ब्रह्म खण्ड · अध्याय 2
सेतु-निर्माण का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.3.2.1)
ऋषय ऊचुः । कथं सूत महाभाग रामेणाक्लिष्टकर्मणा । सेतुर्बद्धो नदीनाथे ह्यगाधे वरुणालये
ṛṣaya ūcuḥ kathaṁ sūta mahābhāga rāmeṇākliṣṭakarmaṇā seturbaddho nadīnāthe hyagādhe varuṇālaye
ऋषियों ने कहा — हे महाभाग सूत! अथक कर्म करने वाले राम द्वारा अगाध नदीनाथ, वरुण के आवास (समुद्र) में सेतु कैसे बाँधा गया?
श्लोक 2 (skanda.3.2.2)
सेतौ च कति तीर्थानि गंधमादनपर्वते । एतन्नः श्रद्दधानानां ब्रूहि पौराणिकोत्तम
setau ca kati tīrthāni gaṁdhamādanaparvate etannaḥ śraddadhānānāṁ brūhi paurāṇikottama
और सेतु में तथा गंधमादन पर्वत पर कितने तीर्थ हैं? हे पुराणों में श्रेष्ठ, श्रद्धावान हम लोगों को यह बताइए।
श्लोक 3 (skanda.3.2.3)
श्रीसूत उवाच । रामेण हि यथासेतुर्निबद्धो वरुणालये । तदहं संप्रवक्ष्यामि युष्माकं मुनिपुंगवाः
śrīsūta uvāca rāmeṇa hi yathāseturnibaddho varuṇālaye tadahaṁ saṁpravakṣyāmi yuṣmākaṁ munipuṁgavāḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! जिस प्रकार राम द्वारा वरुण के आवास पर सेतु बाँधा गया, वह मैं आपको बताऊँगा।
श्लोक 4 (skanda.3.2.4)
आज्ञया हि पितू रामो न्यवसद्दंडकानने । सीतालक्ष्मणसंयुक्तः पंचवट्यां समाहितः
ājñayā hi pitū rāmo nyavasaddaṁḍakānane sītālakṣmaṇasaṁyuktaḥ paṁcavaṭyāṁ samāhitaḥ
पिता की आज्ञा से राम दण्डकवन में निवास करने लगे, सीता और लक्ष्मण सहित, पंचवटी में स्थिर होकर।
श्लोक 5 (skanda.3.2.5)
तस्मिन्निव सतस्तस्य राघवस्य महात्मनः । रावणेन हृता भार्या मारीचच्छद्मना द्विजाः
tasminniva satastasya rāghavasya mahātmanaḥ rāvaṇena hṛtā bhāryā mārīcacchadmanā dvijāḥ
हे द्विजो, वहीं निवास करते हुए उन महात्मा राघव की पत्नी को रावण ने मारीच के छल से हर लिया।
श्लोक 6 (skanda.3.2.6)
मार्गमाणो वने भार्यां रामो दशरथात्मजः । पंपातीरे जगा मासौ शोकमोहसमन्वितः
mārgamāṇo vane bhāryāṁ rāmo daśarathātmajaḥ paṁpātīre jagā māsau śokamohasamanvitaḥ
वन में अपनी पत्नी को खोजते हुए दशरथ-पुत्र राम, शोक और मोह से व्याकुल होकर, दोनों पम्पा के तट पर गए।
श्लोक 7 (skanda.3.2.7)
दृष्टवान्वानरं तत्र कंचिद्दशरथात्मजः । वानरेणाथ पृष्टोऽयं को भवानिति राघवः
dṛṣṭavānvānaraṁ tatra kaṁciddaśarathātmajaḥ vānareṇātha pṛṣṭo'yaṁ ko bhavāniti rāghavaḥ
वहाँ दशरथ-पुत्र ने एक वानर को देखा; तब उस वानर ने राघव से पूछा — "आप कौन हैं?"
श्लोक 8 (skanda.3.2.8)
आदितः स्वस्य वृत्तांत्तं तस्मै प्रोवाच तत्त्वतः । अथ राघवसंपृष्टो वानरः को भवानिति
āditaḥ svasya vṛttāṁttaṁ tasmai provāca tattvataḥ atha rāghavasaṁpṛṣṭo vānaraḥ ko bhavāniti
उन्होंने अपने वृत्तांत को आदि से यथार्थ रूप में उस वानर को बताया; तब राघव ने भी वानर से पूछा — "तुम कौन हो?"
श्लोक 9 (skanda.3.2.9)
सोपि विज्ञापयामास राघवाय महात्मने । अहं सुग्रीवसचिवो हनूमा न्नाम वानरः
sopi vijñāpayāmāsa rāghavāya mahātmane ahaṁ sugrīvasacivo hanūmā nnāma vānaraḥ
उसने भी महात्मा राघव को बताया — "मैं सुग्रीव का मंत्री, हनुमान नामक वानर हूँ।
श्लोक 10 (skanda.3.2.10)
तेन च प्रेरितोऽभ्यागां युवाभ्यां सख्यमिच्छता । आगच्छतं तद्भद्रं वां सुग्रीवांतिकमाशु वै
tena ca prerito'bhyāgāṁ yuvābhyāṁ sakhyamicchatā āgacchataṁ tadbhadraṁ vāṁ sugrīvāṁtikamāśu vai
और मैं उन्हीं के द्वारा भेजा गया हूँ, जो आप दोनों से मित्रता चाहते हैं। आइए, आप दोनों का कल्याण हो, शीघ्र सुग्रीव के समीप चलें।"
श्लोक 11 (skanda.3.2.11)
तथास्त्विति स रामो पि तेन साकं मुनीश्वराः । सुग्रीवांतिकमागप्य सख्यं चक्रेऽग्निसाक्षिकम्
tathāstviti sa rāmo pi tena sākaṁ munīśvarāḥ sugrīvāṁtikamāgapya sakhyaṁ cakre'gnisākṣikam
हे मुनीश्वरो, "ऐसा ही हो" कहकर राम भी उसके साथ सुग्रीव के समीप गए और अग्नि को साक्षी मानकर मित्रता की।
श्लोक 12 (skanda.3.2.12)
प्रतिजज्ञेऽथ रामोऽपि तस्मै वालिवधं प्रति । सुग्रीवश्चापि वै देह्याः पुनरानयनं द्विजाः
pratijajñe'tha rāmo'pi tasmai vālivadhaṁ prati sugrīvaścāpi vai dehyāḥ punarānayanaṁ dvijāḥ
तब राम ने भी उससे वालि-वध का प्रण किया, और हे द्विजो, सुग्रीव ने भी राम की पत्नी को पुनः लाने का प्रण किया।
श्लोक 13 (skanda.3.2.13)
इत्येवं समयं कृत्वा विश्वास्य च परस्परम् । मुदा परमया युक्तौ नरेश्वरकपीश्वरौ
ityevaṁ samayaṁ kṛtvā viśvāsya ca parasparam mudā paramayā yuktau nareśvarakapīśvarau
इस प्रकार वचन देकर तथा परस्पर विश्वास कर, नरेश्वर (राम) और कपीश्वर (सुग्रीव) परम आनंद से युक्त हुए।
श्लोक 14 (skanda.3.2.14)
आसाते ब्राह्मणश्रेष्ठा ऋष्यमूकगिरौ तथा । सुग्रीवप्रत्ययार्थं च दुंदुभेः कायमाशु वै
āsāte brāhmaṇaśreṣṭhā ṛṣyamūkagirau tathā sugrīvapratyayārthaṁ ca duṁdubheḥ kāyamāśu vai
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, वे दोनों ऋष्यमूक पर्वत पर रहे; और सुग्रीव के विश्वास के लिए राम ने शीघ्र ही दुंदुभि के शरीर को दिखाया।
श्लोक 15 (skanda.3.2.15)
पादांगुष्ठेन चिक्षेप राघवो बहुयोजनम् । सप्तताला विनिर्भिन्ना राघवेण महात्मना
pādāṁguṣṭhena cikṣepa rāghavo bahuyojanam saptatālā vinirbhinnā rāghaveṇa mahātmanā
राघव ने अपने पैर के अंगूठे से उसे कई योजन दूर फेंक दिया; और महात्मा राघव ने सात ताड़ वृक्षों को भी बींध डाला।
श्लोक 16 (skanda.3.2.16)
ततः प्रीतमना वीरः सुग्रीवो राममब्रवीत् । इंद्रादिदेवताभ्योऽपि नास्ति राघव मे भयम्
