ब्रह्म खण्ड · अध्याय 114
पुराण-श्रवण का माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.3.114.1)
॥ सूत उवाच ॥ एवं शिवतमः पंथाः शिवेनैव प्रदर्शितः ॥ नृणां संसृतिबद्धानां सद्योमुक्तिकरः परः
sūta uvāca evaṁ śivatamaḥ paṁthāḥ śivenaiva pradarśitaḥ nṛṇāṁ saṁsṛtibaddhānāṁ sadyomuktikaraḥ paraḥ
सूत जी ने कहा — इस प्रकार शिव द्वारा ही दिखाया गया यह अत्यन्त शिवमय पथ, संसार-बद्ध मनुष्यों को तत्काल मुक्ति देनेवाला परम मार्ग है।
श्लोक 2 (skanda.3.114.2)
अथ दुर्मेधसां पुंसां वेदेष्वनधिकारिणाम् ॥ स्त्रीणां द्विजातिबंधूनां सर्वेषां च शरीरिणाम्
atha durmedhasāṁ puṁsāṁ vedeṣvanadhikāriṇām strīṇāṁ dvijātibaṁdhūnāṁ sarveṣāṁ ca śarīriṇām
अब दुर्बुद्धि मनुष्यों के लिए, वेदों में अनधिकारियों के लिए, स्त्रियों के लिए, द्विजबन्धुओं के लिए, तथा समस्त देहधारियों के लिए,
श्लोक 3 (skanda.3.114.3)
एष साधारणः पंथाः साक्षात्कैवल्यसाधनः ॥ महामुनिजनैः सेव्यो देवैरपि सुपूजितः
eṣa sādhāraṇaḥ paṁthāḥ sākṣātkaivalyasādhanaḥ mahāmunijanaiḥ sevyo devairapi supūjitaḥ
यह सामान्य मार्ग है, साक्षात् कैवल्य का साधन, महामुनियों द्वारा सेवित, देवताओं द्वारा भी भलीभाँति पूजित —
श्लोक 4 (skanda.3.114.4)
यत्कथाश्रवणं शंभोः संसारभयनाशनम् ॥ सद्योमुक्तिकरं श्लाघ्यं पवित्रं सर्वदेहिनाम्
yatkathāśravaṇaṁ śaṁbhoḥ saṁsārabhayanāśanam sadyomuktikaraṁ ślāghyaṁ pavitraṁ sarvadehinām
अर्थात् शम्भु की कथा का श्रवण, जो संसार-भय का नाशक, तत्काल मुक्ति देनेवाला, प्रशंसनीय और समस्त देहधारियों के लिए पवित्र है।
श्लोक 5 (skanda.3.114.5)
अज्ञानतिमिरांधानां दीपोऽयं ज्ञानसिद्धिदः ॥ भवरोगनिबद्धानां सुसेव्यं परमौषधम्
ajñānatimirāṁdhānāṁ dīpo'yaṁ jñānasiddhidaḥ bhavaroganibaddhānāṁ susevyaṁ paramauṣadham
अज्ञान के अन्धकार से अन्धे हुए लोगों के लिए यह ज्ञान-सिद्धि देनेवाला दीपक है; संसार-रोग से बद्ध लोगों के लिए सुसेव्य परम औषधि है।
श्लोक 6 (skanda.3.114.6)
महापातकशैलानां वज्रघातसुदारुणम् ॥ भर्जनं कर्मबीजानां साधनं सर्व संपदाम्
mahāpātakaśailānāṁ vajraghātasudāruṇam bharjanaṁ karmabījānāṁ sādhanaṁ sarva saṁpadām
महापातक-पर्वतों के लिए यह वज्रपात के समान अत्यन्त भयंकर है; कर्म-बीजों का भूनना, समस्त सम्पदाओं का साधन है।
श्लोक 7 (skanda.3.114.7)
ये शृण्वंति सदा शम्भोः कथां भुवनपावनीम् ॥ ते वै मनुष्या लोकेस्मिन्रुद्रा एव न संशयः
ye śṛṇvaṁti sadā śambhoḥ kathāṁ bhuvanapāvanīm te vai manuṣyā lokesminrudrā eva na saṁśayaḥ
जो सदा शम्भु की जगत्-पावन कथा सुनते हैं, वे मनुष्य इस लोक में साक्षात् रुद्र ही हैं, इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 8 (skanda.3.114.8)
शृण्वतां शूलिनो गाथां तथा कीर्तयतां सताम् ॥ तेषां पादरजांस्येव तीर्थानि मुनयो जगुः
śṛṇvatāṁ śūlino gāthāṁ tathā kīrtayatāṁ satām teṣāṁ pādarajāṁsyeva tīrthāni munayo jaguḥ
शूलधारी की गाथा सुननेवालों तथा सत्पुरुषों में कीर्तन करनेवालों — उनके चरणों की धूल को ही मुनियों ने तीर्थ कहा है।
श्लोक 9 (skanda.3.114.9)
तस्मान्निश्रेयसं गन्तुं येभिवांछंति देहिनः ॥ ते शृण्वंतु सदा भक्त्या शैवीं पौराणिकीं कथाम्
tasmānniśreyasaṁ gantuṁ yebhivāṁchaṁti dehinaḥ te śṛṇvaṁtu sadā bhaktyā śaivīṁ paurāṇikīṁ kathām
इसलिए जो देहधारी परम कल्याण को प्राप्त करना चाहते हैं, वे सदा भक्तिपूर्वक शैव पौराणिक कथा सुनें।
श्लोक 10 (skanda.3.114.10)
यद्यशक्तः सदा श्रोतुं कथां पौराणिकीं नरः ॥ मुहूर्तं वापि शृणुयान्नियतात्मा दिनेदिने
yadyaśaktaḥ sadā śrotuṁ kathāṁ paurāṇikīṁ naraḥ muhūrtaṁ vāpi śṛṇuyānniyatātmā dinedine
यदि मनुष्य सदा पौराणिक कथा सुनने में असमर्थ हो, तो नियमित आत्मावाला होकर प्रतिदिन कम से कम मुहूर्तभर ही सुने।
श्लोक 11 (skanda.3.114.11)
अथ प्रतिदिनं श्रोतुमशक्तो यदि मानवः ॥ पुण्यमासेषु वा पुण्ये दिने पुण्यतिथिष्वपि
atha pratidinaṁ śrotumaśakto yadi mānavaḥ puṇyamāseṣu vā puṇye dine puṇyatithiṣvapi
यदि मनुष्य प्रतिदिन सुनने में भी असमर्थ हो, तो पुण्य महीनों में, अथवा पुण्य दिन में, पुण्य तिथियों में भी सुने।
श्लोक 12 (skanda.3.114.12)
यः शृणोति कथां रम्यां पुराणैः समुदीरिताम् ॥ स निस्तरति संसारं दग्ध्वा कर्ममहाटवीम्
yaḥ śṛṇoti kathāṁ ramyāṁ purāṇaiḥ samudīritām sa nistarati saṁsāraṁ dagdhvā karmamahāṭavīm
जो पुराणों द्वारा कही गई रमणीय कथा सुनता है, वह कर्म की महाअटवी को जलाकर संसार को पार कर जाता है।
श्लोक 13 (skanda.3.114.13)
मुहूर्त्तं वा तदर्द्धं वा क्षणं वा पावनीं कथाम् ॥ ये शृण्वंति सदा भक्त्या न तेषामस्ति दुर्गतिः
muhūrttaṁ vā tadarddhaṁ vā kṣaṇaṁ vā pāvanīṁ kathām ye śṛṇvaṁti sadā bhaktyā na teṣāmasti durgatiḥ
जो मुहूर्तभर, अथवा उसके आधे, अथवा क्षणभर भी उस पवित्र कथा को सदा भक्तिपूर्वक सुनते हैं, उनकी कोई दुर्गति नहीं होती।
श्लोक 14 (skanda.3.114.14)
यत्फलं सर्वयज्ञेषु सर्वदानेषु यत्फलम् ॥ सकृत्पुराणश्रवणात्तत्फलं विंदते नरः
yatphalaṁ sarvayajñeṣu sarvadāneṣu yatphalam sakṛtpurāṇaśravaṇāttatphalaṁ viṁdate naraḥ
समस्त यज्ञों में जो फल है, समस्त दानों में जो फल है, मनुष्य एक बार पुराण-श्रवण से वही फल प्राप्त करता है।
श्लोक 15 (skanda.3.114.15)
कलौ युगे विशेषेण पुराणश्रवणादृते ॥ नास्ति धर्मः परः पुंसां नास्ति मुक्तिपथः परः
kalau yuge viśeṣeṇa purāṇaśravaṇādṛte nāsti dharmaḥ paraḥ puṁsāṁ nāsti muktipathaḥ paraḥ
कलियुग में विशेष रूप से, पुराण-श्रवण के अतिरिक्त, मनुष्यों के लिए न कोई परम धर्म है, न कोई परम मुक्ति-मार्ग है।
श्लोक 16 (skanda.3.114.16)
पुराणश्रवणाच्छंभोर्नास्ति संकीर्तनं परम् ॥ अत एव मनुष्याणां कल्पद्रुममहाफलम्
purāṇaśravaṇācchaṁbhornāsti saṁkīrtanaṁ param ata eva manuṣyāṇāṁ kalpadrumamahāphalam
पुराण-श्रवण से बढ़कर शम्भु का कोई कीर्तन नहीं है; इसीलिए यह मनुष्यों के लिए कल्पवृक्ष का महाफल है।
श्लोक 17 (skanda.3.114.17)
कलौ हीनायुषो मर्त्या दुर्बलाः श्रमपीडिताः ॥ दुर्मेधसो दुःखभाजो धर्माचारविवर्जिताः
kalau hīnāyuṣo martyā durbalāḥ śramapīḍitāḥ durmedhaso duḥkhabhājo dharmācāravivarjitāḥ
कलियुग में अल्पायु, दुर्बल, श्रम से पीड़ित, दुर्बुद्धि, दुःखभागी, धर्माचार से रहित मनुष्य होते हैं —
श्लोक 18 (skanda.3.114.18)
इति संचिंत्य कृपया भगवान्बादरायणः ॥ हिताय तेषां विदधे पुराणाख्यं सुधारसम्
iti saṁciṁtya kṛpayā bhagavānbādarāyaṇaḥ hitāya teṣāṁ vidadhe purāṇākhyaṁ sudhārasam
