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ब्रह्म खण्ड · अध्याय 113

रुद्राध्याय का माहात्म्य

अध्याय 112अध्याय-सूचीअध्याय 114

श्लोक 1 (skanda.3.113.1)

॥ सूत उवाच ॥ एवं ब्रह्मर्षिणा प्रोक्तां वाणीं पीयूषसन्निभाम् ॥ आकर्ण्य मुदितो राजा प्रांजलिः पुनरब्रवीत्

sūta uvāca evaṁ brahmarṣiṇā proktāṁ vāṇīṁ pīyūṣasannibhām ākarṇya mudito rājā prāṁjaliḥ punarabravīt

सूत जी ने कहा — इस प्रकार उस ब्रह्मर्षि द्वारा कहे गए अमृत-तुल्य वचन को सुनकर, प्रसन्न राजा ने हाथ जोड़कर पुनः कहा।

श्लोक 2 (skanda.3.113.2)

राजोवाच ॥ अहो सत्संगमः पुंसामशेषाघप्रशोधनः ॥ कामक्रोधनिहंता च इष्टदोग्धा जनस्य हि

rājovāca aho satsaṁgamaḥ puṁsāmaśeṣāghapraśodhanaḥ kāmakrodhanihaṁtā ca iṣṭadogdhā janasya hi

राजा ने कहा — "अहो, सज्जनों का संग मनुष्यों के समस्त पापों को शुद्ध करनेवाला है, काम-क्रोध का नाशक है, और जनों की इच्छाओं को पूर्ण करनेवाला है।

श्लोक 3 (skanda.3.113.3)

मम मायातमो नष्टं ज्ञानदृष्टिः प्रकाशिता ॥ तव दर्शनमात्रेण प्रायोहममरोत्तमः

mama māyātamo naṣṭaṁ jñānadṛṣṭiḥ prakāśitā tava darśanamātreṇa prāyohamamarottamaḥ

"मेरी माया का अन्धकार नष्ट हो गया, ज्ञानदृष्टि प्रकाशित हो गई; आपके दर्शनमात्र से मैं मानो श्रेष्ठ अमर बन गया हूँ।

श्लोक 4 (skanda.3.113.4)

श्रुतं च पूर्वचरितं बालयोः सम्यगेतयोः ॥ भविष्यदपि पृच्छामि मत्पुत्राचरणं मुने

śrutaṁ ca pūrvacaritaṁ bālayoḥ samyagetayoḥ bhaviṣyadapi pṛcchāmi matputrācaraṇaṁ mune

"इन दोनों बालकों का पूर्ववृत्तान्त भलीभाँति सुन लिया; अब, हे मुने! मेरे पुत्र के भविष्य के आचरण के बारे में भी पूछता हूँ।

श्लोक 5 (skanda.3.113.5)

अस्यायुः कति वर्षाणि भाग्यं वद च कीदृशम् ॥ विद्या कीर्तिश्च शक्तिश्च श्रद्धा भक्तिश्च कीदृशी

asyāyuḥ kati varṣāṇi bhāgyaṁ vada ca kīdṛśam vidyā kīrtiśca śaktiśca śraddhā bhaktiśca kīdṛśī

"इसकी आयु कितने वर्षों की है, और इसका भाग्य कैसा है? इसकी विद्या, कीर्ति और शक्ति कैसी होगी, और श्रद्धा-भक्ति कैसी होगी?

श्लोक 6 (skanda.3.113.6)

एतत्सर्वमशेषेण मुने त्वं वक्तुमर्हसि ॥ तव शिष्योस्मि भृत्योस्मि शरणं त्वां गतोस्मयहम्

etatsarvamaśeṣeṇa mune tvaṁ vaktumarhasi tava śiṣyosmi bhṛtyosmi śaraṇaṁ tvāṁ gatosmayaham

"यह सब कुछ पूरी तरह, हे मुने! आप कहने योग्य हैं; मैं आपका शिष्य हूँ, आपका सेवक हूँ, मैं आपकी शरण में आया हूँ।"

श्लोक 7 (skanda.3.113.7)

पराशर उवाच ॥ अत्रावाच्यं हि यत्किंचित्कथं शक्तोस्मि शंसितुम् ॥ यच्छ्रुत्वा धृतिमंतोपि विषादं प्राप्नुयुर्जनाः

parāśara uvāca atrāvācyaṁ hi yatkiṁcitkathaṁ śaktosmi śaṁsitum yacchrutvā dhṛtimaṁtopi viṣādaṁ prāpnuyurjanāḥ

पराशर ने कहा — "यहाँ जो कुछ न कहने योग्य है, उसे कैसे कहने में मैं समर्थ हो सकता हूँ? इसे सुनकर धैर्यवान लोग भी विषाद को प्राप्त हो जाएँ।

श्लोक 8 (skanda.3.113.8)

तथापि निर्व्यलीकेन भावेन परिपृच्छतः ॥ अवाच्यमपि वक्ष्यामि तव स्नेहान्महीपते

tathāpi nirvyalīkena bhāvena paripṛcchataḥ avācyamapi vakṣyāmi tava snehānmahīpate

"फिर भी, निष्कपट भाव से पूछनेवाले तुम्हारे स्नेह के कारण, हे महीपते! मैं न कहने योग्य को भी कहूँगा।

श्लोक 9 (skanda.3.113.9)

अमुष्य त्वत्कुमारस्य वर्षाणि द्वादशात्ययुः ॥ इतः परं प्रपद्येत सप्तमे दिवसे मृतिम्

amuṣya tvatkumārasya varṣāṇi dvādaśātyayuḥ itaḥ paraṁ prapadyeta saptame divase mṛtim

"तुम्हारे इस कुमार के बारह वर्ष बीतने पर, इसके आगे, सातवें दिन ही यह मृत्यु को प्राप्त होगा।"

श्लोक 10 (skanda.3.113.10)

इति तस्य वचः श्रुत्वा कालकूटमिवोदितम् ॥ मूर्च्छितः सहसा भूमौ पतितो नृपतिः शुचा

iti tasya vacaḥ śrutvā kālakūṭamivoditam mūrcchitaḥ sahasā bhūmau patito nṛpatiḥ śucā

उसके इस वचन को, मानो कालकूट विष उगला गया हो, सुनकर, राजा शोक से तुरन्त मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।

श्लोक 11 (skanda.3.113.11)

