब्रह्महत्याओं का नाश हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। जिसका सम्पूर्ण शरीर सेतु के मध्य से आने वाली वायु से स्पर्श होता है —

श्लोक 51 (skanda.3.1.51)

सुरापानायुतं तस्य तत्क्षणादेव नश्यति । वर्तंते यस्य केशास्तु वपनात्सेतुमध्यतः

surāpānāyutaṁ tasya tatkṣaṇādeva naśyati vartaṁte yasya keśāstu vapanātsetumadhyataḥ

— उसका दस हजार सुरापान के समान पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। जिसके केश सेतु के मध्य मुंडन तक बने रहते हैं —

श्लोक 52 (skanda.3.1.52)

गुरुतल्पा युतं तस्य तत्क्षणादेव नश्यति । यस्यास्थि सेतुमध्ये तु स्थापितं पुत्रपौत्रकैः । स्वर्णस्तेयायुतं तस्य तत्क्षणादेव नश्यति

gurutalpā yutaṁ tasya tatkṣaṇādeva naśyati yasyāsthi setumadhye tu sthāpitaṁ putrapautrakaiḥ svarṇasteyāyutaṁ tasya tatkṣaṇādeva naśyati

— उसका गुरुतल्पगमन के समान पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है। जिसकी अस्थियाँ उसके पुत्र-पौत्रों द्वारा सेतु के मध्य रखी जाती हैं — उसका स्वर्ण-चोरी के समान पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

श्लोक 53 (skanda.3.1.53)

स्मृत्वा यं सेतुमध्ये तु स्नानं कुर्याद्द्विजोत्तमाः । महापातकिसंसर्गदोषस्तस्य लयं व्रजेत्

smṛtvā yaṁ setumadhye tu snānaṁ kuryāddvijottamāḥ mahāpātakisaṁsargadoṣastasya layaṁ vrajet

हे द्विजश्रेष्ठो, जिसका स्मरण करके सेतु के मध्य स्नान करना चाहिए, उससे महापातकी के संसर्ग का दोष भी लय को प्राप्त होता है।

श्लोक 54 (skanda.3.1.54)

मार्गभेदी स्वार्थपाकी यतिब्राह्मणदूषकः । अत्याशी वेदविक्रेता पंचैते ब्रह्मघातकाः

mārgabhedī svārthapākī yatibrāhmaṇadūṣakaḥ atyāśī vedavikretā paṁcaite brahmaghātakāḥ

मार्ग भटकाने वाला, केवल अपने लिए भोजन पकाने वाला, यति और ब्राह्मणों को दूषित करने वाला, अत्यधिक खाने वाला, तथा वेद बेचने वाला — ये पाँच ब्रह्महत्यारे के समान हैं।

श्लोक 55 (skanda.3.1.55)

ब्राह्मणान्यः समाहूय दास्यामीति धनादिकम् । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूते ब्रह्महा सोपि कीर्तितः

brāhmaṇānyaḥ samāhūya dāsyāmīti dhanādikam paścānnāstīti yo brūte brahmahā sopi kīrtitaḥ

जो किसी ब्राह्मण को बुलाकर "मैं तुम्हें धन दूँगा" कहकर बाद में "मेरे पास कुछ नहीं है" कहता है, वह भी ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।

श्लोक 56 (skanda.3.1.56)

परिज्ञाय यतो धर्मांस्तस्मै यो द्वेषमाचरेत् । अवजानाति वा विप्रान्ब्रह्महा सोपि कीर्तितः

parijñāya yato dharmāṁstasmai yo dveṣamācaret avajānāti vā viprānbrahmahā sopi kīrtitaḥ

जिससे धर्म जानकर भी उसके प्रति द्वेष करे, अथवा ब्राह्मणों का अनादर करे, वह भी ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।

श्लोक 57 (skanda.3.1.57)

जलपानार्थमायातं गोवृन्दं तु जलाशये । निवारयति यो विप्रा ब्रह्महा सोपि कीर्तितः

jalapānārthamāyātaṁ govṛndaṁ tu jalāśaye nivārayati yo viprā brahmahā sopi kīrtitaḥ