ऐसा करुणापूर्वक विचार करके, भगवान बादरायण ने उनके हित के लिए पुराण नामक इस सुधारस को रचा।
श्लोक 19 (skanda.3.114.19)
पिबन्नेवामृतं यत्नादेतत्स्यादजरामरः ॥ शम्भोः कथामृतं कुर्यात्कुलमेवाजरामरम्
pibannevāmṛtaṁ yatnādetatsyādajarāmaraḥ śambhoḥ kathāmṛtaṁ kuryātkulamevājarāmaram
जैसे प्रयत्नपूर्वक अमृत पीकर मनुष्य अजरामर बन जाता है, वैसे ही शम्भु का यह कथामृत सम्पूर्ण कुल को अजरामर बना देता है।
श्लोक 20 (skanda.3.114.20)
बालो युवा दरिद्रो वा वृद्धो वा दुर्बलोऽपि वा ॥ पुराणज्ञः सदा वन्द्यः पूज्यश्च सुकृतार्थिभिः
bālo yuvā daridro vā vṛddho vā durbalo'pi vā purāṇajñaḥ sadā vandyaḥ pūjyaśca sukṛtārthibhiḥ
बालक हो, युवा हो, दरिद्र हो, वृद्ध हो, या दुर्बल भी हो — पुराणज्ञ पुण्यार्थियों द्वारा सदा वन्दनीय और पूज्य होता है।
श्लोक 21 (skanda.3.114.21)
नीचबुद्धिं न कुर्वीत पुराणज्ञे कदाचन ॥ यस्य वक्त्रांबुजाद्वाणी कामधेनुः शरीरिणाम्
nīcabuddhiṁ na kurvīta purāṇajñe kadācana yasya vaktrāṁbujādvāṇī kāmadhenuḥ śarīriṇām
पुराणज्ञ के प्रति कभी नीच बुद्धि नहीं रखनी चाहिए, जिसके मुखकमल से निकली वाणी देहधारियों के लिए कामधेनु के समान है।
श्लोक 22 (skanda.3.114.22)
गुरवः संति लोकेषु जन्मतो गुणतस्तथा ॥ तेषामपि च सर्वेषां पुराणज्ञः परो गुरुः
guravaḥ saṁti lokeṣu janmato guṇatastathā teṣāmapi ca sarveṣāṁ purāṇajñaḥ paro guruḥ
लोकों में जन्म से और गुण से भी गुरु होते हैं; किन्तु उन सभी में भी पुराणज्ञ ही परम गुरु है।
श्लोक 23 (skanda.3.114.23)
भवकोटिसहस्रेषु भूत्वाभूत्वावसीदति ॥ यो ददात्यपुनर्वृत्तिं कोऽन्यस्तस्मात्परो गुरुः
bhavakoṭisahasreṣu bhūtvābhūtvāvasīdati yo dadātyapunarvṛttiṁ ko'nyastasmātparo guruḥ
जो करोड़ों जन्मों में बार-बार जन्म लेकर डूबते हुए को, पुनर्जन्म से रहित कर देता है, उससे बढ़कर और कौन गुरु है?
श्लोक 24 (skanda.3.114.24)
पुराणज्ञः शुचिर्दांतः शांतो विजितमत्सरः ॥ साधुः कारुण्यवान्वाग्मी वदेत्पुण्यकथां सुधी
purāṇajñaḥ śucirdāṁtaḥ śāṁto vijitamatsaraḥ sādhuḥ kāruṇyavānvāgmī vadetpuṇyakathāṁ sudhī
पुराणज्ञ पवित्र, संयमी, शान्त, ईर्ष्यारहित, साधु, करुणावान, वाग्मी, बुद्धिमान होकर पुण्यकथा कहे।
श्लोक 25 (skanda.3.114.25)
व्यासासनं समारूढो यदा पौराणिको द्विजः ॥ असमाप्तप्रसंगश्च नमस्कुर्यान्न कस्य चित्
vyāsāsanaṁ samārūḍho yadā paurāṇiko dvijaḥ asamāptaprasaṁgaśca namaskuryānna kasya cit
जब पौराणिक ब्राह्मण व्यास-आसन पर आरूढ़ हो, और जब तक उसका प्रसंग समाप्त न हो, वह किसी को भी नमस्कार न करे।
श्लोक 26 (skanda.3.114.26)
ये धूर्ता ये च दुर्वृत्ता ये चान्ये विजिगीषवः ॥ तेषां कुटिलवृत्तीनामग्रे नैव वदेत्कथाम्
ye dhūrtā ye ca durvṛttā ye cānye vijigīṣavaḥ teṣāṁ kuṭilavṛttīnāmagre naiva vadetkathām
जो धूर्त हैं, जो दुराचारी हैं, तथा अन्य जो विजय की इच्छावाले हैं, उन कुटिल आचरणवालों के समक्ष कथा न कहे।
श्लोक 27 (skanda.3.114.27)
न दुर्जनसमाकीर्णे न शूद्रश्वापदावृते ॥ देशे न द्यूतसदने वदेत्पुण्यकथां सुधीः
na durjanasamākīrṇe na śūdraśvāpadāvṛte deśe na dyūtasadane vadetpuṇyakathāṁ sudhīḥ
दुर्जनों से भरे स्थान में नहीं, शूद्रों और हिंसक पशुओं से घिरे देश में नहीं, न जुआघर में, बुद्धिमान पुण्यकथा कहे।
श्लोक 28 (skanda.3.114.28)
सद्ग्रामे सुजनाकीर्णे सुक्षेत्रे देवतालये ॥ पुण्ये नदनदीतीरे वदेत्पुण्यकथां सुधीः
sadgrāme sujanākīrṇe sukṣetre devatālaye puṇye nadanadītīre vadetpuṇyakathāṁ sudhīḥ
अच्छे गाँव में, सज्जनों से भरे स्थान में, अच्छे खेत में, देवालय में, पवित्र नदी-तट पर, बुद्धिमान पुण्यकथा कहे।
श्लोक 29 (skanda.3.114.29)
शिवभक्तिसमायुक्ता नान्यकार्येषु लालसा ॥ वाग्यताः सुश्रवोऽव्यग्राः श्रोतारः पुण्यभागिनः
śivabhaktisamāyuktā nānyakāryeṣu lālasā vāgyatāḥ suśravo'vyagrāḥ śrotāraḥ puṇyabhāginaḥ
शिवभक्ति से युक्त, अन्य कार्यों में लालायित न रहनेवाले, वाणी को संयमित रखनेवाले, अच्छे श्रवणवाले, अव्यग्र श्रोता ही पुण्यभागी होते हैं।
श्लोक 30 (skanda.3.114.30)
अभक्ता ये कथां पुण्यां शृण्वंति मनुजाधमाः ॥ तेषां पुण्यफलं नास्ति दुःखं स्याज्जन्मजन्मनि
abhaktā ye kathāṁ puṇyāṁ śṛṇvaṁti manujādhamāḥ teṣāṁ puṇyaphalaṁ nāsti duḥkhaṁ syājjanmajanmani
जो अभक्त, नीच मनुष्य पुण्यकथा सुनते हैं, उन्हें पुण्य का फल नहीं मिलता, जन्म-जन्म में केवल दुःख होता है।
श्लोक 31 (skanda.3.114.31)
पुराणं ये त्वसंपूज्य तांबूलाद्यैरुपायनैः ॥ शृण्वंति च कथां भक्त्या दरिद्राः स्युर्न पापिनः
purāṇaṁ ye tvasaṁpūjya tāṁbūlādyairupāyanaiḥ śṛṇvaṁti ca kathāṁ bhaktyā daridrāḥ syurna pāpinaḥ
जो पुराण को ताम्बूल आदि उपहारों से पूजित किए बिना ही भक्तिपूर्वक कथा सुनते हैं, वे दरिद्र होंगे, यद्यपि पापी नहीं।
श्लोक 32 (skanda.3.114.32)
कथायां कीर्त्यमानायां ये गच्छंत्यन्यतो नराः ॥ भोगांतरे प्रणश्यंति तेषां दाराश्च संपदः
kathāyāṁ kīrtyamānāyāṁ ye gacchaṁtyanyato narāḥ bhogāṁtare praṇaśyaṁti teṣāṁ dārāśca saṁpadaḥ
कथा के कीर्तन के समय जो मनुष्य कहीं और चले जाते हैं, अगले जन्म में उनकी पत्नियाँ और सम्पदाएँ नष्ट हो जाती हैं।
श्लोक 33 (skanda.3.114.33)
सोष्णीषमस्तका ये च कथां शृण्वंति पावनीम् ॥ ते बलाकाः प्रजायन्ते पापिनो मनुजाधमाः
soṣṇīṣamastakā ye ca kathāṁ śṛṇvaṁti pāvanīm te balākāḥ prajāyante pāpino manujādhamāḥ
जो सिर पर पगड़ी बाँधे हुए पवित्र कथा सुनते हैं, वे पापी, नीच मनुष्य बगुले बनकर जन्म लेते हैं।
श्लोक 34 (skanda.3.114.34)
तांबूलं भक्षयन्तो ये कथां शृण्वंति पावनीम् ॥ स्वविष्ठां खादयंत्येतान्नरके यमकिंकराः
tāṁbūlaṁ bhakṣayanto ye kathāṁ śṛṇvaṁti pāvanīm svaviṣṭhāṁ khādayaṁtyetānnarake yamakiṁkarāḥ
जो ताम्बूल चबाते हुए पवित्र कथा सुनते हैं, उन्हें नरक में यमदूत उनका ही मल खिलाते हैं।
श्लोक 35 (skanda.3.114.35)
ये च तुंगासनारूढाः कथां शृण्वंति दांभिकाः ॥ अक्षयान्नरकान्भुक्त्वा ते भवंत्येव वायसाः
ye ca tuṁgāsanārūḍhāḥ kathāṁ śṛṇvaṁti dāṁbhikāḥ akṣayānnarakānbhuktvā te bhavaṁtyeva vāyasāḥ
जो पाखण्डी ऊँचे आसन पर बैठकर कथा सुनते हैं, वे अक्षय नरकों को भोगकर कौवे बन जाते हैं।
श्लोक 36 (skanda.3.114.36)
ये च वीरासनारूढा ये च मंचकसंस्थिताः ॥ शृण्वंति सत्कथां ते वै भवंत्यनृजुपादपाः
ye ca vīrāsanārūḍhā ye ca maṁcakasaṁsthitāḥ śṛṇvaṁti satkathāṁ te vai bhavaṁtyanṛjupādapāḥ
जो वीरासन पर बैठकर, अथवा पलंग पर स्थित होकर सत्कथा सुनते हैं, वे टेढ़े पैरोंवाले वृक्ष बन जाते हैं।
श्लोक 37 (skanda.3.114.37)