तमुत्थाप्य समाश्वास्य स मुनिः करुणार्द्रधीः ॥ उवाच मा भैर्नृपते पुनर्वक्ष्यामि ते हितम्

tamutthāpya samāśvāsya sa muniḥ karuṇārdradhīḥ uvāca mā bhairnṛpate punarvakṣyāmi te hitam

उसे उठाकर, सान्त्वना देकर, करुणा से आर्द्रबुद्धि वह मुनि बोला — "डरो मत, हे राजन्! मैं तुम्हारे लिए हितकर बात पुनः कहूँगा।

श्लोक 12 (skanda.3.113.12)

सर्गात्पुरा निरालोकं यदेकं निष्कलं परम् ॥ चिदानंदमयं ज्योतिः स आद्यः केवलः शिवः

sargātpurā nirālokaṁ yadekaṁ niṣkalaṁ param cidānaṁdamayaṁ jyotiḥ sa ādyaḥ kevalaḥ śivaḥ

"सृष्टि से पूर्व, जो एक, प्रकाशरहित, परम, निष्कल, चिदानन्दमय ज्योति था, वही आद्य, केवल शिव था।

श्लोक 13 (skanda.3.113.13)

स एवादौ रजोरूपं सृष्ट्वा ब्रह्माणमात्मना ॥ सृष्टिकर्मनियुक्ताय तस्मै वेदांश्च दत्तवान्

sa evādau rajorūpaṁ sṛṣṭvā brahmāṇamātmanā sṛṣṭikarmaniyuktāya tasmai vedāṁśca dattavān

"उन्होंने ही सबसे पहले रज-रूप ब्रह्मा को अपने से उत्पन्न करके, सृष्टि-कर्म में नियुक्त उसे वेद भी दिए।

श्लोक 14 (skanda.3.113.14)

पुनश्च दत्तवानीश आत्मतत्त्वैकसंग्रहम् ॥ सर्वोपनिषदां सारं रुद्राध्यायं च दत्तवान्

punaśca dattavānīśa ātmatattvaikasaṁgraham sarvopaniṣadāṁ sāraṁ rudrādhyāyaṁ ca dattavān

"फिर ईश ने आत्मतत्त्व का एकमात्र संग्रह, समस्त उपनिषदों का सार, और रुद्राध्याय भी दिया।

श्लोक 15 (skanda.3.113.15)

यदेकमव्ययं साक्षाद्ब्रह्मज्योतिः सनातनम् ॥ शिवात्मकं परं तत्त्वं रुद्राध्याये प्रतिष्ठितम्

yadekamavyayaṁ sākṣādbrahmajyotiḥ sanātanam śivātmakaṁ paraṁ tattvaṁ rudrādhyāye pratiṣṭhitam

"जो एक, अव्यय, साक्षात् सनातन ब्रह्मज्योति, शिवात्मक परम तत्त्व है, वह रुद्राध्याय में प्रतिष्ठित है।

श्लोक 16 (skanda.3.113.16)

स आत्मभूः सृजद्विश्वं चतुर्भिर्वदनैर्विराट् ॥ ससर्ज वेदांश्चतुरो लोकानां स्थितिहेतवे

sa ātmabhūḥ sṛjadviśvaṁ caturbhirvadanairvirāṭ sasarja vedāṁścaturo lokānāṁ sthitihetave

"उस आत्मभू विराट ने चार मुखों से विश्व की सृष्टि करते हुए, लोकों की स्थिति के लिए चार वेदों को उत्पन्न किया।

श्लोक 17 (skanda.3.113.17)

तत्रायं यजुषां मध्ये ब्रह्मणो दक्षिणान्मुखात् ॥ अशेषोपनिषत्सारो रुद्राध्यायः समुद्गतः

tatrāyaṁ yajuṣāṁ madhye brahmaṇo dakṣiṇānmukhāt aśeṣopaniṣatsāro rudrādhyāyaḥ samudgataḥ

"वहाँ यजुर्वेद के मध्य में, ब्रह्मा के दक्षिण मुख से, समस्त उपनिषदों का सार यह रुद्राध्याय उत्पन्न हुआ।

श्लोक 18 (skanda.3.113.18)

स एष मुनिभिः सर्वैर्मरीच्यत्रिपुरोगमैः ॥ सह देवैर्धृतस्तेभ्यस्तच्छिष्या जगृहुश्च तम्

sa eṣa munibhiḥ sarvairmarīcyatripurogamaiḥ saha devairdhṛtastebhyastacchiṣyā jagṛhuśca tam

"इसे मरीचि-अत्रि आदि समस्त मुनियों ने देवताओं सहित धारण किया; उनसे उनके शिष्यों ने भी इसे ग्रहण किया।

श्लोक 19 (skanda.3.113.19)

तच्छिष्यशिष्यैस्तत्पुत्रैस्तत्पुत्रैश्च क्रमागतैः ॥ धृतो रुद्रात्मकः सोऽयं वेदसारः प्रसादितः

tacchiṣyaśiṣyaistatputraistatputraiśca kramāgataiḥ dhṛto rudrātmakaḥ so'yaṁ vedasāraḥ prasāditaḥ

"उनके शिष्यों के शिष्यों द्वारा, उनके पुत्रों द्वारा, और उनके क्रमशः आए हुए पुत्रों द्वारा, यह रुद्रात्मक वेदसार धारण करके प्रसादित किया गया है।

श्लोक 20 (skanda.3.113.20)

एष एव परो मन्त्र एष एव परं तपः ॥ रुद्राध्यायजपः पुंसां परं कैवल्यसाधनम्

eṣa eva paro mantra eṣa eva paraṁ tapaḥ rudrādhyāyajapaḥ puṁsāṁ paraṁ kaivalyasādhanam

"यही परम मन्त्र है, यही परम तप है; रुद्राध्याय का जप मनुष्यों के लिए कैवल्य का परम साधन है।

श्लोक 21 (skanda.3.113.21)

महापातकिनः प्रोक्ता उपपातकिनश्च ये ॥ रुद्राध्यायजपात्सद्यस्तेऽपि यांति परां गतिम्

mahāpātakinaḥ proktā upapātakinaśca ye rudrādhyāyajapātsadyaste'pi yāṁti parāṁ gatim

"जो महापातकी और उपपातकी कहे गए हैं, वे भी रुद्राध्याय के जप से तत्काल परम गति को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 22 (skanda.3.113.22)