हे विप्रो, जो जलाशय में जल पीने आई गौओं के समूह को रोकता है, वह भी ब्रह्महत्यारा कहा जाता है।

श्लोक 58 (skanda.3.1.58)

सेतुमेत्य तु ते सर्वे मुच्यंते दोषसंचयैः । ब्रह्मघातकतुल्या ये संति चान्ये द्विजोत्तमाः

setumetya tu te sarve mucyaṁte doṣasaṁcayaiḥ brahmaghātakatulyā ye saṁti cānye dvijottamāḥ

किंतु ये सभी सेतु में आकर अपने संचित दोषों से मुक्त हो जाते हैं — और जो अन्य द्विजोत्तम भी ब्रह्महत्यारे के समान हैं —

श्लोक 59 (skanda.3.1.59)

ते सर्वे सेतुमागत्य मुच्यंते नात्र संशयः । औपासनपरित्यागी देवतान्नस्य भोजकः

te sarve setumāgatya mucyaṁte nātra saṁśayaḥ aupāsanaparityāgī devatānnasya bhojakaḥ

— वे सभी सेतु में आकर मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं। जो गृह्याग्नि का त्याग करने वाला है, जो देवताओं को अर्पित अन्न खाने वाला है —

श्लोक 60 (skanda.3.1.60)

सुरापयोषित्संसर्गी गणिकान्नाशनस्तथा । गणान्नभोजकश्चैव पतितान्नरतश्च यः

surāpayoṣitsaṁsargī gaṇikānnāśanastathā gaṇānnabhojakaścaiva patitānnarataśca yaḥ

— जो सुरापान करने वाली स्त्री का संसर्ग करता है, जो वेश्या का अन्न खाता है, जो सामूहिक अन्न (अनुचित रीति से) खाता है, तथा जो पतित के अन्न में रत रहता है —

श्लोक 61 (skanda.3.1.61)

एते सुरापिनः प्रोक्ताः सर्वकर्मबहिष्कृताः । सेतुस्नानेन मुच्यंते ते सर्वे हतकिल्बिषाः

ete surāpinaḥ proktāḥ sarvakarmabahiṣkṛtāḥ setusnānena mucyaṁte te sarve hatakilbiṣāḥ

— ये सुरापी के समान कहे गए हैं, समस्त कर्मों से बहिष्कृत। सेतु में स्नान करने से ये सभी मुक्त हो जाते हैं, उनका पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 62 (skanda.3.1.62)

सुरापतुल्या ये चान्ये मुच्यंते सेतुमज्जनात् । कन्दमूलफलानां च कस्तूरीपट्टवाससाम्

surāpatulyā ye cānye mucyaṁte setumajjanāt kandamūlaphalānāṁ ca kastūrīpaṭṭavāsasām

और सुरापी के समान अन्य जो भी हैं, वे सेतु में डुबकी लगाने से मुक्त हो जाते हैं। कंद, मूल, फल, कस्तूरी, रेशमी वस्त्र —

श्लोक 63 (skanda.3.1.63)

पयश्चंदनकर्पूरक्रमुकाणां तथैव च । मध्वाज्यता म्रकांस्यानां रुद्राक्षाणां तथैव च

payaścaṁdanakarpūrakramukāṇāṁ tathaiva ca madhvājyatā mrakāṁsyānāṁ rudrākṣāṇāṁ tathaiva ca

— दूध, चंदन, कपूर, सुपारी, तथा मधु, घृत, कांस्य-पात्र, रुद्राक्ष —

श्लोक 64 (skanda.3.1.64)

चोरकास्तु परिज्ञेया सुवर्णस्तेयिनः समाः । ते सेतुक्षेत्रमागत्य मुच्यन्ते नात्र संशयः

corakāstu parijñeyā suvarṇasteyinaḥ samāḥ te setukṣetramāgatya mucyante nātra saṁśayaḥ

— इनके चोरों को स्वर्ण-चोरों के समान समझना चाहिए; वे भी सेतु-क्षेत्र में आकर मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं।

श्लोक 65 (skanda.3.1.65)