असंप्रणम्य शृण्वंतो विषवृक्षा भवंति ते ॥ कथां शयानाः शृण्वन्तो भवंत्यजगरा नराः
asaṁpraṇamya śṛṇvaṁto viṣavṛkṣā bhavaṁti te kathāṁ śayānāḥ śṛṇvanto bhavaṁtyajagarā narāḥ
बिना प्रणाम किए सुननेवाले विषवृक्ष बन जाते हैं; लेटे हुए कथा सुननेवाले मनुष्य अजगर बन जाते हैं।
श्लोक 38 (skanda.3.114.38)
यः शृणोति कथां वक्तुः समानासनमाश्रितः ॥ गुरुतल्पसमं पापं संप्राप्य नरकं व्रजेत्
yaḥ śṛṇoti kathāṁ vaktuḥ samānāsanamāśritaḥ gurutalpasamaṁ pāpaṁ saṁprāpya narakaṁ vrajet
जो वक्ता के समान आसन पर बैठकर कथा सुनता है, वह गुरुतल्प के समान पाप प्राप्त करके नरक जाता है।
श्लोक 39 (skanda.3.114.39)
ये निंदंति पुराणज्ञं कथां वा पापहारिणीम् ॥ ते वै जन्मशतं मर्त्याः शुनका संभवंति च
ye niṁdaṁti purāṇajñaṁ kathāṁ vā pāpahāriṇīm te vai janmaśataṁ martyāḥ śunakā saṁbhavaṁti ca
जो पुराणज्ञ की, अथवा पापहारिणी कथा की निन्दा करते हैं, वे सौ जन्मों तक मनुष्य से कुत्ता बनते हैं।
श्लोक 40 (skanda.3.114.40)
कथायां वर्तमानायां ये वदंति नराधमाः ॥ ते गर्दभाः प्रजायन्ते कृकलासास्ततः परम्
kathāyāṁ vartamānāyāṁ ye vadaṁti narādhamāḥ te gardabhāḥ prajāyante kṛkalāsāstataḥ param
कथा चलते समय जो नीच मनुष्य बोलते हैं, वे गधे बनते हैं, फिर उसके बाद छिपकली बनते हैं।
श्लोक 41 (skanda.3.114.41)
कदाचिदपि ये पुण्यां न शृण्वंति कथां नराः ॥ ते भुक्त्वा नरकान्घोरान्भ वंति वनसूकराः
kadācidapi ye puṇyāṁ na śṛṇvaṁti kathāṁ narāḥ te bhuktvā narakānghorānbha vaṁti vanasūkarāḥ
जो मनुष्य कभी भी पुण्यकथा नहीं सुनते, वे भयंकर नरकों को भोगकर वनसूकर बनते हैं।
श्लोक 42 (skanda.3.114.42)
ये कथामनुमोदन्ते कीर्त्यमानां नरोत्तमाः ॥ अशृण्वंतोऽपि ते यांति शाश्वतं परमं पदम्
ye kathāmanumodante kīrtyamānāṁ narottamāḥ aśṛṇvaṁto'pi te yāṁti śāśvataṁ paramaṁ padam
जो श्रेष्ठ मनुष्य कीर्तन की जाती कथा का अनुमोदन करते हैं, वे न सुनते हुए भी शाश्वत परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 43 (skanda.3.114.43)
कथायां कीर्त्यमानायां विघ्नं कुर्वंति ये शठाः ॥ कोट्यब्दान्नरकान्भुक्त्वा भवंति ग्रामसूकराः
kathāyāṁ kīrtyamānāyāṁ vighnaṁ kurvaṁti ye śaṭhāḥ koṭyabdānnarakānbhuktvā bhavaṁti grāmasūkarāḥ
कथा के कीर्तन में जो दुष्ट विघ्न डालते हैं, वे करोड़ों वर्षों तक नरक भोगकर ग्रामसूकर बनते हैं।
श्लोक 44 (skanda.3.114.44)
ये श्रावयंति मनुजान्पुण्यां पौराणिकीं कथाम् ॥ कल्पकोटिशतं साग्रं तिष्ठंति ब्रह्मणः पदम्
ye śrāvayaṁti manujānpuṇyāṁ paurāṇikīṁ kathām kalpakoṭiśataṁ sāgraṁ tiṣṭhaṁti brahmaṇaḥ padam
जो मनुष्यों को पुण्य पौराणिक कथा सुनाते हैं, वे सौ करोड़ से अधिक कल्पों तक ब्रह्मा के पद पर स्थित रहते हैं।
श्लोक 45 (skanda.3.114.45)
आसनार्थं प्रयच्छंति पुराणज्ञस्य ये नराः ॥ कम्बलाजिनवासांसि मञ्चं फलकमेव च
āsanārthaṁ prayacchaṁti purāṇajñasya ye narāḥ kambalājinavāsāṁsi mañcaṁ phalakameva ca
जो मनुष्य पुराणज्ञ को आसन के लिए कम्बल, चर्म, वस्त्र, पलंग या तख्ता देते हैं,
श्लोक 46 (skanda.3.114.46)
स्वर्गलोकं समासाद्य भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान् ॥ स्थित्वा ब्रह्मादिलोकेषु पदं यांति निरामयम्
svargalokaṁ samāsādya bhuktvā bhogānyathepsitān sthitvā brahmādilokeṣu padaṁ yāṁti nirāmayam
स्वर्गलोक को प्राप्त करके यथेच्छ भोगों को भोगकर, ब्रह्मा आदि लोकों में रहकर, निरामय पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 47 (skanda.3.114.47)
पुराणज्ञस्य यच्छंति ये सूत्रवसनं नवम् ॥ भोगिनो ज्ञानसंपन्नास्ते भवंति भवेभवे
purāṇajñasya yacchaṁti ye sūtravasanaṁ navam bhogino jñānasaṁpannāste bhavaṁti bhavebhave
जो पुराणज्ञ को नया यज्ञोपवीत और वस्त्र देते हैं, वे जन्म-जन्म में ज्ञान-सम्पन्न भोगी बनते हैं।
श्लोक 48 (skanda.3.114.48)
ये महापातकैर्युक्ता उपपातकिनश्च ये ॥ पुराणश्रवणादेव ते यांति परमं पदम्
ye mahāpātakairyuktā upapātakinaśca ye purāṇaśravaṇādeva te yāṁti paramaṁ padam
जो महापातकों से युक्त हैं, और जो उपपातकी हैं, वे भी केवल पुराण-श्रवण से परम पद को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 49 (skanda.3.114.49)
अत्र वक्ष्ये महापुण्यमितिहासं द्विजोत्तमाः ॥ शृण्वतां सर्वपापघ्नं विचित्रं सुमनोहरम्
atra vakṣye mahāpuṇyamitihāsaṁ dvijottamāḥ śṛṇvatāṁ sarvapāpaghnaṁ vicitraṁ sumanoharam
यहाँ, हे द्विजश्रेष्ठो! मैं एक अत्यन्त पुण्यमय इतिहास कहूँगा, जो सुननेवालों के समस्त पापों का नाशक, विचित्र और परम मनोहर है।
श्लोक 50 (skanda.3.114.50)
दक्षिणापथमध्ये वै ग्रामो बाष्कलसंज्ञितः ॥ तत्र संति जनाः सर्वे मूढाः कर्मविवर्जिताः
dakṣiṇāpathamadhye vai grāmo bāṣkalasaṁjñitaḥ tatra saṁti janāḥ sarve mūḍhāḥ karmavivarjitāḥ
दक्षिणापथ के मध्य में बाष्कल नाम का एक गाँव है; वहाँ के सभी लोग मूढ़, कर्मरहित हैं।
श्लोक 51 (skanda.3.114.51)
न तत्र ब्राह्मणाचाराः श्रुतिस्मृतिपराङ्मुखाः ॥ जपस्वाध्यायरहिताः परस्त्री विषयातुराः
na tatra brāhmaṇācārāḥ śrutismṛtiparāṅmukhāḥ japasvādhyāyarahitāḥ parastrī viṣayāturāḥ
वहाँ ब्राह्मणोचित आचार नहीं है, वे श्रुति-स्मृति से विमुख हैं, जप-स्वाध्याय से रहित, परस्त्री-विषय में आतुर हैं।
श्लोक 52 (skanda.3.114.52)
कृषीवलाः शस्त्रधरा निर्देवा जिह्मवृत्तयः ॥ न जानंति परं धर्मं ज्ञानवैराग्यलक्षणम्
kṛṣīvalāḥ śastradharā nirdevā jihmavṛttayaḥ na jānaṁti paraṁ dharmaṁ jñānavairāgyalakṣaṇam
वे किसान, शस्त्रधारी, देवरहित, कुटिल आचरणवाले हैं; ज्ञान-वैराग्य से युक्त परम धर्म को नहीं जानते।
श्लोक 53 (skanda.3.114.53)
स्त्रियश्च पापनिरताः स्वैरि ण्यः कामलालसाः॥ दुर्बुद्धयः कुटिलगाः सद्गताचारवर्जिताः
striyaśca pāpaniratāḥ svairi ṇyaḥ kāmalālasāḥ durbuddhayaḥ kuṭilagāḥ sadgatācāravarjitāḥ
और वहाँ की स्त्रियाँ भी पाप में रत, स्वेच्छाचारिणी, काम-लालसी, दुर्बुद्धि, कुटिल-गामिनी, सद्गति के आचार से रहित हैं।
श्लोक 54 (skanda.3.114.54)
तत्रैको विदुरो नाम दुरात्मा ब्राह्मणाधमः ॥ आसीद्वेश्यापतिर्योऽसौ सदारोऽपि कुमार्गगः
tatraiko viduro nāma durātmā brāhmaṇādhamaḥ āsīdveśyāpatiryo'sau sadāro'pi kumārgagaḥ
वहाँ विदुर नाम का एक दुरात्मा, नीच ब्राह्मण था; वह पत्नी होते हुए भी वेश्या का प्रेमी और कुमार्गगामी था।
श्लोक 55 (skanda.3.114.55)
स्वपत्नीं बंदुलां नाम हित्वा प्रतिनिशं तथा ॥ वेश्याभवनमासाद्य रमते स्मरपीडितः