भूयोपि ब्रह्मणा सृष्टाः सदसन्मिश्रयोनयः ॥ देवतिर्यङ्मनुष्याद्यास्ततः संपूरितं जगत्

bhūyopi brahmaṇā sṛṣṭāḥ sadasanmiśrayonayaḥ devatiryaṅmanuṣyādyāstataḥ saṁpūritaṁ jagat

"फिर भी ब्रह्मा द्वारा सृजित, सत्-असत् मिश्रित योनियोंवाले, देव-तिर्यक्-मनुष्य आदि से जगत भर गया।

श्लोक 23 (skanda.3.113.23)

तेषां कर्माणि सृष्टानि स्वजन्मानुगुणानि च ॥ लोकास्तेषु प्रवर्तंते भुंजते चैव तत्फलम्

teṣāṁ karmāṇi sṛṣṭāni svajanmānuguṇāni ca lokāsteṣu pravartaṁte bhuṁjate caiva tatphalam

"उनके अपने-अपने जन्म के अनुरूप कर्म सृजित हुए; उन्हीं में लोक प्रवृत्त होते हैं, और उन्हीं का फल भोगते हैं।

श्लोक 24 (skanda.3.113.24)

लोकसृष्टिप्रवाहार्थं स्वयमेव प्रजापतिः॥ धर्माधर्मौ ससर्जाग्रे स्ववक्षःपृष्ठभागतः

lokasṛṣṭipravāhārthaṁ svayameva prajāpatiḥ dharmādharmau sasarjāgre svavakṣaḥpṛṣṭhabhāgataḥ

"लोक-सृष्टि के प्रवाह के लिए, स्वयं प्रजापति ने पहले अपने वक्षस्थल और पृष्ठभाग से धर्म और अधर्म को उत्पन्न किया।

श्लोक 25 (skanda.3.113.25)

धर्ममेवानुतिष्ठंतः पुण्यं विंदंति तत्फलम् ॥ अधर्ममनुतिष्ठंतस्ते पापफलभोगिनः

dharmamevānutiṣṭhaṁtaḥ puṇyaṁ viṁdaṁti tatphalam adharmamanutiṣṭhaṁtaste pāpaphalabhoginaḥ

"धर्म का ही अनुसरण करनेवाले पुण्य को उसके फल के रूप में पाते हैं; अधर्म का अनुसरण करनेवाले पाप के फल भोगनेवाले होते हैं।

श्लोक 26 (skanda.3.113.26)

पुण्यकर्मफल स्वर्गो नरकस्तद्विपर्ययः ॥ तयोर्द्वावधिपौ धात्रा कृतौ शतमखांतकौ

puṇyakarmaphala svargo narakastadviparyayaḥ tayordvāvadhipau dhātrā kṛtau śatamakhāṁtakau

"पुण्यकर्म का फल स्वर्ग है, और नरक उससे विपरीत; इन दोनों के दो अधिपति विधाता ने बनाए — शतमख (इन्द्र) और अन्तक (यम)।

श्लोक 27 (skanda.3.113.27)

कामः क्रोधश्च लोभश्च मदमानादयः परे ॥ अधर्मस्य सुता आसन्सर्वे नरकनायकाः

kāmaḥ krodhaśca lobhaśca madamānādayaḥ pare adharmasya sutā āsansarve narakanāyakāḥ

"काम, क्रोध, लोभ, मद, मान आदि अन्य, ये सभी अधर्म के पुत्र थे, सभी नरक के नायक।

श्लोक 28 (skanda.3.113.28)

गुरुतल्पः सुरापानं तथान्यः पुल्कसीगमः ॥ कामस्य तनया ह्येते प्रधानाः परिकीर्तिताः

gurutalpaḥ surāpānaṁ tathānyaḥ pulkasīgamaḥ kāmasya tanayā hyete pradhānāḥ parikīrtitāḥ

"गुरुतल्पगमन, सुरापान, और दूसरा वृषली-गमन — ये काम के प्रमुख पुत्र कहे गए हैं।

श्लोक 29 (skanda.3.113.29)

क्रोधात्पितृवधो जातस्तथा मातृवधः परः ॥ ब्रह्महत्या च कन्यैका क्रोधस्य तनया अमी

krodhātpitṛvadho jātastathā mātṛvadhaḥ paraḥ brahmahatyā ca kanyaikā krodhasya tanayā amī

"क्रोध से पितृवध उत्पन्न हुआ, और उसी प्रकार मातृवध; ब्रह्महत्या और एक कन्या — ये क्रोध की सन्तानें हैं।

श्लोक 30 (skanda.3.113.30)

देवस्वहरणश्चैव ब्रह्मस्वहरणस्तथा ॥ स्वर्णस्तेय इति त्वेते लोभस्य तनयाः स्मृताः

devasvaharaṇaścaiva brahmasvaharaṇastathā svarṇasteya iti tvete lobhasya tanayāḥ smṛtāḥ

"देवद्रव्य-हरण, ब्रह्मद्रव्य-हरण, तथा स्वर्ण-चोरी — ये लोभ के पुत्र स्मृत हैं।

श्लोक 31 (skanda.3.113.31)

एतानाहूय चांडालान्यमः पातकनायकान् ॥ नरकस्य विवृद्ध्यर्थमाधिपत्यं चकार ह

etānāhūya cāṁḍālānyamaḥ pātakanāyakān narakasya vivṛddhyarthamādhipatyaṁ cakāra ha

"इन चाण्डालों को बुलाकर, यम ने नरक की वृद्धि के लिए इन्हें अधिकार दिया।

श्लोक 32 (skanda.3.113.32)

ते यमेन समादिष्टा नव पातकनायकाः ॥ ते सर्वे संगता भूयो घोराः पातकनायकाः

te yamena samādiṣṭā nava pātakanāyakāḥ te sarve saṁgatā bhūyo ghorāḥ pātakanāyakāḥ

"यम द्वारा नियुक्त वे नौ पातक-नायक, वे सभी फिर एकत्र होकर, वे भयंकर पातक-नायक,

श्लोक 33 (skanda.3.113.33)

नरकान्पालयामासुः स्वभृत्यैश्चोपपातकैः ॥ रुद्राध्याये भुवि प्राप्ते साक्षात्कैवल्यसाधने

narakānpālayāmāsuḥ svabhṛtyaiścopapātakaiḥ rudrādhyāye bhuvi prāpte sākṣātkaivalyasādhane