tataḥ prītamanā vīraḥ sugrīvo rāmamabravīt iṁdrādidevatābhyo'pi nāsti rāghava me bhayam
तब प्रसन्नचित्त वीर सुग्रीव ने राम से कहा — "हे राघव, अब मुझे इन्द्र आदि देवताओं से भी भय नहीं है,
श्लोक 17 (skanda.3.2.17)
भवान्मित्रं मया लब्धो यस्मादति पराक्रमः । अहं लंकेश्वरं हत्वा भार्यामानयितास्मि ते
bhavānmitraṁ mayā labdho yasmādati parākramaḥ ahaṁ laṁkeśvaraṁ hatvā bhāryāmānayitāsmi te
क्योंकि मुझे आप जैसा अत्यंत पराक्रमी मित्र प्राप्त हुआ है। मैं लंकापति को मारकर आपकी पत्नी को ले आऊँगा।"
श्लोक 18 (skanda.3.2.18)
ततः सुग्रीवसहितो रामचंद्रो महाबलः । सलक्ष्मणो ययौ तूर्णं किष्किंधां वालिपालिताम्
tataḥ sugrīvasahito rāmacaṁdro mahābalaḥ salakṣmaṇo yayau tūrṇaṁ kiṣkiṁdhāṁ vālipālitām
तब महाबली रामचंद्र, सुग्रीव सहित तथा लक्ष्मण सहित, वालि द्वारा शासित किष्किंधा को शीघ्र गए।
श्लोक 19 (skanda.3.2.19)
ततो जगर्ज सुग्रीवो वाल्यागमनकांक्षया । अमृष्यमाणो वाली च गर्जितं स्वानुजस्य वै
tato jagarja sugrīvo vālyāgamanakāṁkṣayā amṛṣyamāṇo vālī ca garjitaṁ svānujasya vai
तब सुग्रीव ने वालि के आगमन की कामना से गर्जना की; और वालि अपने छोटे भाई की उस गर्जना को सहन न कर सका —
श्लोक 20 (skanda.3.2.20)
अंतःपुराद्विनिष्क्रम्य युयुधेऽवरजेन सः । वालिमुष्टिप्रहारेण ताडितो भृशविह्वलः
aṁtaḥpurādviniṣkramya yuyudhe'varajena saḥ vālimuṣṭiprahāreṇa tāḍito bhṛśavihvalaḥ
— अंतःपुर से निकलकर अपने छोटे भाई के साथ युद्ध करने लगा; वालि के मुष्टि-प्रहार से आहत होकर सुग्रीव अत्यंत विह्वल हो गया।
श्लोक 21 (skanda.3.2.21)
सुग्रीवो निर्गतस्तूर्णं यत्र रामो महाबलः । ततो रामो महाबाहुस्सुग्रीवस्य शिरोधरे
sugrīvo nirgatastūrṇaṁ yatra rāmo mahābalaḥ tato rāmo mahābāhussugrīvasya śirodhare
सुग्रीव शीघ्र वहाँ भागा जहाँ महाबली राम थे; तब महाबाहु राम ने सुग्रीव के गले में —
श्लोक 22 (skanda.3.2.22)
लतामाबध्य चिह्नं तु युद्धायाचोदयत्तदा । गर्जितेन समाहूय सुग्रीवो वालिनं पुनः
latāmābadhya cihnaṁ tu yuddhāyācodayattadā garjitena samāhūya sugrīvo vālinaṁ punaḥ
— एक लता बाँधकर उसे पहचान-चिह्न दिया, और फिर उसे पुनः युद्ध के लिए प्रेरित किया। सुग्रीव ने पुनः गर्जना से वालि को ललकारा —
श्लोक 23 (skanda.3.2.23)
रामप्रेरणया तेन बाहुयुद्धमथाकरोत् । ततो वालिनमाजघ्ने शरेणैकेन राघवः
rāmapreraṇayā tena bāhuyuddhamathākarot tato vālinamājaghne śareṇaikena rāghavaḥ
— और राम की प्रेरणा से उसके साथ बाहु-युद्ध करने लगा। तब राघव ने एक ही बाण से वालि का वध कर दिया।
श्लोक 24 (skanda.3.2.24)
हते वालिनि सुग्रीवः किष्किंधां प्रत्यपद्यत । ततो वर्षास्वतीतासु सुग्रीवो वानराधिपः
hate vālini sugrīvaḥ kiṣkiṁdhāṁ pratyapadyata tato varṣāsvatītāsu sugrīvo vānarādhipaḥ
वालि के मारे जाने पर सुग्रीव को किष्किंधा प्राप्त हुई। फिर वर्षा-ऋतु बीत जाने पर वानरों के स्वामी सुग्रीव —
श्लोक 25 (skanda.3.2.25)
सीतामानयितुं तूर्णं वानराणां महाचमूम् । समादाय समागच्छदंतिकं नृपपुत्रयोः
sītāmānayituṁ tūrṇaṁ vānarāṇāṁ mahācamūm samādāya samāgacchadaṁtikaṁ nṛpaputrayoḥ
— सीता को शीघ्र लाने के लिए वानरों की एक विशाल सेना लेकर दोनों राजकुमारों के समीप आए।
श्लोक 26 (skanda.3.2.26)
प्रस्थापयामास कपीन्सीतान्वेषणकांक्षया । विदितायां तु वैदेह्या लंकायां वायुसूनुना
prasthāpayāmāsa kapīnsītānveṣaṇakāṁkṣayā viditāyāṁ tu vaidehyā laṁkāyāṁ vāyusūnunā
उन्होंने सीता की खोज की कामना से वानरों को भेजा। जब वायुपुत्र हनुमान द्वारा वैदेही के लंका में होने का पता चल गया —
श्लोक 27 (skanda.3.2.27)
दत्ते चूडामणौ चापि राघवो हर्षशोकवान् । सुग्रीवेणानुजेनापि वायुपुत्रेण धीमता
datte cūḍāmaṇau cāpi rāghavo harṣaśokavān sugrīveṇānujenāpi vāyuputreṇa dhīmatā
— तथा जब सीता का चूड़ामणि भी राम को दिया गया, तब राघव हर्ष और शोक दोनों से युक्त हो गए, सुग्रीव सहित, अपने छोटे भाई लक्ष्मण सहित, तथा बुद्धिमान वायुपुत्र सहित —
श्लोक 28 (skanda.3.2.28)
तथान्यैः कपिभिश्चैव जांबवन्नलमुख्यकैः । अन्वीयमानो रामोऽसौ मुहूर्तेऽभिजिति द्विजाः
tathānyaiḥ kapibhiścaiva jāṁbavannalamukhyakaiḥ anvīyamāno rāmo'sau muhūrte'bhijiti dvijāḥ
— तथा जाम्बवान् और नल आदि अन्य वानरों सहित, हे द्विजो, अभिजित मुहूर्त में उन सबके साथ राम —
श्लोक 29 (skanda.3.2.29)
विलंघ्य विविधा न्देशान्महेंद्रं पर्वतं ययौ । चक्रतीर्थं ततो गत्वा निवासमकरोत्तदा
vilaṁghya vividhā ndeśānmaheṁdraṁ parvataṁ yayau cakratīrthaṁ tato gatvā nivāsamakarottadā
— विभिन्न देशों को पार करते हुए महेन्द्र पर्वत पर गए; फिर वहाँ से चक्रतीर्थ जाकर उन्होंने वहीं निवास किया।
श्लोक 30 (skanda.3.2.30)
तत्रैव तु स धर्मात्मा समागच्छद्विभीषणः । भ्राता वै राक्षसेंद्रस्य चतुर्भिः सचिवैः सह
tatraiva tu sa dharmātmā samāgacchadvibhīṣaṇaḥ bhrātā vai rākṣaseṁdrasya caturbhiḥ sacivaiḥ saha
वहीं उस धर्मात्मा विभीषण, जो राक्षसेन्द्र रावण के भाई थे, अपने चार मंत्रियों सहित आए।
श्लोक 31 (skanda.3.2.31)
प्रतिजग्राह रामस्तं स्वागतेन महात्मना । सुग्रीवस्य तु शंकाऽभूत्प्रणिधिः स्यादयं त्विति
pratijagrāha rāmastaṁ svāgatena mahātmanā sugrīvasya tu śaṁkā'bhūtpraṇidhiḥ syādayaṁ tviti
महात्मा राम ने उनका स्वागत कर उन्हें ग्रहण किया; किंतु सुग्रीव को शंका हुई कि "यह कहीं गुप्तचर तो नहीं?"