svapatnīṁ baṁdulāṁ nāma hitvā pratiniśaṁ tathā veśyābhavanamāsādya ramate smarapīḍitaḥ
अपनी पत्नी बन्दुला नाम की को त्यागकर, वह प्रतिरात्रि वेश्या के भवन में जाकर, काम से पीड़ित होकर रमण करता था।
श्लोक 56 (skanda.3.114.56)
सापि तस्यांगना रात्रौ वियुक्ता नवयौवना ॥ असहंती स्मरावेशं रेमे जारेण संगता
sāpi tasyāṁganā rātrau viyuktā navayauvanā asahaṁtī smarāveśaṁ reme jāreṇa saṁgatā
वह उसकी अंगना भी, रात्रि में वियुक्त, नवयौवना, काम के आवेश को सहन न करती हुई, जार के साथ मिलकर रमण करती थी।
श्लोक 57 (skanda.3.114.57)
तां कदाचिद्दुराचारां जारेण सह संगताम् ॥ दृष्ट्वा तस्याः पतिः क्रोधादभि दुद्राव सत्वरः
tāṁ kadāciddurācārāṁ jāreṇa saha saṁgatām dṛṣṭvā tasyāḥ patiḥ krodhādabhi dudrāva satvaraḥ
एक बार उस दुराचारिणी को जार के साथ मिली देखकर, उसका पति क्रोध से तुरन्त उस पर टूट पड़ा।
श्लोक 58 (skanda.3.114.58)
जारे पलायिते पत्नीं गृहीत्वा स दुराशयः ॥ संताड्य मुष्टिबंधेन मुहुर्मुहुरताडयत्
jāre palāyite patnīṁ gṛhītvā sa durāśayaḥ saṁtāḍya muṣṭibaṁdhena muhurmuhuratāḍayat
जार के भाग जाने पर, उस दुष्ट-हृदय ने पत्नी को पकड़कर, मुक्के से पीट-पीटकर बार-बार प्रहार किया।
श्लोक 59 (skanda.3.114.59)
सा नारी पीडिता भर्त्रा कुपिता प्राह निर्भया ॥ भवान्प्रतिनिशं वेश्यां रमते का गतिर्मम
sā nārī pīḍitā bhartrā kupitā prāha nirbhayā bhavānpratiniśaṁ veśyāṁ ramate kā gatirmama
पति द्वारा पीड़ित, क्रुद्ध वह स्त्री निर्भय होकर बोली — "आप प्रतिरात्रि वेश्या से रमण करते हैं; मेरी क्या गति है?
श्लोक 60 (skanda.3.114.60)
अहं रूपवती योषा नवयौवनशालिनी ॥ कथं सहिष्ये कामार्ता तव संगतिवर्जिता
ahaṁ rūpavatī yoṣā navayauvanaśālinī kathaṁ sahiṣye kāmārtā tava saṁgativarjitā
"मैं रूपवती, नवयौवना स्त्री हूँ; काम से पीड़ित, आपके संगमरहित, कैसे सहन करूँ?"
श्लोक 61 (skanda.3.114.61)
इत्युक्तः स तया तन्व्या प्रोवाच ब्राह्मणाधमः ॥ युक्तमेव त्वयोक्तं हि तस्माद्वक्ष्यामि ते हितम्
ityuktaḥ sa tayā tanvyā provāca brāhmaṇādhamaḥ yuktameva tvayoktaṁ hi tasmādvakṣyāmi te hitam
उस कोमलांगी द्वारा यह कहे जाने पर, वह नीच ब्राह्मण बोला — "तुमने जो कहा वह उचित ही है; इसलिए मैं तुम्हारा हित बताऊँगा।
श्लोक 62 (skanda.3.114.62)
जारेभ्यो धनमाकृष्य तेभ्यो देहि परां रतिम् ॥ तद्धनं देहि मे सर्वं पण्यस्त्रीणां ददामि तत्
jārebhyo dhanamākṛṣya tebhyo dehi parāṁ ratim taddhanaṁ dehi me sarvaṁ paṇyastrīṇāṁ dadāmi tat
"जारों से धन खींचकर उन्हें परम रति दो; वह सारा धन मुझे दे दो, मैं उसे पण्यस्त्रियों (वेश्याओं) को दूँगा।
श्लोक 63 (skanda.3.114.63)
एवं संपूर्यते कामो ममापि च वरानने ॥ तथेति भर्तृवचनं प्रतिजग्राह सा वधूः
evaṁ saṁpūryate kāmo mamāpi ca varānane tatheti bhartṛvacanaṁ pratijagrāha sā vadhūḥ
"इस प्रकार मेरी भी काम-पूर्ति हो जाएगी, हे सुन्दरी!" "ऐसा ही हो" कहकर उस वधू ने पति के वचन को स्वीकार कर लिया।
श्लोक 64 (skanda.3.114.64)
एवं तयोस्तु दंपत्योर्दुराचारप्रवृत्तयोः ॥ कालेन निधनंप्राप्तः स विप्रो वृषलीपतिः
evaṁ tayostu daṁpatyordurācārapravṛttayoḥ kālena nidhanaṁprāptaḥ sa vipro vṛṣalīpatiḥ
इस प्रकार दुराचार में प्रवृत्त उन दोनों दम्पतियों में, समय के साथ, वह वेश्यापति ब्राह्मण मृत्यु को प्राप्त हुआ।
श्लोक 65 (skanda.3.114.65)
मृते भर्तरि सा नारी पुत्रैः सह निजालये ॥ उवास सुचिरं कालं किंचिदुत्क्रांतयौवना
mṛte bhartari sā nārī putraiḥ saha nijālaye uvāsa suciraṁ kālaṁ kiṁcidutkrāṁtayauvanā
पति के मरने पर, वह स्त्री पुत्रों सहित अपने ही घर में, अपने यौवन के कुछ बीत जाने तक, दीर्घकाल तक रही।
श्लोक 66 (skanda.3.114.66)
एकदा दैवयोगेन संप्राप्ते पुण्यपर्वणि ॥ सा नारी बंधुभिः सार्धं गोकर्णं क्षेत्र माययौ
ekadā daivayogena saṁprāpte puṇyaparvaṇi sā nārī baṁdhubhiḥ sārdhaṁ gokarṇaṁ kṣetra māyayau
एक बार दैवयोग से पुण्य-पर्व आने पर, वह स्त्री बन्धुजनों सहित गोकर्ण क्षेत्र गई।
श्लोक 67 (skanda.3.114.67)
तत्र तीर्थजले स्नात्वा कस्मिंश्चिद्देवतालये ॥ शुश्राव देवमुख्यानां पुण्यां पौराणिकीं कथाम्
tatra tīrthajale snātvā kasmiṁściddevatālaye śuśrāva devamukhyānāṁ puṇyāṁ paurāṇikīṁ kathām
वहाँ तीर्थ-जल में स्नान करके, किसी देवालय में, उसने देवताओं में प्रमुख (कथाकार) से पुण्य पौराणिक कथा सुनी —
श्लोक 68 (skanda.3.114.68)
योषितां जारसक्तानां नरके यमकिंकराः ॥ संतप्तलोहपरिघं क्षिपंति स्मरमंदिरे
yoṣitāṁ jārasaktānāṁ narake yamakiṁkarāḥ saṁtaptalohaparighaṁ kṣipaṁti smaramaṁdire
कि जार में आसक्त स्त्रियों को नरक में यमदूत, काम-अंग में तपाए हुए लोहे की सलाई डालते हैं।
श्लोक 69 (skanda.3.114.69)
इति पौराणिकेनोक्तां सा श्रुत्वा धर्मसंहिताम् ॥ तमुवाच रहस्येषा भीता ब्राह्मणपुंगवम्
iti paurāṇikenoktāṁ sā śrutvā dharmasaṁhitām tamuvāca rahasyeṣā bhītā brāhmaṇapuṁgavam
इस प्रकार कथावाचक द्वारा कही गई इस धर्मसंहिता को सुनकर, वह भयभीत होकर एकान्त में उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से बोली —
श्लोक 70 (skanda.3.114.70)
ब्रह्मन्पापमजानंत्या मयाचरितमुल्बणम् ॥ यौवने कामचारेण कौटिल्येन प्रवर्तितम्
brahmanpāpamajānaṁtyā mayācaritamulbaṇam yauvane kāmacāreṇa kauṭilyena pravartitam
"हे ब्रह्मन्! पाप को न जानते हुए मैंने भयंकर आचरण किया, यौवन में काम-आचरण से, कुटिलता से प्रेरित होकर।
श्लोक 71 (skanda.3.114.71)
इदं त्वद्वचनं श्रुत्वापुराणार्थविजृंभि तम् ॥ भीतिर्मे महती जाता शरीरं वेपते मुहुः
idaṁ tvadvacanaṁ śrutvāpurāṇārthavijṛṁbhi tam bhītirme mahatī jātā śarīraṁ vepate muhuḥ
"पुराणार्थ को विस्तारित करता आपका यह वचन सुनकर, मुझे महान भय उत्पन्न हुआ है; मेरा शरीर बार-बार काँप रहा है।
श्लोक 72 (skanda.3.114.72)
धिङ्मां दुरिंद्रियासक्तां पापां स्मरविमोहिताम् ॥ अल्पस्य यत्सुखस्यार्थे घोरां यास्यामि दुर्गतिम्
dhiṅmāṁ duriṁdriyāsaktāṁ pāpāṁ smaravimohitām alpasya yatsukhasyārthe ghorāṁ yāsyāmi durgatim
"धिक्कार है मुझे, दुष्ट इन्द्रियों में आसक्त, पापी, काम से मोहित; थोड़े-से सुख के लिए मैं घोर दुर्गति को प्राप्त होऊँगी।
श्लोक 73 (skanda.3.114.73)
कथं पश्यामि मरणे यमदूतान्भयंकरान् ॥ कथं पाशैर्बलात्कंठे बध्यमाना धृतिं लभे
kathaṁ paśyāmi maraṇe yamadūtānbhayaṁkarān kathaṁ pāśairbalātkaṁṭhe badhyamānā dhṛtiṁ labhe
"मृत्यु के समय भयंकर यमदूतों को मैं कैसे देख पाऊँगी? गले में पाशों से बलपूर्वक बाँधे जाने पर धैर्य कैसे प्राप्त करूँगी?