"अपने सेवकों और उपपातकों सहित नरकों का पालन करने लगे। जब पृथ्वी पर रुद्राध्याय, साक्षात् कैवल्य-साधन, पहुँचा,

श्लोक 34 (skanda.3.113.34)

भीताः प्रदुद्रुवुः सर्वे तेऽमी पातकनायकाः ॥ यमं विज्ञापयामासुः सहान्यैरुपपातकैः

bhītāḥ pradudruvuḥ sarve te'mī pātakanāyakāḥ yamaṁ vijñāpayāmāsuḥ sahānyairupapātakaiḥ

"तब भयभीत होकर वे सभी पातक-नायक भाग गए; उन्होंने अन्य उपपातकों सहित यम से निवेदन किया —

श्लोक 35 (skanda.3.113.35)

जय देव महाराज वयं हि तव किंकराः ॥ नरकस्य विवृद्ध्यर्थं साधिकाराः कृतास्त्वया

jaya deva mahārāja vayaṁ hi tava kiṁkarāḥ narakasya vivṛddhyarthaṁ sādhikārāḥ kṛtāstvayā

"'जय हो, हे देव महाराज! हम आपके ही सेवक हैं, नरक की वृद्धि के लिए आपके द्वारा अधिकार दिए गए।

श्लोक 36 (skanda.3.113.36)

अधुना वर्तितुं लोके न शक्ताः स्मो वयं प्रभो ॥ रुद्राध्यायानुभावेन निर्दग्धाश्चैव विद्रुताः

adhunā vartituṁ loke na śaktāḥ smo vayaṁ prabho rudrādhyāyānubhāvena nirdagdhāścaiva vidrutāḥ

"'अब हम संसार में रहने में समर्थ नहीं हैं, हे प्रभु! रुद्राध्याय के प्रभाव से हम जले हुए और तितर-बितर हो गए हैं।

श्लोक 37 (skanda.3.113.37)

ग्रामेग्रामे नदीकूले पुण्येष्वायतनेषु च ॥ रुद्रजाप्ये तु पर्याप्ते कथं लोके चरेमहि

grāmegrāme nadīkūle puṇyeṣvāyataneṣu ca rudrajāpye tu paryāpte kathaṁ loke caremahi

"'गाँव-गाँव में, नदी-तट पर, पवित्र स्थानों में, रुद्रजाप्य के पूर्णतः फैल जाने पर, हम संसार में कैसे विचरण करें?

श्लोक 38 (skanda.3.113.38)

प्रायश्चित्तसहस्रं वै गणयामो न किंचन ॥ रुद्रजाप्याक्षराण्येव सोढुं बत न शक्नुमः

prāyaścittasahasraṁ vai gaṇayāmo na kiṁcana rudrajāpyākṣarāṇyeva soḍhuṁ bata na śaknumaḥ

"'हजारों प्रायश्चित्तों को हम कुछ भी नहीं गिनते; हाय, हम रुद्रजाप्य के अक्षरों को ही सहन नहीं कर सकते।

श्लोक 39 (skanda.3.113.39)

महापातकमुख्यानामस्माकं लोकघातिनाम् ॥ रुद्रजाप्यं भयं घोरं रुद्रजाप्यं महद्विषम्

mahāpātakamukhyānāmasmākaṁ lokaghātinām rudrajāpyaṁ bhayaṁ ghoraṁ rudrajāpyaṁ mahadviṣam

"'महापातकों में प्रमुख, लोकघातक हम सबके लिए, रुद्रजाप्य घोर भय है, रुद्रजाप्य महाविष है।

श्लोक 40 (skanda.3.113.40)

अतो दुर्विषहं घोरमस्माक व्यसनं महत् ॥ रुद्रजाप्येन संप्राप्तमपनेतुं त्वमर्हसि

ato durviṣahaṁ ghoramasmāka vyasanaṁ mahat rudrajāpyena saṁprāptamapanetuṁ tvamarhasi

"'इसलिए हमें रुद्रजाप्य से प्राप्त इस दुःसह, घोर, महान संकट को दूर करने योग्य हैं आप।'

श्लोक 41 (skanda.3.113.41)

इति विज्ञापितः साक्षाद्यमः पातकनायकैः ॥ ब्रह्मणोंऽतिकमासाद्य तस्मै सर्वं न्यवेदयत्

iti vijñāpitaḥ sākṣādyamaḥ pātakanāyakaiḥ brahmaṇoṁ'tikamāsādya tasmai sarvaṁ nyavedayat

"इस प्रकार साक्षात् पातक-नायकों द्वारा निवेदन किए जाने पर, यम ब्रह्मा के समीप जाकर उन्हें सब कुछ बताया।

श्लोक 42 (skanda.3.113.42)

देवदेव जगन्नाथ त्वामेव शरणं गतः ॥ त्वया नियुक्तो मर्त्यानां निग्रहे पापकारिणाम्

devadeva jagannātha tvāmeva śaraṇaṁ gataḥ tvayā niyukto martyānāṁ nigrahe pāpakāriṇām

"'हे देवदेव, जगन्नाथ! मैं आपकी ही शरण में आया हूँ; आपके द्वारा मनुष्यों में पापियों के निग्रह के लिए नियुक्त,

श्लोक 43 (skanda.3.113.43)

अधुना पापिनो मर्त्या न संति पृथिवीतले ॥ रुद्राध्यायेन निहतं पातकानां महत्कुलम्

adhunā pāpino martyā na saṁti pṛthivītale rudrādhyāyena nihataṁ pātakānāṁ mahatkulam

"'अब पृथ्वीतल पर पापी मनुष्य नहीं रहे; रुद्राध्याय द्वारा पातकों का महाकुल नष्ट हो गया है।

श्लोक 44 (skanda.3.113.44)

पातकानां कुले नष्टे नरकाः शून्यतां गताः ॥ नरके शून्यतां याते मम राज्यं हि निष्फलम्

pātakānāṁ kule naṣṭe narakāḥ śūnyatāṁ gatāḥ narake śūnyatāṁ yāte mama rājyaṁ hi niṣphalam

"'पातकों का कुल नष्ट होने पर, नरक शून्य हो गए हैं; नरक शून्य हो जाने पर, मेरा राज्य निष्फल हो गया है।

श्लोक 45 (skanda.3.113.45)

तस्मात्त्वयैव भगवन्नुपायः परिचिन्त्यताम् ॥ यथा मे न विहन्येत स्वामित्वं मर्त्यदेहिनाम्

tasmāttvayaiva bhagavannupāyaḥ paricintyatām yathā me na vihanyeta svāmitvaṁ martyadehinām