अन्ये च स्तेयिनः सर्वे सेतुस्नानेन वै द्विजाः । मुच्यंते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा

anye ca steyinaḥ sarve setusnānena vai dvijāḥ mucyaṁte sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā

और हे द्विजो, अन्य सभी चोर भी सेतु में स्नान करने से समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं — इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 66 (skanda.3.1.66)

भगिनीं पुत्रभार्यां च तथैव च रजस्वलाम् । भ्रातृभार्यां मित्रभार्यां मद्यपां च परस्त्रियम्

bhaginīṁ putrabhāryāṁ ca tathaiva ca rajasvalām bhrātṛbhāryāṁ mitrabhāryāṁ madyapāṁ ca parastriyam

अपनी बहन, पुत्र की पत्नी, तथा रजस्वला स्त्री, भाई की पत्नी, मित्र की पत्नी, मद्यपान करने वाली स्त्री, तथा पराई स्त्री —

श्लोक 67 (skanda.3.1.67)

हीनस्त्रियं च विश्वस्तां योऽभिगच्छति रागतः । गुरुतल्पी स विज्ञेयः सर्वकर्मबहिष्कृतः

hīnastriyaṁ ca viśvastāṁ yo'bhigacchati rāgataḥ gurutalpī sa vijñeyaḥ sarvakarmabahiṣkṛtaḥ

— तथा विश्वासपात्र निम्न स्त्री के पास जो कामवश जाता है, वह गुरुतल्पगामी जाना जाता है, समस्त कर्मों से बहिष्कृत।

श्लोक 68 (skanda.3.1.68)

एते चान्ये च ये संति गुरुतल्पगतुल्यकाः । ते सर्वे प्रविमुच्यंते सेतुस्नानेन वै द्विजाः

ete cānye ca ye saṁti gurutalpagatulyakāḥ te sarve pravimucyaṁte setusnānena vai dvijāḥ

ये तथा गुरुतल्पगामी के समान अन्य जो भी हैं — हे द्विजो, वे सभी सेतु में स्नान करने से पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 69 (skanda.3.1.69)

एतैः संसर्गिणो विप्रा ये चान्ये संति पापिनः । सेतुस्नानेन महता तेऽपि मोक्षमवाप्नुयुः

etaiḥ saṁsargiṇo viprā ye cānye saṁti pāpinaḥ setusnānena mahatā te'pi mokṣamavāpnuyuḥ

हे विप्रो, इनका संसर्ग करने वाले तथा अन्य जो भी पापी हैं — वे भी सेतु के महान स्नान से मोक्ष प्राप्त करते हैं।

श्लोक 70 (skanda.3.1.70)

यागं विना देवलोके घृताचीमेनकादिभिः । संभोगकामिनो विप्राः स्नातुं संतावघापहे

yāgaṁ vinā devaloke ghṛtācīmenakādibhiḥ saṁbhogakāmino viprāḥ snātuṁ saṁtāvaghāpahe

यज्ञ के बिना देवलोक में घृताची, मेनका आदि अप्सराओं के साथ भोग की कामना करने वाले विप्रों को, शांतिदायक इस पापनाशक तीर्थ में स्नान करना चाहिए।

श्लोक 71 (skanda.3.1.71)

अनिषेव्य रविं वह्निमनुपास्य परान्सुरान् । शुभकामी जनः सेतौकुर्यात्स्नानं सभक्तिकम्

aniṣevya raviṁ vahnimanupāsya parānsurān śubhakāmī janaḥ setaukuryātsnānaṁ sabhaktikam

सूर्य की उपासना न कर, अग्नि की उपासना न कर, तथा अन्य देवताओं की उपासना न कर, शुभ की कामना करने वाला व्यक्ति सेतु में भक्तिपूर्वक स्नान करे।

श्लोक 72 (skanda.3.1.72)

तिलान्भूमिं सुवर्णं च धान्यं तंदुलमेव च । अदत्त्वेच्छंति ते स्वर्गं स्नातुं सेतौ तु ते द्विजाः

tilānbhūmiṁ suvarṇaṁ ca dhānyaṁ taṁdulameva ca adattvecchaṁti te svargaṁ snātuṁ setau tu te dvijāḥ