श्लोक 74 (skanda.3.114.74)
कथं सहिष्ये नरके खंडशो देहकृंतनम ॥ पुनः कथं पतिष्यामि संतप्ता क्षारकर्दमे
kathaṁ sahiṣye narake khaṁḍaśo dehakṛṁtanama punaḥ kathaṁ patiṣyāmi saṁtaptā kṣārakardame
"नरक में शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए जाने को मैं कैसे सहन करूँगी? फिर से क्षार-कीचड़ में संतप्त होकर कैसे गिरूँगी?
श्लोक 75 (skanda.3.114.75)
कथं च योनिलक्षेषु क्रिमिकीटखगादिषु ॥ परिभ्रमामि दुःखौघात्पीड्यमाना निरंतरम्
kathaṁ ca yonilakṣeṣu krimikīṭakhagādiṣu paribhramāmi duḥkhaughātpīḍyamānā niraṁtaram
"कीड़े, कीट, पक्षी आदि लाखों योनियों में, दुःखों के प्रवाह से निरन्तर पीड़ित होती हुई मैं कैसे भटकूँगी?
श्लोक 76 (skanda.3.114.76)
कथं च रोचते मह्यमद्यप्रभृति भोजनम् ॥ रात्रौ कथं च सेविष्ये निद्रां दुःखपरिप्लुता
kathaṁ ca rocate mahyamadyaprabhṛti bhojanam rātrau kathaṁ ca seviṣye nidrāṁ duḥkhapariplutā
"आज से मुझे भोजन कैसे रुचेगा? रात्रि में दुःख से आप्लावित होकर नींद का सेवन मैं कैसे करूँगी?
श्लोक 77 (skanda.3.114.77)
हाहा हतास्मि दग्धास्मि विदीर्णहृदयास्मि च ॥ हा विधे मां महापापे दत्त्वा बुद्धिमपातयः
hāhā hatāsmi dagdhāsmi vidīrṇahṛdayāsmi ca hā vidhe māṁ mahāpāpe dattvā buddhimapātayaḥ
"हाय-हाय, मैं मारी गई, मैं जल गई, मेरा हृदय विदीर्ण हो गया; हाय विधाता! मुझे बुद्धि देकर तूने मुझे महापाप में क्यों गिरा दिया?
श्लोक 78 (skanda.3.114.78)
पततस्तुंगशैलाग्राच्छूलाक्रांतस्य देहिनः ॥ यद्दुःखं जायते घोरं तस्मात्कोटिगुणं मम
patatastuṁgaśailāgrācchūlākrāṁtasya dehinaḥ yadduḥkhaṁ jāyate ghoraṁ tasmātkoṭiguṇaṁ mama
"ऊँचे पर्वत-शिखर से गिरते, शूल पर चढ़े हुए प्राणी को जो घोर दुःख होता है, उससे भी करोड़ गुना मेरा दुःख होगा।
श्लोक 79 (skanda.3.114.79)
अश्वमेधायुतं कृत्वा गंगां स्नात्वा शतं समाः ॥ न शुद्धिर्जायते प्रायो मत्पापस्य गरीयसः
aśvamedhāyutaṁ kṛtvā gaṁgāṁ snātvā śataṁ samāḥ na śuddhirjāyate prāyo matpāpasya garīyasaḥ
"दस हजार अश्वमेध करके, सौ वर्षों तक गंगा में स्नान करके भी, मेरे इस अत्यन्त गुरुतर पाप की शुद्धि प्रायः नहीं होगी।
श्लोक 80 (skanda.3.114.80)
किं करोमि क्व गच्छामि कं वा शरणमाश्रये ॥ को वा मां त्रायते लोके पतंती नरकार्णवे
kiṁ karomi kva gacchāmi kaṁ vā śaraṇamāśraye ko vā māṁ trāyate loke pataṁtī narakārṇave
"मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, किसकी शरण लूँ? नरकसागर में गिरती हुई मुझे इस लोक में कौन बचाएगा?
श्लोक 81 (skanda.3.114.81)
त्वमेव मे गुरुर्ब्रह्मंस्त्वं माता त्वं पितासि च ॥ उद्धरोद्धर मां दीनां त्वामेव शरणं गताम्
tvameva me gururbrahmaṁstvaṁ mātā tvaṁ pitāsi ca uddharoddhara māṁ dīnāṁ tvāmeva śaraṇaṁ gatām
"आप ही मेरे गुरु हैं, हे ब्रह्मन्! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं; उद्धार कीजिए, उद्धार कीजिए इस दीन को, जो केवल आपकी ही शरण में आई है।"
श्लोक 82 (skanda.3.114.82)
इति तां जातनिर्वेदां पतितां चरणद्वये ॥ उत्थाप्य कृपया धीमान्बभाषे द्विजपुंगवः
iti tāṁ jātanirvedāṁ patitāṁ caraṇadvaye utthāpya kṛpayā dhīmānbabhāṣe dvijapuṁgavaḥ
इस प्रकार वैराग्य को प्राप्त, उसके दोनों चरणों में गिरी उसे कृपापूर्वक उठाकर, वह बुद्धिमान श्रेष्ठ ब्राह्मण बोला —
श्लोक 83 (skanda.3.114.83)
ब्राह्मण उवाच ॥ दिष्ट्या काले प्रबुद्धासि श्रुत्वेमां महतीं कथाम् ॥ मा भैषीस्तव वक्ष्यामि गतिं चैव सुखावहाम्
brāhmaṇa uvāca diṣṭyā kāle prabuddhāsi śrutvemāṁ mahatīṁ kathām mā bhaiṣīstava vakṣyāmi gatiṁ caiva sukhāvahām
ब्राह्मण ने कहा — "सौभाग्य से समय पर तुम इस महती कथा को सुनकर जाग गई हो; डरो मत, मैं तुम्हें सुखदायक गति भी बताऊँगा।
श्लोक 84 (skanda.3.114.84)
सत्कथाश्रवणादेव जाता ते मतिरीदृशी ॥ इंद्रियार्थेषु वैराग्यं पश्चात्तापो महानभूत्
satkathāśravaṇādeva jātā te matirīdṛśī iṁdriyārtheṣu vairāgyaṁ paścāttāpo mahānabhūt
"सत्कथा-श्रवण से ही तुम्हारी ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई है — इन्द्रिय-विषयों में वैराग्य और महान पश्चात्ताप उत्पन्न हुआ है।
श्लोक 85 (skanda.3.114.85)
पश्चात्तापो हि सर्वेषामघानां निष्कृतिः परा ॥ तेनैव कुरुते सद्यः प्रायश्चित्तं सुधीर्नरः
paścāttāpo hi sarveṣāmaghānāṁ niṣkṛtiḥ parā tenaiva kurute sadyaḥ prāyaścittaṁ sudhīrnaraḥ
"पश्चात्ताप ही समस्त पापों का परम प्रायश्चित्त है; उसी से बुद्धिमान मनुष्य तत्काल प्रायश्चित्त कर लेता है।
श्लोक 86 (skanda.3.114.86)
प्रायश्चित्तानि सर्वाणि कृत्वा च विधिवत्पुनः ॥ अपश्चात्तापिनो नार्या न यांति गतिमुत्तमाम्
prāyaścittāni sarvāṇi kṛtvā ca vidhivatpunaḥ apaścāttāpino nāryā na yāṁti gatimuttamām
"सारे प्रायश्चित्त विधिपूर्वक करके भी, जो स्त्री पश्चात्तापरहित है, वह उत्तम गति को प्राप्त नहीं होती।
श्लोक 87 (skanda.3.114.87)
सत्कथाश्रवणान्नित्यं संयाति परमां गतिम् ॥ पुण्यक्षेत्रनिवासाच्च चित्तशुद्धिः प्रजायते
satkathāśravaṇānnityaṁ saṁyāti paramāṁ gatim puṇyakṣetranivāsācca cittaśuddhiḥ prajāyate
"सत्कथा-श्रवण से मनुष्य सदा परम गति को प्राप्त होता है; पुण्यक्षेत्र में निवास से भी चित्त-शुद्धि उत्पन्न होती है।
श्लोक 88 (skanda.3.114.88)
यथा सत्कथया नित्यं संयाति परमां गतिम् ॥ तथान्यैः सद्व्रतैर्जंतोर्नभवेन्मतिरुत्तमा
yathā satkathayā nityaṁ saṁyāti paramāṁ gatim tathānyaiḥ sadvratairjaṁtornabhavenmatiruttamā
"जैसे सत्कथा से मनुष्य सदा परम गति को प्राप्त होता है, वैसी उत्तम बुद्धि प्राणी को अन्य सद्व्रतों से नहीं होती।
श्लोक 89 (skanda.3.114.89)
यथा मुहुः शोध्यमानो दर्पणो निर्मलो भवेत् ॥ तथा सत्कथया चेतो विशुद्धिं परमां व्रजेत्
yathā muhuḥ śodhyamāno darpaṇo nirmalo bhavet tathā satkathayā ceto viśuddhiṁ paramāṁ vrajet
"जैसे बार-बार साफ किया गया दर्पण निर्मल हो जाता है, वैसे ही सत्कथा से चित्त परम विशुद्धि को प्राप्त होता है।