श्लोक 32 (skanda.3.2.32)
राघवस्तस्य चेष्टाभिः सम्यक्स्वचरितैर्हितैः । अदुष्टमेनं दृष्ट्वैव तत एनमपूजयत्
rāghavastasya ceṣṭābhiḥ samyaksvacaritairhitaiḥ aduṣṭamenaṁ dṛṣṭvaiva tata enamapūjayat
किंतु राघव ने उसकी चेष्टाओं तथा अपने भले-सच्चे आचरण से यह जानकर कि वह निर्दोष है, उसका सम्मान किया।
श्लोक 33 (skanda.3.2.33)
सर्वराक्षसराज्ये तमभ्यषिंचद्विभीषणम् । चक्रे च मंत्रिप्रवरं सदृशं रविसूनुना
sarvarākṣasarājye tamabhyaṣiṁcadvibhīṣaṇam cakre ca maṁtripravaraṁ sadṛśaṁ ravisūnunā
उन्होंने उस विभीषण को समस्त राक्षस-राज्य पर अभिषिक्त किया, तथा सूर्यपुत्र सुग्रीव के समान उसे भी अपना प्रमुख मंत्री बनाया।
श्लोक 34 (skanda.3.2.34)
चक्रतीर्थं समासाद्य निवसद्रघुनंदनः । चिंतयन्राघवः श्रीमान्सुग्रीवादीनभाषत
cakratīrthaṁ samāsādya nivasadraghunaṁdanaḥ ciṁtayanrāghavaḥ śrīmānsugrīvādīnabhāṣata
चक्रतीर्थ में पहुँचकर रघुनंदन वहाँ निवास करने लगे; और चिंतन करते हुए श्रीमान् राघव ने सुग्रीव आदि से कहा —
श्लोक 35 (skanda.3.2.35)
मध्ये वानरमु ख्यानां प्राप्तकालमिदं वचः । उपायः को नु भवतामेतत्सागरलंघने
madhye vānaramu khyānāṁ prāptakālamidaṁ vacaḥ upāyaḥ ko nu bhavatāmetatsāgaralaṁghane
— वानर-प्रमुखों के मध्य यह समयोचित वचन — "इस समुद्र को पार करने का आपके पास क्या उपाय है?
श्लोक 36 (skanda.3.2.36)
इयं च महती सेना सागरश्चापि दुस्तरः । अंभोराशिरयं नीलश्चंचलोर्म्मिसमाकुलः
iyaṁ ca mahatī senā sāgaraścāpi dustaraḥ aṁbhorāśirayaṁ nīlaścaṁcalormmisamākulaḥ
यह विशाल सेना है और समुद्र भी दुस्तर है — यह गहरी नीली जलराशि, चंचल लहरों से भरी हुई,
श्लोक 37 (skanda.3.2.37)
उद्यन्मत्स्यो महानक्रशंखशुक्तिसमाकुलः । क्वचिदौर्वानलाक्रांतः फेनवानतिभीषणः
udyanmatsyo mahānakraśaṁkhaśuktisamākulaḥ kvacidaurvānalākrāṁtaḥ phenavānatibhīṣaṇaḥ
उछलती हुई मछलियों वाली, बड़े-बड़े मगरमच्छों, शंखों तथा सीपियों से भरी हुई, कहीं-कहीं बड़वानल से आक्रांत, फेनयुक्त तथा अत्यंत भयंकर —
श्लोक 38 (skanda.3.2.38)
प्रकृष्टपवनाकृष्टनीलमेघसमन्वितः । प्रलयांभोधरारावः सारवाननिलोद्धतः
prakṛṣṭapavanākṛṣṭanīlameghasamanvitaḥ pralayāṁbhodharārāvaḥ sāravānaniloddhataḥ
— प्रबल वायु से खिंचे हुए नीले मेघों से युक्त, प्रलयकालीन मेघों की सी गर्जना करने वाली, वायु से उद्वेलित तथा शक्तिशाली —
श्लोक 39 (skanda.3.2.39)
कथं सागरमक्षोभ्यं तरामो वरुणा लयम् । सैन्यैः परिवृताः सर्वे वानराणां महौजसाम्
kathaṁ sāgaramakṣobhyaṁ tarāmo varuṇā layam sainyaiḥ parivṛtāḥ sarve vānarāṇāṁ mahaujasām
— इस अक्षोभ्य समुद्र, वरुण के आवास को हम कैसे पार करें, जबकि हम सब महातेजस्वी वानरों की सेनाओं से घिरे हैं?
श्लोक 40 (skanda.3.2.40)
उपायैरधिगच्छामो यथा नदनदीपतिम् । कथं तरामः सहसा ससैन्या वरुणालयम्
upāyairadhigacchāmo yathā nadanadīpatim kathaṁ tarāmaḥ sahasā sasainyā varuṇālayam
किन उपायों से हम नदी-नदों के स्वामी समुद्र तक पहुँचें? हम अपनी सेना सहित वरुण के आवास को सहसा कैसे पार करें?
श्लोक 41 (skanda.3.2.41)
शतयोजनमायातं मनसापि दुरासदम् । अतो नु विघ्ना बहवः कथं प्राप्या च मैथिली
śatayojanamāyātaṁ manasāpi durāsadam ato nu vighnā bahavaḥ kathaṁ prāpyā ca maithilī
यह सौ योजन तक फैला हुआ है, मन से भी दुर्गम्य है। अतः इसमें अनेक विघ्न हैं — मैथिली को कैसे प्राप्त किया जाए?
श्लोक 42 (skanda.3.2.42)
कष्टात्कष्टतरं प्राप्ता वयमद्य निराश्रयाः । महाजले महावाते समुद्रे हि निराश्रये
kaṣṭātkaṣṭataraṁ prāptā vayamadya nirāśrayāḥ mahājale mahāvāte samudre hi nirāśraye
हम आज कठिनाई से भी बढ़कर कठिनाई में पड़ गए हैं, निराश्रय होकर, इस विशाल जल, प्रबल वायु तथा निराश्रय समुद्र के समक्ष।
श्लोक 43 (skanda.3.2.43)
उपायं कं विधास्यामस्तरणार्थं वनौकसाम् । राज्याद्भ्रष्टो वनं प्राप्तो हृता सीता मृतः पिता
upāyaṁ kaṁ vidhāsyāmastaraṇārthaṁ vanaukasām rājyādbhraṣṭo vanaṁ prāpto hṛtā sītā mṛtaḥ pitā
वनवासियों के पार जाने के लिए हम कौन-सा उपाय करें? मैं राज्य से भ्रष्ट होकर वन को प्राप्त हुआ, सीता का हरण हो गया, पिता का देहांत हो गया —
श्लोक 44 (skanda.3.2.44)
इतोऽपि दुःसहं दुःखं यत्सागरविलंघनम् । धिग्धिग्गर्जितमंभोधे धिगेतां वारिराशिताम्
ito'pi duḥsahaṁ duḥkhaṁ yatsāgaravilaṁghanam dhigdhiggarjitamaṁbhodhe dhigetāṁ vārirāśitām
— और इससे भी बढ़कर, इस समुद्र को पार करना असह्य दुःख है। हे समुद्र, तेरी गर्जना को धिक्कार है! इस जलराशि को धिक्कार है!