तिल, भूमि, स्वर्ण, धान्य तथा चावल का दान दिए बिना ही, स्वर्ग की कामना करने वाले वे द्विज सेतु में स्नान करें।

श्लोक 73 (skanda.3.1.73)

उपवासैर्व्रतैः कृत्स्नैरसंताप्य निजां तनुम् । स्वर्गाभिलाषिणः पुंसः स्नांतु सेतौ विमुक्तिदे

upavāsairvrataiḥ kṛtsnairasaṁtāpya nijāṁ tanum svargābhilāṣiṇaḥ puṁsaḥ snāṁtu setau vimuktide

उपवास और अनेक व्रतों से अपने शरीर को कष्ट दिए बिना ही, स्वर्ग की कामना करने वाले पुरुष विमुक्तिदायी सेतु में स्नान करें।

श्लोक 74 (skanda.3.1.74)

सेतुस्नानं मोक्षदं हि मनःशुद्धिप्रदं तथा । जपाद्धोमात्तथा दानाद्यागाच्च तपसोऽपि च

setusnānaṁ mokṣadaṁ hi manaḥśuddhipradaṁ tathā japāddhomāttathā dānādyāgācca tapaso'pi ca

सेतु-स्नान मोक्षदायक है तथा मन को शुद्ध करने वाला भी है; यह जप, होम, दान, यज्ञ तथा तप से भी श्रेष्ठ है।

श्लोक 75 (skanda.3.1.75)

सेतुस्नानं विशिष्टं हि पुराणे परिपठ्यते । अकामनाकृतं स्नानं सेतौ पापविनाशने

setusnānaṁ viśiṣṭaṁ hi purāṇe paripaṭhyate akāmanākṛtaṁ snānaṁ setau pāpavināśane

पुराण में सेतु-स्नान को विशेष रूप से बताया गया है। पापनाशक सेतु में बिना किसी कामना के किया गया स्नान —

श्लोक 76 (skanda.3.1.76)

अपुनर्भवदं प्रोक्तं सत्यमुक्तं द्विजोत्तमाः । यः संपदं समुद्दिश्य स्नाति सेतौ नरो मुदा

apunarbhavadaṁ proktaṁ satyamuktaṁ dvijottamāḥ yaḥ saṁpadaṁ samuddiśya snāti setau naro mudā

— पुनर्जन्म से मुक्ति देने वाला कहा गया है; हे द्विजोत्तमो, यह सत्य कहा गया है। जो मनुष्य धन-संपत्ति की कामना से आनंदपूर्वक सेतु में स्नान करता है —

श्लोक 77 (skanda.3.1.77)

स संपदमवाप्नोति विपुलां द्विजपुंगवाः । शुद्ध्यर्थं स्नाति चेत्सेतौ तदा शुद्धिमवाप्नुयात्

sa saṁpadamavāpnoti vipulāṁ dvijapuṁgavāḥ śuddhyarthaṁ snāti cetsetau tadā śuddhimavāpnuyāt

— हे द्विजपुंगवो, वह प्रचुर संपत्ति प्राप्त करता है। यदि वह शुद्धि के लिए सेतु में स्नान करे, तो उसे शुद्धि प्राप्त होती है।

श्लोक 78 (skanda.3.1.78)

रत्यर्थं यदि च स्नायादप्सरोभिर्नरो दिवि । तदा रतिमवाप्नोति स्वर्गलोकेऽमरीजनैः

ratyarthaṁ yadi ca snāyādapsarobhirnaro divi tadā ratimavāpnoti svargaloke'marījanaiḥ

और यदि मनुष्य स्वर्ग में अप्सराओं के साथ रति-सुख के लिए स्नान करे, तो उसे स्वर्गलोक में देवांगनाओं के साथ वह रति-सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 79 (skanda.3.1.79)

मुक्त्यर्थं यदि च स्नायात्सेतौ मुक्तिप्रदायिनि । तदा मुक्तिमवाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जिताम्

muktyarthaṁ yadi ca snāyātsetau muktipradāyini tadā muktimavāpnoti punarāvṛttivarjitām

और यदि वह मुक्तिदायी सेतु में मोक्ष के लिए स्नान करे, तो उसे पुनरावृत्ति-रहित मोक्ष प्राप्त होता है।