श्लोक 90 (skanda.3.114.90)
विशुद्धे चेतसि नृणां ध्यानं सिध्यत्युमापतेः ॥ ध्यानेन सर्वं मलिनं मनोवाक्कायसंभृतम्
viśuddhe cetasi nṛṇāṁ dhyānaṁ sidhyatyumāpateḥ dhyānena sarvaṁ malinaṁ manovākkāyasaṁbhṛtam
"चित्त के विशुद्ध होने पर मनुष्यों का उमापति का ध्यान सिद्ध होता है; ध्यान से मन-वाणी-शरीर से संचित समस्त मल,
श्लोक 91 (skanda.3.114.91)
सद्यो विधूय कृतिनो यांति शम्भोः परं पदम् ॥ अतः संन्यस्तपुण्यानां सत्कथा साधनं परम्
sadyo vidhūya kṛtino yāṁti śambhoḥ paraṁ padam ataḥ saṁnyastapuṇyānāṁ satkathā sādhanaṁ param
"तत्काल दूर होकर, सिद्ध पुरुष शम्भु के परम पद को प्राप्त होते हैं; इसलिए पुण्य का भी त्याग करनेवालों के लिए सत्कथा ही परम साधन है।
श्लोक 92 (skanda.3.114.92)
कथया सिध्यति ध्यानं ध्यानात्कैवल्यमुत्तमम् ॥ असिद्धपरमध्यानः कथामेतां शृणोति यः ॥ सोऽन्यजन्मनि संप्राप्य ध्यानं याति परां गतिम्
kathayā sidhyati dhyānaṁ dhyānātkaivalyamuttamam asiddhaparamadhyānaḥ kathāmetāṁ śṛṇoti yaḥ so'nyajanmani saṁprāpya dhyānaṁ yāti parāṁ gatim
"कथा से ध्यान सिद्ध होता है, ध्यान से परम कैवल्य; जो परम ध्यान को सिद्ध न करके भी इस कथा को सुनता है, वह अन्य जन्म में ध्यान प्राप्त करके परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 93 (skanda.3.114.93)
नामोच्चारणमात्रेण जप्त्वा मंत्रमजामिलः ॥ पश्चात्तापसमायुक्तस्त्ववाप परमां गतिम्
nāmoccāraṇamātreṇa japtvā maṁtramajāmilaḥ paścāttāpasamāyuktastvavāpa paramāṁ gatim
"नाम के मात्र उच्चारण से, मन्त्र जपकर, अजामिल भी पश्चात्ताप से युक्त होकर परम गति को प्राप्त हुआ।
श्लोक 94 (skanda.3.114.94)
सर्वेषां श्रेयसां बीजं सत्कथाश्रवणं नृणाम् ॥ यस्तद्विहीनः स पशुः कथं मुच्येत बन्धनात्
sarveṣāṁ śreyasāṁ bījaṁ satkathāśravaṇaṁ nṛṇām yastadvihīnaḥ sa paśuḥ kathaṁ mucyeta bandhanāt
"समस्त कल्याणों का बीज मनुष्यों के लिए सत्कथा-श्रवण ही है; जो इससे रहित है, वह पशु है, वह बन्धन से कैसे मुक्त होगा?
श्लोक 95 (skanda.3.114.95)
अतस्त्वमपि सर्वेभ्यो विषयेभ्यो निवृत्तधीः ॥ भक्तिं परां समाधाय सत्कथां शृणु सर्वदा ॥ शृण्वंत्याः सत्कथां नित्यं चेतस्ते शुद्धिमेष्यति
atastvamapi sarvebhyo viṣayebhyo nivṛttadhīḥ bhaktiṁ parāṁ samādhāya satkathāṁ śṛṇu sarvadā śṛṇvaṁtyāḥ satkathāṁ nityaṁ cetaste śuddhimeṣyati
"इसलिए तुम भी समस्त विषयों से निवृत्तबुद्धि होकर, परम भक्ति धारण करके, सदा सत्कथा सुनो; सत्कथा सदा सुननेवाली तुम्हारा चित्त शुद्धि को प्राप्त होगा।
श्लोक 96 (skanda.3.114.96)
तेन ध्यायसि विश्वेशं ततो मुक्तिमवाप्स्यसि ॥ ध्यायतः शिवपादाब्जं मुक्तिरेकेन जन्मना
tena dhyāyasi viśveśaṁ tato muktimavāpsyasi dhyāyataḥ śivapādābjaṁ muktirekena janmanā
"उससे तुम विश्वेश का ध्यान करोगी, फिर मुक्ति प्राप्त करोगी; शिव के चरणकमल का ध्यान करनेवाले को एक ही जन्म में मुक्ति मिलती है।
श्लोक 97 (skanda.3.114.97)
भविष्यति न सन्देहः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ॥ इत्युक्ता तेन विप्रेण सा नारी बाष्पसंकुला
bhaviṣyati na sandehaḥ satyaṁ satyaṁ vadāmyaham ityuktā tena vipreṇa sā nārī bāṣpasaṁkulā
"यह अवश्य होगा, इसमें कोई सन्देह नहीं; मैं सत्य, सत्य कहता हूँ।" इस प्रकार उस ब्राह्मण द्वारा कहे जाने पर, वह आँसुओं से भरी स्त्री,
श्लोक 98 (skanda.3.114.98)
पतित्वा पादयोस्तस्य कृतार्थास्मीत्यभाषत ॥ तस्मिन्नेव महाक्षेत्रे तस्मादेव द्विजोत्तमात्
patitvā pādayostasya kṛtārthāsmītyabhāṣata tasminneva mahākṣetre tasmādeva dvijottamāt
उसके चरणों में गिरकर "मैं कृतार्थ हुई" यह बोली। उसी महाक्षेत्र में, उसी श्रेष्ठ ब्राह्मण से,
श्लोक 99 (skanda.3.114.99)
शुश्राव सत्कथां साध्वीं कैवल्यफल दायिनी॥ स उवाच द्विजस्तस्यै कथां वैराग्यबृंहिताम्
śuśrāva satkathāṁ sādhvīṁ kaivalyaphala dāyinī sa uvāca dvijastasyai kathāṁ vairāgyabṛṁhitām
उसने कैवल्य-फल देनेवाली सत्कथा सुनी; उस ब्राह्मण ने उसे वैराग्य से भरी कथा सुनाई,
श्लोक 100 (skanda.3.114.100)
यां श्रुत्वा मनुजः सद्यस्त्यजेद्विषयवासनाम् ॥ तस्याश्चित्तं यथा शुद्धं वैराग्यरसगं यथा
yāṁ śrutvā manujaḥ sadyastyajedviṣayavāsanām tasyāścittaṁ yathā śuddhaṁ vairāgyarasagaṁ yathā
जिसे सुनकर मनुष्य तत्काल विषय-वासना त्याग दे; जिससे उसका चित्त शुद्ध हो, वैराग्य-रस से युक्त हो,
श्लोक 101 (skanda.3.114.101)
तथोवाच द्विजः शैवीं कथां भक्तिसमन्विताम् ॥ यथायथा मनस्तस्याः प्रसादमभिगच्छति ॥ तथातथा शनैः शंभोर्ध्यानयोगमुपादिशत्
tathovāca dvijaḥ śaivīṁ kathāṁ bhaktisamanvitām yathāyathā manastasyāḥ prasādamabhigacchati tathātathā śanaiḥ śaṁbhordhyānayogamupādiśat
उसी प्रकार उस ब्राह्मण ने भक्तिसहित शैव कथा कही; जैसे-जैसे उसका मन प्रसन्नता को प्राप्त होता गया, वैसे-वैसे धीरे-धीरे उसे शम्भु के ध्यान-योग का उपदेश दिया।
श्लोक 102 (skanda.3.114.102)
शनैः शनैर्ध्वस्तरजस्तमोमलं विमुक्तसर्वेन्द्रियभोगविग्रहम् ॥ विशुद्धतत्त्वं हृदयं द्विजस्त्रिया विवेश विश्वेश्वर रूपचिंतनम्
śanaiḥ śanairdhvastarajastamomalaṁ vimuktasarvendriyabhogavigraham viśuddhatattvaṁ hṛdayaṁ dvijastriyā viveśa viśveśvara rūpaciṁtanam
धीरे-धीरे रज-तम के मल को नष्ट करके, समस्त इन्द्रिय-भोगों के शरीर से मुक्त होकर, विशुद्ध तत्त्ववाला हृदय उस ब्राह्मणी का विश्वेश्वर के रूप-चिन्तन में प्रविष्ट हुआ।
श्लोक 103 (skanda.3.114.103)
इत्थं सद्गुरुमाश्रित्य सा नारी प्राप्तसन्मतिः ॥ दध्यौ मुहुर्मुहुः शंभोश्चिदानंदमयं वपुः
itthaṁ sadgurumāśritya sā nārī prāptasanmatiḥ dadhyau muhurmuhuḥ śaṁbhościdānaṁdamayaṁ vapuḥ
इस प्रकार सद्गुरु का आश्रय लेकर, सद्बुद्धि को प्राप्त वह स्त्री, बार-बार शम्भु के चिदानन्दमय स्वरूप का ध्यान करने लगी।
श्लोक 104 (skanda.3.114.104)
नित्यं तीर्थजले स्नात्वा जटावल्कलधारिणी ॥ भस्मोद्धूलितसर्वांगी रुद्राक्षकृतभूषणा