श्लोक 45 (skanda.3.2.45)
कथं तद्वचनं मिथ्या महर्षेः कुम्भजन्मनः । हत्वा त्वं रावणं पापं पवित्रे गंधमादने । पापोपशमनायाशु गच्छस्वेति यदीरितम्
kathaṁ tadvacanaṁ mithyā maharṣeḥ kumbhajanmanaḥ hatvā tvaṁ rāvaṇaṁ pāpaṁ pavitre gaṁdhamādane pāpopaśamanāyāśu gacchasveti yadīritam
कुम्भ से उत्पन्न महर्षि अगस्त्य का वह वचन कैसे मिथ्या हो सकता है — जो कहा गया था कि 'पापी रावण का वध कर तू शीघ्र ही पाप-शमन के लिए पवित्र गंधमादन जाना' — यह मिथ्या कैसे हो?"
श्लोक 46 (skanda.3.2.46)
श्रीसूत उवाच । इति रामवचः श्रुत्वा सुग्रीवप्रमुखास्तदा
śrīsūta uvāca iti rāmavacaḥ śrutvā sugrīvapramukhāstadā
श्री सूत जी ने कहा — राम के इन वचनों को सुनकर सुग्रीव आदि प्रमुख वानरों ने तब —
श्लोक 47 (skanda.3.2.47)
ऊचुः प्रांजलयः संर्मे राघवं तं महाबलम् । नौभिरेनं तरिष्यामः प्लवैश्च विविधैरिति
ūcuḥ prāṁjalayaḥ saṁrme rāghavaṁ taṁ mahābalam naubhirenaṁ tariṣyāmaḥ plavaiśca vividhairiti
— हाथ जोड़कर, साथ में, उन महाबली राघव से कहा — "हम इसे नावों और विविध बेड़ों से पार कर लेंगे।"
श्लोक 48 (skanda.3.2.48)
मध्ये वानरकोटीनां तदोवाच विभीषणः । समुद्रं राघवो राजा शरणं गन्तुमर्हति
madhye vānarakoṭīnāṁ tadovāca vibhīṣaṇaḥ samudraṁ rāghavo rājā śaraṇaṁ gantumarhati
तब करोड़ों वानरों के मध्य विभीषण ने कहा — "राजा राघव को समुद्र की शरण में जाना चाहिए।
श्लोक 49 (skanda.3.2.49)
खनितः सागरैरेष समुद्रो वरुणालयः । कर्तुमर्हति रामस्य तज्ज्ञातेः कार्यमंबुधिः
khanitaḥ sāgaraireṣa samudro varuṇālayaḥ kartumarhati rāmasya tajjñāteḥ kāryamaṁbudhiḥ
यह समुद्र, वरुण का आवास, सगर-पुत्रों द्वारा खोदा गया था; अतः समुद्र को राम का, जो उन्हीं के कुल में हैं, कार्य अवश्य करना चाहिए।"
श्लोक 50 (skanda.3.2.50)
विभीषणेनैवमुक्तो राक्षसेन विपश्चिता । सांत्वयन्राघवः सर्वान्वानरानिदमब्रवीत्
vibhīṣaṇenaivamukto rākṣasena vipaścitā sāṁtvayanrāghavaḥ sarvānvānarānidamabravīt
बुद्धिमान राक्षस विभीषण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, राघव ने समस्त वानरों को सांत्वना देते हुए यह कहा —
श्लोक 51 (skanda.3.2.51)
शतयोजन विस्तारमशक्ताः सर्ववानराः । तर्तुं प्लवोडुपैरेनं समुद्रमतिभीषणम्
śatayojana vistāramaśaktāḥ sarvavānarāḥ tartuṁ plavoḍupairenaṁ samudramatibhīṣaṇam
"सभी वानर इस सौ योजन विस्तार वाले अत्यंत भयंकर समुद्र को बेड़ों और नावों से पार करने में असमर्थ हैं।
श्लोक 52 (skanda.3.2.52)
नावो न संति सेनाया बह्व्या वानरपुंगवाः । वणिजामुपघातं च कथमस्मद्विधश्चरेत्
nāvo na saṁti senāyā bahvyā vānarapuṁgavāḥ vaṇijāmupaghātaṁ ca kathamasmadvidhaścaret
हे वानरश्रेष्ठो, इतनी विशाल सेना के लिए नावें नहीं हैं; और हम जैसे लोग व्यापारियों की हानि कैसे कर सकते हैं?
श्लोक 53 (skanda.3.2.53)
विस्तीर्णं चैव नः सैन्यं हन्याच्छिद्रेषु वा परः । प्लवोडुपप्रतारोऽतो नैवात्र मम रोचते
vistīrṇaṁ caiva naḥ sainyaṁ hanyācchidreṣu vā paraḥ plavoḍupapratāro'to naivātra mama rocate
हमारी सेना भी बहुत विस्तृत है, और शत्रु उसके छिद्रों (कमजोर स्थानों) पर आक्रमण कर सकता है; अतः बेड़ों और नावों से पार जाना मुझे यहाँ किंचित् भी पसंद नहीं है।
श्लोक 54 (skanda.3.2.54)
विभीषेणोक्तमे वेदं मोदते मम वानराः । अहं त्विमं जलनिधिमुपास्ये मार्गसिद्धये
vibhīṣeṇoktame vedaṁ modate mama vānarāḥ ahaṁ tvimaṁ jalanidhimupāsye mārgasiddhaye
विभीषण ने जो कहा, वह मेरे वानरों को भी प्रसन्न करता है। मैं ही मार्ग की सिद्धि के लिए इस समुद्र की उपासना करूँगा।
श्लोक 55 (skanda.3.2.55)
नो चेद्दर्शयिता मार्गं धक्ष्याम्येनमहं तदा । महास्त्रैरप्रतिहतैरत्यग्निपवनोज्ज्वलैः
no ceddarśayitā mārgaṁ dhakṣyāmyenamahaṁ tadā mahāstrairapratihatairatyagnipavanojjvalaiḥ
यदि यह मार्ग नहीं दिखाएगा, तो मैं इसे अपने अमोघ महास्त्रों से, जो अग्नि और वायु के समान प्रज्वलित हैं, जला डालूँगा।"
श्लोक 56 (skanda.3.2.56)
इत्युक्त्वा सहसौमित्रिरुपस्पृश्याथ राघवः । प्रतिशिश्ये जलनिधिं विधिवत्कुशसंस्तरे
ityuktvā sahasaumitrirupaspṛśyātha rāghavaḥ pratiśiśye jalanidhiṁ vidhivatkuśasaṁstare
यह कहकर राघव ने सौमित्र सहित आचमन कर विधिपूर्वक कुश के आसन पर समुद्र की ओर मुख करके शयन किया।
श्लोक 57 (skanda.3.2.57)
तदा रामः कुशा स्तीर्णे तीरे नदनदीपतेः । संविवेश महाबाहुर्वेद्यामिव हुताशनः
tadā rāmaḥ kuśā stīrṇe tīre nadanadīpateḥ saṁviveśa mahābāhurvedyāmiva hutāśanaḥ
तब महाबाहु राम कुश-बिछे हुए नदी-नद के स्वामी के तट पर वैसे ही लेटे, जैसे वेदी पर अग्नि स्थापित हो।
श्लोक 58 (skanda.3.2.58)
शेषभोगनिभं बाहुमुपधाय रघूद्वहः । दक्षिणो दक्षिणं बाहुमुपास्ते मकरालयम्
śeṣabhoganibhaṁ bāhumupadhāya raghūdvahaḥ dakṣiṇo dakṣiṇaṁ bāhumupāste makarālayam
रघुकुल के धारक ने शेष के फणों के समान अपनी भुजा को तकिया बनाकर, दक्षिण की ओर मुख करके, मकरालय समुद्र की उपासना की।
श्लोक 59 (skanda.3.2.59)