"'इसलिए, हे भगवन्! आप ही उपाय सोचें, जिससे मेरा मर्त्य प्राणियों पर स्वामित्व नष्ट न हो।'

श्लोक 46 (skanda.3.113.46)

इति विज्ञापितो धाता यमेन परिखिद्यता ॥ रुद्रजाप्यविघातार्थमुपायं पर्यकल्पयत्

iti vijñāpito dhātā yamena parikhidyatā rudrajāpyavighātārthamupāyaṁ paryakalpayat

"इस प्रकार व्याकुल यम द्वारा निवेदन किए जाने पर, विधाता ने रुद्रजाप्य के विघात के लिए उपाय सोचा।

श्लोक 47 (skanda.3.113.47)

अश्रद्धां चैव दुर्मेधामविद्यायाः सुते उभे ॥ श्रद्धामेधाविघातिन्यौ मर्त्येषु पर्यचोदयत्

aśraddhāṁ caiva durmedhāmavidyāyāḥ sute ubhe śraddhāmedhāvighātinyau martyeṣu paryacodayat

"उन्होंने अविद्या की दो पुत्रियाँ — अश्रद्धा और दुर्मेधा, श्रद्धा और मेधा की विघातक — मनुष्यों में भेज दीं।

श्लोक 48 (skanda.3.113.48)

ताभ्यां विमोहिते लोके रुद्राध्यायपराङ्मुखे ॥ यमः स्वस्थानमासाद्य कृतार्थ इव सोऽभवत्

tābhyāṁ vimohite loke rudrādhyāyaparāṅmukhe yamaḥ svasthānamāsādya kṛtārtha iva so'bhavat

"उन दोनों से मोहित होकर, रुद्राध्याय से विमुख हुआ संसार; यम अपने स्थान पर पहुँचकर मानो कृतार्थ हो गया।

श्लोक 49 (skanda.3.113.49)

पूर्वजन्मकृतैः पापैर्जायंतेऽल्पायुषो जनाः ॥ तानि पापानि नश्यंति रुद्रं जप्तवतां नृणाम्

pūrvajanmakṛtaiḥ pāpairjāyaṁte'lpāyuṣo janāḥ tāni pāpāni naśyaṁti rudraṁ japtavatāṁ nṛṇām

"पूर्वजन्म में किए गए पापों से मनुष्य अल्पायु होते हैं; रुद्र का जप करनेवाले मनुष्यों के वे पाप नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 50 (skanda.3.113.50)

क्षीणेषु सर्वपापेषु दीर्घमायुर्बलं धृतिः ॥ आरोग्यं ज्ञानमैश्वर्यं वर्धते सर्वदेहिनाम्

kṣīṇeṣu sarvapāpeṣu dīrghamāyurbalaṁ dhṛtiḥ ārogyaṁ jñānamaiśvaryaṁ vardhate sarvadehinām

"समस्त पापों के क्षीण होने पर, समस्त देहधारियों की दीर्घायु, बल, धृति, आरोग्य, ज्ञान और ऐश्वर्य बढ़ते हैं।

श्लोक 51 (skanda.3.113.51)

रुद्राध्यायेन ये देवं स्नापयंति महेश्वरम् ॥ तज्जलैः कुर्वतः स्नानं ते मृत्युं संतरंति च

rudrādhyāyena ye devaṁ snāpayaṁti maheśvaram tajjalaiḥ kurvataḥ snānaṁ te mṛtyuṁ saṁtaraṁti ca

"जो रुद्राध्याय से महेश्वर देव को स्नान कराते हैं, उन्हीं जलों से स्वयं भी स्नान करनेवाले मृत्यु को पार कर जाते हैं।

श्लोक 52 (skanda.3.113.52)

रुद्राध्यायाभिजप्तेन स्नानं कुर्वंति येंऽभसा ॥ तेषां मृत्युभयं नास्ति शिवलो के महीयते

rudrādhyāyābhijaptena snānaṁ kurvaṁti yeṁ'bhasā teṣāṁ mṛtyubhayaṁ nāsti śivalo ke mahīyate

"जो रुद्राध्याय से अभिमन्त्रित जल से स्नान करते हैं, उन्हें मृत्यु का भय नहीं रहता; वे शिवलोक में महिमामंडित होते हैं।

श्लोक 53 (skanda.3.113.53)

शतरुद्राभिषेकेण शतायुर्जायते नरः ॥ अशेषपापनिर्मुक्तः शिवस्य दयितो भवेत्

śatarudrābhiṣekeṇa śatāyurjāyate naraḥ aśeṣapāpanirmuktaḥ śivasya dayito bhavet

"शतरुद्राभिषेक से मनुष्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है; समस्त पापों से मुक्त होकर वह शिव का प्रिय बन जाता है।

श्लोक 54 (skanda.3.113.54)

एष रुद्रायुतस्नानं करोतु तव पुत्रकः ॥ दशवर्षसहस्राणि मोदते भुवि शक्रवत्

eṣa rudrāyutasnānaṁ karotu tava putrakaḥ daśavarṣasahasrāṇi modate bhuvi śakravat

"यह तुम्हारा पुत्र रुद्र के दस हजार जप से स्नान करे; वह पृथ्वी पर दस हजार वर्षों तक इन्द्र के समान आनन्द भोगेगा,

श्लोक 55 (skanda.3.113.55)

अव्याहतबलैश्वर्यो हतशत्रुर्निरामयः ॥ निर्धूताखिलपापौघः शास्ता राज्यमकंटकम्

avyāhatabalaiśvaryo hataśatrurnirāmayaḥ nirdhūtākhilapāpaughaḥ śāstā rājyamakaṁṭakam

"अखण्डित बल-ऐश्वर्यवाला, शत्रुहन्ता, निरामय, समस्त पापसमूह से मुक्त होकर, निष्कण्टक राज्य का शासक बनेगा।

श्लोक 56 (skanda.3.113.56)

विप्रा वेदविदः शांताः कृतिनः शंसितव्रताः ॥ ज्ञानयज्ञतपोनिष्ठाः शिवभक्तिपरायणाः

viprā vedavidaḥ śāṁtāḥ kṛtinaḥ śaṁsitavratāḥ jñānayajñataponiṣṭhāḥ śivabhaktiparāyaṇāḥ