श्लोक 80 (skanda.3.1.80)

सेतुस्नानेन धर्मः स्यात्सेतुस्नानादघक्षयः । सेतुस्नानं द्विजश्रेष्ठाः सर्वकामफलप्रदम्

setusnānena dharmaḥ syātsetusnānādaghakṣayaḥ setusnānaṁ dvijaśreṣṭhāḥ sarvakāmaphalapradam

सेतु-स्नान से धर्म होता है, सेतु-स्नान से पाप का नाश होता है; हे द्विजश्रेष्ठो, सेतु-स्नान समस्त कामनाओं के फल को देने वाला है।

श्लोक 81 (skanda.3.1.81)

सर्वव्रताधिकं पुण्यं सर्वयज्ञोत्तरं स्मृतम् । सर्वयोगाधिकं प्रोक्तं सर्व तीर्थाधिकं स्मृतम्

sarvavratādhikaṁ puṇyaṁ sarvayajñottaraṁ smṛtam sarvayogādhikaṁ proktaṁ sarva tīrthādhikaṁ smṛtam

यह समस्त व्रतों से अधिक पुण्यदायी माना गया है, समस्त यज्ञों से श्रेष्ठ कहा गया है, समस्त योगों से अधिक बताया गया है, तथा समस्त तीर्थों से अधिक माना गया है।

श्लोक 82 (skanda.3.1.82)

इंद्रादिलोकभोगेषु रागो येषां प्रवर्तते । स्नातव्यं तैर्द्विजश्रेष्ठाः सेतौ रामकृते सकृत्

iṁdrādilokabhogeṣu rāgo yeṣāṁ pravartate snātavyaṁ tairdvijaśreṣṭhāḥ setau rāmakṛte sakṛt

हे द्विजश्रेष्ठो, जिनमें इन्द्र आदि लोकों के भोगों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है, उन्हें राम द्वारा निर्मित सेतु में एक बार स्नान अवश्य करना चाहिए।

श्लोक 83 (skanda.3.1.83)

ब्रह्मलोके च वैकुण्ठे कैलासेऽपि शिवालये । रंतुमिच्छा भवेद्येषां ते सेतौ स्नांतु सादरम्

brahmaloke ca vaikuṇṭhe kailāse'pi śivālaye raṁtumicchā bhavedyeṣāṁ te setau snāṁtu sādaram

जिनकी ब्रह्मलोक, वैकुण्ठ, अथवा शिव के कैलास में भी क्रीड़ा करने की इच्छा हो, वे सेतु में आदरपूर्वक स्नान करें।

श्लोक 84 (skanda.3.1.84)

आयुरारोग्यसंपत्तिमतिरूपगुणाढ्यताम् । चतुर्णामपि वेदानां सांगानां पारगामिनाम्

āyurārogyasaṁpattimatirūpaguṇāḍhyatām caturṇāmapi vedānāṁ sāṁgānāṁ pāragāminām

आयु, आरोग्य, संपत्ति, बुद्धि, रूप तथा गुणों की समृद्धि; चारों वेदों को उनके अंगों सहित पूर्णतः जानने की क्षमता —

श्लोक 85 (skanda.3.1.85)

सर्वशास्त्राधिगंतृत्वं सर्वमंत्रेष्वभिज्ञताम् । समुद्दिश्य तु यः स्नायात्सेतौ सर्वार्थसिद्धिदे

sarvaśāstrādhigaṁtṛtvaṁ sarvamaṁtreṣvabhijñatām samuddiśya tu yaḥ snāyātsetau sarvārthasiddhide

— समस्त शास्त्रों का ज्ञान, तथा समस्त मंत्रों की जानकारी — इन्हें उद्देश्य बनाकर जो सर्वार्थ-सिद्धिदायी सेतु में स्नान करता है —

श्लोक 86 (skanda.3.1.86)

तत्तत्सिद्धिम वाप्नोति सत्यं स्यान्नात्र संशयः । दारिद्र्यान्नरकाद्ये च मनुजा भुवि बिभ्यति

tattatsiddhima vāpnoti satyaṁ syānnātra saṁśayaḥ dāridryānnarakādye ca manujā bhuvi bibhyati