तस्य रामस्य सुप्तस्य कुशास्तीर्णे महीतले । नियमादप्रमत्तस्य निशास्तिस्रोऽतिचक्रमुः
tasya rāmasya suptasya kuśāstīrṇe mahītale niyamādapramattasya niśāstisro'ticakramuḥ
कुश-बिछी हुई भूमि पर सोए हुए, नियम में तत्पर, सावधान उन राम की तीन रातें व्यतीत हो गईं।
श्लोक 60 (skanda.3.2.60)
स त्रिरात्रोषितस्तत्र नयज्ञो धर्मतत्परः । उपास्तेस्म तदा रामः सागरं मार्गसिद्धये
sa trirātroṣitastatra nayajño dharmatatparaḥ upāstesma tadā rāmaḥ sāgaraṁ mārgasiddhaye
वहाँ तीन रातें बिताकर, नीति के ज्ञाता, धर्मपरायण राम ने तब मार्ग की सिद्धि के लिए समुद्र की उपासना की।
श्लोक 61 (skanda.3.2.61)
न च दर्शयते मन्दस्तदा रामस्य सागरः । प्रयतेनापि रामेण यथार्हमपि पूजितः
na ca darśayate mandastadā rāmasya sāgaraḥ prayatenāpi rāmeṇa yathārhamapi pūjitaḥ
फिर भी वह जड़ समुद्र राम को अपना रूप नहीं दिखाता, यद्यपि संयमी राम द्वारा यथोचित रूप से उसकी पूजा की गई थी।
श्लोक 62 (skanda.3.2.62)
तथापि सागरो रामं न दर्शयति चात्मनः । समुद्राय ततः क्रुद्धो रामो रक्तांतलोचनः
tathāpi sāgaro rāmaṁ na darśayati cātmanaḥ samudrāya tataḥ kruddho rāmo raktāṁtalocanaḥ
फिर भी समुद्र राम को अपना स्वरूप नहीं दिखाता। तब क्रोधित होकर, आँखों के कोने लाल किए हुए राम ने समुद्र के प्रति —
श्लोक 63 (skanda.3.2.63)
समीपवर्तिनं चेदं लक्ष्मणं प्रत्यभाषत । अद्य मद्बाणनिर्भिन्नैर्मकरैर्वरुणालयम्
samīpavartinaṁ cedaṁ lakṣmaṇaṁ pratyabhāṣata adya madbāṇanirbhinnairmakarairvaruṇālayam
— अपने पास खड़े लक्ष्मण से यह कहा — "आज मेरे बाणों से बींधे गए मकरों द्वारा मैं वरुण के इस आवास को —
श्लोक 64 (skanda.3.2.64)
निरुद्धतोयं सौमित्रे करिष्यामि क्षणादहम् । सशंखशुक्ताजालं हि समीनमकरं शनैः
niruddhatoyaṁ saumitre kariṣyāmi kṣaṇādaham saśaṁkhaśuktājālaṁ hi samīnamakaraṁ śanaiḥ
— इसी क्षण जलरहित कर दूँगा, हे सौमित्र। मैं इस मछलियों और मकरों से भरे, शंख-सीपियों के समूह वाले समुद्र को धीरे-धीरे —
श्लोक 65 (skanda.3.2.65)
अद्य बाणैरमोघास्त्रैर्वारिधिं परिशोषये । क्षमया हि समायुक्तं मामयं मकरालयः
adya bāṇairamoghāstrairvāridhiṁ pariśoṣaye kṣamayā hi samāyuktaṁ māmayaṁ makarālayaḥ
— आज अपने अमोघ बाणों से पूर्णतः सुखा दूँगा! क्योंकि मैं क्षमाशील हूँ, इसीलिए यह मकरालय —
श्लोक 66 (skanda.3.2.66)
असमर्थं विजानाति धिक्क्षमामीदृशे जने । न दर्शयति साम्ना मे सागरो रूपमात्मनः
asamarthaṁ vijānāti dhikkṣamāmīdṛśe jane na darśayati sāmnā me sāgaro rūpamātmanaḥ
— मुझे असमर्थ समझ रहा है। ऐसे प्राणी के प्रति क्षमा को धिक्कार है! समुद्र सामनीति से भी मुझे अपना स्वरूप नहीं दिखाता।
श्लोक 67 (skanda.3.2.67)
चापमानय सौमित्रे शरांश्चाशीविषोपमान् । सागरं शोषयिष्यामि पद्भ्यां यांतु प्लवंगमाः
cāpamānaya saumitre śarāṁścāśīviṣopamān sāgaraṁ śoṣayiṣyāmi padbhyāṁ yāṁtu plavaṁgamāḥ
हे सौमित्र, धनुष तथा सर्प के समान बाण ले आओ! मैं समुद्र को सुखा दूँगा, और वानर पैदल ही चले जाएँ।
श्लोक 68 (skanda.3.2.68)
एनं लंघितमर्यादं सहस्रोर्मिसमाकुलम् । निर्मर्यादं करिष्यामि सायकैर्वरुणालयम्
enaṁ laṁghitamaryādaṁ sahasrormisamākulam nirmaryādaṁ kariṣyāmi sāyakairvaruṇālayam
यह अपनी मर्यादा लाँघने वाला, सहस्रों लहरों से भरा हुआ — मैं इस वरुणालय को अपने बाणों से पूर्णतः मर्यादाहीन कर दूँगा।
श्लोक 69 (skanda.3.2.69)
महार्णवं शोषयिष्ये महादानवसंकुलम् । महामकरनक्राढ्यं महावीचिसमाकुलम्
mahārṇavaṁ śoṣayiṣye mahādānavasaṁkulam mahāmakaranakrāḍhyaṁ mahāvīcisamākulam
मैं इस महान् समुद्र को, जो महादानवों से भरा हुआ, बड़े-बड़े मकरों और मगरमच्छों से युक्त, महान् तरंगों से भरा हुआ है, सुखा दूँगा।"
श्लोक 70 (skanda.3.2.70)
एवमुक्त्वा धनुष्पाणिः क्रोधपर्याकुलेक्षणः । रामो बभूव दुर्धर्षस्त्रिपुरघ्नो यथा शिवः
evamuktvā dhanuṣpāṇiḥ krodhaparyākulekṣaṇaḥ rāmo babhūva durdharṣastripuraghno yathā śivaḥ
यह कहकर हाथ में धनुष लिए, क्रोध से चंचल नेत्रों वाले राम, त्रिपुरघ्न शिव के समान दुर्धर्ष हो गए।
श्लोक 71 (skanda.3.2.71)
आकृष्य चापं कोपेन कम्पयित्वा शरैर्जगत् । मुमोच विशिखानुग्रांस्त्रिपुरेषु यथा भवः
ākṛṣya cāpaṁ kopena kampayitvā śarairjagat mumoca viśikhānugrāṁstripureṣu yathā bhavaḥ
क्रोधपूर्वक धनुष खींचकर, अपने बाणों से जगत को कंपाते हुए, उन्होंने भयंकर बाणों को छोड़ा, जैसे त्रिपुरों पर भव शिव ने छोड़े थे।
श्लोक 72 (skanda.3.2.72)
दीप्ता बाणाश्च ये घोरा भासयन्तो दिशो दश । प्राविशन्वारिधेस्तोयं दृप्तदानवसंकुलम्
dīptā bāṇāśca ye ghorā bhāsayanto diśo daśa prāviśanvāridhestoyaṁ dṛptadānavasaṁkulam
और वे प्रज्वलित, भयंकर बाण, दसों दिशाओं को प्रकाशित करते हुए, उन्मत्त दानवों से भरे समुद्र के जल में प्रविष्ट हो गए।
श्लोक 73 (skanda.3.2.73)
समुद्रस्तु ततो भीतो वेपमानः कृतांजलिः । अनन्यशरणो विप्राः पाता लात्स्वयमुत्थितः
samudrastu tato bhīto vepamānaḥ kṛtāṁjaliḥ ananyaśaraṇo viprāḥ pātā lātsvayamutthitaḥ