"वेदज्ञ, शान्त, कृती, प्रशंसित व्रतवाले, ज्ञान-यज्ञ-तप में निष्ठावाले, शिवभक्ति परायण ब्राह्मण,

श्लोक 57 (skanda.3.113.57)

रुद्राध्याय जपं सम्यक्कुर्वंतु विमलाशयाः ॥ तेषां जपानुभावेन सद्यः श्रेयो भविष्यति

rudrādhyāya japaṁ samyakkurvaṁtu vimalāśayāḥ teṣāṁ japānubhāvena sadyaḥ śreyo bhaviṣyati

"निर्मल हृदयवाले होकर रुद्राध्याय का जप भलीभाँति करें; उनके जप के प्रभाव से इसका शीघ्र कल्याण होगा।"

श्लोक 58 (skanda.3.113.58)

इत्युक्तवंतं नृपतिर्महामुनिं तमेव वव्रे प्रथमं क्रियागुरुम् ॥ अथापरांस्त्यक्तधनाशयान्मुनीनावाहयामास सहस्रशः क्षणात्

ityuktavaṁtaṁ nṛpatirmahāmuniṁ tameva vavre prathamaṁ kriyāgurum athāparāṁstyaktadhanāśayānmunīnāvāhayāmāsa sahasraśaḥ kṣaṇāt

इस प्रकार कहे जाने पर, राजा ने उसी महामुनि को पहला क्रियागुरु चुना; फिर धन की इच्छा त्याग चुके अन्य मुनियों को क्षणभर में सहस्रों की संख्या में बुलाया।

श्लोक 59 (skanda.3.113.59)

ते विप्राः शांतमनसः सहस्रपरिसंमिताः ॥ कलशानां शतं स्थाप्य पुण्य वृक्षरसैर्युतम्

te viprāḥ śāṁtamanasaḥ sahasraparisaṁmitāḥ kalaśānāṁ śataṁ sthāpya puṇya vṛkṣarasairyutam

वे शान्तचित्त हजार ब्राह्मण, पवित्र वृक्षों के रस से युक्त सौ कलश स्थापित करके,

श्लोक 60 (skanda.3.113.60)

रुद्राध्यायेन संस्नाप्य तमुर्वीपतिपुत्रकम् ॥ विधिवत्स्नापयामासुः संप्राप्ते सप्तमे दिने

rudrādhyāyena saṁsnāpya tamurvīpatiputrakam vidhivatsnāpayāmāsuḥ saṁprāpte saptame dine

रुद्राध्याय से उस राजपुत्र को स्नान कराकर, सातवाँ दिन आने पर विधिपूर्वक उसे स्नान करा चुके।

श्लोक 61 (skanda.3.113.61)

स्नाप्यमानो मुनिजनैः स राजन्यकुमारकः ॥ अकस्मादेव संत्रस्तः क्षणं मूर्च्छामवाप ह

snāpyamāno munijanaiḥ sa rājanyakumārakaḥ akasmādeva saṁtrastaḥ kṣaṇaṁ mūrcchāmavāpa ha

मुनियों द्वारा स्नान कराए जाते हुए, वह राजकुमार अचानक ही भयभीत होकर क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो गया।

श्लोक 62 (skanda.3.113.62)

सहसैव प्रबुद्धोऽसौ मुनिभिः कृतरक्षणः ॥ प्रोवाच कश्चित्पुरुषो दंडहस्तः समागतः

sahasaiva prabuddho'sau munibhiḥ kṛtarakṣaṇaḥ provāca kaścitpuruṣo daṁḍahastaḥ samāgataḥ

वह तुरन्त ही, मुनियों द्वारा रक्षित होकर, जग गया और बोला — "कोई पुरुष, हाथ में दण्ड लिए हुए, आया,

श्लोक 63 (skanda.3.113.63)

मां प्रहर्तुं कृतमतिर्भीमदण्डो भयानकः ॥ सोऽपि चान्यैर्महावीरै पुरुषैरभिताडितः

māṁ prahartuṁ kṛtamatirbhīmadaṇḍo bhayānakaḥ so'pi cānyairmahāvīrai puruṣairabhitāḍitaḥ

"मुझे मारने का निश्चय किए हुए, भयंकर दण्डवाला, भयानक; किन्तु उसे भी अन्य महावीर पुरुषों द्वारा चारों ओर से पीटा गया,

श्लोक 64 (skanda.3.113.64)

बद्ध्वा पाशेन महता दूरं नीत इवाभवत् ॥ एतावदहमद्राक्षं भवद्भिः कृतरक्षणः

baddhvā pāśena mahatā dūraṁ nīta ivābhavat etāvadahamadrākṣaṁ bhavadbhiḥ kṛtarakṣaṇaḥ

"बड़े पाश से बाँधकर उसे दूर ले जाया गया-सा प्रतीत हुआ। इतना ही मैंने देखा, आपके द्वारा रक्षित होकर।"

श्लोक 65 (skanda.3.113.65)

इत्युक्तवंतं नृपतेस्तनूजं द्विजसत्तमाः ॥ आशीर्भिः पूजयामासुर्भयं राज्ञे न्यवेदयन्

ityuktavaṁtaṁ nṛpatestanūjaṁ dvijasattamāḥ āśīrbhiḥ pūjayāmāsurbhayaṁ rājñe nyavedayan

राजा के इस पुत्र द्वारा यह कहे जाने पर, श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने आशीर्वादों से उसकी पूजा की, और राजा को यह भय बता दिया।

श्लोक 66 (skanda.3.113.66)

अथ सर्वानृषीञ्छ्रेष्ठान्दक्षिणाभिर्नृपोत्तमः ॥ पूजयित्वा वरान्नेन भोजयित्वा च भक्तितः

atha sarvānṛṣīñchreṣṭhāndakṣiṇābhirnṛpottamaḥ pūjayitvā varānnena bhojayitvā ca bhaktitaḥ

फिर समस्त श्रेष्ठ ऋषियों को दक्षिणा से पूजकर, उत्तम अन्न से भक्तिपूर्वक भोजन कराकर, वह श्रेष्ठ राजा,

श्लोक 67 (skanda.3.113.67)

प्रतिगृह्याशिषस्तेषां मुनीनां ब्रह्मवादिनाम् ॥ भक्त्या बंधुजनैः सार्धं सभायां समुपाविशत्

pratigṛhyāśiṣasteṣāṁ munīnāṁ brahmavādinām bhaktyā baṁdhujanaiḥ sārdhaṁ sabhāyāṁ samupāviśat