— वह उसी सिद्धि को प्राप्त करता है; यह सत्य है, इसमें संदेह नहीं। दरिद्रता, नरक आदि से मनुष्य पृथ्वी पर भयभीत रहते हैं —

श्लोक 87 (skanda.3.1.87)

स्नानं कुर्वंतु ते सर्वे रामसेतौ विमुक्तिदे । श्रद्धया सहितो मर्त्यः श्रद्धया रहितोऽपि वा

snānaṁ kurvaṁtu te sarve rāmasetau vimuktide śraddhayā sahito martyaḥ śraddhayā rahito'pi vā

— वे सभी विमुक्तिदायी रामसेतु में स्नान करें। श्रद्धा-सहित मर्त्य हो या श्रद्धा-रहित —

श्लोक 88 (skanda.3.1.88)

इहलोके परत्रापि सेतुस्नायी न दुःखभाक् । सेतुस्नानेन सर्वेषां नश्यते पापसंचयः

ihaloke paratrāpi setusnāyī na duḥkhabhāk setusnānena sarveṣāṁ naśyate pāpasaṁcayaḥ

— सेतु में स्नान करने वाला इस लोक में तथा परलोक में भी दुःख का भागी नहीं होता। सेतु-स्नान से सबका संचित पाप नष्ट हो जाता है।

श्लोक 89 (skanda.3.1.89)

वर्द्धते धर्मराशिश्च शुक्लपक्षे यथा शशी । यथा रत्नानि वर्द्धंते समुद्रे विविधान्यपि

varddhate dharmarāśiśca śuklapakṣe yathā śaśī yathā ratnāni varddhaṁte samudre vividhānyapi

और जैसे शुक्ल पक्ष में चंद्रमा बढ़ता है, वैसे ही धर्म की राशि बढ़ती है; जैसे समुद्र में विविध रत्न बढ़ते हैं —

श्लोक 90 (skanda.3.1.90)

तथा पुण्यानि वर्द्धंते सेतुस्नानेन वै द्विजाः । काम धेनुर्यथा लोके सर्वाकामान्प्रयच्छति

tathā puṇyāni varddhaṁte setusnānena vai dvijāḥ kāma dhenuryathā loke sarvākāmānprayacchati

— वैसे ही हे द्विजो, सेतु-स्नान से पुण्य बढ़ते हैं। जैसे लोक में कामधेनु समस्त कामनाओं को पूर्ण करती है —

श्लोक 91 (skanda.3.1.91)

चिंतामणिर्यथा दद्यात्पुरुषाणां मनोरथान् । यथाऽमरतरुर्दद्यात्पुरुषाणामभीप्सितम्

ciṁtāmaṇiryathā dadyātpuruṣāṇāṁ manorathān yathā'maratarurdadyātpuruṣāṇāmabhīpsitam

— जैसे चिंतामणि पुरुषों के मनोरथ पूर्ण करती है, जैसे कल्पवृक्ष पुरुषों की अभीष्ट वस्तु देता है —

श्लोक 92 (skanda.3.1.92)

सेतुस्नानं तथा नृणां सर्वाभीष्टान्प्रदास्यति । अशक्तः सेतुयात्रायां दारिद्र्येण च मानवः

setusnānaṁ tathā nṛṇāṁ sarvābhīṣṭānpradāsyati aśaktaḥ setuyātrāyāṁ dāridryeṇa ca mānavaḥ

— वैसे ही सेतु-स्नान मनुष्यों की समस्त अभीष्ट वस्तुएँ प्रदान करेगा। जो मनुष्य दरिद्रता के कारण सेतु-यात्रा में असमर्थ हो —

श्लोक 93 (skanda.3.1.93)

याचित्वा स धनं शिष्टात्सेतौ स्नानं समाच रेत् । सेतुस्नानसमं पुण्यं तत्र दाता समश्नुते

yācitvā sa dhanaṁ śiṣṭātsetau snānaṁ samāca ret setusnānasamaṁ puṇyaṁ tatra dātā samaśnute