तब समुद्र भयभीत होकर, काँपता हुआ, हाथ जोड़कर, हे द्विजो, अन्य कोई शरण न पाकर, स्वयं पाताल से उठ खड़ा हुआ,
श्लोक 74 (skanda.3.2.74)
शरणं राघवं भेजे कैवल्यपदकारणम् । तुष्टाव राघवं विप्रा भूत्वा शब्दैर्मनोरमैः
śaraṇaṁ rāghavaṁ bheje kaivalyapadakāraṇam tuṣṭāva rāghavaṁ viprā bhūtvā śabdairmanoramaiḥ
और मोक्षपद के कारणस्वरूप राघव की शरण ग्रहण की; हे द्विजो, तब मूर्तिमान होकर उसने मनोहर शब्दों से राघव की स्तुति की।
श्लोक 75 (skanda.3.2.75)
समुद्र उवाच । नमामि ते राघव पादपंकजं सीतापते सौख्यद पादसेवनात् । नमामि ते गौतमदारमोक्षजं श्रीपादरेणुं सुरवृन्दसेव्यम्
samudra uvāca namāmi te rāghava pādapaṁkajaṁ sītāpate saukhyada pādasevanāt namāmi te gautamadāramokṣajaṁ śrīpādareṇuṁ suravṛndasevyam
समुद्र ने कहा — हे राघव, हे सीतापते, मैं आपके उन चरण-कमलों को नमस्कार करता हूँ, जिनकी सेवा सुख देने वाली है। मैं आपकी उस श्रीचरण-रज को नमस्कार करता हूँ, जिसने गौतम की पत्नी अहल्या को मुक्ति दी, और जो देवताओं के समूह द्वारा सेवित है।
श्लोक 76 (skanda.3.2.76)
सुन्दप्रियादेहविदारिणे नमो नमोस्तु ते कौशिकयागरक्षिणे । नमो महादेवशरासभेदिने नमो नमो राक्षससंघनाशिने
sundapriyādehavidāriṇe namo namostu te kauśikayāgarakṣiṇe namo mahādevaśarāsabhedine namo namo rākṣasasaṁghanāśine
सुंद की प्रिय देह ताटका को विदीर्ण करने वाले, कौशिक विश्वामित्र के यज्ञ के रक्षक, आपको बारंबार नमस्कार है! महादेव के धनुष को भंग करने वाले, राक्षस-समूह के नाशक, आपको बारंबार नमस्कार है!
श्लोक 77 (skanda.3.2.77)
रामराम नमस्यामि भक्तानामिष्टदायिनम् । अवतीर्णो रघुकुले देवकार्यचिकीर्षया
rāmarāma namasyāmi bhaktānāmiṣṭadāyinam avatīrṇo raghukule devakāryacikīrṣayā
हे राम, हे राम, भक्तों को अभीष्ट देने वाले, देवताओं के कार्य को सिद्ध करने की इच्छा से रघुकुल में अवतरित हुए आपको मैं नमस्कार करता हूँ।
श्लोक 78 (skanda.3.2.78)
नारायणमनाद्यंतं मोक्षदं शिवमच्युतम् । रामराम महाबाहो रक्ष मां शरणागतम्
nārāyaṇamanādyaṁtaṁ mokṣadaṁ śivamacyutam rāmarāma mahābāho rakṣa māṁ śaraṇāgatam
हे नारायण, आदि-अंत रहित, मोक्षदाता, शिव, अच्युत — हे राम, हे राम, हे महाबाहो, शरणागत मेरी रक्षा कीजिए।
श्लोक 79 (skanda.3.2.79)
कोपं संहर राजेंद्र क्षमस्व करुणालय । भूमिर्वातो वियच्चापो ज्योतींषि च रघूद्वह
kopaṁ saṁhara rājeṁdra kṣamasva karuṇālaya bhūmirvāto viyaccāpo jyotīṁṣi ca raghūdvaha
हे राजेन्द्र, अपने कोप को संहरण कीजिए; हे करुणालय, क्षमा कीजिए। हे रघूद्वह, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल तथा ज्योतियाँ —
श्लोक 80 (skanda.3.2.80)
यत्स्वभावानि सृष्टानि ब्रह्मणा परमेष्ठिना । वर्तंते तत्स्वभा वानि स्वभावो मे ह्यगाधता
yatsvabhāvāni sṛṣṭāni brahmaṇā parameṣṭhinā vartaṁte tatsvabhā vāni svabhāvo me hyagādhatā
— जिन-जिन स्वभावों में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने उन्हें रचा है, वे उन्हीं स्वभावों में स्थित रहते हैं; मेरा स्वभाव भी अगाधता ही है।
श्लोक 81 (skanda.3.2.81)
विकारस्तु भवेद्गाध एतत्सत्यं वदाम्यहम् । लोभात्कामाद्भयाद्वापि रागाद्वापि रघूद्वह
vikārastu bhavedgādha etatsatyaṁ vadāmyaham lobhātkāmādbhayādvāpi rāgādvāpi raghūdvaha
यदि यह उथला हो जाए, तो वह मेरे स्वभाव के विरुद्ध विकार होगा — यह मैं सत्य कहता हूँ। हे रघूद्वह, चाहे लोभ से, कामना से, भय से अथवा आसक्ति से,
श्लोक 82 (skanda.3.2.82)
न वंशजं गुणं हातुमुत्सहेयं कथंचन । तत्करिष्ये च साहाय्यं सेनायास्तरणे तव
na vaṁśajaṁ guṇaṁ hātumutsaheyaṁ kathaṁcana tatkariṣye ca sāhāyyaṁ senāyāstaraṇe tava
मैं अपने कुल-सहज गुण को किसी भी प्रकार त्यागने का साहस नहीं कर सकता। फिर भी मैं आपकी सेना के पार जाने में सहायता करूँगा।
श्लोक 83 (skanda.3.2.83)
इत्युक्तवन्तं जलधिं रामोऽवादीन्नदीपतिम् । ससैन्योऽहं गमि ष्यामि लंकां रावणपालिताम्
ityuktavantaṁ jaladhiṁ rāmo'vādīnnadīpatim sasainyo'haṁ gami ṣyāmi laṁkāṁ rāvaṇapālitām
इस प्रकार कहने वाले समुद्र से राम ने, उस नदीपति से, कहा — "मैं अपनी सेना सहित रावण द्वारा शासित लंका जाऊँगा।
श्लोक 84 (skanda.3.2.84)
तच्छोषमुपयाहि त्वं तरणार्थं ममाधुना । इत्युक्तस्तं पुनः प्राह राघवं वरुणालयः
tacchoṣamupayāhi tvaṁ taraṇārthaṁ mamādhunā ityuktastaṁ punaḥ prāha rāghavaṁ varuṇālayaḥ
मेरे पार जाने के लिए अब तुम सूख जाने को स्वीकार करो।" ऐसा कहे जाने पर वरुणालय ने पुनः राघव से कहा —
श्लोक 85 (skanda.3.2.85)
शृणुष्वाव हितो राम श्रुत्वा कर्तव्यमाचर । यद्याज्ञया ते शुष्यामि ससैन्यस्य यियासतः
śṛṇuṣvāva hito rāma śrutvā kartavyamācara yadyājñayā te śuṣyāmi sasainyasya yiyāsataḥ
"हे राम, ध्यानपूर्वक सुनिए, और सुनकर जो कर्तव्य हो वह कीजिए। यदि आपकी आज्ञा से, प्रस्थान को उद्यत आपकी सेना के लिए मैं सूख जाऊँ —
श्लोक 86 (skanda.3.2.86)
अन्येऽप्याज्ञापयिष्यंति मामेवं धनुषो बलात् । उपायमन्यं वक्ष्यामि तरणार्थं बलस्य ते