उन ब्रह्मवादी मुनियों के आशीर्वाद पाकर, भक्तिपूर्वक बन्धुजनों सहित सभा में बैठ गया।

श्लोक 68 (skanda.3.113.68)

तस्मिन्समागते वीरे मुनिभिः सह पार्थिवे ॥ आजगाम महायोगी देवर्षिर्नारदः स्वयम्

tasminsamāgate vīre munibhiḥ saha pārthive ājagāma mahāyogī devarṣirnāradaḥ svayam

उस वीर के मुनियों सहित बैठे रहने पर, महायोगी देवर्षि नारद स्वयं वहाँ आ पहुँचे।

श्लोक 69 (skanda.3.113.69)

तमागतं प्रेक्ष्य गुरुं मुनीनां सार्धं सदस्यैरखिलैर्मुनींद्रैः ॥ प्रणम्य भक्त्या विनिवेश्य पीठे कृतोपचारं नृपतिर्बभाषे

tamāgataṁ prekṣya guruṁ munīnāṁ sārdhaṁ sadasyairakhilairmunīṁdraiḥ praṇamya bhaktyā viniveśya pīṭhe kṛtopacāraṁ nṛpatirbabhāṣe

उन आए हुए गुरु को सभी मुनीन्द्र सभासदों सहित देखकर, भक्तिपूर्वक प्रणाम करके, आसन पर बिठाकर, उनका सत्कार करके राजा बोला —

श्लोक 70 (skanda.3.113.70)

राजोवाच ॥ दृष्टं किमस्ति ते ब्रह्मस्त्रिलोक्यां किंचिदद्भुतम् ॥ तन्नो ब्रूहि वयं सर्वे त्वद्वाक्यामृतलालसाः

rājovāca dṛṣṭaṁ kimasti te brahmastrilokyāṁ kiṁcidadbhutam tanno brūhi vayaṁ sarve tvadvākyāmṛtalālasāḥ

राजा ने कहा — "हे ब्रह्मन्! क्या आपने त्रिलोकी में कोई अद्भुत बात देखी है? वह हमें बताइए; हम सभी आपके वाक्य-अमृत के लिए लालायित हैं।"

श्लोक 71 (skanda.3.113.71)

नारद उवाच ॥ अद्य चित्रं महद्दृष्टं व्योम्नोवतरता मया ॥ तच्छृणुष्व महाराज सहैभिर्मुनिपुंगवैः

nārada uvāca adya citraṁ mahaddṛṣṭaṁ vyomnovataratā mayā tacchṛṇuṣva mahārāja sahaibhirmunipuṁgavaiḥ

नारद ने कहा — "आज मैंने आकाश से उतरते हुए एक महान अद्भुत बात देखी है; उसे सुनिए, हे महाराज! इन मुनिश्रेष्ठों सहित।

श्लोक 72 (skanda.3.113.72)

अद्य मृत्युरिहायातो निहंतुं तव पुत्रकम्॥ दंडहस्तो दुराधर्षो लोकमुद्बाधयन्सदा

adya mṛtyurihāyāto nihaṁtuṁ tava putrakam daṁḍahasto durādharṣo lokamudbādhayansadā

"आज मृत्यु यहाँ तुम्हारे पुत्र को मारने के लिए आया — हाथ में दण्ड लिए, दुर्धर्ष, सदा संसार को पीड़ित करनेवाला।

श्लोक 73 (skanda.3.113.73)

ईश्वरोपि विदित्वैनं त्वत्पुत्रं हंतुमागतम् ॥ सहैव पार्षदैः कंचिद्वीरभद्रमचोदयत्

īśvaropi viditvainaṁ tvatputraṁ haṁtumāgatam sahaiva pārṣadaiḥ kaṁcidvīrabhadramacodayat

"ईश्वर ने भी, इसे तुम्हारे पुत्र को मारने आया जानकर, अपने पार्षदों सहित किसी वीरभद्र को भेजा।

श्लोक 74 (skanda.3.113.74)

स आगत्य हठान्मृत्युं त्वत्पुत्रं हंतुमागतम् ॥ गृहीत्वा सुदृढं बद्ध्वा दंडेनाभ्यहनद्रुषा

sa āgatya haṭhānmṛtyuṁ tvatputraṁ haṁtumāgatam gṛhītvā sudṛḍhaṁ baddhvā daṁḍenābhyahanadruṣā

"वह आकर, तुम्हारे पुत्र को मारने आए मृत्यु को हठपूर्वक पकड़कर, दृढ़ता से बाँधकर, क्रोधवश दण्ड से पीटा।

श्लोक 75 (skanda.3.113.75)

तं नीयमानं जगदीशसन्निधिं शीघ्रं विदित्वा भगवान्यमः स्वयम् ॥ कृतांजलिर्देव जयेत्युदीरयन्प्रणम्य मूर्ध्ना निजगाद शूलिनम्

taṁ nīyamānaṁ jagadīśasannidhiṁ śīghraṁ viditvā bhagavānyamaḥ svayam kṛtāṁjalirdeva jayetyudīrayanpraṇamya mūrdhnā nijagāda śūlinam

"उसे इस प्रकार ले जाया जाता देखकर, तुरन्त जगदीश की उपस्थिति को पहचानकर, भगवान यम स्वयं, हाथ जोड़कर 'जय हो देव' कहते हुए, सिर झुकाकर प्रणाम करके, उस शूलधारी से बोले —

श्लोक 76 (skanda.3.113.76)

यम उवाच ॥ देवदेव महारुद्र वीरभद्र नमोऽस्तु ते ॥ निरागसि कथं मृत्यौ कोपस्तव समुत्थितः

yama uvāca devadeva mahārudra vīrabhadra namo'stu te nirāgasi kathaṁ mṛtyau kopastava samutthitaḥ

"यम ने कहा — 'हे देवदेव महारुद्र वीरभद्र! तुम्हें नमस्कार है; निर्दोष मृत्यु पर तुम्हारा यह क्रोध कैसे उत्पन्न हुआ?