— वह किसी सज्जन से धन माँगकर सेतु में स्नान करे; वहाँ दाता को भी सेतु-स्नान के समान पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 94 (skanda.3.1.94)

तथा प्रतिगृहीतापि प्राप्नोत्यविकलं फलम् । सेतुयात्रां समुद्दिश्य गृह्णीयाद्ब्राह्मणाद्ध नम्

tathā pratigṛhītāpi prāpnotyavikalaṁ phalam setuyātrāṁ samuddiśya gṛhṇīyādbrāhmaṇāddha nam

और इसी प्रकार दान लेने वाला भी पूर्ण फल प्राप्त करता है। सेतु-यात्रा के उद्देश्य से ब्राह्मण से धन ले सकते हैं —

श्लोक 95 (skanda.3.1.95)

क्षत्रियादपि गृह्णीयान्न दद्युर्ब्राह्मणा यदि । वैश्याद्वा प्रतिगृह्णीयान्न प्रयच्छंति चेन्नृपाः

kṣatriyādapi gṛhṇīyānna dadyurbrāhmaṇā yadi vaiśyādvā pratigṛhṇīyānna prayacchaṁti cennṛpāḥ

— अथवा क्षत्रिय से ले सकते हैं, यदि ब्राह्मण न दें; अथवा वैश्य से ले सकते हैं, यदि राजा न दें।

श्लोक 96 (skanda.3.1.96)

शूद्रान्न प्रतिगृह्णीयात्कथंचिदपि मानवः । यः सेतुं गच्छतः पुंसो धनं वा धान्यमेव वा

śūdrānna pratigṛhṇīyātkathaṁcidapi mānavaḥ yaḥ setuṁ gacchataḥ puṁso dhanaṁ vā dhānyameva vā

किंतु शूद्र से किसी भी दशा में नहीं लेना चाहिए। जो मनुष्य सेतु जाने वाले किसी व्यक्ति को धन अथवा धान्य —

श्लोक 97 (skanda.3.1.97)

दत्त्वा वस्त्रादिकं वापि प्रवर्तयति मानवः । सोऽश्वमेधादियज्ञानां फलमाप्तो त्यनुत्तमम्

dattvā vastrādikaṁ vāpi pravartayati mānavaḥ so'śvamedhādiyajñānāṁ phalamāpto tyanuttamam

— अथवा वस्त्र आदि देकर उसे मार्ग पर भेजता है, वह अश्वमेध आदि यज्ञों का अनुपम फल प्राप्त करता है।

श्लोक 98 (skanda.3.1.98)

चतुर्णामपि वेदानां पारायणफलं लभेत् । तुलापुरुषमुख्यानां दानानां फलमश्नुते

caturṇāmapi vedānāṁ pārāyaṇaphalaṁ labhet tulāpuruṣamukhyānāṁ dānānāṁ phalamaśnute

वह चारों वेदों के पूर्ण पाठ का फल प्राप्त करता है तथा तुलापुरुष आदि प्रमुख दानों का फल भोगता है।

श्लोक 99 (skanda.3.1.99)

ब्रह्महत्यादिपापानां नाशः स्या न्नात्र संशयः । बहुना किं प्रलापेन सर्वान्कामान्समश्नुते

brahmahatyādipāpānāṁ nāśaḥ syā nnātra saṁśayaḥ bahunā kiṁ pralāpena sarvānkāmānsamaśnute

ब्रह्महत्या आदि पापों का नाश निश्चय ही होता है, इसमें संदेह नहीं। अधिक कहने से क्या लाभ, वह समस्त कामनाओं को भोगता है।

श्लोक 100 (skanda.3.1.100)

एवं प्रतिगृहीतापि तत्तुल्यफलमश्नुते । याचतः सेतुयात्रार्थं न प्रतिग्रहकल्मषम्

evaṁ pratigṛhītāpi tattulyaphalamaśnute yācataḥ setuyātrārthaṁ na pratigrahakalmaṣam

इस प्रकार दान लेने वाला भी उतना ही फल भोगता है; सेतु-यात्रा के लिए माँगने वाले को प्रतिग्रह का दोष नहीं लगता।

श्लोक 101 (skanda.3.1.101)