anye'pyājñāpayiṣyaṁti māmevaṁ dhanuṣo balāt upāyamanyaṁ vakṣyāmi taraṇārthaṁ balasya te
— तो अन्य लोग भी धनुष के बल से मुझे इसी प्रकार आज्ञा देने लगेंगे। मैं आपकी सेना के पार जाने के लिए एक अन्य उपाय बताता हूँ।
श्लोक 87 (skanda.3.2.87)
अस्ति ह्यत्र नलोनाम वानरः शिल्पिसंमतः । त्वष्टुः काकुत्स्थ तनयो बलवान्विश्वकर्मणः
asti hyatra nalonāma vānaraḥ śilpisaṁmataḥ tvaṣṭuḥ kākutstha tanayo balavānviśvakarmaṇaḥ
हे काकुत्स्थ, यहाँ नल नामक एक वानर है, जो शिल्पियों में सम्मानित तथा त्वष्टा विश्वकर्मा का बलवान पुत्र है।
श्लोक 88 (skanda.3.2.88)
स यत्काष्ठं तृणं वापि शिलां वा क्षेप्स्यते मयि । सर्वं तद्धारयिष्यामि स ते सेतुर्भविष्यति
sa yatkāṣṭhaṁ tṛṇaṁ vāpi śilāṁ vā kṣepsyate mayi sarvaṁ taddhārayiṣyāmi sa te seturbhaviṣyati
वह जो भी काष्ठ, तृण अथवा शिला मुझमें फेंकेगा, उस सबको मैं धारण करूँगा; वही आपका सेतु बन जाएगा।
श्लोक 89 (skanda.3.2.89)
सेतुना तेन गच्छ त्वं लंकां रावणपालि ताम् । उक्त्वेत्यंतर्हिते तस्मिन्रामो नलमुवाच ह
setunā tena gaccha tvaṁ laṁkāṁ rāvaṇapāli tām uktvetyaṁtarhite tasminrāmo nalamuvāca ha
उस सेतु से आप रावण द्वारा शासित लंका को जाइए।" ऐसा कहकर जब वह समुद्र अंतर्धान हो गया, तब राम ने नल से कहा —
श्लोक 90 (skanda.3.2.90)
कुरु सेतुं समुद्रे त्वं शक्तो ह्यसि महामते । तदाऽब्रवीन्नलो वाक्यं रामं धर्मभृतां वरम्
kuru setuṁ samudre tvaṁ śakto hyasi mahāmate tadā'bravīnnalo vākyaṁ rāmaṁ dharmabhṛtāṁ varam
— "तुम समुद्र पर सेतु बनाओ; हे महामते, तुम इसमें समर्थ हो।" तब नल ने धर्मपरायणों में श्रेष्ठ राम से यह वचन कहा —
श्लोक 91 (skanda.3.2.91)
अहं सेतुं विधास्यामि ह्यगाधे वरुणालये । पित्रा दत्तवरश्चाहं सामर्थ्ये चापि तत्समः
ahaṁ setuṁ vidhāsyāmi hyagādhe varuṇālaye pitrā dattavaraścāhaṁ sāmarthye cāpi tatsamaḥ
"मैं इस अगाध वरुणालय पर सेतु बनाऊँगा। मुझे मेरे पिता से वरदान प्राप्त है, और सामर्थ्य में भी मैं उनके समान हूँ।
श्लोक 92 (skanda.3.2.92)
मातुर्मम वरो दत्तो मन्दरे विश्वक र्मणा । शिल्पकर्मणि मत्तुल्यो भविता ते सुतस्त्विति
māturmama varo datto mandare viśvaka rmaṇā śilpakarmaṇi mattulyo bhavitā te sutastviti
मेरी माता को मंदराचल पर विश्वकर्मा ने वरदान दिया था — 'तुम्हारा पुत्र मेरे समान होगा।'
श्लोक 93 (skanda.3.2.93)
पुत्रोऽहमौरसस्तस्य तुल्यो वै विश्वकर्मणा । अद्यैव कामं बध्नंतु सेतुं वानरपुं गवाः
putro'hamaurasastasya tulyo vai viśvakarmaṇā adyaiva kāmaṁ badhnaṁtu setuṁ vānarapuṁ gavāḥ
मैं उन्हीं का औरस पुत्र हूँ, विश्वकर्मा के समान ही। आज ही श्रेष्ठ वानर इच्छानुसार सेतु का निर्माण करें।"
श्लोक 94 (skanda.3.2.94)
ततो रामनिसृष्टास्ते वानरा बलवत्तराः । पर्वतान्गिरिशृंगाणि लतातृणमहीरुहान्
tato rāmanisṛṣṭāste vānarā balavattarāḥ parvatāngiriśṛṁgāṇi latātṛṇamahīruhān
तब राम द्वारा भेजे गए वे अत्यंत बलवान वानर पर्वतों, पर्वत-शिखरों, लताओं, तृणों तथा वृक्षों को —
श्लोक 95 (skanda.3.2.95)
समाजह्रुर्महाकाया गरुडानिलरंहसः । नलश्चक्रे महासेर्तुमध्ये नदनदीपतेः
samājahrurmahākāyā garuḍānilaraṁhasaḥ nalaścakre mahāsertumadhye nadanadīpateḥ
— अपने विशाल शरीरों से, गरुड़ अथवा वायु के समान वेग से, एकत्र किया; और नल ने नदी-नदों के स्वामी के मध्य उस महान सेतु का निर्माण किया।
श्लोक 96 (skanda.3.2.96)
दशयोजनविस्तीर्णं शतयोजनमायतम् । जानकीरमणो रामः सेतुमेवमकारयत्
daśayojanavistīrṇaṁ śatayojanamāyatam jānakīramaṇo rāmaḥ setumevamakārayat
दस योजन चौड़ा और सौ योजन लंबा — इस प्रकार जानकी के प्रियतम राम ने सेतु का निर्माण करवाया।
श्लोक 97 (skanda.3.2.97)
नलेन वानरेन्द्रेण विश्वकर्मसुतेन वै । तमेवं सेतुमासाद्य रामचन्द्रेण कारितम्
nalena vānarendreṇa viśvakarmasutena vai tamevaṁ setumāsādya rāmacandreṇa kāritam
वानरेन्द्र नल द्वारा, जो सचमुच विश्वकर्मा के पुत्र थे, तथा रामचन्द्र की प्रेरणा से इस प्रकार निर्मित उस सेतु को प्राप्त कर —
श्लोक 98 (skanda.3.2.98)
सर्वे पातकिनो मर्त्या मुच्यन्ते सर्वपातकैः । व्रतदान तपोहोमैर्न तथा तुष्यते शिवः
sarve pātakino martyā mucyante sarvapātakaiḥ vratadāna tapohomairna tathā tuṣyate śivaḥ
— समस्त पापी मनुष्य अपने सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं। व्रत, दान, तप तथा होम से शिव उतने प्रसन्न नहीं होते —
श्लोक 99 (skanda.3.2.99)
सेतुमज्जनमात्रेण यथा तुष्यति शंकरः । न तुल्यं विद्यते तेजोयथा सौरेण तेजसा
setumajjanamātreṇa yathā tuṣyati śaṁkaraḥ na tulyaṁ vidyate tejoyathā saureṇa tejasā
— जितना केवल सेतु में स्नान करने मात्र से शंकर प्रसन्न होते हैं। जैसे सूर्य के तेज के समान कोई तेज नहीं है, वैसे ही —
श्लोक 100 (skanda.3.2.100)
सेतुस्नानेन च तथा न तुल्यं विद्यते क्वचित् । तत्सेतुमूलं लंकायां यत्ररामो यियासया
setusnānena ca tathā na tulyaṁ vidyate kvacit tatsetumūlaṁ laṁkāyāṁ yatrarāmo yiyāsayā