श्लोक 77 (skanda.3.113.77)

निजकर्मानुबंधेन राजपुत्रं गतायुषम्॥ प्रहर्तुमुद्यते मृत्यौ कोपराधो वद प्रभो

nijakarmānubaṁdhena rājaputraṁ gatāyuṣam prahartumudyate mṛtyau koparādho vada prabho

"'अपने ही कर्म के बन्धन से, आयु समाप्त हो चुके राजपुत्र को मारने के लिए उद्यत मृत्यु पर, हे प्रभु! क्रोध का यह अपराध क्या है, बताइए।'

श्लोक 78 (skanda.3.113.78)

वीरभद्र उवाच॥ दशवर्षसहस्रायुः स राजतनयः कथम्॥ विपत्तिमंतरायाति रुद्रस्नानहताशुभः

vīrabhadra uvāca daśavarṣasahasrāyuḥ sa rājatanayaḥ katham vipattimaṁtarāyāti rudrasnānahatāśubhaḥ

"वीरभद्र ने कहा — 'दस हजार वर्ष आयुवाला वह राजपुत्र, रुद्र-स्नान से अशुभ नष्ट हुआ, विपत्ति को कैसे प्राप्त हो सकता है?

श्लोक 79 (skanda.3.113.79)

अस्ति चेत्तव संदेहो मद्वाक्येऽप्यनिवारिते ॥ चित्रगुप्तं समाहूय प्रष्टव्योऽद्यैव मा चिरम्

asti cettava saṁdeho madvākye'pyanivārite citraguptaṁ samāhūya praṣṭavyo'dyaiva mā ciram

"'यदि इसमें तुम्हें सन्देह है, तो मेरे अनिवार्य वचन पर भी, चित्रगुप्त को बुलाकर आज ही पूछो, देर मत करो।'

श्लोक 80 (skanda.3.113.80)

नारद उवाच ॥ अथाहूतश्चित्रगुप्तो यमेन सहसागतः ॥ आयुःप्रमाण त्वत्सूनोः परिपृष्टः स चाब्रवीत्

nārada uvāca athāhūtaścitragupto yamena sahasāgataḥ āyuḥpramāṇa tvatsūnoḥ paripṛṣṭaḥ sa cābravīt

"नारद ने कहा — फिर बुलाए गए चित्रगुप्त, यम के साथ तुरन्त आए; तुम्हारे पुत्र की आयु-प्रमाण के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा —

श्लोक 81 (skanda.3.113.81)

द्वादशाब्दं च तस्यायुरित्युक्त्वाथ विमृश्य च ॥ पुनर्लेख्यगतं प्राह स वर्षायुतजीवितम्

dvādaśābdaṁ ca tasyāyurityuktvātha vimṛśya ca punarlekhyagataṁ prāha sa varṣāyutajīvitam

"'इसकी आयु बारह वर्ष है' — यह पहले कहकर, फिर विचार करके, पुनः लेख्य में देखकर उन्होंने दस हजार वर्ष का जीवन बताया।

श्लोक 82 (skanda.3.113.82)

अथ भीतो यमो राजा वीरभद्रं प्रणम्य च ॥ कथंचिन्मोचयामास मृत्युं दुर्वारबंधनात्

atha bhīto yamo rājā vīrabhadraṁ praṇamya ca kathaṁcinmocayāmāsa mṛtyuṁ durvārabaṁdhanāt

"फिर भयभीत राजा यम ने वीरभद्र को प्रणाम करके, किसी तरह मृत्यु को उस दुर्वार बन्धन से मुक्त कराया।

श्लोक 83 (skanda.3.113.83)

वीरभद्रेण मुक्तोऽथ यमोऽगान्निजमंदिरम् ॥ वीरभद्रश्च कैलासमहं प्राप्तस्तवांतिकम्

vīrabhadreṇa mukto'tha yamo'gānnijamaṁdiram vīrabhadraśca kailāsamahaṁ prāptastavāṁtikam

"वीरभद्र द्वारा मुक्त होकर, यम अपने भवन को चला गया; और वीरभद्र कैलास को, और मैं तुम्हारे समीप आया हूँ।

श्लोक 84 (skanda.3.113.84)

अतस्तव कुमारोऽयं रुद्रजाप्यानुभावतः ॥ मृत्योर्भयं समुत्तीर्य सुखी जातोऽयुतं समाः

atastava kumāro'yaṁ rudrajāpyānubhāvataḥ mṛtyorbhayaṁ samuttīrya sukhī jāto'yutaṁ samāḥ

"'इसलिए तुम्हारा यह कुमार, रुद्रजाप्य के प्रभाव से, मृत्यु के भय को पार करके, दस हजार वर्षों तक सुखी हुआ है।'"

श्लोक 85 (skanda.3.113.85)

इत्युक्त्वा नृपमामंत्र्य नारदे त्रिदिवं गते ॥ विप्राः सर्वे प्रमुदिताः स्वस्वजग्मुरथाश्रमम्

ityuktvā nṛpamāmaṁtrya nārade tridivaṁ gate viprāḥ sarve pramuditāḥ svasvajagmurathāśramam

यह कहकर राजा से विदा लेकर, नारद के स्वर्ग जाने पर, समस्त ब्राह्मण प्रसन्न होकर अपने-अपने आश्रम को चले गए।

श्लोक 86 (skanda.3.113.86)

इत्थं काश्मीरनृपती रुद्राध्यायप्रभावतः ॥ निस्तीर्याशेषदुः खानि कृतार्थोभूत्सपुत्रकः

itthaṁ kāśmīranṛpatī rudrādhyāyaprabhāvataḥ nistīryāśeṣaduḥ khāni kṛtārthobhūtsaputrakaḥ

इस प्रकार काश्मीर के राजा, रुद्राध्याय के प्रभाव से, समस्त दुःखों को पार करके, पुत्र सहित कृतार्थ हुए।

श्लोक 87 (skanda.3.113.87)

ये कीर्तयंति मनुजाः परमेश्वरस्य माहात्म्यमेतदथ कर्णपुटैः पिबंति ॥ ते जन्मकोटिकृतपापगणैर्विमुक्ताः शांताः प्रयांति परमं पदमिंदुमौलेः

ye kīrtayaṁti manujāḥ parameśvarasya māhātmyametadatha karṇapuṭaiḥ pibaṁti te janmakoṭikṛtapāpagaṇairvimuktāḥ śāṁtāḥ prayāṁti paramaṁ padamiṁdumauleḥ

जो मनुष्य परमेश्वर के इस माहात्म्य को कीर्तन करते हैं, और कानों से इसका पान करते हैं, वे करोड़ों जन्मों के अर्जित पाप-समूहों से मुक्त होकर, शान्त होकर, चन्द्रमौलि के परम पद को प्राप्त होते हैं।

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