nityaṁ tīrthajale snātvā jaṭāvalkaladhāriṇī bhasmoddhūlitasarvāṁgī rudrākṣakṛtabhūṣaṇā
नित्य तीर्थ-जल में स्नान करके, जटा-वल्कल धारण करके, सम्पूर्ण अंगों पर भस्म लगाकर, रुद्राक्ष के आभूषण धारण करके,
श्लोक 105 (skanda.3.114.105)
शिवनामजपासक्ता वाग्यता मितभोजना ॥ बद्धपद्मासनाऽव्यग्रा सत्कथा श्रवणोत्सुका
śivanāmajapāsaktā vāgyatā mitabhojanā baddhapadmāsanā'vyagrā satkathā śravaṇotsukā
शिवनाम-जप में आसक्त, वाणी-संयत, अल्पभोजी, पद्मासन में बैठी, अव्यग्र, सत्कथा-श्रवण की उत्सुक,
श्लोक 106 (skanda.3.114.106)
गुरुशुश्रूषणरता त्यक्तापत्यसुहृजना ॥ गुरूपदिष्टयोगेन शिवमेवमतोषयत्
guruśuśrūṣaṇaratā tyaktāpatyasuhṛjanā gurūpadiṣṭayogena śivamevamatoṣayat
गुरु-सेवा में रत, पुत्र-मित्रों को त्यागकर, गुरु द्वारा उपदिष्ट योग से उसने शिव को ही संतुष्ट किया।
श्लोक 107 (skanda.3.114.107)
विश्वेश विश्वविलयस्थितिजन्महेतो विश्वैकवंद्य शिव शाश्वत विश्वरूप ॥ विध्वस्तकालविपरीतगुणावभास श्रीमन्महेश मयि धेहि कृपाकटाक्षम्
viśveśa viśvavilayasthitijanmaheto viśvaikavaṁdya śiva śāśvata viśvarūpa vidhvastakālaviparītaguṇāvabhāsa śrīmanmaheśa mayi dhehi kṛpākaṭākṣam
"हे विश्वेश! विश्व के विलय, स्थिति और जन्म के हेतु! विश्व द्वारा एकमात्र वन्दनीय, हे शिव, शाश्वत, विश्वरूप! काल की विपरीत गुणवाली प्रभा को नष्ट करनेवाले, हे श्रीमान महेश! मुझ पर कृपा-कटाक्ष कीजिए।
श्लोक 108 (skanda.3.114.108)
शंभो शशांककृतशेखर शांतमूर्ते गंगाधरामरवरार्चितपादपद्म ॥ नागेंद्रभूषण नगेंद्रनिकेतनेश भक्तार्तिहन्मयि निधेहि कृपाकटाक्षम्
śaṁbho śaśāṁkakṛtaśekhara śāṁtamūrte gaṁgādharāmaravarārcitapādapadma nāgeṁdrabhūṣaṇa nageṁdraniketaneśa bhaktārtihanmayi nidhehi kṛpākaṭākṣam
"हे शम्भो! चन्द्रमा को शिखर बनाए हुए, शान्तमूर्ति, गंगाधर और श्रेष्ठ अमरों द्वारा पूजित चरणकमलवाले, नागेन्द्र से विभूषित, पर्वतराज-निवासी ईश! भक्तों की पीड़ा हरनेवाले! मुझ पर कृपा-कटाक्ष कीजिए।
श्लोक 109 (skanda.3.114.109)
श्रीविश्वनाथ करुणाकर शूलपाणे भूतेश भर्ग भुवनत्रयगीतकीर्ते ॥ श्रीनीलकण्ठ मदनान्तक विश्वमूर्ते गौरीपते मयि निधेहि कृपाकटाक्षम्
śrīviśvanātha karuṇākara śūlapāṇe bhūteśa bharga bhuvanatrayagītakīrte śrīnīlakaṇṭha madanāntaka viśvamūrte gaurīpate mayi nidhehi kṛpākaṭākṣam
"हे श्रीविश्वनाथ! करुणाकर, शूलपाणि, भूतेश, भर्ग, तीनों लोकों में गाई गई कीर्तिवाले! हे श्रीनीलकण्ठ, मदनान्तक, विश्वमूर्ते, गौरीपते! मुझ पर कृपा-कटाक्ष कीजिए।"
श्लोक 110 (skanda.3.114.110)
इत्थं प्रतिदिनं भक्त्या प्रार्थयंती महेश्वरम्॥ शृण्वंती सत्कथां सम्यक्कर्मबंधं समाच्छिनत्
itthaṁ pratidinaṁ bhaktyā prārthayaṁtī maheśvaram śṛṇvaṁtī satkathāṁ samyakkarmabaṁdhaṁ samācchinat
इस प्रकार प्रतिदिन भक्तिपूर्वक महेश्वर से प्रार्थना करती हुई, भलीभाँति सत्कथा सुनती हुई, उसने अपना कर्मबन्धन काट डाला।
श्लोक 111 (skanda.3.114.111)
अथ कालेन सा नारी समुत्सृज्य कलेवरम् ॥ महेशानुचरैर्नीता संप्राप्ता शिव मंदिरम्
atha kālena sā nārī samutsṛjya kalevaram maheśānucarairnītā saṁprāptā śiva maṁdiram
फिर समय आने पर, वह स्त्री शरीर त्यागकर, महेश के अनुचरों द्वारा ले जाई जाकर शिव के मन्दिर पहुँची।
श्लोक 112 (skanda.3.114.112)
तत्र देवैर्महादेवं सेव्यमानं सहोमया ॥ गणेशनंदिभृंग्याद्यैर्वीरभद्रेश्वरादिभिः
tatra devairmahādevaṁ sevyamānaṁ sahomayā gaṇeśanaṁdibhṛṁgyādyairvīrabhadreśvarādibhiḥ
वहाँ देवताओं द्वारा, उमा सहित सेवित महादेव को, गणेश, नन्दी, भृंगी आदि तथा वीरभद्रेश्वर आदि द्वारा,
श्लोक 113 (skanda.3.114.113)
उपास्यमानं गौरीशं कोटिसूर्यसमप्रभम् ॥ त्रिलोचनं पंचमुखं नीलग्रीवं सदाशिवम्
upāsyamānaṁ gaurīśaṁ koṭisūryasamaprabham trilocanaṁ paṁcamukhaṁ nīlagrīvaṁ sadāśivam
उपासित गौरीश को, करोड़ों सूर्यों के समान प्रभावाले, त्रिलोचन, पंचमुख, नीलग्रीव सदाशिव को,
श्लोक 114 (skanda.3.114.114)
वामांके बिभ्रतं गौरीं विद्युच्चंद्रसमप्रभाम् ॥ दृष्ट्वा ससंभ्रमं नारी सा प्रणम्य पुनःपुनः
vāmāṁke bibhrataṁ gaurīṁ vidyuccaṁdrasamaprabhām dṛṣṭvā sasaṁbhramaṁ nārī sā praṇamya punaḥpunaḥ
बाईं गोद में विद्युत-चन्द्र के समान प्रभावाली गौरी को धारण किए हुए देखकर, वह स्त्री विह्वल होकर बार-बार प्रणाम करने लगी।
श्लोक 115 (skanda.3.114.115)
आनन्दाश्रुजलोत्सिक्ता रोमहर्षसमाकुला ॥ संमानिता करुणया पार्वत्या शंकरेण च
ānandāśrujalotsiktā romaharṣasamākulā saṁmānitā karuṇayā pārvatyā śaṁkareṇa ca
आनन्द के आँसुओं से भीगी, रोमांच से व्याकुल, वह पार्वती और शंकर द्वारा करुणापूर्वक सम्मानित हुई।
श्लोक 116 (skanda.3.114.116)
तस्मिँल्लोके परानन्दघनज्योतिषि शाश्वते ॥ लब्ध्वा निवासमचलं लेभे सुखमनाहतम्
tasmim̐lloke parānandaghanajyotiṣi śāśvate labdhvā nivāsamacalaṁ lebhe sukhamanāhatam
उस परमानन्दघन ज्योतिर्मय शाश्वत लोक में अचल निवास पाकर, उसने अखण्ड सुख प्राप्त किया।
श्लोक 117 (skanda.3.114.117)
सा कदाचिदुमां देवीमुपसृत्य प्रणम्य च ॥ पर्यपृच्छत मे भर्त्ता कां गतिं गतवानिति
sā kadācidumāṁ devīmupasṛtya praṇamya ca paryapṛcchata me bharttā kāṁ gatiṁ gatavāniti
एक बार वह उमा देवी के पास जाकर, प्रणाम करके पूछने लगी — "मेरे पति किस गति को प्राप्त हुए हैं?"
श्लोक 118 (skanda.3.114.118)
तामुवाच महादेवी स ते भर्त्ता दुराशयः ॥ भुक्त्वा नरकदुःखानि विंध्ये जातः पिशाचकः
tāmuvāca mahādevī sa te bharttā durāśayaḥ bhuktvā narakaduḥkhāni viṁdhye jātaḥ piśācakaḥ
महादेवी ने उससे कहा — "तुम्हारा वह दुर्बुद्धि पति, नरक के दुःख भोगकर, विन्ध्य में पिशाच बना है।"
श्लोक 119 (skanda.3.114.119)
पुनः प्रपच्छ सा नारी देवीं त्रिभुवनेश्वरीम् ॥ केनोपायेन मे भर्त्ता सद्गतिं प्राप्नुयादिति
punaḥ prapaccha sā nārī devīṁ tribhuvaneśvarīm kenopāyena me bharttā sadgatiṁ prāpnuyāditi
फिर वह स्त्री त्रिभुवनेश्वरी देवी से पूछने लगी — "किस उपाय से मेरे पति की सद्गति प्राप्त हो सकती है?"