सेतुं गच्छ धनं तेऽहं दास्यामीति प्रलोभ्य यः । पश्चान्नास्तीति च ब्रूयात्तमाहुर्ब्रह्मघातकम्

setuṁ gaccha dhanaṁ te'haṁ dāsyāmīti pralobhya yaḥ paścānnāstīti ca brūyāttamāhurbrahmaghātakam

जो किसी को "सेतु जाओ, मैं तुम्हें धन दूँगा" कहकर लुभाकर बाद में "मेरे पास नहीं है" कहता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

श्लोक 102 (skanda.3.1.102)

लोभेन सेतुयात्रार्थं संपन्नोऽपि दरिद्रवत् । मानवो यदि याचेत तमाहुस्तेयिनं बुधाः

lobhena setuyātrārthaṁ saṁpanno'pi daridravat mānavo yadi yāceta tamāhusteyinaṁ budhāḥ

यदि कोई सम्पन्न मनुष्य लोभवश सेतु-यात्रा के लिए दरिद्र के समान माँगे, तो विद्वान उसे चोर कहते हैं।

श्लोक 103 (skanda.3.1.103)

गमिष्ये सेतुमिति वै यो गृहीत्वा धनं नरः । न याति सेतुं लोभेन तमाहुर्ब्रह्मघा तकम्

gamiṣye setumiti vai yo gṛhītvā dhanaṁ naraḥ na yāti setuṁ lobhena tamāhurbrahmaghā takam

जो मनुष्य "मैं सेतु जाऊँगा" कहकर धन ग्रहण करके, लोभवश सेतु नहीं जाता, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

श्लोक 104 (skanda.3.1.104)

येन केनाप्युपायेन सेतुं गच्छेन्नरो मुदा । अशक्तो दक्षिणां दत्त्वा गमयेद्वा द्विजोत्तमम्

yena kenāpyupāyena setuṁ gacchennaro mudā aśakto dakṣiṇāṁ dattvā gamayedvā dvijottamam

जिस किसी भी उपाय से मनुष्य आनंदपूर्वक सेतु जाए; यदि असमर्थ हो, तो दक्षिणा देकर किसी श्रेष्ठ ब्राह्मण को भेज दे।

श्लोक 105 (skanda.3.1.105)

याचित्वा यज्ञकरणे यथा दोषो न विद्यते । याचित्वा सेतुयात्रायां तथा दोषो न विद्यते

yācitvā yajñakaraṇe yathā doṣo na vidyate yācitvā setuyātrāyāṁ tathā doṣo na vidyate

जैसे यज्ञ करने के लिए माँगने में दोष नहीं है, वैसे ही सेतु-यात्रा के लिए माँगने में भी दोष नहीं है।

श्लोक 106 (skanda.3.1.106)

याचित्वाप्यन्यतो द्रव्यं सेतुस्नाने प्रवर्तयेत् । सोऽपि तत्फलमाप्नोति सेतु स्नायी नरो यथा

yācitvāpyanyato dravyaṁ setusnāne pravartayet so'pi tatphalamāpnoti setu snāyī naro yathā

अन्यत्र से भी धन माँगकर सेतु-स्नान में लगाए, तो वह भी उतना ही फल प्राप्त करता है, जितना सेतु में स्वयं स्नान करने वाला मनुष्य।

श्लोक 107 (skanda.3.1.107)

ज्ञानेन मोक्षमभियांति कृते युगे तु त्रेतायुगे यजनमेव विमुक्तिदायि । श्रेष्ठं तथान्ययुगयोरपि दानमाहुः सर्वत्र सेत्वभिषवो हि वरो नराणाम्

jñānena mokṣamabhiyāṁti kṛte yuge tu tretāyuge yajanameva vimuktidāyi śreṣṭhaṁ tathānyayugayorapi dānamāhuḥ sarvatra setvabhiṣavo hi varo narāṇām

सतयुग में मनुष्य ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होते हैं, त्रेतायुग में यज्ञ ही मुक्ति देने वाला है; अन्य दोनों युगों में दान को श्रेष्ठ कहा गया है — किंतु सभी युगों में सेतु-स्नान ही मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ है।

अध्याय-सूचीअध्याय 2