— बिल्कुल वैसे ही सेतु-स्नान के समान कहीं कुछ नहीं है। लंका में वही सेतु का मूल स्थान है, जहाँ जाने की इच्छा से राम ने —
श्लोक 101 (skanda.3.2.101)
वानरैः सेतुमारेभे पुण्यं पाप प्रणाशनम् । तद्दर्भशयनं नाम्ना पश्चाल्लोकेषु विश्रुतम्
vānaraiḥ setumārebhe puṇyaṁ pāpa praṇāśanam taddarbhaśayanaṁ nāmnā paścāllokeṣu viśrutam
— वानरों के साथ इस पुण्यमय, पाप-नाशक सेतु का निर्माण आरंभ किया। वही स्थान बाद में दर्भशयन (कुश-शय्या) नाम से लोक में प्रसिद्ध हुआ।
श्लोक 102 (skanda.3.2.102)
एवमुक्तं मया विप्राः समुद्रे सेतुबंधनम् । अत्र तीर्थान्यनेकानि संति पुण्यान्यनेकशः
evamuktaṁ mayā viprāḥ samudre setubaṁdhanam atra tīrthānyanekāni saṁti puṇyānyanekaśaḥ
हे द्विजो, इस प्रकार मैंने समुद्र पर सेतु-बंधन का वर्णन किया। यहाँ अनेक पवित्र और पुण्यमय तीर्थ हैं।
श्लोक 103 (skanda.3.2.103)
न संख्यां नामधेयं वा शेषो गणयितुं क्षमः । किं त्वहं प्रब्रवीम्यद्य तत्र तीर्थानि कानिचित्
na saṁkhyāṁ nāmadheyaṁ vā śeṣo gaṇayituṁ kṣamaḥ kiṁ tvahaṁ prabravīmyadya tatra tīrthāni kānicit
उनकी संख्या अथवा नाम को शेषनाग भी गिनने में समर्थ नहीं हैं; किंतु मैं अब वहाँ के कुछ तीर्थों को बताता हूँ।
श्लोक 104 (skanda.3.2.104)
चतुर्विंशति तीर्थानि संति सेतौ प्रधानतः । प्रथमं चकतीर्थं स्याद्वेतालवरदं ततः
caturviṁśati tīrthāni saṁti setau pradhānataḥ prathamaṁ cakatīrthaṁ syādvetālavaradaṁ tataḥ
सेतु में मुख्यतः चौबीस तीर्थ हैं। पहला चक्रतीर्थ है, फिर वेतालवरद है।
श्लोक 105 (skanda.3.2.105)
ततः पापविनाशार्थं तीर्थं लोकेषु विश्रुतम् । ततः सीतासरः पुण्यं ततो मंगलतीर्थकम्
tataḥ pāpavināśārthaṁ tīrthaṁ lokeṣu viśrutam tataḥ sītāsaraḥ puṇyaṁ tato maṁgalatīrthakam
फिर पाप-नाश के लिए लोक में विख्यात तीर्थ; फिर पवित्र सीतासरः; फिर मंगलतीर्थक।
श्लोक 106 (skanda.3.2.106)
ततः सकलपापघ्नी नाम्ना चामृतवापिका । ब्रह्मकुण्डं ततस्तीर्थं ततः कुंडं हनूमतः
tataḥ sakalapāpaghnī nāmnā cāmṛtavāpikā brahmakuṇḍaṁ tatastīrthaṁ tataḥ kuṁḍaṁ hanūmataḥ
फिर सकल-पापनाशिनी नामक अमृतवापिका; फिर ब्रह्मकुण्ड तीर्थ; फिर हनुमान का कुण्ड।
श्लोक 107 (skanda.3.2.107)
आगस्त्यं हि ततस्तीर्थं रामतीर्थ मतः परम् । ततो लक्ष्मणतीर्थं स्याज्जटातीर्थमतः परम्
āgastyaṁ hi tatastīrthaṁ rāmatīrtha mataḥ param tato lakṣmaṇatīrthaṁ syājjaṭātīrthamataḥ param
फिर अगस्त्य तीर्थ; उसके बाद रामतीर्थ; फिर लक्ष्मणतीर्थ; और उसके बाद जटातीर्थ।
श्लोक 108 (skanda.3.2.108)
ततो लक्ष्म्याः परं तीर्थमग्नितीर्थमतः परम् । चक्रतीर्थं ततः पुण्यं शिवतीर्थमतः परम्
tato lakṣmyāḥ paraṁ tīrthamagnitīrthamataḥ param cakratīrthaṁ tataḥ puṇyaṁ śivatīrthamataḥ param
फिर लक्ष्मी का श्रेष्ठ तीर्थ; उसके बाद अग्नितीर्थ; फिर पुण्यमय चक्रतीर्थ; उसके बाद शिवतीर्थ।
श्लोक 109 (skanda.3.2.109)
ततः शंखाभिधं तीर्थं ततो यामुनतीर्थकम् । गंगातीर्थं ततः पश्चाद्गयातीर्थमनन्तरम्
tataḥ śaṁkhābhidhaṁ tīrthaṁ tato yāmunatīrthakam gaṁgātīrthaṁ tataḥ paścādgayātīrthamanantaram
फिर शंख नामक तीर्थ; फिर यामुनतीर्थक; फिर गंगातीर्थ; और तत्पश्चात् गयातीर्थ।
श्लोक 110 (skanda.3.2.110)
ततः स्यात्कोटितीर्थाख्यं साध्यानाममृतं ततः । मानसाख्यं ततस्तीर्थं धनुष्कोटिस्ततः परम्
tataḥ syātkoṭitīrthākhyaṁ sādhyānāmamṛtaṁ tataḥ mānasākhyaṁ tatastīrthaṁ dhanuṣkoṭistataḥ param
फिर कोटितीर्थ नामक तीर्थ; फिर साध्यों का अमृत-तीर्थ; फिर मानस नामक तीर्थ; और उसके बाद धनुष्कोटि।
श्लोक 111 (skanda.3.2.111)
प्रधानतीर्थान्येतानि महापापहराणि च । कथितानि द्विजश्रेष्ठास्सेतुमध्यगतानि वै
pradhānatīrthānyetāni mahāpāpaharāṇi ca kathitāni dvijaśreṣṭhāssetumadhyagatāni vai
ये सभी प्रमुख तीर्थ, हे द्विजश्रेष्ठो, महापापों के हरने वाले हैं, जो सेतु के मध्य स्थित हैं — ऐसा मैंने बताया।
श्लोक 112 (skanda.3.2.112)
यथा सेतुश्च बद्धोऽभूद्रामेण जलधौ महान् । कथितं तच्च विप्रेन्द्राः पुण्यं पापहारं तथा
yathā setuśca baddho'bhūdrāmeṇa jaladhau mahān kathitaṁ tacca viprendrāḥ puṇyaṁ pāpahāraṁ tathā
जिस प्रकार राम द्वारा समुद्र पर वह महान सेतु बाँधा गया — हे विप्रेन्द्रो, वह भी, पुण्यकारी और पापहारी, मैंने बता दिया।
श्लोक 113 (skanda.3.2.113)
यच्छ्रुत्वा च पठित्वा च मुच्यते मानवो भुवि
yacchrutvā ca paṭhitvā ca mucyate mānavo bhuvi
जिसे सुनकर तथा पढ़कर मनुष्य इस पृथ्वी पर मुक्त हो जाता है।
श्लोक 114 (skanda.3.2.114)
अध्यायमेनं पठते मनुष्यः शृणोति वा भक्तियुतो द्विजेंद्राः । सो नंतमाप्नोति जयं परत्र पुनर्भवक्लेशमसौ न गच्छेत्
adhyāyamenaṁ paṭhate manuṣyaḥ śṛṇoti vā bhaktiyuto dvijeṁdrāḥ so naṁtamāpnoti jayaṁ paratra punarbhavakleśamasau na gacchet
हे द्विजेंद्रो, जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस अध्याय को पढ़ता अथवा सुनता है, वह परलोक में अनंत विजय प्राप्त करता है और पुनः जन्म के क्लेश को प्राप्त नहीं होता।