श्लोक 120 (skanda.3.114.120)
देव्युवाच ॥ सोऽस्मत्कथां महापुण्यां कदाचिच्छृणुयाद्यदि ॥ निस्तीर्य दुर्गतिं सर्वामिमं लोकं प्रयास्यति
devyuvāca so'smatkathāṁ mahāpuṇyāṁ kadācicchṛṇuyādyadi nistīrya durgatiṁ sarvāmimaṁ lokaṁ prayāsyati
देवी ने कहा — "यदि वह कभी हमारी यह महापुण्य कथा सुन ले, तो समस्त दुर्गति को पार करके वह इस लोक को प्राप्त होगा।"
श्लोक 121 (skanda.3.114.121)
इति गौर्या वचः श्रुत्वा सा नारी विहितांजलिः ॥ प्रार्थयामास तां देवीं भर्तुः पापविशोधने
iti gauryā vacaḥ śrutvā sā nārī vihitāṁjaliḥ prārthayāmāsa tāṁ devīṁ bhartuḥ pāpaviśodhane
गौरी के इस वचन को सुनकर, वह स्त्री हाथ जोड़कर, अपने पति के पाप-शोधन के लिए उस देवी से प्रार्थना करने लगी।
श्लोक 122 (skanda.3.114.122)
तया मुहुः प्रार्थ्यमाना पार्वतीकरुणायुता ॥ तुंबुरुं नाम गंधर्वमाहूयेदमथाब्रवीत्
tayā muhuḥ prārthyamānā pārvatīkaruṇāyutā tuṁburuṁ nāma gaṁdharvamāhūyedamathābravīt
उसके द्वारा बार-बार प्रार्थना की जाती हुई, करुणा से भरी पार्वती ने तुम्बुरु नाम के गन्धर्व को बुलाकर यह कहा —
श्लोक 123 (skanda.3.114.123)
तुंबुरो गच्छ भद्रं ते विंध्यशैलं सहानया ॥ आस्ते पिशाचकस्तत्र योऽस्याः पतिरसन्मतिः
tuṁburo gaccha bhadraṁ te viṁdhyaśailaṁ sahānayā āste piśācakastatra yo'syāḥ patirasanmatiḥ
"हे तुम्बुरु! तुम्हारा कल्याण हो; इसके साथ विन्ध्य पर्वत जाओ; वहाँ वह पिशाच रहता है, जो इसका दुर्बुद्धि पति है।
श्लोक 124 (skanda.3.114.124)
तस्याग्रे परमां पुण्यां कथामस्मद्गुणैर्युताम् ॥ आख्याय दुर्गतेर्मुक्तं तमानय शिवांतिकम्
tasyāgre paramāṁ puṇyāṁ kathāmasmadguṇairyutām ākhyāya durgatermuktaṁ tamānaya śivāṁtikam
"उसके सामने हमारे गुणों से युक्त परम पुण्य कथा सुनाकर, दुर्गति से मुक्त हुए उसे शिव के समीप ले आओ।"
श्लोक 125 (skanda.3.114.125)
इति देव्या समादिष्टस्तुंबुरुस्तां प्रणम्य च ॥ तया सह विमानेन विंध्याद्रिं सहसा ययौ
iti devyā samādiṣṭastuṁburustāṁ praṇamya ca tayā saha vimānena viṁdhyādriṁ sahasā yayau
इस प्रकार देवी द्वारा आज्ञप्त तुम्बुरु, उसे प्रणाम करके, उसके साथ विमान द्वारा तुरन्त विन्ध्याचल गया।
श्लोक 126 (skanda.3.114.126)
तत्रापश्यन्महाकायं रक्तनेत्रं महाहनुम् ॥ प्रहसंतं रुदंतं च वल्गंतं च पिशाचकम्
tatrāpaśyanmahākāyaṁ raktanetraṁ mahāhanum prahasaṁtaṁ rudaṁtaṁ ca valgaṁtaṁ ca piśācakam
वहाँ उन्होंने विशालकाय, लाल नेत्रोंवाले, विशाल जबड़ेवाले, कभी हँसते, कभी रोते, कभी कूदते पिशाच को देखा।
श्लोक 127 (skanda.3.114.127)
बलाद्गृहीत्वा तं पाशैर्बद्ध्वा वै संनिवेश्य च ॥ तुंबुरुर्वल्लकीहस्तो जगौ गौरीपतेः कथाम्
balādgṛhītvā taṁ pāśairbaddhvā vai saṁniveśya ca tuṁbururvallakīhasto jagau gaurīpateḥ kathām
उसे बलपूर्वक पकड़कर, पाशों से बाँधकर बिठाकर, वीणा हाथ में लिए तुम्बुरु ने गौरीपति की कथा गाई।
श्लोक 128 (skanda.3.114.128)
स पिशाचो महापुण्यां कथां श्रुत्वा पुरद्विषः ॥ विधूय कलुषं सर्वं सप्ताहात्प्राप संस्मृतिम्
sa piśāco mahāpuṇyāṁ kathāṁ śrutvā puradviṣaḥ vidhūya kaluṣaṁ sarvaṁ saptāhātprāpa saṁsmṛtim
वह पिशाच त्रिपुरारि की वह महापुण्य कथा सुनकर, अपने समस्त कल्मष को दूर करके, सात दिनों में स्मृति को प्राप्त हुआ।
श्लोक 129 (skanda.3.114.129)
स पैशाचं वपुस्त्यक्त्वा स्वरूपं दिव्यमाप्य च ॥ जगौ स्वयमपि श्रीमच्चरितं पार्वतीपतेः
sa paiśācaṁ vapustyaktvā svarūpaṁ divyamāpya ca jagau svayamapi śrīmaccaritaṁ pārvatīpateḥ
उसने अपने पैशाच शरीर को त्यागकर, अपना दिव्य स्वरूप प्राप्त करके, स्वयं भी श्रीमान पार्वतीपति के चरित्र को गाया।
श्लोक 130 (skanda.3.114.130)
विमानमारुह्य स दिव्यरूपधृक्स तुंबुरुः पार्श्वगतः स्वकांतया ॥ गायन्महेशस्य गुणान्मनोरमाञ्जगाम कैवल्यपदं सनातनम्
vimānamāruhya sa divyarūpadhṛksa tuṁburuḥ pārśvagataḥ svakāṁtayā gāyanmaheśasya guṇānmanoramāñjagāma kaivalyapadaṁ sanātanam
विमान पर आरूढ़ होकर, दिव्य रूप धारण किए हुए, वह तुम्बुरु, अपनी प्रिया के साथ, महेश के मनोहर गुणों को गाते हुए, सनातन कैवल्य पद को गया।
श्लोक 131 (skanda.3.114.131)
सूत उवाच ॥ इत्येतत्कथितं पुण्यमाख्यानं दुरितापहम् ॥ महेश्वरप्रीतिकरं निर्मलज्ञानसाधनम्
sūta uvāca ityetatkathitaṁ puṇyamākhyānaṁ duritāpaham maheśvaraprītikaraṁ nirmalajñānasādhanam
सूत जी ने कहा — इस प्रकार यह पुण्य आख्यान कहा गया, जो पाप को हरनेवाला, महेश्वर को प्रिय, निर्मल ज्ञान का साधन है।
श्लोक 132 (skanda.3.114.132)
य इदं शृणुयान्मर्त्यः कीर्तयेद्वा समाहितः ॥ शंभोर्गुणानुकथनं विचित्रं पापनाशनम्
ya idaṁ śṛṇuyānmartyaḥ kīrtayedvā samāhitaḥ śaṁbhorguṇānukathanaṁ vicitraṁ pāpanāśanam
जो मनुष्य इसे सुनता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर इसका कीर्तन करता है — शम्भु के गुणों का यह विचित्र, पापनाशक वर्णन,
श्लोक 133 (skanda.3.114.133)
परमानन्दजनकं भवरोगमहौषधम् ॥ भुक्त्वेह विविधान्भोगान्मुक्तो याति परां गतिम्
paramānandajanakaṁ bhavarogamahauṣadham bhuktveha vividhānbhogānmukto yāti parāṁ gatim
परम आनन्द को उत्पन्न करनेवाला, संसार-रोग की महौषधि — यहाँ विविध भोगों को भोगकर, मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होता है।
श्लोक 134 (skanda.3.114.134)
सूत उवाच ॥ यूयं खलु महाभागाः कृतार्था मुनिसत्तमाः ॥ ये सेवंते सदा शंभोः कथामृतरसं नवम्
sūta uvāca yūyaṁ khalu mahābhāgāḥ kṛtārthā munisattamāḥ ye sevaṁte sadā śaṁbhoḥ kathāmṛtarasaṁ navam
सूत जी ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठो! तुम सब निश्चय ही महाभाग, कृतार्थ हो, जो सदा शम्भु की कथा के नए अमृत-रस का सेवन करते हो।
श्लोक 135 (skanda.3.114.135)
ते जन्मभाजः खलु जीवलोके येषां मनो ध्यायति विश्वनाथम् ॥ वाणी गुणान्स्तौति कथां शृणोति श्रोत्रद्वयं ते भवमुत्तरंति
te janmabhājaḥ khalu jīvaloke yeṣāṁ mano dhyāyati viśvanātham vāṇī guṇānstauti kathāṁ śṛṇoti śrotradvayaṁ te bhavamuttaraṁti
वे ही इस जीवलोक में सच्चे जन्मधारी हैं, जिनका मन विश्वनाथ का ध्यान करता है, जिनकी वाणी उनके गुणों की स्तुति करती है, जो कथा सुनते हैं — उनके दोनों कान संसार से पार हो जाते हैं।
श्लोक 136 (skanda.3.114.136)
विविधगुणविभेदैर्नित्यमस्पृष्टरूपं जगति च बहिरंतर्वा समानं महिम्ना ॥ स्वमहसि विहरंतं वाङ्मनोवृत्तिदूरं परमशिवमनंतानंदसांद्रं प्रपद्ये
vividhaguṇavibhedairnityamaspṛṣṭarūpaṁ jagati ca bahiraṁtarvā samānaṁ mahimnā svamahasi viharaṁtaṁ vāṅmanovṛttidūraṁ paramaśivamanaṁtānaṁdasāṁdraṁ prapadye
विविध गुणों के भेदों से सदा अस्पर्शित रूपवाले, जगत में बाहर और भीतर समान महिमावाले, अपनी ही महिमा में विहार करनेवाले, वाणी और मन की वृत्तियों से दूर, अनन्त आनन्द से सान्द्र उस परम शिव की मैं शरण लेता हूँ।